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भारत के खिलाफ कोई भी गतिविधि बर्दाश्त नहीं की जाएगी: PM मोदी ने ट्रम्प को फोन पर कहा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से बात की है। फोन कॉल पर दोनों की बातचीत लगभग आधे घंटे तक चली। इस दौरान दोनों ने द्विपक्षीय मुद्दों से लेकर क्षेत्रीय मसलों पर भी बातचीत की। प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, दोनों नेताओं की बातचीत में वही गर्मजोशी और सौहार्द देखने को मिला, जो भारत-अमेरिका के रिश्तों में भी झलकता है।

इस दौरान पीएम मोदी ने यह साफ़ कर दिया कि दक्षिण एशिया के कुछ नेताओं द्वारा भारत के ख़िलाफ़ हिंसा फैलाने के उद्देश्य से भड़काऊ बयानबाजी की जा रही है, जो क्षेत्र की शांति के लिए सही नहीं है। अर्थात, नरेंद्र मोदी ने ट्रंप से पाकिस्तान से संबंध पर बात की और कहा कि पाक की एंटी भारत विरोधी गतिविधियाँ क्षेत्र में शांति के लिए एक बड़ा ख़तरा है, भारत ऐसी गतिविधियाँ बर्दाश्त नहीं करेगा।

पीएम मोदी ने राष्ट्रपति ट्रम्प से बात करते हुए आतंक और हिंसा से मुक्त शांतिपूर्ण वातावरण तैयार करने की महत्ता पर प्रकाश डाला। पीएम मोदी ने सीमा पार से आतंकवाद को बढ़ावा दिए जाने के ख़िलाफ़ भी अपनी बात रखी।

राजस्थान: पूर्व प्रधान ने धोखे से हस्ताक्षर करा कर हड़प ली आदिवासियों की 286 बीघा ज़मीन

राजस्थान के डूंगरपुर से एक पूर्व प्रधान द्वारा जालसाजी और धोखाधड़ी करने का मामला सामने आया है। यह घटना सीमलवाडा उपखंड के जोरावरपुरा गाँव की है, जहाँ पूर्व प्रधान नानुराम परमार ने 32 आदिवासियों की 286 बीघा ज़मीन हड़प ली। पीड़ितों ने सोमवार (अगस्त 19, 2019) को कलेक्ट्रेट पहुँच कर डीएम व एसपी को इस सम्बन्ध में ज्ञापन सौंपा। पीड़ितों ने पूर्व प्रधान परमार के ख़िलाफ़ आपराधिक मामला दर्ज कर उनके ख़िलाफ़ उच्च-स्तरीय जाँच बिठाने की माँग की।

पूर्व प्रधान ने 8 वर्ष पहले ही आदिवासियों से ज़मीन सम्बन्धी कागजात पर हस्ताक्षर करा लिए थे। चूँकि, आदिवासी केवल हस्ताक्षर करना जानते थे और वे यह देखने में सक्षम नहीं थे कि कागजात पर क्या लिखा हुआ है, पूर्व प्रधान ने इसका ग़लत फायदा उठाया। न्यूज़ 18 की ख़बर के अनुसार, पूर्व प्रधान ने ख़राब हुई फसल का मुआवजा दिलाने के बहाने आदिवासियों की ज़मीन हड़प ली।

ग़रीब आदिवासियों को इसका पता तब चला जब वे प्रधानमंत्री किसान निधि योजना का लाभ लेने पटवार मंडल गए। उन्हें पता चला कि अब वो ज़मीनें उनकी नहीं रहीं। मामले में उचित कार्रवाई न करने पर आदिवासियों ने आंदोलन की चेतावनी दी है।

भारत, धर्म और कानून: ‘आधुनिक’ भारतीय मानस की औपनिवेशिक दासता

भारतवर्ष की सभ्यता का उत्तराधिकारी भारतीय गणराज्य जब अपना 73वाँ स्वतन्त्रता दिवस मना रहा था, तब माननीय सुप्रीम कोर्ट श्री राम जन्मभूमि मामले में दैनिक सुनवाई चल रही थी। श्री पद्मनाभस्वामी स्वामी मंदिर मामले और श्री सबरीमाला अय्यप्पा मंदिर मामले में पुनर्विचार याचिकाओं पर फ़ैसले अभी लंबित हैं।

इसके अलावा श्री जगन्नाथ पुरी मंदिर भी सुप्रीम कोर्ट के कटघरे में खड़ा है, और न जाने किस कारण से स्वर्गीय स्वामी दयानन्द सरस्वती जी की रिट पेटीशन पर अभी बहस ही शुरू नहीं हुई है। उन्होंने तमिल नाडु, पुडुचेरी, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के मंदिर नियंत्रण कानूनों को चुनौती दी थी। इन कानूनों के ज़रिए ‘सेक्युलर’ राज्य की राज्य सरकारों को केवल और केवल मंदिरों के मामले में निरंकुश शक्तियाँ दी गईं हैं।

इन सबके अलावा The Places of Worship (Special provisions) Act, 1991 [उपासना स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991] नामक भेदभावपूर्ण और अनर्गल कानून भी है, जो मध्ययुगीन बर्बरता के शिकार लोगों को अपने उपासना स्थलों, अपनी धरोहरों को पुनः प्राप्त करने से रोकता है।

ऐसे में दिमाग में यह सवाल उठता है कि एक हज़ार साल तक भारतीय सभ्यता को मिटा देने के अनथक प्रयासों को हरा देने, नाकाम कर देने के बाद भारत ऐसी स्थिति में कैसे पहुँच गया है।

‘आधुनिक’ भारतीयों का औपनिवेशिक मानस

इस सवाल का शायद कोई जवाब नहीं है। पर इतना तो माना ही जा सकता है कि विदेशी लगाम तो हमने गले से 1947 में उतार फेंकी, लेकिन भारतीय जन के मानस से गुलामी की विचारधारा निकलना अभी बाकी है, और औपनिवेशिक मानसिकता से काम कर रहा आधुनिक भारतीय इस दशा के लिए काफी हद तक ज़िम्मेदार है। और यह विश्लेषण एक नहीं, कई भारतीय मूल के ही नहीं, विदेशी मूल और भारतीय मानस वाले विचारकों और विद्वानों का है।

यह ‘औपनिवेशिक मानस’ है क्या, इसे संक्षिप्त में ऐसे समझा जा सकता है कि आम ‘आधुनिक’ भारतीय अभी भी गोरे साहब के पैमानों पर ही शाबाशी तलाशता है। विदेशी पैमाने आम भारतीय चेतना में इतनी गहराई तक पैवस्त है (धँसा हुआ है) कि उसके लिए वही केवल सामान्य नहीं, आदर्श भी बन गया है। और अंग्रेज़ों की इसी मानसिक गुलामी में बँधे रहने के कारण ही आम भारतीय को हर भारतीय मूल और प्रकृति की चीज़ गँवारू और असभ्य, अंधविश्वासी, जातिवादी, नारी-विरोधी, अवैज्ञानिक और ‘एलीटिस्ट’ लगती है। और इस पूर्वाग्रह पर वह किसी भी प्रकार की बहस के लिए तैयार नहीं है।

वैचारिक गुलामी की ज़ंजीरों में बंधा यह भारतीय मानस न तर्क मानता है न ही तथ्य। वैचारिक रूप से गुलाम ‘आधुनिक, धर्मनिरपेक्ष, वैज्ञानिक’ सोच वालों ने खुद ही ‘जाहिल मूलनिवासियों’ को ‘सभ्य’ बनाने का ठेका ले लिया है। और यह ‘आधुनिकीकरण’ केवल भारतीय उद्गम वाली/धार्मिक आस्थाओं का ही होता है, बाकियों में या तो इन्हें इसकी ज़रूरत ही नहीं दिखती, या फिर यह सुविधानुसार बनी ‘सेक्युलरिज़्म’ की परिभाषा के विरुद्ध हो जाता है।

अपने आपको ‘संवैधानिक देशभक्त’ (Constitutional Patriot) दिखाना भी इसी गुलामी की मानसिकता की ही ज़रूरत है। इनके लिए इस देश में संविधान के पहले तो कोई काम की चीज़ रही ही नहीं। उससे पहले की चीज़ों से या तो रिश्ता तोड़ लेने की इनके अनुसार ज़रूरत है, या फिर औपनिवेशिक लेंस से उसकी व्याख्या पुनः किए जाने की ज़रूरत है। अगर ज़रूरी हो तो इतिहास को ‘अविष्कृत’ भी किया जा सकता है। ‘झटका’ के नाम से इनकी नाक सिकुड़ती है, और ‘हलाल-सर्टिफिकेट’ के साथ भारतीय भूतकाल से पीछा छुड़ाने से ज़्यादा आनंद इन्हें किसमें आएगा?

और यह लम्बी-चौड़ी भूमिका बाँध कर आखिर मैं कहना क्या चाहता हूँ, आइए उसपर बात करते हैं।

न्यायिक तंत्र का ‘इन्हें सभ्य बनाओ’ मिशन

भारतीय न्यायिक तंत्र भारतीय विचार, परम्पराओं और संस्थाओं, बल्कि समूची भारतीय जीवन-शैली को ही, उसी औपनिवेशिक लेंस से देखता है, जिसकी हमने ऊपर बात की थी। उनके लिए हम सतत ‘सुधार’ की ज़रूरत में फँसे असभ्य मूलनिवासी हैं। भारतीय जीवन के हर पक्ष, शादी और उत्तराधिकार से लेकर धार्मिक परम्पराओं और त्यौहारों तक हर चीज़ को वे अपने इसी लेंस से गुज़ारकर देखते हैं, भले ही इनके पीछे का भारतीय कारण, भारतीय पक्ष उनकी समझ से बाहर हो। यह बात अलग है कि इतनी बार वही चीज़ करने पर भूले-भटके कभी-कभी वे सही साबित हो जाते हैं, जैसे बंद घड़ी दिन में दो बार सही समय बता जाता है।

कुछ लोगों का मानना है कि इस मानसिकता की जड़ में संविधान है। मैं इस मूल्यांकन से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ; लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं कि मैं इसे पूरी तरह गलत ही मानता हूँ। मैं इस मामले में सच में एक विचार तय नहीं कर पा रहा हूँ।

लेकिन अगर स्टैंड लेने को कह ही दिया जाए, तो मुझे लगता है कि गलती संविधान की व्याख्या करने और उसे और अन्य कानूनों को लागू करने वालों को मिली ट्रेनिंग की है। और यह मेरी राय भी अनिश्चित है, मैं इसे लेकर खुद भी 100% आश्वस्त नहीं हूँ।

जड़ों में ही ज़हर भर दिया जाता है

कच्ची उम्र में, जब मस्तिष्क और विचार बन ही रहे होते हैं, जब यह सिखाया जाता है कि तर्क, कारण, लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की आज़ादी, मूलभूत अधिकार, बराबरी, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सत्य, न्याय, लैंगिक समानता, न्याय का शासन आदि विदेश से मँगाए गए हैं, और इन क्षेत्रों में भारत के योगदान की तरफ एक नज़र दौड़ाने की भी कोशिश नहीं होगी, तो ज़ाहिर है कि युवा मन में यह बात बैठ जाएगी कि इन क्षेत्रों में भारत का कोई योगदान रहा ही नहीं।

केवल भारत के योगदानों को नज़रअंदाज़ ही किया जा रहा हो, ऐसा भी नहीं है। स्कूलों-कॉलेजों के इतिहास और राजनीति-शास्त्र के पाठ्यक्रमों में भारतीय जीवन-पद्धति के खिलाफ ज़हर उगला जाता है। इसे उगलने वाले मार्क्सवादी विचारधारा के होते हैं, जो दिखावे के लिए भी वैचारिक विभिन्नता बर्दाश्त नहीं कर सकते। ऐसे में कोई आश्चर्य की बात नहीं कि हर भारतीय उद्गम का संस्थान कटघरे में खड़ा हो जीवित रहने, अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए गुहार करता, तर्क-वितर्क करने पर मजबूर दिखता है। और उसे अस्तित्व में होना चाहिए या नहीं, यह तय करने की शक्ति रखने वाले यह मानकर चलते हैं कि ‘इंडिक’ (भारतीय उद्गम और प्रकृति वालों) तो स्वभावतः अपराधी है, और यह उस पर है कि साबित करे वह ऐसा नहीं है। किसी एक कानून को हटा देने या बदल दिए जाने से कानूनी शिक्षा के इस गलत ‘एंगल’ से हो रहे नुकसान की भरपाई नहीं हो सकती।

समाधान

इसका समाधान शिक्षा-व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव में ही है। इतिहास, राजनीति शास्त्र और न्यायिक शिक्षा के पूरे ढाँचे में बदलाव करने की ज़रूरत है, चाहे मार्क्सवादी व्यक्तियों और शैक्षिक संस्थानों द्वारा इसका जितना भी विरोध हो। वे इन क्षेत्रों को अपने घर की खेती समझते हैं, जिसमें उनसे विभिन्न विचार रखने वाले का कदम रखना भी मना है।

लेकिन इस मामले में राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2019 का ड्राफ़्ट निराश करता है। न्यायिक शिक्षा में सुधार, या उसकी खामियों का ढंग से विश्लेषण, केवल एक अनुच्छेद तक सीमित हैं। यह नाकाफी है। और इस बात को नज़रअंदाज़ करता है कि कानून और सुप्रीम कोर्ट की पहुँच में पूरा देश होता है।

जैसे केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 के मामले में तैयारी और साहस दिखाया, क्या वैसा ही साहस कानूनी शिक्षा और उससे जुड़े अन्य मसलों के मामले में दिखाया जाएगा? क्या भारतीय सभ्यता के सत्य और न्याय की स्थापना, जोकि धर्म के मूल हैं, में योगदान के साथ न्याय होगा?

(भगवान अय्यप्पा मामले में सुप्रीम कोर्ट में उनका पक्ष रखने वाले सुप्रीम कोर्ट के वकील जे साई दीपक के अंग्रेजी में प्रकाशित मूल लेख का अनुवाद मृणाल प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव ने किया है। )

देखिए किस तरह से वायुसेना ने तवी नदी में फँसे 2 मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकाला

जम्मू के तवी नदी में फँसे 2 लोगों को भारतीय वायुसेना ने बहादुरी का परिचय देते हुए बाहर निकाल लिया है। मुश्किल परिस्थितियों में भी वायुसेना द्वारा दोनों फँसे लोगों को सफलतापूर्वक बाहर निकाल लेना लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। सोशल मीडिया पर इसका वीडियो वायरल हो रहा है और ख़ूब शेयर किया जा रहा है। इस वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे वायुसेना के जवान ने रस्सी के सहारे हैलीकॉप्टर से नीचे उतर कर दो लोगों को बचाया, जो नदी में झंझावातों के बीच घिर गए थे।

भारतीय वायुसेना ने तवी नदी में फँसे लोगों को सुरक्षित निकाला

इस वीडियो को देख कर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि आपदा की स्थिति में किन मुश्किल परिस्थितियों के बीच हमारी सेना आम नागरिकों को सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाने का कार्य करती है। उक्त वीडियो में पहले तो वायुसेना का जवान दोनों फँसे नागरिकों को सेफ्टी बेल्ट पहना कर रस्सी के सहारे हेलीकॉप्टर में भेजता है और बाद में ख़ुद जाता है। वायुसेना ने एमआई-17 हेलीकॉप्टर का प्रयोग कर इस रेस्क्यू ऑपरेशन को अंजाम तक पहुँचाया।

सुरक्षित निकाले गए दोनों व्यक्ति मजदूरी का कार्य करते हैं। तवी नदी का पानी अभी पूरे उफान पर है और बाढ़ के कारण कई इलाक़े डूब गए हैं। वायुसेना के रेस्क्यू ऑपरेशन को देखने के लिए पुल पर लोगों का जमावड़ा लगा हुआ था।

नाराज़ मलेशिया के PM ने ज़ाकिर नाइक को राजनीतिक गतिविधियों से दूर रहने को कहा, समन जारी, होगी पूछताछ

भगोड़े ज़ाकिर नाइक की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं लेकिन उसकी अकड़ अभी भी कम नहीं हुई है। हिन्दुओं व चीनियों के ख़िलाफ़ आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में मलेशिया के अधिकारियों ने उसे दूसरी बार समन जारी किया है। विवादित इस्लामिक उपदेशक को मलेशिया के प्रधानमंत्री महाथिर मोहम्मद ने साफ़-साफ़ कह दिया है कि उसे वहाँ की राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने की अनुमति नहीं है। मनी लॉन्ड्रिंग और हेट स्पीच के मामलों में भारतीय एजेंसियों को भी ज़ाकिर नाइक की तलाश है।

बौखलाए नाइक ने पेनांग के उपमुख्यमंत्री पी रामासामी सहित 4 बड़े नेताओं को अदालत में घसीट लिया है। ज़ाकिर ने इन सभी से 48 घंटे के अंदर माफ़ी माँगने अथवा मानहानि का मुक़दमा झेलने की धमकी दी है। इन नेताओं ने साफ़ कर दिया कि ज़ाकिर का बयान जहरीला और विभिन्न सम्प्रदायों के बीच वैमनस्य फैलाने वाला था। ज़ाकिर ने मलेशिया के मानव संसाधन मंत्री के ख़िलाफ़ भी मामला दर्ज कराया है। उसका कहना है कि इन नेताओं ने उसके बयान को ग़लत तरीके से पेश किया।

मलेशिया के पूर्व पुलिस प्रमुख रहीम नूर ने सरकार से माँग की है कि ज़ाकिर नाइक का ‘परमानेंट रेजिडेंट’ समाप्त कर उसे भारत को सौंप दिया जाए क्योंकि उसने आपराधिक कार्य किया है। ज़ाकिर नाइक ने अपने विवादित बयान में कहा था कि मलेशिया में रहने वाले हिन्दुओं को भारत में रह रहे अल्पसंख्यकों से सौ गुना ज्यादा अधिकार मिलते हैं, फिर भी वे (मलेशिया निवासी हिन्दू) मलेशिया के पीएम की बजाय मोदी का ही समर्थन करते हैं।

हालाँकि, मलेशिया के प्रधानमंत्री कई मौक़ों पर ज़ाकिर नाइक का समर्थन करते रहे हैं लेकिन अबकी उन्होंने कहा है कि इस्लामिक उपदेशक ने इस बार बयान देते हुए हद पार कर दी। प्रधानमंत्री महाथिर ने कहा कि चीनियों व भारतियों को वापस जाने की बात कह ज़ाकिर ने सीमा लांघी है। बाद में अपने बयान से पलटते हुए ज़ाकिर नाइक ने कहा कि उसने इस बात पर चर्चा की थी कि मलेशिया में किस तरह से हिन्दू अल्पसंख्यकों को काफ़ी अधिकार दिए जाते हैं।

पूर्व PM चंद्रशेखर के बेटे नीरज शेखर राज्यसभा में निर्विरोध निर्वाचित, सपा छोड़ BJP में हुए थे शामिल

भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी नीरज शेखर राज्यसभा के लिए निर्विरोध निर्वाचित हो गए हैं। उन्होंने जुलाई 15, 2019 को राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद वह समाजवादी पार्टी का दामन छोड़ कर भाजपा में शामिल हो गए थे। बलिया लोकसभा क्षेत्र उनके पिता पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का पारम्परिक गढ़ रहा है और नीरज शेखर ने पिता की विरासत को संभालते हुए यहाँ से 2 बार जीत दर्ज की। हालाँकि, 2014 आम चुनाव में सपा के टिकट पर लड़ते हुए उन्हें हार का सामना करना पड़ा था।

नीरज शेखर उत्तर प्रदेश के कोटे से राज्यसभा में निर्वाचित हुए हैं। चूँकि, उनके ख़िलाफ़ किसी अन्य प्रत्याशी ने नामांकन नहीं किया, नाम वापसी की समयसीमा ख़त्म होते ही उन्हें निर्विरोध निर्वाचित घोषित कर दिया गया। इसके साथ ही लगभग एक महीने के भीतर उनकी संसद में वापसी हो गई। यह भी जानने लायक बात है कि जिस सीट के लिए उपचुनाव हुआ, वह नीरज शेखर के इस्तीफे के बाद ही खाली हुई थी।

नीरज शेखर के आने से बिहार से लगे पूर्वांचल के क्षेत्रों में भाजपा और बढ़त बना सकती है। कहा जा रहा है कि 2019 लोकसभा चुनाव में सपा ने उन्हें बलिया से टिकट नहीं दिया, जिसके बाद से ही वे पार्टी ने नाराज़ चल रहे थे। नीरज शेखर ने जब दिल्ली भाजपा कार्यालय में पार्टी की सदस्यता ग्रहण की, तब कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा भी वहाँ मौजूद थे।

…क्योंकि वामपंथ का कोई लोकतंत्र नहीं होता: हॉन्गकॉन्ग के प्रदर्शनकारियों को आतंकी बता कर नहीं बच सकता चीन

चाहें वो चीन हो या उत्तर कोरिया, अधिकतर उदाहरणों से पता चलता है कि वामपंथ लोकतंत्र को नहीं मानता। इसके लिए आपको समझना पड़ेगा कि हॉन्गकॉन्ग में क्या हो रहा है? आपने सोशल मीडिया पर ऐसी पोस्ट्स ज़रूर देखी होगी, जिसमें हॉन्गकॉन्ग में प्रदर्शनकारियों द्वारा एम्बुलेंस को रास्ता देने से लेकर शांतिपूर्वक कैंडल मार्च निकालने तक का जिक्र किया गया है। हम परत दर परत घटनाक्रम की बात करते हुए इस पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रिया से लेकर चीन के रुख तक की बात करेंगे लेकिन पहले जानते हैं कि आखिर मुद्दा क्या है?

हॉन्गकॉन्ग में प्रदर्शन कई हफ्तों से चल रहा है। अगर ताज़ा प्रदर्शनों की बात करें तो 12 हफ़्तों से भी ज्यादा समय से यह चालू है। यह प्रदर्शन इसीलिए शुरू हुआ क्योंकि लोगों ने चीन की साम्राज्यवादी और विस्तारवादी नीतियों को भाँपते हुए उसके इरादों को पढ़ लिया। दरअसल, चीन ने हॉन्गकॉन्ग को मेनलैंड चीन में लाने की पूरी योजना तैयार कर ली थी। हॉन्गकॉन्ग की जनता ख़ुद को चीनी कहलाना पसंद नहीं करती और ब्रिटिश राज ख़त्म होने के बाद से ही उसे आर्थिक व शासकीय स्वायत्तता हासिल है।

हॉन्गकॉन्ग और चीन के बीच का समीकरण

हॉन्गकॉन्ग विश्व के सबसे समृद्ध इलाक़ों में शामिल है। व्यापार और मैन्युफैक्चरिंग का हब है। चीन ने हॉन्गकॉन्ग के कई ऐसे लोगों को ठिकाने लगाना शुरू कर दिया है, जिसे वह ख़तरे के रूप में देखता है। ये वो लोग हैं जो चीन द्वारा हॉन्गकॉन्ग को धीमे-धीमे पूरी तरह कब्जाने की नीति का विरोध करते रहे हैं। इलेक्शन कमिटी से लेकर क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों तक, बीजिंग ने हर जगह अपने लोग बिठा रखे हैं, जिससे वहाँ की जनता ख़ुद को ठगा महसूस करती है। हॉन्गकॉन्ग का अपना अलग संविधान है, जिसे ‘बेसिक लॉ’ कहा जाता है।

लेकिन, दिक्कत की बात यह है कि बेसिक लॉ 2047 में एक्सपायर हो जाएगा। उसके बाद क्या? क्या उसके बाद कोई भी निर्णय लेने से पहले चीन हॉन्गकॉन्ग की जनता की राय लेगा? हॉन्गकॉन्ग की चीफ एग्जीक्यूटिव भी चीन के किसी विश्वस्त को ही बनाया जाता है और जजों की नियुक्ति में अहम रोल होने के कारण क्षेत्र की न्यायिक व्यवस्था भी कमोबेश चीन के ही प्रभाव में काम करती है। यूनिवर्सिटी ऑफ हॉन्गकॉन्ग के एक सर्वे के अनुसार, वहाँ की 71% जनता अपने-आप को चीनी कहलाने में गर्व महसूस नहीं करती। ऐसी भावना युवाओं में और भी अधिक है।

चीन ने एक नया प्रत्यर्पण बिल लाकर यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया कि हॉन्गकॉन्ग के नागरिकों को न्यायिक कार्रवाई के लिए उन्हें मेनलैंड चीन ले जाया जा सकेगा। इससे वहाँ की जनता सतर्क हो गई और उन्होंने बिल का कड़ा विरोध किया, जिसके बाद इसे ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया। लेकिन, इसने हॉन्गकॉन्ग की जनता के भीतर की उस आग को बढ़ा दिया जो अरसे से भभक रहा था।

विरोध-प्रदर्शनों को लेकर चीन का रवैया

हॉन्गकॉन्ग में विरोध-प्रदर्शन करने वाले लोगों को चीन किसी आतंकवादी से कम नहीं मानता है। हॉन्गकॉन्ग के एयरपोर्ट पर जब सुरक्षा बलों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हुई, उसके बाद चीन ने इसे आतंकवादियों वाली हरकत बताया। जैसा कि आप जानते हैं, चीन में मीडिया सरकार के नियंत्रण में होती है और चीनी मीडिया संस्थान ‘ग्लोबल टाइम्स’ के एक पत्रकार की कुछ हरकतों के कारण हॉन्गकॉन्ग के लोगों से उसे बंधक बना लिया था। लोगों का कहना था कि वह चीनी जासूस है।

एक पुलिसकर्मी ने एक प्रदर्शनकारी महिला को नीचे गिरा कर उसकी तरफ बन्दूक तान दिया, जिसके बाद लोग भड़क गए। अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों की पिटाई भी की। क्षेत्र में लाखों लोग लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं और चीन ने हॉन्गकॉन्ग से कुछ दूर एक शहर में सुरक्षाबलों का जमावड़ा लगाया है ताकि ज़रूरत पड़ने पर कभी भी क्रैकडाउन किया जा सके। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भी आशंकाएँ जता चुके हैं कि चीनी सेना हॉन्गकॉन्ग में घुस कर गड़बड़ी कर सकती है।

ट्रम्प ने हॉन्गकॉन्ग की जनता की सुरक्षा व क्षेत्र की शांति पर जोर दिया। चीनी मीडिया लगातार सेना द्वारा पूरे साजो-सामान के साथ शेनजिन शहर में जमावड़ा लगाने की वीडियोज और फोटोज शेयर कर रहा है। उनका इरादा प्रदर्शनकारियों को डराने का है और यह सन्देश देने का है कि ज़रूरत पड़ने पर सेना कोई भी कार्रवाई करने के लिए तैयार है। ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने तो चीनी सेना का धौंस दिखाते हुए यहाँ तक लिखा कि हॉन्गकॉन्ग के लोग ‘आत्म विनाश’ की ओर बढ़ रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय समुदाय का नज़रिया

संयुक्त राष्ट्र ने हॉन्गकॉन्ग में बढ़ती हिंसक वारदातों को लेकर चिंता ज़ाहिर की। जम्मू-कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र की बैठक बुलाने वाले चीन ने हॉन्गकॉन्ग पर यूएन के बयान को ग़लत करार देने में तनिक भी देरी नहीं की और कहा कि इससे ‘अपराधियों’ को और बढ़ावा मिलेगा। चीन ने अपने प्यादे और हॉन्गकॉन्ग की चीफ एग्जीक्यूटिव कैरी लैम का भी बचाव किया। चीन हॉन्गकॉन्ग को मेनलैंड की तरह ट्रीट करना चाह रहा है और इसमें कैरी लैम उसकी भरपूर मदद कर रही हैं। ऐसे में, चीन का पूरा जोर इस बात पर है कि ‘एक देश, दो संविधान’ वाला नियम ख़त्म हो जाए।

चीन ने यूनाइटेड किंगडम को पहले ही गीदड़ भभकी दे रखी है कि उनके द्वारा हस्तक्षेप न किया जाए। जब यूके के कुछ नेताओं ने हॉन्गकॉन्ग में लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शन का समर्थन किया, चीन ने साफ़-साफ़ कहा कि यह बयान ब्रिटेन की ‘औपनिवेशिक सोच’ को दर्शाता है। बीजिंग ने ब्रिटेन को यह एहसास दिलाया कि हॉन्गकॉन्ग अब उसकी कॉलोनी नहीं है। प्रदर्शनकारियों के अनुसार, बीते सप्ताह कुल 17 लाख लोग सड़कों पर उतरे। हालाँकि, पुलिस ने इस आँकड़े को झूठा बताया। पुलिस के आसार, 1.3 लाख लोगों ने विरोध-प्रदर्शनों में हिस्सा लिया।

हालाँकि, हॉन्गकॉन्ग की जनता ने प्रदर्शन के बीच कई बार मानवता की मिसाल पेश की। एम्बुलेंस को रास्ता देना उनमें से एक है। प्रदर्शनकारी अधिकतर प्रतीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। चूँकि हॉन्गकॉन्ग एयरपोर्ट विश्व के सबसे व्यस्त एयरपोर्ट्स में से एक है, यहाँ प्रदर्शनकारियों के जमावड़े ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी तरह खींचा। सालाना 7 करोड़ से यात्रियों द्वारा इस एयरपोर्ट का प्रयोग किया जाता है। इसीलिए यहाँ हुई हिंसक झड़पों ने पूरी दुनिया का ध्यान आकृष्ट किया।

अब आगे क्या होगा?

हॉन्गकॉन्ग का भविष्य क्या होगा? प्रदर्शनकारियों के प्रति चीन क्या रवैया अपनाएगा? क्या कैरी लैम इस्तीफा देंगी?इतना तो तय है कि इस महानगर को मिली स्वायत्ता अब पहले जैसी नहीं रही है और आगे भी चीन इसे कम करता जाएगा। वह अपनी विस्तारवादी नीति को नहीं छोड़ेगा। चीनी मीडिया द्वारा सेना का धौंस दिखाना भी इसी का एक हिस्सा है। कुल मिला कर देखें तो वामपंथी सत्ता के आधीन चीन में लोकतंत्र का अभाव तो है ही, हॉन्गकॉन्ग में भी मेनलैंड चीन की दमनकारी नीतियों को लागू करने की कोशिश जारी है।

आपको थियानमेन स्क्वायर नरसंहार याद होगा ही ? चीन में हॉन्गकॉन्ग ही एक ऐसी जगह है, जहाँ उस वीभत्स घटना की बरसी पर मारे गए लोगों को याद किया जाता है क्योंकि मेनलैंड चीन में किसी की हिम्मत नहीं है। चीनी सेना द्वारा 10 हज़ार लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था, जिनमें से कई छात्र थे, युवा थे। बेख़ौफ़ बेशर्मी का आलम यह है कि चीन के सत्तासीन बड़े नेता आज भी अपनी इस कार्रवाई को सही ठहराते हैं। इस घटना के बारे में चीन में न कोई बोल सकता है, न मीडिया छाप सकती है और न ही सोशल प्लेटफॉर्म्स पर इसकी चर्चा हो सकती है।

हॉन्गकॉन्ग के बेसिक लॉ में जो बातें है, उनका आज कोई मोल नहीं रहा है, क्योंकि उसमें जनप्रतिनिधियों से लेकर न्यायिक व्यवस्था तक, सब पर चीन की छाया न पड़ने देने की कोशिश की गई थी। आज इसका उल्टा हो रहा है। कुल मिला कर देखें तो चीन को बस हॉन्गकॉन्ग की विदेश और रक्षा नीति पर ही निर्णय लेने का अधिकार सौंपा गया था। आर्थिक रूप से समृद्ध, पर्यटन के आधार पर अति व्यस्त और व्यापारिक रूप से महत्वपूर्ण हॉन्गकॉन्ग पर चीन का जितना ज्यादा कब्जा होगा, वहाँ की कम्युनिस्ट सरकार को उतना ही फायदा है।

जिंदगी से परेशान हैं पाकिस्तानी, कुछ नहीं मिला तो मेरे ऊपर निकाल रहे भड़ास: अदनान सामी

पाकिस्तानी मूल के गायक अदनान सामी ने कहा है कि पाकिस्तान के लोग अपने जीवन से निराश हो चुके हैं और इसकी भड़ास वे उन पर निकाल रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 के प्रावधानों निष्प्रभावी किए जाने के बाद से ही सामी पाकिस्तानियों के निशाने पर हैं। इसी क्रम में ट्विटर पर एक यूजर ने उनसे पूछा कि उन्हें पाकिस्तानियों की काफी आलोचना सुनने को मिल रही है। वो इन सबका सामना कैसे करते हैं?

सामी ने इसका जवाब देते हुए कहा कि पाकिस्तान के नागरिक खुद के जीवन से निराश हो चुके हैं और जब से उन्हें यह एहसास हुआ है कि वो इन सब से आगे निकल चुके हैं, तब से वो उनके ऊपर अपनी भड़ास निकाल रहे हैं। उन्होंने कहा कि वो उन लोगों को माफ करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि भगवान उनके जीवन में सुधार करें। वे वास्तव में पीड़ित हैं।

गौरतलब है कि, इससे पहले भी अदनान सामी ने अपने जवाब से ट्विटर पर ट्रोल करने वाले लोगों का मुँह बंद कर दिया था। सामी ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर ‘सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा’ लिखने वाले सर मोहम्मद ‘अल्लामा’ इक़बाल की इन्हीं पंक्तियों में ट्विटर पर शेयर किया था, इस तथ्य के साथ कि पाकिस्तान के ‘बौद्धिक पिता’ माने जाने वाले इक़बाल तकनीकी रूप से हिंदुस्तानी ही रहे, सारी उम्र। इक़बाल की मौत देश के विभाजन से 9 साल पहले 1938 में हो गई थी। उनका जन्म भी हिंदुस्तान में ही हुआ था। अदनान सामी ने इक़बाल की तस्वीर के साथ तिरंगा भी लगाया था।

इसके बाद बौखलाए पाकिस्तानी ट्रोल मुहम्मद शफ़ीक़ ने अदनान से पूछा कि उनके वालिद कहाँ पैदा हुए और मरे थे? अदनान ने शफ़ीक़ के ट्वीट को रीट्वीट करते हुए जवाब दिया कि उनके वालिद हिंदुस्तान में ही 1942 में पैदा हुए थे, और 2009 में हिंदुस्तान में ही उन्होंने अंतिम साँस ली।

शाहिद ने तलाक़शुदा बीवी शबनम की काटी नाक, शाहिद के अब्बू-भाई समेत 3 के ख़िलाफ़ FIR दर्ज

उत्तर प्रदेश के बरेली में शौहर द्वारा अपनी तलाक़शुदा बीवी की चाकू से नाक काट देने का मामला सामने आया है। इससे पीड़िता का चेहरा पूरी तरह से लहूलुहान हो गया। पीड़िता ने पुलिस को जो बयान दिया उसके आधार पर तीन आरोपितों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कर लिया गया है।

हफीजपुर क्षेत्र के नसरुद्दीन और सकीरा के अनुसार, उन्होंने अपनी बेटी शबनम (35 वर्षीय) का निक़ाह चार साल पहले शाहिद से किया था, जोकि पहले से शादीशुदा था। तीन महीने पहले शाहिद ने शबनम को तलाक़ दे दिया था जिसके बाद वो अपने अम्मी-अब्बू के साथ रहने लगी।

पीड़िता का कहना है कि रविवार (18 अगस्त) सुबह उसके पिता नसरुद्दीन सब्जी का ठेला लेकर फेरी लगाने गए थे। बड़ा भाई नफीसुद्दीन बीमार था। उसे लेकर छोटा भाई शफीकुद्दीन और अम्मी सकीरा इलाज के लिए अस्पताल गई थी। इसके आगे उसने बताया कि जब वो पड़ोस में अपने रिश्तेदार के यहाँ जा रही थी तभी अचानक शाहिद और उसके अब्बू जाहिद, भाई सादे और बासिद ने रोककर बुरा-भला कहते हुए उसके साथ मारपीट की। इसी बीच शाहिद ने चाकू निकालकर शबनम की नाक काट दी

खून से लथपथ शबनम को जान से मारने की धमकी देकर हमलावर वहाँ से फ़रार हो गए। पुलिस ने सीएचसी भेजकर मेडिकल कराया। शबनम की शिक़ायत पर पुलिस ने उसके शौहर और उसके दोनों भाइयों के खिलाफ़ मामला दर्ज कर लिया है। फ़िलहाल, आरोपित अपना घर बंद कर वहाँ से भाग गए हैं।

संतों संग राम जन्मभूमि न्यास पहुँचे मुस्लिम समर्थक, मंदिर निर्माण के लिए तराशे पत्थरों को किया साफ़

सर्वोच्च न्यायालय में राम मंदिर को लेकर चल रही सुनवाई के मध्य मुस्लिम समाज के वह लोग जो मंदिर बनने के समर्थन में हैं आज राम जन्मभूमि न्यास कार्यशाला पहुँचे और मंदिर निर्माण हेतु तराशे गए पत्थरों की सफाई की।

जानकारी के मुताबिक बबलू खान के नेतृत्व में 6 दर्जन मुस्लिम लोग न्यास पर पहुँचे और बड़ी संख्या में उन्होंने राम मंदिर न्यास में श्रम दान किया। इस दौरान मौक़े पर महंत परमहंस दास, महंत बृजमोहन दास, महंत डॉ. राघवेश दास वेदांती सहित विश्व हिंदू परिषद के प्रांतीय मीडिया प्रभारी शरद शर्मा भी मौजूद रहे।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी भी अयोध्या में राम मंदिर बनवाए जाने का खुला समर्थन कर चुके हैं। जिसके कारण इस्लामिक कट्टरपंथी उन्हें आलोचनाओं का शिकार बना चुके हैं। वहीं इसके अलावा खुद को बहादुर शाह जफर का वंशज बताने वाले प्रिंस हबीबुद्दिन तूसी भी कह चुके हैं कि अगर राम मंदिर बना तो वह उसके लिए सोने की ईंट देंगे।

तूसी तो यहाँ तक स्पष्ट कह चुके हैं कि वो चाहते हैं सुप्रीम कोर्ट राम जन्मभूमि की जमीन उन्हें सौंप दें। क्योंकि वहीं इस भूमि के आधिकारिक हकदार हैं।

बता दें इन दिनों राम मंदिर-बाबरी मस्जिद मामले में कोर्ट प्रतिदिन सुनवाई कर रहा है। माना जा रहा है कि नवंबर के अंत तक इस विषय पर अंतिम निर्णय ले लिया जाएगा। दोनो पक्षों द्वारा अपनी दलीले दी जा रहीं हैं। मामले की सुनवाई खुद सीजेआई रंजन गोगोई कर रहे हैं। लेकिन इसी बीच अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए पत्थर तराशने का काम तेज़ कर दिया गया है और इसके लिए अतिरिक्त कारीगरों को भी बुलाया जा रहा है। जिसके मद्देनजर राम मंदिर के मुस्लिम समर्थक भी इसमें अपना योगदान दे रहे हैं।