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‘कॉन्ग्रेसी, कॉमरेड और इस्लामी कट्टरपंथियों ने रची थी गुवाहाटी को जलाने की साजिश’

असम सरकार में मंत्री हेमंत विश्व शर्मा ने पूर्वोत्तर में हो रही हिंसा को लेकर बड़ा आरोप लगाया है। शर्मा ने दावा किया कि हिंसा की साज़िश दिल्ली में बैठे एक बुद्धिजीवी ने रची थी। राज्य के वित्त मंत्री ने कहा कि गुवाहाटी को दहलाने की साज़िश रची गई थी। उन्होंने कहा कि एक बड़े बुद्धिजीवी ने इस पुरी हिंसा की योजना तैयार की और उनकी मंशा थी कि उत्तर-पूर्व के सबसे बड़े मेट्रोपोलिस गुवाहाटी को तबाह कर दिया जाए। हालाँकि, शर्मा ने किसी का भी नाम नहीं लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि उस बड़े बुद्धिजीवी की योजना थी कि असम के सचिवालय को ही जला डाला जाए। लेकिन, पुलिस की मुस्तैदी से ये मंशा कामयाब नहीं हो सकी।

उत्तर-पूर्व में भाजपा की बड़ी जीत व प्रचार-प्रसार के स्थानीय सूत्रधार रहे हेमंत विश्व शर्मा ने असम यूथ कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष कमरुल इस्लाम का एक फोटो भी दिखाया, जिसमें वो हिंसा वाली जगह पर मौजूद दिख रहे हैं। इस पूरी हिंसा को लेकर शर्मा ने कहा कि इसके लिए एक डिज़ाइन तैयार किया गया था। उन्होंने दावा किया कि इस घटना के पीछे किसका हाथ है, ये साबित करने के लिए उनके पास सबूत भी हैं। बकौल शर्मा, एक बड़े बुद्धिजीवी ने जो कि एक अकादमिक व्यक्ति भी हैं, जनता भवन को जलाने की तैयारी की थी। आपको बता दें कि कॉन्ग्रेस ने अपील की थी कि लोग असम सचिवालय ‘जनता भवन’ के पास इकट्ठे हों।

हेमंत विश्व शर्मा ने एक वीडियो दिखाया, जिसमें कमरुल इस्लाम एक व्यक्ति से हाथ मिलाते हुए दिख रहे हैं। इस्लाम उसी जगह पर मौजूद हैं, जहाँ हिंसा भड़की हुई उस वीडियो में दिख रही है। हालाँकि शर्मा ने कहा कि ये कॉन्ग्रेस नेता कमरुल का कोई हमशक्ल भी हो सकता है लेकिन इस वीडियो की फॉरेंसिक जाँच आवश्यक है। उन्होंने सवाल किया कि हिंसा वाली जगह पर ये दोनों हाथ क्यों मिला रहे हैं? उन्होंने बताया कि इस हिंसा के पीछे पीएफआई के लोगों का हाथ है और सरकार इसके लिए सबूत इकट्ठा कर रही है, जिसके बाद कार्रवाई की जाएगी।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में शर्मा ने यह आरोप लगाया कि कॉन्ग्रेस के एक धड़े और PFI ने असम में हिंसा को बढ़ावा दिया और प्रशासन को इसके तह तक जाकर जाँच करनी होगी। यह जानकारी जरूरी है कि ‘पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI)’ एक इस्लामी कट्टरपंथी आतंकी संगठन है। केरल से लेकर कर्नाटक और उत्तर-पूर्व तक, हिंसा की वारदातों में इस संगठन के नाम आते रहते हैं। असम में पुलिस ने हिंसा में लिप्त 107 लोगों को गिरफ़्तार किया है। हिंसा की वारदातों की जाँच के लिए एक एसआईटी का गठन किया गया है। असम सरकार केंद्र से माँग करेगी कि सीबीआई या एनआईए के अधिकारियों को इस हिंसा की जाँच सौंपी जाए, ताकि सच्चाई सामने आए।

‘जंग की मशाल उठाकर करो प्रदर्शन’ – AMU में भड़काऊ स्पीच देने पर डॉ कफील खान हिरासत में

CAA और NRC पर फरहान गैंग के हर झूठ का पर्दाफाश: साज़िश का जवाब देने के लिए जानिए सच्चाई

‘जंग की मशाल उठाकर करो प्रदर्शन’ – AMU में भड़काऊ स्पीच देने पर डॉ कफील खान हिरासत में

गोरखपुर के डॉ कफील खान एक बार फिर सुर्खियों में हैं। लेकिन, इस बार मामला बीआरडी अस्पताल में हुए 60 बच्चों की मौत से जुड़ा हुआ नहीं है। इस बार मामला नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में प्रदर्शन कर रहे प्रदर्शनकारियों को भड़काने का है। जिसके संबंध में आज पुलिस ने उन्हें हिरासत में ले लिया है। कुछ दिन पहले उन पर सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने के आरोप में मामला दर्ज हुआ था।

अलीगढ़ के एसपी अभिषेक ने इस मामले में जानकारी देते हुए बताया कि कफील खान के ख़िलाफ़ 13 दिसंबर को सिविल लाइन्स पुलिस स्टेशन में आईपीसी की धारा 153-A के तहत मामला दर्ज हुआ था। जिसके बाद इस मामले में आगे जाँच हुई। इस एफआईआर में उन पर आरोप लगा कि उन्होंने अपने भाषण के जरिए शाांत माहौल को उकसाया और साम्प्रादायिक सौहार्द को बिगाड़ने का प्रयास किया।

जानकारी के मुताबिक उन्होंने इस दौरान छात्रों को जंग की मशाल उठाकर प्रदर्शन करने को कहा था। साथ ही केंद्र पर आरोप लगाया था कि वे देश को बाँटने काम कर रहे हैं। उन्होंने छात्रों से कहा कि इस कानून को, उन्हें डराने के लिए मोहरा बनाया जा रहा है, लेकिन वे डरें नहीं और अपने दस्तावेज पूरे रखें। इसके बाद उन्होंने छात्रों से कहा कि ये देश उनका है और उनका ही रहेगा, वो जो चाहेंगे, वही होगा।

कफील खान ने अपनी स्पीच में गृहमंत्री अमित शाह को लेकर भी टिप्पणी की। उन्होंने कहा, “मोटा भाई सबको हिंदू-मुस्लिम बनना सिखा रहे हैं, लेकिन इंसान नहीं। जब से आरएसएस अस्तित्व में आया है तब से वे संविधान में यकीन नहीं रखते। कैब से मुस्लिम दूसरी श्रेणी का नागरिक होगा और बाद में उसे एनआरसी लागू करके उसका शोषण किया जाएगा।”

इसके अलावा एक अज्ञात पर भी पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है। जिसपर आरोप है कि उसने भीड़ को उकसाने और हिंदुत्व के ख़िलाफ़ एएमयू कैंपस में प्रदर्शन के दौरान नारेबाजी की। जिसकी वीडियो सोशल मीडिया पर भी वायरल हो रही हैं और उस शख्स के ख़िलाफ़ भी पुलिस ने आईपीसी की धारा 153-A के तहत ही मामला दर्ज किया है।

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रवीश कुमार और न्यूजलॉन्ड्री का ऑपइंडिया पर हमला: अजीत भारती का जवाब | Ajeet Bharti on Ravish Kumar and Newslaundry Propaganda

रवीश कुमार ने न्यूज लॉन्ड्री के साथ मिलकर बिना नाम लिए ऑपइंडिया पर हमला करते हुए कहा कि आईटी सेल वालों की दुकान ही चलती है रवीश कुमार के नाम से। रवीश कुमार जहर फैला रहे हैं कि देश में कुछ हो ही नहीं रहा है और बाकी लोग कह रहा है कि नहीं, देश में बहुत कुछ हो रहा है, तो वो आईटी सेल हो गया। और वो दुकान रवीश कुमार चला रहे हैं। आपकी दुकान कौन चला रहा है रवीश कुमार? मोदी या भाजपा?

अब ये इस स्तर पर आ गए हैं कि कहने लगे कि ये किसी की दुकान चला रहे हैं। आपकी दुकान पतंजलि का विज्ञापन चला रहा है। रवीश कुमार ने कहा कि ब्रेनवॉश करने के लिए छोटे-छोटे बॉयलर खोले गए हैं। उसी बॉयलर में रवीश कुमार को उबाला जाता है, तो तड़प होना तो स्वाभाविक है। इनका कहना है कि इन्हीं का टीवी चैनल देखिए, इन्हीं का लिखा पढ़िए, बाकी दुनिया बेकार है। इस लेख को न्यूजलॉन्ड्री के पत्रकार बसंत कुमार ने लिखा है। इसमें उन्होंने पत्रकारिता की सारी नैतिकता को ताक पर रख दिया है।

पूरी वीडियो यहाँ क्लिक कर के देखें

बंगाल में कैलाश विजयवर्गीय को मजहबी भीड़ ने घेर रखा है, देखिए Video

नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA के खिलाफ पश्चिम बंगाल में हिंसा जारी है। भाजपा महासचिव और बंगाल के पार्टी प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने ट्वीट कर दावा किया है कि मजहब़ी उनकी गाड़ी को घेर रखा है। उन्होंने ट्वीट किया है, “मुर्शिदाबाद जाते हुए मुझे नवग्राम के पास मजहबी भीड़ ने घेर लिया है। मेरी गाड़ी के दोनों तरफ भीड़ जमा है। प्रशासन कोई सुनवाई नहीं कर रहा। SP और DG भी फ़ोन नहीं उठा रहे। पश्चिम बंगाल में अराजक सरकार के रहते कुछ भी हो सकता है। यहाँ किसी की जान सुरक्षित नहीं है।”

उन्होंने कहा है, “मुर्शिदाबाद जाते हुए नवग्राम के पास मुस्लिमों की भीड़ ने रिक्शा सामने अड़ाकर हमारा रास्ता रोक दिया। भीड़ की उग्रता देखकर लगता है कि इन्हें भड़काकर हमारे खिलाफ किया गया है। प्रशासन की लापरवाही इससे नजर आती है कि कोई फोन तक नहीं उठा रहा।”

इससे पहले मंगलवार को डीसीपी पर दंगाइयों ने बम फेंका था। हावड़ा के डीसीपी (मुख्यालय) अजीत सिंह यादव पर बम तब फेंका गया जब वे माणिकपुर इलाके में हालात पर काबू पाने पहुॅंचे थे। उनके साथ दो और पुलिसकर्मी भी इस हमले में जख्मी हो गए। बंगाल में हिंसा का यह सिलसिला बीते हफ्ते जुमे की नमाज के बाद शुरू हुआ था। इसके बाद से ही राज्य के अलग-अलग हिस्सों से हिस्सा की खबरें लगातार आ रही है। सबसे ज्यादा नुकसान रेलवे की संपत्तियों को पहुॅंचाया गया है। मालदा, उत्तर दिनाजपुर, मुर्शिदाबाद, हावड़ा, उत्तर 24 परगना, बीरभूम, नदिया और हावड़ा जिलों से हिंसा, लूट और आगजनी की कई घटनाएँ सामने आई हैं।

इस बीच, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा है कि रेलवे की संपत्तियों की सुरक्षा उनके सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार शुक्रवार के बाद से अब तक कम से कम 700 ट्रेनें रद्द की गई हैं। ममता ने कहा, “अमित शाह केवल बीजेपी के नेता नहीं हैं। वे देश के गृह मंत्री हैं। शांति बनाए रखना उनकी जिम्मेदारी हैं। उन्होंने कहा कि ‘सबका साथ, सबका विकास’ का नारा देने वाली केंद्र सरकार ‘सबके साथ सर्वनाश’ करने पर तुली है।” साथ ही सीएए और एनआरसी वापस लेने की मॉंग करते हुए एक बार फिर दोहराया है कि राज्य में वे इसे लागू नहीं होने देंगी।

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CAA और NRC पर फरहान गैंग के हर झूठ का पर्दाफाश: साज़िश का जवाब देने के लिए जानिए सच्चाई

जावेद अख्तर और उनकी पहली पत्नी के बेटे फरहान अख्तर ने एक बार फिर से संशोधित नागरिकता क़ानून (CAA) को लेकर झूठ फैलाया है। ऐसा लगता है जैसे उन्हें व्हाट्सप्प पर कुछ मिला, जिसे उन्होंने बिना जाँच-पड़ताल के ही ट्विटर पर शेयर कर दिया। उन्होंने जो भी जानकारी शेयर की है, वो भ्रामक है, ग़लत है, त्रुटिपूर्ण है और भड़काऊ भी है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह बार-बार सभी इंटरव्यू में कह रहे हैं कि सीएए का भारतीय मुस्लिमों से कोई लेना-देना नहीं है। यहाँ तक कि इसका भारतीय नागरिकों से भी कोई लेना-देना नहीं है। फिर भी इससे जुड़ी ऐसी जानकारियाँ शेयर की जा रही हैं, जिससे लगे कि ये मजहब विशेष के ख़िलाफ़ है।

‘डॉन’ और ‘दिल चाहता है’ जैसी फ़िल्मों को निर्देशित कर चुके फरहान अख्तर ने एक फोटो ट्वीट किया। उसमें बताया गया है कि संसद द्वारा पारित किए गए नए क़ानून के अनुसार, पड़ोसी देशों के हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के उन लोगों को भारतीय नागरिकता दी जाएगी, जो वहाँ की प्रताड़ना से बचने के लिए भारत आ गए हैं। इसके बाद उन्होंने दावा किया है कि अगर एनआरसी के साथ इसे जोड़ कर देखा जाए तो ये क़ानून मुस्लिमों को बाहर कर देता है। आइए, बताते हैं कि ये कैसे ग़लत है:

एनआरसी अभी पूरे देश में लागू नहीं किया गया है। ये भारतीय नागरिकों के एक डेटाबेस की तरह है, एक आधिकारिक रिकॉर्ड है, जिसे फिलहाल केवल असम में लागू किया गया है। इसे पूरे देश में लागू करने की बातें ज़रूर हो रही हैं, लेकिन इसके लिए क्या नियम-क़ानून हैं, ये तभी पता चलेगा जब सरकार कोई घोषणा करे। और हाँ, 1951 में हुए जनगणना के बाद इस रजिस्टर को तैयार किया गया था लेकिन उसके बाद से इसे अपडेट नहीं किया गया। इन सबके बावजूद जानबूझकर सीएए के विरोध में एनआरसी को घुसाया जा रहा है, ताकि मुस्लिमों को डराया जा सके। सारे कार्य सिटीजनशिप एक्ट, 1955 के तहत ही हो रहा है।

अब सीएए पर आते हैं क्योंकि फरहान अख्तर गैंग की पूरी कोशिश यही है कि सीएए की जगह एनआरसी की बात हो और जनता को भड़काया जा सके। हमने देखा कि फरहान अख्तर ने लिखा कि सीएए में मुस्लिमों को बाहर कर दिया गया है, छाँट दिया गया है। ऐसा नहीं है। इस क़ानून के तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के उन प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता दी जाएगी, जो दिसंबर 2014 से पहले से भारत में रह रहे हैं। वहाँ अल्पसंख्यक कौन हैं? हिन्दू, सिख, जैन, ईसाई, बौद्ध और पारसी। मुस्लिम तो इन तीनों देशों में अल्पसंख्यक हैं ही नहीं। फिर जावेद और उनकी पहली पत्नी के बेटे फरहान अपना अल्पसंख्यक-विरोधी रुख क्यों दिखा रहे हैं?

ऐसा भी नहीं है कि इन तीनों देशों से जो भी अल्पसंख्यक यहाँ आएँगे, उन्हें नागरिकता दे दी जाएगी। केवल उन्हीं को मिलेगी, जो दिसंबर 2014 से पहले से भारत में रह रहे हैं। उसके बाद जो आए हैं या आगे जो आएँगे, उनके लिए ये नियम नहीं है। तो क्या मुस्लिमों को नागरिकता नहीं मिलेगी? भारत की नागरिकता के लिए आवेदन करने के अपने नियम-क़ानून हैं और उसके तहत कोई भी ऐसा कर सकता है। ये सरकार फ़ैसला लेती है कि किसे नागरिकता देनी है या नहीं। जैसे, अदनान सामी मुस्लिम हैं, फिर भी उन्होंने आवेदन किया और उन्हें नागरिकता मिली। इसी तरह दरवाजे सबके लिए खुले हैं। ऐसा कोई भी नियम नहीं बनाया गया है, जिसमें ये लिखा हो कि मुस्लिमों को नागरिकता नहीं दी जाएगी।

अब फरहान अख्तर के अगले झूठ पर आते हैं। ‘रॉक ऑन’ और ‘ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा’ के अभिनेता फरहान ने लिखा है कि मुस्लिमों के अलावा इन लोगों को भी छाँट दिया जाएगा और निकाल बाहर किया जाएगा- आदिवासी, महिलाएँ, ट्रांसजेंडर्स, दलित, भूमिहीन, नास्तिक, भूमिहीन और दस्तावेज न रखने वाले लोग। फरहान लिखते हैं कि इन लोगों को जेल में ठूँस दिया जाएगा। इन्हें प्रत्यर्पित कर दिया जाएगा और प्रताड़ना कैम्पों में डाल दिया जाएगा। अब आप सोचिए, सरकार के मंत्रीगण और भाजपा के सांसदों-विधायकों के घर में महिलाएँ नहीं हैं क्या? भाजपा में दलित और आदिवासी नेतागण थोक संख्या में हैं? वो सब जेल जाएँगे, प्रत्यर्पित होंगे और प्रताड़ना कैम्पों में डाले जाएँगे?

वैसे तो जाति की चर्चा करना उचित नहीं है लेकिन इस प्रोपेगंडा का जवाब देने के लिए इसका उल्लेख करना पड़ेगा। भारत के राष्ट्रपति, जो संघ से जुड़े रहे हैं और भाजपा नेता भी हैं, वो दलित हैं। क्या उन्होंने ऐसे क़ानून पर हस्ताक्षर किया, जिससे उन्हें ही जेल में डाल दिया जाएगा? ये बेहूदा लॉजिक है। लेकिन फिर भी, एक-एक झूठ का पर्दाफाश आवश्यक है। दरअसल, असम में जो एनआरसी लाया गया है, उसका धर्म से कोई लेना-देना है ही नहीं। ये तो सभी नागरिकों के लिए है! दलितों, मुस्लिमों व महिलाओं को अलग करने का कोई सवाल ही कहाँ उठता है, जब मजहब, लिंग और जाति का एनआरसी से कोई मतलब ही नहीं है।

इसके बाद फरहान अपने व्हाट्सप्प फॉरवर्ड के माध्यम से समझाते हैं कि एनआरसी क्या है? इसमें बताया गया है कि ये भारत के हर नागरिक को ये साबित करने को कहता है कि वो यहाँ रहने के अधिकारी तभी होंगे, जब उनके पास दस्तावेजी सबूत हों। फरहान लिखते हैं कि आईडी कार्ड और टैक्स स्लिप्स से कुछ साबित नहीं होगा। इसके बाद वो पूछते है कि कितने लोगों के माता-पिता के पास 1971 के पहले का जन्म प्रमाण पत्र या ऐसे दस्तावेज हैं? यहाँ फिर से बताना पड़ेगा कि एनआरसी पूरे देश में लागू नहीं किया गया है और असम में 1971 को समयसीमा तय करनी एक वजह है। असम एकॉर्ड में भी इसी तारीख का जिक्र किया गया है। ये एकॉर्ड केंद्र सरकार और असम आंदोलन के नेताओं के बीच हुआ था। तब केंद्र में कॉन्ग्रेस की सरकार थी।

फिर पूरे देश के लिए 1971 की बात क्यों की जा रही है, जबकि ऐसी कोई बात ही नहीं है? ये तो असम के लिए है। अब फरहान अख्तर के अगले झूठ की ओर आते हैं। फरहान यहाँ सीएए और एनआरसी को लिंक किए जाने की बात करते हैं। उनका कहना है कि सरकार ऐसा करेगी। सच्चाई क्या है? सच्चाई ये है कि एनआरसी को अपडेट करने के लिए सीएए का कोई इस्तेमाल होगा ही नहीं। सरकार ने भी इस बात से पूरी तरह इनकार कर दिया है। जब एनआरसी मजहबी आधार पर किया ही नहीं जा रहा और इसके लिए सीएए का इस्तेमाल हो ही नहीं रहा, तो फिर मुस्लिमों को बाहर किए जाने वाली बात ही फ़र्ज़ी साबित हो जाती है।

सिटीजनशिप एक्ट, 1955 के तहत काम होगा और जो देश का नागरिक नहीं है, उसे देश से बाहर निकाल फेंका जाएगा। इससे फरहान अख्तर या उनके गैंग को समस्या ही क्या है? अब फरहान अख्तर के सबसे बड़े झूठ की तरफ़ आते हैं। ‘सेनोरिटा’ और ‘दिन धड़कने दो’ जैसे गाने गा चुके फरहान को कम से कम एक बार सीएए पढ़ तो लेना चाहिए था। भले ही वो ‘रॉक ऑन’ में ‘सोचा है’ गाते हैं लेकिन खुद उनमें सोचने की क्षमता की कमी दिखाई देती है। उनके अगले झूठ पर नज़र डालिए:

फरहान लिखते हैं कि भारत के हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध, सिख, पारसी और ईसाई समुदाय से जुड़े लोगों को बिना दस्तावेज दिखाए ही नागरिकता दे दी जाएगी। मज़ाक चल रहा है क्या? किसी व्यक्ति को सिर्फ़ इसीलिए दस्तावेज नहीं दिखाने होंगे क्योंकि वो हिन्दू है? इसके बाद फरहान इसे भेदभाव करार देते हुए कहते हैं कि ये भारत के सेक्युलर संवैधानिक मूल्यों के ख़िलाफ़ है। किसी अनपढ़ व्यक्ति को भी ये पता है कि वो हिन्दू हो या मुस्लिम, उसे राशन लेने के लिए राशन कार्ड और वोट देने के लिए वोटर आईडी कार्ड दिखाना ही पड़ेगा। सरकारी अधिकारी इसके लिए उसका मजहब नहीं पूछेंगे।

एक बात जान लीजिए। जब भी कोई व्यक्ति आपसे कहे कि भेदभाव हो रहा है, आप जवाब दीजिए कि एनआरसी में एक हिन्दू को भी उन्हीं प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ेगा, जिससे एक मुस्लिम को। एक सिख और एक हिन्दू या फिर एक पारसी और एक बौद्ध, किसी भी व्यक्ति को समान नियम-कायदों का पालन करना पड़ेगा। फरहान अख्तर और उनके गैंग के लोग नकारात्मक मानसिकता से भरे पड़े हैं। वो मुस्लिमों को डरा रहे हैं। एनआरसी और सीएए की लिंकिंग की बात ग़लत है। मुस्लिमों को छाँटने की बात ग़लत है। भेदभाव की बात ग़लत है। ये सारे तर्क दीजिए, जब भी कोई ऐसी भ्रामक बातें फैलाए। जाते-जाते बता दें कि फरहान अख्तर ने भारत का जो नक्शा शेयर किया है, वो भी ग़लत है। वो पूरे जम्मू कश्मीर को भारत का हिस्स्सा नहीं मानते।

…वो सांसद जिसने किया CAB का समर्थन लेकिन जमात फेडरेशन ने कर दिया निष्कासित

जामिया हिंसा पर FIR: कॉन्ग्रेस का पूर्व MLA आसिफ खान भी था शामिल, दंगाइयों के साथ छात्रों ने भी की पत्थरबाजी

भारत के साथ रिश्ते सुनहरे दौर में, अवैध रूप से रह रहे हर बांग्लादेशी को बुलाएँगे: पीएम शेख हसीना का सलाहकार

…वो सांसद जिसने किया CAB का समर्थन लेकिन जमात फेडरेशन ने कर दिया निष्कासित

AIADMK राज्यसभा सांसद ए मोहम्मद जॉन को संसद में नागरिकता संशोधन विधेयक का समर्थन करने पर ऑल जमात फेडरेशन से निष्कासित कर दिया गया है। ये फैसला रानीपेत में सोमवार (दिसंबर 16, 2019) की शाम अधिकारियों की बैठक के बाद लिया गया।

फेडरेशन में मोहम्मद जॉन ‘संरक्षक’ के पद पर साल 2010 से आसित थे। लेकिन सोमवार को उन्हें इस पद से यह कहकर हटा दिया गया कि कैब का समर्थन करके उन्होंने समुदाय का अपमान किया है।

ऑल जमात फेडरेशन के सदस्य मोहम्मद हसन और तमिलनाडु के जिलाध्यक्ष मुनेत्र कड़गम ने इस बैठक की जानकारी देते हुए बताया कि सोमवार को हुई बैठक में सर्वसम्मति से सब ने फैसला लिया कि मोहम्मद जॉन को राज्यसभा में कैब का समर्थन करने पर उनके पद से निष्कासित किया जाए, क्योंकि ऐसा करके उन्होंने समुदाय का अपमान किया है।

इसके अलावा मोहम्मद हसन ने ये भी बताया है कि जॉन को उनके पद से हटाने का फैसला राज्य में पूरी जमात और रानीपेत में समुदाय द्वारा बनाए जा रहे दबाव के बाद लिया गया है।

गौरतलब है कि कैब का समर्थन करने के कारण टीएमएमके ने भी मोहम्मद जॉन के ख़िलाफ़ उनके आवास पर प्रदर्शन करने का ऐलान किया है। साथ ही ये भी बताया है कि उनके इस फैसले में IUML,VCK और TVK जैसी स्थानीय पार्टियाँ भी साथ हैं।

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जामा मस्जिद के शाही इमाम ने कहा- CAA से मुस्लिमों का लेना-देना नहीं, कौमी ठेकेदारों ने बताया जाहिल

नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA के बहाने देश के कई हिस्सों में समुदाय विशेष की हिंसा के बीच दिल्ली के जामा मस्जिद के शाही मस्जिद सैयद अहमद बुखारी की शांति की अपील उनके ही समुदाय के ठेकेदारों को नहीं भाया। शाही इमामन ने लोगों को CAA का सही मतलब बताते हुए उनसे शांत रहने की अपील की। उन्होंने कहा कि विरोध लोगों का लोकतांत्रिक अधिकार है। कोई उन्हें ऐसा करने से नहीं रोक सकता। लेकिन, यह बेकाबू नहीं होना चाहिए।

सड़कों पर उतरकर हिंसा करने वाले लोगों को समझाने की कोशिश करते हुए उन्होंने कहा कि इस कानून का भारत के मुस्लिमों से कोई सरोकार नहीं है। ये केवल उन तीन इस्लामिक देशों के अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के लिए है, जिन्हें उनके मुल्क में प्रताड़ित किया गया है। शाही इमाम ने एनआरसी और सीएए को दो अलग-अलग चीज भी बताया और कहा कि दोनों में फर्क़ हैं। एक सीएए है, जो अब कानून बन गया है और दूसरा एनआरसी है, जिसकी अभी सिर्फ़ घोषणा हुई है, वो कानून नहीं बना है।

हालाँकि, जामा मस्जिद का शाही इमाम होने के नाते अहमद बुखारी का ये फर्ज था कि वो अपने समुदाय के लोगों को समझाएँ और नए कानून पर उनकी भ्रम की स्थिति को दूर करें। लेकिन जैसे ही उन्होंने ऐसा किया, मजहब के कट्टरपंथी ठेकेदार उन पर टूट पड़े। उनके ख़िलाफ़ बयानबाजी होने लगी। उन्हें जाहिल कहा गया। ‘जमीरफरोश’ करार दिया गया।

सबसे पहले आप समर्थक ‘जनता का रिपोर्टर’ के संपादक रिफत जावेद ने अहमद बुखारी पर सवाल उठाए और उन्हें जाहिल यानी बेवकूफ बताया। रिफत ने लिखा, “इस जाहिल को शाही इमाम का तमगा किसने दे दिया। इन्हें फॉलो कौन करता हैं। ऐसे लोग सच्चे जमीरफरोश होते हैं।”

इसके बाद अहमद बुखारी को समुदाय विशेष के लोगों द्वारा सोशल मीडिया पर ‘सरकारी कठपुतली’ और ‘सरकारी मौलाना’ कहा जाने लगा।

एक सोशल मीडिया यूजर्स ने उन्हें सीएए पर बरगलाने वाला बताया और कुछ ने गुस्से में पूछा कि आखिर ये है ही कौन?

केवल जनता के बीच में भ्रम दूर करने के कारण लोग उनपर ये इल्जाम लगाने से भी नहीं चूँके कि वो सरकार से पैसे लेते हैं और सरकारी भोंपू हैं।

बता दें, कि सोशल मीडिया पर अहमद बुखारी की अपील के विरोध में उतरे लोगों के अलावा कई लोग ऐसे हैं जिन्होंने उनके साथ अपनी सहमति दिखाई हैं। उनके इस अपील के कारण लोग उन्हें पढ़ा-लिखा समझदार इमाम कह रहे हैं। लेकिन कुछ उनके बयान पर उन्हें ट्रोल करने से बाज नहीं आ रहे। लोगों का कहना है कि इस इमाम को साल 2004 में आडवाणी 2 करोड़ रुपए में लेकर आए थे और तब इसने भाजपा का समर्थन किया था, इसलिए ऐसे गद्दारों को चप्पल से धोना चाहिए।

जामिया में मिले 750 फ़र्ज़ी आईडी कार्ड: महीनों से रची जा रही थी साज़िश, अचानक नहीं हुई हिंसा

CAA के ख़िलाफ़ प्रदर्शन के नाम पर दंगा भड़काने की साज़िश: व्हाट्सप्प ग्रुप से हुआ कॉन्ग्रेस नेताओं का पर्दाफाश

इस उन्माद, मजहबी नारों के पीछे साजिश गहरी… क्योंकि CAA से न जयंती का लेना है और न जोया का देना

71 मौतें, 185 घायल: जयपुर बम ब्लास्ट में 11 साल बाद न्याय – सैफ, सरवर, सैफुर्रहमान, सलमान दोषी करार

राजस्थान की राजधानी जयपुर में 13 मई 2008 को 8 जगहों पर सिलसिलेवार धमाके हुए थे। जिसके संबंध में यहॉं की एक विशेष अदालत ने बुधवार (18 दिसंबर 2019) को इस मामले में चार लोगों को दोषी करार दिया। इनके नाम हैं मोहम्मद सैफ, मोहम्मद सरवर आजम, सैफुर्रहमान और मोहम्मद सलमान। धमाकों में 71 लोगों की मौत हो गई थी, जबकि 185 लोग घायल हुए थे।

इस ब्लास्ट के 2 अन्य आरोपित दिल्ली के बटला हाउस में 2008 में हुए एनकाउंटर में मार गिराए गए थे। एक आरोपित शाहबाज हुसैन को अदालत ने साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया है। धमाकों के सि​लसिले में जयपुर पुलिस ने पॉंच आरोपितो को गिरफ्तार किया था। तीन आरोपित दिल्ली के तिहाड़ जेल में बंद हैं। ये तीनों देश के दूसरे हिस्सों में भी धमाकों के आरोपित हैं। लिहाजा इनके खिलाफ एटीएस जॉंच नहीं कर पाई है।

मामले में कुल 13 लोगों को पुलिस ने आरोपित बनाया था। इनमें से 3 अब भी फरार हैं। इस मामले की सुनवाई में बीते एक साल से तेजी आई थी। सुनवाई के दौरान 1,296 गवाहों के बयान दर्ज किए गए। दोषी करार दिए गए चारों आरोपितों को शुक्रवार को सजा सुनाए जाने की संभावना है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार दोषियों ने शहर में बम धमाके करने के लिए जिन जगहों व दुकानदारों से साइकिलें खरीदी थीं, उन दुकानदारों ने उनकी पहचान की थी। 13 मई 2008 की शाम परकोटा इलाके में 12 से 15 मिनट के अंतराल में चांदपोल गेट, बड़ी चौपड़, छोटी चौपड़, त्रिपोलिया बाजार, जौहरी बाजार और सांगानेरी गेट पर बम धमाके हुए थे। पहला ब्लास्ट खंदा माणकचौक, हवा महल के सामने शाम 7:20 बजे हुआ था। फिर एक के बाद एक 8 धमाके हुए थे।

इन धमाकों के बाद काफी देर तक जयपुर शहर की मोबाइल और टेलीफोन लाइनें जाम हो गईं थीं। जिससे दूसरे शहरों में मौजूद लोग अपने परिजनों और रिश्तेदारों की खैरियत जानने के लिए परेशान होते रहे थे।

बताया जाता है कि हनुमान मंदिर के निकट बम निरोधक दस्ते ने एक बम को निष्क्रिय कर दिया था। लेकिन, जो धमाके हुए थे, वो इतने शक्तिशाली थे कि कुछ लोगों के जिस्म तो कुछ फुट ऊपर तक उड़ गए थे। हमले की साजिश काफी सावधानी से रची गई थी। राजस्थान के तत्कालीन पुलिस महानिदेशक ए.एस. गिल ने कहा था कि यह आतंकवादी हमला था।

इसके बाद मामले की जाँच करते हुए एसओजी ने सितम्बर 2008 को सबसे पहले इंडियन मुजाहिद्दीन को घटना जानकारी मेल करने वाले आरोपित मोहम्मद शहबाज हुसैन को गिरफ्तार किया था। और उसकी निशानदेही पर ही पुलिस ने मार्च 2009 में मोहम्मद सैफ उर्फ कैरीऑन और मोहम्मद सरवर आज़मी को भी गिरफ्तार कर लिया। बाद में मोहम्मद सलमान और सैफुर उर्फ सैफुर्रहमान अंसारी को भी गिरफ्तार कर लिया गया। इसके अलावा, पिछले साल आरिज खान उर्फ जुनैद को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया, लेकिन अभी तक राजस्थान पुलिस ने उसे प्रोडेक्शन वारंट पर गिरफ्तार नहीं किया है। पूरे मामले में मिर्जा शादाब बैग उर्फ मलिक, साजिद बड़ा और मोहम्मद खालिद अभी भी फरार चल रहे हैं।

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जनरल डायर की तरह लोगों पर गोली चलवा रहे अमित शाह: एनसीपी नेता नवाब मलिक

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध के बहाने देश में कई जगहों पर हिंसा की गई है। इन घटनाओं के पीछे की साजिश भी धीरे-धीरे सामने आने लगी है। इनमें विपक्षी दल के नेताओं की संलिप्तता भी उजागर हुई है। जामिया में हुई हिंसा को लेकर दिल्ली पुलिस ने जो एफआईआर दर्ज की है उसमें कॉन्ग्रेस के पूर्व विधायक आसिफ मोहम्मद खान का भी नाम है।

एक ओर विपक्षी नेता हिंसा करने वालों का बचाव करने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं, दूसरी ओर केंद्र सरकार और भाजपा नेताओं के खिलाफ विवादित टिप्पणी का सिलसिला भी जारी है। इस कड़ी में एनसीपी की मुंबई ईकाई के अध्यक्ष और विधायक नवाब मलिक ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की तुलना अंग्रेज अफसर जनरल डायर से की है।

मलिक ने कहा है कि अमित शाह जनरल डायर की तरह देश के लोगों पर गोली चलवा रहे हैं। उन्होंने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे के उस बयान का भी समर्थन किया है, जिसमें उन्होंने जामिया की घटना की तुलना जलियॉंवाला बाग में 1919 में निहत्थों पर हुई गोलीबारी से की थी। मलिक ने कहा, “जिस तरह जलियॉंवाला बाग में जनरल डायर ने लोगों पर गोली चलवाई थी, अमित शाह भी देश के लोगों पर ऐसे ही गोली चलवा रहे हैं। अमित शाह जनरल डायर से कम नहीं हैं।” उन्होंने कहा कि उद्धव ठाकरे का वह बयान बिल्कुल सही था, जिसमें उन्होंने जामिया में पुलिस कार्रवाई को जलियॉंवाला जैसा बताया था।

ठाकरे ने कहा था कि जामिया में जो हुआ वह जलियॉंवाला बाग जैसा है। छात्र एक ‘युवा बम’ की तरह हैं। हम केंद्र सरकार से अपील कर रहे हैं कि वे छात्रों के साथ जो कर रहे हैं, वह ना करें। इस बयान को लेकर महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस ने कहा था कि जामिया की घटना की जलियॉंवाला से तुलना कर उद्धव ठाकरे ने शहीदों का अपमान किया है।

गौरतलब है कि महाराष्ट्र में शिवसेना, कॉन्ग्रेस और एनसीपी की गठबंधन सरकार सत्ता में है। कॉन्ग्रेस के स्टैंड के विपरीत जाकर शिवसेना ने लोकसभा में नागरिकता संशोधन विधेयक का समर्थन किया था। हालॉंकि दबाव में वह राज्यसभा में बिल के पक्ष में मतदान से पीछे हट गई थी और मतदान के वक्त उसके सांसद सदन से बाहर निकल गए थे। इसके बाद से ही नागरिकता संशोधन कानून पर शिवसेना का स्टैंड पेंडुलम की तरह बना हुआ है।

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दिलीप मंडल के विरोध की सजा: माखनलाल यूनिवर्सिटी ने 23 छात्रों को निष्कासित किया

दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया और यूपी के अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में विरोध के नाम पर हिंसक हुए छात्रों के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया गया। कॉन्ग्रेस सहित तमाम विपक्षी दल इन छात्रों की ढाल बनकर खड़े हो गए। लेकिन, इसी वक्त में कॉन्ग्रेस शासित मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय में 23 छात्र निष्कासित कर दिए गए।

इन छात्रों पर कार्रवाई प्रदर्शन के दौरान कथित अनुशासनहीनता को लेकर की गई है। प्रदर्शन दो प्रोफेसरों दिलीप मंडल और मुकेश कुमार के खिलाफ जातिगत भेदभाव का आरोप लगते हुए किया गया था। शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मॉंगों के समर्थन में धरने पर बैठे छात्रों के साथ बर्बरता बरतने का आरोप पुलिस पर भी है। छात्रों का कहना है कि कुलपति की शह पर ऐसा किया गया।

असल में प्रदेश में कॉन्ग्रेस की सरकार बनने के बाद इस विश्वविद्यालय में राजनीतिक प्रयोगों का जो सिलसिला शुरू हुआ था उसके तहत ही कुछ महीने पहले दिलीप मंडल और मुकेश कुमार की अनुबंध पर नियुक्ति हुई थी। आरोप है कि दोनों प्रोफेसर छात्रों के बीच जातिगत भेदभाव कर माहौल खराब कर रहे हैं। इन छात्रों को मंगलवार को निष्काषित करने का आदेश जारी किया गया।

बता दें, यूनिवर्सिटी के दो सहायक प्रोफेसर द्वारा जातिवादी ट्वीट के बाद छात्रों ने ये प्रदर्शन शुरू किया था और इसी संबंध में उन्होंने पिछले गुरुवार को वाइस चांसलर के केबिन के सामने धरना दिया था। हालाँकि उस वक्त वीसी भोपाल में मौजूद नहीं थे। छात्रों के इस समूह की माँग थी कि छात्रों के साथ जातिगत भेदभाव करने वाले प्रोफेसरों को निष्काषित किया जाए। लेकिन, कॉलेज प्रशासन ने उन्हें हटाने की जगह छात्रों को ही सस्पेंड कर दिया।

साथ ही, आदेश की कॉपी में छात्रों पर लिए गए एक्शन पर लिखा गया कि जब वीसी दीपक तिवारी वापस आए तो स्टूडेंट्स अगले दिन धरने पर बैठ गए। इस दौरान कुछ छात्रों ने दोबारा से तोड़फोड़ की। जिसके बाद वीसी ने पुलिस को बुलाया और पुलिस-छात्रों में बवाल हुआ। इस दौरान दोनों पक्षों की चोटें आईं। 10 छात्रों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज हुई। अब एफआईआर में 13 नाम और जोड़े गए हैं।

जानकारी के मुताबिक, यूनिवर्सिटी की अनुशासनात्मक कमिटी ने छात्रों के निष्कासन की सिफारिश की थी। जिसके बाद रजिस्ट्रार दीपेंद्र बघेल ने मंगलवार को ऑर्डर जारी किया। मंगलवार को जारी किए गए आदेश में रजिस्ट्रार की तरफ से कहा गया,”इन छात्रों को निष्कासित किया गया है और अगले आदेश तक ये यूनिवर्सिटी की कक्षा या एग्जाम में शामिल नहीं हो सकेंगे।”

रजिस्ट्रार का कहना है कि ये फैसला सीसीटीवी फुटेज देखकर लिया गया है। अनुशासनात्मक समिति ने तय किया है कि छात्रों के दुर्व्यवहार और अनुशासनहीनता को देखते हुए सख्त कार्रवाई होनी जरूरी है ताकि भविष्य में इस तरह की दोबारा कोई हरकत न हो।

निष्कासित किए गए छात्रों के नाम सौरभ कुमार, प्रखरादित्य द्विवेदी, राघवेंद्र सिंह, आशुतोष भार्गव, अभिलाष ठाकुर, अर्पित शर्मा, रवि भूषण सिंह, अंकित शर्मा, अर्पित दुबे, सुरेंद्र चौधरी, विवेक उपाध्याय, शुभम द्विवेदी, अंकित कुमार चौबे, आकाश शुक्ला, अनूप शर्मा, प्रतीक वाजपेयी, विपिन तिवारी, राहुल कुमार, रवि शर्मा, मोनिका दुबे, नीतीश सिंह और विधि सिंह है।

प्रशासन के इस फैसले के बाद शिवराज सिंह चौहान ने बच्चों के समर्थन में आवाज उठाई है। उन्होंने ट्वीट किया है, “माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय एवं संचार विश्वविद्यालय में छात्रों को जायज माँगे उठाने पर निष्काषित कर दिया है। यह बच्चों की आवाज दबाने व लोकतंत्र को कुचलने का प्रयास है। छात्रों को निष्काषित कर उनके भविष्य को तबाह करने के इस षड्यंत्र को हम कामयाब नहीं होने देंगे।” चौहान ने कहा है कि छात्रों की सभी जायज माँगे मानी जाएँ और उनके निष्कासन का आदेश तुरंत वापस लिया जाए।

उल्लेखनीय है कि दिलीप मंडल और मुकेश कुमार पर छात्रों के बीच जातिगत भेदभाव कर माहौल खराब करने का आरोप है। छात्रों का आरोप है कि दिलीप मंडल और मुकेश कुमार सोशल मीडिया पर जाति विशेष को लेकर लगातार पोस्ट कर रहे हैं। छात्रों ने इस संबंध में 11 दिसंबर को कुलपति को ज्ञापन सौंपते हुए शिकायत की थी कि दिलीप सी मंडल और मुकेश कुमार जाति के आधार पर छात्रों के साथ भेदभाव करते हैं और जातिगत कटुता बढ़ाने का काम कर रहे हैं। मगर विश्वविद्यालय प्रशासन की तरफ से न तो उनसे संपर्क करने की कोई कोशिश की गई और न ही ज्ञापन से संबंधित कोई जवाब दिया गया। उल्टा प्रशासन ने इनके खिलाफ FIR करवा दी और फिर पुलिस ने भी छात्रों के साथ काफी बर्रबरता से मारपीट की। 

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