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CCD संस्थापक वीजी सिद्धार्थ की मौत का मामला गहराया, कॉन्ग्रेस नेता डीके शिवकुमार के साथ हवाला कनेक्शन

कर्नाटक कॉन्ग्रेस के बड़े नेता और पूर्व मंत्री डीके शिवकुमार के साथ हवाला कनेक्शन का मामला सामने आने के कारण कैफ़े कॉफी डे (CCD) के संस्थापक वीजी सिद्धार्थ की मौत का मामला और पेचीदा हो गया है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक पूर्व विदेश मंत्री एसएम कृष्णा के दामाद सिद्धार्थ के खिलाफ जाँच के दौरान आयकर (IT) विभाग को संदिग्ध हवाला लेनदेन के सुराग मिले थे।

रिपब्लिक के अनुसार IT विभाग ने जाँच में पाया कि कॉन्ग्रेस नेता डीके शिवकुमार की बेटी के साथ CCD ने करीब ₹20 करोड़ का लेनदेन किया था। जाँच में सिंगापुरी नागरिक रजनीश गोपीनाथ का नाम भी सामने आया था। उसके घर पर IT विभाग को ₹1.2 करोड़ की बेहिसाब नकदी मिली थी। पूछताछ में गोपीनाथ ने यह पैसा वीजी सिद्धार्थ का होने की बात कही थी। रिपब्लिक ने विभाग के सूत्रों के हवाले से फ़ोन पर बातचीत के सबूतों का भी दावा किया है।

इसके अलावा CCD कर्मचारी और सिद्धार्थ के कथित ‘खास’ दीक्षित के ज़रिए रजनीश गोपीनाथ और CCD के बीच हवाला कारोबार होता था। रजनीश का भाई मुनीश CCD का वित्तीय निदेशक था और इस कारोबार में शर्मा ट्रांसपोर्ट नामक हवाला ऑपरेटर के कर्मचारी रवि और रफ़ी भी शामिल हैं। रिपब्लिक के IT सूत्र ने दीक्षित के भी इकबालनामे की बात की है।

नदी में मिली लाश

मालूम हो कि सोमवार से लापता चल रहे सिद्धार्थ का लाश उल्लाल के निकट नेत्रवती नदी किनारे मिला। उनका शव वहाँ मौजूद स्थानीय मछुआरों ने निकाला। IT विभाग का कहना है कि उसके पास सिद्धार्थ का जो हस्ताक्षर है, वह सोशल मीडिया में चल रहे उनके कथित पत्र के हस्ताक्षर से अलग है। साथ ही विभाग ने जाँच के दौरान सिद्धार्थ को प्रताड़ित करने के आरोपों से भी इनकार किया है। विभाग के अनुसार पूर्व विदेश मंत्री एसएम कृष्णा के दामाद ने अपनी आय के कुछ हिस्से को छिपाने का आरोप भी स्वीकारा था।

मेरी बात को तोड़ा-मरोड़ा: पीवी सिंधु ने TOI को लताड़ा

ओलम्पिक पदक विजेता शटलर पीवी सिंधु ने अपने शब्द तोड़-मरोड़ कर पेश करने के लिए टाइम्स ऑफ़ इंडिया के पत्रकार को लताड़ लगाई है। सिंधु का कहना है कि TOI संवाददाता मन्ने रत्नाकर ने उनके कहे को कुछ-का-कुछ बना दिया है। एक अन्य बैडमिंटन खिलाड़ी ज्वाला गुट्टा ने भी ट्विटर पर सिंधु का समर्थन किया है।

कॉमनवेल्थ गेम्स का मसला

कॉमनवेल्थ गेम्स के मामले पर टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने दावा किया था कि अभिनव बिंद्रा और गगन नारंग के बाद सिंधु ने भी CWG का बहिष्कार न करने की इंडियन ओलम्पिक एसोसिएशन (IOA) से अपील की है। बताया जा रहा है कि IOA अगले राष्ट्रमंडल खेलों में शूटिंग को शामिल न किए जाने को लेकर इन खेलों के बर्मिंघम में होने वाले अगले संस्करण का बहिष्कार करने का मन बना रहा है। IOA अध्यक्ष नरेंद्र बत्रा ने खेल मंत्री किरण रिजिजू को पत्र लिखकर इस मसले पर विचार करने के लिए बैठक की माँग की है

इसी को लेकर बीजिंग ओलम्पिक में शूटिंग में स्वर्ण पदक जीतने वाले अभिनव बिंद्रा और लंदन ओलम्पिक के काँस्य विजेता गगन नारंग ने IOA से ऐसा न करने की अपील की थी। बाद में 2016 के रियो ओलम्पिक में रजत जीतने वाली सिंधु के हवाले से TOI ने दावा किया कि उन्होंने भी IOA से बहिष्कार न करने की अपील की है।

लेकिन सिंधु ने साफ तौर पर कहा है कि उन्होंने ऐसा कभी नहीं कहा था। उनके अनुसार उन्होंने कहा था कि एथलीट होने के नाते (ऐसी प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में) वह हिस्सा अवश्य लेना चाहतीं हैं, लेकिन साथ में यह भी जोड़ा था कि ऐसा देश की कीमत पर नहीं होगा। वह IOA और सरकार के हर फैसले के साथ हैं।

ज्वाला गुट्टा ने सिंधु के ट्वीट का समर्थन करते हुए कहा कि ऐसी घटना पहली बार नहीं हुई है। यानी मन्ने रत्नाकर ऐसा पहले भी कर चुके हैं।

मीडिया की विश्वसनीयता घेरे में

यह घटना एक बार फिर दिखाती है कि मीडिया कि विश्वसनीयता पर लग रहे प्रश्नचिह्न क्यों सही हैं। आज जब आम और खास, हर आदमी पेशेवर पत्रकारों पर विश्वास करने से कतराता है, तो इसके लिए गम्भीरतापूर्वक, विचारपूर्वक कोई हल निकालने की बजाय चंद मिनटों की चिरकुटई लूटने के लिए पत्रकार ऐसी हरकतें कर खुद की ही नहीं, पूरे पेशे की कब्र खोद रहे हैं।

मोदी ने पहले ही खास आदमी को यह दिखा दिया है कि उसे आम आदमी से संवाद करने के लिए बिचौलिए की ज़रूरत नहीं है। आम आदमी सोशल ट्रेंडों की ताकत से खास लोगों से संवाद कर ही रहा है। इस बीच बाबा रामदेव के इंटरव्यू से छेड़छाड़ जैसी घटनाओं से भी मीडिया की विश्वसनीयता गिरती गई है। इसीलिए अख़बारों के सब्सक्रिप्शन घट रहे हैं, चैनलों को टीवी पर कोई देखना नहीं चाहता। ऐसे में इस तरह की ओछी हरकत की उम्मीद देश के सबसे ज़्यादा बिकने वाले अख़बारों में से एक से तो नहीं थी!

शेहला के बैग में कंडोम की अफवाह फैलाने पर चौकीदार नीतीश कुमार समेत 16 पर FIR

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की छात्र नेता शेहला राशिद पर आपत्तिजनक टिप्पणी मामले में बेगूसराय में 16 लोगों पर प्राथमिकी दर्ज की गई है। लोकसभा चुनाव के दौरान शेहला बेगूसराय से CPI के प्रत्याशी रहे कन्हैया कुमार और JNU छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार के प्रचार में आईं थी।

उस समय चुनाव प्रचार कर रही शेहला रशीद के बारे में फेसबुक पर कई तरह की पोस्ट शेयर की गई थीं। कई लोगों ने लिखा था कि बेगूसराय पुलिस की जाँच में शेहला रशीद के बैग से कंडोम मिले थे।

इस मामले में नगर थाने में 16 लोगों के विरुद्ध नामजद एफआईआर की गई है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बेगूसराय जिला पुलिस ने यह कार्रवाई दिल्ली की सामाजिक कार्यकर्ता जेना यमन की महिला आयोग से शिकायत के बाद की है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, शिकायत दर्ज करने वाली जेना ने जिन 16 लोगों को नामजद आरोपित बनाया है, इनमें स्थानीय केशव भारद्वाज के साथ रोशन राज, मनीष कुमार, रितेश झा, ज्योति, एवी विपिन शर्मा, कन्हैया सिंह, राहुल शर्मा, वेंकटेश कुमार सिंह, एस पुरोहित, मंजेश पुरोहित, मंतोष कुमार शांडिल्य, विनोद कुमार मंडल, मुख्तार सिंह और चौकीदार नीतीश कुमार समेत 16 लोग शामिल हैं। उन पर आइटी एक्‍ट की धारा 67 व 67-ए तथा आइपीसी की धारा 294, 469, 504 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है। 

अप्रैल में शेहला रशीद का एक वीडियो वायरल हुआ था जिसमें शेहला कह रही थीं कि किसी भी समुदाय के सारे अमीर व्यक्ति शाम को होटल में बैठकर एक साथ बीफ खाते हैं और दारू पीते हैं। हालाँकि इस बात की पुष्टि नहीं हो पाई थी कि वीडियो चुनाव प्रचार के दौरान का ही है, लेकिन इसके बाद वह कई लोगों के निशाने पर आ गई थीं। वीडियो के आधार पर उन पर कई आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की गई थीं।

बंगाल में पत्रकारों पर रुक नहीं रहे हमले और दीदी बॉंट रही रेवड़ी

प्रेस क्लब, कोलकाता की प्लैटिनम जुबली के उपलक्ष्य में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पत्रकारों को ‘जॉब गारंटी’ स्कीम देने का वादा किया। साथ ही 69 पत्रकारों की सूची भी जारी की जिन्हें राज्य सरकार द्वारा ₹2,500 मासिक दिए जाएंगे। सरकार ने पहले 30 की सूची दिसंबर, 2018 में ही जारी कर दी थी। इसके अलावा उन्होंने ₹1,00,001 भी प्रेस क्लब को चंदा दिया और प्रेस क्लब को कुल 13.5 कोटा ज़मीन भी आवंटित की। ₹1,00,000 का अतिरिक्त दान शर्मिष्ठा हज़रा के लिए उन्होंने किया, जिसके पत्रकार पति अर्णब हज़रा ने आर्थिक तंगी के चलते आत्महत्या कर ली थी

पहले हमले रोकिए

एक तरफ़ ममता बनर्जी ने यह रेवड़ियाँ बाँटीं और दूसरी ओर हफ्ते भर के भीतर पत्रकार के घर पर बम से हमले की एक और घटना सामने आई है। ABP आनंदार के बीरभूम संवाददाता गोपाल चट्टोपाध्याय के घर पर बमों से हमला किया गया। हमले के वक़्त गोपाल चट्टोपाध्याय और उनकी पत्नी घर पर नहीं थे।

बीरभूम के SP संजय सिंह ने मौके पर पहुँच कर जाँच शुरू कर दी है। गोपाल को पिछले कुछ दिनों से अवैध बालू माफ़िया और जमाखोरी के खिलाफ रिपोर्ट लिखने को लेकर धमकी मिल रही थी।

जान है तो जहान है

ममता बनर्जी ने कहावत सुनी होगी कि जान है तो जहान है। अगर ईमानदारी से काम करने वाला पत्रकार ज़िंदा ही नहीं बचेगा तो ममता बनर्जी बताएँ कि उनकी ऐसी पेंशन किस काम की है? रेवड़ियों वाली ‘सोशल सिक्योरिटी’ से बेहतर है ममता बनर्जी पत्रकारों को असली सिक्योरिटी दिलाने के बारे में सोचें।

हिन्दुओं की लिंचिंग से हिन्दुओं को ही फर्क नहीं पड़ता तो 49 सेलिब्रिटीज़ से सवाल क्यों?

हत्या क्या है? हत्या एक अपराध है, अगर मरने वाला हिन्दू न हो तो। साम्प्रदायिक या कम्यूनल होना क्या है? जब आप विशेष मजहब के खिलाफ सामान्य बातें भी आलोचनात्मक रवैये के साथ लिखें। हालाँकि, जब हिन्दुओं के धार्मिक प्रतीकों, देवताओं, देवियों, मंदिरों, परम्पराओं आदि पर सीधे तौर पर हमले हों, और हमलावर सम्प्रदाय विशेष से या ईसाई हो, तो उसे साम्प्रदायिक नहीं माना जाता क्योंकि पीड़ित हिन्दू या हिन्दू धर्म है। यही आजकल की परिभाषा है, आपको जितना रोना-गाना है कर लीजिए, फर्क नहीं पड़ता।

जब तबरेज या अखलाख की हत्या होती है तो वो आंदोलन बन जाता है। ऐसा आंदोलन बन जाता है कि घटनास्थल से सैकड़ों किलोमीटर दूर मजहबी भीड़ लाख की संख्या में कैंडल लेकर निकल पड़ती है। या झारखंड से दूर गुजरात के सूरत में पुलिस की परमिशन न मिलने के बाद भी इस्लामी भीड़ निकलती है, उत्पात मचाती है और बताती है कि वो तबरेज की लिंचिंग के खिलाफ है।

अब कुछ घटनाएँ देखिए जो हाल ही की हैं जहाँ हिन्दुओं को कट्टरपंथियों ने मार डाला, लेकिन वो खबरें आप तक मेनस्ट्रीम मीडिया ले कर नहीं आती। सारी घटनाओं में मजहब ही केन्द्र में है, और कुछ भी नहीं।

गोपाल गौ रक्षक दल से जुड़े हुए थे। वह पहले भी कई गायों को तस्करों की पकड़ से छुड़ा चुके थे। उन्हें सोमवार (जुलाई 29, 2019) को किसी ने सूचना दी थी कि कुछ लोग गाय की तस्करी कर रहे हैं। जिसके बाद अपनी बाइक लेकर निहत्थे ही वे गायों को बचाने के लिए तस्करों का पीछा करने लगे। परिणामस्वरुप रास्ते का रोड़ा बनता देख गो तस्करों ने उन्हें गोली मार दी और वहीं उनकी मौत हो गई।

जनवरी 2019 में, इम्तियाज़ अहमद फ़ैयाज़ (19) और मोहम्मद रज़ा अब्दुल क़ुरैशी (20) गाय चुराकर ले जा रहे थे, कॉन्स्टेबल पेट्रोलिंग कर रहे थे। गाय लेकर जा रहे ट्रक से अब्दुल और क़ुरैशी ने कॉन्सटेबल प्रकाश मेशराम को कुचल दिया, जिससे उनकी वहीं पर मृत्यु हो गई। इससे पहले अप्रैल 2016 में रेवाड़ी में गो-तस्करों ने गाड़ी से कुचल कर एक सिपाही की हत्या कर दी थी।

राजस्थान के अलवर जिले में गो तस्करों ने ग्रामीणों पर फायरिंग की। हमले में जीतनराम नाम के ग्रामीण के सीने में गोली लगी। उनका भतीजा रामजीत भी घायल हो गया। इसके बाद अन्य ग्रामीणों ने एक तस्कर को पकड़ लिया और उसकी जमकर पिटाई की। 2 अन्य तस्कर फरार हो गए। तस्कर की पहचान सलीम खान के रूप में हुई है।

हरियाणा के नूंह शहर के भूतेश्वर मंदिर में कल काँवड़ चढ़ाने के दौरान ‘शांतिप्रिय’ समुदाय के युवकों द्वारा लड़कियों को छेड़ने का मामला सामने आया। जानकारी के मुताबिक जब लड़कियों के परिजनों ने इसका विरोध किया तो आसिफ, हुसैन, नोमान, इसराइल, जुबैर, सुब्बे, नईम और हाशिम ने उनसे मारपीट की।

बिहार के मुजफ्फरपुर में बरुराज थाना क्षेत्र में सावन के दूसरे सोमवार को जल भरने जा रही तकरीबन 500 से भी ज्यादा महिला और बच्चियों पर, मस्जिद के पास से गुजरते समय कुछ अराजक तत्वों द्वारा पथराव किया गया। जब बीच-बचाव के लिए पुलिस आई तो उनके साथ भी दुर्व्यवहार हुआ।

प्रयागराज में गौ तस्करी के आरोपी को गिरफ़्तार करने गई यूपी पुलिस पर गाँव वालों ने हमला कर दिया। हमला भी ऐसा-वैसा नहीं, बाकायदा पुलिस पर फायरिंग। इसके चलते आरोपित भागने में सफल रहा और 7 पुलिस वाले घायल भी हो गए।

ये चंद वैसी घटनाएँ हैं जो एक सीधे सर्च से सामने दिख गईं। इसके अलावा आपने दसियों नाम सुने होंगे जिसमें ध्रुव त्यागी, डॉक्टर नारंग, ई-रिक्शा चालक रवीन्द्र, अंकित सक्सेना आदि शामिल हैं जिन्हें मजहबी भीड़ ने अपनी घृणा का शिकार बनाया। इन सब पर न तो किसी जगह पर एक लाख हिन्दुओं ने कैंडल मार्च किया, न ही प्रधानमंत्री को इन घटनाओं पर बोलने को मजबूर किया, न ही किसी दूसरे राज्य में इनकी लिंचिंग के विरोध में सद्भावना रैली निकली।

ये सब नहीं हुआ क्योंकि आपको लगता है कि आपके बदले कोई सेलिब्रिटी कहीं से बैठ कर लेटर साइन करेगा, और आपका काम हो जाएगा। आपका काम नहीं हो पाएगा, क्योंकि आपको फर्क नहीं पड़ता। आप और हम सिर्फ़ ट्विटर-फेसबुक पर ही सारी लड़ाई लड़ लेते हैं। आप बस इस बात से खुश हो जाते हैं कि कश्मीर से ये धारा अब खत्म हो जाएगी, जबकि सामने से एक मजहबी उन्माद से उबलती भीड़ नारा-ए-तदबीर अदरक-लहसुन करती आती है, और आपके दुर्गा मंदिर को तोड़ कर चली जाती है।

क्या मैं, पिछली घटनाओं को आधार मानकर, ये सवाल न पूछूँ कि मजहब विशेष के लोगों को गाय काटकर खाने की ऐसी भी क्या चुल्ल मचती है कि वो पुलिस कॉन्स्टेबल की हत्या करने पर आमादा हो जाते हैं? कानून के लिए कितनी इज़्ज़त है कि बुलंदशहर में भी इसी तरह गायों के काटे जाने की ख़बर की परिणति एक पुलिस अफसर और एक नवयुवक की मौत के रूप में हुई?

आखिर ‘शान्तिप्रियों’ को काँवड़ ले जाते काँवड़ियों से क्या समस्या है कि वो रात के एक बजे छत पर बैठ कर उनके गुजरने का इतंजार करते हैं और पत्थरबाजी करते हैं? रामनवमी के जुलूस पर पत्थरबाजी, दुर्गा विसर्जन करने जा रहे लोगों पर पत्थरबाजी, सैनिकों पर पत्थरबाजी, अपराधियों और आतंकियों को बचाने को लिए पत्थरबाजी…आखिर ऐसा भी क्या प्रेम है पत्थरों से?

आख़िर बवाल तब ही क्यों होता है जब गायों की चोरी करते हुए अपराधियों को कुछ हिन्दू गौरक्षक घेरकर पीटते हैं, या कभी-कभी पिटाई के कारण उनकी मौत हो जाती है? अगर मोदी इन गौरक्षकों को फोन करके गाय चोरी करनेवालों को पीटने कहता है, तो फिर इन समुदाय विशेष के लड़कों को पुलिस के ऊपर गाड़ी चढ़ाने के लिए कौन फोन करता है? उनको भी तो कहीं से फोन आता होगा उस हिसाब से?

जब गौरक्षक कानून हाथ में लेते हैं तो पूरा हिन्दू समाज असहिष्णु हो जाता है, फिर इन कट्टरपंथियों द्वारा पुलिस की हत्या पर क्या कहा जाए? जब गाय का मसला संवेदनशील और भावनात्मक है तो फिर एक ख़ास मज़हब के लोग बार-बार वही काम क्यों करते हैं जिससे भावनाएँ भड़कती हैं और दंगे तक होते हैं? क्या हिन्दू समाज को उकसा कर, अपने अल्पसंख्यक होने की बात कहकर मजहबी अपराधी अपने दुष्कृत्यों को अंजाम देते रहेंगे?

शायद हाँ, क्योंकि आपने ‘संघे शक्ति कलौयुगे’ या ‘संघे शक्ति युगे युगे’ की रट तो लगाई लेकिन देश की सबसे बड़ी आबादी होने के बावजूद उस संगठन की शक्ति को कहीं दिखा नहीं पाए। और मैं यह नहीं कह रहा कि आप दूसरे मजहबों के संस्थानों पर चढ़ाई कर दें या उनके जुलूसों पर पत्थर मारने लगें, क्योंकि उस स्थिति में आपराधिक मजहबी भीड़ और सर्वसमावेशी भाव से चलने वाले सनातनियों में कोई फर्क नहीं रह जाएगा।

मैं तो यह कह रहा हूँ कि जो उचित है, जहाँ सच में इंसाफ की दरकार है, जहाँ किसी हिन्दू को उसके हिन्दू होने के कारण एक भीड़ मार देती है, जहाँ 50 दिनों में दस जगह मंदिर और मूर्तियों को विखंडित कर दिया जाता है, जहाँ गायों को काट कर दंगे कराने की योजना बनाई जाती है, तब भी आप चुप कैसे रहते हैं? चुप और न्यूट्रल भी वही रहते हैं जिनके समुदाय का आतंकी होता है। हमारी, एक किस्म की, समस्या यह है कि हम अपने लोगों को कोसने में कोताही नहीं बरतते अगर वो अपराधी हो, और दूसरों के अपराध पर इंतजार करते हैं कि फलाँ आदमी ने ट्वीट क्यों नहीं किया।

फलाँ सेलिब्रिटी जब ऑर्गेज्म के लिए इक्वालिटी की बात करने में व्यस्त है तो उसे हिन्दू की भीड़ हत्या से क्षोभ नहीं होगा, चरमसुख ही मिलेगा। उनका अजेंडा तय है कि उन्हें कब बोलना है, कब चुप रहना है। वो अपने कैलेंडर के हिसाब से चलते हैं। हमारे जैसों की समस्या यह है कि हम उनका पीछा करने में लगे रहते हैं कि तुमने इस पर क्यों नहीं बोला। ये एक्शन नहीं, रिएक्शन है।

हिन्दुओं को यह सीखना होगा कि तुम्हारे ऊपर अगर एक पत्थर भी कोई फेंकता है तो कानून को अपना काम करने पर मजबूर तो करो ही, साथ ही हर माध्यम और स्तर से अपनी संगठन क्षमता दिखाते हुए नैरेटिव में इस बात को लाओ कि तुम्हें सिर्फ तुम्हारे धर्म के कारण परेशान किया जा रहा है। सिर्फ सरकार चुन लेने से धर्म की रक्षा नहीं होती, सत्ताधीशों की जीभ पर अंकित से लेकर ध्रुव तक के नामों को बिठाने की कवायद भी ज़रूरी है।

अगर तुम्हें लगता है कि अन्याय हो रहा है तो प्रतिकार करना सीखो। तुम्हारी लड़ाई वो 49 लोग क्यों लड़ेंगे जिनका अजेंडा ही तुम्हारी सरकार को कमजोर करना है। उनके पास लिखने और बोलने का सामर्थ्य है, क्या तुम्हारे पास वो सामर्थ्य नहीं? अगर है तो वो दिखता क्यों नहीं? क्यों तुम्हारे राम बेबस हो जाते हैं, क्यों कोई शिवलिंग पर पेशाब कर देता है, कैसे किसी दुर्गा की मूर्ति तोड़ दी जाती है और वही इस्लामी भीड़ तुम्हें खाना बाँट कर ठग लेती है?

क्या इतने भीरु हम इतिहास के किसी और मोड़ पर थे? सत्ता भी हमारी चुनी हुई लेकिन हम उनकी तरफ ताकते हैं जो घोषित रूप से हमारे विरोध में हैं! ये बेवकूफी हिन्दुओं में इस स्तर तक कैसे पाई जाती है कि अपना आंदोलन खड़ा करने की जगह हम विरोधियों से पूछते हैं कि भाई, तुम हमारे लिए क्यों नहीं लड़ रहे? ये क्या बात हुई? उन्हें भी घसीटो, लेकिन अपनी बात भी स्वतंत्र रूप से रखो।

वो जहाँ पाँच ट्वीट करें, पोस्ट करें तो हमें दस करना चाहिए जिसमें पाँच उनके फर्जीवाड़े, उनकी हिपोक्रिसी को ललकारते हुए हो, और पाँच अपनी बात कहने के लिए। अगर ऐसा करने की आदत हम नहीं डालेंगे तो मंगरू को समुदाय विशेष वाला, उसके घर के बाहर छुरा मार कर मार डालेगा, तुम जब अपने पिता की अंत्येष्टि के बाद घाट से घर तक भजन-कीर्तन करते लौटोगे तो मस्जिदों की छत से तुम पर पत्थर फेंके जाएँगे।

इसलिए जगना ज़रूरी है क्योंकि हमारी लड़ाई कोई और नहीं लड़ेगा। हमारी लड़ाई दूसरों से नहीं है, हमारी लड़ाई इस बात को लेकर है कि वैचारिक दोगलापन नैरेटिव से बाहर जाए और हेट क्राइम पर चर्चा मजहब और धर्म से परे हो कर हो। क्योंकि दो महीने में अगर चार घटनाएँ ‘जय श्री राम’ को लेकर वास्तव में हुईं तो दस ऐसी हैं, जहाँ ख़ास मजहब वालों ने झूठ बोला कि उनसे जय श्री राम कहने को बोला गया।

इसलिए अपने आप को तैयार रखें तथ्यों के साथ। इंटरनेट सबके पास है, इस्तेमाल करें। हमें हर ऐसी घटना पर अपनी आवाज उठानी होगी। हर माध्यम पर साथ हो कर सारे ट्रेंड हथियाने होंगे, हर स्तर पर हमें अपने ख़िलाफ़, अपने धर्म को ख़िलाफ़ हो रहे हमलों पर मुखर होना पड़ेगा। वो 49 तुम्हारे लिए कभी चिट्ठी नहीं लिखेंगे क्योंकि वो बिके हुए लोग हैं।

चाँद नवाब-2: गर्दन तक पानी में डूबकर पाकिस्तानी रिपोर्टर ने बताया बाढ़ का हाल, Video वायरल

पाकिस्तान एक ऐसा देश बनता जा रहा है जिसकी हर संस्था और घटना सोशल मीडिया पर मजाक का नया मुद्दा छेड़ देता है। आज ही पाकिस्तान के प्रधानमन्त्री इमरान खान नान-रोटी के मुद्दे पर उच्चस्तरीय बैठक बुलाते देखे गए हैं। पाकिस्तान के पत्रकार भी अक्सर अपने कारनामों की वजह से सुर्खियों में रहते हैं। कुछ समय पहले पकिस्तान के एक पत्रकार चाँद नवाब सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गए थे। लेकिन अब चाँद नवाब को एक और पाकिस्तानी पत्रकार टक्कर दे रहा है।

दरअसल, आजकल पाकिस्तान के कई राज्यों में बाढ़ जैसे हालात हैं। इसी बाढ़ के दौरान एक पत्रकार की वीडियो वायरल हुआ है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो में दिख रहा है कि पाकिस्तानी पत्रकार गर्दन तक गहरे बाढ़ के पानी में खड़ा होकर रिपोर्टिंग कर रहा है।

रिपोर्टिंग करते हुए रिपोर्टर की ये विडियो ट्विटर पर खूब पसंद की जा रही है। पाकिस्तानी पत्रकार जावेरिया सिद्दिकी ने अपने ट्विटर अकाउंट से वायरल वीडियो को शेयर किया है।

इस रिपोर्टर का नाम है अज़ादर हुसैन, जो पाकिस्तान के न्यूज़ चैनल जीटीवी (GTV) के लिए काम करते हैं। 0.41 सेकेंड के इस वीडियो में अज़ादर हुसैन पाकिस्तान के कोट चट्टा क्षेत्र में आई बाढ़ के बारे में बता रहे हैं। यूरो न्यूज़ के अनुसार, इस वीडियो में ये रिपोर्टर लगातार 6 दिन से हो रही बारिश के बाद इस क्षेत्र में हुए नुकसान के बारे में दर्शकों को दिखाने का प्रयास कर रहे हैं।

ये वीडियो जीटीवी के यूट्यूब चैनल पर 25 जुलाई को शेयर किया गया, जिसे अभी तक डेढ़ लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है। सोशल मीडिया पर तमाम लोग विडियो को लेकर मजाकिया टिप्पणियाँ कर रहे हैं। कई लोग ऐसे भी है जो हुसैन के काम की प्रशंसा कर रहे हैं और कई रिपोर्टर की जान खतरे में डालने के लिए समाचार चैनल की आलोचना कर रहे हैं।

IAF ने लॉन्च किया Air Combat गेम, विंग कमांडर अभिनंदन भी आएँगे नज़र

भारतीय वायु सेना के चीफ़ बीरेंद्र सिंह धनोआ ने आज (जुलाई 31, 2019) “Indian Air Force: A cut above” नाम का एयर कॉम्बेट गेम लॉन्च किया। ये गेम एंड्रायड और IOS दोनों डिवाइस में आसानी से खेला जा सकेगा। IAF ने अपने कामकाज के बारे में युवाओं को बताने और उन्हें सेना की नौकरी के प्रति आकर्षित करने के लिए यह गेम बनाया है।

IAF ने ट्वीट कर इस 3डी गेम को लॉन्च करने की जानकारी दी। इससे पहले 20 जुलाई को IAF ने इस गेम को लेकर 1.41 मिनट का वीडियो ट्वीट किया गया था। जिसमें ‘I AM AN WARRIOR’ के नाम पर बालाकोट हमले में अभिनंदन द्वारा दिखाई जांबांजी का जिक्र था। इस गेम में ग्राफिक विजुअल्स और एनिमेशन के जरिए बालाकोट एयर स्ट्राइक और कैप्टन अभिनंदन के पाकिस्तान घुसने की पूरी घटना को दर्शाया गया है। इस गेम में अभिनंदन दुश्मनों का खात्मा करते दिखाए गए हैं।

गेम को फिलहाल मोबाइल के लिए तैयार किया गया है। जिसमें ट्रेनिंग के अलावा सिंगल प्लेयर और फ्री फ्लाइट का मोड शामिल है। खेल के दौरान प्लेयर पायलट होगा और एयरक्राफ्ट को टच कंट्रोल या ऑन-स्क्रीन बटन से कंट्रोल किया जा सकेगा। गेम ट्रेनिंग सेशन के दौरान प्लेयर्स को सिखाया जाएगा कि एयरक्राफ्ट हैंडल कैसे करते हैं।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इस गेम की शुरुआत विंग कमांडर अभिनंदन के उसी मिग-21 से होगी, जिसने पाकिस्तान के F-16 को मार गिराया था। इस गेम में अभिनंदन मिग-21 के साथ खड़े नजर आएँगे।

प्राप्त जानकारी के अनुसार पहले यह गेम सिंगल प्लेयर मोड में उपलब्ध होगा और बाद में इसे मल्टी प्लेयर मोड के लिए भी डेवलप किया जाएगा। मल्टी प्लेयर में इस गेम को खेलने वाले पबजी और अन्य खेलों की तरह इसमें भी एक दूसरे से ऑनलाइन जुड़कर कनेक्ट हो पाएँगे। लेकिन अभी फिलहाल कुछ समय तक के लिए सिर्फ़ सिंगल प्लेयर वर्जन जारी किया गया है। बताया जा रहा है मल्टी प्लेयर का फीचर अक्टूबर तक लॉन्च किया जाएगा।

बेटी को जमीन पर पटक शौहर ने दिया तीन तलाक, पीड़िता ने की आत्महत्या की कोशिश

अहमदाबाद में तीन तलाक से पीड़ित मुस्लिम महिला ने बुधवार को आत्महत्या करने की कोशिश की है। हालाँकि, समय रहते मेडिकल सहायता मिल जाने से पीड़िता की जान बच गई है, लेकिन पुलिस ने उसके शौहर और ससुराल वालों के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है। यह विडंबना है कि यह मसला राज्यसभा में तीन तलाक को जुर्म करार दिए जाने के एक दिन से कम समय में प्रकाश में आया है। उसने आत्महत्या का प्रयास किस प्रकार से किया, खबर लिखे जाने तक इसकी जानकारी हमें नहीं मिल पाई है।

पीड़िता के अनुसार शौहर ने उनसे पैसे की माँग की। जब पीड़िता पैसे का इंतजाम नहीं कर पाई तो कथित तौर पर शौहर ने दम्पत्ति की बेटी को ज़मीन पर पटक दिया, और पीड़िता को तीन तलाक दे दिया। पीड़िता के अनुसार इस्लामी कानून उन्हें यह तलाक-ए-बिद्दत मंज़ूर करने के लिए मजबूर करता है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक पीड़िता फ़िलहाल अस्पताल में मौत से जूझ रही है। दो बच्चों की माँ की तहरीर पर पुलिस ने शौहर और ससुराल के अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है। फ़िलहाल पुलिस ने महिला की पहचान सार्वजनिक नहीं की है

मंगलवार को ही राज्यसभा में तीन तलाक को अपराध बनाने वाले बिल को चर्चा के बाद वोटिंग के जरिए पास कर दिया गया है। लोकसभा से बीती 26 जुलाई को ही इसे मंजूरी मिल चुकी थी। इस बिल में तीन तलाक को गैर कानूनी बनाते हुए 3 साल की सजा और जुर्माने का प्रावधान शामिल है। यह बिल 21 फरवरी को पास किए गए अध्यादेश का स्थान लेगा। इसके बाद भी इस मामले का सामने आना मुस्लिम समाज में तलाक-ए-बिद्दत किस हद तक जड़ें जमाया हुआ है, इसका उदाहरण है।

मुफ़्ती ने कहा- छत पर अता करो नमाज़, अलीगढ़ में सड़क पर नमाज पढ़ने पर है पाबन्दी

अलीगढ़ में सड़क पर नमाज़ समेत सभी मज़हबी कार्यों के लिए जाम लगाने पर सख्ती के प्रशासकीय निर्देश के बाद अलीगढ़ शहर के मुफ़्ती मोहम्मद खालिद हमीद ने शहर की सभी मस्जिदों को जुम्मे की नमाज़ सड़कों की बजाय मस्जिद के छतों पर करने का निर्देश दिया है। यह निर्देश मुस्लिमों के प्रतिनिधियों द्वारा जिला प्रशासन से मिलने के बाद आया है। समुदाय के नुमाइंदों ने उन अधिकारियों से मुलाकात की थी, जिन्होंने सड़कों पर सभी मज़हबी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाया था।

जगह नहीं होती

मुफ़्ती ने प्रेस से बात करते हुए दावा किया कि हालाँकि सड़क पर नमाज़ का कोई प्रावधान नहीं है, लेकिन लोगों को अकसर ऐसा मस्जिदों में जगह की कमी के चलते करना पड़ता है। “मैंने सभी मस्जिदों तक संदेश पहुँचा दिया है, और वे आवश्यकतानुसार छतों पर प्रबंध करेंगे।” लेकिन उन्होंने साथ में जोड़ा कि विशेष मौकों जैसे ईद और बकरीद की नमाज़ जामा मस्जिद और ईदगाह की सड़कों पर फिर भी होगी, क्योंकि मस्जिदों में लोगों के लिए जगह नहीं है।

पहले से लेनी होगी इजाज़त

जिलाधिकारी सीबी सिंह ने कहा कि ऐसे विशेष मौकों के लिए पहले से अनुमति लेनी होगी, जो दे दी जाएगी। “अगर कोई इस प्रतिबंध को भंग करते पकड़ा गया तो उस उपासना स्थल के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी। अधिकारी ऐसे कृत्यों का वीडियो सबूत भी लेंगे।”

सिंह ने दावा यह भी किया कि उन्हें मुस्लिम नेताओं और शहर के मेयर मोहम्मद फुरकान का समर्थन है। उन्हें आश्वासन भी मिला है कि समुदाय के लोग इसका पालन करेंगे। अलीगढ़ में इस मीटिंग में शामिल होने वाले हिंदूवादी और दक्षिणपंथी नेताओं ने कहा कि जब तक मुस्लिमों की ओर से इसका पालन होगा, वे कोई भी कदम नहीं उठाएँगे। बजरंग दल, अलीगढ़, के संयोजक गौरव शर्मा ने साथ में कहा, “अगर मुस्लिम जुम्मे की नमाज़ सड़कों पर पढ़ेंगे, तो हम भी सड़कों पर हनुमान चालीसापढ़ेंगे।”

56 इंच: तीन तलाक बिल पर राज्यसभा की बाधा मोदी सरकार ने यूँ की पार

56 इंच का सीना से तात्पर्य उस सा​हस और इच्छाशक्ति से है जो नामुमकिन दिख रहे बदलावों को भी मुमकिन कर देता है। यह दूसरी बात है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संदर्भ में जब भी इसका जिक्र आता है तो ‘लिबरल’ इंची-टेप लेकर बैठ जाते हैं। लेकिन, इससे बेपरवाह मोदी सरकार ने तीन तलाक पर रोक से संबंधित बिल को राज्यसभा से पास कराकर अपनी उसी इच्छाशक्ति का फिर से परिचय दिया है।

प्रधानमंत्री मोदी ने दिखाया है जो चीज़ें सरकार की प्राथमिकता है, उसका कोर एजेंडा है, उसके लिए न तो राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है और न ही राज्यसभा में बहुमत न होना इनके आड़े आएगा। तीन तलाक बिल को लेकर बहुत से मोदी-विरोधी इस मुगालते में थे कि मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) विधेयक सरकार के पास बहुमत न होने के कारण राज्यसभा में फँस जाएगा और वे इसे सिलेक्ट समिति के पास भिजवाने में कामयाब हो जाएँगे। लेकिन मोदी की राजनीतिक प्रबंधन क्षमता ने बाज़ी पलट दी।

गणित

भाजपा की सहयोगी लेकिन अल्पसंख्यकवाद और तुष्टिकरण में अभी भी ‘इनवेस्टेड’ जदयू बिल के विरोध में थी। इसके कारण 242 सांसदों की वर्तमान संख्या वाली राज्यसभा में सत्ता पक्ष का संख्या बल गिरकर 113 से 107 पर आ गया था। लेकिन मतदान के वक़्त जदयू और तेलंगाना राष्ट्र समिति ने विरोध में वोट डालने के बजाए वॉक-आउट किया, जिससे राज्यसभा में कुल सदस्यों की संख्या 236 हो गई। पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली, एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार और कांग्रेस के ऑस्कर फर्नांडीज समेत 14 सांसदों की अनुपस्थिति से सदन की संख्या 216 हो गई और बहुमत के लिए जरूरी संख्या 109 रह गई।

भाजपा के काम यहाँ आई पुरानी सहयोगी और फ़िलहाल ‘न्यूट्रल’ बीजद (बीजू जनता दल)। 4 सांसद बीजद के मिल जाने से बिल के पक्ष में गणित 113 का हो गया। 11 सांसदों वाली अन्नाद्रमुक, 6 सांसदों वाली जदयू, टीआरएस के 6, बसपा के 4 और पीडीपी के दो सांसदों का वॉक-आउट भाजपा के काम आया। इसके अलावा कॉन्ग्रेस, तृणमूल और सपा के भी कुछ सांसदों के ‘बंक’ मारने से सदन की प्रभावी संख्या (जितने लोगों ने अंततः वोट किया) 183 बची। यानि बहुमत के लिए 94 मत चाहिए थे।

वोटिंग

वोटिंग हुई। भाजपा के 78 सदस्यों ने पक्ष और कॉन्ग्रेस के 48 सदस्यों ने बिल के विरोध में मतदान किया। कुल 99-84 के आँकड़े से यह बिल राज्यसभा से पास हो गया। इसके पहले इसे सिलेक्ट समिति को भेज लटकाने का प्रस्ताव 100 के मुकाबले 84 से गिर चुका था

संदेश

यह बिल भाजपा और मोदी का संदेश था- समर्थकों और विरोधियों दोनों के लिए। दोनों को ही समान संदेश- सरकार राज्यसभा में बहुमत में भले न हो, लेकिन जो उसे करना है, जिसे वह उचित समझती है, उसे वह करके रहेगी। उसके पास संख्या बल की कमी हो सकती है, इच्छाशक्ति की नहीं। अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार सरकार अपने कार्य बदस्तूर जारी रखेगी और संख्याबल प्रबंधन की नज़ीर तो इस बिल ने दिखा ही दी है।