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हिन्दुओं ने माहौल बिगाड़ा, मुस्लिमों के साथ अन्याय हुआ: सुप्रीम कोर्ट में बाबरी मस्जिद के पैरोकार रहे राजीव धवन

राम जन्मभूमि मामले में सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्ष की पैरोकारी करने वाले वकील राजीव धवन ने एक बार फिर विवादास्पद बयान दिया है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले में विवादित रहे 2.77 एकड़ समेत पूरी 67 एकड़ भूमि हिन्दुओं को रामलला का मंदिर बनाने के लिए दिए जाने को मुस्लिम पक्ष के साथ अदालत का अन्याय करार दिया है। साथ ही दावा किया कि हिन्दुओं ने माहौल खराब किया और मुस्लिम पक्ष शांत रहा। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर भी ऐसे ही आरोप लगाए।

गौरतलब है कि 9 नवंबर, 2019 के अपने ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यों वाली संविधान बेंच ने राम जन्मभूमि स्थल का पूरा मालिकाना हक हिन्दुओं दिया था। साथ ही मस्जिद बनाने के लिएसमुदाय विशेष को अलग से 5 एकड़ ज़मीन देने के निर्देश केंद्र सरकार को दिए थे। इस पीठ की अध्यक्षता तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई ने की थी और इसमें मुस्लिम जज जस्टिस अब्दुल नज़ीर भी शामिल थे। पीठ ने अपना फैसला सर्वसम्मति से दिया था।

राजीव धवन के बयान पर बिफ़रे भाजपा नेता और राज्यसभा सांसद डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने बयान जारी कर बार काउंसिल से धवन के खिलाफ कार्रवाई करने की माँग की है। गौरतलब है कि डॉ. स्वामी की इस मुकदमे के निपटारे में अहम भूमिका रही है। उनकी जन्मभूमि स्थल पर आस्था के आधार पर पूजा के संवैधानिक अधिकार की माँग वाली याचिका के ही कुछ समय बाद शीर्ष अदालत ने दशकों से न्यायपालिका में लटके पड़े इस मुकदमे की सुनवाई में तेजी लाई थी।

एडवोकेट धवन की इस मुकदमे से जुड़ी यह पहली अशोभनीय हरकत नहीं है। इसके पहले मुकदमे की सुनवाई के आखिरी दिन उन्होंने अदालत में दस्तावेजी साक्ष्य के रूप में पेश की गई किताबों, कागजों, नक्शों आदि को फाड़ दिया था– वह भी सीजेआई गोगोई के सामने। उनके सामने वह साक्ष्य हिन्दू महासभा ने पेश किए थे। तब उनकी इस हरकत से गोगोई बेहद नाराज़ हुए थे और चेतावनी दी थी कि ऐसी हरकतें अदालत में हुईं तो वह उठ कर चले जाएँगे। तब धवन को माफ़ी माँगनी पड़ी थी।

अयोध्या में राम मंदिर: 75 साल बाद वक्फ बोर्ड के दस्तावेजों से हटेगा बाबरी मस्जिद का नाम

‘शरीयत के ख़िलाफ़ है सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला, मुस्लिम समर्थन भी करें तो फर्क़ नहीं पड़ता’

अयोध्या अधिनियम 1993 की वो धारा, जिसके तहत बनेगा राम मंदिर के लिए ट्रस्ट

महाराष्ट्र: कॉन्ग्रेस ने स्पीकर पद से दावा छोड़ा, उद्धव कैबिनेट में चाहिए अपने 13 मंत्री

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के तौर पर उद्धव ठाकरे के शपथ लेने से पहले कॉन्ग्रेस पार्टी ने विधानसभा के स्पीकर पद पर दावेदारी से अपने हाथ पीछे खींच लिए हैं। एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक कॉन्ग्रेस उद्धव कैबिनेट में 13 पद के लिए स्पीकर पद पर दावेदारी छोड़ने के लिए तैयार हो गई है।

शुरुआत में कॉन्ग्रेस स्पीकर पद के लिए अड़ी थी। न्यूज़18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक वरिष्ठ कॉन्ग्रेसी नेताओं को कैबिनेट मंत्री बनाया जाएगा। इनमें विजय नामदेवराव,यशोम्मती ठाकुर, नाना पटोले, वर्षा गायकवाड़, अमीन पटेल, अशोक चव्हाण, अमित देशमुख, विश्वजीत कदम, बंटी पाटिल और केसी पडवी आदि नेताओं के नाम शामिल हैं। वहीं चार अन्य कॉन्ग्रेस नेता राज्य मंत्री बनाए जाएँगे।

शिवसेना-एनसीपी-कॉन्ग्रेस गठबंधन सरकार में स्पीकर पद एनसीपी के पास रहेगी। एनसीपी को कैबिनेट में भी उचित हिस्सेदारी मिलेगी। महाराष्ट्र में 43 से ज्यादा मंत्री नहीं बनाए जा सकते हैं। 2003 में हुए 91वें संवैधानिक संशोधन के अनुसार राज्य कैबिनेट में विधानसभा के कुल सदस्यों की संख्या के 15 प्रतिशत से ज्यादा नहीं हो सकते।

मंगलवार को महाराष्ट्र के सियासी ड्रामे में एक नया मोड़ उस वक़्त आया जब अजित पवार के समर्थन से सरकार बनाने वाले देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया था। बता दें कि 288 विधानसभा सीटों वाली महाराष्ट्र विधानसभा में भाजपा के पास 105 सीटें है।

फडणवीस के इस्तीफे के बाद उद्धव ठाकरे शिवसेना, एनसीपी और कॉन्ग्रेस के नेता चुने गए। तीनों दलों के इस गठबंधन को महाविकास अघाड़ी नाम दिया गया है। उद्धव गुरुवार को मुंबई के शिवाजी पार्क में मुख्यमंत्री के पद की शपथ लेंगे। उनके साथ छह अन्य लोगों के भी शपथ लेने की संभावना है।

कैथोलिक स्कूल में 10 बधिर बच्चों का यौन शोषण: एक पादरी को 42 साल तो दूसरे को 45 साल की कैद

अर्जेंटीना के एक कैथोलिक स्कूल में 10 बधिर बच्चों का यौन शोषण करने के मामले में 2 पादरियों को कोर्ट ने दोषी ठहराते हुए 40 वर्ष से अधिक कारावास की सजा सुनाई। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मेंडोजा में 3 न्यायाधीशों के पैनल ने सोमवार (नवंबर 25, 2019) को 83 वर्षीय पादरी निकोला कोराडी को 42 वर्ष और 59 वर्षीय पादरी होरासियो कोरबाचो को 45 वर्ष कारावास की सजा सुनाई।

इसके अलावा कोर्ट ने माली अरमांडो गोम्ज को भी 18 साल की सजा सुनाई है। जानकारी के मुताबिक दोनों पादरी ने 2005 से 2016 के बीच में अपने कुकर्मों को अंजाम दिया। 2016 में इसका खुलासा हुआ था।

पोप फ्रांसिस भी अर्जेंटीना से हैं। कहा जा रहा है कि उन्हें और अन्य चर्च अधिकारियों को 2014 की शुरुआत में ही इन पादरियों में से एक पर लगे आरोपों के बारे में जानकारी थी। लेकिन फिर भी, उनके ख़िलाफ़ गिरफ्तारी से पहले किसी प्रकार की जाँच शुरू नहीं हुई। इस दौरान अर्जेंटीना में कैथोलिक स्कूलों को बंद करने की मॉंग भी जोर-शोर से उठी थी।

उल्लेखनीय है कि पीड़ितों के वकील सर्गियो सलिनास ( Sergio Salinas) ने एक साक्षात्कार में कहा कि इस घटना के लिए पोप फ्रांसिस को सार्वजनिक तौर पर माफी माँगनी चाहिए। उन्होंने कहा कि चर्च ने इस मामले में उचित ढँग से काम नहीं किया है।

इस मामले में उन्होंने चर्च पर आरोप लगाया कि वे अपराधियों के ख़िलाफ़ न केवल सबूत पेश करने में विफल हुआ, बल्कि उसने जानकारियाँ भी छिपाई। पीड़ितों की शिकायतों का मजाक उड़ाया गया। सलिनास के अनुसार इस मामले में चर्च की गवाही अविश्वसनीय है। गौरतलब है कि पिछले कुछ दशकों में पादरियों द्वारा यौन शोषण करने का काफी मामले सामने आए हैं। इनमें से कई मामले दबाने का आरोप पोप फ्रांसिस पर है।

एयरपोर्ट पर सिख पायलट की पगड़ी उतरवाई, बिफरे अकाली विधायक ने कहा- दखल दे मोदी सरकार

एयर इंडिया के सिख पायलट के साथ नस्लीय भेदभाव और दुर्व्यवहार का एक मामला हाल ही में प्रकाश में आया है। एयरलाइंस के पायलट सिमरन गुजराल को स्पेन में कथित तौर पर अपनी पगड़ी उतारने के लिए मजबूर किया गया। यह घटना तब हुई जब वे एयर इंडिया की फ्लाइट संख्या AI136 को लेकर स्पेन की राजधानी मैड्रिड से दिल्ली आ रहे थेगौरतलब है कि सिख धर्म/खालसा पंथ में सार्वजनिक स्थलों पर सिखों को केश खुले रखने की मनाही है- यह उनके पंथ के अंतिम गुरु श्री गोबिंद सिंह का आदेश है।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक गुजराल जब एयरपोर्ट के मेटल डिटेक्टर से गुजर कर निकले, तो उनके गुजरने पर कोई अलार्म नहीं बजा- यानी उनके शरीर पर या पगड़ी में किसी सुरक्षा उपकरण ने कोई खतरनाक या संवेदनशील चीज़ नहीं थी। इसके बावजूद वहाँ तैनात सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें पगड़ी उतारने के लिए कहा।

गुजराल ने यह भी बताया कि मैड्रिड एयरपोर्ट पर सिखों के साथ बदतमीज़ी अकसर होती रहती है। उनका कहना है कि दुनिया के किसी भी अन्य हवाई अड्डे पर यह होते नहीं देखा है। यानी यह कोई मानक सुरक्षा जाँच नहीं है, जबकि अमेरिका और कनाडा में लाखों की संख्या में सिख रहते हैं।

इस घटना का ज़िक्र करते हुए दिल्ली के राजौरी गार्डन से शिरोमणि अकाली दल के विधायक और सिख नेता मनजिंदर सिंह सिरसा ने ट्विटर पर क्षोभ प्रकट किया है। उन्होंने कहा कि गुजराल ने उन्हें फ़ोन कर आपबीती सुनाई थी। गुजराल के साथ हुए वाकए को सिरसा ने “सिख पगड़ी का अपमान और नस्लभेदी व्यवहार” करार दिया है। सिरसा दिल्ली की सिख गुरुद्वारा प्रबंधन कमेटी के अध्यक्ष भी हैं।

साथ ही उन्होंने मोदी सरकार में  विदेश मंत्री और पूर्व राजनयिक एस जयशंकर को टैग करते हुए इस मामले का हल निकालने की गुज़ारिश की है। उन्होंने लिखा, “(आप) सुनिश्चित करें कि दुनिया भर में सिखों के साथ उनकी पगड़ी के चलते दुर्व्यवहार न हो।”

सिखों के साथ पगड़ी के कारण दुर्व्यवहार की यह पहली घटना नहीं है। 2011 में ऐसी कई घटनाएँ हुईं थीं, जिनमें मशहूर गोल्फ़र जीव मिल्खा सिंह के कोच अमृतिंदर सिंह को इटली के मिलान एयपोर्ट पर पगड़ी उतारने के लिए मजबूर किया जाना शामिल है। उस समय अकाली दल ने तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को आड़े हाथों लिया था। लेकिन इस मसले का कोई हल नहीं निकला।

अयोध्या में राम मंदिर: दिसंबर के पहले हफ्ते में पुनर्विचार याचिका दाखिल करेगा मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जमीयत पीछे हटा

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) दिसंबर के पहले सप्ताह में राम जन्मभूमि मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पु​नर्विचार याचिका दायर करेगा। शीर्ष अदालत ने 9 नवंबर को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए विवादित जमीन रामलला को सौंप दी थी। साथ ही मुस्लिम पक्ष को मस्जिद बनाने के लिए अयोध्या में पॉंच एकड़ जमीन मुहैया कराने के निर्देश भी केंद्र सरकार को दिए थे।

इस मामले के दो मुख्य पक्षकार सुन्नी वक्फ बोर्ड और इकबाल अंसारी ने पुनर्विचार याचिका दाखिल नहीं करने का फैसला किया है। एआईएमपीएलबी ने कहा है कि इस फैसले से न उसे फर्क पड़ता है और न इसका उसकी याचिका पर कानूनी तौर पर कोई फर्क पड़ेगा। दिलचस्प यह है कि एआईएमपीएलबी ने कहा है कि सभी मुस्लिम संगठन उसके साथ है।

सुन्नी वक्फ बोर्ड ने लखनऊ में मंगलवार (नवंबर 26, 2019) को हुई बैठक में पुनर्विचार याचिका दाखिल नहीं करने का फैसला था। हालॉंकि मस्जिद के लिए जमीन कबूल करने को लेकर बोर्ड ने आखिरी फैसला अब तक नहीं किया है। बोर्ड की बैठक से पहले 100 जानी-मानी मुस्लिम हस्तियों ने रिव्यू पीटिशन नहीं दाखिल करने अपील की थी। इनलोगों का कहना था कि पुनर्विचार दायर करना विवाद को जिंदा रखेगा और मुस्लिम समुदाय को नुकसान पहुँचाएगा।

हैरत की बात यह है ​कि अपने पुराने स्टैंड से पलटते हुए जमीयत उलेमा ए हिंद ने भी पुनर्विचार याचिका दाखिल नहीं करने का फैसला किया है। बीते दिनों जमीयत के प्रमुख अरशद मदनी ने कहा था कि उन्हें मालूम है कि समीक्षा याचिका खारिज हो जाएगी। इसके बावजूद वे इसे दाखिल करेंगे। एक इंटरव्यू में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाते हुए मदनी ने कहा था, “सुप्रीम कोर्ट के फैसले में, सभी सबूत बाईं ओर इशारा करते हैं, जबकि फैसला दाईं ओर जाता है।” साथ ही उन्होंने हिंदुओं को मंदिर बनाने के लिए कहीं और जमीन दिए जाने की बात भी कही थी।

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भाँड़ में जाएँ ब्राह्मण: मराठी पत्रकार निखिल वागले की घृणित जातिवादी सोच आई बाहर

महाराष्ट्र के पत्रकार निखिल वागले ने सोशल मीडिया पर घृणा फैलाई है। विवादास्पद बयानों के लिए कुख्यात निखिल वागले ने ट्विटर पर ब्राह्मणों को भला-बुरा कहा। उन्होंने महाराष्ट्र के केयरटेकर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की जाति पर टिप्पणी करते हुए कहा कि महाराष्ट्र के ब्राह्मण देवेंद्र फडणवीस की सरकार जाने से ख़ुश नहीं है। वागले ने लिखा कि महाराष्ट्र के ब्राह्मण ऐसा सोचते थे कि फडणवीस की सरकार उनकी अपनी ही सरकार है। साथ ही उन्होंने दावा किया कि उद्धव ठाकरे की नेतृत्व वाली भावी सरकार से ग्रामीण और दलित काफ़ी ख़ुश हैं।

निखिल वागले ने इसे स्पष्ट ध्रुवीकरण करार दिया। इसके बाद ब्राह्मणों पर विवादित चिप्प्णी करते हुए उन्होंने लिखा- “भाँड़ में जाएँ ये 3% ब्राह्मण।” वागले मराठी पत्रकार हैं और आईबीएन लोकमत के महानगर एडिटर रह चुके हैं। आज जातिवाद कर रहे निखिल वागले ने 2012 में जातिवाद हटाने की बात की थी। उस वक़्त उन्होंने लिखा था कि जाति, पंथ और मजहब की राजनीति से हट कर जनता को अब विकास की राजनीति की ज़रूरत है। उन्होंने लिखा था कि वो 1985, 92 और 2002 के दंगों को फिर से होता हुआ नहीं देखना चाहते।

यह भी अजीब है कि निखिल वागले जिस शिवसेना की आज प्रशंसा कर रहे हैं, उससे कभी उन्हें ख़ासी चिढ़ थी। शिवसैनिकों ने उनके स्टूडियो में घुस कर उनकी पिटाई की थी। शिवसेना कार्यकर्ताओं ने निखिल वागले के चेहरे पर स्याही पोत दी थी। उस पिटाई के बाद वागले अक्सर शिवसेना की आलोचना करते मिलते थे। अब जब शिवसेना ने भाजपा को धोखा देकर कॉन्ग्रेस और एनसीपी के साथ सरकार बनाने का निर्णय लिया है, वागले उद्धव की तारीफ़ करते नहीं तक रहे।

निखिल वागले की पिटाई के बाद शिवसेना के तत्कालीन अध्यक्ष बाल ठाकरे ने इसे मीडिया पर हमला मानने से इनकार कर दिया था। ठाकरे ने पूछा था कि अगर किसी पत्रकार की बीवी अपने पति को मारती है तो क्या उसे मीडिया पर हमला माना जाएगा?’ उन्होंने कहा था कि ये बस एक पत्रकार की पिटाई है, मीडिया की नहीं। बाल ठाकरे ने कहा था कि वागले ने राजीव गाँधी की मृत्यु के बाद सोनिया गाँधी के चरित्र पर सवाल उठाए थे, तब कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने उनके ख़िलाफ़ पुलिस में मामला दर्ज कराया था। इसके बाद वागले ने माफी माँगी थी। बालासाहब ने कहा था कि इसी तरह शिवसैनिक भी अपनी भावनाओं को रोक नहीं पाए और वागले की पिटाई कर दी। ठाकरे ने कहा था कि इसमें कुछ भी ग़लत नहीं है।

तब बाल ठाकरे ने कहा था कि एनसीपी और कॉन्ग्रेस भी पूर्व में पत्रकारों पर हमले करती आई है, इसमें कुछ भी नया नहीं है। हाल के दिनों में निखिल वागले ने शिवसेना की तारीफ़ में कई ट्वीट किए हैं। शिवसेना नेताओं और उनके बीच बधाइयों का आदान-प्रदान भी हो रहा है। उन्होंने टेलीग्राफ के उस हैडलाइन का भी समर्थन किया है, जिसमें कहा गया है कि चाणक्य एक ही थे। इस ख़बर में अमित शाह पर तंज कसा गया है।

उद्धव के लिए तिहाड़ जेल से आई बधाई, राहुल-प्रियंका से मिलने के बाद चिदंबरम ने कहा- जनता के हितों को दें तवज्जो

पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने एक के बाद एक ट्वीट कर तिहाड़ जेल से अपनी बात सामने रखी। चिदंबरम ने अपने परिवार से ये ट्वीट करवाया। उनके आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर बताया गया कि पी चिदंबरम ने ये ट्वीट्स करने को कहा है। अपने ट्वीट में उन्होंने महाराष्ट्र की भावी शिवसेना सरकार को बधाई दी है। चिदंबरम ने शिवसेना-एनसीपी-कॉन्ग्रेस की भावी गठबंधन सरकार से अपनी पार्टी के विचारधारा के सात-साथ आम जनता के हितों को तवज्जो देने की अपील की है।

चिदंबरम ने देवेंद्र फडणवीस को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाए जाने को संविधान का उल्लंघन करार दिया। उन्होंने कहा कि सुबह 4 बजे उठा कर राष्ट्रपति शासन हटाने सम्बन्धी दस्तावेज पर दस्तखत कराना राष्ट्रपति का अपमान है। उन्होंने पूछा कि सरकार ने सुबह 9 बजे तक इंतजार क्यों नहीं किया? उन्होंने कहा कि कॉमन मिनिमम प्रोग्राम पर कार्य करने वाली गठबंधन पार्टियाँ एक अच्छा शासन देती हैं।

पी चिदंबरम को जेल में 99 दिन हो गए हैं। बुधवार (नवंबर 27, 2019) को पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी और उनकी बहन प्रियंका गाँधी ने तिहाड़ जेल जाकर चिदंबरम से मुलाक़ात की। उन्हें 21 अगस्त को ही सीबीआई ने गिरफ़्तार किया था। उनके बेटे कार्ति चिदंबरम ने कहा कि राहुल और प्रियंका का उनके पिता से मुलाक़ात करने का अर्थ है कि पूरी कॉन्ग्रेस पार्टी उनके साथ मजबूती से खड़ी है। मुलाक़ात के दौरान कार्ति भी वहाँ मौजूद थे। तीनों ने पी चिदंबरम से क़रीब 50 मिनट तक बातचीत की।

मंगलवार को प्रवर्तन निदेशालय ने कोर्ट में पी चिदंबरम की जमानत याचिका का विरोध किया। जाँच एजेंसी ने कहा कि चिदंबरम ने वित्त मंत्री जैसे प्रभावशाली पद का उपयोग अपने व्यक्तिगत फ़ायदे के लिए किया। ईडी ने कहा कि चिदंबरम को जमानत नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि वो सबूतों से छेड़छाड़ कर सकते हैं। शुक्रवार को कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर ने भी चिदंबरम से जेल में मुलाक़ात की थी। सोनिया गाँधी और एचडी कुमारस्वामी जैसे नेता भी चिदंबरम से जेल में जाकर मिल चुके हैं।

प्राइवेट वार्ड में नहीं होगा चिदंबरम का इलाज, हाई कोर्ट ने कहा- तिहाड़ में ही साफ और स्वच्छ वातावरण दें

चिदंबरम और उनके बेटे के खिलाफ दो लोगों को गवाही देने से रोका गया: CBI

INX मीडिया घोटाला: CBI ने दाखिल की चार्जशीट, चिदंबरम सहित 14 लोगों के नाम

अगर वीसी ने धर्म संकाय में नियुक्ति नियमों का ध्यान रखा होता तो BHU की बदनामी नहीं होती: प्रो. वशिष्ठ त्रिपाठी

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान के छात्रों द्वारा गैर हिन्दू फिरोज खान की नियुक्ति का विरोध जारी है। छात्रों को शंकराचार्यों, काशी विद्वत परिषद, पूर्व और वर्तमान प्रोफेसरों, संकाय प्रमुख और विभागाध्यक्षों का जबरदस्त समर्थन मिल रहा है। काशी विद्वत परिषद, 50 से अधिक प्रोफेसरों, शंकराचार्य सहित बनारस के कई आचार्यों और विद्वानों ने BHU के विजिटर महामहिम राष्ट्रपति को पत्र लिखकर आवश्यक हस्तक्षेप का अनुरोध करते हुए फिरोज खान की नियुक्ति रद्द करने को कहा, जिसका कार्यकारिणी ने संज्ञान भी लिया। BHU की बदनामी से चिंतित कार्यकारिणी की अगली बैठक 7 दिसम्बर को बुलाई गई है। जिसमें फिरोज खान प्रकरण पर भी निर्णय लिया जाएगा।

दूसरी ओर छात्रों का आंदोलन निर्बाध गति से चल रहा है। प्रशासन के 10 दिन की मोहलत के अनुरोध पर छात्रों ने धरना भले समाप्त कर दिया हो लेकिन कक्षाओं और परीक्षाओं का पूर्णतया बहिष्कार जारी है और आंदोलन को गति देने के लिए रोज कई कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं जिसमें तमाम विद्वानों और आचार्यों को अपने विचार प्रकट करने के लिए बुलाया जा रहा है। चूँकि, इसमें से अधिकांश आचार्य-प्रोफ़ेसर अब विश्विद्यालय की नौकरी में नहीं हैं इसलिए वाइस चांसलर को खरी-खोटी सुनाने से लेकर लानत-मलामत में भी कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।

आंदोलन की कड़ी में ही 26 नवंबर को अस्सी घाट पर एक सभा हुई। सभा मे आए मुख्य वक्ता न्याय शास्त्र के मूर्धन्य विद्वान प्रो. वशिष्ठ त्रिपाठी ने संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में हुई नियुक्ति को महामना के मूल्यों व विश्वविद्यालय के संविधान के विपरीत बताया। साथ ही यह भी कहा, “इतिहास शिलालेखों के आधार पर ही लिखे जाते हैं। BHU स्थापना स्थल पर लगे शिलालेख से अगर BHU के स्थापना काल का निर्धारण किया जाता है तो धर्म विज्ञान संकाय में लगे शिलालेख को भी मानना ही पड़ेगा। हमारी परंपरा में तो न्याय का विद्यार्थी साहित्य में, व्याकरण में नहीं पढ़ा सकता तो दूसरे धर्म का व्यक्ति कैसे पढ़ा सकता है।”

SVDV के ही पूर्व छात्र व प्राध्यापक रहे, राष्टपति, विश्वभारती आदि अनेक पुरस्कारों से सम्मानित प्रोफ़ेसर वशिष्ठ त्रिपाठी ने चयन समिति पर ही सवाल उठाते हुए कहा कि विभागाध्यक्ष व संकाय प्रमुख को विचार करना चाहिए था। उहोंने कहा कि महामना ने किसी विशिष्ट उद्देश्य के साथ ही इस संकाय को बनाया होगा और साथ ही नियम भी बनाए होंगे। साथ ही यह भी बताए कि अन्य संकायों में जहाँ संस्कृत पढ़ाया जाता है वहाँ नियुक्ति में कोई आपत्ति नहीं होती किसी को। संविधान किसी को भी किसी के धर्म मे हस्तक्षेप की अनुमति नहीं देता।

साथ ही साथ उन लोगों के बयानों को खंडित करते हुए कहा कि जो कहते हैं कि जैन, बौद्ध हिन्दू नहीं है, तो वो लोग विक्षिप्त हैं, भारत में उदय हुआ कोई भी धर्म सनातन धर्म से अलग नहीं हो सकता। आस्तिक-नास्तिक, वैदिक-अवैदिक को लेकर जरूर भेद है। साथ ही साथ उन्होंने भारत सरकार से इस नियुक्ति की जाँच कराने की भी माँग की।

प्रोफ़ेसर शिवराम गंगोपाध्याय एवं प्रोफ़ेसर वशिष्ठ त्रिपाठी

प्रोफ़ेसर त्रिपाठी ने कहा, “आंदोलन तो छात्रों के बल पर चल रहा है। कितने प्रोफ़ेसर खुल कर सामने आए कि कुलपति, विभागाध्यक्ष और संकायप्रमुख को उनकी गलती और विश्विद्यालय का नियम बताएँ? बाद में कुछ लोग आए और अब सब आ रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि बहुत लोग अभी भी कोई मुद्दा अखबार और टीवी से समझते हैं। मीडिया ने गलत ही समझाना शुरू किया इससे भी लोगों को मूल बात पकड़ने में समय लगा। पुराने लोग जानते हैं कि विश्विद्यालय के इस संकाय में क्या नियम है लेकिन कुलपति, रजिस्ट्रार, विभागाध्यक्ष ने उनसे संपर्क ही नहीं किया।” उन्होंने इस आंदोलन को ‘न भूतो न भविष्यति’ की संज्ञा दी। कहा लोग ध्यान रखते तो आज ऐसी जरुरत ही नहीं पड़ती कि छात्र आज पठन-पाठन छोड़कर धर्म और सनातन मूल्यों की रक्षा के लिए सड़क पर हैं।

धर्म विज्ञान संकाय के न्याय विभाग के पूर्व छात्र व प्राध्यापक रहे डॉ. शिवराम गंगोपाध्याय जी ने कहा, “दो धर्मों को एकसाथ नहीं निभाया जा सकता। शास्त्रों का उदाहरण देते हुए बताए कि दो धर्मों को मानने वाले व्यक्ति को अपने घर मे भी नहीं प्रवेश देना चाहिए, क्योंकि वह अविश्वासी होता है।”

डॉ. शिवराम गंगोपाध्याय जी ने यह भी कहा, “अगर इतना ही संस्कृत भाषा पढ़े लिखे हैं व उसके प्रति सम्मान है तो अभी तक सनातन धर्म को स्वीकार कर लेना चाहिए था। साथ ही यह शास्त्र का नियम बताया कि हर व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करना चाहिए तभी आपकी पूजा होगी। किसी भी परिस्थिति में अपने धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए। दूसरे धर्म को जानना, पढ़ना अलग बात है, पर उस धर्म की शिक्षा देना अलग। हो सकता है पढ़ाते समय वह अपने धर्मों के अनुसार शास्त्रों की व्याख्या करने लगे जिससे हमारी परम्परा ही नष्ट हो जाय।”

उन्होंने यह भी कहा कि संस्कृत भाषा पढ़ाने पर कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन जहाँ बात धर्म की और उसके मूल्यों की है तो यह हम सबकी ज़िम्मेदारी है कि जैसे हमारे पुरखों ने आज तक इसे बचाए और संरक्षित रखा, हमें भी इसे आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखना चाहिए। आज मजहब वाला इसकी व्याख्या करेगा तो कल ईसाई ऐसे में उनके अपने प्रभाव से अछूता नहीं रहेगा। आखिर इसकी ज़रूरत ही क्या है। हिन्दू धर्म में विद्वानों का अकाल थोड़ी न है।

इस अवसर पर SVDV के ही पूर्व छात्र अंतरराष्ट्रीय कवि डॉ. अनिल चौबे भी उपस्थित रहे, हालाँकि, स्वास्थ्य ज्यादा खराब होने से वे बोल नहीं पाए, लेकिन छात्रों को समर्थन देने के लिए कार्यक्रम में उपस्थित रहे।

डॉ. मुनीश मिश्र ने मीडिया के माध्यम से समाज मे फैले भ्रम के सभी पक्षों का निवारण करते हुए प्रशासन की गलतियों को भी गिनाया। उन्होंने कहा, “आज विश्वविद्यालय की बदनामी कुलपति (VC) की नासमझी की वजह से हो रही है। जब कोई ऐसा कुलपति हो जिसे न उस संस्थान और उसके संस्थापक के मूल्य पता हों, न हिन्दू धर्म में आस्था तो ऐसा अनर्थ होना स्वाभाविक हो जाता है। सरकार को सोचना चाहिए जब वो कुलपति का चुनाव करती है कि कहाँ के लिए कैसा कुलपति उपयुक्त है।” बता दें कि 80 के दशक में इंदिरा गाँधी ने भी ऐसी एक गलती की थी जब BHU में ईसाई धर्म को मानने वाले एक कुलपति को नियुक्त कर दिया जिसका विश्विद्यालय सहित बनारस में जबरदस्त विरोध हुआ, इंदिरा जी को अपनी गलती समझ आई और उनके निर्देश पर उन्होंने खुद ही अपने आपको इस पद से अलग कर लिया।

15 दिनों तक चले धरने में और उसके बाद भी चल रहे आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाने वालों में शशिकांत मिश्र सहित SVDV के छात्रों की उपस्थिति में कार्यक्रम का संचालन शुभम तिवारी ने, स्वागत व विषय प्रस्तावना कृष्ण कुमार मिश्र व धन्यवाद ज्ञापन करते हुए चक्रपाणि ओझा ने इस आंदोलन में सभी के शामिल होने आह्वान किया। उक्त अवसर पर आंदोलनरत छात्रों के साथ बड़ी संख्या में पूर्व छात्र व सामान्य जन भी उपस्थित रहे।

आंदोलन की आज की कड़ी में शशिकांत मिश्र ने बताया कि महामना के मूल्यों व धर्म के रक्षार्थ 27 नवंबर को 4:30 बजे से बीएचयू सिंहद्वार से मशाल जुलूस निकाला जाएगा जिसमें आप सभी बंधु-बांधवों से अनुरोध हैं कि अपनी गरिमामय उपस्थिति समय को ध्यान में रखते हुए दर्ज कराएँ।

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‘हिजड़ों का शासन’ चलाने वालों के समर्थन से ‘माताश्री का काकभगोड़ा’ बनेंगे मातोश्री के उद्धव

वो नवम्बर 16, 2016 का दिन था। नोटबंदी के फ़ैसले को बस 1 सप्ताह ही हुए थे। विपक्ष लगातार मोदी सरकार को घेरने में लगा हुआ था। विरोध में तृणमूल कॉन्ग्रेस ने राष्ट्रपति भवन तक मार्च किया। उसका साथ भाजपा की सहयोगी शिवसेना भी दे रही थी। उस समय शिवसेना उसी डॉक्टर मनमोहन सिंह के समर्थन में उतर आई थी, जिन्हें ख़ुद उद्धव ने कभी हिजड़ा कहा था। इतना ही नहीं, उन्होंने तो डॉक्टर सिंह को ‘राजनीतिक रूप से नपुंसक’ भी करार दिया था। बाद में वही मनमोहन शिवसेना के लिए हीरो बन गए और दिन-प्रतिदिन शिवसेना ने भाजपा की आलोचना को धार देना शुरू कर दिया।

समय बीतता चला गया और अब स्थिति ये आ गई है कि भाजपा का साथ छोड़ कर शिवसेना ने कॉन्ग्रेस और एनसीपी के समर्थन से सरकार बनाने का फ़ैसला लिया है। ख़ुद को हिंदूवादी पार्टी कहने वाली शिवसेना उस पार्टी की शरण में जा पहुँची है, जिसने राम के अस्तित्व को ही नकार दिया था। मीडिया जिसे कट्टर हिंदूवादी पार्टी की संज्ञा देती थी, जो हिंदूवादी मामलों में भाजपा से भी दो क़दम आगे थी, आज वही पार्टी सीएम पद के लिए चिर-विरोधियों से जा मिली है। वो भी तब, जब भाजपा के साथ उसके चुनाव-पूर्व गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिला, सरकार बनाने का जनादेश मिला। एनसीपी, कॉन्ग्रेस और शिवसेना के विधायकों ने उद्धव ठाकरे को अपना नेता चुन लिया है।

ये बाल ठाकरे की पार्टी है। उनके ख़ून-पसीने से सींची हुई पार्टी है, जिसके लिए उन्होंने कई मानक तैयार किए थे। ठाकरे जो कॉन्ग्रेस के सबसे बड़े विरोधियों में से एक रहे। भाजपा के साथ आने के बाद तो उन्होंने कॉन्ग्रेस पर इतने हमले किए कि कॉन्ग्रेस नेता उनका नाम भी सुनना पसंद नहीं करते थे। बाला साहब ने दशहरा की एक रैली के दौरान कहा था कि सोनिया के चरणों में तो हिजड़े झुकते हैं। उन्होंने कॉन्ग्रेस की सरकार को ‘हिजड़ों का शासन’ बताया था। आज कौन किसके चरणों में झुक कर शासन चलाने जा रहा है, ये बताने की ज़रूरत नहीं है। बाला साहब की परिभाषा वही है, बस किरदार बदल गए हैं। उनका बेटा शासन चलाने जा रहा है और वो भी ‘हिजड़ों का शासन’ चलाने वाली पार्टी के समर्थन से।

राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी को लेकर बाला साहब ठाकरे ने पूछा था कि क्या प्रधानमंत्री पद भिंडी बाजार में रखी गई कोई कुर्सी है? आज फिर से भिंडी बाजार लगा है, बस कुर्सी बदल है। कॉन्ग्रेस और बाला साहब का बयान वही है, बस प्रधानमंत्री पद की जगह इस बार मुख्यमंत्री पद ने ले ली है। ठाकरे सोनिया को ‘इटालियन पार्टी’ कहते थे। ठाकरे का कहना था कि कॉन्ग्रेस द्वारा ‘इटालियन औरत’ को आगे लाना शर्मनाक है। बाल ठाकरे कहते थे कि कॉन्ग्रेस अब ‘इटालियन कॉन्ग्रेस’ बन गई है। बाल ठाकरे ने कॉन्ग्रेस को ‘2500 सिखों के क़त्ल का जिम्मेदार’ बताया था। बाल ठाकरे के बेटे आज उसी कॉन्ग्रेस के साथ शासन चलाएँगे।

जब बात मुख्यमंत्री पद की हो रही है तो उस सम्बन्ध में भी बाल ठाकरे का बयान याद किया ही जाएगा। बाल ठाकरे मानते थे कि कॉन्ग्रेस के जितने भी मुख्यमंत्री हैं, वो सभी सोनिया गाँधी के ‘कुरियर सर्विस’ हैं। कॉन्ग्रेस के बाहर से समर्थन से सीएम बनने वाले के लिए उनका बयान क्या होता, ये तो उनकी अनुपस्थिति में सिर्फ़ अनुमान ही लगाया जा सकता है। बाल ठाकरे ने कॉन्ग्रेस के मुख्यमंत्रियों की तुलना ‘काकभगोड़ों’ से की थी। आपने भी पढ़ा होगा- “काकभगोड़ा-काकभगोड़ा, जितना लम्बा-उतना चौड़ा“। ये मानव आकर का अस्थायी ढाँचा भर होते हैं, कौवें खेतों में नहीं आते। वो इन्हें असली का आदमी समझ लेते हैं। आज काकभगोड़ा कौन है, यह तो बालासाहब ही बता पाते।

शिवसेना और बाला साहब के विरोध में कॉन्ग्रेस क्या करती थी? कॉन्ग्रेस तो उस अख़बार को ही जला डालती थी, जिसमें बाला साहब ठाकरे का इंटरव्यू छपा होता था। क्या अब वही कार्यकर्ता उद्धव को सीएम बनाने के पार्टी के फ़ैसले से ख़ुश होंगे? हाँ, शिवसेना ने ज़रूर 2012 के राष्ट्रपति चुनाव में कॉन्ग्रेस उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी का समर्थन किया था और बाला साहब से उनकी मुलाक़ात भी हुई थी, लेकिन इस मुलाक़ात से सोनिया खफा थीं। ख़ुद मुखर्जी ने अपनी पुस्तक में इसका खुलासा किया है। राहुल की ‘माताश्री’ अपनी पार्टी के नेता के ‘मातोश्री’ जाने से ख़फ़ा थीं। अब सोनिया के समर्थन ने ‘मातोश्री’ से सीएम निकलेगा। ठाकरे ने तो जनता से कहा था कि आपने इन अयोग्य लोगों (कॉन्ग्रेस) को चुना है तो अब झेलिए। लगता है महाराष्ट्र को भी ‘झेलना’ ही पड़ेगा।

आज सारे समीकरण पलट गए हैं। बाल ठाकरे ने कहा था कि शरद पवार ने सोनिया गाँधी को ख़ुश करने के लिए एक सड़क का नाम राजीव गाँधी के नाम पर रख दिया। आज सोनिया गाँधी, उनको ‘ख़ुश करने वाले पवार के साथ बाल ठाकरे के बेटे उद्धव सरकार चलाएँगे। कितना अजीब संयोग है न? जिन शब्दों का प्रयोग शिवसेना के संस्थापक और वर्तमान अध्यक्ष, इन दोनों ने पूर्व में किया था, आज वही शब्द वापस आकर उद्धव को घेरेंगे ज़रूर। ख़ुद उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे कॉन्ग्रेस की तुलना रावण से कर चुके हैं। अब इस नए ‘रामायण’ में कौन राम है और कौन रावण, कुछ पता नहीं चल रहा। आदित्य की नज़र में कॉन्ग्रेस और एनसीपी, दोनों ही ‘महाराष्ट्र के लुटेरे’ हुआ करते थे। इतने कम दिनों में सबकुछ बदल गया।

नोट: किसी भी तरह के भेदभाव, कमजोरी या गाली के तौर पर हिजड़ा जैसे शब्दों के इस्तेमाल का ऑपइंडिया समर्थन नहीं करता है। यहाँ राजनीतिक स्थिति को समझाने के लिए हमने बाल ठाकरे के शब्दों का हू-ब-हू इस्तेमाल किया है।

फ़िरोज़ा ने बताया उइगरों का हो रहा बलात्कार, वायरल हुआ वीडियो, TikTok ने किया ब्लॉक

वायरल वीडियोज़ ऍप टिकटॉक ने अपने एक यूज़र के अकाउंट को सस्पेंड कर दिया है, क्योंकि उसने चीन में उइगरों के साथ हो रहे अमानवीय अत्याचार की पोल खोलने की जुर्रत की थी। फ़िरोज़ा ने ट्विटर पर बताया कि टिकटॉक ने उन पर एक महीने का प्रतिबंध लगा दिया है। लेकिन साथ ही साफ़ किया कि ऐसी ओछी हरकत कर के उनका मुँह नहीं बंद किया जा सकता है। गौरतलब है कि टिकटॉक ऍप की मालिक कम्पनी बाइटडांस चीन के सोशल मीडिया जगत में बहुत बड़ा नाम है।

दरअसल फ़िरोज़ा ने अपने एक वीडियो को बड़ी ही चालाकी से देखने में पलकें लम्बी करने के लिए ब्यूटी टिप्स की तरह से बनाया, और उसमें पलकें लम्बी करने का हुनर सिखाने के बीच में ही उइगरों की हिमायत में भी वीडियो में बात कर दी। सोशल मीडिया के पैंतरों में इसे बेट-एंड-स्विच कहते हैं, यानि किसी और विषय का हवाला देकर ऑडियंस को बुलाना, और फिर किसी और ही दिशा में उन्हें घुमा ले जाना।

40 सेकंड का यह वीडियो तेज़ी से टिकटॉक पर वायरल हो गया। इतना ज़्यादा कि, इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, टिकटॉक का यूज़र बेस बेहद सीमित होने के बाद भी इसे 498,000 लोगों ने लाइक किया।

लेकिन इसके बाद टिकटॉक ने फ़िरोज़ा का अकाउंट सस्पेंड कर दिया। हालाँकि टिकटॉक की मालिक बाइटडांस के प्रवक्ता जॉश गार्टनर ने सफ़ाई दी है कि इस प्रतिबंध का कारण फ़िरोज़ा के फ़ोन से इसके पहले एक दूसरा अकाउंट चलता था, जिसने ओसामा बिन लादेन की तस्वीर पोस्ट की गई थी। गार्टनर भले यह दावा करें कि फ़िरोज़ा को सस्पेंड जिहादी कंटेंट शेयर करने के लिए किया गया है, लेकिन इससे इस धारणा को और बल ही मिला है कि बाइटडांस ऐसे कंटेंट को सेंसर करने की फ़िराक में रहती है, जो चीन के खिलाफ हो या चीन की सरकार को पसंद न आए।

यह सर्वविदित है कि चीनी कम्पनियाँ चीनी सरकार और उसकी विदेश नीति के हुक्म की तामील करतीं हैं। विदेशी कंपनियों तक को चीन घुटने पर ला चुका है। अमेरिकी बास्केटबॉल लीग एनबीए में एक फ्रेंचाइजी के मालिक ने हाल ही में हुए चीन-विरोधी हॉन्ग-कॉन्ग प्रदर्शनों के समर्थन में ट्वीट क्या कर दिया, पूरी लीग को चीन से गिड़गिड़ा कर माफ़ी माँगनी पड़ी।