बलात्कार के आरोपित बिशप फ्रैंको मुलक्कल के खिलाफ बयान देने के लिए फ्रांसिसन क्लेरिस्ट कॉन्ग्रेगेशन (एफसीसी) द्वारा अप्राकृतिक और अनुशासनात्मक कार्रवाई का सामना करने वाली सिस्टर लिसी वडक्केल पर अब बिशप फ्रैंको के खिलाफ दिए गए बयान को बदलने का दबाव डाला जा रहा है।
बता दें कि जालंधर बिशप फ्रैंको मुलक्कल द्वारा केरल नन का कथित तौर पर कई बार बलात्कार किया गया था और सिस्टर लिसी इस मामले की प्रमुख गवाहों में से एक हैं। द न्यूज मिनट से बात करते हुए सिस्टर लिसी ने कहा कि उनके वरिष्ठ लोग लगातार उन पर फ्रैंको मुलक्कल के खिलाफ दिए गए बयान को बदलने के लिए दबाव डाल रहे हैं।
फिलहाल मामले में आरोपितों के खिलाफ आरोप तय करने की कार्यवाही को अदालत ने 6 जनवरी तक के लिए स्थगित कर दिया है। नन ने कहा कि वो खुद को बहुत असुरक्षित महसूस कर रही हैं। उन्होंने बताया कि बिशप की जमानत की अवधि हाल ही में अदालत ने बढ़ाई थी और फिलहाल कार्यवाही इस सप्ताह के अंत तक के लिए स्थगित कर दी गई हैं। बता दें कि 56 वर्षीय नन पिछले कई महीनों से केरल के मुवत्तुपुझा के कॉन्वेंट में पुलिस संरक्षण में रह रही हैं। उन्होंने कॉन्वेंट के अंदर बुरा व्यवहार का आरोप लगाते हुए कहा कि हाउस अरेस्ट के दौरान लगातार उन पर बयानों को बदलने के लिए दवाब डाल रहे हैं।
सिस्टर लिसी ने CNN News18 से बात करते हुए कहा, “यह हाउस अरेस्ट है। मैं एक प्रचारक हूँ लेकिन मैं कहीं भी नहीं जा सकती और ना ही प्रार्थना कर सकती। मेरे कॉन्वेंट में लोग मुझे किसी भी गतिविधि में शामिल नहीं कर रहे हैं … वे ऐसा व्यवहार करते हैं कि जैसे मैं इसका हिस्सा नहीं हूँ। ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि पादरी, फ्रैंको मुलक्कल के करीबी हैं। मैंने अदालत से कहा था कि मुझे मुकदमे के अंत तक यहाँ रहने दिया जाए और उन्होंने मुझे गवाह सुरक्षा के तहत यहाँ रहने की अनुमति दी।”
उल्लेखनीय है कि सिस्टर लिसी उन कुछ लोगों में से एक है, जिनके साथ पीड़ित नन ने उन यौन विकृतियों के बारे में बात की थी। सिस्टर लिसी ने उस समय पुलिस को अपना बयान दिया था। जिसके बाद उसे एफसीसी द्वारा अपमानित किया गया था और केरल छोड़ने और विजयवाड़ा में एक कॉन्वेंट में रहने के लिए कहा गया था।
वहीं सिस्टर लिसी ने एक बार फिर से अपनी बात दोहराते हुए कहा कि वह अपना बयान नहीं बदलेंगी। उन्होंने कहा, “मैं बयान दे रही हूँ क्योंकि मैं सच्चाई जानती हूँ। शिकायतकर्ता नन के साथ 2011 से मेरा व्यक्तिगत संबंध है। नन को न्याय मिलना चाहिए, मैं उसके साथ हूँ। मैं प्रार्थना करती हूँ कि उसे न्याय मिले।”
गौरतलब है कि जालंधर सूबा से ताल्लुक रखने वाले मुलक्कल को कोट्टायम कॉन्वेंट में 13 बार नन के साथ बलात्कार के आरोप में पुलिस जाँच का सामना करना पड़ रहा है। जून 2018 में पीड़िता की शिकायत के बाद कई अन्य ननों ने सामने आकर मुलक्कल पर यौन दुराचार का आरोप लगाया था।
काशी हिन्दू विश्विद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय (SVDV) के आंदोलनकारी छात्रों का अनिश्चित कालीन धरना संकाय के प्रवेश द्वार पर जारी है। बता दें कि BHU प्रशासन के बिना प्रमाण के दिए जवाबों से SVDV के छात्रों में घोर असंतुष्टि है। चक्रपाणि ओझा, शशिकांत मिश्र, आनंद मोहन झा, कृष्ण कुमार, शुभम सहित सभी धरनारत छात्रों ने कुलपति राकेश भटनागर के समक्ष कई गंभीर प्रश्न उठाए हैं। छात्रों ने इससे पहले SVDV के साहित्य विभाग के विभागाध्यक्ष प्रोफ़ेसर उमाकांत चतुर्वेदी द्वारा दिए गए आधे-अधूरे जवाबों पर भी कई काउंटर सवाल (प्रति-प्रश्न) किए थे और BHU प्रशासन से सभी प्रश्नों का समुचित जवाब माँगा था।
#SVDV के छात्रों को #BHU प्रशासन ने दिया बिना प्रमाण के जवाब, असंतुष्ट छात्रों ने उठाए कई गंभीर सवाल, अनिश्चित काल तक आन्दोलन जारी रखने पर अड़े धरनारत छात्र….
प्रशासन ने तो कोई प्रमाण नहीं दिया लेकिन आज संकाय के छात्रों की तरफ से ऑपइंडिया को कई महत्वपूर्ण दस्तावेज उपलब्ध कराए गए हैं जिन्हें देखकर संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में किसी गैर हिन्दू की नियुक्ति से छात्रों को क्यों आपत्ति है? क्यों वे सनातन परम्पराओं और मालवीय मूल्यों की लड़ाई लड़ रहे हैं? क्यों वे संकाय में एक मुस्लिम प्रोफ़ेसर डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध कर रहे हैं और क्यों किसी गैर हिन्दू को अपना गुरु नहीं मानना चाहते हैं?
SVDV के छात्रों के BHU प्रशासन पर आरोप, आपत्तियाँ और प्रमाण
धरनारत आंदोलनकारी छात्रों का कहना है, “संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के छात्रों ने संकाय में नियम, विधि, परंपरा एवं बीएचयू एक्ट के विरुद्ध जाकर कुलपति से एक गैर हिन्दू अध्यापक की नियुक्ति का कारण पूछा तो कुलपति राकेश भटनागर और उनके झूठे प्रशासन ने अपनी गर्दन बचाने के लिए 10 दिन की मोहलत माँगने के बावजूद एक झूठ का पुलिंदा जवाब के रूप में छात्रों के हाथ में थमाकर पूरे मामले से इस तरह पल्ला झाड़ लिया कि मानो सब कुछ यूजीसी के नियमों के अन्तर्गत हुआ है जिसे बीएचयू एक्ट की स्वीकृति भी प्राप्त है।”
छात्रों ने कुलपति से सवाल किया:
प्रशासन के पास इस सवाल का क्या जवाब है कि आखिर बीएचयू एक्ट की धारा 4 में जो परन्तुक या अपवाद ‘धार्मिक शिक्षा’ अर्थात ‘religious instruction’ को लेकर लिखा गया है उसका तात्पर्य वास्तव में क्या है?
इस परन्तुक या अपवाद के आधार पर बीएचयू में धार्मिक शिक्षा किस संकाय द्वारा, किसे व किस रूप में दी जा रही है?
यह परन्तुक या अपवाद आज भी बीएचयू एक्ट का हिस्सा क्यों है?
छात्रों का कहना है, “आज सारा विश्वविद्यालय प्रशासन जो कुलपति राकेश भटनागर के डर से चुप है लेकिन वह दबी जुबान जानता है और मानता भी है कि इस परन्तुक या अपवाद के आधार पर ही बीएचयू का धार्मिक शिक्षा का मामला सभी मत-मजहब के लिए नहीं खुला है, इसी के कारण धर्मविज्ञान संकाय में विगत 100 साल से किसी गैरहिन्दू शिक्षक की नियुक्ति नहीं हो सकी थी। इस नियम को दोबारा पढ़ना और प्रशासन को पढ़ाना और समझाना आवश्यक हो गया है।”
BHU Act-1951 एवं सभी संशोधनों में सम्मिलित नियम के अनुसार:
SVDV के छात्रों का कहना है, “कुलपति प्रो. राकेश भटनागर जेएनयू से आए हैं और इन्हें अंग्रेजी भी बहुत अच्छी आती है तो क्या उन्हें मालूम है कि धारा चार धार्मिक शिक्षा के मामले में बीएचयू को विशेष अधिकार दे रहा है कि धार्मिक शिक्षा सभी मत-मजहब के लिए नहीं खुली है। इस अनुच्छेद के अनुसार, इस धारा की कोई भी बात पूर्वादेश से दी जा रही धार्मिक शिक्षा पर लागू नहीं होती है। पूर्वादेश यानी अध्यादेश अर्थात कुलपति प्रो. राकेश भटनागर इस अनुच्छेद की पंक्तियों में लिखे “Ordinances” शब्द की मनमानी व्याख्या कर रहे हैं कि यह तो संसद का अध्यादेश है, और संसद ने यूजीसी के द्वारा हमें नियुक्ति का अधिकार भी दिया है। कुलपति महोदय को बीएचयू एक्ट की धारा दो (2-परिभाषा) जिसमें विधिक शब्दों की परिभाषा दी गई है, इसमें ऑर्डिनेंस की परिभाषा भी वर्णित है जिसका तात्पर्य है कि विश्वविद्यालय के द्वारा लागू किया जाने वाला पूर्वादेश।”
अंग्रेजी में लिखा है:
छात्रों का यहाँ कहना है, “अब प्रश्न है कि विश्वविद्यालय का वह ऑर्डिनेंस कौन सा है? कब जारी किया गया है? किसने जारी किया था जिसके द्वारा बीएचयू एक्ट-1951 में लिखा गया है कि….”
धरनारत छात्रों का सवाल है, “बीएचयू प्रशासन को उस ऑर्डिनेंस को देश के सामने प्रस्तुत करना चाहिए जिसके जरिए बीएचयू में धार्मिक शिक्षा बीएचयू एक्ट-1951 में संशोधन के पूर्व से दी जा रही थी, इसीलिए संसद को संशोधन के समय लिखना पड़ा कि “religious instruction being given.” अर्थात वह धार्मिक शिक्षा अर्थात, दी जा रही धार्मिक शिक्षा रोकी नहीं जाएगी। बीएचयू एक्ट-1915 में हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसायटी-1904 को उसकी सभी शक्ति, नियम एवं संपत्ति के साथ विलीन किया गया था। बीएचयू एक्ट में अब तक जितने भी संशोधन हुए हैं, सभी में सबसे पहले इस तथ्य का वर्णन आता है।”
इसे निम्नांकित रूप से समझ सकते हैं:
“इस प्रकार से बीएचयू एक्ट के प्रथम अध्याय में ही उपर्युक्त पंक्तियाँ सबसे ऊपर वर्णित हैं कि बीएचयू एक्ट में हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसायटी का विलय उसकी संपूर्ण शक्तियों और संपत्ति के साथ हो गया है। यूनिवर्सिटी सोसायटी-1904 में बीएचयू की स्थापना के जो उद्देश्य निर्धारित किए गए थे, वह आज भी बीएचयू की उद्देशिका हैं।”
इसके अनुसार:
छात्रों ने आगे बताया, “बीएचयू की स्थापना के उपर्युक्त चार उद्देश्य आज भी यथावत हैं। इस सोसायटी के नियम क्रमांक-8 में लिखा है कि- संस्कृत महाविद्यालय का धर्मशास्त्र विभाग धर्मशास्त्र संकाय के नियंत्रण में रहेगा और इसका संचालन शास्त्रों द्वारा यथानिर्धारित हिन्दू धर्म के सिद्धांतों के अनुसार न्यासी परिषद द्वारा बनाए गए नियमों के अन्तर्गत होगा। नियम क्रमांक-9 के अनुसार, धर्मशास्त्र संकाय में प्रवेश, परीक्षा एवं उपाधि हेतु सभी नियम संकाय द्वारा स्वयं ही निर्धारित किया जाएगा। सोसायटी के नियम क्रमांक-11 में लिखा है कि धर्मशास्त्र संकाय को छोड़कर विश्वविद्यालय के समस्त महाविद्यालय, विद्यालय एवं संस्थान सभी मत-मजहबों एवं वर्गों के लोगों के लिए खुले रहेंगे।”
“काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में सनातन हिन्दू धर्म की धार्मिक शिक्षा प्रदान करने वाला संस्थान विशेष रूप से होना चाहिए, इसका वर्णन हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसायटी-1904 के साथ-साथ बीएचयू एक्ट-1915 में भी भलीभाँति वर्णित है। बीएचयू एक्ट-1915 के अनुच्छेद चार में लिखा है कि- विनियमों के अधीन, यह विश्वविद्यालय सभी वर्ग, जाति और पंथ के व्यक्तियों के लिए खुला होगा किन्तु, केवल हिन्दू धर्म से संबंधित धार्मिक शिक्षा प्रदान करने और तत्सबंधी परीक्षा संचालित करने के लिए विशेष प्रावधान किया जाएगा।”
“बीएचयू के संशोधित एक्ट-1951 ने बीएचयू के मूल एक्ट-1915 के इसी प्रावधान को, जिसे 1917 में ही अमलीजामा पहनाते हुए फैकल्टी ऑफ थियोलॉजी अर्थात धर्मविज्ञान संकाय के रूप में क्रियान्वित कर दिया गया था, के अन्तर्गत प्रदान की जा रही धार्मिक शिक्षा को सभी मत-पंथों के लिए खुला रखने वाले अनुदेश से अलग कर स्पष्टतया रेखांकित कर दिया था कि बीएचयू सभी मत-मजहब के लिए खुला रहेगा किन्तु यह बात धार्मिक शिक्षा पर लागू नहीं होगी। धार्मिक शिक्षा के प्रावधान को संसद द्वारा पारित बीएचयू एक्ट-1915 के अन्तर्गत बीएचयू की अनेक विधिक समितियों ने, तत्कालीन बीएचयू कोर्ट (सर्वोच्च नीति निर्धारिक समिति) और बीएचयू कार्यकारिणी और सीनेट ने अपनी बैठकों, संकल्पों के द्वारा स्पष्ट किया है।”
BHU एक्ट-1915 के अन्तर्गत पारित स्टेट्यूट-65 के अनुसार:
आंदोलनकारी छात्रों का कहना है कि उपर्युक्त वर्णन से स्पष्ट है कि बीएचयू की स्थापना के समय से ही धर्म की शिक्षा का विषय सनातन हिन्दू वैदिक, जैन-सिख और बौद्ध आदि के लिए विशेष रूप से निर्मित किया गया था। इसके लिए विशेष रूप से धर्मविज्ञान संकाय की स्थापना भी सबसे पहले संकाय के रूप में की गई। इस संकाय में अध्यापकों की नियुक्ति के विषय में भी समय-समय पर नियम-निर्देश किए गए।”
बीएचयू के पोर्टल पर संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय की स्थापना का जो उद्देश्य लिखा है उसमें वर्णित है:
“इसमें लिखा है कि संस्कृतविद्या धर्मविज्ञान संकाय की स्थापना विश्वविद्यालय के संस्थापक पंडित मदन मोहन मालवीय द्वारा विश्वविद्यालय स्थापना के मुख्य उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए की गई थी; प्राचीन भारतीय शास्त्रों के अध्ययन को संरक्षित एवं उन्नत करने के लिए। इस प्रकार यह संकाय अपनी प्रकृति में विलक्षण है। यहाँ शास्त्रीय ग्रंथों का अध्ययन-अध्यापन प्राचीन ज्ञान परंपरा की पद्धति के अनुसार,- वाचिक और लिखित परंपरा दोनों समेत, कड़ाई से परंपरा का पालन करते हुए किया जाता है।”
छात्रों का कहना है, “अब यहाँ प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि प्राचीन परंपरा और उससे जुड़े कर्मकांड, वाचिक एवं अन्य धार्मिक पद्धतियों का पालन क्या गैरहिन्दू भी उसी भाव-भावना से कर सकेगा जिस भाव-भावना से इस संकाय की स्थापना का उद्देश्य विश्वविद्यालय ने स्थान-स्थान पर घोषित कर रखा है।”
“किसी गैर-हिन्दू की शिक्षण कार्य में नियुक्ति किस कारण से प्रतिबंधित रखी गई थी, क्या विश्वविद्यालय के उद्देश्य और संकाय की स्थापना के उद्देश्य को पढ़ने के बाद इसमें कोई शंका शेष रह जाती है? इस सन्दर्भ में 1919 में उठे एक विवाद का सन्दर्भ देखना समीचीन है। 7 मार्च 1919 को धर्मविज्ञान संकाय द्वारा संकाय में अध्यापकों की नियुक्ति के सन्दर्भ में पारित प्रस्ताव में कहा गया था कि- केवल प्राचीन परंपरा से सदाचार और धार्मिक नियमों का पालन करने वाले आचार निष्ठ ब्राह्मण ही धर्म की शिक्षा देने के लिए संकाय में नियुक्त किए जा सकते हैं।”
“धर्म विज्ञान संकाय के उपर्युक्त प्रस्ताव के विरुद्ध डॉ. भगवान दास एवं स्वयं महामना मालवीय जी ने प्रश्न उठाया कि योग्य गैर ब्राह्मण हिन्दू भी अगर उपलब्ध होते हैं तो उन्हें धार्मिक शिक्षा से जोड़ा जाना चाहिए। इस प्रकार 14 दिसंबर 1921 को बीएचयू कोर्ट के द्वारा संकल्प पारित किया गया कि धर्मविज्ञान संकाय में अध्यापकों की नियुक्ति हिन्दू धर्म में से उदारतापूर्वक (आचारनिष्ठ ब्राह्मण के साथ आचारनिष्ठ गैर ब्राह्मण हिन्दू समुदाय में से भी) मानव धर्मशास्त्र के अनुसार, बिना किसी समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचाए की जाएगी।”
“इस प्रकार से धर्मविज्ञान संकाय में प्रवेश, नियुक्ति एवं अध्ययन की पाठ्य सामग्री हेतु विश्वविद्यालय ने ऑर्डिनेंस पारित किया जिसका उल्लेख आजतक सभी संशोधित बीएचयू एक्ट में सम्मिलित है। प्रश्न है कि उक्त ऑर्डिनेंस की पूरे सत्य स्वरूप में सभी के सामने रखने के बजाए बीएचयू के कुलपति राकेश भटनागर यूजीसी आदि के सर्कुलर का हवाला देकर देश को भ्रमित कर रहे हैं। जबकि सच्चाई यही है कि धर्मविज्ञान संकाय के मामले में संसद द्वारा पारित बीएचयू एक्ट के अनुच्छेद चार में उल्लिखित धार्मिक शिक्षा यानी religious instruction ही वास्तविक विधि है जिसके द्वारा गैर हिन्दू शिक्षक की धर्मविज्ञान संकाय में नियुक्ति प्रतिबंधित है क्योंकि अनुच्छेद चार के द्वारा धार्मिक शिक्षा का क्षेत्र सभी मत-मजहबों के लिए अधिकृत नहीं है।”
“स्पष्ट है कि यह विधिमान्य नियम परंपरा के रूप में चला आ रहा है कि संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के शिक्षकों की नियुक्ति में गैर-हिन्दू हिन्दू यूनिवर्सिटी सोसायटी एवं बीएचयू एक्ट-1915 के प्रावधानों के कारण नियमतः अवसर नहीं पा सकते। ये नियम आज भी अस्तित्व में हैं और बीएचयू के सभी संशोधित एक्ट में इनकी उपस्थिति का संकेत सीधे तौर पर अनुच्छेद चार में किया गया है। यह अवश्य है कि बीएचयू एक्ट के अन्तर्गत गैरहिन्दू अध्यापक संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय छोड़कर कला संकाय, आयुर्वेद संकाय, संगीत संकाय समेत अन्य दूसरे संकायों और महाविद्यालयों के संस्कृत से जुड़े विभाग में अध्ययन-अध्यापन कर सकते हैं।”
संस्कृत विद्या धर्म संकाय के बाहर डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध कर रहे धरनारत छात्रों ने BHU प्रशासन एवं कुलपति राकेश भटनागर से इन प्रमाणों के मद्देनजर कुछ और महत्वपूर्ण सवाल पूछे हैं, जिनका जवाब उन्हें प्रशासन से चाहिए।
SVDV के छात्रों का कुलपति से सवाल
बीएचयू प्रशासन को यदि यह तथ्य अभी भी नहीं स्वीकार हैं तो उसे स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर बीएचयू एक्ट-1951 एवं सभी संशोधित अधिनियमों के अन्तर्गत उल्लिखित ‘धार्मिक शिक्षा’ का स्वरूप क्या है?
एक्ट में उल्लिखित ‘धार्मिक शिक्षा’ का ‘ऑर्डिनेंस’ अथवा पूर्वादेश या नियम बीएचयू में कहाँ किस संकाय के तत्वावधान में क्रियान्वित किया जा रहा है?
कौन क्रियान्वित कर रहा है?
कहाँ और किस प्रकार से क्रियान्वित कर रहा है?
किसे ‘धार्मिक शिक्षा’ बीएचयू में आज भी दी जा रही है?
किसके द्वारा दी जा रही है?
कब से दी जा रही है?
नहीं दी जा रही है तो क्यों नहीं दी जा रही है?
कुलपति और बीएचयू प्रशासन बताए कि बीएचयू की स्थापना के उद्देश्यों की प्रथम पंक्ति के प्रथम वाक्यांश में उल्लिखित हिन्दू शास्त्रों की उन्नति, हिन्दू विचार और संस्कृति के संरक्षण के उद्देश्य का परिपालन परिसर में किस रूप में और कहाँ पर किया जा रहा है?
अगर संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय ‘धार्मिक शिक्षा’ के नियम के अन्तर्गत नहीं आता है तो बीएचयू का कौन सा संकाय या विभाग ‘धार्मिक शिक्षा’ के नियम के दायरे में आता है?
अगर कोई भी संकाय या विभाग ‘धार्मिक शिक्षा’ के नियम के दायरे में नहीं आता है तो फिर धार्मिक शिक्षा दिए जाने का उल्लेख बीएचयू एक्ट में आज भी क्यों उल्लिखित है?
गौरतलब है कि इससे पहले डॉ. फिरोज खान की SVDV में नियुक्ति में गड़बड़ी और BHU प्रशासन और कुलपति राकेश भटनागर, साहित्य विभाग के विभागाध्यक्ष उमाकांत चतुर्वेदी द्वारा नियुक्ति में की गई लापरवाही सहित धाँधली तक जैसे कई आरोपों के विरोध में 7 से 21 नवंबर तक पहले भी कुलपति आवास के सामने छात्र धरने पर बैठे थे। छात्रों से धरना समाप्त करने के अनुरोध के साथ प्रशासन ने उनकी माँगों पर दस दिन के भीतर जवाब देने की लिखित सहमति दी थी।
30 नवंबर को दस दिन बीतने के बाद सोमवार (दिसंबर 2, 2019) को साहित्य विभाग के विभागाध्यक्ष ने जो अधूरा जवाब दिया था, उससे छात्र सहमत नहीं हुए, और विरोध में पुनः धरने पर बैठ गए। BHU प्रशासन के बिना किसी प्रमाण के आधेअधूरे जवाब से असंतुष्ट हैं और प्रशासन से कई काउंटर प्रश्न कर चुके हैं। SVDV संकाय में पठन-पाठन पहले से ही बंद है। साथ ही छात्रों ने 5 दिसंबर से होने वाली परीक्षा का बहिष्कार करने की भी चेतावनी दी है, जिसके मद्देनजर अभी परीक्षा की नई तिथि 10 दिसंबर कर दी गई है।
#SVDV के छात्रों को #BHU प्रशासन ने दिया बिना प्रमाण के जवाब, असंतुष्ट छात्रों ने उठाए कई गंभीर सवाल, परीक्षा के बहिष्कार के साथ अनिश्चित काल तक आन्दोलन जारी रखने पर अड़े धरनारत छात्र….#Ferojkhanpic.twitter.com/rnUDRB9zWm
जब ऑपइंडिया ने छात्रों से इस नए परीक्षा की तिथि पर बात की तो छात्रों की तरफ से शशिकांत मिश्र ने बताया, “यदि BHU प्रशासन इस समस्या का उपरोक्त वर्णित प्रमाणों, BHU एक्ट, मालवीय जी के मूल्यों, संकाय के उद्देश्यों के अनरूप कोई समाधान नहीं निकालता है तो हम सभी छात्र इस परीक्षा की तिथि का भी बहिष्कार करने पर अडिग हैं। हमारा धरना इस बार किसी आश्वासन पर नहीं बल्कि इस समस्या के पूर्ण समाधान के साथ ख़त्म होगा।”
पाकिस्तान की महिलाओं को खरीद कर चीन के लोग अपने घर ले जा रहे हैं। पाकिस्तानी महिलाओं को बेचने का धंधा बड़े पैमाने पर हो रहा है। पाकिस्तान के अधिकतर इलाके गरीब हैं। वहॉं के लोग आर्थिक और सामाजिक तौर पर पिछड़े हैं। इसका फायदा उठाकर ह्यूमन ट्रैफिकिंग नेटवर्क ने जाल बिछा लिया है। ‘एसोसिएट प्रेस’ के आँकड़ों के अनुसार, 2018 से अब तक 629 पाकिस्तानी महिलाओं को बेचा जा चुका है। पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसियों को इसकी जानकारी होने के बावजूद कार्रवाई नहीं की जा रही है।
पाकिस्तान के एक ख़ुफ़िया अधिकारी ने बताया कि चीन को ख़ुश रखने के चक्कर में पाकिस्तान सरकार देह व्यापार के इस धंधे पर कार्रवाई करने के लिए हरी झंडी नहीं दिखा रही है। इन देह व्यापारियों के ख़िलाफ़ अदालत में मामला दर्ज कराया गया था। कुल 31 चीनी नागरिकों के ख़िलाफ़ सुनवाई चल रही थी। अदालत ने सभी चीनी नागरिकों को बाइज्जत बरी कर दिया। पीड़ित महिलाओं ने बयान देने से इनकार कर दिया, क्योंकि या तो उन्हें प्रलोभन दिया गया था या फिर उन्हें डराया-धमकाया गया। इन महिलाओं को दुल्हन बना कर चीन ले जाया जाता है, लेकिन वहाँ जाकर इनका सामना क्रूर हकीकत से होता है।
2 पीड़ित महिलाओं ने पहचान न उजागर करने की शर्त पर ‘एसोसिएट प्रेस’ को बताया कि ह्यूमन ट्रैफिकिंग करने वालों के ख़िलाफ़ बयान देने पर उनका बहुत बुरा अंजाम होता, इसीलिए वो हिम्मत नहीं जुटा पाईं। एक ईसाई एक्टिविस्ट ने कई पाकिस्तानी महिलाओं को चीन के लोगों को बेचे जाने के ख़िलाफ़ अभियान चलाया। इस मामले की जाँच कर रहे कई ख़ुफ़िया अधिकारियों का तबादला कर दिया गया और पाकिस्तान की सरकार ने इसके पीछे कोई कारण भी नहीं बताया। पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय ने इस मामले पर टिप्पणी करने से इनकार कर दिया है। न सिर्फ़ ख़ुफ़िया अधिकारियों पर शिकंजा कसा गया है, बल्कि मीडिया को भी ह्यूमन ट्रैफिकिंग व इससे जुड़े लोगों के बारे में लिखने से मना कर दिया गया है।
पाकिस्तान के ही अधिकारी मानते हैं कि वहाँ ह्यूमन ट्रैफिकिंग का नेटवर्क लगातार फैलता जा रहा है और इस पर कोई एक्शन नहीं लिया जा रहा। इसके लिए झूठी शादी का सहारा लेकर ग़रीब परिवारों को झाँसा दिया जाता है। अधिकारियों व पुलिस पर दबाव बनाया जा रहा है कि वो ह्यूमन ट्रैफिकिंग से जुड़े अपराधों की जाँच न करें। चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि वो दोनों देशों के नियमों का पालन करते हुए पाकिस्तान और चीन के बीच होने वाली शादियों का ‘हैप्पी फैमिली फॉर्मेशन’ के अंतर्गत समर्थन करता है। साथ ही मंत्रालय ने जोड़ा कि अवैध शादियों के ख़िलाफ़ चीन ने कड़ा रुख अपनाया हुआ है।
इससे पहले ख़बर आई थी कि देह-व्यापार के इस धंधे में सबसे ज्यादा पाकिस्तान की ईसाई लड़कियों को शिकार बनाया जा रहा है। ग़रीब ईसाई परिवार की महिलाओं को चीनी नागरिकों के हाथों बेच दिया जाता है और वो उन्हें अपने देश ले जाते हैं। चीनी नागरिक इन ईसाई महिलाओं के साथ शादी करते हैं और चीन ले जाकर उन्हें वेश्यावृत्ति में ढकेल देते हैं। ह्यूमन ट्रैफिकिंग के दलाल चीनी नागरिकों से तो 50 लाख रुपए तक वसूल लेते हैं लेकिन पाकिस्तान परिवारों को इसका मात्र 20-25% ही दिया जाता है।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान के पास 50 से भी अधिक ऐसी महिलाओं की सूची भेजी गई है, जिन्हें चीनियों के हाथों बेच डाला गया। पाकिस्तान को चीन से हर साल मदद के रूप में अरबों रुपए मिल रहे हैं। चीन ने अपने बेल्ट्स एन्ड रोड प्रोजेक्ट में भी पाकिस्तान को साझीदार बनाया हुआ है। वह पाकिस्तान के कई इलाक़ों में विकास कार्य कर रहा है। इन सबको देखते हुए पाकिस्तान अपनी महिलाओं की ख़रीद-बिक्री पर चुप रहना ही बेहतर समझ रहा है।
छत्तीसगढ़ के नारायणपुर में भारत-तिब्बत पुलिस फ़ोर्स (आईटीबीपी) के कॉन्स्टेबल रहमान खान की 5 (समाचार एजेंसी एएनआई के दावे के मुताबिक 6) साथी जवानों की हत्या के बाद आत्महत्या की खबर अपने आप में कम कष्टकारक नहीं थी। उसके ऊपर से वॉशिंगटन पोस्ट नामक अमेरिकी अख़बार ने अपनी हेडलाइन में ऐसे दिखाया कि यह आपसी झड़प में हुई हत्याएँ हैं।
Superintendent of Police Narayanpur, Mohit Garg: 6 dead and two injured in a clash amongst Indo-Tibetan Border Police (ITBP) personnel in Narayanpur, Chhattisgarh. pic.twitter.com/bodzeiNpmK
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ के नारायणपुर में तैनात आईटीबीपी की 45वीं बटालियन के कॉन्स्टेबल रहमान खान ने अपने साथी सुरक्षाकर्मियों पर फायरिंग कर दी, जिसके चलते 5 (या 6) जवानों की मौत हो गई और तीन अन्य घायल हो गए थे। घायलों को इलाज के लिए आनन-फानन में हेलीकॉप्टर से राजधानी रायपुर भेजा गया। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक सभी मृतक और घायल भी कॉन्स्टेबल रैंक के ही हैं।
Tragic news from Narayanpur in Chattisgarh. Constable Rahman Khan of 45th bn ITBP fired on fellow soldiers in which 5 soldiers have been martyred and three others have bullet injuries. Injured soldiers being rushed to Raipur in a chopper for better medical facilities.
घटना के बारे में एएनआई से बात करते हुए बस्तर के इंस्पेक्टर जनरल पी सुंदरराज ने बताया कि प्राथमिक जाँच में फायरिंग करने वाले कॉन्स्टेबल रहमान खान के मानसिक रूप से बीमार रोगी होने की बात सामने आती दिख रही है।
रक्षा क्षेत्र की खबरें कवर करने वाले पोर्टल इंडियन डिफेंस न्यूज़ ने स्थानीय पुलिस के हवाले से यह भी दावा किया है कि रहमान खान ने इस हमले में अपनी निजी बंदूक का इस्तेमाल किया था। घटना सुबह 9.30 बजे कडेनर कैम्प की बताई जा रही है। खबरों के मुताबिक बंगाल के रहने वाले रहमान ने 2009 में सुरक्षा बल में प्रवेश लिया था।
लेकिन इस खबर की रिपोर्टिंग वॉशिंगटन पोस्ट ने जिस तरीके से की है, वह अत्यंत घृणास्पद और साफ तौर पर भारत को बदनाम करने का एक प्रोपेगेंडा है। अपनी हेडलाइन को इस तरह से लिखा है कि इसे पढ़ने से ऐसा लगे मानो जवानों के दो गुटों में झड़प हो गई, वह हिंसक हो गई, दोनों ओर से फायरिंग हुई और 6 लोग मारे गए (यानी, भारतीय सुरक्षा बल बहुत ही गैर-अनुशासित हैं), जबकि सच्चाई इस हेडलाइन से कोसों दूर है।
राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (एनसीपी) प्रमुख शरद पवार ने बीते दिनों एक इंटरव्यू के दौरान दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उन्हें साथ मिलकर काम करने का ऑफर दिया था। पवार के मुताबिक महाराष्ट्र में मिलकर सरकार बनाने की सूरत में प्रधानमंत्री ने उनकी बेटी सुप्रिया सुले को केंद्रीय कैबिनेट में जगह देने की भी पेशकश की थी। बारामती से लोकसभा सांसद सुप्रिया सुले ने अब इसके लिए प्रधानमंत्री का आभार जताया है।
Nationalist Congress Party leader Supriya Sule on Ajit Pawar: He had not joined BJP. This is internal matter of our party and family. He will always remain my elder brother and senior leader of the party. https://t.co/VXX3MzV7IXpic.twitter.com/jdamrW8L8x
मंगलवार (दिसंबर 3, 2019) को सुप्रिया सुले ने कहा, “ये प्रधानमंत्री जी का बड़प्पन है कि उन्होंने ऐसा सुझाव दिया। मैं उनकी आभारी हूँ उन्होंने कहा, लेकिन वो हो नहीं पाया।” उन्होंने मीडिया से बातचीत करते हुए कहा, “मैं उस चर्चा (NCP अध्यक्ष शरद पवार और मोदी के बीच) में नहीं थी। मुझमें ऐसा भरोसा और विश्वास जताने के लिए मैं प्रधानमंत्री को अपने दिल की गहराइयों से शुक्रिया अदा करती हूँ। उन्होंने जो कुछ कहा, उससे मैं अभिभूत हूँ। लेकिन पवार ने स्पष्ट रूप से बेहद विनम्रतापूर्वक प्रधानमंत्री को बता दिया कि यह संभव नहीं है।”
वहीं पवार ने इंटरव्यू के दौरान राष्ट्रहित पर पीएम मोदी के साथ होने की बात कही। उन्होंने पीएम मोदी की तरफ इशारा करते हुए कहा, “हमारे उनके साथ कल भी रिश्ते अच्छे थे। आज भी हैं और आगे भी रहेंगे। जब तक वे देश के हित की बात करेंगे, भलाई की बात करेंगे, तो राजनीति में इसका विरोध करने की कोई आवश्यकता नहीं है। राजनीतिक मुद्दों पर जो असहमति रहती है वो रहेगी। इसमें कोई बदलाव नहीं आएगा। लेकिन जब बात राष्ट्रीय हित की होगी, तो मेरा सहयोग उनके साथ रहेगा। इसमें कोई दोराय नहीं है।”
गौरतलब है कि एनसीपी, कॉन्ग्रेस और शिवसेना में महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए चल रही बातचीत के बीच पिछले महीने पवार ने प्रधानमंत्री से मुलाकात की थी। बाद में उनके भतीजे अजित ने पार्टी निर्देश से इतर जाते हुए बीजेपी से हाथ मिला लिया था। अजित पवार ने 23 नवंबर को महाराष्ट्र के उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। हालाँकि बाद में उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया और फिर पार्टी में वापस लौट आए।
इसके बाद महाराष्ट्र में शिवसेना-कॉन्ग्रेस-एनसीपी की सरकार बन गई। नई सरकार में अजित पवार की भूमिका के बारे में पूछे जाने पर सुप्रिया ने कहा कि वह एनसीपी के वरिष्ठ नेता हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि अजित पवार बीजेपी में शामिल नहीं हुए थे। सुप्रिया ने कहा, “यह हमारी पार्टी और परिवार का आंतरिक मामला है। वह (अजित पवार) मेरे बड़े भाई और हमेशा एनसीपी के वरिष्ठ नेता बने रहेंगे।”
हैदराबाद में 26 वर्षीय पशु चिकित्सक की गैंगरेप और हत्या के बाद अब ऐसा ही मामला तेलंगाना के आदिलाबाद जिले से सामने आया है। यह घटना रामन्यकतंडा और एलापट्टर गाँव के बीच हुई। 25 नवंबर को इसी क्षेत्र में पुलिस को एक महिला की लाश मिली। उसके साथ गैंगरेप हुआ था। सामूहिक बलात्कार के बाद दरिंदों ने उसे मार डाला।
30 वर्षीय पीड़िता निर्मल के खानपुर की रहने वाली थी और काफ़ी गरीब थी। वह गुब्बारे बेच कर अपना गुजारा किया करती थी। वह आसपास के कई गाँवों में गुब्बारे बेच कर अपना गुजर-बसर करती थी। उसके पति भी बैलून बेचने का ही काम किया करते थे। घटना के दिन उसके पति ने उसे गाँव तक छोड़ा था और दोनों अलग-अलग गाँवों में गुब्बारे बेचने चले गए थे।
पुलिस के अनुसार, रविवार (नवंबर 24, 2019) को जब उसका पति वापस आया तो उसने पाया कि महिला गायब है। उसके पति ने आसपास के गाँवों में भी खोज-खबर ली, लेकिन कहीं भी उसका पता नहीं चला। रिश्तेदारों को भी उसके बारे में कुछ नहीं पता था। हार कर उसने लिंगापुर पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई। बाद में पुलिस को एलापट्टर गाँव में उक्त महिला की लाश मिली। इसके बाद आदिलाबाद एक्स रोड से पुलिस ने तीन को धर-दबोचा।
Woman hawker allegedly gangraped and murdered in Telangana’s Asifabad.
She had made a living by selling balloons and other supplies in the neighbouring villages of Lingapur and Jainoor mandals.
शेख बाबू, शेख सहाबुद्दीन और शेख मकदूम को पुलिस ने गिरफ़्तार किया। तीनों ने पुलिस के समक्ष अपना गुनाह कबूल कर लिया है। आरोपितों ने बताया कि उन्होंने पीड़िता के साथ सामूहिक बलात्कार करने के बाद उसकी हत्या कर दी। तीनों आरोपितों को न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया है। उन पर बलात्कार, हत्या और एससी-एससी एक्ट के तहत मामला चलाया जाएगा। आरोपितों ने पीड़िता का बलात्कार तब किया, जब वह गाँव के एक सुनसान इलाक़े से अकेली गुजर रही थी।
पुलिस ने घटनास्थल से सबूतों को हैदराबाद फॉरेंसिक लैब में जाँच के लिए भेजा है। असिफाबाद के डिप्टी एसपी इस केस की मॉनिटरिंग कर रहे हैं। जैनूर और लिंगापुर इलाक़े में दलित और आदवासी समूहों ने इस गैंगरेप व हत्याकांड के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया। परिजनों ने आरोप लगाया है कि किसी भी नेता ने अब तक उनकी सुध नहीं ली है।
केंद्र की मोदी सरकार ने नागरिकता विधेयक में संशोधन का मसौदा कैबिनेट में पास कर दिया है। इस बिल के अगले सप्ताह संसद में पेश किए जाने की उम्मीद है। इस बिल के प्रावधानों के मुताबिक भारत के तीन सबसे कट्टर रूप से मज़हबी पड़ोसी देशों पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान और बांग्लादेश के मज़हबी रूप से अल्पसंख्यक समुदाय के प्रताड़ित लोगों को भारत की नागरिकता के लिए योग्य घोषित किया गया है। इसमें केवल हिन्दू धर्म ही नहीं, जैन, बौद्ध, सिख धर्म और ईसाई व अन्य पंथिक समुदाय के भी लोग शामिल हैं। यह बिल पिछली बार भी लोकसभा में लाया गया था, लेकिन इसके राज्यसभा में पास होने से पहले ही आम चुनावों के लिए निचले सदन को भंग कर दिया गया था।
Union Cabinet has cleared the Citizenship Amendment Bill, 2019 Read here: https://t.co/ivGQuLNLdz
सोशल मीडिया पर बहुत से लोगों ने इसका स्वागत भी किया है, जिसमें स्वराज्य पत्रिका के सीईओ प्रसन्ना विश्वनाथन भी शामिल हैं। उन्होंने इस अधिनियम को शरणार्थी हिन्दुओं के लिए बड़ी राहत बताया है।
वहीं उनकी पार्टी की एक अन्य नेत्री शमा मोहम्मद ने इसे भारतीय संविधान के खिलाफ बताया है।
–@AmitShah has said- every illegal immigrant apart from Muslims will be granted citizenship.@DrSJaishankar has conveyed 2 Bangladesh that no immigrant will be deported there. So will Muslims be banished to No-Man’s Land? This is against our Constitution!#CitizenshipAmendmentBill
स्वराज्य के सम्पादक राघवन जगन्नाथन ने इस बिल के विरोधियों पर करारा प्रहार किया है। स्वराज्य के अपने कॉलम में उन्होंने इसे इन देशों के प्रताड़ित हिन्दुओं के खिलाफ साज़िश करार दिया है। उनके मुताबिक यह पहले से ही प्रताड़ित और अपमानित हिन्दू शरणार्थियों को दोबारा परेशान करने की कोशिश है।
उनके लेख को ट्विटर पर साझा करते हुए प्रसन्ना विश्वनाथन ने भी भारतीय सेक्युलरिज़्म को हिन्दूफ़ोबिया से भरा हुआ करार दिया है।
‘Secular’ parties who want the CAB to be junked are essentially asking that Hindus should be persecuted twice or thrice over by insisting that illegal Muslim migrants must also get the same rights to citizenship. This is how Hinduphobic our ‘secularism’ is https://t.co/XXj0KazoJW
गुजरात में ‘पठानी’ सूट पहनने की ‘जुर्रत’ करने पर दलित की पिटाई का मामला सामने आया है। जानकारी के मुताबिक राजकोट के कच्छ जिले के गाँधीधाम शहर में एक दलित की पिटाई सिर्फ इसलिए कर दी, क्योंकि उसने पठानी सूट पहना था।
पुलिस ने इस मामले में कार्रवाई करते हुए मंगलवार (दिसंबर 3, 2019) को 27 वर्षीय जयंत भाटी की पिटाई करने के आरोप में अमजद पठान और अजगर पठान के खिलाफ मामला दर्ज किया है। बता दें कि आरोपित अमजद पठान और अजगर पठान ने 26 नवंबर को गाँधीधाम के ग्रीन पैलेस होटल के पास जयंत भाटी की पिटाई की थी। जयंत पेशे से ड्राइवर है।
टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, घटना वाले दिन जयंत भाटी होटल के पास चाय पी रहा था, तभी आरोपित अमजद पठान और अजगर पठान मोटरसाइकल से वहाँ आए और उसके साथ बहस करने लगे। इस दौरान आरोपितों ने उसके ‘पठानी’ सूट पहनने पर आपत्ति जताई। इसके बाद बहस और बढ़ गई। तभी एक आरोपित ने भाटी के पठानी सूट को पीछे से उठाते हुए उसके चेहरे को ढँक दिया और फिर बुरी तरह से उसकी पिटाई कर दी।
इतना ही नहीं, पिटाई करने के बाद दोनों ने दलित को धमकी देते हुए कहा कि वो नीची जाति से है, इसलिए उसे पठानी सूट पहनने का कोई अधिकार नहीं है। अगर उसने दोबारा से पठानी सूट पहना तो वे उसे जान से मार देंगे।
इस घटना के बाद भाटी ने उसी दिन गाँधीधाम के ए डिवीजन पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई और फिर जॉब पर चला गया। उसके लौटने के बाद आरोपित के खिलाफ एससी/एसटी एक्ट, हमला और आपराधिक धमकी के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई। फिलहाल दोनों आरोपितों का गिरफ्तार होना बाकी है।
लोकसभा में जब कॉन्ग्रेस संसदीय दल के नेता भारत-चीन सीमा विवाद को लेकर बोल रहे थे, तब उनकी पार्टी के मुखिया रहे राहुल गाँधी सदन में सोते हुए नज़र आए। अधीर रंजन चौधरी के सम्बोधन के दौरान पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी काफी देर तक सोते हुए दिखे। उस समय लोकसभाध्यक्ष ओम बिरला चेयर पर मौजूद थे। नीचे संग्लन की गई तस्वीरों में आप देख सकते हैं कि कैसे सदन की कार्यवाही के दौरान राहुल सोते दिखे:
राहुल गाँधी केरल के वायनाड से सांसद हैं। उन्होंने इस वर्ष 2 सीटों से लोकसभा चुनाव लड़ा था लेकिन उन्हें अपने पारम्परिक गढ़ अमेठी से स्मृति ईरानी के हाथों हार का समाना करना पड़ा। राहुल गाँधी कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष रहे हैं और उनकी माँ सोनिया गाँधी पार्टी की अंतरिम अध्यक्ष हैं। ऐसे में, अपनी ही पार्टी के नेता के सम्बोधन के दौरान सदन में नींद लेने के कारण सोशल मीडिया पर राहुल गाँधी की ख़ासी आलोचना हुई। कई लोगों ने उनका मज़ाक भी बनाया।
ऊपर संलग्न किए गए वीडियो में साफ-साफ़ दिख रहा है कि अधीर रंजन के भाषण के दौरान राहुल गाँधी काफ़ी देर तक सोते रहे। जब अधीर रंजन चौधरी ने अपना सम्बोधन शुरू किया, तभी राहुल झपकी लेने लगे और काफ़ी देर बार उनकी तन्द्रा टूटी।
पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) के गिलगिट-बाल्टिस्तान इलाके में छात्रों ने इमरान सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। कराकोरम इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के छात्रों ने सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया है। छात्रों का आरोप है कि इमरान खान की सरकार उन्हें उच्च शिक्षा प्राप्त करने से वंचित कर रही है।
समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, प्रदर्शन कर रहे छात्र यूनियन के एक नेता ने कहा, “पाकिस्तान हमारे युवाओं के साथ खिलवाड़ कर रहा है। वह उन्हें गुलाम बनाना चाहता है। वह मानसिक तौर पर कमजोर लोग चाहता है। मैं कराकोरम यूनिवर्सिटी से यह बताने आया हूँ कि वे NSF (National Student Federation) को सरकार विरोधी तत्व करार देने की फिराक में हैं। छात्र सहमे हुए हैं क्योंकि उन्हें डर है कि विरोध-प्रदर्शन में शामिल होने का उन्हें खामियाजा भुगतना पड़ेगा।”
Pakistan Occupied Kashmir (PoK): Students of Karakoram University in Gilgit-Baltistan protest against Pakistan for systematically depriving them of higher education. (3.12.19) pic.twitter.com/Cpiu8nysJa
प्रदर्शन कर रहे एक अन्य छात्र ने कहा कि इस क्षेत्र में सिर्फ एक यूनिवर्सिटी है। शिक्षा के मामले में गिलगिट-बाल्टिस्तान काफी पिछड़ा हुआ है। उसका कहना है कि इस क्षेत्र के कई शिक्षित युवाओं को रावलपिंडी और इस्लामाबाद में विश्वविद्यालयों में दाखिला लेने का मौका भी नहीं दिया गया है। ऐसी स्थिति में यहाँ के छात्रों को मजबूरन प्रोफेशनल कोर्सेस की जगह सामान्य कोर्स करना पड़ता है। उसने माँग की है कि यहाँ कम से कम एक मेडिकल और एक इंजीनियरिंग कॉलेज खोला जाए।
बता दें कि 30 लाख से ज्यादा आबादी वाले गिलगिट-बाल्टिस्तान क्षेत्र में सिर्फ एक यूनिवर्सिटी है। इस इकलौती यूनिवर्सिटी में भी प्रोफेसर्स की भारी कमी है। इस यूनिवर्सिटी में ना तो कोई प्रोफेशनल प्रोग्राम चलता है और ना ही प्रोफेसरों की पर्याप्त संख्या है। ऐसी स्थिति में छात्रों के पास इंजीनियरिंग और मेडिकल समेत तमाम प्रोफेशनल प्रोग्राम की पढ़ाई के लिए पाकिस्तान के अन्य शहरों में जाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है।
गौरतलब है कि गिलगिट-बाल्टिस्तान समेत गुलाम कश्मीर में रहने वाले लोगों के साथ शिक्षा से लेकर हर क्षेत्र में बड़े पैमाने पर भेदभाव किया जाता है। इन लोगों को नागरिक अधिकारों से लेकर, समानता और मताधिकार तक की आजादी नहीं है।