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55 लाख आयुष्मान कार्ड्स, 30 लाख LPG कनेक्शन: इन योजनाओं को धरातल पर उतार कर भी हारी BJP

झारखण्ड में राज्य सरकार ने मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं को धरातल पर लागू करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ऐसा हम नहीं कह रहे बल्कि आँकड़े कुछ ऐसी ही कहानी बयाँ कर रहे हैं। अगर कुल वोटों की बात करें तो राज्य में भाजपा को ताज़ा विधानसभा चुनाव में 50 लाख 22 हज़ार 374 (5,022,374) वोट मिले। अगर सरकारी योजनाओं की बात करें तो मोदी सरकार की बड़ी योजनाओं का लाभ इससे कहीं ज़्यादा लोगों को मिला। भाजपा को राज्य में 25 सीटें आई हैं और हेमंत सोरेन की झामुमो 30 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी है।

सरकारी योजनाओं के आँकड़ों पर एक नज़र डालने से हमें पता चलेगा कि पिछले कुछ सालों में राज्य सरकार द्वारा शुरू की गई जन कल्याणकारी योजनाओं के मामले में झारखण्ड का कैसा प्रदर्शन रहा?

आयुष्मान भारत: 55 लाख लोगों को दिए गए कार्ड्स

अगर ‘आयुष्मान भारत योजना’ की ही बात करें तो भाजपा को जितने वोट मिले, उससे 5 लाख से भी ज़्यादा लोगों को इस योजना का लाभ दिया गया। आँकड़ों के अनुसार, 55 लाख 2 हज़ार 570 (55,02,570) लोगों को इ-कार्ड्स दिए गए। राज्य के 654 अस्पतालों को इस योजना के तहत सूचीबद्ध किया गया है। इन आँकड़ों से पता चलता है कि भाजपा ने जिन लोगों को हेल्थकेयर स्कीम से जोड़ा, उससे 5 लाख कम लोगों ने उसे वोट दिया। ये योजना झारखण्ड से ही लॉन्च की गई थी। राज्य में 57 लाख लोगों को इससे जोड़ने का लक्ष्य रखा गया था।

उज्ज्वला: 30 लाख गैस कनेक्शन

झारखण्ड में उज्ज्वला योजना का प्रदर्शन काफ़ी शानदार रहा। राज्य सरकार ने दावा किया था कि ये देश का पहला राज्य है, जहाँ गैस कनेक्शन के साथ मुफ्त में ओवन और पूरा भरा हुआ सिलिंडर दिया गया। अब तक राज्य में 31 लाख से भी ज़्यादा गैस कनेक्शन बाँटे गए हैं। अगस्त 2019 में रघुबर सरकार ने एक बार फिर से 12 लाख नए एलपीजी गैस कनेक्शन बाँटने का अभियान शुरू किया था। देशभर में इस योजना के तहत एक सिलिंडर दिया जाता था लेकिन झारखण्ड सरकार ने लाभार्थियों को 2 सिलिंडर दिया। पीएम मोदी ने हर जनसभा में उज्ज्वला का जिक्र किया था लेकिन शायद इनमें से सब वोटों में तब्दील नहीं हो सका।

कृषि आशीर्वाद योजना: 20 लाख किसानों को मिला लाभ

ऐसा नहीं है कि राज्य सरकार ने सिर्फ़ केंद्र की योजनाओं को लागू करने में ही चपलता दिखाई। रघुबर दास की सरकार ने अपनी योजनाओं को भी बखूबी लागू किया। जहाँ एक तरफ केंद्र की पीएम किसान सम्मान योजना के तहत किसानों को 6 हज़ार रूपए सालाना दिए गए, ‘मुख्यमंत्री कृषि आशीर्वाद’ योजना के तहत भी 5 से 25 हज़ार रूपए किसानों को प्रतिवर्ष मिले। केंद्र की योजना का लाभ 8 लाख किसानों को मिला और राज्य सरकार की योजना 20 लाख 56 हज़ार किसानों तक पहुँची। इसके तहत 11 लाख किसानों को पहली क़िस्त में ही जोड़ लिया गया था।

तेजस्विनी योजना: 10 लाख किशोरियों को प्रशिक्षण

भाजपा ने महिला कल्याण मंत्रालय लुइस मरांडी को सौंपा था। 2014 में तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को हरा कर लुइस विधायक बनी थीं। उन्होंने ‘तेजस्विनी योजना’ के तहत 14-24 वर्ष की युवतियों को कौशल प्रशिक्षण देने का कार्यक्रम चलाया, ताकि उन्हें रोज़गार मिलने में समस्या न हो।

इस योजना से 10 लाख युवतियों व किशोरियों को जोड़ा गया। मुख्यमंत्री कन्यादान योजना के तहत 72 हज़ार से कम वार्षिक आय वालों को 30 हज़ार रुपए दिए गए। वहीं मुख्यमंत्री सुकन्या योजना के तहत बालिका व उसके परिजनों के खाते में रुपए डाले गए। इन सबके बावजूद रघुबर दास अपनी सरकार नहीं बचा पाए।

आदित्य ठाकरे ने उत्तर भारतीय को कहा नीच, शिवसैनिकों की गुंडई को ठहराया जायज

एक तरफ विपक्ष मोदी सरकार पर तानाशाही और आवाज़ दबाने का आरोप लगाता है। दूसरी तरफ जिन राज्यों में विपक्षी दल सत्ता पर काबिज हैं, वहाँ सत्ताधीशों के ख़िलाफ़ फेसबुक पोस्ट हिंसा का कारण बन जाती है। अव्वल तो ये कि इस घटना की निंदा करने की बजाय उसे जायज ठहराया जाता है। विश्व हिन्दू परिषद के कार्यकर्ता राहुल तिवारी को शिवसैनिकों ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की आलोचना करने वाले पोस्ट के लिए पीटा।

शिवसैनिकों की गुंडई को पार्टी विधायक और उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ने जायज ठहराया है। इतना ही नहीं आदित्य ने पीड़ित के लिए अपशब्दों का प्रयोग भी किया है। दरअसल, मामला ये है कि शिवसेना सुप्रीमो उद्धव ने जामिया में हुए उपद्रव की तुलना जालियाँवाला बाग़ नरसंहार से की थी, जिससे नाराज़ राहुल तिवारी ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा था कि उद्धव आखिर अपने औकात पर आ ही गए। इसके बाद अचानक से उनके घर के बाहर बड़ी संख्या में शिवसैनिक जमा हो गए और तिवारी की पिटाई की गई। उनका सिर मुंडवा दिया गया। पोस्ट डिलीट करने के बावजूद 25 शिवसैनिकों ने उन्हें मारा-पीटा।

अब आदित्य ठाकरे अपनी पार्टी के गुंडों के बचाव में उत्तर आए हैं। आदित्य ने पीड़ित राहुल तिवारी को ओछा और नीच ट्रोल करार दिया है। आदित्य ने अपने बयान में कहा कि राहुल ने मुख्यमंत्री उद्धव के लिए असभ्य भाषा का प्रयोग किया, जबकि वो सीएए से उपजे असंतोष के बीच राज्य में शांति-व्यवस्था कायम करने में लगे हुए हैं। उन्होंने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं की गुंडई को गुस्से में दी गई त्वरित प्रतिक्रिया बताया। आदित्य ने साथ ही बिना नाम लिए कहा कि राहुल जैसे धमकीबाज और गालीबाज लोगों को जवाब देना हमारा काम नहीं होना चाहिए। आदित्य ने कहा:

“मैं शिवसैनिकों की गुस्से में दी गई प्रतिक्रिया को समझ सकता हूँ। जब किसी नेता, संगठन या समुदाय के ख़िलाफ़ इस तरह इस तरह असभ्य भाषा का इस्तेमाल किया जाता है तो गुस्सा स्वाभाविक है। इनलोगों के इस व्यवहार का जवाब देश की जनता ने हालिया चुनावों में लोकतान्त्रिक तरीके से दे दिया है। ये सोशल मीडिया के ‘लिंच मॉब’ हैं, जो देश में कलह और विभाजन का माहौल पैदा करना चाहते हैं। वो परेशान हैं क्योंकि देश ने उनकी तर्कहीन बातों को नकार दिया है। मैं कहता हूँ कि हमारे मुख्यमंत्री का ही अनुसरण कीजिए। वो शांत हैं, उदार हैं, लेकिन जनहित के निर्णयों को लागू करने को लेकर आक्रामक हैं। वो जनसेवा कर रहे हैं।”

आदित्य ठाकरे ने जो बयान जारी किया, उसमें पीड़ित राहुल तिवारी को बार-बार ‘ट्रोल’ कह कर सम्बोधित किया गया है। महाराष्ट्र की पुलिस पर भी इस मामले में पक्षपात का आरोप लगा है। तिवारी ने बताया कि पुलिस ने गुंडे शिवसैनिकों पर एफआईआर दर्ज करने के बदले उन्हें ही समन जारी कर दिया। पुलिस ने उन पर समझौता करने का दबाव बनाया। साथ ही उनके साथ हुई मारपीट का वीडियो भी सोशल मीडिया पर अपलोड कर दिया गया। तिवारी ने आरोप लगाया कि अलोकतांत्रिक माहौल बना कर विरोध में आवाज़ उठाने वालों का दमन किया जा रहा है।

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AMU में छात्रों पर नहीं हुआ हथगोलों का इस्तेमाल: अफवाह फैलाने वालों का पुलिस ने किया पर्दाफाश

नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में भड़की हिंसा को शांत कराने के लिए पुलिस की कार्रवाई को लेकर काफी सवाल उठ रहे हैं। इसी बीच प्रदर्शन के दौरान घायल छात्रों की स्थिति के लिए कुछ लोगों ने पुलिस को ही जिम्मेदार ठहराया। साथ ही झूठ फैलाने की कोशिश भी की कि पुलिस ने छात्रों को रोकने के लिए हथगोलों का इस्तेमाल किया।

हालाँकि, इसी दौरान आज अलीगढ़ के एसएसपी अकाश कुल्हारी ने इन अफवाहों का खंडन किया । साथ ही बताया कि यूपी पुलिस ने हिंसा रोकने के दौरान आत्मसुरक्षा के लिए केवल नॉन लेथल हथियारों का इस्तेमाल किया, न कि हथगोलों का। इसके अलावा उन्होंने ये भी बताया कि सुप्रीम कोर्ट एवं हाईकोर्ट को भेजी रिपोर्ट में उन्होंने इस बात का जिक्र किया है कि एएमयू के छात्र उस दिन आक्रामक रूप से अराजकता फैलाने की कोशिश कर रहे थे। जिसके मद्देनजर उन्होंने 15 दिसंबर की वीडियो को भी जारी किया है। जिसमें सारी सच्चाई साफ दिख रही है।

अब सवाल ये है कि अगर अलीगढ़ एसएसपी द्वारा बताए गए तथ्य सच हैं, तो फिर पुलिस के ख़िलाफ़ अफवाह फैलाने की कोशिश किसने की? तो थोड़ा दिन पीछे जाकर इनकी शुरुआत को देखा जाए, तब पता चलेगा कि ये सब तथाकथित बुद्धिजीवियों का कारनामा है। जिसे शुरु दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर ने 19 दिसंबर 2019 को ट्वीट करके किया। अपने ट्वीट में नंदिनी ने दावा किया कि एएमयू के छात्रों को रोकने के लिए हथगोलों का इस्तेमाल किया जिससे बच्चों के हाथ चले गए।

इसके बाद अलीगढ़ पुलिस द्वारा हिंसा रोकने के लिए हथगोलों का इस्तेमाल करने की बात वामपंथी अखबार ‘द टेलीग्राफ’ में कही गई। जिसका आधार उस रिपोर्ट को बनाया गया जिसे जामिया मिलिया के छात्रों ने तैयार की।

अब इस पूरे मामले में 2 लोग ‘जाँचकर्ताओं’ के रूप में सामने आए। पहले या तो जामिया छात्र या दूसरी नंदिनी सुंदर। बता दें सुंदर द वायर के संस्थापक की पत्नी हैं और माओंवादियों की मदद करने के लिए आरोपित भी।

इसके बाद औरंगजेब परस्त इतिहासकार ऑद्रे ट्रुस्चके (Audrey Truschke) ने भी सुंदर के दावों को दोहराया और अफवाह उड़ाई कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्रों के घायल होने के पीछे पुलिस द्वारा इस्तेमाल किए गए हथियार हैं। जिसके बाद अलीगढ़ पुलिस ने इन अफवाहों को खारिज करने की ठानी और ऑद्रे को आदर के साथ जवाब दिया कि ये केवल एक अफवाह हैं। इसलिए इनको फैलाने से पहले इनके तथ्यों की जाँच करे और समाज में शांति बनाए रखने में साथ दें।

हालाँकि, अलीगढ़ पुलिस द्वारा खंडन करने के बाद भी सोशल मीडिया पर ये प्रोपगेंडा फैल चुका है और कई लोग इन बुद्धिजीवियों की बात को ही अंतिम सत्य समझ कर बैठे हैं। साथ ही अपनी बात को साबित करने के लिए तरह-तरह की रिपोर्ट शेयर करके हथगोले फेंकने की बात को सही साबित किया जा रहा है और कई बड़ी मीडिया संस्थान के पत्रकार इसपर अपनी रिपोर्ट कर रहे हैं। लेकिन, अब जब आधिकारिक रूप से अलीगढ़ एसएसपी द्वारा पुष्टि कर दी गई है, तो उम्मीद है इन झूठों पर लगाम लगेगी। क्योंकि आकाश कुल्हारी अपने बयान में दो टूक बोल चुके हैं कि वे सोशल मीडिया पर लगाए जा रहे इल्जामों पर जाँच के लिए तैयार हैं, जिनमें उनपर हथगोलों का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया जा रहा है।

CAA पर भड़काऊ बयानबाजी: रवीश कुमार पर केस, सोनिया, प्रियंका और ओवैसी भी नामजद

कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी, पार्टी महासचिव प्रियंका गाँधी और AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी के साथ ही पत्रकार रवीश कुमार के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई है। इन सब पर नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर भड़काऊ भाषण देने का आरोप है। उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट (CJM) कोर्ट में प्रदीप गुप्ता नाम के वकील ने सोनिया, प्रियंका, ओवैसी और रवीश कुमार के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है।

दैनिक जागरण को गुप्ता ने बताया कि कई लोगों ने इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रखी है। बावजूद इसके सोनिया, प्रियंका और ओवैसी साजिश के तहत लोगों को उकसाने वाले बयान दे रहे हैं। उनका कहना है कि इसके कारण ही दिल्ली के जामिया मिलिया इस्लामिया में हिंसा भड़की। गुप्ता के अनुसार इसके बाद रवीश कुमार ने इस घटना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया। नतीजतन, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी सहित देश के अन्य हिस्सों में हिंसा हुई। कोर्ट ने शिकायत पर संज्ञान लेते हुए मामले में सुनवाई की अगली तारीख 24 जनवरी तय की है।

दैनिक जागरण के अलीगढ़ संस्करण में प्रकाशित खबर

इससे पहले राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी को मेरठ बॉर्डर पुलिस रोक लिया और उन्हें वापस दिल्ली लौटा दिया। राहुल और प्रियंका शुक्रवार को मेरठ में हुए हिंसक प्रदर्शन में मारे गए लागों के परिजनों से मिलने जा रहे थे। अधिकारियों ने दोनों नेताओं को यह कह कर लौटा दिया कि शहर में अभी भी धारा-144 लागू है और उनके जाने से कानून-व्यवस्था की स्तिथि बिगड़ सकती है। बता दें कि दोनों को रोकने की तैयारी मेरठ सीमा पर मोहिउद्दीनपुर में ही कर ली गई थी। इसके लिए खरखौदा वाले रोड पर पुलिस ने पूरी तरह से नाकाबंदी की थी। लेकिन, वहाँ पुलिस प्रियंका और राहुल को नहीं रोक पाई क्योंकि उनके सुरक्षाकर्मियों ने सीओ व अन्य पुलिसवालों को धक्का देकर किसी तरह गाड़ी आगे बढ़ा दिया। वहाँ मौजूद एक सीओ ने बताया कि एक पल के लिए उन्हें ऐसा लगा कि गाड़ी उन्हें टक्कर मार देगी।

बता दें कि कॉन्ग्रेस ने सोमवार को संशोधित नागरिकता कानून के खिलाफ विरोध और तेज कर दिया। सोनिया गाँधी, पूर्व पीएम मनमोहन सिंह, राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी ने राजघाट स्थित महात्मा गाँधी के स्मारक पर जहाँ एकता के लिए सत्याग्रह किया, वहीं उसकी सहयोगी DMK ने चेन्नई में बड़ी रैली आयोजित की थी।

नागरिकता कानून के खिलाफ रैली करने के लिए DMK प्रमुख एमके स्टालिन समेत आठ हजार लोगों के खिलाफ भी केस दर्ज हुआ है। इन लोगों पर आरोप है कि इन्होंने पुलिस की अनुमति के बिना रैली निकाली थी। उल्लेखनीय है कि नागरिकता संशोधन कानून के तहत तीन पड़ोसी देशों पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश से प्रताड़ित होकर आए हिंदू, सिख, ईसाई, पारसी, जैन और बुद्ध धर्मावलंबियों को भारत की नागरिकता दी जाएगी।

CAA पर बवाल में जख्मी तारिक AMU में पढ़ाएगा: जिस VC को छात्रों ने ‘निष्कासित’ किया था उसकी मुहर

मुस्लिम भीड़ ने CAA के विरोध के नाम पर हनुमान मंदिर में घुस कर मूर्तियों को तोड़ा: वीडियो आया सामने

यूपी हिंसा: CAA के विरोध-प्रदर्शन में 250 से अधिक पुलिसकर्मी घायल, 62 दंगाइयों की गोली से जख़्मी

1 अप्रैल से NPR: घर-घर जाकर जुटाया जाएगा डाटा, मोदी सरकार ने ₹8500 करोड़ की दी मंजूरी

मोदी कैबिनेट ने नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (NPR) को मंजूरी दे दी है। इस संबंध में 1 दिन पहले ही सूचना जारी कर दी गई थी। केंद्र सरकार ने अपने नोटिफिकेशन में कहा है कि 2003 के ‘रजिस्ट्रेशन ऑफ सिटीजन्स एन्ड इशू ऑफ नेशनल आइडेंटिटी कार्ड्स’ के नियमों के तहत इस प्रक्रिया को पूरा किया जा रहा है। इसके अंतर्गत पॉपुलेशन रजिस्टर को तैयार कर अपडेट किया जाएगा। इसे फील्ड वर्क के जरिए पूरा किया जाएगा। घर-घर जाकर डाटा जुटाया जाएगा।

एनपीआर की प्रक्रिया के लिए केंद्रीय कैबिनेट ने 85,00 करोड़ रुपए का बजट आवंटित किए जाने को भी मंजूरी दे दी है। यह नागरिकता का प्रमाण नहीं होगा और न ही एनआरसी (NRC) से इसका कोई सरोकार है। इससे पहले 2011 की जनगणना से पहले 2010 में भी जनसंख्या रजिस्टर को अपडेट किया गया था। उस समय केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए-2 सरकार थी।

असम को छोड़कर सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में अप्रैल 2020 से सितंबर 2020 तक एनपीआर को अपडेट करने का काम किया जाएगा। इस प्रक्रिया के तहत उन लोगो की सूची और उनका विवरण तैयार किया जाएगा, जो लोकल रजिस्ट्रार के अंतर्गत आते हैं। सेंसस कमीशन ने कहा है कि एनपीआर का मकसद देश में रहने वाले लोगों की पहचान का एक डाटाबेस तैयार करना है।

भारत सरकार का नोटिफिकेशन: NPR के लिए गृह मंत्रालय का नोटिफिकेशन

2021 में अगली जनगणना होनी है। पश्चिम बंगाल और केरल की सरकारों ने एनपीआर की प्रक्रिया रोक दी है। कई गैर भाजपा शासित राज्यों ने कहा है कि वो एनपीआर की प्रक्रिया के लिए वर्क फोर्स देने के लिए तैयार नहीं है, क्योंकि चीजें स्पष्ट नहीं हैं। विपक्ष का आरोप है कि ये एनआरसी की प्रक्रिया का एक हिस्सा है, जबकि सरकार ने स्पष्ट कहा है कि पूरे देश में एनआरसी के लिए अभी तक कोई अधिकारिक चर्चा हुई ही नहीं है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा है कि जब तक सरकार ‘चीजें स्पष्ट नहीं करती’, तब तक राज्य में एनपीआर से जुड़ी सभी गतिविधियाँ बंद रहेंगी। मुख्यमंत्री ने सभी जिलों के डीएम को निर्देश दिया है कि एनपीआर का कार्य स्थगित कर दिया जाए। बता दें कि एनपीआर एक नियमित प्रक्रिया है, जिसे जनगणना के पहले किया जाना है, इसका एनआरसी से कोई सम्बन्ध नहीं है।

एनपीआर और एनआरसी में बुनियादी अंतर है। NRC का मकसद देश में अवैध तरीके से रह रहे लोगों की पहचान करना है। वहीं, NPR में 6 महीने या उससे अधिक समय से रह रहे हर निवासी को अनिवार्य रूप से रजिस्ट्रेशन कराना होगा। कोई विदेशी भी अगर देश के किसी हिस्से में छह महीने से रह रहा है, तो उसे भी NPR में अपना विवरण दर्ज कराना होगा।

ममता बनर्जी को झटका: कलकत्ता हाईकोर्ट ने CAA-NRC संबंधी विज्ञापनों को हटाने के दिए निर्देश

‘वसुधैव कुटुम्बकम’ अच्छी चीज… लेकिन स्थानीय पहचान को समाप्त करके नहीं: NRC है देश व समय की माँग

क्या मुस्लिमों के ख़िलाफ़ है NRC? प्रपंचियों के फैलाए अफवाहों से बचने के लिए जानें सच्चाई

13 से 16 साल की बच्चियों से रेप, यौन शोषण व तस्करी: कॉन्स्टेबल अमजद, नदीम, साजिद सहित 16 गिरफ्तार

यूनाइटेड किंगडम में 35 वर्षीय पुलिस कॉन्स्टेबल अमजद दित्ता समेत 16 लोगों पर नाबालिग लड़कियों के साथ यौन शोषण और उनकी तस्करी करने का आरोप है। वेस्ट यॉर्कशायर पुलिस ने कहा कि आरोप 2006 और 2009 के बीच हैलिफ़ैक्स में तीन नाबालिग लड़कियों के खिलाफ यौन अपराधों से संबंधित हैं। पुलिस ने बताया कि पीड़ित नाबालिग लड़कियों की उम्र 13 से 16 वर्ष के बीच थी।

डेली मेल की रिपोर्ट के अनुसार अमजद दित्ता को अमजद हुसैन के नाम से भी जाना जाता है। अमजद एक पुलिस कॉन्स्टेबल है। उस पर 2009 में हैलिफ़ैक्स में काम करने के दौरान एक लड़की को गलत तरीके से छूने का आरोप है। एक प्रवक्ता ने बताया कि अमजद को फिलहाल ड्यूटी से निलंबित कर दिया गया है और अन्य 15 आरोपितों के साथ 6 जनवरी 2020 को ब्रैडफोर्ड मजिस्ट्रेट कोर्ट में पेश होने के लिए कहा है।

पुलिस ने कहा कि 2009 में जब उन्होंने यौन अपराध को अंजाम दिया था, उस समय वह एक सेवारत पुलिस अधिकारी था। अमजद के अलावा गिरफ्तार किए गए अन्य आरोपितों में वकास अब्बास, नदीम अदलात, साजिद अदालत, वसीम अदलात, क्रिस्टोफर ईस्टवुड, मेटाब इस्लाम, मोहम्मद रिजवान इकबाल, इश्तियाक लतीफ, असद महमूद, अरफ महमूद, अरफ मीर, यूनिस मोहम्मद उर्फ यूनिस खान, नदीम नासिर, शहज़ाद नवाज़, शाज़ाद नज़ीर, और सोहेल जाफ़र का नाम शामिल है।

30 साल के वकास अब्बास पर रेप के तीन मामले और क्लास सी ड्रग सप्लाई करने के तीन आरोप हैं। 34 वर्षीय नदीम अदलात पर बलात्कार के चार आरोप और क्लास सी ड्रग सप्लाय करने के चार आरोप हैं। 43 वर्षीय साजिद अदलात पर बलात्कार का आरोप है। 33 वर्षीय वसीम अदालत पर रेप के दो आरोप के साथ ही मानव तस्करी और क्लास सी ड्रग सप्लाय करने का आरोप है। इसके अलावा बाकी सब भी नाबालिगों के साथ बलात्कार, यौन शोषण और क्लास सी ड्रग सप्लाय करने के आरोपित हैं।

मेरठ में घुसने से पहले ही वापस लौटाए गए राहुल व प्रियंका, यूपी पुलिस से धक्का-मुक्की

राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी को उत्तर प्रदेश के मेरठ जाने से रोक दिया गया है। दोनों कॉन्ग्रेस नेता बिजनौर से मेरठ की तरफ आ रहे थे लेकिन पुलिस ने दोनों को परतापुर से ही वापस लौटा दिया। उन्हें मेरठ सीमा पर मोहिउद्दीनपुर में ही रोकने की तैयारी कर ली गई थी। इसके लिए खरखौदा वाले रोड पर पुलिस ने पूरी तरह से नाकाबंदी की थी। लेकिन, वहाँ पुलिस प्रियंका और राहुल को नहीं रोक पाई क्योंकि उनके सुरक्षाकर्मियों ने सीओ व अन्य पुलिसवालों को धक्का देकर किसी तरह गाड़ी आगे बढ़ा दिया। वहाँ मौजूद एक सीओ ने बताया कि एक पल के लिए उन्हें ऐसा लगा कि गाड़ी उन्हें टक्कर मार देगी।

दरअसल, राहुल और प्रियंका सीएए हिंसा में मारे गए मोहसिन के परिजनों से मिलने पहुँचे थे। पूरे उत्तर प्रदेश में सीएए के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन के नाम पर हिंसा और उपद्रव किया गया। दंगाइयों ने पुलिस से झड़प की, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया और क़ानून-व्यवस्था अपने हाथ में लिया। इस हिंसा में मारे गए लोगों का समर्थन करते हुए कॉन्ग्रेस ने योगी सरकार को इसके लिए जिम्मेदार बताया है। पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने कहा कि वो बुधवार (दिसंबर 25, 2019) को फिर से मेरठ जाएँगे।

मेरठ में सीएए को लेकर हुई हिंसा में मोहसिन, आसिफ, जहीर, आलिम और दिल्ली के आसिफ की मौत हो गई थी। इसमें 35 पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं, जिनका विभिन्न अस्पतालों में इलाज चल रहा है। इस मामले में अब तक 102 लोगों को गिरफ़्तार किया जा चुका है। पुलिस की ‘सोशल मीडिया लैब’ डिजिटल रूप से भड़काऊ पोस्ट्स व ट्वीट्स पर नज़र रख रही है। कई क्षेत्रों में ‘शांति कमिटियों’ का गठन कर के सामाजिक सौहार्द बरक़रार रखने का प्रयास जारी है। पुलिस ने कहा है कि बाकी आरोपितों की गिरफ़्तारी के लिए धर-पकड़ जारी है।

कॉन्ग्रेस नेता इमरान मसूद ने कहा कि राहुल व प्रियंका मृतक के परिजनों का दुःख बाँटने आए थे। दोनों नेताओं ने परिजनों से फोन पर भी बातचीत की। इलाक़े में बड़ी संख्या में कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता जमा हो गए थे, जिन्हें राहुल-प्रियंका के न पहुँचने से निराशा हुई।

‘कागज़ नहीं दिखाएँगे’ वाले वरुण के शो में बिना कागज़ दिखाए एंट्री नहीं, चाहिए वैध आईडी प्रूफ

कथित कॉमेडियन वरुण ग्रोवर ने नागरिकता संशोधन क़ानून का विरोध करने के लिए एनआरसी का मुद्दा उठाया और वाहवाही लूटने का प्रयास किया। जबकि सरकार बार-बार स्पष्ट कर चुकी है कि सीएए व एनआरसी का आपस में कोई सम्बन्ध नहीं है और देश भर में एनआरसी लागू करने के लिए कोई आधिकारिक चर्चा तक नहीं हुई है, वरुण ग्रोवर ने फिर भी इसका विरोध करना शुरू कर दिया। सीएए के विरोध के लिए उन्होंने ‘कागज़ नहीं दिखाएँगे’ नामक एक कविता भी लिखी, जिसे वामपंथियों का खुला समर्थन मिला। मोदीविरोधी गैंग ने इस कविता को सोशल मीडिया में वायरल करने में जान लगा दी।

हालाँकि, सरकार को कागज़ न दिखाने की बात करने वाले वरुण ग्रोवर के शो में जाने के लिए आपके पास वैध आईडी कार्ड होना चाहिए, वो भी सरकारी। अगर ऐसा नहीं है तो बाउंसर्स आपको धक्के देकर बाहर निकाल सकते हैं। वरुण ग्रोवर भले ही सरकार को कागज़ न दिखाने की बात करते हों और दूसरों को भी ऐसा ही सलाह देते हों लेकिन उनके शो में जाने वाले लोगों को कागज़ दिखाना ही पड़ेगा। सोशल मीडिया में लोगों ने वरुण ग्रोवर के इस दोहरे रवैये को आड़े हाथों लिया।

‘मसान’ और ‘सेक्रेड गेम्स’ की पटकथा लिखने वाले वरुण ग्रोवर ‘ऐसी तैसी डेमोक्रेसी’ के तत्वाधान में शो कर रहे हैं, जिसके लिए लोगों से कहा गया है कि वो वैलिड आईडी कार्ड लेकर ही आएँ। वहीं जो चीज पूरे देश में अभी न आई है और न ही इसका कोई ड्राफ्ट आया है, उसका विरोध वरुण इस तरह से करते हैं:

तानाशाह आके जाएँगे, हम कागज नहीं दिखाएँगे।
तुम आँसू गैस उछालोगे, तुम जहर की चाय उबालोगे
हम प्यार की शक्कर घोल के उसको, गट गट गट पी जाएँगे
हम कागज नहीं दिखाएँगे।

वरुण ग्रोवर को 2016 में ‘दम लगा के हइसा’ फ़िल्म के गाने ‘मोह मोह के धागे’ के लिए बेस्ट लिरिक्स का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। बता दें कि उस समय भी भाजपा की ही सरकार थी। वरुण ग्रोवर अक्सर मोदी सरकार पर तानाशाही का आरोप लगाते रहते हैं।

अंदर बच्चे अपनी डिग्रियों के लिए इंतजार करते रहे… बाहर रोक दिया राज्यपाल का रास्ता: पश्चिम बंगाल में हालत खराब

पश्चिम बंगाल के जाधवपुर विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में छात्रों को उनकी डिग्रियाँ देने पहुँचे राज्यपाल जगदीप धनकड़ के साथ लगातार दूसरे दिन बदसलूकी का मामले सामने आया है। जानकारी के मुताबिक विश्वविद्यालय के गेट नंबर 5 के बाहर तृणमूल के कुछ छात्र संगठनों ने उन्हें रोककर उनका रास्ता बंद कर दिया है। उन्हें काले झंडे दिखाए जा रहे हैं। साथ ही उनके ख़िलाफ नारेबाजी भी चालू है। बताया जा रहा है राज्यपाल पिछले एक घंटे से इस भीड़ में फँसे हुए हैं।

इस बीच उन्होंने ट्वीट किया और बताया कि वे जाधवपुर यूनिवर्सिटी में हैं, ताकि छात्रों को उनकी डिग्रियाँ दे सकें, लेकिन जहाँ से उन्हें जाना है, वहाँ का रास्ता जाम कर दिया गया है।

मीडिया से बातचीत में राज्य के राज्यपाल ने इस घटना को अपने लिए बतौर चांसलर एवं राज्यपाल होने के नाते एक दर्दनाक क्षण बताया। उन्होंने कहा, “अंदर बच्चे अपनी डिग्रियों के लिए इंतजार कर रहे हैं, लेकिन बाहर खड़े इन मुट्ठी भर लोगों ने मेरा रास्ता रोक दिया है। ये पूर्ण रूप से कानून का पतन है। आज राज्य सरकार ने शिक्षा को बंदी बना लिया है। यूनिवर्सिटी और राज्य प्रशासन कुछ नहीं कर रहा है। राज्य में पूरी तरीके से कानून व्यवस्था चरमरा गई है। यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि राज्य सरकार ने शिक्षा को अपने कब्जे में ले लिया है। वाइस चांसलर रिमोट कंट्रोल से चलाए जा रहे हैं।”

इसके अलावा राज्यपाल ने यूनिवर्सिटी के बाहर हालात देखकर अपने ट्विटर पर लिखा, “दर्दनाक हालत है क्योंकि जाधवपुर विश्वविद्यालय के कुलपति अपने दायित्वों के बारे में जान-बूझकर अनजान हैं। वह अपनी अनुपस्थिति का बहाना बना रहे हैं। वह कानून के शासन के पतन वाले कैंपस की अध्यक्षता कर रहे हैं। बर्बादी की स्थिति है।”

आगे वे लिखते हैं, “मुझे हैरानी है कि वाइस चांसलर निष्क्रिय मुद्रा में मूक दर्शक बनकर बैठे हुए हैं। हमारे सिस्टम के नाकाम होने की इस अप्रत्याशित घटना पर वह चुप्पी साधे हैं। यह काम उन ताकतों द्वारा किया गया है, जिन्हें हमारी शिक्षा व्यवस्था पर कम या लंबे समय तक होने वाले नुकसान का अनुमान नहीं है।”

गौरतलब है कि राज्यपाल के साथ यूनिवर्सिटी में लगातार दूसरे दिन बदसलूकी की घटना सामने आई है। कल भी जगदीप धनखड़ को इसी तरह का विरोध यूनिवर्सिटी के बाहर झेलना पड़ा जब वे दीक्षांत समारोह को लेकर बुलाई गई बैठक में शामिल होने के लिए पहुँचे थे। लेकिन कल भी जैसे ही वे विश्वविद्यालय पहुँचे थे, छात्रों ने उनकी गाड़ी रोक ली थी और उनकी गाड़ी के सामने विरोध प्रदर्शन करने लगे थे। इस दौरान गो बैक के नारे लगाए गए थे। साथ ही छात्रों ने उन्हें काले झंडे और पोस्टर्स भी दिखाए थे और ‘भाजपा कार्यकर्ता जगदीप धनखड़ वापस जाओ’ के नारे भी लगाए थे। इसके अलावा उन्हें धमकी भी दी गई थी कि धनखड़ अगर मंगलवार को वार्षिक दीक्षांत समारोह में आते हैं तो वे फिर उनका विरोध करेंगे।

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CAA पर बवाल में जख्मी तारिक AMU में पढ़ाएगा: जिस VC को छात्रों ने ‘निष्कासित’ किया था उसकी मुहर

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के विरोध के नाम पर हुई हिंसा के दौरान जख्मी हुए लोगों को पुरस्कृत करने का काम शुरू हो गया है। पहले दिल्ली के जामिया हिंसा के दौरान घायल मिन्हाज को आप विधायक अमानतुल्लाह ने 5 लाख रुपए देते हुए वक्फ बोर्ड में नौकरी देने का ऐलान किया था। अब अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) ने अपने यहॉं हुए बवाल में जख्मी छात्र मोहम्मद तारिक को एडहॉक पर असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्त किया है। उनकी नियुक्ति केमेस्ट्री डिपार्टमेंट में की गई है।

मीडिया रिपोर्टों में बताया गया है कि वाइस चांसलर तारिक मंसूर ने मानवीय आधार पर उनकी नियुक्ति को मंजूरी दी है। एएमयू के एक अधिकारी के हवाले से बताया गया है, “मानवीय आधार पर वीसी ने मोहम्मद तारिक को एडहॉक पर केमेस्ट्री डिपार्टमेंट में असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्त किया है। तारिक के पास पीएचडी की डिग्री है और उसने NET और JRF भी क्वालिफाई कर रखा है। जिस दिना हिंसा हुई थी तारिक के हाथ में गंभीर चोटें आई थी। इस बात को ध्यान में रखते हुए केमेस्ट्री फैकल्टी से सलाह-मशविरे के बाद उसकी नियुक्ति की गई है।”

बता दें कि जिस वाइस चांसलर तारिक मंसूर ने इस नियुक्ति को मंजूरी दी है उन्हें रविवार (22 दिसंबर) को अलीगढ़ में इंटरनेट सेवाओं की बहाली के तुरंत बाद, शिक्षकों, छात्रों और ग़ैर-शिक्षण कर्मचारियों ने निष्कासित कर दिया था। बाक़ायदा नोटिस जारी कर बताया गया था कि वाइस चांसलर प्रोफ़ेसर तारिक मंसूर और विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार एस अब्दुल हामिद को निष्कासित कर दिया गया है। जब तक दोनों इस्तीफा नहीं देंगे और कैंपस छोड़कर नहीं जाएँगे तब तक सभी लोग विश्वविद्यालय प्रशासन का बहिष्कार करेंगे।

छात्रों का आरोप था कि वाइस चांसलर तारिक मंसूर ने ही कैंपस में यूपी पुलिस को विरोध-प्रदर्शन के दौरान अंदर घुसने की अनुमति दी थी। ग़ौरतलब है कि नागरिकता संशोधन क़ानून के विरोध के नाम पर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में 15 दिसंबर 2019 को जमकर बवाल कटा था। छात्रों ने एडमिशन ब्लॉक के बाहर निकलकर पुलिस पर पथराव और हवाई फायरिंग की थी। इसके बाद स्थिति पर क़ाबू पाने के लिए पुलिस को लाठीचार्ज और आँसू गैस के गोले दागने पड़े थे।

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