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बहू निमिषा के साथ केरल वापस आ रहा है IS आतंकी बेटा: सुरक्षा एजेंसियाँ सतर्क

पिछले दिनों अफ़ग़ानिस्तान में 900 इस्लामिक स्टेट (दाएश) के लड़ाकों ने सुरक्षा बलों के आगे हथियार डाल दिए थे। उनमें से 10 न केवल भारत के निकले, बल्कि भारत में भी अधिकाँश का कनेक्शन केरल से निकला। उन्हीं में से एक बेक्सन की ईसाई माँ और हिन्दू सास ने उसके जिन्दा होने पर ईश्वर का धन्यवाद करते हुए राहत की साँस ली है। समाचार पोर्टल The Week से बात करते हुए उन दोनों ने बेक्सन और उसकी पूर्व-हिन्दू पत्नी निमिषा के जिहाद छोड़ने पर ख़ुशी जताई है

जिहादी बेक्सन की माँ ग्रेसी पलक्कड़ की रहने वालीं हैं। उन्होंने बताया कि उनके बेटे बेक्सन व उसके भाई बेस्टिन ने 2016 में इस्लामिक स्टेट का दामन पकड़ा लिया था और देश छोड़ कर जिहाद के लिए चले गए थे। साथ में दोनों ने अपनी-अपनी पत्नियों, क्रमशः निमिषा (तिरुवनंतपुरम की हिन्दू) और मेर्रिन, को भी इस्लाम कबूल कराया था ताकि वे चारों साथ-साथ जिहाद करने जा सकें।

ग्रेसी ने उक्त साक्षात्कार में यह भी बताया कि उनका दूसरा बेटा बेस्टिन, जो बेक्सन से छोटा था, पिछले साल मारा गया था। इसके बाद ईसाई से जिहादी बनी मेर्रिन ने दूसरा निकाह पढ़ लिया था। उन्हें बेस्टिन की मौत की खबर अख़बारों में मिली थी। इसी संदर्भ में उन्होंने यह भी बताया कि उनकी बेटे बेक्सन से बात होती ही रहती थी, क्योंकि उन्होंने बेस्टिन की मौत की बात की पुष्टि बेक्सन से ही की थी।

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बाएँ- जिहादी निमिषा की हिन्दू माँ बिंदु, दाहिने- बेक्सन की माँ ग्रेसी (The Week से साभार)

ग्रेसी का कहना है कि उन्हें बेटे बेक्सन और बहू निमिषा के इस्लामी बने रहने से कोई दिक्कत नहीं है, बशर्ते वे शांतिपूर्वक उनके सामने रहें।

निमिषा की माँ बिंदु ने भी दोनों को पहचाना और बताया कि पुलिस बेस्टिन और उसके साथ एक बुर्के वाली औरत व उनकी नातिन उम्मुकुलसु (बेस्टिन-निमिषा की बेटी) की फ़ोटो उन्हें दिखाने लाई थी। उन्होंने बताया कि जब वह जिहाद करने निकली, तब निमिषा नौ महीने के गर्भ से थी- यानी किसी भी दिन माँ बन सकती थी। वे अब जाकर उम्मुकुलसु को देख पाएँगी, जिसके नाम पर अब तक उन्होंने फ़्रॉक केवल खरीद कर रखे हुए थे। बिंदु ने यह भी बताया कि जिहाद के लिए निकलने के पहले बेस्टिन और निमिषा उनसे मिलने भी आए थे- लेकिन उस समय यह झूठ बोलकर विदा ली कि किसी काम से श्री लंका जा रहे हैं।

जहाँ दोनों के परिवार वाले उनकी ‘घर वापसी’ से बहुत खुश हैं, वहीं सुरक्षा एजेंसियाँ सशंकित हैं। एक एनआईए अधिकारी ने The Week को बताया कि उन्हें शक है यह हृदय-परिवर्तन, हथियार डालना आदि ढोंग भी हो सकता है। ऐसा बहुत संभव है कि बेस्टीन और निमिषा की असली योजना केरल लौटकर और जिहादियों को रिक्रूट करने की हो।

गौरतलब है कि अमेरिकी-नाटो, इज़राइली और रूसी सेनाओं की मार से इस्लामिक स्टेट को बहुत क्षति पहुँची है- उसका बेस ईराक और सीरिया में उसके अधिकांश शीर्ष लड़ाके या तो मारे गए थे या गिरफ्तार हो गए थे। इसके बाद उसने एक ओर तो ‘लोन वुल्फ’ के रूप में काम करने के लिए बचे-खुचे जिहादियों को बिखेर दिया, और दूसरी ओर अपना बेस अफ़ग़ानिस्तान में बनाने की कोशिश करने लगा। इसके बारे में ईरान ने पिछले दिनों भारत को चेताया भी था।

हमें पाँच एकड़ अलॉट कीजिए, हम बनाएँगे अस्पताल: शिया वक्फ बोर्ड

अयोध्या में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मस्जिद के लिए निर्धारित पाँच एकड़ ज़मीन न लेने के सुन्नी वक्फ बोर्ड के बयान पर शिया वक्फ बोर्ड ने कहा है कि ज़मीन कोर्ट उन्हें (शिया वक्फ बोर्ड को) अलॉट कर दें। इस जगह पर वह अस्पताल बनवा देंगे। एक रिपोर्ट के मुताबिक इस मामले में बोलते हुए शिया वक्फ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिज़वी ने कहा कि पाँच एकड़ की इस ज़मीन पर शिया वक्फ बोर्ड एक अस्पताल बनवाएगा जिसमें कि सभी धर्म के लोगों का इलाज मुफ्त में किया जाएगा। रिज़वी ने आगे कहा कि आज हुई बोर्ड की मीटिंग में यह तय किया गया है कि शिया वक्फ बोर्ड अयोध्या मामले में पुनर्विचार याचिका दायर नहीं करेगा।

अपने एक बयान में उन्होंने कहा कि, “शिया वक्फ बोर्ड का मानना है कि लम्बे समय से चले आ रहे इस विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला आया है वह देशहित में है, इसीलिए इस मामले में अब पुनर्विचार याचिका डालकर हम इसे और बढ़ाना नहीं चाहते।” उन्होंने आगे कहा कि शिया वक्फ बोर्ड ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के फैसले से बिलकुल इत्तेफाक नहीं रखता, न ही वह एआईएमपीएलबी का हिस्सा है। रिज़वी ने यह भी कहा कि देशभर में उनके मजहब के लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया है।

वहीं दूसरी ओर मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने जन्मभूमि केस में पुनर्विचार याचिका दाखिल करने का फैसला किया है। बता दें कि 9 नवम्बर को सुप्रीम कोर्ट ने लम्बे समय से चले आ रहे अयोध्या विवाद पर अपना फैसला सुना दिया था। कोर्ट ने अपने इस फैसले में विवादित भूमि पर राम मंदिर निर्माण के लिए हिन्दुओं के पक्ष को सही ठहराया था वहीं मुसलामान पक्ष को धर्मनगरी अयोध्या में मस्जिद बनाने के लिए अलग से पाँच एकड़ ज़मीन देने की बात अपने फैसले में कही थी।

सिंधिया ने पार्टी बनाई तो मैं पहला सदस्य: कॉन्ग्रेस के वफ़ादार रहे विधायक ने बढ़ाई मुश्किलें

ऐसा लग रहा है कि देश की सत्ता पर सबसे ज़्यादा समय तक काबिज रही कॉन्ग्रेस के बुरे दिन खत्म होने का नाम नहीं ले रहे हैं। एक ओर शरद पवार के ताज़ा दाँव से महाराष्ट्र में उसे मुफ्त में मिलने जा रही सत्ता की मलाई एक बार फिर छटकती दिख रही है, दूसरी ओर उसके अंतिम गढ़ों में से एक मध्य प्रदेश और अधिक दरक रहा है।

मुख्यमंत्री कमलनाथ और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी में प्रभुसत्ता के लिए चुनौती होने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया के पक्ष में आवाज़ें मुखर होने लगीं हैं। सिंधिया के पार्टी छोड़ने की अटकलों के बीच कॉन्ग्रेस के पुराने और निष्ठावान विधायक माने जाने वाले सुरेश राठखेड़ा ने ऐलान किया है कि अगर सिंधिया राजवंश के वारिस और गुना के ‘महाराज’ माने जाने वाले पूर्व सांसद ने पार्टी बनाई तो वे (राठखेड़ा) उस पार्टी के पहले सदस्य बनेंगे

हालाँकि, राठखेड़ा ने साथ में यह भी कहा कि ऐसी नौबत नहीं आनी है कि “श्रीमंत महाराज साहब” अपनी एक अलग पार्टी बनाएँ क्योंकि वे कॉन्ग्रेस छोड़ने ही नहीं वाले, लेकिन उनके बयान को मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस में गहराती अंतर्कलह और प्रदेश अध्यक्ष-सीएम की दोहरी कुर्सी पर काबिज़ कमलनाथ को घेरने की सिंधिया गुट की कोशिशों से ही जोड़ कर देखा जा रहा है। राठखेड़ा ने यह भी कहा कि पार्टी के लचर संगठन को ताकत देने के लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे नेतृत्व की जरूरत है

कुछ दिन पहले सिंधिया के यकायक अपने ट्विटर बायो में से कॉन्ग्रेस का नाम हटा लेने से सुगबुगाहट फ़ैल गई थी कि वे जल्दी ही अपने परिवार की पारम्परिक पार्टी को अलविदा कह सकते हैं। इसके पीछे कारण यह बताया जा रहा था कि कमलनाथ-दिग्विजय सिंधिया को प्रदेश अध्यक्ष बनने से रोक रहे हैं, और उनकी बजाय मरहूम कॉन्ग्रेस नेता अर्जुन सिंह के बेटे अजय सिंह के नाम की सिफारिश आलाकमान से कर रहे हैं।

गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में गुना ही नहीं, ग्वालियर, चंबल समेत पूरे राज्य में सिंधिया राजपरिवार के लिए बहुत सम्मान है। न केवल कॉन्ग्रेस विधायकों में दो दर्जन का एक बड़ा धड़ा सिंधिया के पक्ष में है, बल्कि कमलनाथ के मंत्रिमंडल के ही 5 मंत्री सिंधिया गुट के बताए जा रहे हैं। ऐसे में सिंधिया को पार्टी छोड़ने के लिए मजबूर करना या फिर उन्हें हाशिए पर धकेलना कॉन्ग्रेस को महंगा भी पड़ सकता है।

धर्मान्तरण का ‘ईसाई’ आतंक: यूपी के मऊ में तीन पादरी गिरफ्तार, बीमारी ठीक होने के नाम पर किया सहमत

उत्तर प्रदेश के मऊ जिले में लोगों की इच्छा के विरुद्ध लालच देकर धर्म परिवर्तन करने के मामले में पुलिस ने तीन पादरियों को गिरफ्तार कर लिया है। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस इलाके में बहला-फुसलाकर धर्म परिवर्तन करने का यह काम काफी लम्बे समय चला आ रहा था। इन पादरियों पर आरोप है कि यह ग्रामीण लोगों के बीच अंध-विश्वास फ़ैलाते हुए बहला-फुसलाकर उनका धर्म-परिवर्तन करवाते थे।

घटना मंगलवार की है जहाँ मऊ के दरौरा गाँव में यह पादरी अंधविश्वास फैलाकर गाँव देहात के लोगों को ईसाई बनाने में लगे थे। विहिप कार्यकर्ताओं की सूचना पर पुलिस ने कार्रवाई करते हुए वहाँ मौजूद तीनों ईसाई प्रचारकों को गिरफ्तार कर लिया। इस दौरान उनके पास से धर्मान्तरण में प्रयुक्त होने वाली कई सामग्रियाँ भी बरामद हुईं। सरकार की सख्ती के चलते कुछ समय तक धर्मान्तरण के काम बंद थे मगर एक बार फिर धर्मंतारण की यह घटना सामने आई है।

इस मामले में पुलिस ने जिन पादरियों को गिरफ्तार किया उनके कपिलदेव राम, अजय कुमार और ओम प्रकाश हैं। इनमें कपिलदेव राम के घर मिशनरी के ईसाई धर्म प्रचारक लोगों का आना जाना हुआ करता था। उसके घर का उपयोग एक चर्च के रूप में हुआ करता था जहाँ हर रविवार को सभा प्रार्थना करने जुटते थे। मीडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए पादरी दरअसल गाँव के लोगों को गिरजाघर ले जाकर उनका धर्मांतरण करने का काम करते थे।

बता दें कि इस गाँव में मंगलवार को एक कार्यक्रम होना था जिसमें बपतिस्मा की रस्म से करीब 20 लोगों को ईसाई धर्म में धर्मान्तरित करने की योजना थी। उस दिन सुबह से कपिलदेव राम के घर पर भीड़भाड़ थी। दोपहर के वक्त जैसे ही धर्मान्तरण की प्रक्रिया शुरू हुई, तो इसकी सूचना विहिप कार्यकर्ता आशुतोष पाण्डेय को मिल गई। इसके बाद कई हिन्दूवादी संगठन इसको लेकर सक्रिय हो गए। उन्होंने धर्मान्तरण करवा रहे लोगों को धर दबोचा। फिलहाल इस मामले की जाँच में जुटी पुलिस इलाके के सभी लोगों से पूछताछ कर रही है।

एक स्थानीय निवासी के अनुसार वह अपने परिवार के एक सदस्य को लेकर बीमारी ठीक करवाने के लिए इन पादरियों की धर्मपरिवर्तन सभा में गया था। जहाँ कुछ ग्रामीणों ने उससे कहा कि धर्मपरिवर्तन के बाद एक शीशी से पवित्र जल पिलाने से उसके परिजन की बीमारी दूर हो जाएगी। उस व्यक्ति ने आगे बताया कि वहाँ पर एक धार्मिक किताब रखी थी जिसमें बीमारी ठीक करने के लिए धर्मान्तरण के कई किस्से भी लिखे हुए थे।

अत्यधिक मात्रा में संभोग, घृणा की निर्बाध खेती: वामपंथियों, लिबरलों के हर आंदोलन का एकसूत्री अजेंडा

पिछले दिनों दो-तीन आंदोलन हुए हैं, जिसमें भारत के युवाओं ने (और कुछ बुजुर्ग बच्चों ने) भाग लिया। एक आंदोलन जेएनयू में फीस वृद्धि से ले कर उनके कैम्पस में आवाजाही पर लगाए गए कुछ प्रतिबंधों पर हो रहा है। दूसरा, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में जबरदस्ती एक मजहब विशेष के शिक्षक को हिन्दू कर्मकांड, यज्ञ, अनुष्ठान आदि पढ़ाने के लिए नियुक्त करने के विरोध में संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के बच्चे कर रहे हैं। वहीं तीसरा प्रदर्शन या मार्च ‘दिल्ली क्वेयर परेड 2019’ के रूप में समलैंगिक संबंधों, सेक्सुअल ओरिएंटेशन एवम् जेंडर की भिन्न अवधारणाओं के समर्थन में किया गया।

जेएनयू और बीएचयू, दोनों ही संस्थानों के प्रदर्शन पर ऑपइंडिया ने काफी लिखा है। हाँ, लेस्बियन, गे, बायसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर, क्वेयर लोगों के मार्च पर ज्यादा नहीं लिखा गया। वैचारिक रूप से, निजी तौर पर, मैं LGBTQ समुदाय का पक्षधर रहा हूँ। कुछ लोग इसे अप्राकृतिक मान कर, इसे एक बीमारी मानते हैं, जो कि उनकी अभिव्यक्ति हो सकती है, पर मेरे विचार से यह बिलकुल प्राकृतिक है और सामान्य है।

जो चीज प्रकृति में ज्यादा नहीं दिखती, वो अप्राकृतिक नहीं हो जाती। दुनिया में लगभग दस प्रतिशत मानव बाएँ हाथ से कार्य करते हैं। घरों में ऐसे बच्चों को दाहिने हाथ से ही लिखने की आदत पकड़ाने के लिए सारे यत्न किए जाते हैं। कुछ लोग दाहिने हाथ से लिखने लगते हैं, लेकिन बाकी काम बाएँ से ही करने में सहज महसूस करते हैं।

उसी तरह कुछ लोग विपरीत लिंग के प्रति आकर्षित नहीं होते, उनकी संख्या कम है। ये उनकी पसंद है कि उन्हें विपरीत लिंग के लोगों का साथ नहीं चाहिए। चूँकि, आपके लिए सारे लोग दाहिने हाथ से ही लिखते दिखते हैं, तो फिर बाएँ वालों को आप बीमार नहीं कह सकते। ये कोई फैशन नहीं है, ये बस है, ऐसा होता है, कम होता है, लेकिन होता है। हमें स्वयं को ही परम सत्ता नहीं माननी चाहिए। दुनिया के दसियों सफल लोग समलैंगिक हैं, और वो मानव समाज के लिए प्रेरणा बन कर गए हैं।

ये मेरी निजी राय है, और आप चाहें तो इससे बिल्कुल भिन्न मत रख सकते हैं, मैं आपका सम्मान करूँगा। किसी को एक खास शारीरिक ढाँचे वाले लड़के या लड़कियाँ ही पसंद आते हैं, किसी को एक खास रंग ही पसंद आता है, कोई गाय पालता है, किसी को बिल्ली पसंद है। गाय पालने वाला यह कहने लगे कि गाय तो दूध देती है, व्यवसाय कर सकते हैं, उससे फायदा है, बिल्ली से क्या मिलता है। फिर वो बिल्ली पालने वालों को गलत निगाह से देखने लगे?

ईश्वर की सत्ता बहुत व्यापक है। इसमें इतनी विविधताएँ हैं कि मानव आज तक उसका पाँच प्रतिशत भी नहीं समझ पाया है। इसलिए इस ब्रह्मांड के एक छोटे गैलेक्सी के, एक छोटे सौर परिवार के, एक छोटे ग्रह के, एक छोटे राष्ट्र में रहने वाले एक बहुत छोटे व्यक्ति हैं हम। हमें अपनी समझ का इतना दम्भ नहीं भरना चाहिए कि हम अपने सीमित अनुभव को सार्वभौम सत्य समझ लें। दिमाग खुला रखिए तो अलग अनुभव मिलेंगे, उसे स्वीकारिए क्योंकि हमारे पास इतनी समझ और समय नहीं है कि हम स्वयं के ही अनुभव से हर बात जान लें।

अब आते हैं प्रदर्शनों पर

प्रदर्शन की आवश्यकता क्यों पड़ती है? खास कर ऐसे प्रदर्शनों की जहाँ किसी मानव की स्वच्छंदता पर सदियों से सामाजिक और दशकों का राजनैतिक पहरा रहा हो, वहाँ हमें रुक कर सोचना चाहिए। आप यह सोचिए कि कल से कोई कानून बना दिया जाए कि लड़के और लड़कियाँ, जब तक शादीशुदा न हों, कहीं भी एक साथ देखे जाने पर जेल में डाल दिए जाएँगे। फिर आपको कैसा लगेगा?

सुप्रीम कोर्ट ने समलैंगिकों के निजी संबंधों को नागरिकों के मूलभूत अधिकारों का हनन बताते हुए उसे पिछले साल गैरआपराधिक घोषित कर दिया। ये भारत सरकार के विरुद्ध केस दायर हुआ था, जो एक दशक से चल रहा था। भाजपा की सरकार थी, जिसके कई मंत्रियों ने समलैंगिक संबंधों को मुखर हो कर अप्राकृतिक माना था, उसी सरकार ने इसका विरोध नहीं किया और समानता का अधिकार इन सबको मिला।

जाहिर है कि ऐसे मौकों पर खुशी के साथ-साथ अपने भीतर के क्रोध को भी लोग अभिव्यक्त करेंगे। वो करना भी आवश्यक है वरना दबे हुए भाव आपको पागल बना सकते हैं। इस बात को ले कर दिल्ली में कुछ सालों से LGBTQ समुदाय अपनी परेड निकालती रही है। आम तौर पर यहाँ आजादी को सेलिब्रेट किया जाता है, लोगों को बताया जाता है कि आपको जागरूक होने की जरूरत है, आप आइए और हमें जानिए।

ये सामाजिक जागरूकता के लिए होता है, अपने तरह के लोगों से मिलने का समय होता है और सदियों से दबाई गई स्वतंत्रता को खुले में आजमाने जैसा होता है। आप चाहें तो इनके अस्तित्व को मानें, या नकार दें, वो आपकी मर्जी, लेकिन आपको उनसे घृणा करने का अधिकार नहीं है क्योंकि उनके होने से आपको किसी भी तरह की हानि नहीं पहुँचती।

वामपंथी जहर जब मिलता है ऐसे प्रदर्शनों में

हालाँकि, हाल के दिनों में इन प्रदर्शनों को माओवंशी कामपंथियों ने हायजैक कर लिया है। ऐसे प्रदर्शनों को पूरी तरह से जागरूकता की जद से बाहर निकाल कर इसे भाजपा-विरोधी बना दिया गया है। आप यह सोचिए कि समलैंगिकों के मार्च में, उस सरकार की आलोचना क्यों हो रही है जिसने उन्हें अधिकार दिलाए? जिसे आप बंद सोच वाला कहते हैं, उसके प्रवक्ता ने कहा कि दुनिया बदल रही है और पार्टी इन अधिकारों के समर्थन में है।

फिर यहाँ ऐसी तख्तियाँ क्यों निकल आती हैं कि ‘मैं किसी के भी साथ सो सकती हूँ, पर भाजपाई के साथ नहीं?’ क्या किसी भाजपाई ने आपको बुलाया सोने के लिए साथ में? अगर बुलाया भी हो तो आप निजी तैर पर अपने विचार रख दीजिए, पब्लिक में तख्ती ले कर घूमने का क्या मतलब है? क्या भाजपा ने, या मोदी के मंत्रियों ने, मंत्रालयों के प्रवक्ताओं ने कहीं भी यह कहा है कि भाजपा वालों से सेक्स करें? मुझे नहीं लगता।

फिर ये लोग क्यों बता रहे हैं कि वो किसके साथ संभोग करना चाहेंगी, किसके साथ नहीं। क्या पता भाजपा समर्थकों की सेक्स लाइफ काफी अच्छी हो गई हो क्योंकि वो लोग खुल्लमखुल्ला बता देते हैं कि उनकी विचारधारा क्या है। कम से कम कम्यूनिस्टों की तरह सीडी देने बुला कर, ड्रिंक में ड्रग्स मिला कर हॉस्टलों में बलात्कार तो नहीं करते! हो सकता है कि अपनी विचारधारा सामने लाने पर भाजपा समर्थक लोग काफी एक्टिव लाइफ जी रहे हों! फिर तुम्हें पूछ कौन रहा है कि ऐ लड़की, हम भाजपाई हैं, सेक्स करोगी? नो बडी गिव्स अ शिट हू यू स्लीप विद!

साथ ही, एक लड़की यह तख्ती लिए घूम रही थी कि ‘भारत माता को चाहिए गर्लफ्रेंड’। मुझे नहीं लगता कि भारत माता को ब्वॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड चाहिए, भारत माता ‘भारत माता’ हैं, जिनको अपनी माँओं को गर्लफ्रेंड दिलाना है, बिलकुल दिलाएँ लेकिन भारत माता को छोड़ दें। अब बात वही है कि जिनके दिमाग में दिन रात सेक्स का कीड़ा कुलबुलाता रहे, उनके लिए माँ क्या, बाप क्या! वो तो तख्तियाँ ले कर कुछ भी लिख देंगे। उनके लिए संबंधों की अहमियत शून्य है क्योंकि दुनिया में हरेक जीव बस किसी प्रजाति की नर, मादा या उभयलिंगी है, और सबको सबसे सेक्स कर लेना चाहिए।

तुम्हें गर्लफ्रेंड चाहिए, ब्वायफ्रेंड चाहिए, तीन ब्वॉयफ्रेंड चाहिए, चार गर्लफ्रेंड चाहिए, वो तुम्हारा मसला है। लेकिन इसमें आज भारत माता को खींच रही हो, कल को किसी हिन्दू देवी-देवता को खींच लोगे और तख्ती ले कर बताने लगोगे कि किसको क्या चाहिए। ऐसे लोग किसी भी अच्छे प्रदर्शन को प्रदूषित कर देते हैं और इन जैसों के कारण पूरा मुद्दा परिधि पर ढकेल दिया जाता है।

विरोधों का अक्सर कामपंथी नालायक दूषित करते रहे हैं

इससे भारत माता पर कोई लांछन नहीं लगता। ये तख्ती सीधा उन लोगों को आहत करने के उद्देश्य से उठाया गया जिनकी भारत माता में आस्था है। इसके सहारे उन पर निशाना साधा गया जो राष्ट्र को माँ के रूप में देखते हैं। मतलब यह है कि ऐसे प्रदर्शनों में ऐसे तत्व भीड़ बन कर आ जाते हैं, ताकि उन्हें दो मिनट की ख्याति मिल जाए।

वामपंथियों की यह कला बहुत पुरानी है। इन्हें लगता है कि प्रोटेस्ट किसी भी बात की हो, उन पर इनका पहला अधिकार है, और ये उनके अपने लोग हैं। लगातार जनाधार खोते वामपंथी जब नितम्ब सटा कर स्कूलों के मॉनीटर का चुनाव जीतने को ही ‘मोदी को मिला जवाब’ मानने लगे हैं, तो इनके अजेंडे के लिए भीड़ जुटाना एक दुष्कर कार्य है।

इसलिए आप देख सकते हैं कि ये समलैंगिकों के मार्च में पहुँच जाते हैं जो कि एक सामाजिक अभियान है, और उसे राजनैतिक बना कर ये लोग उसमें अपना अजेंडा घुसा देते हैं। मुझे आश्चर्य होता है LGBTQ लोगों पर जो इन्हें अपना प्लेटफॉर्म दे देते हैं जैसे कि कॉन्ग्रेस या वामपंथियों ने इनके लिए कोई कानून बनाया हो। विडंबना यह है कि जिस सरकार ने न सिर्फ समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से मुक्त कराने में समर्थन दिया, बल्कि अब ट्रांसजेंडर विधेयक भी ले कर आ रही है, उसी सरकार के खिलाफ उसी LGBTQ समुदाय के लोग वामपंथियों को आवाज उठाने दे रहे हैं।

1991 से समलैंगिकों को सहमति से आपस में सेक्स करने की आजादी के लिए कानूनी लड़ाई चल रही थी। 2001 में नाज फाउंडेशन ने इस मुद्दे को उठाया और 2003 में इस पर दिल्ली हायकोर्ट में याचिकाएँ दाखिल हुईं, जिसे खारिज कर दिया गया। फिर 2009 में ये मुद्दा वापस आया और दिल्ली हायकोर्ट ने इनके पक्ष में निर्णय दिया। इसके बाद 2013 में बात सुप्रीम कोर्ट में पहुँची जिसने वापस इस निर्णय को पलट दिया।

आप याद कीजिए कि इन समयों में दिल्ली और केन्द्र में किनकी सरकारें थीं। साथ ही, यह भी याद कीजिए कि पिछले साल किसकी सरकार थी जिसने इस कानून के विरोध में जा कर, समलैंगिकों के हित में निर्णय दिलाया जबकि कोर्ट ने कहा था कि कानून बनाने का काम संसद का है। संसद में बगुमत वाली सरकार चाहती तो फैसला पलट सकती थी, लेकिन कॉन्ग्रेस सरकारों के उलट यही कथित फासीवादी सरकार इन लोगों के समर्थन में खड़ी हुई।

पहली बार नहीं हुआ है यह

हाल ही में जेएनयू में चल रहे आंदोलन में इन्हीं वामपंथियों ने अपनी मानसिक विकृति का नमूना दिखाया जब इन्होंने एक जगह ‘ब्रह्मणों भारत छोड़ो’ लिख दिया। आप यह सोचिए कि बढ़ी हुई फीस और कैम्पस के नए नियमों को विरोध में ब्राह्मणों की क्या भूमिका है कि उन्हें भारत छोड़ने को कहा जा रहा है? भूमिका यह है कि वामपंथी लम्पटों को एक विरोधी चाहिए जिसके खिलाफ वो विषवमन कर सकें।

चूँकि गरीबों के सारे मुद्दे मोदी ने उठा लिए और उन्हें घर दिया, घर में गैस चूल्हा दिया, बिजली दी, पानी दिया, बल्ब लगवाए, शौचालय बनवाया, बैंक अकाउंट दिया, दुर्घटना बीमा और स्वास्थ्य बीमाएँ दी… तो जाहिर है कि वामपंथी इस बात पर तो बात कर ही नहीं सकते कि गरीबों को लिए क्या किया। पहले गरीबों की स्थिति पर बात की जा सकती थी क्योंकि वाकई सत्तर सालों से उनकी ओर किसी ने इस तरह ध्यान दिया ही नहीं था।

अब वामपंथियों के पास वैसी बात करने के लिए कुछ है ही नहीं तो एक फर्जी मुद्दा उठाया जा रहा है कि ब्राह्मण ही लोगों की राह में खड़े हैं, वही सताते रहे हैं, वही सारी समस्याओं की जड़ में हैं। बात यह है कि वोटिंग पैटर्न बताता कि लोकसभा चुनावों में लोग जाति से ऊपर उठ कर भाजपा को वोट कर रहे हैं। साथ ही कई तरह से बँटा हुआ उत्तर प्रदेश भाजपा को तीन-चौथाई बहुमत दे देता है।

ऐसे समीकरण वामपंथियों को नहीं सुहाते क्योंकि ये आज भी भारत में हो कर कश्मीर और केरल की आजादी के नारे लगाते रहते हैं। भारतीय समाज को तोड़ने के लिए एक दुश्मन खोजना जरूरी है क्योंकि लोग अब सड़क-बिजली-सिलिंडर-बीमा जैसे मुद्दों पर वोट देने लगे हैं। उन्होंने मायावती और मुलायम जैसों की जातिवादी राजनीति को नकारा है।

इसलिए, छात्रों की बढ़ी हुई फीस की बात में ‘ब्राह्मणों भारत छोड़ो’ का तड़का लगा दिया जाता है। उन्हें पता है कि इस आंदोलन को लोग देख रहे हैं तो उसमें ये कलाकारी भी कर दी जाए। आप यह सोचिए कि बीएचयू के आंदोलन में कोई लड़का किसी दीवार पर ‘मु##मानों भारत छोड़ो’ लिख देता, या ‘फिरोज वापस जाओ’ लिख देता, तो अचानक से पूरा बीएचयू, वहाँ के सारे हिन्दू छात्र, पूरा बनारस और अंततः मोदी के लोकसभा क्षेत्र होने के कारण पूरी भाजपा, भारत सरकार और पूरा हिन्दू समुदाय घेर लिया जाता कि समुदाय विशेष को भारत से भगाने की योजना बनाई जा रही है।

भला हो काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कारी छात्र-छात्राओं और शिक्षकों का जो धर्म पथ से बिना डिगे, डॉक्टर फिरोज खान के बारे में एक भी अपशब्द बोले, उनके पैर छूने को तैयार, लेकिन अपनी आस्था और पारंपरिक नियमों का हवाला देते हुए, भजन-कीर्तन और मंत्रोच्चारण करते हुए अपना विरोध रखा

इसलिए तैयार रहिए, लड़ाई लम्बी है

इसलिए इन वामपंथियों की एक-एक गतिविधि पर नजर रखना आवश्यक है। ये कभी प्रधानमंत्री की हत्या की योजना बनाने वाले शहरी नक्सलियों के समर्थन में खड़े हो जाते हैं, कभी आतंकी को फाँसी से बचाने के लिए दया याचिका पर दस्तखत करते हैं, कभी भारत के टुकड़े करने की बातें करते हैं, और कभी आंतकियों के जनाजे में वैचारिक रूप से शामिल होते हैं।

इनका इतिहास देखिए, इन्होंने हिंसा और नरसंहारों को मुखर सहमति दी है। वामपंथियों ने नरसंहार और हिंसक क्रांति को ग्लैमराइज ही नहीं किया बल्कि इसे एक जरूरत के रूप में प्रस्तुत किया है। ये मानना कि क्रांति का बस एक ही मार्ग है कि ग़रीब हाथ में हँसिया और कुल्हाड़ी लिए दौड़ें और हर अमीर को काट दें, एक आग लगाने वाली बात है। इससे आप उग्रवादियों को तैयार करते हैं क्योंकि ऐसी बातें फैला कर किसी की आर्थिक या सामाजिक स्थिति का फ़ायदा उठाकर उनसे वो कराया जा सके जो सिर्फ भाषणों से संभव नहीं।

ये वामपंथी भाषण देने और लोगों की भावनाओं को भड़काने में बहुत माहिर हैं। आप ज़रा मुझे बताएँ कि किस लेनिन, माओ, ग्वेरा आदि ने एक ग़रीब को सत्ता दे दी कि ‘लो तुम इस देश के सर्वहारा हो, तुम इसे दिशा दो।’ ऐसा नहीं होता क्योंकि जब आपको सत्ता का उन्माद और एक उग्र भीड़ के पागलपन की तालियाँ सुनने की आदत पड़ जाए तो फिर आपको सर्वहारा की याद नहीं आती। आप क्रांति करते हैं सत्ता पाने के लिए, ना कि किसी का भला करने के लिए।

और उसके रास्ते में आने वाले नरसंहारों को आप ‘क्रांति के नाम जायज’ होने की बात एक और स्पीच में कह देते हैं। एक पोस्टर में आप कुछ भी लिख कर कुछ जातियों को एक जाति के खिलाफ खड़ा कर सकते हैं, फिर वो मशाल ले कर आगजनी करते हैं, और नौ लोग मर जाते हैं। नेता ट्वीट करता रहता है, वो स्पीच देता रहता है। यही होती है सर्वहारा की क्रांति में नेता की स्थिति। सर्वहारा, सर्वहारा ही रहता है।

इस सोच और विचारधारा के स्तंभ धीरे धीरे गिर रहे हैं, और गिरते रहेंगे। जिस समय में एक पक्षी की मौत पर लोग कैम्पेन और जुलूस निकालते हैं, वही समय इन कास्ट्रो, ग्वेरा आदि हत्यारों को उनकी जगह जरूर बताएगा। हिसाब तो लिया जाता रहा है, और लिया जाता रहेगा। इस तरह के हिंसक और नरसंहारियों का हिसाब इतिहास करता रहा है, करता रहेगा। जरूरत है नए इतिहासकारों की जो वामपंथी नहीं हैं।

इसलिए, खुद को तैयार कीजिए इनके वैचारिक आतंकवाद का बहिष्कार करने के लिए। ये लोग व्यभिचार करने में माहिर हैं, इनकी कुंठित मानसिकता ऐसे आँकड़ों में दिखती है जहाँ जेएनयू लड़कियों से छेड़छाड़ के मामले में देश का अव्वल विश्वविद्यालय बन जाता है। इसलिए ये समलैंगिकों को परेड में भारत माता के लिए लेस्बियन सेक्स पार्टनर ढूँढते नजर आते हैं।

इनकी जातिवादी सोच से बच कर रहिए क्योंकि 2012 में ‘हमें जातिगत राजनीति से ऊपर उठ कर सोचना चाहिए’ लिखने वाला वामपंथी वागले 2019 में कॉन्ग्रेस की सरकार में सहभागिता देखते ही लिख बैठता है कि ‘ब्राह्मण भाँड़ में जाएँ’। यही इनका असली चेहरा है। ये किसी के सगे नहीं, न गरीबों के, न दलितों के, न कथित अल्पसंख्यकों के, न वंचितों के। ये लोग घृणा की राजनीति, बिखरे हुए राष्ट्र और सेक्स के लिए व्याकुल, कुंठित, व्यभिचारी समाज के लिए हल्ला करते हैं। इन्हें वैचारिक रूप से मसल दें।

जिहादी लगे हैं बालाकोट को दोबारा सक्रिय करने की कोशिश में: सही निकली जनरल रावत की आशंका

केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जीके रेड्डी ने आज (बुधवार, 27 नवंबर, 2019 को) राष्ट्रीय सुरक्षा, जिहाद और पाकिस्तान से जुड़ी एक बहुत बड़ी आशंका पर मुहर लगा दी, जिसे जनरल रावत ने दो महीने पहले ही जाहिर कर दिया था। उन्होंने इस बात की पुष्टि कर दी कि पाकिस्तान में बैठे आतंकी बालाकोट में अपने लॉन्च पैड और बाकी दहशतगर्दी का ढाँचा दोबारा खड़ा करने की कोशिश में लगे हैं, और भारत के ख़िलाफ़ जिहाद की घुट्टी पिला रहे हैं।

इसी चीज़ की चिंता सितंबर में थल सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत ने कहा था कि बालाकोट मिशन की सफलता के बावजूद आतंकी संगठन जैश ए मोहम्मद ने अपना आतंकी ढाँचा फिर से तैयार कर लिया है और वहाँ हरकत की खबरें आ रहीं हैं। रावत ने यह बयान तमिलनाडु की राजधानी चेन्नै स्थित ऑफ़िसर्स ट्रेनिंग एकेडमी में पत्रकारों से बात करते हुए दिया था।

लेकिन गृह राज्य मंत्री रेड्डी ने संसद को आश्वस्त किया कि बालाकोट में आतंक की नर्सरी भले ही फिर से पनपने लगी हो, लेकिन भारत सरकार देश की सीमाओं की सुरक्षा, और देश की एकता और अखंडता तक इसे नहीं पहुँचने देगी। उन्होंने कश्मीर में इन दो सालों में हुई आतंकी घटनाओं की तुलना भी पेश की। साथ ही कहा कि सरकार की आतंक को लेकर ज़ीरो-टॉलरेंस नीति है, और इसके चलते पिछले कुछ सालों में कश्मीर घाटी में भारी संख्या में जिहादी सुरक्षा बलों के हाथों मारे गए हैं

14 फरवरी को सीआरपीएफ के काफिले पर हुए पुलवामा आतंकी हमले के जवाब में वायुसेना ने बालाकोट में कार्रवाई करते हुए आतंकियों के लॉन्च पैड बने ठिकानों को पाने जंगी वायुयानों का निशाना बनाया था। इज़राइली स्पाइस बमों से हुए इस हमले में वायुसेना और मोदी सरकार ने 200-300 जिहादियों को मार गिराने का दावा किया था और इसके पक्ष में सबूत भी पेश किए। वहीं पाकिस्तान एक ओर यह रट लगाए रहा कि भारतीय वायुसेना के आतंकी ठिकानों पर पहुँच पाने के पहले ही पाकिस्तानी F-16 ने उन्हें खदेड़ दिया था, और दूसरी ओर उसने भारत के हमले के दावे वाली जगह को काफ़ी समय तक मीडिया से दूर रखा, और उतने समय के बाद ही उन्हें जाने वहाँ दिया जितना समय शवों के ढेर को समेट कर ठिकाने लगाने के लिए लग सकता है।

INX मीडिया: चिदंबरम की जमानत याचिका फिर हुई खारिज, नाराज होकर कहा- ‘लगता है मैं रंगा बिल्ला हूँ’

INX मीडिया मनी लॉन्ड्रिंग मामले में कॉन्ग्रेस नेता पी चिदंबरम को एक बार फिर से कोर्ट से बड़ा झटका लगा। ताजा जानकारी के अनुसार विशेष अदालत ने चिंदंबरम की याचिका पर बुधवार (नवंबर 27, 2019) को सुनवाई करते हुए एक बार फिर उसे खारिज कर दिया। इस दौरान कोर्ट ने चिदंबरम के तिहाड़ जेल में रहने की अवधि को भी 11 दिसंबर तक बढ़ा दिया।

उल्लेखनीय है, इससे पहले हुई सुनवाई में भी चिदंबरम की जमानत याचिका को खारिज किया गया था। साथ ही जाँच अधिकारियों को अनुमति दी गई थी कि वे 22-23 नवम्बर तक तिहाड़ जेल में उनसे पूछताछ कर सकते हैं। उस दौरान भी ED ने हाईकोर्ट के सामने तर्क देते हुए कहा था कि अगर पूर्व वित्तमंत्री को जमानत मिल जाती है तो वह सबूतों को नष्ट कर सकते हैं। इसके साथ ही वह गवाहों को भी प्रभावित कर सकते हैं। 

बता दें, लगभग 98 दिन हिरासत में बिताने के बाद अब पूर्व वित्त मंत्री परेशान हो चुके हैं। जिसके कारण उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में जजों के सामने अपनी याचिका फिर खारिज होने पर नाराजगी जाहिर की। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की 3 जजों की पीठ से कहा, “हाई कोर्ट ने सबूतों से छेड़छाड़ और मेरे भाग निकलने के डर से मेरी जमानत याचिक खारिज कर दी है।”

जबकि, कॉन्ग्रेस नेता के वकील कपिल सिब्बल का कहना है कि हाईकोर्ट ने चिदंबरम के ख़िलाफ़ गंभीर आरोप होने के कारण उनकी बेल याचिका खारिज की है। ऐसे में अगर अदालत की गंभीर आरोप वाली दलील स्वीकार हो जाती है तो उन्हें कभी जमानत नहीं मिलेगी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस दौरान चिदंबरम के लिए बहस करते हुए कपिल सिब्बल ने रंगा बिल्ला तक का उदाहरण दे डाला। उन्होंने कहा, “कोर्ट ने जब इस अपराध की गंभीरता को स्वीकार कर लिया है तो मुझे कभी जमानत नहीं मिलेगी? यह ऐसा है जैसे कि मैं कोई रंगा- बिल्ला हूँ। अगर मुझे जमानत नहीं दी जाती है तो देश को गलत संदेश जाएगा।”

यहाँ बता दें कि रंगा और बिल्ला बॉम्बे के 2 खतरनाक अपराधी थे।, जो ऑर्थर रोड से रिहा होने के बाद तुरंत दिल्ली आ गए थे और उन्होंने अगस्त 1978 में 2 किशोरों का अपहरण कर उनकी हत्या कर दी थी।

शरद पवार ने भतीजे अजित के लिए माँगा 2.5 साल CM पद: सर मुँड़ाते ही उद्धव ठाकरे को पड़े ओले

महाराष्ट्र में आख़िरकार बनती दिख रही सरकार के आसार फिर खटाई में पड़ गए हैं। मीडिया सूत्रों के हवाले से खबर आ रही है कि उद्धव ठाकरे पूरे 5 साल महाराष्ट्र पर राज नहीं कर पाएँगे, क्योंकि सहयोगी एनसीपी ने भी ढाई साल अपने लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी माँग ली है। 288 सदस्यीय विधानसभा में शिवसेना (56) और एनसीपी (54) की सीटों में केवल 2 विधायकों का अंतर है।

मंगलवार को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और पाला बदल कर उनके साथ पहुँचे शरद पवार के भतीजे अजित पवार के इस्तीफ़े के बाद शिवसेना-कॉन्ग्रेस-एनसीपी ने महा विकास अघाड़ी गठबंधन के अंतर्गत सरकार बनाने की घोषणा की थी। यह भी दावा किया था कि विधानसभा चुनाव तक न लड़ने वाले शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे पाँच साल तक गठबंधन के सीएम होंगे।

इस बीच यह भी खबर आई थी कि भाजपा को गच्चा देने के बाद अजित पवार अपनी पार्टी में लौट भी गए हैं और ससम्मान स्वीकार भी हो गए हैं। मौजूदा खबरों में भी उनके डिप्टी सीएम बनाए जाने की बात सामने आ रही है।

सत्ता पर अपनी जकड़ सबसे मजबूत करने का एनसीपी का व्यूह शुरू से था। 13 मंत्रियों और एक डिप्टी सीएम के बदले स्पीकर पद से कॉन्ग्रेस के दावा छोड़ने की बात सामने आते ही यह साफ़ हो गया था कि शक्ति-संतुलन के नाम पर एनसीपी विधानसभा स्पीकर का पद भी अपने पास ही रखेगी। इसके अलावा उसका एक डिप्टी सीएम भी होगा। ऐसे में अगर मुख्यमंत्री की कुर्सी भी उसने आधे समय के लिए छीन ही ली, तो उद्धव ठाकरे के लिए शिवसैनिकों को जवाब देना मुश्किल हो जाएगा कि भाजपा से नाता तोड़ने का पार्टी को क्या फायदा मिला।गौरतलब है कि पूर्व मुख्यमंत्री फडणवीस ने कल अपनी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा था कि भाजपा 2.5 साल सीएम के अलावा शिवसेना की हर शर्त पर 30 साल पुराने गठबंधन को बचाने के लिए राज़ी थी।

स्तम्भकार आनंद रंगनाथन ने इस खबर पर चुटकी लेते हुए इस प्रकरण के पहले शरद पवार की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से हुई बैठक की याद दिलाई।

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फिरोज खान काण्ड पर तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा उठाए गए हर प्रश्न का BHU के विद्वानों ने दिया उत्तर

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के छात्रों द्वारा डॉ. फिरोज की नियुक्ति विरोध जारी है। लगातार आंदोलन के तहत कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं। शकराचार्यों, काशी विद्वत परिषद, सहित तमाम प्रोफेसरों, आचार्यों और विद्वानों का समर्थन छात्रों को मिल रहा है। तमाम विद्वान ने इस बात पर आपत्ति जताई कि मीडिया एक धड़े ने अपने अज्ञान वश या बिना यहाँ की स्थिति जाने ही आंदोलन के शुरूआती दौर से ही इसे संस्कृत भाषा और मजहब का प्रश्न बनाकर एक बार फिर हिन्दुओं को असहिष्णु सिद्ध करने में लग गए।

काशी विद्वत परिषद के वर्तमान पदाधिकारी और SVDV के पूर्व प्रोफ़ेसर रामयत्न शुक्ल ने कहा भी कि हमारे लिए वसुधैव कुटुम्बकम नारा नहीं है बल्कि जीवन शैली है और इसके तहत ही भारत ने सभी को अपनाया। लेकिन कभी भी दूसरे की परम्पराओं में हस्तक्षेप नहीं किया। बाहर के लोगों ने हमारी सहृदयता को हमारी कमजोरी समझी और समय-समय पर हमें नुकसान पहुँचाया। लेकिन कठिन से कठिन समय में भी धर्म की रक्षा के लिए कोई न कोई खड़ा रहा जिसकी बदौलत आज हमारी सनातन परम्पराएँ जीवित हैं। आज उन्हीं परम्पराओं की रक्षार्थ छात्र खड़े हैं। इनका आज संघर्ष करना केवल आज के लिए नहीं है बल्कि आने वाले समय और पीढ़ियों के लिए है। और आज जब मीडिया सहित तमाम लोग बिना जाने इनके विरोध में हैं तो हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम उन्हें सही मुद्दे से अवगत कराएँ।

न्याय शास्त्र के प्रकाण्ड विद्वान प्रोफ़ेसर शिवराम गंगोपाध्याय ने कहा, “लोगों के बीच मीडिया द्वारा फैलाए भ्रम और उनके खुद के अज्ञान के कारण विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचा। लेकिन इसमें दोष किसका है? जब संकाय और BHU के लोग ही संस्कृत विद्या धर्म संकाय’ के नियमों से ठीक से अवगत नहीं हैं। यह विवाद होता ही नहीं अगर कुलपति (VC) और विभागाध्यक्ष उमाकांत चतुर्वेदी को नियमों की जानकारी होती।

न्याय शास्त्र के ही एक और प्रोफ़ेसर वशिष्ठ नारायण त्रिपाठी ने भी अपने वक्तव्य में प्रशासन की कमी को रेखांकित किया। उन्होंने साथ ही तमाम विद्वानों ने मीडिया द्वारा फैलाए भ्रम और इधर-उधर की सही और अधकचरी सभी सवालों का जवाब दिया है। जिसे ऑपइण्डिया आपके सामने लेकर आई है तो अगर आप अभी भी संदेह में हों या किसी भ्रम के शिकार हों और गूगल पर फैली आधी-अधूरी और गलत जानकारी को ही ज्ञान समझ कर अपना लिए हों तो पढ़िए, खुद समझिए और दूसरों को भी समझाइए ताकि सही मुद्दा लोगों तक पहुँचे और विश्विद्यालय अपनी गलतियों को सुधारने के लिए विवश हो।

कल अस्सी घाट के सुबहे बनारस के मंच पर हुए कार्यक्रम में सवालों का जवाब देने के क्रम में SVDV के ही पूर्व छात्र डॉ. मुनीश मिश्र ने कहा, “हम स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मों भयावहः जैसे वाक्यों का अनुसरण करने वाले वैदिक सनातनी है।” उन्होंने कहा कि संस्कृत का ज्ञान होना पृथक विषय है पर उस परम्परा का आचार्य बनना अलग बात है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आज कुछ तथाकथित बुद्धिजीवीयों के द्वारा भी छात्रों और देश की जनता को गलत बताया जा रहा है। आज उन तमाम प्रश्नों का उत्तर मैं यहाँ सार्वजनिक रूप से देने जा रहा हूँ। तो पेश है कुछ प्रमुख प्रश्न और उनके उत्तर:


शिक्षक की नियुक्ति की बर्खास्तगी का अधिकार छात्रों को किसने दिया?

पुराणों के अनुसार कई विद्यार्थियों ने अपने आचरण से प्रतिकूल गुरु का परित्याग किया जैसे भक्त प्रह्लाद जी ने शुक्राचार्य पुत्र सण्डामर्क का परित्याग किया क्योंकि वो परमात्मज्ञानाश्रयी थे और सण्डामर्क दैत्य समर्थक थे इसलिए सनातन शास्त्र में व्यवस्था है कि शिष्य प्रतिकूल गुरु का परित्याग कर सकता है।

भाषा का भी कोई धर्म होता है क्या?

भाषा के धर्म का पता नहीं पर हर धर्म की शास्त्रीय भाषा जरूर होती है जिसके सहारे हमे उस धर्म की विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है यदि ऐसा नहीं होता तो अलग अलग धर्मों के अंतरंग तथ्यों के विषय में जानने के लिए उस भाषा में लिखित ग्रंथ को नहीं पढ़ना पड़ता। जैसे इस्लाम धर्म को जानने के लिये ऊर्दू फारसी में लिखित ग्रंथों को पढ़ना पड़ता है, ईसाई धर्म के अंतरंग जानकारी के लिए बाईबिल पढ़ना पड़ता है और सनातन के गूढ़ रहस्यों को जानने के लिए संस्कृत में लिखित शास्त्र ही परम सहायक होतें हैं। इसलिए अपने अंतरंग रहस्यों की रक्षार्थ अपने शास्त्रों को अन्य धर्मावलंबियों से बचा कर रखने की अत्यावश्यक्ता है।

कबीर, रहीम, रसखान, दाराशिकोह इन सब के साथ एपीजे अब्दुल कलाम जैसे लोगों का सम्मान और फिरोज खान का विरोध क्यों?

रहीम, रसखान, दाराशिकोहादि ने संस्कृत तथा सनातन परम्परा के ग्रंथों के जानकार होने पर भी सनातन धर्माचार्यों के पद प्राप्ति के लिए ना तो कोई आवेदन किया ना हीं कोई आंदोलन किया और ना ही वे किसी पद के लोलुप थे किन्तु फिरोज़ खान यह जानते हुए कि ये केवल सनातनियों के लिए उपयुक्त पद है फिर भी अपने जिद्द पर अड़कर उस पद की दावेदारी बनाए हुए हैं इसलिए भइया हम उदारवादी लोग हैं जिन्होंने सनातन को समझा पर दावेदारी नहीं की ऐसे रसखान, रहीम का हृदय से सम्मान करते है किन्तु यदि कोई हमारे घर में आकर अपना दावेदारी ठोकेगा तो हमें उसका विरोध करना भी आता है। हमने हर दौर में ऐसे प्रतिकार किए तभी आज सनातन परम्परा को बहुत हद तक बचा पाए हैं। संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के मूल में ही प्राच्च विद्या का संवर्धन और संरक्षण है और ये अपने आप में एक विशिष्ठ संस्थान है।

फिरोज़ के घर में सभी संस्कृत प्रेमी हैं पिता भजन श्लोक आदि का गायन करते हैं फिर भी आप लोगों को क्या आपत्ति है?

संस्कृत पढ़ना कोई कौतूहल की बात नहीं है पर संस्कृत प्रेमी कहना पूर्ण सत्य नहीं है यदि ये संस्कृत प्रेमी होते तो दूसरे के धर्म पर आघात नहीं करते मुझे लगता है ये केवल व्यवसायिक तौर पर ही संस्कृत को पढ़ें है यदि ये तीन पीढ़ी से संस्कृत ही पढ़ रहे हैं, भजन-श्लोक गाने में ही रूचि है तथा वैचारिक रूप से सनातनी ही है तो फिर इन्होंने अबतक सनातन धर्म क्यों नहीं अपना लिया? एक तरफ ये नमाज भी पढ़तें हैं, बकरीद जैसे हिंसक पर्व भी मनाते हैं और दूसरे तरफ आजीविका के लिए मंदिर में भजन गाते हैं। सनातनी होने का ढोंग है ये सब आजीविका के लिए ये सब दिखावा करते हैं। संस्कृत प्रेमी संस्कृत शास्त्रों का उल्लंघन नहीं करता इसलिए फिरोज को संस्कृत प्रेमी कहना अनुचित है।

फिरोज़ खान को वेद कर्मकांड नहीं अपितु साहित्य पढ़ाने के लिए नियुक्त किया गया है उनसे रसगंगाधर पढ़ने में क्या आपत्ति है?

उत्तर: रसगंगाधर हीं नहीं अपितु काव्यप्रकाशादि भी पढ़ाने के अधिकारी नहीं है क्योंकि वे देवी देवताओं को नहीं मानते ऐसे में देवी देवतादि विषयक रति को कहीं रस ना कहने लग जाएँ जो कि शास्त्र विरुद्ध है। एक बात और साहित्य केवल रसगंगाधर तक सीमित नहीं है ज्यादातर साहित्यिक ग्रंथों के उपजीव्य वेद पुराण हीं है अतः साहित्य को लौकिक कहना अनुचित है।

क्या आपके लिए काबिलियत कोई महत्व नहीं रखता किसी विद्वान से ज्ञान लेने के बजाय उसका धर्म जानना जरूरी है?

जब जाति के आधार पर आरक्षण काबिलियत को निगल जाती है तब तो कोई नहीं बोलता आज लोग काबिलियत की बात कर रहें है। बात यहाँ काबिलियत का निरादर करने की नहीं हैं यदि वो इतने काबिल हैं तो झगड़ा करने के बजाए दूसरे विभाग में स्थानांतरण हेतु एक आवेदन डाल दें। हम उनकी काबिलियत को सलाम करेंगे किन्तु यदि कोई धर्म पढ़ाने आएगा तो उससे उसका धर्म जरूर पूछा जाएगा। उदाहरण के रूप में जैसे जिस व्यक्ति ने स्वयं कभी वाहन नहीं चलाया और हम उसे किसी को वाहन सिखाने के लिए नियुक्त कर दे तो क्या होगा सीखने तथा सिखाने वाले दोनों दुर्घटनाग्रस्त हो जाएँगे। इसलिए धर्म सिखाने वाले गुरु को भी उसी धर्म का होना आवश्यक है।

अस्सी घाट पर हुए कार्यक्रम में डॉ. मुनीश मिश्र सहित सभी विद्वानों और पूर्व छात्रों ने लोगों के सवालों और मीडिया में उछाले गए कई कुतर्कों का जवाब दिया। साथ ही उन्होंने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा भी कि यदि कोई झूठ फैला रहा हो या फिर से कोई नया प्रश्न आ जाए बेशक वह तर्क के नाम पर कुतर्क ही क्यों न हो तो आप हमें सूचित किजिएगा। सनातन में तो शास्त्रार्थ की परंपरा रही है। हमारे यहाँ कुछ भी अंतिम सत्य नहीं है। और ये संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान की स्थापना ही इन्हीं व्याख्याओं और धर्म के सत्य और उसके विज्ञान के अनुसन्धान और संरक्षण के लिए हुआ है।”

मुनीश मिश्र ने यह भी कहा, “धर्म की लडाई सदैव सत्य तथा तथ्य के आधार पर जीती जाती है और हमारे पास ये दोंनों हैं इसलिए हमारी जीत सुनिश्चित है। देवतागण लाख विपत्ति आने पर भी अपने गुरू बृहस्पति का ही आश्रय लिया जबकि शुक्राचार्य बृहस्पति से ज्ञान के मामले मे कम नहीं थे पर देवताओं ने अपने परम्परानुसार गुरू का ही अनुसरण किया इसलिए वो सदा विजयी हुए। हमारी परम्परा विद्वानों का सम्मान करने की रही है जिस प्रकार से भगवान श्री राम ने रावण के विद्वता का सम्मान किया था पर केवल सम्मान किया ना कि किसी गुरुकुल में अध्यापन कराने के लिए आहूत किया क्योंकि वो राम और रावण के परम्परागत आचरण में भेद था। अतः फिरोज़ खान विद्वान हो सकते है और हम सम्मान भी करतें है किंतु परम्परागत आचरण में विभेद के कारण वो हमारे आचार्य नहीं बन सकतें।”

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POK वैसे ही वापस ले आएँगे जैसे अनुच्छेद 370 पर एक्शन लिया: अमित शाह

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पाक अधिकृत कश्मीर को लेकर भाजपा सरकार का रुख साफ़ कर दिया है। ‘रिपब्लिक समिट’ के दूसरे दिन कार्यक्रम में हिस्सा लेते हुए शाह ने कहा कि पाक अधिकृत कश्मीर (POK) और जम्मू-कश्मीर के लिए वो जान भी दे सकते हैं और देश में करोड़ों ऐसे लोग हैं, जिनके मन में यही भावना है। पत्रकार अर्नब गोस्वामी ने उनसे पीओके को भारत में मिलाने के लिए सरकार के ‘प्लान ऑफ एक्शन’ को लेकर सवाल पूछा था। बता दें कि संसद में एक सवाल का जवाब देते हुए भी शाह ने कहा था कि पीओके के लिए जान दे सकते हैं।

अमित शाह ने कहा कि पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर को लेकर केंद्र सरकार का जो भी ‘प्लान ऑफ एक्शन’ या उसका समय है, उसे टीवी डिबेट के दौरान घोषित नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि ये सब देश की सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मुद्दे हैं, जिन्हें ठीक वैसे ही कर डालना चाहिए, जैसे अनुच्छेद 370 को हटाया गया। शाह ने अर्नब गोस्वामी से कहा कि पीओके के लिए ‘प्लान ऑफ एक्शन’ या समय की बात मत ही पूछिए तो अच्छा है।

पीओके को पाकिस्तान से वापस लेने वाले सवाल पर देश के गृह मंत्री ने कहा कि इस प्रकार की चीजों के लिए जो भी रणनीति या समय होता है, उसे घोषित नहीं किया जाता। अमित शाह ने उदाहरण देते हुए कहा कि सरकार ने अनुच्छेद 370 पर भी जो फ़ैसला लिया, उसे लेकर भी किसी प्रकार का ‘प्लान ऑफ एक्शन’ घोषित नहीं किया गया था। अर्नब गोस्वामी ने मजाकिया अंदाज़ में प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि अमित शाह के बयान के बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान और वहाँ के सेनाध्यक्ष जनरल बाजवा को नींद भी नहीं आएगी।

शाह ने कहा कि देश की सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मसलों पर लिए गए फ़ैसलों को अपने तरीके से लागू किया जाता है, सार्वजनिक रूप से इसकी घोषणा नहीं की जाती कि क्या और कैसे किया जाएगा? बालाकोट एयर स्ट्राइक और सर्जिकल स्ट्राइक के बारे में शाह ने कहा कि वो सब भी पहले घोषित कर के नहीं किया गया था। शाह ने कहा कि पाकिस्तान और भारत का रिश्ता इस पर निर्भर करता है कि वो अपनी ज़मीन पर आतंकवाद को ख़त्म करता है या नहीं। उन्होंने पाक को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर वो आतंकवाद फैलाने वाली रणनीति पर कायम रहता है तो आतंकवाद को ख़त्म करने की दिशा में उसका जवाब हम देंगे।

पीओके पर सुने अमित शाह का जवाब (15 मिनट के बाद)

पीओके पर संसद में दिखाए गए तेवर को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में अमित शाह ने कहा कि गृह मंत्रालय का काम देश के सभी हिस्सों में सुरक्षा सुनिश्चित करना है। साथ ही उन्होंने कहा कि अगर देश के भीतर कहीं भी असुरक्षा है, उसे लेकर गृह मंत्री को गुस्सा नहीं आता है तो वह संवेदनशील नहीं है। शाह ने आगे कहा:

“गुलाम नबी आज़ाद ने कहा कि देश की संसद को जम्मू-कश्मीर पर क़ानून बनाने का वैधानिक अधिकार नहीं है। जब मैंने उनसे पूछा कि आप पीओके को संप्रभु भारत का हिस्सा मानते हो या नहीं मानते हो? अगर ये देश की सीमाओं के भीतर आता है तो इसपर क़ानून बनाने के लिए देश का संसद कैसे अधिकृत नहीं है? मेरी जगह कोई भी होता तो उसे इस बात से गुस्सा आ सकता था। गुलाम नबी आज़ाद ने देश की संसद की क्षमता पर सवाल खड़े किए। इसलिए , मेरा नाराज होना स्वाभाविक था। मैंने गुस्से में भी किसी व्यक्ति के ख़िलाफ़ कुछ नहीं बोला।”

अमित शाह ने कहा कि उनकी आक्रामकता किसी व्यक्ति या संस्था के ख़िलाफ़ नहीं है, बल्कि असुरक्षा और अव्यवस्था के ख़िलाफ़ है। उन्होंने कहा कि देश में व्यवस्था लाना सरकार का काम है और आक्रामकता होनी ही चाहिए।