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‘दलित ईसाई’ शब्द के इस्तेमाल पर The News Minute की सम्पादक को लोगों ने लताड़ा

केरल के एक ईसाई युवक की हत्या के मामले में उसके लिए ‘दलित ईसाई’ शब्द के इस्तेमाल पर The News Minute पोर्टल की सम्पादक धन्या राजेंद्रन को ट्विटर पर लोगों के गुस्से का शिकार होना पड़ा। कई लोगों ने उन्हें आड़े हाथों लेते हुए इस शब्द की वैधता पर ही सवाल खड़े किए। उनके अनुसार हिन्दू धर्म के बाहर इस शब्द के इस्तेमाल का कोई औचित्य नहीं है।

दरअसल राजेंद्रन ने केरल के युवक केविन पी जोसेफ़ की हत्या के मामले में केरल के सेशन कोर्ट द्वारा 10 को दोषी ठहराने की खबर शेयर करते हुए कहा था कि ‘दलित ईसाई’ युवक की हत्या में दस लोगों को दोषी पाया गया है।

कानूनी रूप से नहीं है ‘दलित ईसाई’ का अस्तित्व

कानूनी रूप से ‘दलित ईसाई’ वैध नहीं है। दलित के रूप में वर्गीकरण केवल हिन्दुओं, सिखों और बौद्धों का ही हो सकता है। हालाँकि कई दलित संगठन ईसाईयों और समुदाय विशेष को भी यह दर्जा दिलाने के लिए प्रयास कर रहे हैं, लेकिन अब तक ऐसा हुआ नहीं है।

‘हर वक्त मोदी को खलनायक बताने से कुछ नहीं मिलेगा, आपको समझना होगा कि वह कैसे इतने सम्माननीय बने’

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने बयान दिया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासन का मॉडल पूरी तरह नकारात्मक गाथा नहीं है। इसके साथ ही जयराम नरेश ने कहा कि पीएम मोदी के काम के महत्व को स्वीकार नहीं करना और हर समय उन्हें खलनायक की तरह पेश करके कोई फायदा नहीं होने वाला है।

कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश ने बुधवार (अगस्त 21, 2019) को कहा- “यह वक्त है कि हम मोदी के काम और 2014 से 2019 के बीच उन्होंने जो किया उसके महत्व को समझें, जिसके कारण वह सत्ता में लौटे। इसी के कारण 30% मतदाताओं ने उनकी सत्ता में वापसी करवाई।” लोकसभा चुनाव 2019 में भाजपा को 37.4% वोट मिले, जबकि सत्तारूढ़ NDA को कुल मिलाकर 45% वोट हासिल हुए थे।

रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर यह बयान जयराम रमेश ने राजनीतिक विश्लेषक कपिल सतीश कोमीरेड्डी की किताब ‘मालेवॉलेंट रिपब्लिक: ए शॉर्ट हिस्ट्री ऑफ द न्यू इंडिया’ का विमोचन करते हुए दिए।

जयराम रमेश ने कहा- “वह (मोदी) ऐसी भाषा में बात करते हैं जो उन्हें लोगों से जोड़ती है। जब तक हम यह न मान लें कि वह ऐसे काम कर रहे हैं, जिन्हें जनता सराह रही है और जो पहले नहीं किए गए, तब तक हम इस व्यक्ति का मुकाबला नहीं कर पाएँगे।”

इसके आगे कॉन्ग्रेस नेता ने कहा कि अगर आप हर समय उन्हें (मोदी को) खलनायक की तरह पेश करने जा रहे हैं, तो आप उनका मुकाबला नहीं कर पाएँगे। UPA के दौरान मनमोहन सिंह सरकार में ग्रामीण विकास और पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय संभालने वाले जयराम रमेश ने स्पष्ट किया कि वह किसी से प्रधानमंत्री की सराहना या तारीफ करने के लिए नहीं कह रहे है बल्कि वे चाहते हैं कि राजनीतिक वर्ग कम से कम उन बातों को माने जो वह शासन में लेकर आए खासतौर से ‘शासन के अर्थशास्त्र’ के संदर्भ में।

‘शासन की राजनीति पूरी तरह अलग है’

जयराम रमेश ने कहा- “मैं आपको बता दूँ कि जब शासन के अर्थशास्त्र की बात आती है, तो यह पूरी तरह नकारात्मक गाथा नहीं है, शासन की राजनीति पूरी तरह अलग है। मोदी के शासन मॉडल से जिस प्रकार के सामाजिक संबंध सृजित हुए हैं वे भी पूर्णत: भिन्न हैं।” अपने बयान के तर्क में जयराम रमेश ने मोदी सरकार की कुछ उपलब्धियों, जैसे- प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना (PMUJ) का उदाहरण देते हुए बताया कि वह कैसे प्रधानमंत्री मोदी के लिए सफल साबित हुई।

‘हम सबने मोदी की योजनाओं का मजाक उड़ाया, लेकिन ..’

नरेंद्र मोदी की जनता के बीच पकड़ का उदाहरण देते हुए जयराम रमेश ने कहा- “साल 2019 में राजनीतिक विमर्श में हम सभी ने उनकी एक या दो योजनाओं का मजाक उड़ाया लेकिन सभी चुनावी अध्ययनों में यह सामने आया कि पीएमयूजे अकेली ऐसी योजना रही जो उन्हें करोड़ों महिलाओं से जोड़ पाई। इसने उन्हें ऐसा राजनीतिक खिंचाव दिया जो उनके पास 2014 में नहीं था।” उन्होंने कहा कि पिछले दशक में ऐसा कुछ हुआ जिसने मोदी को 2009 के आम चुनाव में राष्ट्रीय राजनीति में एक मामूली नेता से ऐसा व्यक्ति बना दिया, जिसने लगातार चुनाव जीते।

‘आपको समझना पड़ेगा कि वह कैसे इतने सम्माननीय बने’

कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा- “हमने अपने पूरे अभियान के दौरान किसानों की हालत के बारे में बात की, लोगों ने माना कि किसान संकट में हैं। लेकिन उन्होंने इसके लिए मोदी को जिम्मेदार नहीं ठहराया। आपने देखा कि उसके बाद चुनाव नतीजों में क्या हुआ। आपको समझना पड़ेगा कि वह कैसे इतने सम्माननीय बने।”

वामपंथ एक कैंसर है, इसको इग्नोर करने से काम नहीं चलेगा, इनकी जड़ पर एसिड डालना ज़रूरी

वामपंथ के नाम पर आपको खूब इमोशनल अदरक-लहसुन सुँघाया जाएगा। वो कहेंगे कि ‘कामनिष्ठ मैनिफेस्टो’ पढ़ो। आप पूछिए कि क्यों पढ़ें? वो कहें कि मार्क्स के विचार पढ़ो, आप पूछिए कि क्यों पढ़ें? वो कहेंगे कि वामपंथ की विचारधारा उदारवादी है, आप कहिए कि नक्सलियों के हिमयाती और हिंसक क्रांति की बात करने वाले उदारवादी और सर्वाहारा की बात तो नहीं ही करते। वो कहें कि वो सर्वहारा की लड़ाई लड़ रहे हैं, उनसे कहिए कि कौन नहीं लड़ रहा।

इस कैंसरकारी विचारधारा ने सिवाय रक्त के समाज को कुछ नहीं दिया है। इन्होंने हिंसा को जायज बताया, सर्वहारा की रीढ़ पर लात रख कर सत्ता तक पहुँचे और हर जगह के इतिहास को इन्होंने गंदा किया। आपसे जब पूछें कि उदाहरण दो, उनसे कहिए कि वो इस लायक नहीं हैं कि वो हमारी बात सुन कर सर्टिफिकेट दें। वामपंथियों से, या उनके हिमायतियों को वहाँ मारिए जहाँ उन्हें दर्द हो। इन्हें डिबेट का शौक है, इन सूअरों के साथ कीचड़ में मत उतरिए।

इन्होंने भारत के इतिहास को बदला, क्रांतिकारियों को आतंकी की तरह दिखाया, प्रतापी और पराक्रमी हिन्दू शासकों को नकारा, इस्लामी आक्रांताओं को ऐसे दिखाया जैसे कि मंदिर तोड़ कर, बलात्कार और हत्याएँ करते हुए उन्होंने भारतीय संस्कृति में अपना सकारात्मक योगदान दिया।

आजादी के बाद इन्होंने भारत को तोड़ने की तैयारी जारी रखी। ये आश्चर्य की बात नहीं है कि इनके मंसूबे ईसाई चर्चों और इस्लामी आतंकियों के लहसुन-ए-हिन्द से बिलकुल अलग नहीं है। अगर ये उनके अजेंडे को आगे नहीं बढ़ाते रहते तो फिर ‘केरल माँगे आजादी, पंजाब माँगे आजादी’ कहते हुए विश्वविद्यालयों में क्यों हल्ला करते? इनका अजेंडा सिर्फ एक है वो है तमाम हिन्दू प्रतीकों की तबाही और भारतीय संस्कृति का खात्मा। इस वाक्य को साबित करने के लिए मैं कोई उदाहरण नहीं दूँगा क्योंकि उसकी ज़रूरत नहीं है।

नैरेटिव पर कब्जा

दुर्भाग्य देखिए कि ये लोग हैं तो गिने-चुने लेकिन आम भारतीय किन बातों पर चर्चा करे, ये यही लोग तय करते हैं। वो आखिर होता कैसे है? सत्ताधारियों की चाटुकारिता करते हुए, नेहरू जैसे अक्षम और स्वार्थी नेताओं की चालीसा लिखते हुए, पैसों के लालच में जमीर बेच कर इतिहास के नाम पर काल्पनिक कहानियाँ लिखते हुए, ये पीढ़ी दर पीढ़ी अपने वैचारिक संतानों को पोषित करते रहे।

ये हमारे विश्वविद्यालयों के एकेडमिक काउंसिल में बहुमत में हैं, इन्होंने फिल्मी दुनिया में अपना वर्चस्व बना रखा है, इन्होंने टीवी और अखबारों में सारे बड़े संस्थानों में अपने लोग बिठा रखे हैं। इनमें से मीडिया वाले लगातार अपनी चाटुकारिता दिखाते रहते हैं। बाकी लोग परोक्ष रूप से कार्य करते हैं, जब ज़रूरत पड़ती है तो सिग्नेचर कैम्पेन या ट्वीट के जरिए, मुद्दों को चुन कर, सेलेक्टिव ट्रीटमेंट देते हुए इस कैंसर को पोषण पहुँचाते हैं।

इनके तौर-तरीकों को देखते हुए आपको पता चल जाएगा कि इनकी धूर्तता का ओर-अंत नहीं है। इन्हें न तो गरीबों से कोई मतलब है, न दलितों से, न कथित अल्पसंख्यकों से। हर बार ये इन लोगों का इस्तेमाल करते हैं ताकि चर्चा में ये बने रहें। सत्ता से लगातार दूर होते ये माओ की नाजायज संतानें चाहती हैं कि किसी तरह से, किसी भी कीमत पर, वैसे लोग सत्ता में न रहें जो इनके विपरीत विचारों के हैं। चाहे उसके लिए इन्हें दलितों को मोहरा बना कर, अफवाह फैला कर सड़कों पर आगजनी करने के लिए उतारना हो, या अनुच्छेद 370 के बाद कश्मीरियों को सड़कों पर आ कर विरोध के नाम पर पत्थरबाजी और अराजकता के लिए उकसाना। ये चाहते हैं कि पूरे देश में दंगे हों, लोग सड़कों पर आ जाएँ और खूब रक्तपात हो।

लोग कहते हैं इग्नोर कीजिए

इन सब बातों के लिए मीडिया की मदद ली जाती है। लेकिन इंटरनेट और डिजिटल मीडिया के साथ-साथ सोशल मीडिया के आने से इनकी नग्नता उजागर होने लगी है। आज के दौर में सूचनाओं का सबसे ज्यादा महत्व हो गया है। पहले भारत के बहुत बड़े हिस्से के पास खबर या विचारों के सही या गलत होने को जानने का तरीका ही नहीं था। इसलिए पहले चर्चा होती ही नहीं थी। चर्चा का मतलब था कि आपके मतलब के लोग, आपके मतलब की जगहें, आपके मतलब के मुद्दे और आपके मतलब की बातें।

एक तरफा सेमिनार से लेकर टीवी के पैनल डिस्कशन तक पूरी तरह से मैनेज्ड। आप एनडीटीवी के पैनल देखा कीजिए कि वहाँ किस तरह के लोग आते हैं। विरोधी विचारों के लोगों को बुलाया ही नहीं जाता। आप कहेंगे कि भाजपा ने मना कर रखा है। सही बात है लेकिन क्या भाजपा के इतर दक्षिणपंथी लोग नहीं हैं जिन्हें कश्मीर या तलाक के मुद्दे पर बोलने को बुलाया जाए? या वही वामपंथी असहिष्णुता कि एक्सपर्ट तो सिर्फ वामपंथी हो सकते हैं, बाकी को कुछ नहीं आता।

ऐसे लोगों को इग्नोर करने से ये बढ़ते रहेंगे। ये सीधे तौर पर राष्ट्रविरोधी हैं और इन्हें भारतीयता से, हिन्दू संस्कृति से या यहाँ के वृहद समाज से कोई मतलब नहीं। इन्होंने लगातार उन बातों पर हमला किया है जिससे हिन्दुओं की आस्था बिखर जाए। त्योहारों को प्रदूषण से जोड़ा, पितृसत्ता से जोड़ा, उस पूरे धर्म को असहिष्णु कह दिया दिया जिसने बलात्कारियों और आतंकियों को भी बसने की जगह दी। सब की जड़ में वही बात कि ये लोग सत्ता में कैसे पहुँच गए, ये तो हमारे प्रोजेक्ट को पूरा होने से रोक रहे हैं।

इन्हें सिर्फ रोकना ज़रूरी नहीं है, इनका समूल नाश आवश्यक है। इनका लक्ष्य मोदी या भाजपा नहीं, इनका लक्ष्य हिन्दुओं को इतना पंगु और लाचार बना देना है कि ये बिखर जाएँ, नेतृत्वहीन हो जाएँ, और अंत में इस संस्कृति को भुला दें जिसकी जड़ में वैयक्तिक और सामाजिक स्वतंत्रता, सहिष्णुता, सर्वधर्म समभाव है।

इसलिए इग्नोर करने पर तो ये अपनी राह बनाते ही रहेंगे। ज़रूरत है कि इन पर चौतरफा हमला हो। इनकी फंडिंग बंद की जाए, इनके पैसे कमाने के जरिए खत्म किए जाएँ, विश्वविद्यालयों से ऐसे चूहों को बिलों से पानी और मिर्च का धुआँ डाल कर निकाला जाए। जो लोग शब्दों की आड़ लेकर देश को तोड़ने की बात करें उन्हें आर्थिक रूप से नुकसान पहुँचाना आवश्यक है। इनके पैसे खत्म कर दो ये सब स्वतः गिड़गिड़ाते हुए कहने लगेंगे कि ‘मेरे तो बाप हिन्दू ही थे, मैं तो चाल में फँस गया था।’

इन नक्सलियों और आतंकियों से लेकर वैचारिक तानाशाहों की सारी निष्ठा पैसों से ही है। विचारधारा तो ये दो रुपए के लिए त्याग देते हैं। इन्हें सिर्फ उपेक्षित रखना ही सही उपाय नहीं है, इन्हें अप्रासंगिक बनाना आवश्यक है। इनकी सच्चाई सामने लाकर, इन्हें बिना किसी भी तरह का मौका देते हुए, पूरी तरह से डिसमिस करते हुए, दुत्कार कर सामाजिक चर्चा से बाहर करना समय की माँग है।

समूल नाश ही एकमात्र उपाय है

वो आपको कुछ लिखें, या कहें कि ये तो गलत लिखा है, इसका आधार क्या है, तो उन्हें जवाब मत दीजिए, उन्हें दुत्कार कर भगाइए कि वो इस लायक नहीं है कि उनसे किसी भी तरह की बात की जाए। क्योंकि यही इनका इतिहास रहा है। पत्रकारिता के सम्मानों में कितने सम्मान दक्षिणपंथियों को मिले हैं? साहित्यिक सम्मानों में क्या कोई घोषित दक्षिणपंथी है? ऐसे कितने महत्वपूर्ण मंचों पर आपने दक्षिणपंथियों को अपनी बात खुल कर कहते सुना है?

इन्होंने हर संस्था पर, हर संस्थान पर, हर जगह अपनी ऐसी पकड़ बना रखी है कि व्यक्ति अपने आप को अभिव्यक्त करने से डरता है। ये सारे लोग स्वयं को लिबरल बताते हैं, जबकि इनसे ज्यादा इन्टॉलरेंट, अनुदार, एक आयामी, इन्फ्लेक्सिबल और तानाशाही प्रवृत्ति के लोग आपको ढूँढने से भी नहीं मिलेंगे। हर जगह ये अपने तरह के विचारों को ही विचार मानते हैं, ये जिनको सही मानते हैं, अगर आपने उसके अलावा किसी को वोट दे दिया, तो आपको मूर्ख और अज्ञानी कह कर डिसमिस कर देंगे।

इसीलिए, समय की ज़रूरत यही है कि इन्हें फ्लश किया जाए समाज से। दुर्भाग्य से ऐसे हिंसक विचारों को पोषित करने वालों के लिए समाज में कोई जगह नहीं है। आप इनके साथ अगर इन्हीं के तरीके से पेश नहीं आएँगे तो ये रक्तबीज की तरह पैदा होते रहेंगे।

इस वैचारिक युद्ध में छोटी लड़ाइयों को जीत कर खुश होने की जरूरत नहीं है। ज़रूरत है इस विचारधारा के समूल नाश का। जब ये पूछें कि ‘क्या तुम भगत सिंह के विचारों को मिटा दोगे’, तो पहले तो ऐसे आदमी को अपने मुँह से बलिदानी भगत सिंह का नाम लेने पर दो वैचारिक तमाचा तुरंत मारिए और फिर कहिए कि भगत सिंह के विचारों को कलुषित करने वालों को उनका नाम लेने का कोई हक नहीं।

विचारधारा तुम्हारे मैनिफेस्टो में क्या कहती है, उससे मतलब नहीं है। मतलब इससे है कि आज तुम उस विचारधारा के नाम पर संस्थागत बलात्कार (जो वामपंथियों में खूब प्रचलित है), अपने ही देश की सेना के जवानों की नृशंस हत्या, देश को तोड़ने की बातें और चुने गए नेता को मारने की योजना बनाते हो। मतलब इससे है कि तुमने गरीबों के नाम पर कितना आतंक मचाया है और उन्हें लगातार सरकारी योजनाओं से, विकास से दूर रखा है। जरूरत पड़ी तो तुमने उन्हीं गरीबों को ढाल बना कर सुरक्षाबलों के आगे कर दिया।

वामपंथियों को चिह्नित कर, अप्रासंगिक बनाना समय की माँग

इनके जितने भी प्रोपेगेंडा फैक्ट्री हैं, उन्हें पढ़ना बंद कीजिए। चाहे ये छोटे हों, बड़े हों, तोप हों, या तलवार, इन्हें पहचानिए और सार्वजनिक रूप से उन्हें उनकी करतूतें गिना कर सबके सामने लाइए। मीडिया वाले ऐसा करें तो उनके झूठ और प्रोपेगेंडा को सत्य से काटिए। आप ये मान कर चलिए कि सही बात तो ये कर ही नहीं सकते। इनके डीएनए में ही सही बोलना नहीं है। अगर ये घटना सही उठा रहे हों, तो आप तय मान कर चलिए कि उस घटना में ये कुछ सवर्ण-दलित या साम्प्रदायिक प्रपंच पक्का करेंगे। इसलिए, पहली नजर में तो इन्हें सही मानने का सवाल ही नहीं उठता।

जस्टिस लोया, अमित शाह के बेटे जय शाह, अजित डोभाल के बेटे शौर्य डोभाल से लेकर राफेल, इन्टॉलरेंस, जय श्री राम जैसे दसियों प्रपंच इनके गैंग ने गढ़े। कभी कुछ साबित नहीं हो पाया। लेकिन ये कोरस में गाते रहें। आज भी गाते हैं। इनका हर बड़ा मुद्दा मोटिवेटेड होता है जिसकी जड़ में या तो अपने मालिकों को बचाने की बात होगी या फिर हिन्दुओं को नीचा दिखाने की। इसलिए, इन्हें जहाँ देखिए, वहीं कील ठोक दीजिए।

अगर इनकी छटपटाहट देख कर आपको दया आए तो भी दया मत दिखाइए। ये मत सोचिए कि विरोधी विचारों का रहना आवश्यक है। ये सारी फर्जी बातें इन्हीं चम्पकों ने फैलाई हैं। विरोधी विचारों का नहीं, सही को सही, और गलत को गलत कहने वालों का रहना जरूरी है। आप याद कीजिए कि गौरक्षकों ने कानून को हाथ में लिया तो क्या दक्षिणपंथियों ने उन्हें नहीं नकारा? क्या कठुआ कांड पर दक्षिणपंथी चुप रहे? जब-जब सरकार ने कुछ गलत किया तब इन्हीं दक्षिणपंथियों ने मोदी तक को नहीं छोड़ा। मध्य प्रदेश और राजस्थान में भाजपा कैसे हारी?

लेकिन इसके उलट आप याद कीजिए कितने वामपंथियों ने राहुल गाँधी जैसे नकारे नेता को प्रधानमंत्री नहीं बनाना चाहा? आप याद कीजिए कि कितनी बार मौलवियों द्वारा मस्जिदों और मदरसों के भीतर किए जाने वाले बलात्कार पर इन्होंने दो शब्द बोले हों? आप याद कीजिए कि आतंकी घटनाओं पर ‘हिन्दू टेरर’ की थ्योरी लाने वाले कितने बार इस्लामी आतंक की निंदा कर पाए? याद कीजिए दलितों को अफवाह फैला कर सड़कों पर आगजनी करने और परिणामतः बारह लोगों की हत्या करने को उकसाने के बाद कितने वामपंथियों ने इसकी निंदा की? कितने नक्सली नरसंहारों पर इन्होंने दो शब्द बोले कि उनकी विचारधारा इसका समर्थन नहीं करती? ममता बनर्जी के राज में बंगाल का कौन सा इलाका मजहबी दंगों से अछूता रहा, किस वामपंथी मीडिया ने उसे आप तक पहुँचाया?

इसलिए, इस मुगालते में मत रहिए कि विरोध का स्वर इनके जाने से गायब हो जाएगा। विरोध का स्वर हमारे बीच ही मौजूद है। ये तो कैंसर हैं, कोढ़ हैं, सड़े हुए सेव हैं टोकरी के जिन्हें समाज से निकालना ज़रूरी है। इन्होंने गलतियों को डिफेंड किया है, सही काम आज तक किया नहीं। इसलिए, इन्हें सब्जियों की जड़ में उगे पराश्रित घास की तरह एक-एक कर खोजिए, और उखाड़ लीजिए। उखाड़ने के बाद इन्हें जमीन पर मत रखिए, इन्हें धूप में सुखाइए, फिर जलाइए और फिर कहीं फेंक दीजिए।

और हाँ, राह चलते कोई वामपंथी दिखे तो उसे बिना पूछे दो वैचारिक कंटाप मार दीजिए क्या पता दिमाग पर कुछ असर पड़े और सही राह चल पड़े! आप ही को बाद में धन्यवाद कहेगा।

रविदास मंदिर हिंसा: भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर समेत 96 न्यायिक हिरासत में भेजे गए

दिल्ली के तुगलकाबाद रविदास मंदिर ध्वंस मामले में भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर समेत 96 लोगों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है। इन सभी पर दंगा भड़काने और हिंसा आदि का मुकदमा दर्ज किया गया है। बुधवार (21 अगस्त) को एक घंटे तक चली भीड़ की हिंसा को काबू करने के लिए पुलिस को आँसू गैस का प्रयोग करना पड़ा था। उसके पहले एक घंटे तक भीड़ ने कई बाइकों को आग के हवाले कर दिया था और गाड़ियों को भी क्षतिग्रस्त किया था।

‘हम हिंसा में विश्वास नहीं करते’

एक ओर पुलिस का दावा है कि इस हिंसा में 90 पुलिसकर्मी घायल हुए हैं, और दूसरी ओर आरोपित चंद्रशेखर का कहना है कि वह अंबेडकर के संविधान को मानते हैं और हिंसा में विश्वास नहीं करते। यह उन्हें फँसाने की साजिश है। कल भड़की हिंसा के बाद आज (22 अगस्त, 2019 को) पूरा इलाका छावनी में तब्दील हो गया है। दिल्ली पुलिस के साथ केंद्रीय अर्धसैनिक बलों को भी तैनात किया गया है।

थाने में ही लगी अदालत

आरोपितों की बड़ी संख्या को देखते हुए दिल्ली के कालकाजी थाने को ही अदालत में तब्दील कर दिया गया। साकेत अदालत से थाने आए जज के सामने 96 लोगों की पेशी हुई। जज साहब ने सभी की 14 दिन की न्यायिक हिरासत पुलिस को सौंप दी। गिरफ्तार लोगों में अधिकाँश हरियाणा के बताए जा रहे हैं, और एक बड़ी संख्या पंजाब के लोगों की होने की बात भी मीडिया में कही गई है।

‘कोर्ट रूम इतने छोटे हैं, मुझे लगा यहाँ कोर्ट कॉम्प्लेक्स में हमारे पास बेहतर कोर्ट रूम होंगे’- चिदंबरम

पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम उस समय आश्चर्य में पड़ गए जब उन्हें आज नई दिल्ली के रोसे एवेन्यू कॉम्प्लेक्स में विशेष सीबीआई अदालत के समक्ष पेश किया गया। चिदंबरम ने सीबीआई अधिकारियों के साथ बातचीत में, आश्चर्य व्यक्त किया कि नए परिसर में कोर्ट रूम बहुत छोटे थे।

चिदंबरम ने सीबीआई कोर्ट में उन्हें पेश करने वाले अधिकारियों से कहा, “कोर्ट रूम इतने छोटे हैं। मुझे लगा कि यहाँ नए कोर्ट कॉम्प्लेक्स में अब हमारे पास बेहतर कोर्ट रूम होंगे।”

जाम से भरे कोर्ट रूम में, सीबीआई अधिकारियों ने उन्हें बताया कि राउज एवेन्यू कॉम्प्लेक्स में कोर्ट रूम छोटे हैं। अधिकारियों ने उन्हें बताया, “यह सभी बड़े मामलों की एक समस्या है। कोयला घोटाला मामले में, सभी अभियुक्तों को अदालत कक्ष के अंदर फिट करना असंभव है।”

राउज़ एवेन्यू कॉम्प्लेक्स का उद्घाटन इस साल अप्रैल में किया गया था। दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा जारी अधिसूचना में कहा गया है कि दिल्ली में विशेष न्यायाधीश, सीबीआई, भ्रष्टाचार निरोधक शाखा और श्रम अदालत के सभी न्यायालय राउज एवेन्यू कोर्ट परिसर से कार्य करेंगे।

INX मीडिया मामले के सिलसिले में 24 घंटे से अधिक समय तक छिपने के बाद चिदंबरम को सीबीआई ने बुधवार (21 अगस्त) रात गिरफ़्तार किया। मामला 2007 में INX मीडिया में विदेशी निवेश की अनुमति देने के फ़ैसले से संबंधित है।

दरअसल, CBI के अनुसार मार्च 2007 में INX मीडिया द्वारा विदेशी निवेश के लिए संवर्धन बोर्ड (FIPB) से अवैध तरीके से स्वीकृति प्राप्त की थी। INX मीडिया को शेयर जारी कर 46 फीसद इक्विटी जुटाने की स्वीकृति प्रदान की गई थी। इस मामले में इद्राणी मुखर्जी और उनके पति पीटर मुखर्जी को भी आरोपी बनाया गया था।

इंद्राणी मुखर्जी ने जाँच के दौरान CBI और ED को बताया कि FIPB स्वीकृति में हुए उल्लंघन को निपटाने के लिए तत्कालीन वित्तमंत्री पी चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम ने 10 लाख डॉलर की रिश्वत माँगी थी, जिसे उन्होंने स्वीकार कर लिया था।

भारत से बात का फायदा नहीं, जब दो परमाणु संपन्न देश आमने-सामने होंगे तो कुछ भी हो सकता हैं: इमरान खान

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने बुधवार (अगस्त 22,2019) को एक विदेशी अखबार से बातचीत के दौरान भारत को लेकर बड़ा बयान दिया। उन्होंने अखबार को बताया कि अब वह भारत से बातचीत की अपील नहीं करेंगे। इसके साथ ही उन्होंने सार्वजनिक रूप से परमाणु युद्ध की धमकी दी।

विदेशी अखबार से बात करते हुए पाक पीएम ने भारत के कड़े रुख पर शिकायत करते हुए कहा कि उन्होंने भारत से बार-बार बातचीत के लिए अनुरोध किया लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसे नजरअंदाज कर दिया। उनके मुताबिक अब उनका भारतीय अधिकारियों से बात करने का कोई औचित्य नहीं रह गया। क्योंकि अब तक उनके सभी प्रयास असफल साबित हुए हैं।

उन्होंने न्यूयॉर्क टाइम्स से बातचीत के दौरान कहा, “अब उनसे (भारत) बात करने का कोई फायदा नहीं है। मैंने बातचीत करने की सारी कोशिशें कर लीं। दुर्भाग्य है कि अब जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है कि मेरी शांति और बातचीत की सारी कोशिशों को उन्होंने तुष्टीकरण के तौर पर लिया।”

गौरतलब है कि पठानकोट पर हुए हमले के बाद भारत अपना पक्ष साफ कर चुका है कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद के ख़िलाफ़ कार्रवाई नहीं करता तब तक भारत की उससे कोई बातचीत नहीं होगी। हालाँकि, इस हमले के बाद पाक पीएम इमरान अलग-अलग समयों पर बातचीत की अपील कर चुके हैं।

लेकिन, प्रधानमंत्री मोदी का आतंकवाद के खिलाफ़ सख्त रुख देखते हुए पाक पीएम ने उन्हें फासीवादी और हिंदूवादी करार दिया है। साथ ही उनपर आरोप लगाया है कि वह कश्मीर में मुस्लिम बहुल आबादी का सफाया करके उसे हिंदू बहुल इलाके में बदलना चाहते हैं।

इमरान खान का मानना है कि भारत कश्मीर में प्रोपेगेंडा फैलाते हुए फर्जी ऑपरेशन भी चला सकता है, जिससे कि पाकिस्तान के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई करने के लिए आधार मिल सके।

अपनी बात में आगे जोड़ते हुए इमरान कहते हैं कि अगर युद्ध की ऐसी स्थिति आती है तो पाकिस्तान जवाब देने के मजबूर होगा। वे कहते हैं कि जब दो परमाणु शक्ति संपन्न आमने-सामने होंगी तो कुछ भी हो सकता हैं। उन्होंने दोनों देशों के परमाणु शक्ति से संपन्न होने का हवाला देते हुए कहा कि दुनिया को इस पर ध्यान देना चाहिए कि हम किन हालातों का सामना कर रहे हैं।

भारतीय क्रिकेटरों को जान से मारने की धमकी, पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड को भेजा Email

महाराष्ट्र के एंटी टेररिज्म स्कवॉड (ATS) ने भारतीय क्रिकेटरों को मारने की धमकी देने वाले शख्स को गिरफ्तार कर लिया है। इस शख्स पर आरोप है कि इसने एक ईमेल भेजा था। इस मेल में उसने भारतीय क्रिकेट खिलाड़ियों को मारने की धमकी दी थी।

आरोपित ने ये मेल 16 अगस्त को भेजा था। जिसके बाद बीसीसीआई ने इसकी जानकारी पुलिस को दी। जानकारी मिलते ही एटीएस की टीम ने इस मामले की जाँच शुरू की। इस मामले में साइबर विशेषज्ञों की भी सहायता ली गई। कुछ दिन में पता चल गया कि आरोपित असम के मोरीगाँव के शांतिपुर-सहारनपुर इलाके का निवासी है। उसका नाम ब्रज मोहन दास है।

मूल जानकारी हाथ लगने के बाद एटीएस की टीम असम के लिए रवाना हुई और उसे उसके निवास स्थान से गिरफ्तार किया। आज आरोपित की पेशी कोर्ट में हुई, जहाँ कोर्ट ने उसे 26 अगस्त तक के लिए न्यायिक हिरासत में भेज दिया।

उल्लेखनीय है कि इन दिनों भारत की टीम विश्व टेस्ट चैम्पियनशिप के तहत वेस्टइंडीज दौरे पर है। जिसके मद्देनजर खबर आई थी कि टीम को वहाँ खतरा है। हालाँकि बाद में सूचना फर्जी पाई गई थी, लेकिन फिर भी सुरक्षा के लिहाज से उनकी सुरक्षा बढ़ा दी गई।

उस समय ये धमकी सीधे तौर पर भारतीय टीम को न मिलकर पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड को ईमेल के जरिए मिली थी, जहाँ भारतीय टीम पर हमला होने की आशंका जताई गई थी। इसके बाद ये मेल पाक क्रिकेट बोर्ड ने बीसीसीआई को भेजा था और फिर इसकी सूचना गृह मंत्रालय को दी गई थी। बाद में आईसीसी और वेस्ट इंडीज क्रिकेट बोर्ड ने खबर को अफवाह बताया था। साथ ही बीसीसीआई ने भी इन खबरों का खंडन किया था और आश्वासन दिया था कि भारतीय टीम को कोई खतरा नहीं है।

अरविन्द केजरीवाल के बस एक ट्वीट से हुई CBI स्वतन्त्र और चिदंबरम जेल के अंदर

सीबीआई द्वारा कॉन्ग्रेस नेता पी चिदंबरम की गिरफ्तारी के बाद विपक्षी राजनीतिक दलों से लेकर कुछ मीडिया चैनल्स CBI पर सवाल उठाते नजर आ रहे हैं। किसी भी राजनीतिक चेहरे का घोटालों और जाँच में नाम आते ही अक्सर यह चर्चा जोर पकड़ लेती है। कुछ राजनीतिक दल CBI के रोल पर सवाल उठाते आए हैं और आरोप लगाए जाते हैं कि इसका इस्तेमाल राजनीति के लिए किया जाता है।

लेकिन एक शख़्स ने चिदंबरम की गिरफ्तारी के साथ ही CBI के राजनीति के चंगुल से मुक्त होने की भविष्यवाणी 2013 में ही कर दी थी और ये भविष्यवाणी किसी और ने नहीं बल्कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने की थी। अरविन्द केजरीवाल ने 2013 में यह बात तब एक ट्वीट के जरिए कही थी जब केंद्र में कॉन्ग्रेस की सरकार हुआ करती थी।

उस समय अरविन्द केजरीवाल कॉन्ग्रेस सरकार के भ्रष्टाचारों को बेनकाब करने के दावों के आधार पर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने की कोशिश कर रहे थे। अरविन्द केजरीवाल ने कॉन्ग्रेस के कुछ वरिष्ठ नेताओं- सलमान खुर्शीद, कपिल सिब्बल और पी चिदंबरम पर भ्रष्टाचार में लिप्त होने के आरोप लगाते हुए कहा था कि जिस दिन CBI स्वतंत्र हो जाएगी, ये तीनों और इनकी पत्नियाँ भी जेल के भीतर होंगे।

कल शाम पी चिदंबरम की गिरफ्तारी के बाद केजरीवाल से लोग सोशल मीडिया पर सवाल करते रहे कि क्या उन्हें चिदंबरम की गिरफ्तारी और CBI की स्वतन्त्रता पर अब मोदी सरकार को बधाई नहीं देनी चाहिए? हालाँकि, अरविन्द केजरीवाल इस मामले पर अभी तक खामोश ही हैं।

इसी बात पर भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने भी अरविन्द केजरीवाल पर निशाना साधते हुए एक ट्वीट किया और लिखा, “इतना सन्नाटा क्यों है अरविंद केजरीवाल, कोई सदमा लगा है क्या? इसी चिदंबरम के घर के सामने अन्ना आंदोलन में लोगों ने लाठियाँ खाई थीं। भ्रष्टाचारियों की सूची में चिदंबरम का नाम सबसे ऊपर था। आज लालू, वाड्रा सब शिकंजे में हैं। बधाई तो दे दो मोदी जी को, फेविकोल काहे पीकर बैठे हो?”

केजरीवाल के पुराने साथी रहे प्रशांत भूषण का भी चिदंबरम की गिरफ्तारी पर दोहरा रवैया सामने आया है। सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण पूर्व में कई बार पी चिदंबरम के खिलाफ कार्रवाई की माँग कर चुके हैं, लेकिन जब वह गिरफ्तार हो गए तो इस गिरफ्तारी को असंवैधानिक और जाँच एजेंसियों की बदले की कार्रवाई बता रहे हैं।

कोर्ट में काम न आईं सिब्बल की दलीलें, CBI को मिली 26 अगस्त तक की कस्टडी

पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री पी चिदंबरम को आज गुरुवार (अगस्त 22, 2019) को सीबीआई की विशेष अदालत में पेश किया गया। सीबीआई ने आईएनएक्स मीडिया केस में पी चिदंबरम को 5 दिन के लिए कस्टडी में लेने की माँग की थी। सीबीआई ने अदालत में कहा कि कई ऐसे डाक्यूमेंट्स और जानकारियाँ हैं, जो चिदंबरम को कस्टडी में लेकर पूछताछ करने के बाद ही निकल सकती हैं। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि पी चिदंबरम जाँच व पूछताछ में सहयोग नहीं कर रहे हैं, वह जवाब ही नहीं दे रहे हैं।

INX मीडिया मामले में पी. चिदंबरम को कोर्ट से झटका लगा है। कोर्ट ने पी. चिदंबरम को 5 दिन की CBI रिमांड में भेज दिया है। इसके साथ ही अब 26 अगस्त तक पी. चिदंबरम सीबीआई की हिरासत में रहेंगे। वहीं परिवार के लोग हर रोज आधे घंटे के लिए पी. चिदंबरम से मुलाकात कर सकते हैं।

इससे पहले हुई मामले की सुनवाई के दौरान कपिल सिब्बल ने कहा कि इस मामले में पहली गिरफ्तारी पूर्व केंद्रीय मंत्री के बेटे कार्ति के चार्टर्ड अकाउंटेंट भास्कर रमन की हुई थी, जो अभी जमानत पर जेल से बाहर हैं। सिब्बल ने कहा कि उसके अलावा मामले के अन्य आरोपी पीटर मुखर्जी और इंद्राणी मुखर्जी को भी जमानत मिल चुकी है लेकिन अन्य मामले में वे जेल में हैं।

सिब्बल ने कहा कि जमानत प्रदान करना एक नियम है और अदालत के समक्ष मुद्दा व्यक्तिगत स्वतंत्रता का है। पूछताछ के लिए चिदंबरम को 5 दिनों की हिरासत में सौंपे जाने की सीबीआई के माँग का विरोध करते हुए उन्होंने यह दलील दी थी।

सुनवाई के दौरान मेहता ने दिल्ली हाईकोर्ट का जजमेंट पढ़ा, जिसमें लिखा है कि आईएनएक्स मीडिया केस मनी लॉन्ड्रिंग का एक क्लासिक उदाहरण है। इस जजमेंट को जस्टिस सुनील गौड़ ने लिखा था, जिन्होंने चिदंबरम की अग्रिम जमानत याचिका ख़ारिज की थी। मेहता ने अदालत को बताया कि इस मामले में आरोपित का गंभीर और सक्रिय किरदार रहा है। सीबीआई को इस पूरे लेनदेन की जड़ तक पहुँचना है। मेहता ने जज के सामने केस की डायरी पेश की।

बता दें कि चिदंबरम पर वित्त मंत्री रहते आईएनएक्स मीडिया को एफआईपीबी से स्वीकृति दिलवाने के बदले रिश्वत लेने का आरोप है। उनके वकील कपिल सिब्बल ने अपनी दलील पेश करते हुए अदालत में कहा कि इस प्रक्रिया में भारत सरकार के 6 सचिव हिस्सा लेते हैं लेकिन किसी को भी गिरफ़्तार नहीं किया गया। सिब्बल ने इस बात पर आपत्ति जताई कि एफआईआर 10 वर्षों के बाद दर्ज किया गया। उन्होंने वादा किया कि जब भी पूछताछ के लिए बुलाया जाएगा, पी चिदंबरम हाजिर हो जाएँगे।

सिब्बल ने दावा किया कि सीबीआई को जो सवाल चिदंबरम से पूछने थे, वह पूरी तरह से तैयार नहीं हैं और चिदंबरम ने हर सवाल का जवाब दिया है। सिब्बल ने ‘उस तरीके’ पर आपत्ति जताई, जिससे चिदंबरम के ख़िलाफ़ केस चला और उन्हें गिरफ़्तार किया गया। वहीं अभिषेक मनु सिंघवी की आपत्ति इस बात को लेकर थी कि 2018 में इन्द्राणी मुखर्जी का बयान रिकॉर्ड करने के 4 महीने बाद चिदंबरम को पूछताछ के लिए बुलाया गया। उन्होंने कहा कि इन्द्राणी को अप्रूवर बना दिया गया है ताकि चिदंबरम को कस्टडी में लिया जा सके।

अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत में कहा कि भारत सरकार के जिन 6 सचिवों ने एफआईपीबी अप्रूवल दिया, उनमें से एक आगे जाकर रिज़र्व बैंक का गवर्नर बना। सिंघवी ने एक सुप्रीम कोर्ट जजमेंट का हवाला देते हुए कहा कि कस्टडी की माँग तभी की जाती है जब जाँच एजेंसी को लगे कि कस्टडी में लिए बिना आगे की जाँच प्रक्रिया पूरी करनी असंभव है।

सुनवाई के दौरान आरोपित पी चिदंबरम इस बात पर अड़ गए कि उन्हें भी कुछ बोलना है। सीबीआई की आपत्ति के बाद सिंघवी ने एक जजमेंट पढ़ा, जिसके अनुसार आरोपित ख़ुद का प्रतिनिधित्व कर सकता है।

सॉलिसिटर जनरल ने कहा की जाँच एजेंसी दिमाग वाले लोगों से डील कर रही है और ऐसे में इस केस की जड़ तक पहुँचना ज़रूरी है। हालाँकि, सिब्बल ने कहा कि वे नहीं चाहते कि चिदंबरम से पूछे जाने वाले सवाल सार्वजनिक हों, लेकिन वो सवालों की प्रमाणिकता की पुष्टि चाहते हैं।

फर्जी नारीवाद में मत फँसो लड़कियो, वरना प्रेम में सहमति से बना शारीरिक संबंध भी फर्जी बलात्कार ही लगेगा

बढ़ते समय में ‘स्पेस’ एक बहुत बड़ी माँग है। व्यक्तिगत स्वतंत्रता से लेकर सार्वजनिक रूप से सहमति-असहमति दर्ज कराने के लिए हमें इसकी जरूरत पड़ती है। हमें अपनी बात कहनी होती है तो हम इसकी अपेक्षा करते हैं, हमें किसी की बात सुननी होती है तो हम इसे तलब करते हैं। बाहरी परिवेश से लेकर व्यक्तिगत जीवन तक हमें ‘स्पेस’ मिलना और ‘स्पेस’ देना ही हमारे भीतर सकारात्मक बदलाव लेकर आता है।

कल्पना करिए! आपसे अंजाने में हुई किसी गलती पर कोई आपसे झल्ला कर कहे “तुम इतनी बेवकूफों वाली हरकत कैसे कर सकते हो” या “तुमने ये किया भी कैसे” तो आपको कैसा लगेगा? और इसी परिस्थिति में कोई आपको समझते हुए कह दे, “ऐसा हो जाता है…कोई बात नहीं” तो कैसा लगेगा। एक ही स्थिति पर दो अलग ‘भाव’ और फर्क सिर्फ़ इतना कि आपकी गलती, आपकी भूल, आपके मत, आपके स्वभाव, आपके समाज और आपके परिवेश को सामने वाला स्पेस दे रहा है या नहीं। विपरीत परिस्थियों में भी मिला सही स्पेस आपको आगे बढ़ने के विकल्प देता है और इसकी गैर मौजूदगी सिर्फ़ अवसाद!!!

मुझे लगता है इस ‘स्पेस’ का अर्थ समझने की छोटे बच्चे से लेकर हर बड़े बुजुर्ग को जरूरत है। लेकिन जो सबसे ज्यादा इसके तलबगार हैं वो प्रेम संबंध में जकड़े प्रेमी-प्रेमिका हैं। जकड़े शब्द का इस्तेमाल मैं सोच-समझ कर रही रही हूँ। जिन्होंने अपने जीवन में प्रेम अनुभव किया है या जो अपने जीवन में किसी के प्रेम संबंधों के गवाह हैं, वो इस बात से सहमत रहेंगे। किसी व्यक्ति विशेष से हुआ प्यार हमें भावनाओं के प्रलोभ से ऊपर, उसमें जकड़ते जाने की ट्रेनिंग देता है। नतीजतन हम सामने वाले को अपनी निजी प्रॉपर्टी समझने लगते हैं। हम बिना उसकी व्यथा, मजबूरी, मानसिकता जाने उससे अपेक्षा करते हैं कि वो जो करे उसके मनमुताबिक हो। और जब ऐसा नहीं होता तो हम परेशान हो जाते हैं, घबराहट से भर उठते हैं, गुस्सा हमें खाने लगता है, हम चिड़चिड़े हो जाते हैं। और आखिर में कोई ऐसा कदम उठा लेते हैं जो न हमारे लिए सही होता है न किसी अन्य के लिए। अपने साथी और उसके फैसले को मात्र ‘स्पेस’ न देने के कारण हम खिन्नता के पात्र बन जाते हैं।

प्रेम संबंध के दौरान लड़के-लड़कियों के बीच ये बहुत बड़ा पेशोपेश होता है कि वो एक दूसरे से जुड़ते वक्त समाज से छिपकर स्वतंत्र रूप से फैसला लेते हैं लेकिन जब रिश्ता समाज के बीच पहुँचता है तो उन्हें कई तरह की बंदिशें और उलाहनाएँ झेलनी पड़ती हैं। इसके बावजूद हम क्या फैसला करते हैं और उस पर हमारा साथी क्या रिएक्ट करता है, उसे ही प्रेम में एक तरह से स्पेस देना और स्पेस मिलना कहा जाता है।

कल जब सुप्रीम कोर्ट की ओर से एक फैसला आया, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अगर कोई महिला भविष्य में शादी की सुनिश्चतता जाने बिना किसी शख्स के साथ लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाती है तो वह उस पर यह कहकर बलात्कार का आरोप नहीं लगा सकती कि उस आदमी ने उससे शादी का वादा किया था।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला एक उदाहरण है कि अब न्यायपालिका भी प्रेम संबंधों में जोड़ों से स्पेस की मौजूदगी की अपेक्षा कर रहा है। मसलन इस केस में एक सेल्स टैक्स की असिसटेंट कमिश्नर ने आरोप लगाया कि सीआरपीएफ कमांडेंट ने उसे झूठे वादे देकर बलात्कार किया। सही पढ़ा आपने, महिला अधिकारी ने अपनी शिकायत में पुरुष अधिकारी और एक लंबे समय तक रहे अपने प्रेमी पर बलात्कार का आरोप लगाया। उन्होंने अपनी शिकायत में इस बात का जिक्र किया कि पुरुष अधिकारी ने झूठा वादा करके उसके साथ ये सब किया। लेकिन जब कोर्ट ने मामले में सारी दलीलें सुनीं तो उन्होंने फैसला किया कि 6 साल रिश्ते में रहने के बाद, अलग-अलग मौक़ों पर एक दूसरे के घर आने-जाने के बाद दोनों के बीच सहमति के रिश्ते थे। इसलिए बलात्कार का उनका आरोप खारिज किया जाता है।

साथ ही कोर्ट ने एक बहुत महत्तवपूर्ण बात कही, “झूठे वादे कर महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाने में और आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बनाने में फर्क है। झूठा वादा कर धोखा देना वह स्थिति है, जिसमें वादा करने वाले शख्स के मन में जुबान देते वक्त उसे निभाने की सिरे से कोई योजना ही न हो।”

कोर्ट ने महिला की शिकायत पर बारीकी से अध्य्यन करते हुए कहा कि 2008 में किया गया शादी का वादा 2016 में पूरा नहीं किया जा सका। सिर्फ इस आधार पर यह नहीं माना जा सकता है कि शादी का वादा महज शारीरिक संबंध बनाने के लिए था। कोर्ट ने यह भी कहा कि महिला शिकायतकर्ता को भी इस बात का पता था कि शादी में कई किस्म की अड़चनें हैं। वह पूरी तरह से परिस्थितियों से अवगत थीं।

ये पूरा मामला प्रेम संबंध में सहमति-असहमति को स्पेस न दिए जाने के कारण कोर्ट में पहुँचा। लेकिन आखिरकार कोर्ट के फैसले ने प्रेम संबंध में जकड़े लोगों की उस भावना को चोट किया, जो अपने साथी की निजता खत्म करके उसको अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाली वस्तु समझ लेते हैं। इस हालिया मामले में बलात्कार का आरोप मढ़ती हुई लड़की ने एक बार भी सोचने का प्रयास नहीं किया कि जो संबंध दोनों के बीच बने वो तब भी रहे जब लड़के ने शादी में असमर्थता दिखाते हुए अपनी मजबूरी उसके आगे रख दी। वो मजबूरी लड़की की जाति थी। जिसे लड़के का परिवार-समाज स्वीकारने को तैयार नहीं था, और लड़का अपने समाज की सोच के ख़िलाफ़ कदम उठाने के लिए तैयार नहीं था। लड़की चाहती तो उसे और उसके समाज को पिछड़ी सोच के लिए दुत्कार सकती थी, अपने तरीके से बहिष्कार कर सकती थी, घर में सबको सच्चाई बता सकती थी, उसके फैसले का और उसका विरोध कर सकती थी। लेकिन वो सीधे कोर्ट पहुँची और लड़के पर आरोप भी लगाया तो ये कि उसके प्रेमी ने उसका बलात्कार किया! क्या वाकई 6 साल के प्रेम संबंध में आपसी सहमति से आई करीबियाँ बलात्कार होती हैं? आप अपने स्तर पर सोचिए।

प्रेम के बाद अलग होना और प्रेम में दोषी होना, दो अलग बातें हैं। जिसे कोर्ट ने भी अपने फैसले के साथ स्पष्ट कर दिया। भारतीय संस्कृति के पटल पर नाक-साख, जाति-धर्म, माँ-बाप की इज्जत के नाम पर कितने जोड़े एक दूसरे से अलग हो जाते हैं, ये मुझे विस्तार से बताने की जरूरत नहीं है। हम नजर घुमाकर भी देखें तो इन कुप्रथाओं और भ्रांतियों से ग्रसित समाज में ऐसे पीड़ित प्रेम संबंध मिल जाएँगे जो अपने अटूट प्रेम के बावजूद भी टूट गए और अलग-अलग साथी के साथ न सिर्फ अपना जीवन गुजार रहे हैं बल्कि मस्त भी हैं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि उनमें से कोई एक अपनी कुंठा-गुस्सा-द्वेश निकालने के लिए संबंधों को बलात्कार बता दे।

फर्जी नारीवाद को दो पल के लिए कोने में रखकर एक बार इस बात पर गौर करिए कि हम कथित तौर पर महिला सुरक्षा और महिला अधिकारों के नाम पर क्या गंदगी फैला रहे हैं। हम अभिव्यक्ति की आजादी का प्रयोग कौन सी दिशा में कर रहे हैं? पूछिए एक बार खुद से क्या वाकई प्रेम में अलग होने के बाद आपसी संबंध बलात्कार हो जाते हैं? और अगर आपको इस सवाल का जवाब ‘हाँ’ दिखता है तो उस ‘भाई’ या उस ‘दोस्त’ या उस ‘रिश्तेदार’ के बारे में जरूर सोचिए, जिसे सामाजिक के दबाव में आकर अपने प्रेम को छोड़ना पड़ा, लेकिन फिर भी वो उसे भुलाने में असमर्थ रहा। अब ऐसे में क्या हो अगर उसकी प्रेमिका आकर उसे बलात्कारी बता जाए… शायद उस समय हमें उस लड़की से या पूरी लड़की जाति से नफरत हो जाएगी। एक आरोप एक लड़के की जिंदगी, एक पुरूष का भविष्य सब बर्बाद कर देती है। वो शादी का वादा करके मुकर जाने पर अपनी ओछी मानसिकता के लिए दोषी हो सकता है, वो समाजिक कुरीति बढ़ाने के लिए जिम्मेदार हो सकता है, लेकिन बलात्कार का आरोपी या दोषी बिल्कुल नहीं हो सकता।

ये बात सच है कि समाज में ऐसी घटनाएँ आए दिन घट रही हैं कि जहाँ पुरूष शादी का वादा करके एक महिला को भीतर तक छील जाते हैं, लेकिन इस बात से भी गुरेज नहीं किया जा सकता कि अब महिलाएँ अपनी कुंठा निकालने के लिए आपसी संबंधों को भी बलात्कार बता रही हैं। जिसमें दोषी न होते हुए एक पुरूष को जलालत झेलनी पड़ती है। इन्हीं सब कारणों से प्रेम संबंधों में स्पेस की जरूरत अत्यधिक है, ताकि हम अपने साथी को उसके स्वभाव, मनोभाव और उसकी हरकतों पर आँक सकें, न कि उस व्यक्तित्व के आधार पर जो ‘प्रेम की जकड़’ या ‘साथी की मंशा’ के दबाव के कारण बना। क्योंकि अगर ऐसा होगा तो सहमति से बनाया शारीरिक संबंध भी फर्जी बलात्कार ही लगेगा।