Home Blog Page 5200

‘अल्पसंख्यकों को मोदी-शाह की हत्या कर देनी चाहिए’ – गिरफ्तार हुआ कॉन्ग्रेस नेता व लेखक

नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) के ख़िलाफ़ यूँ तो देश भर में विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं और जगह-जगह हिंसक विरोध-प्रदर्शनों की ख़बरें सुर्ख़ियों में बनी रहीं। इस बीच, तमिलनाडु के एक लेखक और कॉन्ग्रेस नेता नेल्लई कन्नन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री को लेकर ऐसी टिप्पणी कर दी, जिससे उन्हें पेरांबलूर से गिरफ़्तार कर लिया गया। कन्नन की गिरफ़्तारी के लिए बीजेपी जमकर विरोध-प्रदर्शन कर रही थी। बता दें कि कन्नन के ख़िलाफ़ 15 से अधिक मामले दर्ज किए गए हैं। तमिलनाडु पुलिस ने भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा-504, 505, 505 (2) के तहत FIR दर्ज की है।  

दरअसल, शनिवार (29 दिसंबर) को सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया ने CAA के विरोध में बैठक बुलाई थी। इस बैठक में कॉन्ग्रेस नेता नेल्लई कन्नन ने भी भाषण दिया था। इस भाषण में उन्होंने नागरिकता संशोधन क़ानून और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) के ख़िलाफ़ टिप्पणियाँ की थी। इस दौरान नेल्लई कन्नन ने लोगों को भड़काते कहा था कि अल्पसंख्यकों को पीएम मोदी और अमित शाह की हत्या कर देनी चाहिए। उन्होंने कहा था कि उन्हें उम्मीद थी कि कोई प्रधानमंत्री और गृह मंत्री शाह को ख़त्म कर देंगे, लेकिन किसी ने ऐसा नहीं किया।

गिरफ़्तार किए गए लेखक कन्नन ने कहा था कि पीएम नरेंद्र मोदी के पीछे अमित शाह का दिगाम है और दोनों में से किसी एक को समाप्त होना चाहिए, लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हो सका। 

इस प्रकार के विवादित बयान पर बीजेपी ने कड़ा विरोध जताया। बीजेपी के राष्ट्रीय सचिव एच राजा ने तमिलनाडु पुलिस से कन्नन के ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की माँग की। उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, “कॉन्ग्रेस नेता नेल्लई कन्नन ने अपने भाषण में पीएम और गृहमंत्री को ख़त्म करने के लिए मु###नों को उकसाया है। मैंने तमिलनाडु पुलिस के महानिदेशक से व्हाट्सएप पर और ऑनलाइन भी शिक़ायत की है। मैं तमिलनाडु सरकार से तत्काल कार्रवाई करने का अनुरोध करता हूँ।”

अपने एक अन्य ट्वीट में उन्होंने लिखा, “कन्नन ने न सिर्फ़ पीएम मोदी और अमित शाह के ख़िलाफ़ अपमानजनक टिप्पणी की है, बल्कि उन्होंने पीएम और गृहमंत्री को जान से मारने की धमकी दी।” इसके आगे उन्होंने लिखा कि कन्नन कुछ ऐसा करना चाहते हैं जैसा तमिलनाडु में राजीव गाँधी के साथ हुआ था।

नेल्लई कन्नन की टिप्पणी के ख़िलाफ़ बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं ने बुधवार (1 जनवरी 2020) को चेन्नई के मरीना के बीच पर गाँधी प्रतिमा के पास बैठकर तमिल लेखक की गिरफ़्तारी तक धरना दिया था। इसमें बीजेपी के चार वरिष्ठ नेता पोन राधाकृष्णन, सीपी राधाकृष्णन, एल गणेशन और एच राजा भी शामिल थे। 

ग़ौरतलब है कि नागरिकता संशोधन क़ानून 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान से आए ग़ैर-मुस्लिम शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता देने का काम करता है। यह उन लोगों पर लागू होता है, जिन्हें धर्म के आधार पर उत्पीड़न के कारण भारत में शरण लेने के लिए मजबूर किया गया था। इसका उद्देश्य ऐसे लोगों को अवैध प्रवास की कार्यवाही से बचाना है। नागरिकता के लिए कट-ऑफ की तारीख 31 दिसंबर, 2014 है, जिसका अर्थ है कि आवेदक उस तारीख को या उससे पहले भारत में प्रवेश कर चुका हो।

CAA पर हिंसा करने वाले ख़ुद से पूछें कि क्या उन्होंने सही किया, PM मोदी ने उपद्रवियों को चेताया

1 अप्रैल से NPR: घर-घर जाकर जुटाया जाएगा डाटा, मोदी सरकार ने ₹8500 करोड़ की दी मंजूरी

‘अमित शाह दुनिया छोड़ो’: मजहबी नारों और हिंसा के बाद जामिया में मोदी को हिटलर बताते स्लोगन

कोटा में बच्चों की मौत पर प्रियंका गाँधी ‘बेनकाब’: UP में राजनीति व राजस्थान में चुप्पी पर मायावती ने साधा निशाना

राजस्थान के कोटा में लगातार हो रही बच्चों की मौत का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेताओं की चुप्पी को अब अन्य पार्टियाँ संदेह की नजर से देख रही हैं। इस कड़ी में भारतीय जनता पार्टी के बाद बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत समेत कॉन्ग्रेस की महिला राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा पर खुलेआम निशाना साधा है।

बीएसपी अध्यक्ष मायावती ने आज इस मामले को ट्विटर पर उठाते हुए पहले बच्चों की मौत को अति दुखद और दर्दनाक बताया। फिर उन्होंने मुख्यमंत्री गहलोत और राज्य सरकार के रवैये को गैर जिम्मेदार और उदासीन करार दिया।

उन्होंने लिखा, “कॉन्ग्रेस शासित राजस्थान के कोटा जिले में हाल ही में लगभग 100 मासूम बच्चों की मौत से माँओं का गोद उजड़ना अति-दुःखद व दर्दनाक है। तो भी वहाँ के सीएम गहलोत स्वयं व उनकी सरकार इसके प्रति अभी भी उदासीन, असंवेदनशील व गैर-जिम्मेदार बने हुए हैं, जो अति-निन्दनीय।”

इसके बाद उन्होंने राज्य सरकार के रवैये से भी ज्यादा दुखद प्रियंका गाँधी द्वारा इस मामले पर चुप्पी साधने को बताया। उन्होंने आगे लिखा, “किन्तु उससे भी ज्यादा अति दुःखद है कि कॉन्ग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व व खासकर महिला महासचिव की इस मामले में चुप्पी साधे रखना। अच्छा होता कि वह यूपी की तरह उन गरीब पीड़ित माँओं से भी जाकर मिलतीं, जिनकी गोद केवल उनकी पार्टी की सरकार की लापरवाही आदि के कारण उजड़ गई हैं।”

वे प्रियंका गाँधी की मंशा पर सवाल उठाते हुए लिखती हैं, “यदि कॉन्ग्रेस की महिला राष्ट्रीय महासचिव राजस्थान के कोटा में जाकर मृतक बच्चों की ‘माँओं‘ से नहीं मिलती हैं तो यहाँ अभी तक किसी भी मामले में यूपी पीड़ितों के परिवार से मिलना केवल इनका यह राजनैतिक स्वार्थ व कोरी नाटकबाजी ही मानी जाएगी, जिससे यूपी की जनता को सर्तक रहना है।”

गौरतलब है कि बीते दिनों यूपी में भड़की हिंसा में मारे गए लोगों के परिजनों से मिलकर अपनी संवेदना व्यक्त करने के लिए प्रियंका गाँधी सुरक्षाकर्मियों एवं अधिकारियों पर इल्जाम लगाते, नियम तोड़ते तक पाईं गईं। लेकिन जब बात कॉन्ग्रेस शासित राज्य की आई तो उन्होंने चुप्पी साध ली। जिससे विपक्षी पार्टियों को उनपर सवाल उठाने का मौक़ा मिला और उनकी मंशा पर संदेह जताने का भी।

शाहीन बाग़ की आवारा भीड़ पर बावली हुई जा रही मीडिया की नज़र में कोटा के बच्चों की जान सस्ती

कोटा: 13 घंटे में मर गए 5 और बच्चे, राजस्थान के हेल्थ मिनिस्टर ने मौतों को CAA के विरोध से जोड़ा

कोटा में 1 सप्ताह में 22 बच्चों की मौत, CM गहलोत ने कहा- हमारे यहाँ इलाज और दवाइयाँ फ्री

मर गए 14 और बच्चे: कोटा के जेके लोन अस्पताल में टूटे हुए हैं ख़िड़की-दरवाजे, घूमते हैं सुअर

‘सभी मूर्तियों को हटा दिया जाएगा… केवल अल्लाह का नाम रहेगा’: IIT कानपुर में जाँच कमिटी गठित, 15 दिन में रिपोर्ट

नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध के नाम पर जामिया विश्वविद्यालय में हिंसा भड़काने वाले छात्रों पर हुई पुलिस कार्रवाई के खिलाफ IIT कानपुर में 17 दिसंबर को हुए प्रदर्शन के मामले ने अब तूल पकड़ लिया है। जहाँ संस्थान के कई प्रोफेसरों ने कुछ दिन पहले शिकायत की थी कि 17 दिसंबर को हुए प्रदर्शन में शामिल छात्रों ने अपना विरोध जताने के लिए पाकिस्तानी शायर फैज अहमद की नज्म ‘हम देखेंगे, लाजिम है हम भी देखेंगे…’ गाई। इन लोगों ने आरोप लगाया कि यह हिंदू और राष्ट्र विरोधी है। अब IIT कानपुर में इस पर एक उच्चस्तरीय जाँच कमिटी गठित की गई है। कमिटी इस बात की जाँच कर रही है कि जिस दिन यह नज्म IIT कैंपस में गाया गया, क्या उसके दौरान विश्वविद्यालय के नियमों का उल्लंघन किया गया। कमिटी यह भी देखेगी कि इस नज्म के गाने के बाद सोशल मीडिया पर जो पोस्ट इसके संबंध में डाले गए, वो भड़काऊ थे या नहीं। कमिटी 15 दिन के भीतर रिपोर्ट आईआईटी निदेशक को देगी।

नज्म के बोल इस तरह हैं“लाजिम है कि हम भी देखेंगे, जब अर्ज-ए-खुदा के काबे से, सब बुत उठाए जाएँगे, हम अहल-ए-वफा मरदूद-ए-हरम, मसनद पे बिठाए जाएँगे। सब ताज उछाले जाएँगे, सब तख्त गिराए जाएँगे। बस नाम रहेगा अल्लाह का। हम देखेंगे।”

इस नज्म को फैज ने 1979 में सैन्य तानाशाह जिया-उल-हक के संदर्भ में और पाकिस्तान में सैन्य शासन के विरोध में लिखी थी। जिसके बाद फैज अपने क्रांतिकारी विचारों के कारण कई सालों तक जेल में रहे थे।

गौरतलब है कि जामिया मिलिया इस्लामिया में छात्रों का प्रदर्शन उग्र होने के बाद पुलिस को लाठियाँ चलानी पड़ी थी। जिसके बाद पुलिस कार्रवाई की निंदा करने के लिए कई संस्थानों में छात्रों ने विरोध किया। इस कड़ी में आईआईटी कानपुर के छात्रों ने भी प्रदर्शन की अनुमति आईआईटी प्रशासन से माँगी। हालाँकि शहर में धारा-144 लागू होने के कारण उस समय प्रशासन ने इसकी अनुमति नहीं दी, लेकिन फिर भी उन्होने शांति मार्च निकालकर अपना विरोध जताया।

इसी बीच कुछ छात्रों ने वहाँ राष्ट्र और हिंदू विरोधी भाषणबाजी की। साथ ही पाकिस्तानी शायर फैज अहमद की नज्म गाई। कुछ छात्रों ने इसका तब विरोध भी किया था। जिससे छात्रों के बीच तनाव हो गया और एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुई।

बता दें कि इस मामले में संस्थान के फैकल्टी सदस्य डॉ वाशी शर्मा समेत 16 फैकल्टी सदस्यों और छात्रों ने शिकायत दर्ज की। शिकायत में स्पष्ट लिखा है कि इस नज्म के कुछ बोल ऐसे हैं, जो हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुँचा सकते हैं।

शिक़ायतकर्ता डॉ वाशी शर्मा ने IIT प्रशासन से “नफ़रत फैलाने वाली भीड़ के ख़िलाफ तत्काल अनुशासनात्मक और क़ानूनी कार्रवाई” करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि इस कार्यक्रम के आयोजकों और मास्टरमाइंड की पहचान की जानी चाहिए और उन्हें तुरंत निष्कासित कर दिया जाना चाहिए।

संस्थान के डिप्यूटी डॉरेक्शन मनिंदर अग्रवाल के अनुसार, इस मामले में 6 सदस्यों की कमिटी को गठित किया गया है। जिसका नेतृत्व वे खुद कर रहे हैं, ताकि मामले में जाँच की जा सके। कुछ छात्रों से पूछताछ की जा रही है, जबकि अन्य कुछ छात्रों से तब पूछताछ की जाएगी, जब वे छुट्टियों से आएँगे।

डिप्यूटी डॉयरेक्टर के अनुसार, इस कविता के शब्दों को लेकर सोशल मीडिया पर भी द्वंद्व जारी है। कुछ इसके समर्थन में हैं और कुछ इसके विरोध में।

आईआईटी निदेशक प्रोफेसर अभय करंदीकर के मुताबिक जाँच कमिटी से 15 दिन में रिपोर्ट मांगी गई है। अगर छात्र दोषी पाए गए, तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी। उनका संस्थान से निष्कासन तक किया जा सकता है। बता दें कि नज्म के बोलों के अलावा संस्थान में इस बारे में भी जाँच की जा रही है कि बिना अनुमति 17 दिसंबर को छात्रों ने शांति मार्च कैसे निकाल लिया।

‘सभी मूर्तियों को हटा दिया जाएगा… केवल अल्लाह का नाम रहेगा’: IIT कानपुर में हिंदू व देश विरोधी-प्रदर्शन

IIT-B के छात्र नागरिकता विधेयक के पक्ष में, वामपंथी फैकल्टी के डर से नहीं आ रहे सामने

26 साल बाद परीक्षा, 1 साल विवाद, अब मेरिट जंजाल: कमलनाथ राज में सड़क पर शिक्षा

बीते साल के आखिरी दिनों में सोशल मीडिया में एक शब्द खासी चर्चा में रहा था। यह शब्द है- क्रोनोलॉजी। कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गॉंधी ने 27 दिसंबर को ट्वीट कर एक क्रोनोलॉजी पेश की। ऐसा करते वक्त उनके निशाने पर भले केंद्र की मोदी सरकार थी, पर उन्होंने इसकी प्रेरणा कॉन्ग्रेस शासित मध्य प्रदेश से ली थी।

बेरोजगारी भत्ते का वादा कर सत्ता में आई कमलनाथ के नेतृत्व वाली प्रदेश सरकार न केवल अपने कहे से मुकर चुकी है, बल्कि उसके साल भर के ही शासन में राज्य में बेरोजगारों की संख्या भी करीब 7 लाख बढ़ गई है। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय ​राजनीतिक प्रयोगशाला में बदल दिया गया है। पूर्ववर्ती शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने ढाई दशक बाद सहायक प्राध्यापकों (असिस्टेंट प्रोफेसर्स) की भर्ती का जो रास्ता खोला था, वह साल भर विवादों में रहा। पदयात्रा, मुंडन, धरना-प्रदर्शनों के बाद सरकार नियुक्ति प्रक्रिया शुरू करने को झुकी। लेकिन, आरक्षित वर्ग की उन 91 महिलाओं की ही अनदेखी कर दी गई जो मेरिट लिस्ट में हैं। उपेक्षा से आहत अतिथि विद्वान तो इस कड़ाके की ठंड में करीब दो हफ्ते से धरने पर बैठे हैं। राज्य सरकार की साख किस कदर गर्त में है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इनमें से किसी को मुख्यमंत्री कमलनाथ तक के आश्वासन पर यकीन नहीं है।

आखिर ऐसा क्या हुआ कि जिन्हें क्लासरूम में बच्चों को इस समय पढ़ाते रहना था वह खुद सड़क पर हैं? इसे जानने से पहले शिल्पी वर्मा को सुनते हैं। मध्य प्रदेश लोकसेवा आयोग (MPPSC) की सहायक प्राध्यापक भर्ती परीक्षा की चयनित सूची में शिल्पी ज्योग्राफी की मेरिट लिस्ट में हैं। बकौल शिल्पी उनसे कम अंक पाने वालों को नियुक्ति पत्र मिल चुके हैं। लेकिन, वे इससे महरूम हैं।

उच्च शिक्षा विभाग के मंत्री जीतू पटवारी से मुलाकात के बाद अपनी बात रखती शिल्पी वर्मा

शीतल हो या महजबीन… दर्द साझा

शिल्पी अकेली नहीं हैं। उनकी जैसी 91 महिलाएँ हैं। श्वेता हार्डिया, महजबीन अंसारी, शीतल वर्मा, प्रीति तगाया, शीतल जोशी, अरुणा सोलंकी, प्रीति देशमुख, दिव्या पटेल, सबाहत अंजुम कुरैशी, चंदा यादव, दिव्या सेप्ता, इंदिरा परमार…वगैरह। इन सबके विषय अलग-अलग हैं। अलग-अलग शहरों की हैं। ये सब आरक्षित वर्ग की वे चयनित आवेदक हैं जिनका नाम मेरिट लिस्ट में है। लेकिन इनको नियुक्ति पत्र नहीं दिया गया। इनमें 70 ओबीसी, 18 अनुसूचित जाति और 3 अनुसूचित जनजाति से हैं।

प्रीति तगाया ने ऑपइंडिया को बताया कि अपनी समस्या को लेकर वे लोग कई बार MPPSC और उच्च शिक्षा विभाग के सचिव से मिल चुकी हैं। तीन बार राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री जीतू पटवारी के पास भी फरियाद लगा चुकी हैं। उन्होंने बताया कि पटवारी ने अगली सुनवाई पर उनकी की कंडीशनल नियुक्ति के लिए हाई कोर्ट में एफिडेविट दाखिल किए जाने का भरोसा दिलाया है।

मंत्री जीतू पटवारी को अपनी परेशानी से अवगत करातीं मेरिट लिस्ट की महिलाएँ

क्यों आई यह नौबत?

शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री रहते हुए 2017 में एमपीपीएससी ने सहायक प्राध्यापकों, लाइब्रेरियन और स्पोर्टस ऑफिसर की नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी किया। 1992 के बााद पहली बार सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति के लिए प्रक्रिया शुरू की गई थी। विधानसभा चुनाव के कारण परीक्षा 2018 में हुई। लेकिन रिजल्ट आते ही विवाद शुरू हो गए। करीब सालभर नियुक्ति ही नहीं दी गई। फिर सहायक प्राध्यापक के चयनित उम्मीदवारों ने पद यात्रा निकाली। राजधानी भोपाल पहुॅंचकर सिर मुॅंडवाए। इसके बाद 3 दिसंबर को सीएम कमलनाथ ने ट्वीट कर बताया कि उन्होंने पीएससी से चयनित लोगों को नियुक्ति पत्र जारी करने के निर्देश दे दिए हैं। साथ ही कहा कि पहले से काम कर रहे अतिथि विद्वान भी बने रहेंगे।

इस बीच कई मामले कोर्ट भी गए। इनमें से ही एक मामला मेरिट लिस्ट में आने वाली आरक्षित वर्ग की 91 महिलाओं से जुड़ा है। परीक्षा के दौरान ज्यादा अंक पाने वाले आवेदकों को मेरिट लिस्ट के आधार पर अनारक्षित सीट के लिए चयनित किया गया। सामान्य वर्ग की महिला आवेदकों ने इसके खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर की। 18 सितंबर 2019 को हाई कोर्ट का आदेश आया। श्वेता हार्डिया ने ऑपइंडिया को बताया कि इसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि आरक्षित वर्ग की मेरिट लिस्ट में आने वाली महिला उम्मीदवारों का समायोजन सामान्य श्रेणी के कोटे में होगा। कोर्ट का आदेश आप नीचे पढ़ सकते हैं,


18 सितंबर 2019 का हाई कोर्ट का आदेश

हार्डिया के अनुसार इस आदेश की तरीके से व्याख्या नहीं की गई और उन्हें महाविद्यालयों की च्वाइस फिलिंग की प्रक्रिया से रोक दिया। इसके बाद 14 अक्टूबर को ये महिलाएँ हाई कोर्ट पहुॅंची और आदेश पर स्पष्टीकरण देने की गुहार लगाई। 17 अक्टूबर को हाई कोर्ट ने मेरिटोरियस महिलाओं को नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल करने का आदेश MPPSC और उच्च शिक्षा विभाग को दिया। हार्डिया के अनुसार फिर भी उनको नियुक्ति पत्र नहीं दिया गया है, जबकि ऐसे लोगों को नियुक्ति पत्र दिए गए हैं जिनके नाम चयन सूची के आखिर में हैं।

हाई कोर्ट से आदेश पर स्पष्टीकरण देने की गुहार

तगाया के अनुसार अब मंत्री जीतू पटवारी सात जनवरी को होने वाली सुनवाई के दौरान उनकी नियुक्ति के लिए कोर्ट में एफि​डेविट दाखिल करने की बात कह रहे हैं। जबकि हकीकत यह है कि कोर्ट ने उनकी ज्वाइनिंग पर रोक ही नहीं लगाई है।

शीतल जोशी ने ऑपइंडिया को बताया कि इस मामले में एक तरफ उच्च शिक्षा विभाग उनके साथ अन्याय कर रहा है तो दूसरी ओर एमपीपीएससी के वकील कोर्ट में पेश ही नहीं होते। तीन बार वकील सुनवाई पर गैरहाजिर रहे हैं। उन्होंने बताया कि अनारक्षित सीटें मेरिट से भरी जाती हैं। बाद में आ​रक्षित वर्ग की सीटें उस कोटे के उम्मीदवारों से भरी जाती है। पीएससी की तमाम परीक्षाओं में यही पॉलिसी लागू होती है। इस बार भी लाइब्रेरियन और स्पोर्टस ऑफिसर की चयन सूची भी इसी आधार पर तैयार हुई। फिर उनके साथ भेदभाव क्यों हो रहा है। वे पूछती हैं कि क्या अधिक नंबर लाना, ज्यादा प्रतिभा होना गुनाह है?

महजबीन अंसारी ने ऑपइंडिया को बताया, “नियमानुसार सबसे पहले हमारी नियुक्ति होनी चाहिए थी। हममें से कई चयनित सूची में अव्वल हैं। लेकिन, उच्च शिक्षा विभाग ने हमारी ही नियुक्तियाँ रोक दी। विभाग इसका कोई कारण भी हमें नहीं बता रहा।”

इधर जैसे-तैसे सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हुई तो सालों से पढ़ा रहे अतिथि विद्वानों के भविष्य पर संकट मंडराने लगा। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार रीवा में मंत्री जीतू पटवारी की अतिथि विद्वानों से तीखी नोंकझोंक हो गई। अतिथि विद्वानों का कहना था कि वे बीते 25 साल से पढ़ा रहे हैं। अब असिस्टेंट प्रोफेसरों की नियुक्ति के नाम पर उन्हें बाहर किया जा रहा है। भोपाल में करीब दो हफ्ते से धरने पर बैठे अतिथि विद्वानों ने तो कफन ओढ़कर नए साल का स्वागत किया। अतिथि विद्वान संघर्ष मोर्चा के संयोजक डॉ. देवराज सिंह का कहना है कि जब तक सरकार नियमित नहीं करती, उनका धरना-प्रदर्शन जारी रहेगा।

दिलचस्प यह है कि बार-बार मुख्यमंत्री कमलनाथ और जीतू पटवारी की तरफ से आश्वासन मिलने के बावजूद भी अतिथि विद्वानों का धरना चल रहा है। इसका कारण सरकार की नीयत पर इनका भरोसा नहीं होना है। अब आप समझ गए होंगे कि क्रोनोलॉजी समझाते हुए प्रियंका गाँधी ने क्यों लिखा कि जब आप प्रोटेस्ट करेंगे तो वे आपको ‘फूल’ कहेंगे। उनका इशारा शायद अपनी ही सरकार की ओर था।

पर वे भूल गईं कि ये एमपी के मास्टरसाहब हैं। हाथ के लिए फिर से फूल बनने को तैयार नहीं हैं। यही कारण है कि अब मंत्री जीतू पटवारी उनके विरोध-प्रदर्शन को भाजपा के कमल फूल से जोड़ने की जुगत में हैं।

कमलनाथ के खिलाफ 5000 शिक्षकों का प्रदर्शन, सैलरी नहीं दे रही कॉन्ग्रेस सरकार

कमलनाथ के राज में किसानों का बुरा हाल: मुआवजा न मिलने पर एक और किसान ने की आत्महत्या

राहुल गाँधी को माफी माँगनी चाहिए, किसानों के कर्ज माफ करने में रहे विफल: कॉन्ग्रेस नेता

सवेरा ने की PAK के आसिफ़ जान से शादी: अगले दिन भाई को मिला शव, कहा- उसे यातना देकर मार डाला

अल्पसंख्यकों के लिए नर्क बन चुके पाकिस्तान से ईसाई लड़की की हत्या की खबर आई है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मामला पाकिस्तान के पंजाब प्रांत का है। जहाँ 30 वर्षीय सवेरा मकबूल नामक लड़की ने कुछ दिन पहले ही लाहौर स्थित शामा कॉलोनी निवासी आसिफ जान से शादी की थी। लेकिन अगले ही दिन उसके भाई को उसका शव बरामद हुआ। मृतिका के भाई का आरोप है कि उसकी बहन को उसके ससुराल वालों ने यातनाएँ देकर मार डाला।

सवेरा के भाई सुलेमान मसीह द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर में बताया गया कि सवेरा को उसके पति आसिफ जान और उसके घरवालों ने भीषण यातनाएँ दीं।

मसीह ने पुलिस को बताया, “जब हम शादी की अगली सुबह जान के घर पारंपरिक नाश्ता देने पहुँचे तो हमें बताया गया की सवेरा की तबीयत खराब है और उसे अस्पताल ले जाया गया है। लेकिन जब हम अस्पताल पहुँचे तो डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया था। साथ ही मामले को पुलिस केस बताते हुए कहा था कि सवेरा के शरीऱ पर घाव है।

जानकारी के मुताबिक इस मामले में पुलिस अधिकारी अब्दुर रशीद ने बताया कि पुलिस कई कोणों से मामले की जाँच कर रही है। उन्होंने कहा, ‘‘शव को परीक्षण के लिए भेज दिया गया है जिससे मौत का सही कारण पता चल सके।”

पुलिस अधिकारी के अनुसार शव परीक्षण के बाद ही पता चल पाएगा कि उसे (सवेरा) यातना के बाद जहर दिया गया या दिल का दौरा पड़ा। रशीद के अनुसार आसिफ जान को हिरासत में ले लिया गया है और उससे पूछताछ की जा रही है।

शाहीन बाग़ की आवारा भीड़ पर बावली हुई जा रही मीडिया की नज़र में कोटा के बच्चों की जान सस्ती

पहली घटना, दिल्ली के शाहीन बाग़ में। वही शाहीन बाग़ जहाँ पुलिस पर पत्थर फेंके गए, आगजनी की गई, दंगे किए गए और सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाया गया। वहाँ कुछ प्रदर्शनकारी सस्ता प्रचार स्टंट करते हुए दिखते हैं और मीडिया उन्हें देश-विदेश में आंदोलनकारियों के रूप में दिखाता है। क्यों? क्योंकि एक 20 दिन की नवजात बच्ची वहाँ मोदी सरकार के ख़िलाफ़ विरोध दर्ज कराने पहुँची है। चौंक गए न? मीडिया में तो यही चल रहा है- सीएए की सबसे कम उम्र की प्रदर्शनकारी उम्मी हबीबा, जिसका जन्म हुए अभी महीना भर भी नहीं हुआ। वो मोदी के ख़िलाफ़ धरना दे रही है।

दूसरी घटना, राजस्थान के कोटा में एक साल में 962 बच्चों की मौत हो जाती है। 25 दिसंबर को 1, 26 को 3, 27 को 2, 28 को 6, 29 को 1, 30 को 4 और 31 को 5 मासूम काल के गाल में समा गए। यानी, 7 दिनों में 22 मौतें। केवल दिसंबर महीने में 99 बच्चों की मौत हो गई। अस्पताल में व्यवस्था नहीं है, संसाधन नहीं है और उपकरणों की कमी है। मुख्यमंत्री कहते हैं कि ये कोई नई बात नहीं। राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री कहते हैं कि सीएए से ध्यान भटकाने के लिए इस मुद्दे को उठाया जा रहा है। मीडिया यहाँ चुप है। सवाल नहीं पूछ रहा। क्यों? क्योंकि यहाँ भाजपा की सरकार नहीं।

जहाँ तक शाहीन बाग़ में उम्मी के मोदी विरोधी प्रदर्शन में शामिल होने का सवाल है, स्पष्ट है कि उस नवजात को ठंड के मौसम में उसके परिवार ने वहाँ पर लाया है। उसे तो ये तक नहीं पता कि सीएए क्या है, मोदी कौन है, उसके आसपास क्या हो रहा है और उसे कहाँ लेकर जाया जा रहा है? ये एक सस्ता पब्लिसिटी स्टंट है, जो मीडिया अटेंशन के लिए किया गया। ठीक उसी तरह, जैसे हिजाब और जैकेट के ऊपर से मरहम-पट्टी किए हुए प्रदर्शनकारी ‘पुलिसिया बर्बरता’ के ख़िलाफ़ प्रदर्शन करते दिखे।

मीडिया के लिए वामपंथियों के पब्लिसिटी स्टंट का ज़्यादा मोल है और कोटा के जेके लोन अस्पताल में 962 बच्चों का मरना एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर ध्यान देना वो उचित नहीं समझती। शाहीन बाग़ वाले मसले में मोदी-विरोध है, वो बिकता है। कोटा की ख़बर में राज्य सरकार की नाकामी है, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत का असंवेदनशील रवैया और कॉन्ग्रेस पर सवाल उठते हैं, इसीलिए मीडिया के लिए यहाँ कोई ख़ास मसाला नहीं है। मुजफ्फरपुर और गोरखपुर वाली बात कोटा में नहीं है। इसीलिए, मीडिया मुट्ठी भर उपद्रवियों, दंगाइयों और बवालियों के आंदोलन को ज़्यादा तवज्जो देता है।

मुख्यमंत्री का बयान संवेदनहीन है क्योंकि राजस्थान के गृह सचिव वैभव गालरिया ने प्रारंभिक जाँच में पाया है कि हॉस्पिटल के सिस्टम में, इंफ्रास्ट्रक्चर में काफ़ी गड़बड़ियाँ हैं। हॉस्पिटल के नवजात शिशु वाले आईसीयू में ऑक्सीजन सप्लाई सही नहीं है। संक्रमण से बचने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है और ज़रूरी दवाओं का अभाव है। साफ़ ज़ाहिर होता है कि मुख्यमंत्री अपनी सरकार की विफलताओं पर पर्दा डालने के लिए ऐसे बयान दे रहे हैं। अफ़सोस ये कि मुजफ्फरपुर की तरह (जहाँ सत्ताधीशों से ज़्यादा डॉक्टरों से सवाल-जवाब किया गया) यहाँ सवाल पूछने के लिए मीडिया का अभाव है।

अगर उम्मी हबीबा की बात करें तो उसकी माँ के कुल 5 बच्चे हैं और वो मीडिया अटेंशन का कारण इसीलिए बन रही है, क्योंकि वह अपने बच्चों को सीएए विरोधी प्रदर्शन में लेकर आती है। क्या 20 दिन की बच्ची से उसकी मर्जी पूछी जा सकती है? क्या उसे पता भी है कि वो कहाँ है और उसका इस्तेमाल किसलिए किया जा रहा है? उसकी अम्मी संविधान बचाने की बात करते हुए धरने पर बैठी हुई हैं। संविधान को किस से क्या ख़तरा है, इसका उत्तर ख़ुद वामपंथियों के पास भी नहीं है। ऐसे लोग एक बच्ची के स्वास्थ्य के साथ खेलेंगे और बाद में मोदी को जिम्मेदार ठहराएँगे। चित भी मेरी और पट भी मेरी।

मेनस्ट्रीम मीडिया और कथित संवेदनशील बुद्धिजीवी तथा लिबरल गिरोह जो किसी माँ के हाथ में बच्चे की नाक में लगी ऑक्सीजन पाइप वाली तस्वीर दिखा कर संवेदना दिखा रहा था, आज वो चुप हैं क्योंकि कॉन्ग्रेस के सरकार में बच्चों का इस संख्या में मरना जायज है। इस देश के मीडिया की दुर्गति यही है कि जब तक ‘भाजपा’ वाला धनिया का पत्ता न छिड़का गया हो, इन्हें न तो दलित की मौत पर कुछ कहना है, न बड़ी संख्या में नवजात शिशुओं की मृत्यु पर इन्हें वो ज़ायक़ा मिल पाता है।

UP में PFI के 25 सदस्य गिरफ्तार: DGP ने संगठन पर बैन के लिए गृह मंत्रालय को लिखा पत्र

उत्तरप्रदेश में सीएए के ख़िलाफ़ भड़की हिंसा पर कट्टरपंथी समूह पीएफआई की भूमिका लगातार घेरे में आ रही है। कई आला अधिकारी और राजनेता इस समूह को प्रत्यक्ष रूप से दंगों के लिए जिम्मेदार बता चुके हैं। ऐसे में यूपी के आईजी, लॉ एंड ऑर्डर प्रवीण कुमार ने जानकारी दी है कि उन्होंने इस समूह के 25 लोगों को विभिन्न आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किया है। साथ ही यूपी के डीजीपी ने भी इस समूह को प्रतिबंधित करने के लिए गृह मंत्रालय को पत्र लिखा है।

मीडिया रिपोर्ट्स से अनुसार लखनऊ में संवाददाताओं को संबोधित करते हुए लॉ एंड ऑर्डर आईजी प्रवीण कुमार ने बताया कि आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने के आरोप में पीएफआई से जुड़े 25 लोगों की गिरफ्तारी हुई है।

इसके अलावा, बता दें, उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) ओपी सिंह ने भी इस समूह को प्रतिबंधित करने के लिए गृह मंत्रालय को एक पत्र लिखा है। जिसमें उन्होंने स्पष्ट लिखा है कि नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ 19 दिसंबर को हुए हिंसक विरोध प्रदर्शन में जाँच के दौरान पीएफआई की संलिप्तता पाई गई।

जिसके बाद डीजीपी ओपी सिंह के पत्र पर देश के कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा है कि हिंसा में PFI की भूमिका आगे आ रही है, गृह मंत्रालय सबूतों के आधार पर आगे की कार्रवाई तय करेगा। PFI पर स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) से संबंध सहित कई आरोप हैं।

गौरतलब है कि नागरिकता कानून के ख़िलाफ़ यूपी में हुई हिंसा में बीते दिनों पीएफआई से लिंक मिलने के पुख्ता प्रमाण मिले हैं। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि संगठन से जुड़े आरोपितों के यहाँ से आपत्तिजनक सामग्रियाँ, साहित्य, सीडी आदि मिले थे। जिसको आधार बनाकर पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया नामक संगठन को बैन करने का प्रस्ताव उत्तर प्रदेश सरकार ने भेजा।

अब कहा जा रहा है कि प्रदर्शन के पीछे पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया यानी पीएफआई के रोल पर जाँच का दायरा और ज्यादा बढ़ सकता है। क्योंकि पीएफआई 7 राज्यों में पिछले कई महीनों से सक्रिय है। इनमें दिल्ली, आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, केरल, झारखंड, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश शामिल हैं।

#RoadToEndia2020: भारत को बदनाम करने के लिए पाक कर रहा CAA दंगों की तस्वीरों-वीडियो का इस्तेमाल

नए साल के अवसर पर एक ओर जहाँ पूरा विश्व नई उम्मीदों और नई उमंगों के जश्न में डूबा हुआ था। वहीं, पाकिस्तान भारत के अंत की कामना करते हुए ट्विटर पर #roadtoendia (गौर देने वाली बात हैं INDIA की जगह यहाँ पाकिस्तान ‘END’ शब्द का प्रयोग किया) हैशटैग के साथ अनेकों फर्जी तस्वीरें और वीडियो ट्वीट कर रहा था।

पाकिस्तान कल पूरी रात, भारत में सीएए के ख़िलाफ़ सड़कों पर उतरे प्रदर्शनकारियों के नाम पर फर्जी तस्वीरों को शेयर करके ऐसे दर्शाने की कोशिश कर रहा था कि भारत के दूसरे समुदाय वाले यहाँ केंद्र सरकार के कारण खौफ में हैं और उनके साथ यहाँ बर्बरता होती है।

हालाँकि, ये बात सब जानते हैं कि पाकिस्तान के पास भारत के कुछ ऐसे चुनिंदा लोगों की सूची है। जिनके बारे में वो जानता है कि अगर मोदी सरकार कोई फैसला लेगी, तो उसके विरोध में उन लोगों की राय पाकिस्तानियों की राय से मिलती-जुलती ही होगी। शायद इसलिए इस बार भी वो अपना प्रोपगेंडा साधने के लिए स्वरा भास्कर जैसे बॉलीवुड कलाकारों के बयान को शेयर करते पाए गए।

पाकिस्तानियों ने स्वरा भास्कर की तस्वीर शेयर करते हुए लिखा कि भारत में अब कुछ हिंदू ऐसे हैं जो मजहब वाली अल्पसंख्यक आबादी का समर्थन कर रहे हैं, क्योंकि ‘हिटलर मोदी’ के चेहरे का सच उनके सामने आ चुका है।

इसके अलावा पाकिस्तानी लिखते हैं ,”पहले कश्मीर में और अब भारत के हर राज्य में मोदी मु##मों का दमन करके हिंदुत्व को बढ़ाना चाहता है। मोदी सिर्फ़ कश्मीर नहीं बर्बाद कर रहा, बल्कि पूरा भारत कर रहा है।”

इस हैशटैग पर पाकिस्तानियों ने कई ऐसी वीडियो और फर्जी तस्वीरों को भी शेयर करके ये साबित करने की कोशिश की है कि भारत में अल्पसंख्यकों के साथ मोदी सरकार में बर्बरता हो रही है, उन्हें मारा-पीटा जाता है, उनकी जान ली जा रही है आदि-आदि।

जानकर हैरानी होगी, लेकिन अपने मुल्क में हिंदुओं को प्रताड़ित कर देश छोड़ने पर मजबूर करने वाले पाकिस्तानी बर्बर तस्वीरों को शेयर करके मानवाधिकारों की भी दुहाई दे रहे हैं और चाहते हैं कि संयुक्त राष्ट्र इस पर संज्ञान ले।

इसके अतिरिक्त भारत में शाहीन बाग में महिलाओं द्वारा किए जा रहे रहे प्रदर्शन की तस्वीर भी पाकिस्तानियों द्वारा शेयर की जा रही हैं। जिसकी हकीकत की पोल ऑपइंडिया पहले ही अपनी पड़ताल में खोल चुका है। जिसमें स्पष्ट पता चला था कि वहाँ संविधान को बचाने के नाम पर शाहीन बाग पर भीड़ इकट्ठा करने वाला कोई और नहीं, बल्कि शर्जील आलम नाम का जेएनयू छात्र हैं। जो अभी बीते दिनों अयोध्या फैसले पर संविधान को जलाने की बात कर रहा था।

उद्धव कैबिनेट में बेटा-बेटी और भतीजा ही नहीं, आतंकी याकूब मेमन के लिए ‘दया’ माँगने वाला असलम शेख भी

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के कैबिनेट विस्तार में सिर्फ बेटा-बेटी और भतीजों की ही लॉटरी नहीं लगी है। एक ऐसे कॉन्ग्रेसी विधायक को भी मंत्री बनाया गया है, जिन्होंने आतंकी याकूब मेमन के लिए दया मॉंगी थी। ये हैं असलम शेख। मुंबई की मलाड सीट से विधायक शेख को उद्धव ने कैबिनेट मंत्री बनाया है।

उन्होंने जुलाई 2015 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को पत्र लिखकर मेमन की फॉंसी को उम्रकैद में बदलने की अपील की थी। मेमन 1993 बम ब्लास्ट का दोषी था। इन धमाको में करीब 317 लोग मारे गए थे। मुखर्जी ने उसकी दया याचिका ठुकरा दी थी। दिलचस्प यह है कि उस वक्त जिनलोगों ने मेमन का समर्थन किया था उसे शिवसेना ने देशद्रोही बताया था। आप भी असलम शेख का लिखा वो पत्र यहॉं पढ़ सकते हैं;

उद्धव ठाकरे के कैबिनेट में 4 मुस्लिम नेता हैं। इनमें से एक असलम शेख को मंत्री बनाए जाने का कई तबकों में विरोध हो रहा है। अब असलम शेख कह रहे हैं कि भाजपा की मशीनरी ने उनका पत्र वायरल कर दिया है। हालाँकि, वो इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि उन्होंने ही इस पत्र को लिखा था।

असलम शेख मुंबई की मलाड सीट से विधायक चुने गए हैं। जुलाई 2015 में शेख ने तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को पत्र लिखकर मेमन के लिए दया का अनुरोध किया था। हालाँकि, मेमन की दया याचिका को खारिज कर दिया गया था और उसे 30 जुलाई 2015 को नागपुर की एक जेल में फाँसी दे दी गई थी। असलम शेख ने ताज़ा विवाद पर बयान देते हुए कहा:

“जिस दिन से भाजपा सत्ता से बाहर हुई है, तब से वह विभिन्न मुद्दों पर लोगों को गुमराह कर रही है। ये वही लोग हैं, जिन्होंने महात्मा गाँधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का मंदिर बनाया था। आज वही लोग मेरे ख़िलाफ़ आतंकवाद पर नरम रुख रखने का आरोप लगा रहे हैं। ये वही लोग हैं, जिन्होंने महात्मा गाँधी की हत्या की। वे जो करने की कोशिश कर रहे हैं, वो ब्रिटिश तक नहीं कर सके।”

महाराष्ट्र की विपक्षी पार्टी भाजपा ने न सिर्फ़ उद्धव ठाकरे पर निशाना साधा बल्कि असलम शेख को भी आड़े हाथों लिया। भाजपा ने कहा कि आदित्य के कैबिनेट में आने के बाद अब लग रहा है कि सबकुछ सिर्फ़ एक परिवार के ही इर्दगिर्द घूम रहा है।

मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने सोमवार (दिसंबर 30, 2019) को अपने मंत्रिमंडल में 36 नए मंत्रियों को शामिल किया, जिसके बाद मुख्यमंत्री को मिला कर महाराष्ट्र मंत्रिमंडल में कुल 43 सदस्य हो गए हैं। उद्धव के बेटे आदित्य, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण और अमित देशमुख नए मंत्रियों में प्रमुख नाम हैं। अमित देशमुख दिवंगत पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के बेटे और सिने अभिनेता रितेश देशमुख के भाई हैं। एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार के भतीजे अजित पवार उप मुख्यमंत्री बनाए गए हैं।

33 कैबिनेट मंत्रियों में से 10 शिवसेना के हैं, 12 एनसीपी के और 10 कॉन्ग्रेस के हैं। एक मंत्री ‘क्रन्तिकारी शेतकरी पक्ष’ का है। 10 राज्यमंत्रियों में से 1 शिवसेना का, 5 एनसीपी के और 2 कॉन्ग्रेस के हैं। शिवसेना कोटे से एक निर्दलीय को राज्यमंत्री बनाया गया है। वहीं ‘प्रहार जनशक्ति पक्ष’ के विधायक को राज्यमंत्री का पद दिया गया है।

हालॉंकि कैबिनेट विस्तार के बाद सरकार में साझेदार तीन दलों शिवसेना-कॉन्ग्रेस-एनसीपी में मतभेद भी उभरकर सामने आ गए हैं। भाई सुनील को मंत्री नहीं बनाए जाने से शिवसेना सांसद संजय राउत नाराज बताए जा रहे हैं। एनसीपी विधायक प्रकाश सोलंकी ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने तो एक क़दम और आगे बढ़ कर पुणे में अपनी ही पार्टी के दफ्तर में तोड़फोड़ मचाई।

‘ऐसे राजनीतिक माहौल में मेरे जैसे MLA के लिए कोई जगह नहीं’ – कैबिनेट विस्तार के बाद ही ठाकरे-पवार को झटका

कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने अपनी ही पार्टी के दफ़्तर में मचाई तोड़फोड़, उद्धव ठाकरे से नाराज़गी है वजह

AMU में दंगा करने वाले 12 की हुई पहचान: लगेगा गुंडा एक्ट, 6 महीने के लिए होंगे तड़ीपार

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध के नाम पर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) में हिंसा भड़काने वाले 12 लोगों की पुलिस ने पहचान कर ली है। इन पर गुंडा एक्ट के तहत कार्रवाई होगी। प्रशासन इन्हें 6 महीने के लिए जिलाबदर करने की तैयारी में भी है। इनमें एएमयू छात्र संघ का अध्यक्ष सलमान इम्तियाज भी है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इनमें पॉंच पूर्व छात्र हैं और इनका आपराधिक अतीत भी रहा है।

इन लोगों पर भीड़ को उकसाने और पुलिस पर हमला करने के लिए भड़काने का आरोप है। घटना 15 दिसंबर की है। सीसीटीवी फुटेज को खॅंगालने के बाद पुलिस ने इनकी पहचान की है। फुटेज एएमयू प्रशासन ने मुहैया कराए थे। पुलिस ने बताया कि इनमें से पॉंच पूर्व छात्र हैं। इन्हें जिले की शांति के लिए खतरा बताया गया है। साथ ही कहा गया है कि इनका आपराधिक रिकॉर्ड है। अलीगढ़ के एसएसपी आकाश कुल्हाड़ी ने बताया, “मैंने डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट को पत्र लिखकर इनके खिलाफ गुंडा एक्ट की तहत कार्रवाई करने की इजाजत मॉंगी है। इन्हें छह महीने के लिए जिलाबदर भी किया जा सकता है।”

आरोपितों में शामिल हुज़ैफ़ा आमिर एएमयू छात्र संघ का सचिव रहा है। हमजा सूफ़िया छात्र संघ का उपाध्यक्ष रहा है। नदीम अंसारी, आमिर, मिंटो और उस्मानी- इन पाँचों के अलावा एएमयू स्टूडेंट्स यूनियन के अध्यक्ष सलमान इम्तियाज़ का नाम भी एफआईआर में शामिल किया गया है। हमजा और हुज़ैफ़ा को एएमयू ने 5 सालों के लिए निकाल दिया गया था, क्योंकि उन्होंने वीसी ऑफिस में दंगा किया था। उन पर जुलाई 2019 में ही ये कार्रवाई की गई थी। दोनों ने यूनिवर्सिटी के कर्मचारियों के साथ भी दुर्व्यवहार किया था।

ज्ञात हो कि 15 दिसंबर को रात आठ बजे एएमयू में अचानक छात्रों ने पथराव और फायरिंग शुरू कर दी थी। उपद्रवी छात्र जामिया में हुई पुलिस कार्रवाई के विरोध में उग्र हो गए थे। दंगाई छात्रों के उपद्रव के कारण डीआइजी समेत कई पुलिस अधिकारियों को चोट लगी थी। पुलिस को दंगाई छात्रों को रोकने के लिए आँसू गैस के गोले छोड़ने पड़े थे और लाठीचार्ज करना पड़ा था। इस मामले में पुलिस ने 78 नामजद व 1300 अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ सिविल लाइंस थाने में मुकदमा दर्ज कराया था। अब पुलिस आगे की कार्रवाई में जुट गई है।

हिंसा वाले दिन प्रॉक्टर की टीम मान-मनव्वल करती रह गई थी लेकिन एएमयू के छात्र गेट तोड़ कर बाहर आ गए थे। उन्होंने पुलिस के साथ झड़प करने के लिए ऐसा किया था। पुलिस ने छात्रों को ग़ैर-क़ानूनी कार्य करने से रोकने के लिए मिन्नतें की लेकिन छात्र लगातार पत्थरबाजी करते रहे। उपद्रवी छात्रों ने पुलिस का बैरिकेड भी तोड़ डाला था।

AMU में छात्रों पर नहीं हुआ हथगोलों का इस्तेमाल: अफवाह फैलाने वालों का पुलिस ने किया पर्दाफाश

CAA पर बवाल में जख्मी तारिक AMU में पढ़ाएगा: जिस VC को छात्रों ने ‘निष्कासित’ किया था उसकी मुहर

‘जंग की मशाल उठाकर करो प्रदर्शन’ – AMU में भड़काऊ स्पीच देने पर डॉ कफील खान हिरासत में