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6 साल की मासूम से रेप और हत्या मामले में नाजिल को फाँसी की सज़ा, तेज़ाब डालकर जला दिया था शव

उत्तर प्रदेश के रामपुर ज़िले में 6 साल की एक मासूम से रेप के बाद हत्या के मामले में दोषी नाजिल को फाँसी की सजा सुनाई गई और साथ ही 20 हज़ार रुपए का ज़ुर्माना भी लगाया गया। पुलिस ने एक मुठभेड़ में रेप के दोषी नाजिल को गिरफ़्तार किया था। रामपुर के कोतवाली सिविल लाइन इलाक़े में घटित इस मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक कोर्ट में चल रही थी। रामपुर की दिल दहला देने वाली इस घटना में मासूम के साथ रेप कर हत्या करने के आरोपित को महज़ 6 महीने के अंदर फाँसी की सज़ा सुनाई गई है। मुठभेड़ के दौरान दोषी नाजिल को दोनों पैरों में गोली लगी थी, जिसके बाद उसे गिरफ़्तार कर लिया गया था।

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6 साल की बच्ची के रेप और हत्या मामले में नाजिल दोषी करार (तस्वीर सौजन्य: आजतक)

दरअसल, 7 मई 2019 को छ: साल की बच्ची अपने घर के बाहर खेलते-खेलते अचानक ग़ायब हो गई थी। इसके बाद बच्ची के परिजनों ने उसकी तलाश शुरू कर दी, उसके न मिलने पर उन्होंने बच्ची की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई। इसके बाद 22 जून 2019 को बच्ची की लाश बस्ती के पीछे एक आधे बने हुए मकान में मिली। 

ख़बर के अनुसार, सहायक ज़िला अधिवक्ता फौजदारी रामपुर कुमार सौरभ ने बताया कि इस मामले में रामपुर के निवासी नाजिल ने बच्ची का रेप करने के बाद उसकी हत्या कर दी थी। दोषी को विशेष न्यायाधीश पॉक्सो अधिनियम विनोद कुमार की अदालत ने फाँसी की सज़ा सुनाई। अदालत ने अपनी सुनवाई पूरी करते हुए नाजिल को 13 दिसंबर 2019 को दोषी करार दिया था। 

बता दें कि दोषी नाजिल बच्ची को बहला-फुसला कर सामान दिलाने के बहाने अपने साथ ले गया था और बच्ची का रेप किया। इसके बाद पकड़े जाने के डर से उसने बेरहमी से मासूम का गला दबाकर हत्या कर दी। बच्ची की मौत हो जाने के बाद नाजिल ने उसके शव पर तेजाब डालकर उसे जला दिया। शव इस कदर जल चुका था कि परिजनों ने मासूम बच्ची को उसके कपड़ों और चप्पलों से पहचाना था।   

जानकारी के अनुसार, 22 जून को बच्ची की लाश मिलने के बाद उसी दिन शाम को रामपुर में ही एनकाउंटर हुआ जिसमें आरोपित नाजिल को गोली लगी और पुलिस ने उसे गिरफ़्तार कर लिया। इस मामले में कुल नौ गवाहों की पेशी हुई, इनमें से आठ गवाह अभियोजन पक्ष ने पेश किए।

इससे पहले, 8 दिसंबर को राजस्थान में जयपुर के दूदू की अपर सेशन कोर्ट ने क़रीब आठ साल पहले छ: साल की बच्ची से रेप और फिर उसकी बेरहमी से गला घोंटकर हत्या करने के मामले में महेंद्र उर्फ़ धर्मेंद्र बैरवा को फाँसी की सज़ा सुनाई थी। साथ ही 8.20 लाख रुपए का ज़ुर्माना भी लगाया था।

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बेंगलुरु में 3 दिनों के लिए धारा-144 लागू, वामपंथी और मजहबी संगठनों के मंसूबे हुए नाकाम

कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में संशोधित नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ चल रहे विरोध प्रदर्शन को उग्र होने से रोकने के लिए पुलिस ने पहले से ही सारी तैयारी कर ली है। पूरे बेंगलुरु में 3 दिनों के लिए धारा-144 लागू कर दी गई है। अर्थात, कहीं भी भीड़ के रूप में इकट्ठे होकर प्रदर्शन करने पर पुलिस की कड़ी कार्रवाई का समाना करना पड़ सकता है। गुरुवार (दिसंबर 19, 2019) को सुबह 6 बजे से ही बेंगलुरु में धारा-144 लागू हो जाएगा, जो 3 दिनों तक यथावत रहेगा।

दरअसल, पुलिस ने ऐसा फ़ैसला इसीलिए लिया है क्योंकि ख़ुफ़िया सूत्रों से पता चला है कि इस विरोध प्रदर्शन का फायदा उठा कर कुछ असामाजिक तत्व हिंसा फैला सकते हैं। दिल्ली में हुए उपद्रव और दंगाइयों के तांडव के बाद बेंगलुरु पुलिस अतिरिक्त सतर्कता बरत रही है। कलबुर्गी पुलिस कमिश्नर नागराज ने बताया कि कई विभागों में नियुक्तियों के लिए परीक्षाएँ होनी हैं और उन्हें ध्यान में रखते हुए पुलिस सुरक्षा व्यवस्था में कोई चूक नहीं करेगी और किसी को भी क़ानून अपने हाथ में नहीं लेने देगी।

बेंगलुरु के शहरी और ग्रामीण, दोनों ही इलाक़ों में धारा-144 लागू रहेगा। बता दें कि गुरुवार को कई वामपंथी व मजहबी संगठनों ने बंद का आयोजन किया था। पुलिस को ख़ुफ़िया सूचना मिली है कि इस्लामिक संगठनों और वामपंथियों के विरोध प्रदर्शन की आड़ में कुछ देशविरोधी ताक़तें हिंसा पर उतर सकती हैं और दिल्ली की तर्ज पर बेंगलुरु में भी दंगा भड़काया जा सकता है। इसीलिए, पुलिस ने पहले से ही तैयार कर के धारा-144 लागू कर दी है। इसीलिए, अगले 3 दिनों तक कोई विरोध प्रदर्शन नहीं होगा।

गुलबर्गा में 20 ऐसे एक्टिविस्ट्स को पुलिस ने पहले ही अपने शिकंजे में ले लिया है, जो इस विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करने वाले थे। यहाँ तक कि ऑटो रिक्शा यूनियनों तक को भी इस बंद में शामिल कर लिया गया था।

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भारत-पाक सीमा पर कभी भी बिगड़ सकती है स्थिति, जनरल रावत ने कहा- सेना पूरी तरह तैयार

पाकिस्तान से आ रही परमाणु युद्ध की धमकियों के बीच भारतीय सेना प्रमुख ने बड़ा बयान दिया है। सेनाध्यक्ष जनरल विपिन रावत ने कहा कि सीमा पर स्थिति कभी भी बिगड़ सकती है। उन्होंने कहा कि हर प्रकार की स्थिति से निपटने के लिए भारतीय सेना को पूरी तरह तैयार रहना पड़ेगा। जनरल रावत ने कहा कि एलओसी पर विशेष सतर्कता रखने की ज़रूरत है क्योंकि पाकिस्तान कभी भी भड़काऊ हरकत कर सकता है। हालाँकि, उन्होंने यह भी बताया कि भारत की सेना ऐसी किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए एकदम तैयार है।

अगस्त में केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त कर दिया था, जिसके बाद जम्मू कश्मीर विशेष राज्य नहीं रहा और इसे मिले विशेषाधिकार भी नहीं रहे। साथ ही राज्य को पुनर्गठित कर दो केंद्र शासित प्रदेशों में बदल दिया गया। इसके बाद से ही बौखलाए पाकिस्तान ने सीजफायर उल्लंघन की घटनाओं में तेज़ी ला दी है। पाकिस्तानी फौज ने भारत को भड़काने के लिए आतंकियों की घुसपैठ चालू कर दी है। हालाँकि पाकिस्तान की लाख कोशिशों के बावजूद भारतीय सेना ने कई पाकिस्तानी बैट कमांडो को सीमा पर ही चित कर दिया है।

इन्हीं सारी घटनाओं के बीच जनरल रावत ने कहा है कि पाकिस्तान ऐसा देश है, जिसे नियंत्रित करने की ज़रूरत ही नहीं है। इसके पीछे कारण बताते हुए सेना प्रमुख ने कहा कि पाकिस्तान ख़ुद अपने ख़ात्मे की तरफ बढ़ रहा है। अगस्त से अक्टूबर तक पाकिस्तान ने सीमा पार से 950 बार सीजफायर उल्लंघन की वारदातों को अंजाम दिया है। केंद्रीय गृह राज्यमंत्री जी किशन रेड्डी ने संसद में इस बाबत जानकारी दी थी। वहीं सेनाध्यक्ष रावत ने कहा कि पाकिस्तान ख़ुद की हरकतों की वजह से लगातार अनियंत्रित होता जा रहा है।

जनरल रावत ने कहा कि भारतीय सेना के कुछ किए बिना ही पाकिस्तान ख़त्म होने की तरफ बढ़ रहा है। भारत सरकार ने हाल ही में सीएए लागू किया, जिसके तहत पाकिस्तान से आए प्रताड़ित अल्पसंख्यक शरणार्थियों को भारत की नागरिकता मिलेगी। वहाँ के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने इस क़दम का विरोध करते हुए कहा है कि इससे पूरे दक्षिण एशिया में स्थिति बिगड़ सकती है। साथ ही उन्होंने कहा कि भारत का ये ये क़दम क्षेत्र में परमाणु युद्ध की स्थिति उत्पन्न कर सकता है।

मेरा एक बाप ईसाई, दूसरा बाप मुस्लिम… तो मैं किस मजहब की?: दिया मिर्ज़ा के CAA विरोध का उड़ा मजाक

फ़िल्म अभिनेत्री दिया मिर्ज़ा ने सोशल मीडिया पर एक पजल टाइप का सवाल दागा है। यह सवाल कुछ उसी तरह का है कि गाय को 5 किलो चारा खिलाया गया तो मुर्गी अंडा कितने ग्राम का देगी? दरअसल, पूर्व मिस एशिया पैसिफिक दिया मिर्ज़ा ने संशोधित नागरिकता क़ानून का विरोध करते हुए इसी तरह का बेतुका सवाल दागा। इसके बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने आशंका जताई कि इसके पीछे दो कारण हो सकते हैं। पहला कारण ये हो सकता है कि उन्होंने नए क़ानून को पढ़ने की जहमत ही नहीं उठाई और दूसरा कारण ये हो सकता है कि उन्हें पढ़ कर भी कुछ समझ नहीं आया।

इसीलिए, ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की भारती जैन ने ‘रहना है तेरे दिल में’ से फिल्मों में डेब्यू करने वाली दिया मिर्ज़ा को उस आर्टिकल का लिंक दिया, जहाँ सीधे-सपाट शब्दों में सीएए के बारे में समझाया गया है। दिया मिर्ज़ा के ट्वीट को उन्हीं के शब्दों में हूबहू डिकोड करते हैं, ये देखिए:

  • मेरी माँ हिन्दू है।
  • मेरे बायोलॉजिकल पिता ईसाई थे।
  • मेरे दूसरे पिता (Adopted) मुस्लिम हैं।
  • मैंने किसी भी आधिकारिक डॉक्यूमेंट में अपने मजहब का नाम नहीं भरा है। मैं रिलिजन वाला कॉलम खाली छोड़ देती हूँ।
  • क्या धर्म ये निर्णय लेगा कि मैं भारतीय हूँ या नहीं? मैं आशा करती हूँ कि ऐसा नहीं होगा।

इस पजल को पढ़ने के बाद आपको ये पता लगाना है कि दिया मिर्ज़ा भारतीय हैं या नहीं। अब थोड़ी गंभीर बातें कर लें। दरअसल, सीएए से भारतीय नागरिकों का कोई लेना-देना नहीं है। इसका भारतीय नागरिकों के धर्म या मजहब से भी कोई वास्ता नहीं है। सीएए तो भारत के नागरिकों के लिए है ही नहीं। फिर उनसे दस्तावेज माँग कर नागरिकता साबित कराए जाने की बात कहाँ से आई? दरअसल, सीएए पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान के उन प्रताड़ित अल्पसंख्यकों के लिए है, जो वहाँ से भाग कर भारत आ गए और यहाँ पिछले 5 वर्षों से या इससे अधिक समय से रह रहे हैं।

बता दें कि दिया मिर्ज़ा के दो पिता इसीलिए हैं क्योंकि जब वो साढ़े 4 वर्ष की थीं, तभी उनके माता-पिता का तलाक हो गया था। इसके बाद उनकी माँ ने अहमद मिर्ज़ा से दूसरी शादी की थी। दिया मिर्ज़ा ने 2014 में साहिल संगा से शादी की थी लेकिन 5 सालों बाद वो भी अपने शौहर से अलग हो गईं। ऐसा नहीं है कि हम उनके व्यक्तिगत जीवन की बातें कर रहे हैं। उन्होंने ख़ुद सोशल मीडिया पर इसकी चर्चा की है। इस एक ट्वीट से पता चल जाता है कि जामिया के उपद्रवियों का समर्थन कर रहे इन सेलेब्रिटीज में सीएए को लेकर कितनी समझ है।

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आयशा रेना और लदीदा फरज़ाना को जामिया मिलिया इस्लामिया के आंदोलन का चेहरा बना कर पेश करने का प्रयास किया जा रहा है। इसमें न सिर्फ़ मीडिया और कुछ बड़े पत्रकार बल्कि, राजनेता और अकादमिक लोग भी शामिल हैं। हमने अपने एक लेख में इसका जिक्र किया था कि कैसे एक पूर्व-नियोजित साज़िश के तहत हिन्दुविरोधी और इस्लामी कट्टरपंथी विचार रखने वाली दोनों महिलाओं को अरब आंदोलन के नायिकाओं की तरह पेश किया जा रहा है। अब लदीदा के बारे में नया खुलासा हुआ है। लदीदा का जो नया फेसबुक पोस्ट सामने आया है, उसमें उन्होंने हिन्दुओं के नरसंहार का समर्थन किया है।

लदीदा ने जो फेसबुक पोस्ट डाला है, उसमें कई ऐसी बातें लिखी हुई हैं कि भारत के टिपिकल सेक्युलर लोग भी उस पर विश्वास नहीं कर पा रहे हैं। 14 दिसंबर को शेयर किए गए फेसबुक पोस्ट में लदीदा ने लिखा है:

“कल के आंदोलन के बाद कुछ लोग मेरे से कह रहे हैं कि हमें ‘इंशाअल्लाह’ और ‘अल्लाहु अकबर’ जैसे नारे नहीं लगाने चाहिए। मैं उन लोगों को बता दूँ कि हमने अपने आप को अपने अल्लाह के समक्ष समर्पित कर दिया है। हमने तुम लोगों के सेक्युलर नारों को कब का छोड़ दिया है। सुन लो, हमने जो नारे लगाए वो तुम्हें बार-बार सुनने को मिलेंगे। याद रखो, ये नारे हमारी सोच को दिखाते हैं, हमारी आत्मा हैं। ये नारे हमारे अस्तित्व को उभारते हैं। अरे, तुम अपनी सेक्युलर पहचान बनाने के लिए बेताब होंगे, हम नहीं हैं।”

लदीदा ने अपने फेसबुक पोस्ट में इस्लामी कट्टरपंथी उन्माद की नई मिसाल पेश की

दरअसल, इस फेसबुक पोस्ट में लदीदा इस्लाम से जुड़े मजहबी नारों का बचाव कर रही हैं और बाकी नारों को सेक्युलर बता कर उन्हें छोड़ने की बात कर रही हैं। इसी क्रम में वो आगे लिखती हैं:

“हम हर जगह, हर पल मालकम एक्स, अली मुस्लीयर और वरियंकुन्नथ के बेटे-बेटियों और पोते-पोतियों के रूप में उपस्थित रहेंगे। वो सभी नारे हमारी आत्मा हैं और हमने अपने पूर्वजों से ही सीखा है कि राजनीति कैसे की जाती है? तुम लोगों के लिए भले ही वो नारे बस नारे ही हो लेकिन हमारे लिए वो हमारी पहचान हैं, जो हमें औरों से अलग करती है। हम पर ऐसा कोई दबाव नहीं है कि हमें तुम्हारे सेक्युलर नारों का ही इस्तेमाल करना है। मैं स्पष्ट कर दूँ कि हम तुमसे बिलकुल अलग हैं, हमारे तौर-तरीके अलग हैं और हमारा आधार अलग है। इसीलिए, हमें सिखाने की कोशिश मत करो। हमारे बाप मत बनो।”

लदीदा के इस फेसबुक पोस्ट को पढ़ कर आप समझ ही गए होंगे कि ये महिला किस कदर इस्लामी कट्टरपंथ की मदांधता में डूबी हुई है। अब हम आपको इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात बताते हैं। लदीदा इस पोस्ट में ख़ुद को और ‘अपने’ लोगों को जिस अली मुस्लीयर की बेटी बताती हैं, वो केरल के मोपला दंगों का साज़िश करता है, जिसके हाथ हिन्दुओं के ख़ून से रंगे हुए हैं। अली मुस्लीयर, खिलाफत आंदोलन का वो भड़काऊ चेहरा है, जिसने देश के बँटवारे के लिए हिंसा की।

उन दंगों के कारण केरल से 1 लाख हिन्दुओं को भाग कर अपनी जान बचानी पड़ी थी। कॉन्ग्रेस पार्टी की अध्यक्ष रहीं एनी बेसेंट ने इस बारे में अपनी पुस्तक में एक घटना का जिक्र करते हुए लिखा है कि हिन्दुओं का बुरी तरह से कत्लेआम किया गया। जिन्होंने भी इस्लाम अपनाने से इनकार किया, उन्हें या तो मार डाला गया, या फिर उन्हें भाग कर जान बचानी पड़ी। इस घटना ने बेसेंट को इतना झकझोड़ दिया था कि उन्होंने इस्लामिक शासन का विरोध किया और कहा कि खिलाफत क्या होता है, ये इस घटना से पता चल जाता है।

बाबा साहब भीमराव आंबेडकर ने भी अपनी पुस्तक में इस घटना की चर्चा की है। उस वक़्त खिलाफत आंदोलन के नेताओं ने मोपला दंगे की प्रशंसा करते हुए इसे मजहब का एक अंग करार दिया था। लदीदा ने मुस्लीयर के दोस्त चक्कीपारामबम हाजी का भी नाम लिया है, जो ख़ुद को सुल्तान मानता था और जिसने मोपला के दंगों का नेतृत्व किया था। हिन्दुओं के नरसंहार में उसने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था।

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‘2002 के बाद कोई मुस्लिम नहीं कर सकता आप पर विश्वास’ – दिग्विजय सिंह ने फिर दिया भड़काऊ बयान

नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ जामिया में हुई हिंसा के बाद कई लोगों ने इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दी। लेकिन,कॉन्ग्रेस इसको आधार बनाकर सिर्फ़ भाजपा पर हमलावर रही और पार्टी के अलग-अलग नेताओं ने अपनी बयानबाजियों के जरिए लोगों में डर बसाने की कोशिश की। इसी बीच मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह ने एक बार फिर भड़काऊ बयान देकर आग में घी डालने का काम किया।

टाइम्स नाऊ की खबर के अनुसार उन्होंने जामिया हिंसा पर प्रतिक्रिया देते हुए मोदी सरकार पर सवाल उठाया और कहा कि कोई मुस्लिम नरेंद्र मोदी और अमित शाह पर 2002 के गुजरात दंगों के बाद यकीन नहीं कर सकता। उनके अनुसार 2002 के बाद से ही मुस्लिमों ने मोदी और शाह पर अपना विश्वास खो दिया।

गौरतलब है कि गाँधी परिवार के करीबी और कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह का ये बयान उस समय आया है जब मोदी सरकार लगातार लोगों से शांति कायम रखने की बातें कर रही है। दूसरी ओर कॉन्ग्रेस जिस ढंग की राजनीति इस मुद्दे पर कर रही है, उस पर खुद लोग ही आरोप लगा रहे हैं कि वो लोगों में डर फैलाने का काम कर रही है।

बता दें कि इससे पहले दिग्विजय सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ कई बार विवादित बयान दिए हैं। लेकिन इस बार मामला भड़के माहौल को शांत कराने का था। लेकिन यहाँ भी दिग्विजय सिंह ने अपनी राजनीति की रोटियाँ सेंकनी चाही और देश में शांति की अपील करने के बजाए ऐसे विवादित बयान दे डाले।

इससे पहले भी दिग्विजय सिंह ने नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में हो रहे प्रदर्शन पर अपनी प्रतिक्रिया दी थी और कहा था, “मोदी-शाह कहते हैं कि उन पर विश्वास करो। नोटबंदी में किया था क्या नतीजा निकला? अमित शाह हिंदुस्तान के मुसलमानों को कहते हैं कि उन पर विश्वास करो। यदि गोधरा कांड, सोहराबुद्दीन कांड, असम की एनआरसी सूची और उनके मुसलमानों के खिलाफ बयान देखें तो क्या वे बयान और मोदी शाह के कदम मुसलमानों में विश्वास पैदा करते हैं? बिलकुल नहीं। आप मुसलमानों के प्रति नफरत भरे बयान और कदम उठाना बंद करो तो मुसलमान अपने आप विश्वास करेगा।”

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‘मस्जिदों से ऐलान हुआ, पहले से पता था कि क्या करना है’ – दिल्ली में उपद्रव और दंगों के पीछे मुल्ला-मौलवी?

भाजपा के आईटी सेल के अध्यक्ष अमित मालवीय ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। उन्होंने एक वीडियो शेयर कर बताया है कि किस तरह संशोधित नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन के नाम पर मजहबी उन्माद फैलाने की साज़िश रची जा रही है। यहाँ तक कि मस्जिदों से घोषणा की गई ताकि उपद्रवी सड़क पर उतर कर हिंसा करें। मालवीय ने दिल्ली में हुई हिंसा को लेकर मस्जिदों से हुई भड़काऊ घोषणाओं को जिम्मेदार ठहराया है।

अमित मालवीय ने कहा कि इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान में वहाँ के अल्पसंख्यकों का क्या होता होगा। बता दें कि सीएए भी उन्हीं अल्पसंख्यकों के लिए है, जिन्हें पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान में प्रताड़ित किया गया और उस प्रताड़ना से तंग आकर वो पिछले 5 वर्षों या इससे अधिक समय से भारत में शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं। मालवीय ने मस्जिदों से भड़काऊ घोषणाओं का जिक्र करते हुए कहा कि ये सारी घटनाएँ बताती हैं कि सीएए ज़रूरी है।

अमित मालवीय ने ‘इंडिया टुडे’ के एक वीडियो को शेयर किया, जिसमें लोग बता रहे हैं कि वो क्यों सड़कों पर उतरे। नीचे संलग्न किए गए ट्वीट में आप मालवीय का बयान और उनके द्वारा शेयर किए गए वीडियो को देख सकते हैं:

दिल्ली में हिंसा के दौरान दंगाइयों ने पुलिस पर पत्थरबाजी भी की, जैसा जम्मू कश्मीर में वर्षों से होता आ रहा है। जम्मू कश्मीर में भी कश्मीरी पंडितों को निकाले जाने के बाद से लेकर अब तक, कई बार विभिन्न मस्जिदों से भड़काऊ ऐलान होने की ख़बरें आती रहती हैं। ‘इंडिया टुडे’ से बातचीत में दिल्ली एक एक उपद्रवी ने कहा:

“हमारे क्षेत्र में कई दिनों से अनाउंसमेंट हो रही थी कि कि मंगलवार को इतने बजे एनआरसी और सीएए के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन होगा। कई लोगों को पहले से ही पता था और जिन्हें नहीं पता था, उन्होंने मस्जिदों से अनाउंस कर के कहा गया कि आप सड़क पर उतरो।”

उक्त उपद्रवी की बातों से साफ़ हो जाता है कि मस्जिदों से ऐलान कर लोगों को सड़क पर उतरने को कहा गया। इसके बाद हिंसा भड़की और पुलिस व दंगाइयों के बीच झड़प हुई। पत्थरबाजी में कई पुलिसकर्मी घायल भी हुए।

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केरल में SFI के गुंडों ने ABVP कार्यकर्ता पर किया हमला: 30 सेकंड के Video में कैद हुआ सब कुछ

केरल के त्रिशूर से SFI की गुंडागर्दी का एक वीडियो सामने आया है। वीडियो में देखा जा सकता है कि
SFI के गुंडे ABVP के कार्यकर्ता को बुरी तरह पीट रहे हैं। बताया जा रहा है कि ABVP कार्यकर्ताओं ने श्री केरला वर्मा कॉलेज में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में चल रहे प्रोपेगेंडा को ध्वस्त करने के लिए एक कार्यक्रम आयोजित किया था। इस कार्यक्रम से बौखलाए वामपंथी गुंडों ने इसके बाद इस घटना को अंजाम दिया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कॉलेज में एबीवीपी के छात्रों द्वारा आयोजित सेमिनार के दौरान पहले एसएफआई के गुंडों ने उन्हें (ABVP के कार्यकर्ताओं को) उनकी क्लास से खींचकर बाहर निकाला और बाद में उनकी पिटाई की। इस बीच शिक्षकों के एक समूह ने बीच-बचाव करके किसी तरह छात्रों की जान बचाई। पूरे वाकये में अक्षय, अरोमल और राहुल नाम के तीन छात्र घायल हुए हैं। जिन्हें नजदीक के अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

जानकारी के अनुसार नागरिकता कानून के प्रति जागरुकता फैलाने के लिए एबीवीपी ने एक कार्यक्रम का आयोजन किया था। लेकिन एसएफआई इसके विरोध में था और उसने कार्यक्रम का आयोजन करने पर ABVP को धमकाया भी था कि वे इन सबसे दूर रहे। हालाँकि, जब इस धमकी के बाद भी कार्यक्रम आयोजित हुआ तो एसएफआई वालों ने कैंपस सेमिनार के मुख्य अतिथि टीआर रमेश को ही नहीं आने दिया, लेकिन पुलिस के हस्तक्षेप के बाद एसएफआई के कार्यकर्ताओं को कॉलेज परिसर से हटा दिया गया।

दोनों समूहों के बीच इसी गहमागहमी में में धीरे-धीरे टकराव बढ़ गया और फिर हिंसक झड़प का वीडियो सामने आया। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो को एबीवीपी ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से शेयर किया है। उनका दावा है कि वे केवल नागरिकता संशोधन कानून को लेकर फैली अफवाहों को दूर करने और स्टूडेंट्स को इसके बारे में समझाने गए थे, लेकिन एसएफआइ के गुंडों ने उनके साथ मारपीट की।

यहाँ आकर ‘आज़ादी’ ले सकते हैं वामपंथी: CAA के समर्थन में DU के छात्रों का नारा- कसाब को दे दी आज़ादी

11 पॉइंट्स में समझिए सच्चाई: CAA के ख़िलाफ़ हिंसा भड़काने के लिए फैलाए जा रहे ये सारे झूठ

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बंगाल में कैलाश विजयवर्गीय को मजहबी भीड़ ने घेर रखा है, देखिए Video

यहाँ आकर ‘आज़ादी’ ले सकते हैं वामपंथी: CAA के समर्थन में DU के छात्रों का नारा- कसाब को दे दी आज़ादी

आजकल ‘आज़ादी’ के नारे ख़ूब चर्चा में हैं। जेएनयू में 2016 में लगे देशविरोधी नारों के बाद से ही इन स्लोगन्स को एक तरह से सरकार के विरोध की पहचान बना ली गई। “भारत तेरे टुकड़े होंगे होंगे” और “कश्मीर माँगे, आज़ादी” जैसे विभाजनकारी और भड़काऊ नारों के बाद आज़ादी के स्लोगन्स का ख़ूब इस्तेमाल किया गया। बाद में असली इरादे को छिपाने के लिए “आतंकवाद से, आज़ादी”, “सामंतवाद से, आज़ादी” और “जातिवाद से, आज़ादी” जैसे नारे लगाए गए। हाल ही में जामिया व अन्य यूनिवर्सिटीज में भी जब सीएए के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन हुआ, तब भी ‘आज़ादी’ के नारे लगाए गए।

अब हम आपको ‘आज़ादी’ के नारे का दूसरा पक्ष भी दिखा रहे हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों का कहना है कि जिसे भी आज़ादी चाहिए, वह आकर ले जा सकता है। उन्होंने ‘आज़ादी’ की चाह रखने वाले वामपंथियों को चुनौती दी है कि जिसे भी आज़ादी चाहिए, वो आकर ले जाएँ। उनके नारों पर एक नज़र डालिए:

“हम लाकर देंगे- आज़ादी”
“अरे ये पड़ी है- आज़ादी”
“आओ ले लो- आज़ादी”
“अरे दे के रहेंगे- आज़ादी”
“तुम्हें भी देंगे- आज़ादी”
कसाब को दे दी- आज़ादी”
“बुरहान को दे दी- आज़ादी”
“अफजल को दे दी- आज़ादी”

नीचे संलग्न किए गए वीडियो में आप देश सकते हैं कि कैसे संशोधित नागरिकता क़ानून का समर्थन कर रहे छात्र वामपंथियों को आज़ादी देने के नारे लगा रहे हैं:

छात्रों को उम्मीद है कि जो वामपंथी दिन-रात ‘आज़ादी’ के नारे लगाते हैं और ‘आज़ादी’ की माँग कर रहे हैं, वो ‘आज़ादी’ उन्हें मुफ्त में मिल रही है तो वो ज़रूर आकर ले जाएँगे। ऑपइंडिया को मिली ताज़ा सूचना के अनुसार, अभी तक एक भी वामपंथी ‘आज़ादी’ लेने नहीं पहुँचा था।

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11 पॉइंट्स में समझिए सच्चाई: CAA के ख़िलाफ़ हिंसा भड़काने के लिए फैलाए जा रहे ये सारे झूठ

उत्तर-पूर्वी राज्यों में हिंसा हो रही है। सीएए और एनआरसी के नाम पर लोगों को भड़काया जा रहा है। जिस क़ानून से पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफ़ग़ानिस्तान से भाग कर भारत आए प्रताड़ित शरणार्थियों को नागरिकता मिलने जा रही है, उसे लेकर अनेकों-अनेक भ्रम फैलाए जा रहे हैं। यहाँ हम 11 पॉइंट्स में उन सभी सवालों के जवाब देंगे, जिनका इस्तेमाल कर के पूर्वोत्तर में हिंसा भड़काई जा रही है। झूठ क्या है और क्या है सच, इसके बीच की महीन रेखा को हम आपके समक्ष लेकर आए हैं, ताकि आपके सामने अगर कोई झूठ फैलाए तो आप सच के हथियार से उसे जवाब दे सकें।

1.) झूठ: नागरिकता संशोधन क़ानून (CAA) असम एकॉर्ड का उल्लंघन करता है।

सच: सीएए में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे असम एकॉर्ड का उल्लंघन होता हो। इसमें मार्च 24, 1971 की जो कट-ऑफ तारीख दी गई है, वो भी असम एकॉर्ड के अनुरूप ही है। कुछ भी ऐसा नहीं है, जो इस समझौते में लिखी बातों के विपरीत हो।

2.) झूठ: बंगाली हिन्दू असम के लिए बोझ बन जाएँगे।

सच: सीएए पूरे देश में लागू होता है। तीनों पड़ोसी इस्लामिक देशों से प्रताड़ित अल्पसंख्यक जो भारत में शरणार्थी बने हुए हैं, उन्हें केवल असम में ही नहीं बसाया जा रहा है। वो लोग भारत के विभिन्न हिस्सों में रह रहे हैं। लेकिन, झूठ फैलाया जा रहा है कि उन्हें केवल असम में ही बसाया जाएगा।

3.) झूठ: सीएए से उन डेढ़ लाख बंगाली हिन्दुओं को भारतीय नागरिकता मिल जाएगी, जो असम में रह रहे हैं।

किसी भी विदेशी नागरिक को इस क़ानून से अपने-आप नागरिकता नहीं मिल जाएगी, चाहे वो किसी भी धर्म का हो। अधिकारीगण इस बात की पूरी पड़ताल करेंगे कि नियमों के तहत उक्त व्यक्ति को नागरिकता दी जाए या नहीं, इसके बाद ही फ़ैसला लिया जाएगा।

4.) झूठ: इससे असम के अल्पसंख्यकों के हितों को नुकसान होगा।

सीएए तो विदेशी अल्पसंख्यकों (पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश) के लिए है। फिर भारतीय अल्पसंख्यकों पर इसका दुष्प्रभाव पड़ने की बात कहाँ से आ गई? इस पर और स्पष्ट होने के लिए गृह मंत्री अमित शाह का संसद में दिया गया भाषण सुनें।

5.) झूठ: इससे पूर्वोत्तर में बांग्लाभाषियों की संख्या अचानक से बढ़ जाएगी।

असम के बराक वैली में पहले से ही बंगालियों की बड़ी तादाद है, जहाँ बंगाल को दूसरी आधिकारिक भाषा की मान्यता भी दी गई है। ब्रह्मपुत्र की घाटी में रह रहे बंगाली तो असम के अनुरूप ढल गए हैं और वो असमिया बोलते हैं। ऐसा आज से नहीं, वर्षों से हो रहा।

6.) झूठ: ‘इनर लाइन परमिट (ILP)’ के तहत आने वाले क्षेत्रों पर इसका दुष्प्रभाव पड़ेगा।

आईएलपी के तहत कुछ दिनों पहले तक तीन राज्य आते थे- अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और नागालैंड। भारत सरकार ने हाल ही में मणिपुर की चिंताओं को देखते हुए उसे आईएलपी वाले चौथे राज्य की मान्यता प्रदान की। सबसे बड़ी बात कि सीएए के तहत आईएलपी में आने वाले क्षेत्रों को बाहर रखा गया है।

7.) झूठ: सीएए के लागू होने के बाद नागरिकता पाने की लालच में बड़ी संख्या में बांग्लादेशी हिन्दू पूर्वोत्तर में आ जाएँगे।

बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ प्रताड़ना की घटनाओं में भारी कमी आई है। अब ऐसी कोई सम्भावना दिखती नहीं कि हज़ारों-लाखों की संख्या में बांग्लादेश से भारत की तरफ हिन्दुओं का एकमुश्त पलायन हो। और हाँ, सीएए के तहत दिसंबर 31, 2014 का कट-ऑफ डेट भी तो तय किया गया है। उसके बाद आने वाले लोग इस क़ानून के तहत लाभ के अधिकारी नहीं होंगे।

8.) झूठ: सीएए घुसपैठियों को बढ़ावा दे रहा है।

सबसे पहले तो घुसपैठियों और शरणार्थियों के बीच अंतर होता है, ये जान लेना चाहिए। सीएए तो संवैधानिक तरीके से उन्हें अधिकार दे रहा है, जिन्हें पिछले 70 सालों से हर प्रकार के लाभ से वंचित रखा गया और जिन्होंने भारी प्रताड़ना झेली। ये क़ानून वैध शरणार्थियों के लिए है, अवैध घुसपैठियों के लिए नहीं।

9.) झूठ: ये असम के मूल बाशिंदों के ख़िलाफ़ है।

असम के मूल बाशिंदों के हितों की रक्षा के लिए ही तो एनआरसी लाया गया है। सीएए तो पूरे देश के लिए है।

10.) झूठ: सीएए नॉर्थ-ईस्ट के ट्राइबल एरियाज में भी लागू होगा।

असम, मेघालय, मिजोरम और त्रिपुरा के ट्राइबल क्षेत्रों में तो सीएए लागू होगा ही नहीं। पूर्वोत्तर के हितों का पूरा ध्यान रखा गया है। संविधान की छठी अनुसूची का ध्यान रखते हुए इसे तैयार किया गया है।

11.) झूठ: ये आर्टिकल 370 का उल्लंघन करेगा (इसके तहत पूर्वोत्तर के राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा मिला हुआ है।)

सरकार ने बार-बार कहा है कि नॉर्थ-ईस्ट की सांस्कृतिक और भौगोलिक पहचान को अक्षुण्ण रखा जाएगा। साथ ही अनुच्छेद 371 को हटाने की बातें भी फ़र्ज़ी है।

असम में हिंसा भड़काए जाने के पीछे कई आतंकी संगठनों के नाम भी सामने आ रहे हैं। पूर्वोत्तर में भाजपा के लगातार बढ़ते प्रभाव के कारण चिंता में डूबी ताक़तें साज़िश रच रही हैं। जैसे जामिया सहित अन्य विश्वविद्यालयों में छात्रों को भड़काया जा रहा है, उसी तरह नॉर्थ-ईस्ट में लोगों को सड़क पर उतरने को कहा जा रहा है। पश्चिम बंगाल में अलग तरीके से हिंसा भड़काई जा रही है। अर्थात, अलग-अलग इलाक़ों में विरोध के लिए अलग-अलग बहाने खोजे जा रहे हैं।

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