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1984 सिख दंगों के लिए नरसिम्हा राव दोषी! ‘सुप्रीम परिवार’ के लिए मनमोहन सिंह ने चल दी कॉन्ग्रेसी चाल

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 1984 के सिख दंगा को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि अगर उस समय के गृह मंत्री नरसिम्हा राव ने इंद्र कुमार गुजराल की सलाह मान ली होती, तो 1984 के सिख दंगे को टाला जा सकता था। यह बात उन्होंने बुधवार (4 दिसंबर) को पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल की 100वीं जयंती पर आयोजित कार्यक्रम में बोलते हुए कही। इस कार्यक्रम में पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, केंद्रीय मंत्री जयशंकर प्रसाद और पूर्व केंद्रीय मंत्री कर्ण सिंह भी मौजूद थे।

पूर्व पीएम सिंह ने कार्यक्रम के दौरान कहा, “दिल्ली में जब 84 के सिख दंगे हो रहे थे, गुजराल जी उस समय के गृह मंत्री नरसिम्हा राव के पास गए थे। उन्होंने राव से कहा कि स्थिति इतनी गंभीर है कि सरकार के लिए जल्द से जल्द सेना को बुलाना आवश्यक है। अगर राव गुजराल की सलाह मानकर जरूरी कार्रवाई करते तो शायद 1984 के नरसंहार से बचा जा सकता था।”

पूर्व पीएम मनमोहन सिंह के इस बयान पर दिवंगत नरसिम्हा राव के पोते एनवी सुभाष ने कहा, “परिवार के एक सदस्य के रूप में, मैं डॉ मनमोहन सिंह के इस बयान से आहत महसूस कर रहा हूँ, यह अस्वीकार्य है। क्या कोई गृह मंत्री कैबिनेट की मंज़ूरी के बिना स्वतंत्र निर्णय ले सकता है? अगर वहाँ सेना को बुला लिया गया होता, तो अनर्थ हो जाता।”

स्वर्गीय इंद्र कुमार गुजराल 21 अप्रैल 1997 से 19 मार्च 1998 तक देश के 12वें प्रधानमंत्री थे। उनका निधन 92 वर्ष की उम्र में 30 नवंबर 2012 को हुआ था।

पूर्व पीएम मनमोहन सिंह ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि इंद्र कुमार गुजराल ने 1984 के सिख दंगा को रोकने के लिए सेना को तैनात करने की सलाह दी थी, लेकिन तत्कालीन गृहमंत्री नरसिम्हा राव ने उनकी इस सलाह पर ग़ौर नहीं किया। गुजराल ने सिख दंगा भड़कने की रात को गृह मंत्री नरसिम्हा राव से मुलाक़ात भी की थी।

इससे पहले, जस्टिस ढींगरा की अध्यक्षता वाली SIT ने 1984 के सिख विरोधी दंगे मामले में बंद किए गए 186 मामलों को लेकर जाँच कोर्ट को सौंप दी है। कोर्ट ने SIT के दूसरे सदस्य अभिषेक भुल्लर को वापस CBI में जाने की अनुमति दे दी। अब शीर्ष अदालत इस रिपोर्ट पर ग़ौर करेगी और तय करेगी कि रिपोर्ट की कॉपी याचिकाकर्ता को सौंपी जा सकती है कि नहीं। इस मामले की सुनवाई अगले दो हफ़्ते के बाद की जाएगी।

दरअसल, 1984 के सिख विरोधी दंगे पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद दिल्ली से शुरू हुए थे। 31 अक्टूबर 1984 को उनकी सुरक्षा में तैनात दो सिख गार्ड्स ने उनकी हत्या कर दी थी। दिल्ली से शुरू हुए सिख विरोधी दंगे देश के कई हिस्सों में फैल गए थे। इस दौरान केवल दिल्ली में 2,733 लोगों की जान चली गई थी।

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शिवसेना के 400 कार्यकर्ता BJP में शामिल, कहा – ‘भ्रष्ट और हिन्दू-विरोधी दलों संग मिलकर बनाई सरकार’

मुंबई के धारावी में बुधवार (4 दिसंबर) को आयोजित एक कार्यक्रम में लगभग 400 शिवसेना कार्यकर्ता बीजेपी में शामिल हो गए। यह शिवसेना के लिए एक बड़ा झटका है। बता दें कि बीते दिनों महाराष्ट्र की राजनीति में भारी उथल-पुथल के बीच पहले शिवसेना और बीजेपी का गठबंधन टूट गया था जिसके बाद राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP), कॉन्ग्रेस और शिवसेना के गठबंधन की सरकार में शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाया गया।

ख़बर के अनुसार, बीजेपी में शामिल हुए शिवसेना के कार्यकर्ताओं को इस बात का दु:ख है कि शिवसेना ने भ्रष्ट और विरोधी दलों से हाथ मिलाकर सरकार बनाई है। इस वजह से वो ख़ासे नाराज थे, इसलिए उन्होंने शिवसेना को छोड़कर बीजेपी में शामिल होने का मन बनाया। 

बीजेपी में शामिल हुए शिवसेना के एक कार्यकर्ता रमेश नाडार के अनुसार, 400 कार्यकर्ता बीजेपी में शामिल हुए हैं। वो ख़ुद को ठगा सा महसूस कर रहे थे क्योंकि शिवसेना ने भ्रष्ट और हिन्दू-विरोधी दलों से हाथ मिलाकर सरकार बनाई है। इसके आगे उन्होंने बताया कि अभी कई और भी कार्यकर्ता हैं जो शिवसेना के इस क़दम से नाराज़ हैं। उनका कहना है कि वो पिछले सात वर्षों से NCP और कॉन्ग्रेस के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे। इतना ही नहीं उन्होंने चुनाव के दौरान लोगों के घरों तक जा-जाकर वोट माँगे थे। लेकिन, अब वो उन मतदाताओं से नज़रें नहीं मिला पा रहे हैं, जिनसे उन्होंने ईमानदार सरकार बनाने के लिए वोट माँगे थे। 

इससे पहले रमेश सोलंकी ने पार्टी के विचारधारा से भटक जाने के कारण का हवाला देते हुए पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया था। तब उन्होंने कहा था, “21 साल तक बिना पद, प्रतिष्ठा या टिकट की माँग के मैं रात-दिन पार्टी के आदेश का पालन करता रहा, लेकिन जब शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने एनसीपी और कॉन्ग्रेस से हाथ मिला लिया है तो कॉन्ग्रेस का सहयोग करने की इजाज़त उनका ज़मीर नहीं दे रहा है। चूँकि वे आधे-अधूरे मन से कोई काम नहीं करना चाहते, इसलिए वे इस्तीफ़ा दे रहे हैं।”

महाराष्ट्र विधानसभा में रविवार (1 दिसंबर) को मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे कहा था कि उन्होंने अपने पूर्ववर्ती देवेंद्र फडणवीस से बहुत कुछ सीखा है और वे हमेशा उनके दोस्त रहेंगे। साथ ही उन्होंने कहा था, “मैं आपको विपक्ष को नेता नहीं कहूँगा, बल्कि एक पार्टी का बड़ा ज़िम्मेदार नेता कहूँगा।”

राज्य विधानसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, “मैं अभी भी ‘हिन्दुत्व’ की विचारधारा के साथ हूँ और इसे कभी नहीं छोड़ूँगा। पिछले पाँच वर्षों में, मैंने कभी सरकार के साथ विश्वासघात नहीं किया है।”

इसके आगे उन्होंने कहा था, “मैं एक भाग्यशाली मुख्यमंत्री हूँ क्योंकि जिन्होंने मेरा विरोध किया वे अब मेरे साथ हैं। और जो मेरे साथ थे, वे अब विपरीत दिशा में बैठे हैं। मैं यहाँ अपनी क़िस्मत और लोगों के आशीर्वाद के साथ आया हूँ। मैंने कभी किसी को नहीं बताया कि मैं यहाँ आऊँगा, लेकिन मैं आ गया।”

ग़ौरतलब है कि चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद महाराष्ट्र में बीजेपी-शिवसेना के बीच मुख्यमंत्री की सीट को लेकर काफ़ी लंबा विवाद चला। 23 नवंबर को देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री और NCP के अजित पवार ने उप मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर सभी को चौंका दिया था। लेकिन, बिगड़ते राजनीतिक समीकरणों के चलते राज्य में बीजेपी की सरकार नहीं बन पाई और 28 नवंबर को शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली।

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राणा अयूब ने विदेशी पत्रकार को J&K में अवैध रूप से घुसाया, भारत-विरोधी प्रचार किया: देश के साथ गद्दारी!

हमेशा विवादों में रहने वाली पत्रकार राणा अयूब के बारे में पता चला है कि उन्होंने जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 को हटाए जाने के बाद एक विदेशी पत्रकार को घाटी की स्थिति पर रिपोर्टिंग करने के लिए अवैध तरीके से प्रवेश कराने में मदद की। द न्यू यॉर्कर के पत्रकार डेक्स्टर फिकिंस (Dexter Filkins) ने खुद इस बात का खुलासा किया है। उन्होंने अपने नवीनतम लेख में इस बात को स्वीकारा है कि उन्हें अयूब द्वारा अवैध रूप से कश्मीर में चोरी-छिपे तरीके से प्रवेश कराया गया था।


द न्यू यॉर्कर के लेख का स्क्रीनशॉट जिसमें डेक्स्टर ने दावा किया कि कैसे राणा अयूब ने उन्हें श्रीनगर हवाई अड्डे पर कश्मीर में प्रवेश कराया

डेक्स्टर लिखते हैं कि उन्हें राणा अयूब द्वारा मुंबई बुलाया गया था। यहाँ अयूब ने उनसे कश्मीर में विदेशी संवाददाताओं पर प्रतिबंध के बावजूद भारत सरकार के आदेश की अवहेलना कर घाटी की रिपोर्टिंग के लिए कहा। उन्होंने इस बात का उल्लेख किया कि राणा अयूब ने उन्हें श्रीनगर एयरपोर्ट पर एक जोड़ी स्कार्फ़ दिए और उनसे कहा कि वह एक कुर्ता (एकदम भारतीय पहचान) ख़रीदे, जिससे वो भारतीय लगें। डेक्स्टर ने राणा अयूब का संदर्भ देते हुए अपने लेख में लिखा कि उन्हें 99 प्रतिशत विश्वास था कि वो पकड़े जाएँगे, इसके बावजूद राणा अयूब ने उन्हें अपना मुँह बंद रखने के लिए कहा कि शायद 1 प्रतिशत उम्मीद में देश के खिलाफ जहर उगलने का काम बन जाए।

इसके आगे डेक्स्टर ने लेख में लिखा कि जब वो श्रीनगर हवाई अड्डे पर उतरे, तो राणा अयुब ने उन्हें ‘विदेशियों के लिए पंजीकरण’ डेस्क पर जाने से रोक दिया। हवाई अड्डे पर पुलिसकर्मियों और हंगामा का लाभ उठाते हुए, वे दोनों बिना किसी रोक-टोक के और बिना पंजीकरण करवाए आराम से बाहर निकल गए।

राणा और डेक्स्टर के इस कृत्य ने भारत सरकार द्वारा अनिवार्य क़ानूनों का स्पष्ट तौर पर उल्लंघन किया। विदेशी आदेश 1958 के अनुसार, विदेशी नागरिकों, पर्यटकों के साथ-साथ पत्रकारों को भी “प्रतिबंधित क्षेत्रों” या “संरक्षित क्षेत्रों” में प्रवेश करने के लिए पूर्व सरकार की अनुमति की आवश्यकता होती है। इन क्षेत्रों में मणिपुर, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, सिक्किम और हिमाचल प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, राजस्थान और उत्तराखंड के कुछ हिस्से शामिल हैं। विदेश मंत्रालय के अनुसार, प्रतिबंधित या संरक्षित क्षेत्रों की यात्रा करने के इच्छुक विदेशी पत्रकारों को अनुमति के लिए सादे प्रारूप पर गृह मंत्रालय (MHA) और निर्धारित प्रारूप में XP डिवीजन में एक साथ आवेदन करना होता है। यह अनुमति XP डिवीजन के परामर्श से MHA द्वारा दी जाती है।

डेक्स्टर, जैसा कि उनके बयान से स्पष्ट है, उन्होंने परमिट के लिए आवेदन नहीं किया था और अवैध रूप से कश्मीर में प्रवेश करने के लिए वो राणा अयूब पर निर्भर थे।

ख़बर के अनुसार, अनुच्छेद-370 को हटाए जाने के मद्देनज़र, अपने एजेंडे के साथ पत्रकारों द्वारा फैलाई गई ग़लत सूचना से निपटने के लिए एक एहतियाती उपाय के रूप में, भारत सरकार ने उन विदेशी पत्रकारों के प्रवेश की सुविधा के लिए श्रीनगर हवाई अड्डे पर डेस्क की स्थापना की थी। वहाँ से अनुमति मिलने के बाद ही कश्मीर में प्रवेश करना था। लेकिन, डेक्स्टर के पास अपेक्षित अनुमति नहीं होने के कारण, राणा ने हवाई अड्डे के टर्मिनल पर उन्हें अपनी बातों में उलझाया और उन्हें कश्मीर में अवैध तरीके से प्रवेश कराया। इससे साफ़ पता चलता है कि राणा अयूब ने अवैध रूप से एक विदेशी पत्रकार को कश्मीर में घुसने में मदद की।

डेक्स्टर ने राणा अयूब को समर्पित एक चापलूसीपूर्ण लेख लिखकर पत्रकारिता क्षेत्र में अपने कुटिल रिश्ते को उजागर किया है। इस लेख के माध्यम से, उन्होंने राणा आयूब के झूठे तथ्यों को सही करार देने की कोशिश की है। उन्होंने राणा अयूब की विवादास्पद पुस्तक ‘गुजरात फाइल्स’ के लिए उनकी ख़ूब प्रशंसा भी की। जबकि इस   पुस्तक को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अनुमान के आधार पर लिखी पुस्तक के रूप में सन्दर्भित कर बकवास करार दिया था।

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‘वो छटपटा रही थी, मैं रेप कर रहा था, मरने के बाद भी… फिर बेटी के साथ भी’ – नसीरुद्दीन का कबूलनामा

आख़िर एक बलात्कारी के दिमाग में कब क्या चल रहा होता है, ये प्रश्न आम जनता, पुलिस और न्यायाधीशों के मन को भी हमेशा कचोटता रहा है। उत्तर प्रदेश में बलात्कार और ट्रिपल मर्डर केस के एक आरोपित ने अपना ग़ुनाह क़बूल करते हुए बताया कि उसने कैसे पहले महिला का बलात्कार किया और फिर उसकी 10 साल की बेटी का भी बलात्कार किया। इसके अलावा उसने ये भी बताया कि कितनी बेरहमी से उसने महिला के दुधमुँहे बच्चे को भी मौत के घाट उतार दिया।

यह घटना पिछले हफ़्ते आजमगढ़ में हुई थी। आरोपित नसीरुद्दीन को सोमवार को गिरफ़्तार किया गया था। पुलिस द्वारा उसकी पूछताछ का वीडियो सामने आया है जिसमें वह बताता है कि उसने बलात्कार और हत्या की ख़ौफ़नाक वारदात को अंजाम देने की योजना किस तरह से बनाई थी।

अपने ज़ुर्म को क़बूल करते हुए आरोपित ने बताया कि उसने कुछ हफ्ते पहले ही इस घटना को अंजाम देने की योजना बनाई थी। उसने पारिवारिक स्थिति का अनुमान लगा लिया था, जिसमें उसे पता लग गया था कि महिला के घर में प्रवेश करना इसलिए मुश्किल काम नहीं है क्योंकि उनके घर में कुंडी ठीक से बंद नहीं होती।

रात के समय घात लगाए आरोपित नसीरुद्दीन ने बलात्कार करने से पहले उत्तेजक दवा ली थी। उसने बताया कि वह पीड़िता के घर पहुँचा, तो उस समय गली में कोई नहीं था, रास्ता एकदम सूना था। लेकिन, किसी ने अपने घर के बाहर लगे बल्ब का स्विच ऑन किया हुआ था। उसने उस बल्ब को हटा दिया और ख़ौफ़नाक वारदात को अंजाम देने के लिए महिला के घर की ओर आगे बढ़ गया।

इसके आगे आरोपित ने बताया कि जब उसने घर में प्रवेश किया तो दरवाज़ा खुला हुआ था यानी कुंडी नहीं लगी हुई थी। घर में प्रवेश करते ही एक बांस की छड़ी वहाँ गिर गई, जिसकी आवाज़ सुनकर 35 वर्षीय महिला का पति उठ गया। आरोपित ने उसे ईंट से दो बार मारा, उसकी तुरंत मौत हो गई।

पूछताछ के वीडियो में आरोपित ने पुलिस को बताया,

“मैंने उसे एक ईंट से मारा जो मैंने बाहर से उठाई थी। मैंने उसे दो बार मारा। वह बिस्तर से ज़मीन पर गिर गया। महिला आवाज़ सुनकर उठ गई। मैंने उसे भी मारा। मैंने देखा कि एक बच्चा बीच में सो रहा था। मैंने उसे भी मारा। मुझे जो दिखाई दिया, मैंने उसे मार दिया।”

ख़बर के अनुसार, आरोपित ने जिस दुधमुँहे बच्चे की हत्या की, वो चार महीने का लड़का था। ईंट के हमले से उसकी मौत हो गई। महिला का पति भी मर गया। सोर सुनकर आए चार साल की उम्र के एक बेटे को भी मारा लेकिन वो मरा नहीं, घायल हो गया।

दो लोगों की हत्या करने के बाद, नसीरुद्दीन का कहना है कि उसने महिला को खींच लिया और उसके साथ बलात्कार किया। जब वो महिला का पहली बार बलात्कार कर रहा था, उस वक्त वो मरी नहीं थी। उसके हाथ हिल रहे थे। लेकिन वो उसी स्थिति में बलात्कार करता रहा। उसने पुलिस को बताया कि जब वो बाहर आया तो उसके कंधे की तरफ शर्ट पर ख़ून के धब्बे लगे हुए थे (महिला मरने से पहले विरोध कर रही थी और उसके खून से सने हाथ से शर्ट पर खून का दाग लगा), उन्हें साफ़ करने के लिए वो वापस घर में गया। वहाँ उसने शर्ट पर लगे ख़ून को साफ़ किया फिर बाहर गया।

बता दें कि आरोपित नसीरुद्दीन ने तीनों की लाशों के साथ लगातार तीन घंटे तक सेक्स किया और इस कुकृत्य का वीडियो भी बनाया। इस वीडियो को उसने अपनी साली को दिखाया। 

जब आरोपित से यह पूछा गया कि उसने 10 साल की लड़की पर हमला क्यों किया, तो उसने कहा,

“वह अपनी माँ को पानी देने के लिए कह रही थी। मैंने उसे चुपचाप सोने के लिए कहा। उसने मुझसे पूछा ‘तुम कौन हो?’ और ‘चोर, चोर, मम्मा, हमारे घर में एक चोर है’ चिल्लाना शुरू कर दिया। मैंने उसे ईंट से मारा जो मैंने बिस्तर पर रखी थी। फिर मैंने उसके साथ भी वैसा ही (बलात्कार) किया।”

पुलिस ने बताया कि नसीरुद्दीन ने पीड़िता के घर में लगभग तीन घंटे बिताए। बलात्कार और हत्या करने के बाद, उसने घर के हूलिए को इस तरह का बनाने की कोशिश की, जिससे यह लगे कि घर में चोरी हुई है। उसने कमरे के चारों तरफ कपड़े फैला दिए।

इस वीडियो में उसने पुलिस को बताया कि कमरे से बाहर निकलने से पहले, उसने तस्वीरों की एक एल्बम देखी। इसमें वो एक ऐसे शख़्स को पहचान लिया जो हाल ही में सऊदी अरब से आया था। उसने बताया कि महिला के मर जाने के बाद भी वो उसके साथ बलात्कार करता रहा।

नसीरुद्दीन को पुलिस ने ‘Necrophile’ करार दिया है, अर्थात लाशों के साथ सेक्स करने का भूखा। उसे पुलिस ने ‘Sex Maniac’ पाया है, अर्थात हमेशा सेक्स की इच्छा लिए घूमने वाला मानसिक पागल। नसीरुद्दीन ने स्वीकार किया है कि वह दिल्ली, हरियाणा और पश्चिम बंगाल में ऐसे कई अपराधों को अंजाम दे चुका है। पुलिस ने पाया है कि वो पूर्व में कई भयावह अपराध कर चुका है और उन सबके पीछे उसका एक ही उद्देश्य था- सेक्स।

किसी आरोपित के इस तरह के क़बूलनामे से भला किसका दिल न दहल जाए। जिस तरह से उसने एक के बाद एक घर के सदस्यों का हत्या की और बलात्कार की वारदात को अंजाम दिया, उससे किसी की भी रुह काँप जाएगी।

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दुनिया की सबसे ताकतवर कम्पनी भारतवंशी के हाथ में: सुंदर पिचाई बने गूगल की मालिक कम्पनी के CEO

भारतवंशियों की अमेरिका में, टेक की दुनिया में बढ़ती पहुँच में एक नया अध्याय जोड़ते हुए सुंदर पिचाई सर्च इंजन गूगल की मालिक कम्पनी अल्फ़ाबेट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी बनने जा रहे हैं। 2015 में बनी अल्फ़ाबेट कम्पनी के पास गूगल सर्च इंजन, जीमेल, यूट्यूब समेत गूगल ग्रुप की सभी कंपनियों को नियंत्रित करने का हक है। अभी तक अल्फ़ाबेट के अध्यक्ष सर्गेई ब्रिन और सीईओ लैरी पेज थे, लेकिन दोनों ने ही आज रिटायरमेंट की घोषणा कर दी है। गूगल कम्पनी की शुरुआत इन्हीं दोनों ने की थी।

सुंदर पिचाई गूगल का जो कॉर्पोरेट साम्राज्य संभालेंगे, उसमें जीमेल, यूट्यूब, एंड्रॉइड जैसी जानी-मानी कंपनियों और सेवाओं के अलावा ड्रोन के द्वारा डिलीवरी करने, अमेरिकी सेना व चीन सरकार के साथ मिलकर काम करने जैसी परियोजनाएँ शामिल हैं।

गूगल के पहले माइक्रोसॉफ्ट में भी सीईओ की कुर्सी एक भारतवंशी सत्या नडेला को मिल चुकी है। इसके अलावा वित्तीय सेवाएँ देने वाली मास्टरकार्ड और कम्प्यूटर पर कई तरह के सॉफ्टवेयर बनाने वाली एडोब के मुख्य कार्यकारी अधिकारियों के पद पर भी क्रमशः अजय सिंह बंगा और शांतनु नारायण काबिज़ हैं। कुछ समय पहले तक पेप्सिको कम्पनी की सीईओ भी भारतवंशी इंदिरा नूयी ही थीं, जो 2018 में 12.5 साल सेवाएँ देकर हटीं।

गंभीर और मितभाषी पिचाई कड़े प्रशासक माने जाते हैं। गूगल में उनके सीईओ बनने के बाद से एक ओर जहाँ कम्पनी के कारोबार में गति के साथ दिशा भी देखने को मिली है, वहीं दूसरी ओर उन पर यह भी आरोप लगते हैं कि उनके समय में कम्पनी में बोलने, सोचने आदि की आज़ादी पर बंदिशें लग रहीं हैं। उनके ही समय में कम्पनी में जेम्स डे’मोर काण्ड हुआ था, जब कम्पनी की महिला आरक्षण नीति पर सवाल करने को लेकर एक कर्मचारी को नौकरी से निकाल दिया गया था।

इसके अलावा पिचाई के सामने एक और बड़ी चुनौती अमेरिकी संसद के सवालों का जवाब देने की होगी। जहाँ कई रिपब्लिकन सांसद गूगल में फेसबुक की ही तरह लिबरल-समर्थक दुराग्रह और पूर्वाग्रह का शक जता चुके हैं, वहीं वामपंथी डेमोक्रेट्स को शक है कि गूगल लोगों का डाटा बिना उनकी मर्ज़ी के चुरा कर उनकी निजता का हनन कर रही है। इसके अलावा दोनों ही पार्टियों के सांसद डिजिटल विज्ञापनों के बाजार में गैर-क़ानूनी तरीके से एकाधिकार जमाने की कोशिश का भी आरोप गूगल पर लगा चुके हैं। ऐसे में कुछ टेक टिप्पणीकारों का यह भी मानना है कि अमेरिकी संसद की सुनवाई के पहले यह बदलाव कम्पनी के कर्मचारियों के बीच लगातार लोकप्रियता खो रहे पिचाई को बलि का बकरा बना कर बाहर करने की दिशा में भी कदम हो सकता है।

नागरिकता विधेयक से मुस्लिम बाहर: वामपंथियो! हम ‘sick a**hole’ भले हों, लेकिन चलेगी हमारी ही

अल्पसंख्यक की परिभाषा क्या है? जो संख्या में ‘अल्प’ हो, कम हो। क्या 20 करोड़ की आबादी होने, देश की दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या होने के बाद भी किसी को ‘अल्पसंख्यक’ कहा जा सकता है? अगर हाँ, तो 2-3% ईसाई, 1.5-2% सिख या बमुश्किल एक लाख से भी कम ईरानी, पारसी या यहूदी समुदाय क्या होंगे?

अल्पसंख्यक की अवधारणा के पीछे की विचारधारा को देखें तो उसमें यह पूर्वग्रह है कि जो संख्या में अधिक होगा (यानि ‘बहुसंख्यक’ होगा), ज़ाहिर सी बात है कि अल्पसंख्यक को ही उससे ‘दब’ कर रहना पड़ेगा। इसी पूर्वग्रह से, बिना इसकी ज़मीनी सत्यता जाँचे-परखे, बिना यह देखे कि यह पूर्वग्रह भारत के समकालीन समाज में कितना सच है और कितना गलत, एक पूरा ‘अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय’ बना हुआ है।

इसका काम ही इस दुराग्रह के साथ काम करना है कि जहाँ कहीं हिन्दू और गैर-हिन्दू के बीच विवाद होंगे, वहाँ गैर-हिन्दू के ही न्यायपूर्ण हित खतरे में होंगे। लेकिन भारत के बहुसंख्यक हिन्दुओं पर लागू इसी अवधारणा, कि “प्रताड़ित तो केवल बहुसंख्यक कर सकता है, अल्पसंख्यक नहीं”, का इस्तेमाल जब नागरिकता अधिनियम संशोधन विधेयक में इस्तेमाल होता है, तो लिबरल गिरोह और पत्रकारिता के समुदाय विशेष को याद यह आने लगता है कि नहीं-नहीं, प्रताड़ित तो हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई सभी हो सकते हैं- बशर्ते वे भारत के नागरिक न हों। भारत के नागरिक बनने के बाद हिन्दू हुए तो दुष्ट, शोषक और सताने वाले, गैर-हिन्दू हुए तो बेचारे, शोषित, सहानुभूति के पात्र।

सबसे पहला मानदण्ड- भारत के हितों की रक्षा

भारत के हर एक कानून का सबसे पहला मानदण्ड भारत की, यहाँ रह रहे नागरिकों, और यहाँ की मूल संस्कृति की रक्षा होता है- चाहे यह किसी कानून में अलग से लिखित हो या न हो। आज भारत हर तरफ़ से (चीन और श्री लंका को छोड़कर) कट्टरपंथी इस्लामियों, जिहादियों के आतंकी संगठनों से घिरा हुआ है। पाकिस्तान में तो पूरा एक देश ही उन्हें अपना कहर बरपाने के लिए मिला हुआ है, अफ़ग़ानिस्तान में भी तालिबान को अमेरिका की पूरी ताकत केवल सत्ता के मुहाने से दूर रख पा रही है, और बांग्लादेश में भी सत्ता चाहे जिसकी आए-जाए, इस्लामी प्रभुत्व और जनसंख्या में हिस्सेदारी बढ़ते ही जा रहे हैं, गैर-मुस्लिमों की आबादी कम हो रही है, और देश कट्टरपंथ-कठमुल्लावाद की ही गर्त में और गहरा धँसता जा रहा है। 

ऐसे में जब हमें पता है कि बाहर से आना चाह रहे किसी एक समुदाय के लोग एक बहुत ही हिंसक और भयानक विचारधारा के समर्थक हैं, और उनके इस देश की दूसरी सबसे बड़ी आबादी के साथ गहरे मज़हबी और सांस्कृतिक ताल्लुक हैं, तो उन्हें ला कर यहाँ की कमोबेश शांतिप्रिय आबादी को कट्टरपंथ की ओर धकेलने की ज़मीन तैयार करने का क्या औचित्य है? यह भारत के हितों के खिलाफ है, खतरनाक है- और अपने न्यूनतम हितों (अपनी वर्तमान आबादी की शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करना) किसी भी विदेश नीति या विदेशी के प्रति नीति का पहला दायित्व होता है।

यह खतरा किसी भी अन्य गैर-इस्लामी समुदाय के साथ नहीं होता है- न ही हिन्दू ‘जय श्री राम’ कह कर छाती पर बाँधे हुए बम बाज़ार में फोड़ लेते हैं, क्योंकि रामायण में राम ने गैर-हिन्दुओं की हत्या का आदेश दिया हो, न ही बौद्ध, सिख या ईसाई किसी अन्य देश में अपने पंथ के लोगों के मुद्दे पर भारत में मोपला सामूहिक हत्याकाण्ड, या फिलिस्तीन के समर्थन में अमर जवान ज्योति पर हमला जैसा कुछ कर दें, इसका खतरा भारत के इतिहास में हुआ है। जैन तो खैर बेचारे ज़िंदगी भर इंसान क्या, किसी चींटी को भी चोट न लगे, ऐसे बच-बचाकर चलते हैं, और सल्लेखना कर बुढ़ापे में प्राण भी शांति से ही त्याग देते हैं।

अतः यह कहना कि किसी के साथ हो रही कथित प्रताड़ना को रोकने के लिए भारत अपनी खुद की शांति और सुरक्षा को खतरे में रख ले, यह साफ़ तौर पर भारत के हितों के विरोध की पैरवी करना होगा- जैसा कि राहुल कँवल कर रहे हैं। 

आस्था के आधार पर नागरिकता नहीं तय हो रही, खतरे का आकलन हो रहा है 

पता नहीं वामपंथी गैंग के लोगों को सही में कानून पढ़ना-लिखना नहीं आता, या इन्हें ऐसा लगता है कि बाकी जनता अनपढ़-मूर्ख है, जो ऐसी अनर्गल बातें करते फिर रहे हैं कि नागरिकता का आधार आस्था को बनाया जा रहा है। 

आस्था को खतरे के आकलन का आधार बनाया जा रहा है, न कि नागरिकता का। जब कोई भी देश किसी भी बाहरी को अपने यहाँ का नागरिक या स्थाई निवासी बनने की अनुमति देता है तो इसमें हमेशा एक जोखिम होता है- पता नहीं वह इंसान इस देश के नियम-कायदे-कानून, सभ्यता, नागरिक मूल्य और संस्कृति इत्यादि के साथ सामंजस्य बिठा पाएगा या नहीं। अगर ऐसा लगता है कि हाँ, प्रार्थी ऐसा कर सकता है, तो एक सतर्कता बरतते हुए जोखिम लेकर उसे नागरिकता दे दी जाती है। 

लेकिन अगर इन तीन देशों के मुस्लिम प्रार्थियों पर गौर करें तो एक समाज, एक समूह के तौर पर उन्होंने अपने व्यवहार में ऐसा कुछ नहीं किया जिससे भारत आश्वस्त हो सके कि वे भारत के बहुलतावाद में सामंजस्य बिठा पाएँगे। तीनों ही देशों में हिन्दू ही नहीं, सभी गैर-मुस्लिम समुदाय असुरक्षित हैं और संख्या में सिकुड़ रहे हैं, इन देशों में जिहादियों को स्थानीय लोगों का समर्थन है, भारत-विरोधी बातें करने वाले ही पाकिस्तान में तो हमेशा चुनाव में जीतते हैं, और अफ़ग़ानिस्तान-बांग्लादेश में भी भारत के समर्थक नेता को शक की निगाह से ही देखा जाता है। तो ज़ाहिर है कि इन देशों के बहुसंख्यक समुदाय, जिसे खुश करने के लिए भारत-विरोधी रवैया इन देशों के नेता रखते हैं, का मिजाज़ भी भारत-विरोधी ही है। तो ऐसे में सवाल फिर से लौटकर यह आ जाता है कि भारत ऐसे भारत-विरोधी मिजाज़ का प्रदर्शन करने वालों को भारत का नागरिक बनाने का खतरा क्यों ले?

भारत का ‘फैब्रिक’ और ‘ईथोस’ आत्महत्या पर नहीं टिके 

आजतक और इंडिया टुडे के कार्यकारी सम्पादक साहिल जोशी का कहना है कि इस बिल से भारत का ‘फैब्रिक’ बदल जाएगा, भारत के ‘ऐथोस’ के खिलाफ है यह बिल। उनके लिए शायद यह बहुत बड़े धक्के की और चौंकाने वाली बात होगी, लेकिन भारत के किसी ‘फैब्रिक’ या ‘ऐथोस’ में आत्महत्या को बढ़ावा देने का ज़िक्र नहीं है- और जैसा कि ऊपर प्रदर्शित किया गया है, जिस समुदाय से जिहादी और आतंकवादी निकल रहे हैं, उसकी संख्या भारत में गैर-ज़रूरी तरीके से बढ़ाना आत्महत्या ही है। हाँ, अगर भारत से हिन्दुओं, के खात्मे के एजेंडे को ही वे भारत का फैब्रिक, उसका ‘ऐथोस’ मानते हैं तो बात अलग है। यह सेक्युलरासुर, आसुरिक, जड़ संविधान के रूप में एक और ‘पवित्र किताब’-पूजक सरकारी तंत्र का फैब्रिक और ऐथोस हो सकता है, इस देश के जनसामान्य का नहीं। 

अगर वो भारत के मूल्यों को ही जानना चाहते हैं तो उन्हें पता होना चाहिए कि भारत के शासक हमेशा ठोंक-बजाकर ही शरण देते थे। जब पारसी ईरान में उसी समुदाय के लोगों अत्याचार से जान बचाकर भारत पहुँचे, जिन्हें नागरिकता के लिए मना करने को जोशी जी भारत की अवधारणा के खिलाफ बता रहे हैं, तो भारत में जिस राजा के पास वे पहुँचे, उसने ऐसे ही शरण नहीं दे दी- उसने पहले उनके मज़हब को समझा, फिर उनके सामने शर्त रखी कि मूल उपासना-पद्धति के अलावा बाकी सारी संस्कृति हिन्दू ही अपनानी पड़ेगी, फिर शरण दी। महाभारत में भी जब अपना रथ निकालने में जुटे कर्ण ने सुविधानुसार शरणागति माँगी, तो भगवान श्री कृष्ण ने शर्त रखी कि वह हथियार छोड़ दे और हमेशा जिस राजा युद्धिष्ठिर की शरण में आ रहा है उसकी दासता में रहना स्वीकार करे। क्या साहिल जोशी इसका समर्थन करेंगे कि समुदाय विशेष के शरणार्थी से वंदे मातरम गाने, कभी फिलिस्तीन का समर्थन न करने, कश्मीर में हिन्दुओं की संख्या बढ़ाने जैसे मुद्दों का विरोध न करने, हिन्दुओं का मतांतरण न करने और हिन्दू लड़कियों से शादी करने पर उनका मज़हब न बदलवाने पर लिखित और हमेशा के लिए समर्थन की शर्त रख दी जाए? 

संविधान उनके लिए है जो नागरिक बन चुके हैं- उनके लिए नहीं जो बनना चाहते हैं 

स्वाति चतुर्वेदी वायर के लिए लिखतीं हैं, और वायर उन्हें बदले में शायद कुछ मेहनताना देता होगा। अब अगर मैं, जिसने न कभी वायर के लिए लिखा, न कोई लेना-देना, वायर के दफ़्तर में घुस जाऊँ और चिल्लाने लगूँ कि सिद्धार्थ वरदराजन (वायर के सम्पादक) मुझे भी उतना पैसा क्यों नहीं दे रहे जितना स्वाति को मिल रहा है, तो यह माँग पागलपन के अलावा क्या होगी? स्वाति का यह कहना कि यह अधिनियम संविधान का उल्लंघन है, कमोबेश ऐसा ही कथन है।

संविधान देश के वर्तमान  नागरिकों (न कि भावी, इच्छुक नागरिकों) का देश की सरकारी मशीनरी, देश के समाज के साथ अनुबंध होता है। इसका हिस्सा वही इंसान हो सकता है जो इन दोनों पक्षों (सरकार या नागरिक) में से किसी एक का सदस्य बन चुका  हो- वह नहीं, जो बनने का इच्छुक हो। सेक्युलरिज़्म भारत राष्ट्र का अपने देश के लोगों के साथ जो समझौता है, उसका एक हिस्सा है। जब समझौता ही नागरिकता से बाहर के लोगों पर तब तक लागू नहीं होगा जब तक कि वे नागरिक बन नहीं जाते, तो उसका कोई हिस्सा अलग से कैसे लागू हो सकता है? 

हिन्दुओं को ‘सेक्युलर इंडिया’ ने दिया क्या है, जो उसकी मौत से चिंतित हों?

हिन्दुओं की जैसी दुर्दशा सेक्युलर भारत सरकार ने कर रखी है, उसमें हिन्दुओं को ‘सेक्युलरिज़्म’ की दुहाई देना वैसे ही है, जैसे कोई किसी नाज़ी यातना शिविर में पड़े यहूदी, चीनी यातना शिविर में बंद उइगर या हान मुस्लिम, इस्लामिक स्टेट के हाथों सर कलम होने का इंतज़ार कर रहे (और गला न रेता जाए, इसकी प्रार्थना कर रहे) ईसाई से यह प्रार्थना करे कि वह अपने शोषकों को जिलाए रखने के लिए कुछ कर दे। क्यों कर दें, भई अशोक स्वाइन?

हमारे मंदिर का चढ़ावा तुम लूटो, हमारे पुजारियों को पगार के नाम पर टुकड़ों से भी कम फेंक कर भूखा मरने पर तुम मजबूर करो, सबरीमाला से लेकर शनि शिगनापुर तक मंदिर तुम्हारा सेक्युलरिज़्म अपवित्र करे, संविधान में अनुच्छेद 25-30 के पंथिक संरक्षण से केवल हम बाहर, RTE के नाम पर आर्थिक बोझ बढ़ाकर स्कूल केवल हमारे बंद हों, और सेक्युलरिज़्म भी हम ही बचाएँ? माथे पर कोई खास अक्षर जो लिखा हुआ था, उसे मिटा चुके हैं हिन्दू।

https://twitter.com/ashoswai/status/1202165315980972032

शशि थरूर की संविधान की जानकारी स्वाति चतुर्वेदी जितनी- दुःखद परन्तु सत्य 

शशि थरूर ने ले-देकर वही घिसी-पिटी “ये संविधान के खिलाफ है” की लाइन दोहरा दी। स्वाति चतुर्वेदी के लिए तो यह कॉलर ऊँची करने वाली बात हो सकती है कि विपक्ष का सबसे चर्चित और सम्मानित सांसद, व मोदी को प्रधानमंत्री पद के लिए चुनौती दे सकने में दूर-दूर तक सक्षम इकलौते चेहरे का संविधान-ज्ञान उनके बराबर है, लेकिन शशि थरूर के लिए इससे ‘बुरे दिन’ हो नहीं सकते। कहाँ आईएफएस अफ़सर, 19 बेस्टसेलर किताबों के लेखक, संयुक्त राष्ट्र की सबसे बड़ी कुर्सी के एक इंच पास तक पहुँच जाने वाले वे, और कहाँ… स्वाति चतुर्वेदी!! 

जहाँ तक संविधान की भारत की अवधारणा बनाम पाकिस्तान की अवधारणा की बात है, तो शशि थरूर खुद यह कई मौकों पर मान चुके हैं कि गाँधी और नेहरू के “आईडिया ऑफ़ इंडिया” की स्वीकार्यता घटती जा रही है- बल्कि आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा गाँधी का कोई बड़ा नामलेवा नहीं है, और नेहरू को तो कॉन्ग्रेस भी याद नहीं करती। अगर मोदी गाँधी का नाम न लें तो कुछ सालों में “हिंदुओं को अपना गला प्लेट पर रख कर मुस्लिम भाईयों के आगे हाजिर रहना चाहिए” पढ़ाने वाले गाँधी कब बिसर जाएँगे, किसी को याद भी नहीं रहेगा। नेहरू ने मृत/निर्जीव ढाँचों बाँधों को “आधुनिक भारत के मंदिर” कहा था- यह आध्यात्मिक रूप से सजीव और सप्राण मंदिरों का ही अपमान नहीं था,साथ में इस बात की भी तस्दीक थी कि भारत का प्रधानमंत्री देश की उस करोड़ों जनता से कटा हुआ है, जो एक मंदिर बचाने के लिए आखिरी बच्चे तक पूरा-का-पूरा गाँव मरने-मारने के लिए प्रस्तुत रहती थी। 

तो ऐसे लोगों के आईडिया ऑफ़ इंडिया से तो भारत जितना दूर हो रहा है, हिंदुओं के लिए तो उतनी ख़ुशी की बात है। 

हम ‘sick a**hole’ भले हों, लेकिन चलेगी हमारी ही 

संयुक्ता बासु जैसे लोग सत्ता की, हनक की भाषा ही समझते हैं, इसलिए उन्हें तो केवल इतना जवाब देना ही मुनासिब होगा, “मेरा चौकीदार, मेरी सरकार, मेरी मर्जी।” जब आइएगा वापिस सत्ता में किसी दिन, तो पलटने की हिम्मत या कोशिश कर लीजियेगा। या दो-चार गालियाँ और दे कर देखिए, वो भी बिना स्टार के- क्या पता अमित शाह शर्म और विषाद में ही बिल पलट दें। 

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आप जिन्दा रहिए, वरना जेल कैसे जाइएगा: सुब्रमण्यम स्वामी ने किया गाँधी परिवार पर हमला

भारतीय जनता पार्टी के राज्य सभा सांसद और मशहूर अर्थशास्त्री डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने एसपीजी बिल पर बहस के दौरान कल (मंगलवार, 3 दिसंबर, 2019 को) कॉन्ग्रेस के ‘प्रथम परिवार’ यानि गाँधी-नेहरू परिवार पर हमला बोला। एसपीजी बिल पर राज्य सभा में चर्चा के दौरान उन्होंने गाँधी परिवार पर चल रहे भ्रष्टाचार के विंभिन्न मामलों पर तंज़ कसते हुए कहा कि भाजपा बिलकुल नहीं चाहती कि गाँधी परिवार को कोई शारीरिक हानि पहुँचे, क्योंकि उन लोगों को तो अभी जेल भी जाना है।

गौरतलब है कि कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्षा सोनिया गाँधी और वायनाड के सांसद व पार्टी के भूतपूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी जहाँ नेशनल हेराल्ड मामले में भ्रष्टाचार के मुकदमों में जमानत पर हैं, वहीं परिवार के दामाद तथा सोनिया गाँधी के बेटी प्रियंका गाँधी वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा कई ज़मीन घोटालों के आरोपी हैं। यही नहीं, डॉ, स्वामी के आरोपों को अगर सही मान लें तो अगस्ता-वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर घोटाले में भी सोनिया गाँधी के करीबी लोग शामिल थे।

इसके अलावा डॉ. स्वामी ने कॉन्ग्रेस के अन्य तर्कों की भी धज्जियाँ उड़ा कर रख दीं। उन्होंने कॉन्ग्रेस की सदन में पैरवी कर रहे सुप्रीम कोर्ट वकील केटीएस तुलसी के उस आरोप का भी जवाब दिया जिसमें तुलसी ने इंदिरा गाँधी-राजीव गाँधी की हत्या के लिए मुहैया कराई गई सुरक्षा में कमी को ज़िम्मेदार ठहराया था।

इंदिरा गाँधी के मामले में स्वामी ने दावा किया कि इंदिरा गाँधी ने अपनी राजनीतिक छवि के चक्कर में अपने सुरक्षा कर्मियों के आतंकी गुटों से मिल जाने की रिपोर्ट के बाद भी सुरक्षा कर्मी नहीं बदले- और बाद में उन्हीं सुरक्षा कर्मियों ने इंदिरा की हत्या कर दी। राजीव गाँधी की हत्या के बाद उस हत्याकांड की जाँच करने वाले कमीशन की रिपोर्ट के हवाले से डॉ. स्वामी ने कहा कि राजीव की हत्या के वाकये में कॉन्ग्रेसियों ने मौजूद सुरक्षा व्यवस्था का खुद मज़ाक बनाते हुए न ही पुलिस को ठीक से राजीव के इर्द-गिर्द सुरक्षा घेरा बनाने दिया (इससे आम लोग भी राजीव तक न पहुँच पाते, और जननेता की छवि बनाने के प्रोजेक्ट को धक्का लगता), न ही सुरक्षा एजेंसियों के साथ अनन्य सहयोग किए। यहाँ तक कि इस हत्याकाण्ड के बाद सरकारी सुरक्षा प्राप्त नेताओं वाली पार्टियों के व्यवहार को लेकर जाँच आयोग ने कुछ सुझाव भी दिए थे, जिसे नरसिम्हा राव की कॉन्ग्रेस सरकार ने स्वीकार किया।

स्वामी ने इन सबके बाद इस आरोप का भी जवाब दिया कि मोदी सरकार कॉन्ग्रेस के ‘प्रथम परिवार’ से राजनीतिक रूप से डरकर उनकी जान खतरे में डाल रही है। उन्होंने कहा कि सरकार का ऐसा कोई इरादा नहीं है, क्योंकि सरकार तो चाहती है कि वे अपने भ्रष्टाचार के लिए सजा पाने जेल जाएँ।

स्वामी की इस चुटकी को सोशल मीडिया पर बहुत तालियाँ मिल रहीं हैं। एक यूज़र ने लिखा कि मोदी-शाह के खिलाफ खड़े होते रहने के बावजूद इसीलिए भाजपा में स्वामी को इतनी छूट मिली हुई है, क्योंकि भाजपा में इस प्रकार के अप्रिय सत्य जस-के-तस बोलने वाला कोई दूसरा नहीं है।

एक अन्य ने डॉ. स्वामी के इस हमले को ‘विस्फ़ोटक’ करार दिया।

डॉ. स्वामी का वह पूरा भाषण सुनें यहाँ:

फिल्ममेकर डेनियल श्रवण का शर्मनाक बयान, कहा- रेपिस्ट्स के लिए कॉन्डो‍म लेकर चलें लड़कियाँ, सहयोग करें

जहाँ देश एक के बाद एक जघन्य गैंगरेप और वीभत्स मर्डर की घटनाओं से आक्रोशित हो उबल रहा है ऐसे में खुद को फिल्ममेकर कहने वाले एक शख्स डेनियल श्रवण ने बहुत ही शर्मनाक बयान देकर रेप पीड़िताओं और समाज की भावनाओं को ठेस पहुँचाया है।

तथाकथित फिल्ममेकर डेनियल श्रवण ने देश में रेप को लीगल करने की वकालत की है। डेनियल के ऐसे शर्मनाक बयान पर लोगों ने उसे आड़े-हाथों लिया है। इतना ही नहीं डेनियल श्रवण ने फेसबुक पर एक के बाद एक लंबे-लंबे पोस्ट लिखकर कहा है कि लड़कियों और महिलाओं को कॉन्‍डोम लेकर चलना चाहिए। बल्कि रेपिस्ट्स की सेक्सुअल इच्छाओं को नकारने और रेप के बाद हत्या के लिए उकसाने के बजाए इसे कानूनी मान्यता दी जानी चाहिए। रिपोर्ट्स के अनुसार, खुद को फिल्ममेकर कहने वाला यह शख्स साउथ की सी ग्रेड फिल्मों का डायरेक्टर है।

डेनियल के लिखे फेसबुक पोस्ट पर लोगों ने जमकर उसकी जमकर क्लास ली। हालाँकि, सोशल मीडिया यूजर की प्रतिक्रियाओं पर कुछ देर उलझने के बाद डेनियल ने अपनी पोस्ट को डिलीट कर दिया था लेकिन उसके पोस्ट के स्‍क्रीनशॉट्स सोशल मीडिया पर वायरल हो गए।

हाल ही में हैदराबाद गैंगरेप के बाद तेलंगाना और उसके बाद बक्सर गैंगरेप की घटना से लोग व्यथित है तो डेनियल ने जो कहा उसे किसी भी कीमत पर सभ्य अभिव्यक्ति नहीं कही जा सकती लेकिन जिनके लिए लड़कियाँ सिर्फ देह हों, भोग का सामान हों उनसे क्या उम्मीदें रखी जाएँ।

रेप के बारे में फेसबुक पर डेनियल श्रवण ने लिखा, “सरकार को बिना हिंसा वाले रेप मामलों को कानूनी मान्यता दे देनी चाहिए। रेप के बाद हत्या को रोकिए। 18 साल से ज्यादा की सभी लड़कियों को रेप के बारे में विस्तार से बताया जाना चाहिए। उन्हें मर्दों की सेक्सुअल इच्छाओं को नकारना नहीं चाहिए। बल्कि उन्हें कॉन्‍डोम का इस्तेमाल करना चाहिए। केवल तभी ऐसी हिंसात्मक घटनाओं को रोका जा सकता है। ऐसा सोचना मूर्खतापूर्ण है कि वीरप्पन को मार देने से तस्करी पर लगाम लग जाएगी या फिर लादेन को मार देने से आतंकवाद पर काबू पा लिया जाएगा। ठीक उसी तरह से निर्भया एक्ट भी रेप और रेप के दौरान हिंसा को नहीं रोक पाएगा।”

डेनियल ने आगे लिखा, “खासतौर पर भारतीय लड़कियों को सेक्स एजुकेशन दी जानी चाहिए। खासतौर पर 18 साल की उम्र में आते ही उन्हें कॉन्‍डोम साथ लेकर चलना चाहिए। बहुत आम तर्क है, अगर मर्दों की इच्छाएँ पूरी होंगी तो वे महिलाओं को नहीं मारेंगे। सरकार को कुछ इस तरह की योजना बनानी चाहिए।”

लोगों ने जमकर डेनियल को लताड़ा है डेनियल ने अपनी फेसबुक पोस्ट डिलीट कर दी है लेकिन सोशल मीडिया यूजर का कहना है कि ऐसे लोग शायद ही अपनी हरकतों से बाज आएँ। इनकी घृणित सोंच और हरकतें जब-तब बाहर आती रहेगी।

कॉन्ग्रेसी मंत्री ने किया ‘मुझको राणा जी माफ करना गलती…’ गानें पर डांस: VIDEO हुआ वायरल

मध्य प्रदेश के कमलनाथ सरकार में महिला एवं बाल विकास मंत्री इमरती देवी का एक डांस सोशल मीडिया में खूब वायरल हो रहा है। अपने इस डांस से कॉन्ग्रेसी मंत्री इमरती देवी एक बार फिर सुर्खियों में आ गईं हैं। बता दें कि मंत्री इमरती देवी ने बॉलीवुड के मशहूर गाने ‘मुझको राणा जी माफ करना गलती मारे से हो गई’ पर डांस किया है।

मंत्री जी का ये डांस वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है तो वहीं, मध्य प्रदेश की भाजपा मंत्री के डांस पर तंज भी किया है। जबकि, मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस ने इमरती देवी का बचाव करते हुए कहा कि किसी के डांस करने में क्या गलत है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, वायरल डांस वीडियो मध्य प्रदेश के डबरा विधानसभा क्षेत्र में हो रहे एक शादी समारोह का बताया जा रहा है।

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश के कमलनाथ सरकार में मंत्री इमरती देवी अक्सर सुर्खियों में बनी रहती हैं। पहले भी गणतंत्र दिवस के दौरान अपने एक भाषण को लेकर इमरती देवी चर्चा में रह चुकी हैं। जिसमें अपना भाषण पढ़ते-पढ़ते उन्होंने कहा था कि अब कलेक्टर साहब पढ़ेंगे।

बता दें कि इसके बाद तो इमरती देवी के ऐसे कई वीडियो वायरल हो चुके हैं। कॉन्ग्रेसी मंत्री इमरती देवी ऐसे ही एक वायरल वीडियो में कह रही थीं कि डॉक्टर का ट्रांसफर नहीं कराएँगे। इसमें पैसा लगता है, इसलिए उसे सस्पेंड ही कर देते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, डॉक्टर के ट्रांसफर वाला वीडियो 24 सितंबर का बताया जा रहा था। तब इमरती देवी डबरा में ही एक अस्पताल के दौरे पर गईं थीं।

हालाँकि, इस वायरल वीडियो पर अभी तक उनका कोई बयान नहीं आया है लेकिन सोशल मीडिया पर इसे खूब शेयर किया जा रहा है।

मुंबई में 6 साल की बच्ची के साथ बलात्कार: 60 वर्षीय अब्दुल हामिद अंसारी गिरफ़्तार

मुंबई में एक 60 वर्षीय व्यक्ति को बलात्कार के जुर्म में गिरफ़्तार किया गया है। आरोप है कि कुर्ला वेस्ट में ग्रोसरी की दुकान चलाने वाले अब्दुल हामिद बहादुर अंसारी ने 6 साल की बच्ची का बलात्कार किया। विनोबा भावे पुलिस स्टेशन में उसके ख़िलाफ़ नाबालिग के साथ बलात्कार का मामला दर्ज किया गया है। शिकायत में कहा गया है कि अंसारी 1 दिसंबर से ही नाबालिग पीड़िता के साथ यौन दुर्व्यवहार कर रहा था। बच्ची उसके यहाँ अंडे लेने जाती थी। अंसारी उसे चॉकलेट देने के बहाने दुकान के अंदर बुलाता था और फिर उसके साथ अश्लील हरकतें करता था।

एक बार बच्ची के पेट में अचानक से जोर का दर्द हुआ तो उसने अपने माता-पिता को इस बारे में बताया। बच्ची ने अपने पैरेंट्स को मंगलवार (दिसंबर 3, 2019) को हुई घटना के बारे में बताया। बच्ची ने अब्दुल हामिद बहादुर अंसारी के कुकृत्यों के बारे में बताया, तो माता-पिता ने पुलिस में केस दर्ज कराया। आरोपित के ख़िलाफ़ पोस्को एक्ट के तहत भी मामला दर्ज किया गया है। उसे बुधवार को अदालत में पेश किया गया।

ये घटना तब हुई है, जब देश में डॉक्टर प्रीति रेड्डी (बदला हुआ नाम) के गैंगरेप और हत्या के बाद जनाक्रोश का माहौल है। हैदराबाद में हुई इस घटना के तुरंत बाद तेलंगाना का एक और मामला सामने आया, जहाँ एक गुब्बारे बेचने वाली महिला के साथ गैंगरेप किया गया और फिर उसकी हत्या कर दी गई। बलात्कार की घटनाओं को लेकर संसद में भी चर्चा हुई और कई सांसदों ने जल्द से जल्द सुनवाई के बाद दोषियों को फाँसी दिए जाने की माँग की।