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हमारी दोस्ती चाहिए तो अपने हिस्से का आरक्षण मुस्लिमों को भी दें दलित: शेहला रशीद की नई शर्त

जेएनयू की पूर्व छात्र नेता शेहला रशीद ने मुस्लिमों को एससी कैटेगरी के अंदर आरक्षण देने की माँग की है। शेहला ने सोशल मीडिया पर पूछा कि कौन लोग ऐसे हैं, जो मुस्लिमों का मित्र बनना चाहते हैं? इसके बाद उन्होंने शर्त रख दी। शेहला ने लिखा कि वो लोग ही मुस्लिमों के हितैषी हो सकते हैं, जो एससी कैटेगरी के अंदर दलित मुस्लिमों के लिए आरक्षण की माँग करें। शेहला ने कहा कि ये एक बेहतर शुरुआत होगी। शेहला का मानना है कि एससी वर्ग में मुस्लिमों को आरक्षण नहीं देना यह दिखाता है कि भारत मजहब के आधार पर भेदभाव कर रहा है। उन्हें लोगों ने जम कर जवाब दिया।

बता दें कि छात्र नेता रहीं शेहला रशीद ने जम्मू कश्मीर की राजनीति में क़दम रखा ही था कि उनकी पार्टी के संस्थापक शाह फैसल दिल्ली एयरपोर्ट पर तुर्की भागते हुए पकड़े गए। अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त कर दिया गया और उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा धरी की धरी रह गई। इसके बाद उन्होंने अल्लाह और इस्लाम की बातें करते हुए राजनीति से सन्यास ले लिया और ‘फ्रीलान्स प्रोटेस्टर’ बन गईं। जहाँ भी मोदी सरकार या भाजपा के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन होता है, शेहला या तो वहाँ पहुँचती हैं, या फिर सोशल मीडिया के माध्यम से समर्थन देती हैं।

दलित मुस्लिमों को एससी कैटेगरी के अंदर आरक्षण देने की शेहला की माँग का अर्थ क्या है? इसका मतलब ये होगा कि दलितों को मुस्लिमों के साथ एकता प्रदर्शित करने के लिए अपने हिस्से का आरक्षण और अन्य सरकारी सुविधाओं में मुस्लिमों को भी हिस्सा देना होगा। अगर मुस्लिमों को एससी कैटेगरी में आरक्षण X% मिलता है तो इसका अर्थ ये है कि उतनी ही संख्या में दलितों का हिस्सा कट जाएगा। क्या शेहला चाहती हैं कि दलितों को अगर मुस्लिमों के साथ रहना है तो उन्हें अपने हिस्से के आरक्षण की कुर्बानी देनी होगी?

सवाल तो ये भी उठता है कि जात-पात वगैरह तो हिन्दू समाज की देन है न? दशकों से वामपंथी इतिहासकारों का यही नैरेटिव रहा है। तो फिर ये ‘दलित मुस्लिम’ क्या होता है? इसका अर्थ ये है कि मुस्लिमों में भी जाति-व्यवस्था जम कर घुसी हुई है। वैसे मोदी-शाह की जोड़ी जिस तरह से एक-एक कर तीन तलाक़, अनुच्छेद 370, राम मंदिर और सीएए जैसे वादे पूरे कर रही है, उससे शेहला और उनका गैंग पहले से ही चिढ़ा हुआ है।

जामिया हिंसा: अयोध्या फैसले के बाद संविधान को ‘जलाने’ वाले ही आज CAA के विरोध में उसे बचाने उतरे

नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में शाहीन बाग पर हुए महिला प्रदर्शन के बाद सोशल मीडिया पर कई लोग वहाँ मौजूद महिलाओं की तारीफों के पुलिंदे बाँध रहे हैं। ट्वीट कर-करके हाईवे ब्लॉक करने वाली महिलाओं की तारीफ हो रही है। उन्हें नारी सशक्तिकरण का चेहरा बताया जा रहा है। इसी बीच रेहाना खातून नामक महिला की फोटो शेयर करके भी बताया जा रहा है कि वो अपने 20 दिन के बच्चे को लेकर इस कड़ाके की ठंड में केवल प्रदर्शन करने इसलिए आई हैं ताकि संविधान को बचाया जा सके। महिला का कहना है कि अगर वो ये प्रदर्शन नहीं करेगी, तो उनके बच्चे उससे पूछेंगे, “आखिर तुमने मेरे लिए किया ही क्या है।”

हालाँकि, जाहिर है कि शाहीन बाग के प्रदर्शन में शामिल महिलाओं की ऐसी तस्वीरों का प्रयोग सोशल मीडिया पर सीएए के ख़िलाफ़ खड़े लोगों की प्रतिबद्धता दर्शाने के लिए शेयर किया जा रहा है। लेकिन वामपंथी मीडिया गिरोह के हर ‘नाटक’ की तरह इस प्रदर्शन में भी एक ट्विस्ट है। जिसे समझने के लिए लिए हमें कुछ दिन पहले जाना पड़ेगा, जब राम मंदिर पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपना फैसला सुनाया था।

दरअसल, राममंदिर मामले में कोर्ट का फैसला आने के बाद जेएनयू छात्रों के बीच व्हॉट्सअप पर बातचीत हुई थी। जिसे पढ़ने के बाद आप वर्तमान में हो रहे प्रदर्शन की तस्वीर को सही से समझ पाएँगे और जान पाएँगे कि हाईवे जाम करने वालों के इस विरोध में कितनी सच्चाई है, इसे शुरू करने वाले लोगों का क्या उद्देश्य है?

ऊपर दिए चैट के स्क्रीनशॉट में देखा जा सकता है कि आज सड़के जाम करके संविधान को बचाने की बात करने वालों में शर्जील इमाम इस ग्रुप का हिस्सा है और जो अयोध्या पर फैसला आने के बाद संविधान को जलाने की बातें कर रहा है। साथ ही ये भी बोल रहा हैं कि वो सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुनाए फैसले को नहीं जला सकते, क्योंकि वो बहुत लंबा है। जिसपर वसीम नाम का सदस्य शर्जील की बात का रिप्लाई देते हुए कहता है कि वो संवैधानिक होने की कोशिश नहीं कर रहा, लेकिन ऐसा करने से उनपर कानूनी कार्रवाई हो सकती है।

बता दें, इस बातचीत में शर्जील सिर्फ़ इतना ही नहीं कहता। वो अपनी बात को ये कहकर शुरू करता है कि वो चाहता हैं कि संविधान को जलाने का समारोह जेएनयू में आयोजित हो। वो समझाता है कि किस तरह आखिर ये फैसला एक बदलाव का समय है और जो मुस्लिम संविधान की वाह-वाही कर रहे हैं उन्हें संदेश भेजा जाना चाहिए है कि वे संविधान में यकीन नहीं करते। इसलिए इसे जला दिया जाना चाहिए।

इसके बाद वो लोगों संविधान खारिज करने की अपील करते हुए कहता है कि इसके लिए ज्यादा लोगों की आवश्यकता नहीं है। सिर्फ़ कुछ मुस्लिम और गैर-मुस्लिम इसके लिए काफी हैं। इस बीच एक सनी नाम का ग्रुप सदस्य उसे सलाह देता है कि तुम ऐसा जेएनयू के दरवाजे के बाहर क्यों नहीं करते। जिसपर शर्जील जवाब देता है कि उसकी इच्छा है कि ये काम कहीं पर भी हो, लेकिन बस हो। ऐसे में जब कोई दूसरा शख्स उसे कहता है कि वे कोर्ट के फैसले को जला सकते हैं, तो शर्जील कहता है कि वो संविधान जलाने की सलाह देगा, क्योंकि फैसला 1500 पेजों का है।

अब आखिर ये शर्जील है कौन?

शर्जील इमाम जेएनयू में मॉडर्न हिस्ट्री का छात्र है। इसने आईआईटी बॉम्बे से कम्प्यूटर साइंस की पढ़ाई की है। साथ ही द वायर, द क्विंट और फर्स्टपोस्ट जैसे वामपंथी प्रोपगेंडा फैलाने वाली वेबसाइट्स में बतौर स्तंभकार काम करता है। इसके अलावा अपने खाली टाइम में शर्जील भीड़ को भड़काकर दंगे फैलाने और सड़कें जाम करने का काम भी करता है।

जिसका उदाहरण फेसबुक पर मुस्लिम स्टूडेंट ऑफ जेएनयू द्वारा अपलोड की गई 14 दिसंबर 2019 की वीडियो है। जिसमें शर्जील सीएए के ख़िलाफ़ भीड़ को कहता नजर आ रहा है कि उनकी संपत्तियाँ जब्त कर ली जाएँगी और उन्हें पाकिस्तान भेज दिया जाएगा। इसके अलावा 40 सेकेंड की वीडियो में वो कुरान का हवाला दे देकर बताने की कोशिश कर रहा है कि आखिर किस तरह कुरान, संविधान से ऊपर हैं। वीडियो में वो बताता हैं कि वो किस तरह एक जेएनयू का छात्र है और दिल्ली में चक्काजाम करना चाहता है।

वीडियो में उसे कहते सुना जा सकता है कि वो चाहता है कि दिल्ली में चक्का जाम हो। जिसके लिए वो समुदाय विशेष को केंद्र में रखकर कहता है कि मु###न सिर्फ़ दिल्ली में ही नहीं, बल्कि… हिंदुस्तान के 500 शहरों में चक्का जाम कर सकता है। इसके बाद वो भीड़ को उकसाते हुए कहता है “क्या मु###नों में इतनी हैसियत भी नहीं कि उत्तर भारत के शहरों को बंद कराया जा सके।”

संविधान को फासीवादी बताते हुए शर्जील यहाँ फिर कुरान का हवाला देता है और बताता है कि ये कुरान में है अगर कोई तुम्हें घर से निकाले तो तुम उसे घर से निकालो।

9 मिनट की वीडियो में ही शर्जील भीड़ को समझा देता है कि आखिर कैसे लोगों को सड़कों पर उतरने से हिचकना नहीं चाहिए। वो बताता है कि ये दिल्ली हैं और पुलिस की हर कार्रवाई पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया आएगी। इसके अलावा शर्जील ये भी कहता है, “आग लगाने के लिए 2 काम करने होंगे… लाठी खाने के लिए तैयार रहना होगा और नंबर दो ऑर्गनाइज़ (संगठित) रहना होगा।”

इतना ही नहीं, शर्जील इस वीडियो में जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों को भी खारिज करता दिख रहा है। शर्जील अपनी कट्टरता के अनुरूप भीड़ को तैयार करते हुए भीड़ को उन लोगों से दूर रहने की सलाह देता है जो जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने के लिए उन्हें बुलाते हैं। उसका कहना है, “अगर वो सच में हमारी परवाह करते हैं, तो उन्हें हमारे पास आना चाहिए। देखते हैं कौन आएगा।” इसके बाद वो भीड़ को अन्य समूहों के प्रति भड़काता है और कहता है कि आम आदमी पार्टी या AISA से उम्मीदें मत लगाइए। हम दिल्ली को बंद करना चाहते हैं, यहाँ दुकाने बंद करना चाहतें हैं, दूध की बिक्री बंद करना चाहते हैं।

अब सोचिए, 14 दिसंबर को जिस शर्जील की स्पीच में इतना जहर हो और जिसने दो मिनट भी मजहब से हटकर बात न की हो, जो दिल्ली बंद करने पर आमादा हो, सड़क जाम करवाने पर उतारू हो, जो कुरान का हवाला देकर बाकी सभी प्रदर्शनों को खारिज कर रहा हो… और जिसके कहने पर अगले ही दिन जामिया से 3 किलोमीटर दूर चलकर आए प्रदर्शनकारी वहाँ इकट्ठा हो जाएँ और कहें वे वहाँ संविधान को बचाने आए हैं। तो उस प्रदर्शन को क्या समझा जाएगा? ट्विटर पर 20 दिन के बच्चे के साथ उसकी माँ की तस्वीरें और संविधान बचाने के नामपर सड़कों पर बैठे लोगों की तस्वीर शेयर करके इस प्रोटेस्ट को गंभीरता रूप दिया जा रहा है।

लेकिन, जिसकी जड़ शर्जील जैसे लोग हैं और जिस प्रदर्शन का पूरा खाका एक कट्टरपंथी ने तैयार किया हो, उस समय शाहीन बाग का प्रोटेस्ट कितना वास्तविक लग सकता है और इसके पीछे का उद्देश्य क्या हो सकता है। ये खुद सोचिए…..

शर्जील लगातार 15वें दिन तक हाइवे ब्लॉक करने को अपने लिए गर्व की बात समझता हैं और लोगों को भड़काऊ बयान देकर उकसाना अपना फर्ज। लेकिन, उसे हीरो बनाने वालों को और उसके दिखाए रास्ते पर चलकर हाईवे पर बैठने वालों को ये याद रखने की जरूरत है कि शर्जील वही शख्स है जिसने एक महीने पहले अयोध्या फैसला आने पर संविधान को जलाने की बात की थी और अब मौक़ा देखकर इसे बचाने के नाम पर चक्काजाम करवा रहा है।

‘नया साल गैरों का त्योहार, मुस्लिम न मनाएँ खुशी वरना बनेंगे गुनहगार: देवबंद के उलेमा का फतवा’

उत्तरप्रदेश के सहारनपुर में देवबंदी उलेमा ने नए साल के मौक़े पर मुस्लिमों से अपील की है कि वे 1 जनवरी को नया साल न मनाएँ। न्यूजस्टेट की रिपोर्ट के मुताबिक उनका तर्क है कि 1 जनवरी को ईसाई धर्म के लोग नया साल मनाते हैं। इस्लाम में नया साल तो मोहर्रम से शुरु होता है। इसलिए वे लोग गैरों के त्योहार न मनाएँ और जो मुस्लिम इस 1 जनवरी को नया साल मनाते हैं वो गुनहगार होते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, नए साल के जश्न में डूबे युवाओं से इस तरह की अपील इत्तेहाद उलेमा ए हिन्द के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुफ्ती असद कासमी ने की है। उन्होंने कहा है कि आम तौर पर जनवरी को ही नए साल के रूप में मनाया जाता है। लेकिन इस्लामी नजरिए के एतबार से जनवरी इस्लामी साल की शुरुआत नहीं हैं। इसलिए वे इस्लामी नजरिए से बताते हुए कहते हैं कि इस्लाम का नया साल मोहर्रम से शुरु होता है और इस्लाम के अंदर मोहर्रम को ही नया साल माना जाता है।

उनके मुताबिक, जनवरी से जो नया साल शुरु होता है, उसे ईसाई धर्म को मानने वाले मनाते हैं। जिससे उन्हें कोई आपत्ति नहीं। लेकिन वह मुस्लिमों से ये अपील करना चाहते हैं कि जनवरी में कोई भी मुस्लिम इसकों न मनाए। क्योंकि जो भी जनवरी की शुरुआत में नया साल मनाते हैं वे गुनहगार होते हैं।

गौरतलब है कि इंटरनेट पर मौजूद इस विषय की जानकारी के अनुसार, इस विषय पर कई लोगों की अलग-अलग राय हैं। कुछ लोगों का मानना है कि वाकई इस्लाम के मुताबिक जनवरी में नए साल को मनाना एक गुनाह हैं और भूलकर भी ऐसा नहीं करना चाहिए। वहीं, कुछ समुदाय के लोगों का कहना है तथाकथित न्यू ईयर का जश्न मनाने के दौरान कई गुनाह होते हैं, जैसे नाच-गाने के दौरान महिला और पुरुष के बीच कोई पर्दा न होता, लोग शराब पीते हैं आदि-आदि। इसलिए गैर-मुस्लिमों को ही ये त्योहार मनाने देना चाहिए और इस तरह की चीजों का अनुसरण नहीं करना चाहिए। इसके अलावा लोग कहते हैं कि अगर इतने के बावजूद भी उनके मन में सवाल उठते हैं तो उन्हें इस विषय के बारे में मुफ्ती से पता करना चाहिए, ताकि मुफ्ती अन्य मुफ्तियों से बात करके इस बारे में फतवा जारी कर सके।

नए साल के अवसर पर मुस्लिम युवकों से अपील करने वाले उलेमा इससे पहले टीएमसी सांसद पर की गई टिप्पणी के कारण चर्चा का विषय रह चुके हैं। जहाँ उन्होंने नुसरत जहाँ द्वारा दुर्गा पूजा करने को नाजायज ठहराया था और कहा था कि इस्लाम में अल्लाह की इबादत के सिवा किसी और की इबादत करना/पूजा करना जायज नहीं है, उनको अपना नाम बदल लेना चाहिए। इस्लाम को ऐसे लोगों की जरूरत नहीं है जो मुस्लिम नाम रखकर इस्लाम और मुस्लिमों को बदनाम करे।

बुजुर्ग के सिर पर शिवसेना कार्यकर्ताओं ने उड़ेल दी स्याही: CM उद्धव की आलोचना की ‘सज़ा’

महाराष्ट्र में शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे की आलोचना करने वालों पर शिवसेना कार्यकर्ताओं का तांडव जारी है। अब बीड जिले के एक व्यक्ति को निशाना बनाया गया है, जिसे फेसबुक पर मुख्यमंत्री की आलोचना की थी। शिवसेना की एक कार्यकर्ता ने पूरे बोतल भर इंक एक व्यक्ति के ऊपर सिर्फ़ इसीलिए उड़ेल दिया, क्योंकि उसने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की आलोचना करते हुए पोस्ट लिखा था। महिला ने जब उस व्यक्ति पर इंक डाला, तब वो फोन से बात कर रहा था।

शिवसेना कार्यकर्ताओं ने बुजुर्ग को चारों ओर से घेर रखा था और उसे खरी-खोटी सुना रहे थे। इनमें कुछ शिवसेना की महिला कार्यकर्ताएँ भी शामिल थीं। इस दौरान वहाँ उपस्थित कई लोग तमाशबीन बन कर देखते रहे। अंत में महिला ने स्याही भरी बोतल निकाली और बजुर्ग के सिर और गले पर उड़ेल दिया। इस घटना का पूरा वीडियो नीचे संलग्न किया गया है, जिसे आप देख सकते हैं:

जिस बुजुर्ग पर स्याही डाली गई है, वो असल में एक सरकारी कर्मचारी है। महाराष्ट्र में सरकार, सत्ताधारी शिवसेना या मुख्यमंत्री ठाकरे की किसी प्रकार से भी आलोचना को शिवसेना कार्यकर्ता बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। हाल ही में एक व्यक्ति ने जब मुख्यमंत्री की आलोचना की तो उसके साथ मारपीट की गई और उसका सिर मुँड़वा दिया गया था। बाद में युवा सेना के अध्यक्ष आदित्य ठाकरे ने इस मामले में अपने कार्यकर्ताओं का बचाव किया था और पीड़ित को ही ‘नीच’ करार दिया था।

खोज उस क्रिएटिव डॉक्टर की, जिसने नकली पीड़ितों के हिजाब और जैकेट पर बैंडेज लगाया

एक आँख बाहर ताकती हुई, दूसरी आखों के ऊपर से सफ़ेद रंग की पट्टी, सिर में बैंडेज, पाँव में बैंडेज। जामिया गैंग के छात्र कुछ यूँ ही घूम रहे हैं। घायल अवस्था में। एक से बढ़कर एक फोटोज आ रहे हैं मार्किट में। किसी युवती के हिजाब के ऊपर से ही बैंडेज लगा दिया गया है तो किसी के जैकेट के ऊपर से ही पट्टियाँ बाँध दी गई हैं। कहीं इस आस्था में विरोध प्रदर्शन हो रहा है तो कहीं नाटक खेलने की बातें सामने आ रही हैं। जैसा कि सीएए विरोधी सेलेब्रिटी फरहान अख़्तर ने कहा है- “I don’t want to go into the details”, हम भी ये काम ‘फाल्ट न्यूज़’ वालों पर छोड़ते हैं।

आख़िर इन वामपंथियों का फैक्ट-चेक कर के अपना समय ही क्यों बर्बाद करना? यहाँ सवाल ये है कि आखिर किस क्रिएटिव नकली डॉक्टर ने ये मरहम-पट्टी की है, जिसने जैकेट और हिजाब के ऊपर से ही बैंडेज लगा दिया? चोट शरीर को आई है या कपड़े को? क्या ये वही डॉक्टर है, जिसके गैंग ने पाकिस्तान में कबूतर के गुदाद्वार से हेपेटायटिस का कीड़ा खिंच लेने वाला तरीका ईजाद किया है? अगर ऐसा है तो ये सोचने लायक बात है कि इन वामपंथियों को दवा किस मार्ग से खिलाया जाता होगा और पानी शरीर के किस भाग से होकर चढ़ाया जाता होगा?

ये फोटो क्रन्तिकारी हैं। वामपंथियों के पास इससे भी एक क़दम और आगे निकलने का मौक़ा है। वो गले में फाँसी की रस्सी लगा कर भी घूम सकते हैं ताकि लोगों को लगे कि उन्हें ‘अलोकतांत्रिक’ और ‘तानाशाह’ भारत सरकार ने सज़ा-ए-मौत दे दी है और वो मारे जा चुके हैं। लोग तो भला ठहरे बेवकूफ। वो समझेंगे कि ये जो भी वामपंथी विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, उन्हें फाँसी दी जा चुकी है। ठीक उसी तरह, जैसे जैकेट और हिसाब के ऊपर से मरहम-पट्टी की गई है।

ये ट्रेंड सही नहीं है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि ये सब पीएम मोदी के फिटनेस अभियान का विरोध कर रहे हैं? प्रधानमंत्री हमेशा योग करने, फिट रहने, व्यायाम करने और सुबह दौड़ लगाने की बातें करते हैं, ताकि लोग ख़ुद को फिट रख सकें। कहीं वामपंथियों ने ये तो नहीं ठान लिया है कि उन्हें फिट रहने के लिए कोई मजबूर नहीं कर सकता और वो ऐसे ही हाथ-पाँव टूटने का बहाना करते हुए घूमेंगे? या फिर कुछेक ने मोदी की इस नीति का विरोध करने के लिए ये भी प्रण किया हो कि तब तक दंगे और उपद्रव करेंगे, जब तक पुलिस उनका कचूमर निकाल कर उन्हें अनफिट नहीं कर देती।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अगर कल को कह दें कि शौच के बाद हमेशा हाथ-पाँव ठीक से धोना चाहिए तो ये वामपंथी कहीं… छोड़िए, जब ऐसा होगा तो आपको ख़ुद पता चल जाएगा। एक आँख, एक हाथ और एक पाँव वाले इन प्रदर्शनकारियों को सबसे पहले उस नकली डॉक्टर का नाम उजागर करना चाहिए। ऐसा इसीलिए, क्योंकि इससे लोगों को भी पता चलेगा कि शरीर घायल होने से कपड़ों की मरहम-पट्टी कर के भी मरीजों को ठीक किया जा सकता है और ऐसा तरीका ईजाद करने वाला क्रन्तिकारी वैज्ञानिक है कौन?

आश्चर्य की बात तो ये कि कुछ प्रदर्शनकारियों के बैंडेज पर ख़ून लगा हुआ भी दिख रहा है। वो लाल रंग का कौन सा पदार्थ है, इसकी जाँच होनी चाहिए। अगर वो केमिकल वाला रंग है तो ये और भी टेंशन वाली बात है क्योंकि कई मुस्लिम मानते हैं कि इस्लाम में रंग खेलना हराम है। हिजाब, उसके ऊपर लगी पट्टी और फिर पट्टी पर लगा लाल रंग का केमिकल। हाथ में एक बैनर हो और मुँह चिल्लाने की मुद्रा में हो तो फोटो परफेक्ट आता है। ठीक उसी एंगल से, जिससे लदीदा और आयशा की करतूतों को सुनियोजित तरीके से ब्रांडिंग के लिए शूट किया गया था।

जैकेट के ऊपर से मरहम-पट्टी: मदरसा छाप डॉक्टरों की करतूत?

जिन पत्थरबाज दंगाइयों को सच में पुलिस ने पीटा है, वो पोस्टर-बैनर लेकर बाहर निकल कर विरोध प्रदर्शन करने की हालत में हैं ही नहीं। आख़िर इतनी पिटाई के बाद कोई उपद्रवी फिर से बाहर निकलने की जहमत क्यों उठाएगा? योगी के मंत्री पहले ही ऐलान कर चुके हैं कि ऐसी कार्रवाई की जाएगी कि दंगाइयों की सात पुश्तें याद रखेंगी। तो सोचने वाली बात है, कोई दंगाई मार खा कर भी बाहर क्यों निकलेगा? अर्थात, जिन्होंने पुलिस के डंडे का स्वाद नहीं चखा है, वही बाहर निकले हुए हैं। मतलब वो लोग ‘नकली घायल’ हैं।

अगर सच में बैंडेज पहनने का शौक है तो उपद्रवियों के लिए दो विकल्प हैं। पहला विकल्प ये है कि वो यूपी में जाकर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने का प्रयास कर सकते हैं। पुलिस उनकी ऐसी मरम्मत करेगी कि वो ख़ुद असली मरहम-पट्टी के साथ लौटेंगे। लेकिन हाँ, वो फिर सड़क पर उतर कर ‘ड्रामा खेलने’ की हिम्मत शायद ही जुटा सकें। दूसरा विकल्प भी है। इस विकल्प में उन्हें ‘सेक्युलर बैंडेज’ मिलेगा और मुफ़्त में उनके बाल भी मुँड़ दिए जाएँगे। इसके लिए महाराष्ट्र में जाकर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की आलोचना करनी होगी। इसके बाद पुलिस की कोई ज़रूरत ही नहीं रह जाएगी। शिवसैनिक काम पूरा कर देंगे।

हालाँकि, शिवसेना ने जिन लोगों की पिटाई की है, वो बेचारे तो बाहर निकल कर विरोध प्रदर्शन भी नहीं कर सकते। अगली बार न जाने उनके साथ क्या हो! लेकिन हाँ, ये नकली बैंडेज और मरहम-पट्टी वाले सहानुभूति और समर्थन नहीं, हँसी के पात्र बन रहे हैं। आप भी हँस लीजिए, इन्हें देख कर।

राजस्थान: पाकिस्तान के सिंध से भागकर आए आठ हिन्दू शरणार्थियों को मिली भारतीय नागरिकता

संसद द्वारा 11 दिसंबर को नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) पारित होने के बाद, वर्ष 2000 से कोटा में रह रहे पाकिस्तान के आठ हिन्दू शरणार्थियों को सोमवार (30 दिसंबर) को भारतीय नागरिकता प्रदान की गई। इन सभी शरणार्थियों को कोटा के ज़िला कलेक्टर द्वारा नागरिकता का प्रमाण पत्र दिया गया था।

ख़बर के अनुसार, वे धार्मिक उत्पीड़न का सामना करने के बाद पाकिस्तान के सिंध प्रांत से भागकर हिन्दुस्तान आ गए थे। नए नागरिकों ने “इस बात पर ख़ुशी ज़ाहिर की कि अब वे भारतीय संविधान के अनुसार एक भारतीय नागरिक के रूप में अपना जीवन जी सकेंगे।”

भारतीय नागरिकता प्राप्त करने वालों में से एक ने कहा,

“हम यहाँ आए क्योंकि हमारे परिवार पहले से ही यहाँ हैं। हमें नागरिकता देने के लिए हम भारत के बहुत आभारी हैं। मैं बहुत ख़ुश हूँ और अपनी ख़ुशी व्यक्त करने लिए मेरे पास कोई शब्द नहीं हैं।”

इसके अलावा, एक अन्य शख़्स ने कहा, “हम 20-25 साल से यहाँ रह रहे हैं। हमने यहाँ कभी किसी समस्या का सामना नहीं किया। और वहाँ रहने वाले सभी सिंधी भारत आना चाहते हैं। हम यहाँ बहुत ख़ुश हैं। हमने अब तक किसी भी तरह की समस्या का सामना नहीं किया है।”

जबकि राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा था कि राज्य में नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) और नेशनल रजिस्टर फ़ॉर सिटीजन (NRC) लागू नहीं किया जाएगा, लेकिन स्थानीय प्रशासन ने इसे नागरिकता देने की एक नियमित प्रक्रिया बताया।

ग़ौरतलब है कि नागरिकता संशोधन क़ानून 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान से आए ग़ैर-मुस्लिम शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता देने का काम करता है। यह उन लोगों पर लागू होता है, जिन्हें धर्म के आधार पर उत्पीड़न के कारण भारत में शरण लेने के लिए मजबूर किया गया था। इसका उद्देश्य ऐसे लोगों को अवैध प्रवास की कार्यवाही से बचाना है। नागरिकता के लिए कट-ऑफ की तारीख 31 दिसंबर, 2014 है, जिसका अर्थ है कि आवेदक उस तारीख को या उससे पहले भारत में प्रवेश कर चुका हो।

नागरिकता (संशोधन) कानून की आवश्यकता क्यों?

CAA पर बवाल के बीच… Pak से प्रताड़ना का शिकार होकर भागे 7 शरणार्थियों को मिली नागरिकता

Pak मुस्लिम महिला हसीना बेन को मिली भारतीय नागरिकता: CAA के विरोध पर आँख खोलती खबर

मौलवी अब्बास सिद्दीक़ी ने दी धमकी, कहा- CAA को रद्द करो वर्ना कोलकाता हवाई अड्डे को ब्लॉक कर दूँगा

पश्चिम बंगाल में एक मौलवी ने धमकी दी है कि अगर नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) रद्द नहीं किया गया तो वो कोलकाता हवाई अड्डे को ब्लॉक कर देगा। यह दावा करते हुए कि देश की मजहबी आबादी के लिए नागरिकता क़ानून अनुचित है, पश्चिम बंगाल के जँगीपारा, हुगली में फुरफुरा शरीफ़ के मौलवी अब्बास सिद्दीक़ी ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से आग्रह किया कि वे सुप्रीम कोर्ट को या तो विवादास्पद नागरिकता क़ानून को चुनौती दें या फिर राज्य विधानसभा में इस क़ानून के ख़िलाफ़ कोई सख़्त क़ानून लाएँ।

टाइम्स नाउ से बात करते हुए मौलवी ने बताया कि उसने ममता बनर्जी से इस क़ानून को रद्द करने के लिए तत्काल क़दम उठाने के लिए कहा है अन्यथा “उन्हें (ममता बनर्जी) पश्चिम बंगाल में मुस्लिमों का समर्थन खोना पड़ जाएगा।” उसने कहा कि पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्ती के नेतृत्व में होने वाले विरोध-प्रदर्शन अन्य लोगों के लिए संतोषजनक हो सकते हैं, लेकिन वे समुदाय विशेष की आबादी को संतुष्ट करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

आपको बता दें कि 22 दिसंबर को पश्चिम बंगाल के मंत्री और जमीयत उलेमा-ए-हिन्द (जेयूएच) के प्रदेश अध्यक्ष सिद्दीकुल्लाह चौधरी ने कुछ दिन पहले केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को धमकी देते हुए कहा था कि अगर CAA को तुरंत वापस नहीं लिया गया तो वह अमित शाह को कोलकाता एयरपोर्ट से बाहर नहीं निकलने देंगे। उन्होंने कहा था कि जब भी शाह कोलकाता के दौरे पर आएँगे, हम उन्हें रोकने के लिए एक लाख लोग एयरपोर्ट के बाहर इकट्ठा कर देंगे।

रैली में वक्ताओं ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को CAA और NRC के ख़िलाफ़ अपना विरोध दर्ज कराने के लिए सड़कों पर उतरने के लिए धन्यवाद दिया था। चौधरी की टिप्पणी पर प्रतिक्रिया देते हुए, भाजपा की पश्चिम बंगाल इकाई के प्रमुख दिलीप घोष ने पीटीआई को बताया था कि चौधरी ने पूर्व में भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के समर्थन में ऐसी भड़काऊ टिप्पणियाँ कर चुके हैं।

देश में नागरिकता संशोधन क़ानून को लागू करने के केंद्र सरकार के फ़ैसले के ख़िलाफ़ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की नाराज़गी से प्रेरित होकर, पश्चिम बंगाल में मजहब विशेष के कई लोगों ने नागरिकता संशोधन क़ानून के ख़िलाफ़ विरोध-प्रदर्शन के बहाने अत्यधिक हिंसा, आगजनी, पथराव की घटनाओं को अंजाम दिया।

ममता बनर्जी, जो शायद अपने वोट बैंक को खोने से डरती हैं, हाल ही में नागरिकता संशोधन क़ानून को लेकर कहा था कि वह अपने राज्य पश्चिम बंगाल में CAA और NRC को लागू नहीं होने देंगी। तृणमूल कॉन्ग्रेस पार्टी (TMC) द्वारा नागरिकता क़ानून को ख़त्म करने के लिए एक अभियान चलाया गया था, जबकि इस क़ानून का उद्देश्य तीन पड़ोसी इस्लामिक देशों अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के प्रताड़ित गैर-मुस्लिमों को भारतीय नागरिकता प्रदान करना है।

TMC द्वारा पोस्टर लगाए गए थे जिसमें दावा किया गया था कि CAA और NRC को पश्चिम बंगाल में लागू नहीं किया जाएगा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी CAA और NRC के ख़िलाफ़ अपना विरोध दर्ज कराने के लिए कम से कम चार मौकों पर सड़क पर उतरीं।

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क्या इटली में नया साल मना रहे हैं राहुल गाँधी? कोटा में 940 बच्चों की मौत के बाद BJP नेता ने उठाए सवाल

भाजपा द्वारा कोटा में शिशुओं की मौत के कारण का निरीक्षण करने के लिए एक फैक्ट फाइंडिंग कमिटि गठित करने के एक दिन बाद, चार सदस्यीय पैनल ने मंगलवार (31 दिसंबर) को राजस्थान में कोटा ज़िले के एक अस्पताल का दौरा किया और रोगियों के साथ बातचीत की।

इस दौरान कमेटी के सदस्यों में से एक, लॉकेट चटर्जी ने कॉन्ग्रेस की अगुवाई वाली राजस्थान सरकार को आड़े हाथों लेते हुए उन्होंने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर झारखंड विधानसभा चुनावों में झामुमो-कॉन्ग्रेस-राजद गठबंधन की जीत का जश्न मनाने का आरोप लगाया, जब उनके राज्य में शिशु मर रहे थे।

चटर्जी ने राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी के खिलाफ़ रुख़ करते हुए कहा, “राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी कहाँ हैं? सरकारी की निर्दयता के कारण माताओं ने अपने शिशुओं को खो दिया।”

ख़बर के अनुसार, राहुल गाँधी पर तीखा प्रहार करते हुए, पश्चिम बंगाल के भाजपा सांसद ने ट्वीट किया,

“राहुल गाँधी निश्चित तौर पर इटली में नए साल की तैयारियों में व्यस्त होंगे। अगर उन्हें अन्य राज्यों का दौरा करने का समय मिलता है, तो वो राजस्थान क्यों न जाते और वहाँ की गंभीर स्थिति पर ध्यान नहीं देते?”

ग़ौरतलब है कि कोटा में एक महीने के भीतर 77 बच्चों की मौत हो गई, जिनमें से एक सप्ताह के भीतर 12 शिशुओं की मौत हुई। पिछले एक साल में 940 से अधिक बच्चों की मौत हुई है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने मुख्यमंत्री गहलोत से “संवेदनशील” मुद्दे से निपटने का आग्रह किया है।

फ़ैक्ट फ़ाइंडिंग के अन्य सदस्य कांता कर्दम (उत्तर प्रदेश), जसकौर मीणा (राजस्थान) और भारती पवार (महाराष्ट्र) हैं, जिन्होंने गहलोत सरकार पर आरोप लगाया है। इस पैनल की स्थापना सोमवार (30 दिसंबर) को भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष जे पी नड्डा ने की थी, जिसे तीन दिनों के भीतर अपनी रिपोर्ट पेश करनी है।

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आलम के साथ 14 वर्षीय तन्वी को कमरे में अकेला छोड़ा… अम्मी ने जब पढ़ाना चाहा कुरान तो खुली हिन्दू लड़की की आँखें

सोशल मीडिया पर अक्सर लोग अपने अनुभव शेयर करते रहते हैं। इसी क्रम में तन्वी नामक एक यूजर ने अपना अनुभव शेयर किया, जो चर्चा का विषय बना। तन्वी ने बताया कि जब वो स्कूल में थीं और उनकी उम्र महज 14 वर्ष थी, तब वो एक मुस्लिम लड़के के साथ रिलेशनशिप में थीं। उसका नाम आलम था और उसका सबसे अच्छा दोस्त भी एक हिन्दू लड़का ही था। आलम के बारे में तन्वी ने आगे बताया कि वो दिखने में अच्छा था और वो कभी-कभी उनके घर भी आया करता था। दरअसल, तन्वी ये देखना चाहती थीं कि उनके माता-पिता के आलम को लेकर क्या विचार हैं?

तन्वी भी कभी-कभी आलम के यहाँ जाया करती थीं। आलम उनके साथ काफ़ी अच्छा व्यवहार किया करता था और उसके अब्बू-अम्मी भी तन्वी के साथ काफ़ी मीठा व्यवहार करते थे। आलम ने तो अपने घर में सबको ये भी बता रखा था कि तन्वी उसकी गर्लफ्रेंड है। तन्वी मानो आसमान में उड़ रही थी। जिसके साथ वो रिलेशनशिप में थी, वो और उसका परिवार उसके साथ न सिर्फ़ सलीके से पेश आ रहा था बल्कि इतना अपनापन भी दिखा रहा था। उस उम्र में तन्वी के लिए ये बहुत बड़ी बात थी।

गड़बड़ियाँ तब शुरू हुईं, जब एक दिन तन्वी आलम के घर गईं। अचानक से आलम की 2 बहनें और 3 भाई बिना कुछ बताए घर से बाहर निकल गए। तन्वी और आलम को वहाँ अकेले छोड़ दिया गया। तन्वी बताती हैं कि उनके मन में काफ़ी सारी बातें चलने लगीं और उन्होंने अपनी ‘छठी इन्द्रिय’ का इस्तेमाल कर के सोचना शुरू कर दिया कि पाँचों उन दोनों को अकेले छोड़ कर घर से क्यों निकल गए? इसी बीच आलम भी तन्वी के काफ़ी नजदीक आना चाह रहा था लेकिन सोच में पड़ी तन्वी को लगा कि दाल में कुछ काला है और वो वहाँ से निकलने के उपाय ढूँढने लगीं।

लगभग 15 मिनट के बाद तन्वी ने अपनी माँ का फोन आने का बहाना बनाया और वो वहाँ से निकल गईं। अगले दिन आलम ने फोन कर के तन्वी से माफ़ी माँगी। तन्वी ने उससे पूछा भी कि वो किस बात के लिए सॉरी बोल रहा है? इसके जवाब में आलम ने कहा कि उस दिन जो भी हुआ, उसे लगता है कि तन्वी को ये सब अच्छा नहीं लगा, इसीलिए वो माफ़ी माँग रहा है। ये सब होने के 3-4 दिन बाद आलम की अम्मी ने तन्वी को कॉल किया और फोन में मीठी-मीठी बातें की। आलम की अम्मी ने तन्वी से पूछा कि वो उनके घर क्यों नहीं आ रही हैं?

आलम की अम्मी ने तन्वी को बताया कि वो उसे काफ़ी मिस कर रही हैं और जब उन्होंने चिकेन बिरयानी बनाई थी, तब भी उन्हें तन्वी की काफ़ी याद आई थी। तन्वी का माथा ठनका और वो ये सोचने लगी कि आलम की अम्मी, जिनके घर में बच्चों की कमी नहीं है, उनके ख़ुद के 5 बेटे-बेटियाँ हैं, वो भला उसे क्यों इतना याद करेंगी? आलम की अम्मी ने तन्वी को घर आने को भी कहा था। काफ़ी सोच-विचार के बाद तन्वी ने फ़ैसला किया कि वो उनसे मिलने जाएँगी क्योंकि वो आलम की अम्मी को एक अच्छी महिला मानती थीं।

जब वो आलम के यहाँ पहुंचीं, तो उसकी अम्मी कुरान पढ़ रही थीं। उन्होंने तन्वी को बैठने का इशारा किया और कुरान पढ़ने लगीं। कुछ देर बाद आलम की अम्मी ने तन्वी से कहा कि वो कुरान का पहला पन्ना पढ़ कर सुनाने जा रही हैं। तन्वी ने उन्हें बताया कि उसकी माँ हनुमान चालीसा पढ़ती हैं लेकिन उन्हें इस चीजों में उतना इंटरेस्ट नहीं है। ये सुनते ही आलम की अम्मी ने तन्वी से कहा कि ये सब ‘काफिरों की चीजें’ हैं और उसे इन सब से दूर ही रहना चाहिए। यही वो पल था जब तन्वी को पूरी तरह आलम के परिवार की सच्चाई पता चली। माँ का फोन आने के बहाने तन्वी वहाँ से किसी तरह भाग खड़ी हुईं।

तन्वी ने दौड़ते हुए घर आकर अपने पिता को ये बातें बताई। उसे डर था कि उसके पिता उसे मारेंगे-पीटेंगे लेकिन उन्होंने उसे गले से लगा लिया और रोने लगे। ये सब सुन कर तन्वी की माँ भी चिंतित हो गईं। दोनों ने उसके स्कूल में कॉल कर के तन्वी की सुरक्षा का ध्यान रखने को कहा। तन्वी के एक भाई को हमेशा उसके साथ रहने को कहा गया। उसके भाई ने आलम के घर जाकर उसके परिवार वालों को समझाया भी लेकिन उन्होंने अनसुना कर दिया। तन्वी को आज भी जब ये घटना याद आती हैं तो वो सोचती हैं कि समय पर आँखें न खुलतीं तो आलम का परिवार उसे पूरी तरह बर्बाद कर चुका होता।

तन्वी कहती हैं कि वो अभी भी भगवान शिव को धन्यवाद देती हैं क्योंकि अगर वो आलम या उसके परिवार के जाल से नहीं निकलतीं तो आज उनके भी 3 बच्चे होते और वो फिर से एक और को जन्म देने की तैयारी कर रही होतीं। आलम का परिवार फ़िलहाल एक मुस्लिम बहुल इलाक़े में रहता है। आलम और उसके सभी भाइयों की शादी हो चुकी है। वो सभी अपनी बीवियों, बच्चों और अब्बू-अम्मी के साथ एक 2 कमरे वाले फ्लैट में रहते हैं। तन्वी के इस अनुभव को सोशल मीडिया पर ख़ूब शेयर किया गया।

लड़े दलित और मुस्लिम, लेकिन दलित बनाम ब्राह्मण कह कर आग लगाई जाती है: भीमा कोरेगाँव का सच

शायद याद हो कि 2018 की 1 जनवरी को महाराष्ट्र के भीमा कोरेगाँव में क्या हुआ था। एक ऐतिहासिक युद्ध के 200 साल पूरे हुए थे, और हर बीते साल की तरह, इस साल भी एक खास जाति के लोग, अपने योद्धाओं की याद में एक छोटे आयोजन में भाग लेने के लिए जुटे। इनके दो सौ सालों के इतिहास में इस आयोजन में कभी भी किसी हिंसा का जिक्र नहीं है। लेकिन, जब वामपंथी नक्सली, माओवंशी कामरेड और घोर जातिवादी घृणा बाँटने वाले नव निर्वाचित विधायक जिग्नेश मवाणी का हाथ इसमें लगता है तो वहाँ पत्थरबाज़ी के कारण एक राहुल पतंगले की मौत हो जाती है।

उसके बाद जो हिंसा भड़कती है उसमें तीस पुलिस जवान समेत कई लोग घायल होते हैं और करीब 300 लोगों को हिरासत में लिया जाता है। उसके बाद प्रकाश अंबेडकर नामक एक व्यक्ति, जिसकी एकमात्र उपलब्धि भीम राव अंबेडकर का पोता होना है, वो इसमें कूद जाता है, और प्रदर्शनों का आह्वान करता है। पुलिस जाँच शुरू करती है और तब नए एंगल सामने आते हैं जो बताते हैं कि आखिर एक अहिंसक सम्मेलन, एक सुनियोजित हिंसक दुर्घटना का रूप कैसे ले लेती है।

अर्बन नक्सलियों के कुछ नेता पुलिस द्वारा पकड़े जाते हैं जिनका इस हिंसा को भड़काने से ले कर प्रधानमंत्री के हत्या की योजना बनाने तक में हाथ बताया जाता है। रोना विल्सन, वरावारा राव, अरुण फरेरा, सुधा भारद्वाज और गौतम नवलखा एक साथ पुलिस की छापेमारी के बाद धरे जाते हैं। उन पर केस चलता है, सुप्रीम कोर्ट उन्हें हाउस अरेस्ट में रखने की सलाह देती है।

अब ये समझिए कि दो साल पहले वहाँ ऐसा क्या हुआ था कि हर साल का शांत आयोजन हिंसक हो गया। हुआ यह कि जब शहरी नक्सलियों और दलितों के स्वघोषित नेताओं को पता चला कि दलित लोगों से संबंधित कुछ होने वाला है, तो उनके लिए यह वैसा ही मौका था जैसा कि खबरी गिद्ध राजदीप सरदेसाई संसद हमलों को मानते हैं: वैसा समय जब परिस्थितियाँ अनुकूल हों और आपकी बांछे खिला दें (जहाँ-जहाँ भी होती हैं)।

चूँकि, समुदाय विशेष को सत्तर साल पागल बनाने के बाद, नया मुस्लिम दलित है जिस पर एकमात्र नेत्री सुश्री मायावती जी का ही राज था, क्योंकि लालू टाइप के डकैत नेता सत्ता से बाहर हो चुके थे, तो दलित राजनीति को भड़काने के लिए जिग्नेश मवाणी टाइप के टुटपुँजिए लौंडों को एक दरार दिखी जहाँ वो पैर फँसा सकता था। विधायक बन कर तो वो हीरो बना, लेकिन नया-नया जोश उसे राष्ट्रीय परिदृश्य में स्थापित कर सकता था।

माओवंशी आंदोलन लाशें चाहता है

मवाणी को उन्हीं लोगों का साथ मिला जो सालों से इस देश के टुकड़े-टुकड़े करने से ले कर इनकी राह में आने वाले सारे लोगों को हटाने की योजना बना रहे थे। नरेन्द्र मोदी की हत्या इनकी योजना में शामिल थी। साथ ही, वामपंथी लम्पटों का जो टैम्पलेट है, आंदोलनों को सफल मानने का, उसके लिए हिंसा और कुछ लाशों की जरूरत पड़ती है।

तो इस दिन को अंग्रेजों और पेशवाओं की लड़ाई की जगह दलितों और ब्राह्मणों की लड़ाई के नाम पर प्रचारित किया गया, जो कि सर्वथा गलत है (जिस पर आगे चर्चा होगी)। और ब्राह्मणों के घुस जाने के बाद, आज के नैरेटिव में वहाँ ‘हिन्दुत्व’ घुसाया गया। हिन्दुत्व के आने से वैचारिक रूप से इन्हें उन आतंकियों का भी समर्थन मिल गया जो हिन्दुओं को हर दूसरे वाक्य में कोसते रहते हैं।

आंदोलन की रूपरेखा तो तैयार हो गई, स्टेज सज गया, वक्ता आ गए, लेकिन इससे आंदोलन सफल नहीं कहा जाता। वामपंथियों या भीम-मीम के आंदोलनों के नाम पर मासूम गरीबों को सड़क पर आगजनी करने को उकसाने वाले हमेशा कुछ लाशों की तलाश में रहते हैं। वो न सिर्फ हिंसा भड़काना चाहते हैं, बल्कि अपने ही लोगों से पेट्रोल बम फिंकवाते हैं, और भीड़ को कहते हैं कि देखो ब्राह्मणों ने बम फेंका तुम पर, तुम्हें 5000 सालों से सता रहे हैं, देखते क्या हो, यलगार हो!

भीड़ में आया गरीब, जो कि पिछले साल तक महार जाति के योद्धाओं के स्मारक पर पुष्प अर्पित करता था, आज यह पूछ भी नहीं पाया कि पत्थर फेंकने वाले, या आग का गोला फेंकने वाले ब्राह्मण ही हैं, यह कैसे पता चला? क्या उनकी तरफ की भीड़ में उन्हीं दलितों का प्रतिनिधित्व करने वाले लोगों में ब्राह्मण नहीं हैं? भारद्वाज कौन होते हैं? फिर भीड़ में पत्थर का जवाब पत्थर से देने को तैयार दलित गरीब पैदल सिपाही यह क्यों नहीं सोचता कि सामने भी तो कथित ब्राह्मणों के समर्थन में दलित भी खड़े हो सकते हैं?

लेकिन दंगाई सोच के शहरी नक्सिलयों और आतंकियों के पुरातन हिमायतियों ने उन्हें बताया कि यही तो उनके वंशज हैं जिन्हें तुम्हारे पूर्वजों ने धूल चटाई थी, वो अपना बदला लेने आ रहे हैं, टूट पड़ो। दलित टूट पड़ता है, कोई राहुल मारा जाता है, 16 साल का योगेश प्रह्लाद जाधव की हत्या होती है भीड़ में, 19 साल की दलित गवाह पूजा किसी कुएँ में मृत पाई जाती है। सैकड़ों घायल होते हैं उस एक हिंसक प्रदर्शन और उसके बाद के दंगों में।

उकसाने वालों में मिलिंद एकबोते और संभा जी भिड़े का नाम बताया जाता रहा जो कि माओ की नाजायज वामपंथी औलादों की हिंसक योजना का विरोध कर रहे थे। कहा गया कि इन्होंने ही हिंसा भड़काई जबकि जाँचों में पता चला कि वामपंथी गुंडे ठीक-ठाक समय से इस हिंसा की योजना बना रहे थे। वैसे भी, जहाँ माओवंशी कामपंथी आतंकी किसी योजना का हिस्सा हों, और उनकी योजना में दो-चार लाशें न गिरें, ऐसा संभव ही नहीं। पुणे पुलिस ने लगातार छापेमारी करके ऐसे उत्पाती योजनाकारों को पकड़ा जिन पर मामला चल रहा है।

दलितों के आंदोलन के नाम पर ऐसे ही, एक अफवाह के नाम पर, अप्रैल 2018 में नौ लोगों की जानें गईं जब दलित लोगों से यह कह दिया गया सरकार आरक्षण खत्म करने की योजना बना रही है। इन दंगों से जो नुकसान हुआ, वो किसका हुआ? न तो मवाणी का, न भीम आर्मी वाले रावण का, न उन नेताओं का जिन्होंने पैसे दे कर गरीब लोगों के हाथों में पेट्रोल से भींगी मशालें दीं, और कहा कि आग लगा दो। कानूनी केस किन पर चल रहे हैं? लेकिन पैदल सिपाहियों की कमी नहीं दिखती।

इनके हर आंदोलन में आम नागरिक की लाश की जरूरत होती है, और अगर वो स्वतः पूरी न हो रही हो, तो हाल के फर्जी प्रदर्शनों की तरह, आपस में ही देसी कट्टे से गोली मार कर पूरी कर दी जाती है। ये पैटर्न है। लोगों का मरना हर वामपंथी, या भीम-मीम आंदोलन की एक जरूरत है, जहाँ वो जरूरत ये लोग आपस में भी पूरी कर लेते हैं। इनके नेता स्टेज से भाषण दे कर भावनाएँ भड़काते हैं, इन्हें फर्जी बात सिखाई जाती है कि पाँच हजार सालों से तुम्हें सताया जा रहा है। कोई मुझे एक दस्तावेज ला कर दिखा दे जहाँ ऐसा लिखा हो कि ‘जाति’ जैसी कोई चीज थी भारत में मुगलों और अंग्रेजों के आने से पहले, या यह कि उनके साथ दुर्व्यवहार होता था।

इससे इनकार नहीं कि बाहरी आक्रमणकारियों और मुग़ल आतंकियों के यहाँ बस जाने के बाद जातिगत भेदभाव हमारे समाज में आया और हम उसकी आग से आज भी झुलस रहे हैं। जिस मनु स्मृति का जिक्र ये चम्पक हमेशा करते हुए, लोगों को मनुवादी कहते हैं, उन्हें पता भी है कि उसके 100,000 श्लोकों वाली इस स्मृति के संक्षिप्त रूपों में अब न सिर्फ 4,000 श्लोक ही बचे हैं, बल्कि उस पुस्तक की प्रतियाँ बहुत खोजने पर ही किसी घर में मिले। किसी ‘वाद’ को पकड़ने के लिए कम से कम उस आदमी को जानना तो पड़ेगा, उसकी बातें तो जाननी होंगी? दुर्भाग्य यह है कि दूसरों को मनुवादी कहने वालों से दो श्लोक पूछ दीजिए दाँत निपोड़ देगा, और जिसको कहते हैं, उससे भी पूछिए तो वो भी यही कहेगा कि इन भीम-मीम की नौटंकियों से पहले उन्होंने मनु स्मृति का नाम भी नहीं सुना था।

लेकिन उसी मनुवाद के नाम पर इन्हें भड़का कर दंगा कराया जाता रहा है, आगे भी कराया जाता रहेगा। मरेंगे भी वही लोग, मारेंगे भी आपस में ही, नेता तो विधायक बन जाएगा, उसके बाद चुप बैठा रहेगा।

भीमा-कोरेगाँव में हुआ क्या था?

1818 की पहली जनवरी को ईस्ट इंडिया कम्पनी और पेशवा बाजीराव द्वितीय के बीच एक युद्ध हुआ। इस युद्ध में अंग्रेजों की तरफ से पेशवा की सेना से लड़ने वाली टुकड़ी में कथित तौर पर दलित योद्धा थे, जिसे महार रेजिमेंट कहा जाता है। ये पूर्णतः सहमत होने वाली बात है, और इसका जिक्र भी है कि इस टुकड़ी में वाकई कथित निचली जातियों के सैनिक थे। इसी कारण इस युद्ध को ‘दलितों ने जब उच्च जाति के शोषक, उत्पीड़क ब्राह्मण पेशवा को हराया’ के रूप में आज कल प्रचारित किया जाता है।

लेकिन सच्चाई इससे बहुत दूर है। ये कोरी गप्पबाजी और बकवास है, चाहे तार्किक रूप से देखें, या तथ्यों को सामने रखा जाए। इनका मानना है कि पेशवा ब्राह्मण थे, तो उसकी अंग्रेजों के हाथों हुई हार को इसलिए दलितों की जीत कहा जाए क्योंकि लड़ने वाले दलित सिपाही थे। अब इसमें समस्या जो है, वो यह है कि दलित सैनिक यहाँ किसी स्वतंत्र टुकड़ी के सिपाही नहीं थे, बल्कि वो ईस्ट इंडिया कम्पनी की एक टुकड़ी के सिपाही थे, जिसमें उनके अलावा और भी धर्म-मजहब-जाति के सैनिक थे।

ऐसा किसी दस्तावेज में नहीं लिखा है कि ईस्ट इंडिया कम्पनी के बॉम्बे नेटिव इन्फैंट्री, जो पेशवा से लड़ी, उसमें पूरा तो छोड़िए अधिकतर भी दलित थे। कुछ रहे होंगे, संभव है लेकिन आज भी रेजिमेंट के नाम होने का मतलब यह नहीं होता कि सिख रेजिमेंट में सिख ही होते हैं। 1932 में अंबेडकर ने स्वयं यह माँग रखी थी कि महार समुदाय के ज्यादा सैनिकों को सेना में जाने का मौका मिलना चाहिए।

आप जब युद्ध में जाते हैं तो आप पाकिस्तान को हराना चाहते हैं, आप किसी भी धर्म के भारतीय सैनिक हों, निशाने पर पाकिस्तान का झंडा होता है न कि मजहब। उसी तरह, यह मानना मूर्खता है कि ब्रिटिश की तरफ से लड़ने वाले दलित ये सोच कर लड़ रहे होंगे कि आज तो पेशवा के ब्राह्मणवाद को ऐसी धूल चटाएँगे कि 2019 में इसकी वैचारिक सहमति वाले मनुवादियों की सरकार ही न आ पाए। ऐसा नहीं होता।

एक पल को चलिए मान लेते हैं कि वो खुन्नस में थे कि पेशवा ब्राह्मण है, तो उसे हराना एक निजी संतुष्टि देगी और उसके सैनिकों को मारना दलित अस्मिता के नए कीर्तिमान रचेगा। लेकिन जितना सच यह है कि ईस्ट इंडिया कंपनी के झंडे के लिए दलित लड़ रहे थे, उतना ही बड़ा सच यह है कि पेशवा की सेना में अरबी (मुस्लिम) थे। इसकी चर्चा कई जगहों पर, अंग्रेजों द्वारा लिखे गए इतिहास में ही है। तो कायदे से तो ये लड़ाई या तो अंग्रेजों ने मराठा पेशवा के साथ लड़ कर जीती, या फिर दलित सैनिकों ने मुस्लिम सैनिकों का गला रेत कर ये जीत हासिल की।

पीटर ऑबेर की पुस्तक  ‘Rise and Progress of the British Power in India’ से

इसे आधे तर्क के साथ देखना बस यही बताता है कि आप कह देंगे कि मैकग्राथ खराब क्रिकेटर है क्योंकि उसकी बैटिंग एवरेज तो ऋषभ पंत से भी खराब है। फिर आपको पंत की बॉलिंग एवरेज और औसत भी तो देखना होगा। वो आप नहीं करेंगे क्योंकि इधर दलित सैनिक है, उधर ब्राह्मण पेशवा का झंडा! या तो झंडा बनाम झंडा तौलिए, या फिर सैनिक बनाम सैनिक। अगर यह कम है तो रामचंद्र क्षीरसागर की पुस्तक ‘दलित मूवमेंट इन इंडिया एंड इट्स लीडर्स, 1857-1956’ में यह भी लिखा है कि महार जाति के सैनिक मराठा के लिए भी लड़ा करते थे।

रामचंद्र क्षीरसागर की पुस्तक ‘दलित मूवमेंट इन इंडिया एंड इट्स लीडर्स, 1857-1956’ से

इसलिए, वामपंथियों के नैरेटिव से बचिए क्योंकि वो कब किसको कट्टे से मार कर आपकी जाति का हीरो बना कर खुद सत्ता में पहुँच जाएँ, या वैटिकन से फंडिंग पा जाएँ, आपको पता भी नहीं लगेगा। जहरीली वामपंथन लहसुनधति रॉय के गैरकानूनी बंग्ले के बारे में आपको पता है कि वो उन्हीं जंगलों की जमीन का अतिक्रमण कर के बनी है जिसकी बातें वो पूरी दुनिया में करती रहती है। ये है सच इन माओ की नाजायज औलादों का जिन्हें अपनी राजनैतिक बेहतरी के लिए आम दलितों की टूटी रीढ़ या सर मे लगी गोली का सहारा चाहिए, और वो काम भी कट्टा ले कर ये लोग स्वयं करते हैं।