राज्यसभा के बाद लोकसभा से भी जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल 2019 बिल पास हो गया है। लोकसभा में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की ओर लाए गए संकल्प प्रस्ताव पर सदन का मत लिया गया। विपक्षी सांसदों ने सदन में वोटिंग की माँग की, जिसके बाद इसकी प्रक्रिया हुई और इलेक्ट्रॉनिक मशीन से सदन में वोट डाले गए।
The Jammu & Kashmir Reorganization Bill, 2019 has been passed by Lok Sabha with 370 ‘Ayes’ & 70 ‘Noes’ https://t.co/aGZLwcdT3N
लोकसभा में अमित शाह की ओर से लाया गया संकल्प स्वीकार किया गया है। इसके पक्ष में 370 और विपक्ष में 70 वोट पड़े हैं। एक सांसद ने अपना मत नहीं डाला, जबकि कुल 441 सदस्यों ने वोटिंग में हिस्सा लिया है। इसके साथ ही लोकसभा से भी जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल 2019 पास हो गया है।
बता दें कि गृहमंत्री अमित शाह ने मंगलवार को लोकसभा में जम्मू कश्मीर राज्य का पुनर्गठन कर जम्मू एवं कश्मीर और लद्दाख को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने और अनुच्छेद 370 की अधिकतर प्रावधानों को समाप्त करने के प्रस्ताव संबंधी संकल्प चर्चा एवं पारित करने के लिए पेश किया।
इससे पहले राज्यसभा ने सोमवार को अनुच्छेद 370 की अधिकतर धाराओं को खत्म कर जम्मू कश्मीर एवं लद्दाख को दो केन्द्र शासित क्षेत्र बनाने संबंधी सरकार के दो संकल्पों को मंजूरी दे दी थी।
लोक सभा में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल पर सभी को उम्मीद थी कि भाजपा के प्रचंड बहुमत और कमज़ोर विपक्ष के चलते अधिनियम बिना किसी खास बहस के पास हो जाएगा। लेकिन लोक सभा में इस मामले में बहस राज्य सभा से अधिक दिलचस्प हो रही है। सुबह शुरूआत कॉन्ग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी के विवादस्पद बयानों से हुई। उसके बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस के लोकसभा सांसद हसनैन मसूदी ने दावा किया कि संविधान का विवादस्पद अनुच्छेद-370 जनसंघ के संस्थापक-अध्यक्ष और भाजपा के पितृ-पुरुष श्यामा प्रसाद मुखर्जी के आशीर्वाद से बना।
और अब हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने सरकार से कहा है कि अगर जम्मू-कश्मीर का पुनर्गठन सच में दीवाली जैसा मौका है, जैसा कि भाजपा सांसद दावा कर रहे हैं, तो कश्मीरियों पर भी कर्फ्यू हटाकर उन्हें भी जश्न मनाने दिया जाए। उन्होंने भाजपा से आग्रह किया कि कर्फ्यू हटाया जाए और हिरासत में लिए गए सभी कश्मीरी नेताओं को रिहा किया जाए। इसके पहले उन्होंने भाजपा पर अपना चुनावी वादा पूरा करने के लिए संवैधानिक जिम्मेदारी भूलने और (कश्मीरियों से किया गया तथाकथित) संवैधानिक वादा तोड़ने का आरोप लगाया।
Asaduddin Owaisi in Lok Sabha: I stand to oppose the bill. Definitely BJP has lived up to electoral promise in their manifesto, but you have not lived up to your constitutional duties. You’ve indulged in breach of a constitutional promise #Article370pic.twitter.com/YVk7ivxgFH
‘हमने कहा था कहीं भी भेज दो, कश्मीर के साथ मत रखो’
भाजपा की ओर से लोक सभा में मोर्चा संभालने वालों में से एक थे लद्दाख के सांसद जाम्यांग त्सेरिंग नामग्याल, जिन्होंने राज्य के विभाजन के समर्थन में लद्दाख का पक्ष रखा। उनका भाषण इतना प्रभावशाली रहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने अलग से उसे ट्वीट कर उनकी तारीफ़ की।
My young friend, Jamyang Tsering Namgyal who is @MPLadakh delivered an outstanding speech in the Lok Sabha while discussing key bills on J&K. He coherently presents the aspirations of our sisters and brothers from Ladakh. It is a must hear! https://t.co/XN8dGcTwx6
अपने भाषण में नामग्याल ने कई महत्वपूर्ण बिंदु गिनाए। उन्होंने शुरूआत पूर्व-प्रधानमंत्री नेहरू पर तंज़ कसते हुए की। उन्होंने कहा कि 70 साल से लद्दाख को कश्मीर के साथ रखने वालों को वहाँ की स्थानीय संस्कृति, वहाँ की सभ्यता, वहाँ की आकांक्षाओं के बारे में ज्ञान नहीं था; उनके लिए तो यह बंजर भूमि थी जिसपर घास का तिनका भी नहीं उगता। मालूम हो कि अक्साई चिन पर चीन के कब्ज़े पर पंडित नेहरू ने संसद में कहा था कि अरुणाचल और लद्दाख के पहाड़ों पर तो एक पत्ता घास का भी नहीं उगता, तो ऐसे में उनकी समझ में नहीं आ रहा कि उसके पीछे संसद का कीमती समय बर्बाद करने का क्या मतलब है।
नामग्याल ने दावा यह भी किया कि लद्दाख के लोगों ने शुरू से ही सरकार को बता दिया था कि उन्हें (मुस्लिम-प्रभुत्व वाले) कश्मीर के अलावा किसी भी और तरीके से देश में रहना मंज़ूर है- भले ही वह केंद्र-शासित प्रदेश (UT) के रूप में हो, पूर्वी पंजाब के साथ विलय हो, या कुछ और। हिंदी में बोल रहे नामग्याल ने कहा कि हिंदुस्तान का हिस्सा बने रहने के लिए ही लद्दाख ने 70 साल UT बनने की लड़ाई लड़ी, लेकिन पिछली सरकारों ने लद्दाख को ‘फेंककर’ रखा।
अनुच्छेद 370 और 35-A खत्म होने के बाद पूरे देश में जश्न का माहौल है। पटना समेत बिहार के कई जिलों में भी लोगों ने अपने अपने तरीके से जश्न मनाया। पटना के कारगिल चौक पर कई संगठनों ने विजय जुलूस निकाला। युवकों ने एक दूसरे को मिठाई खिलाई और चेहरों पर गुलाल लगाया। इस दौरान वहाँ पर इस फैसले के विरोध में मीटिंग कर रहे वामपंथ के कार्यकर्ताओं से जश्न मना रहे समर्थकों की भिड़ंत हो गई।
दोनों गुटों में बढ़ती बहस ने बाद में हिंसक रूप ले लिया। केंद्र सरकार के फैसले के समर्थन में जश्न मना रहे युवकों ने लाठी-डंडे से हमला कर सीपीआई के सुमंत कुमार का सिर फोड़ दिया, जबकि आशीष व एक अन्य को भी काफी चोटें आईं हैं। फिलहाल, सुमंत कुमार को इलाज के लिए पीएमसीएच ले जाया गया, जहाँ उनकी हालत खतरे से बाहर बताई जा रही है।
सुमंत कुमार ने बताया कि सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर के अनुच्छेद 370 में किए गए बदलाव के विरोध में मार्च निकालने का प्रोग्राम बनाया गया था और फिर बाद में मीटिंग होने लगी, जिसमें संगठन के कई लोग शामिल थे। इसी बीच भगवा धारी झंडा लिए युवकों ने एक युवक की पिटाई कर दी। उन लोगों ने जब बचाने की कोशिश की तो उन पर हमला कर दिया और सिर फोड़ दिया। 2-3 अन्य को भी चोटें आई हैं।
साथ ही, सीपीआई के राज्य सचिव सत्यनारायण सिंह ने बजरंग दल पर मारपीट करने का आरोप लगाया। उन्होंने बताया कि बजरंग दल के सदस्यों ने मारपीट की है। उन्होंने इसे निंदनीय बताते हुए इनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की है।
वहीं, पटना के गाँधी मैदान थानाध्यक्ष सुनील कुमार सिंह ने बताया कि अभी तक किसी पक्ष की तरफ से लिखित शिकायत नहीं मिली है। जानकारी के मुताबिक, एसएसपी गरिमा मलिक ने वायरलेस से हर थाना पुलिस को सतर्क रहने व गश्ती करने का निर्देश दिया है और खुद ही सुरक्षा व्यवस्था की मॉनीटरिंग करने के लिए सड़क पर उतर पड़ी हैं। एसएसपी के निर्देश के बाद सभी थाना पुलिस ने हर चौक-चौराहों पर पुलिस बल की तैनाती कर दी है और साथ ही सीसीटीवी कैमरे से भी नजर रखी जा रही है।
संपादकीय नोट: आए दिन इस तरह की मारपीट की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं। ऑपइंडिया किसी भी तरह की हिंसा या मारपीट की घटना की निंदा करता है। इससे माहौल बिगड़ता है। देश में कानून व्यवस्था है, लोगों को इसके दायरे में ही रहना चाहिए।
जंग और बहस 35-A पर छिड़ी रही लेकिन जब सही देश-काल-वातावरण आया तो अनुच्छेद 35-A की जमीन ही खिसका दी गई। हुआ ये कि सरकार से सिर्फ किसी भी बात को लेकर नाराज रहने वाले प्रदर्शनकारियों को 370 के मुद्दे से ही हाथ धोना पड़ गया। 370 के अस्तित्व पर विचार को लेकर हर तरह के विरोध और समर्थन के स्वर सोशल मीडिया से लेकर बाजारों में देखने को मिले। लेकिन, इस पर अगर कोई जोरदार तरीके से डटा रहा तो वो था नेहरूघाटी सभ्यता से जन्मे देश का लगभग सबसे वयस्क राजनीतिक दल!
कॉन्ग्रेस अभी तक ठीक से नहीं समझ पाई है कि आखिर बेड़ागर्क कहाँ हुआ है। शायद यही वजह भी है कि प्रलाप जारी रखने की सौगंध निभाने के लिए उन्होंने अपना मुद्दा चुन लिया। नेहरू का ही खाने और बजाने वाले देश के इस सबसे वयस्क दल को ‘काटो तो खून नहीं’ वाला दौरा पड़ा है। इसलिए अच्छा है कि सब मुद्दों के बजाए आदरणीय नेहरू जी को अर्घ्य लगा दिया जाए।
वैसे तो हमेशा ही, लेकिन विगत कुछ समय कॉन्ग्रेस ने अपनी डूबती नाव बचाने का यह तरीका अपना लिया है कि किसी तरह नेहरू के नाम पर प्रासंगिक बने रहें। यही हुआ भी। इसरो के अभियानों से लेकर सांड के उन्माद तक के लिए खोजकर नेहरू और इंदिरा से लेकर राजीव गाँधी तक को सब सफलताओं का क्रेडिट दिया गया, लेकिन जम्मू-कश्मीर समस्या से लेकर विवादित 370 के लिए कॉन्ग्रेस ने नेहरू को कभी क्रेडिट नहीं दिया।
यूँ तो दिग्विजय सिंह के बयानों को बहुत गम्भीरता से लेना अपने आप में एक मजाक है फिर भी जब यही आवाज सारे कॉन्ग्रेस की आवाज बन जाए तो गंभीरता से लेना वाजिब हो जाता है। जिस कॉन्ग्रेस पार्टी के नेता संसद में जेब में त्यागपत्र लेकर बैठे हों, उस कॉन्ग्रेस के पास अब अपनी डूब चुकी सभ्यता बचाने के अलावा कोई आखिरी विकल्प मौजूद नहीं है। दिग्विजय सिंह का कहना है कि नेहरू जी ने ही देश को सिक्किम दिया और इंदिरा ने गोआ। साथ ही, इंदिरा गाँधी ने ही पाकिस्तान को दो हिस्सों में बाँटा जिससे बांग्लादेश का जन्म हुआ। वैसे इस सन्दर्भ में दिग्विजय जी को गोवा की याद क्यों आई, ये किसी को पता नहीं। एक सांसद ‘फिफ्टी शेड्स ऑफ़ ग्रे’ की याद करते हैं, दूसरे गोवा की, जबकि चर्चा कश्मीर की हो रही है!
गोवा विलय में नेहरू को उनकी ‘भूमिका’ RSS ने सौंपी थी
जिस गोवा के विलय का श्रेय नेहरू को दिया जा रहा है उसकी सच्चाई संघ से होकर गुजरती है। दादरा, नगर हवेली और गोवा के भारत विलय में संघ की निर्णायक भूमिका थी। जुलाई 21, 1954 को दादरा को पुर्तगालियों से मुक्त कराया गया था। संघ (RSS) के स्वयंसेवकों ने अगस्त 02, 1954 की सुबह पुतर्गाल का झंडा उतारकर भारत का तिरंगा फहराया, पूरा दादरा नगर हवेली पुर्तगालियों के कब्जे से मुक्त करा कर भारत सरकार को सौंप दिया। संघ के स्वयंसेवक 1955 से गोवा मुक्ति संग्राम में प्रभावी रूप से शामिल हो चुके थे।
गोवा में सशस्त्र हस्तक्षेप करने से नेहरू के इनकार करने पर जगन्नाथ राव जोशी के नेतृत्व में संघ के कार्यकर्ताओं ने गोवा पहुँच कर आंदोलन शुरू किया। बदले में परिणाम यह निकला कि जगन्नाथ राव जोशी सहित संघ के कार्यकर्ताओं को दस वर्ष की सजा सुनाई गई। हालत बिगड़ने पर अंततः भारत को सैनिक हस्तक्षेप करना पड़ा और 1961 में गोवा आज़ाद हुआ।
खैर, दिग्विजय को इस सब से क्या? वो दिग्विजय सिंह है, वो कुछ भी कह सकता है।
कॉन्ग्रेस नेता मनीष तिवारी तो दिग्विजय से एक कदम आगे हैं। उन्होंने 370 पर कॉन्ग्रेस के मत की तुलना एक अमेरिकन अश्लील साहित्य से ही कर ली है। उनका कहना है कि कॉन्ग्रेस की राय अनुच्छेद 370 पर ‘50 शेड्स ऑफ़ ग्रे‘ वाली है। दरअसल, कॉन्ग्रेस का मर्म 370 पर भी वोट बैंक से ज्यादा नहीं है।
उसे भय है कि समर्थन करने में मुस्लिम वोट बैंक से हाथ धोना पड़ सकता है और विरोध करने में हाल ही में अपनाया गया ताजातरीन हिंदुत्व खतरे में पड़ सकता है इसलिए बेहतर है कि इस सब चर्चा से ऊपर उठकर नेहरू जी के नाम का कलमा पढ़ा जाए। फिलहाल जमीन बचाने के लिए कॉन्ग्रेस के पास न ज्यादा संख्याबल है, न ही सत्ता ना मुद्दे, और तो और एक अध्यक्ष तक बाकी नहीं बचा है।
जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 370 के तहत मिले विशेषाधिकारों को अब हटा दिया गया है। केंद्र सरकार के इस फैसले के बाद घाटी में सुरक्षा को बढ़ाया गया है, ताकि किसी भी तरह की स्थिति से निपटा जा सके। खुद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजित डोभाल भी इस वक्त श्रीनगर में हैं और काफी करीब से हालात पर नजर बनाए हुए है। अजित डोभाल केंद्र के फैसले को सही तरीके से लागू होने तक श्रीनगर में ही रुकेंगे। NSA अजित डोभाल लगातार वहाँ पर लोकल लोगों से बैठक कर रहे हैं।
इस बीच, मंगलावर (अगस्त 6, 2019) को श्रीनगर के कुछ इलाकों से पत्थरबाजी की घटना सामने आई है। जानकारी के मुताबिक, श्रीनगर के हाजी बाग कैंप, सोम्यार मंदिर, इस्लामियां कॉलेज, छोटा बाजार समेत 9 इलाकों में अराजक तत्वों द्वारा पत्थरबाजी की गई है। जबकि कुछ अन्य इलाकों में लोगों के सड़कों पर उतर आने और पाबंदियों का विरोध करते हुए प्रदर्शन किए गए।
गौरतलब है कि, कश्मीर में धारा 370 हटाए जाने के निर्णय लेने के पहले से ही सेना ने व्यापक तैयारी कर ली थी, जिसकी वजह से जम्मू कश्मीर से कोई बड़ी घटना सामने नहीं आ रही है। एहतियात के तौर पर कल (अगस्त 5, 2019) रात जम्मू कश्मीर के कई नेताओं को भी गिरफ्तार कर लिया गया था ताकि वे शांति भंग ना कर पाएँ।
केन्द्र सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर को लेकर सोमवार को किए गए महत्वपूर्ण व ऐतिहासिक फैसलों के मद्देनजर जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। चप्पे-चप्पे पर सुरक्षाबलों को तैनात किया गया है। मंगलवार (अगस्त 6, 2019) को भी श्रीनगर और जम्मू में धारा-144 लागू है। इसके अलावा डोडा, किश्तवाड़, बनिहाल और रामबन में कर्फ्यू लगाया गया है। कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए सुरक्षाबलों की 40 कम्पनियाँ जम्मू संभाग के जम्मू, डोडा, उधमपुर, रामबन, किश्तवाड़, राजौरी तथा पुंछ जिलों में तैनात की गई हैं। राज्य के ज्यादातर मार्गों पर कंटीली तार लगाकर लोगों की आवाजाही को रोका जा रहा है, ताकि कोई शरारती तत्व राज्य का शांतिपूर्ण माहौल खराब करने की हिम्मत न कर सके। इस दौरान रैलियों और राजनीतिक बैठकों पर भी प्रतिबंध लागू हैं।
जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल आने के बाद से घाटी की दोनों बड़ी पार्टियों नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी के नेताओं का अनर्गल प्रलाप चालू है। अपने मुख्य नेताओं महबूबा मुफ़्ती और उमर अब्दुल्ला के गिरफ़्तार हो जाने से नेतृत्व-विहीन इन पार्टियों के नेताओं की हरकतें देखने लायक हैं। पीडीपी नेताओं ने राज्यसभा में पहले संविधान की प्रतियाँ फाड़ीं, फिर अपने कपड़े फाड़ डाले।
उनके नहले पे दहला जड़ते हुए नेशनल कॉन्फ्रेंस के लोकसभा सांसद हसनैन मसूदी ने कुतर्की बातों की झड़ी लगा दी है। उन्होंने आज लोकसभा में बहस करते हुए दावा किया कि संविधान का विवादस्पद अनुच्छेद 370 जनसंघ के संस्थापक-अध्यक्ष और भाजपा के पितृ-पुरुष श्यामा प्रसाद मुखर्जी के आशीर्वाद से बना।
Hasnain Masoodi,Jammu&Kashmir National Conference leader in Lok Sabha: Aap kehte hain ki nahi ji, hamne kab kaha tha…aap kehte hain ki ye temoprary tha,temporary tha, aap Gopalaswami Ayyangar ki taqreer(speech) padhiye. Mookerji (Syama Prasad Mookerji) ke aashirwaad se 370 bana pic.twitter.com/lQt7rdFUNV
उन्होंने 370 के अस्थायी होने के भाजपा के तर्क पर भी सवाल उठाए और पार्टी को गोपालस्वामी अयंगर के भाषण पढ़ने तक की सलाह दे डाली। यही नहीं, इस विवादस्पद भाषण के एक शाम पहले वह News18 India के कार्यक्रम में भी कश्मीर को ‘मुस्लिम राज्य’ बता चुके थे।
कल राज्यसभा में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम लाए जाने के बाद से ही विपक्ष के अजीबो-गरीब बयान जारी हैं। इसके पहले कॉन्ग्रेस संसदीय दल के लोकसभा में अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने कश्मीर मसले पर बिल लाने की सरकार की हैसियत को ही चुनौती दे डाली थी। उनके इस बयान पर भड़के गृह मंत्री और भाजपा सुप्रीमो अमित शाह ने तो उन्हें खरी-खोटी सुनाई ही, खुद सोनिया गाँधी भौंचक्की नज़र आईं। इसके अलावा कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद और नेता विपक्ष गुलाम नबी आज़ाद के बयानों ने पाकिस्तान को भी हिंदुस्तान के आंतरिक मामलों में दखल देने वाले बयानों के लिए ज़मीन दे डाली।
जेएनयू कुछ सालों से पढ़ाई के लिए कम और बकैती के लिए ज्यादा चर्चा में रहा है। लेनिनवंशी माओनंदन कामपिपासु वामभक्त मोलेस्टरों का गढ़ रह चुके जेएनयू में ‘आजादी गैंग’ और ‘टुकड़े-टुकड़े गिरोह’ अभी भी साँस ले रहा है। ‘डर का माहौल’ में जी रहे ये कामपंथी, ‘फासिस्ट हिन्दुस्तान’ को लानतें भेजते हुए, गले में खराश से जूझती आवाज में देशविरोधी प्रदर्शन करने के लिए रात के अंधेरे का इस्तेमाल करते दिखे।
जिस तरह की क्रांतिकारी आवाज इनका क्रांतिकारी लौंडा निकाल रहा था, लग रहा था कि भाड़े पर बुलाया है ताकि बेचारे फोरेंसिक जाँच में उसे फँसा दें, और खुद बच जाएँ। ऐसा हो भी सकता है क्योंकि वामपंथियों की पूरी लड़ाई सर्वहारा की रीढ़ पर लात रख कर आगे बढ़ते हुए ही हुई है। ‘आजादी’ की बात करता हुआ यह क्रांतिकारी बालक जिस हिसाब से चिल्ला रहा था, उससे तो यही प्रतीत हो रहा था कि इसके बाप जब कहते होंगे कि ‘सात बजे के बाद घर से बाहर कहाँ जा रहे हो’, तो घिघियाता हुआ कहता होगा, “जी, वो, मैं तो… जी देखने जा रहा था कोई दरवाजे पर आया तो नहीं’। फिर बाप जोर से डाँटते होंगे, और हमारा ये क्रांतिकारी बालक कोर्स की किताबों के बीच कामरेड अनमोल रतन रचित ‘सीडी माँगने के बहाने बलात्कार के सौ तरीके’ रख कर पढ़ने लगता होगा।
वामपंथी लम्पटों का यही जीवन है। घर में सुबह उठ कर बाप के डर से मूर्ति के आगे हाथ जोड़ते हैं, और बाहर में अपनी इन्डिविडुएलिटी और फ्रीडम पर ज्ञान देते हैं। ऐसे कई वामपंथियों को जानता हूँ जो जेएनयू में पढ़ते वक्त जब किसी को आईफोन इस्तेमाल करते देख दिमाग की नसें फुला लेते थे कि कोई इतना महँगा फोन कैसे इस्तेमाल कर सकता है, और बाद में कॉरपोरेट या सरकारी नौकरी करते हुए, न तो घूस लेने में लजाते हैं, न कामचोरी करने में।
इनका वैचारिक खुलापन इतना ज़्यादा खुला हुआ है कि खुलते-खुलते ये कब नंगे हो जाते हैं, इन्हें पता ही नहीं चलता। आपसी बातचीत में हार्डकोर वामपंथी बताता है कि ‘सरकार तो ठीक ही काम कर रही है’ लेकिन ज्योंहि वो पब्लिक में आता है, वो बताता है कि सरकार हर मामले में असफल रही है। घर में कॉफी पीने वाला लेनिनवंशी पब्लिक में लाल चाय पीने लगता है और छत पर मार्लबोरो फूँकता माओनंदन कॉलेज के स्टाफ क्लब में बीड़ी पीता दिखता है। ये मैं जानता हूँ क्योंकि विश्विद्यालयों में प्रोफेसरों के साथ मेरे ऐसे ही अनुभव रहे हैं।
ये क्रांतिकारी भी उसी ब्रीड का है। ये जानता है कि अब इनके बिलों में बारिशों में पानी भर रहा है, और सर्दियों में मिर्ची का धुआँ भरा जाएगा। इसलिए, लवचेरी क्रांतिकारी अंधेरे में क्रांति के गीत गा रहा था और ज्योंहि मीडिया वालों का कैमरा आया कि डर के मारे मुँह छुपा कर भागता नजर आया। दस कामपंथी और झामपंथनों के बीच लानतें भेजता यह क्रांतिबीज यह नहीं जानता कि सरकार भी बदल गई है, और उसके गढ़ों के खूनी झंडे को हिलाने वाली हवा भी अब मरी-मरी सी बह रही है।
वामपंथी हमेशा से ही एक फट्टू आबादी रहे हैं। इनसे बकैती चाहे जितनी करवा लो, समाधान इनके पास एक भी नहीं होता। बात ये वेनेजुएला से लेकर क्यूबा तक की करेंगे, लेकिन उसका मतलब कुछ नहीं होता। ये एक ऐसी ब्रीड है जो परजीवी की तरह गरीबों के खून का शरबत बना कर पीती है, उन्हें राजनैतिक और सामाजिक तौर पर कमजोर करती है, और जब और कुछ नहीं बचता तो उन्हें ह्यूमन शील्ड बना कर सैनिकों की गोलियों के आगे कर देती है।
ये फट्टू तो थे। ये विद्यार्थी जीवन में वास्तवकिताओं से भागने की शुरुआत करने से लेकर जीवन के उत्तरार्द्ध तक सच्चाई से आँख फेरने वाले भगोड़े और अश्लील विचारक तो रहे हैं, लेकिन वक्त के साथ-साथ इनकी नारेबाजी की हिम्मत भी चली जाएगी यह देख कर निजी तौर पर मुझे बुरा लग रहा है। कहाँ ज़ोर-शोर से अफजल गुरु की बरसी मनाने वाले देशद्रोही वामपंथी, और कहाँ ये फट्टू लौंडा जिसके मुँह से आवाज नहीं निकल रही। क्या इसी दिन के लिए अपनी नौकरानी से बच्चे पैदा कर, उसे छोड़ देने वाले, संबंध को अस्वीकार करने वाले मार्क्स ने ज्ञान की बातें लिखी थीं! लानत है ऐसे वामपंथियों पर!
मुझे तो अभी भी लगता है कि जेएनयू के वामपंथियों ने किसी असहाय लड़के को भोजन आदि का लालच देकर, या किसी फर्स्ट ईयर वाले नए बच्चे को ‘सीडी के बहाने सेटिंग कराने’ का वादा करके या ‘कल मलाना क्रीम पिलाएँगे तुमको’ कह कर अंधेरे में, टूटे-फूटे शब्दों में, घिसी हुई स्क्रिप्ट पकड़ा कर ‘फासिस्ट’ और ‘ले के रहेंगे आजादी’ कहलवा दिया। ये यही करते हैं, इनका पूरा इतिहास अनभिज्ञ लोगों का इस्तेमाल करते हुए सत्ता तक पहुँचने की कहानियों से भरा हुआ है। इन्होंने गरीबों, असहायों को अपनी ढाल बना कर राजनीति की है। तो यह मानने में बिलकुल भी समस्या नहीं है कि नया वामपंथी एक गाँजे की ज्वाइंट के लोभ में यह करने को तैयार हो गया हो। (वैधानिक चेतावनी: गाँजा पीना, चाहे वो मलाना क्रीम ही क्यों न हो, स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।)
इनका जो हाल है, और जैसे-जैसे इनकी विचारधारा का पतन होता जा रहा है, अगले बार के प्रोटेस्ट में ये किसी मजदूर को ठग कर न ले आएँ और उससे ‘आजादी’ की बातें न कहलवा लें। जेएनयू में तो दो बार से सारे वामपंथियों के नितम्ब चिपक कर एक होने के बाद ही चुनाव जीते जा रहे हैं, इस साल कितने चिपकेंगे ये देखने की बात है क्योंकि इस बार तो कश्मीर का मुद्दा वाकई में इनके लिए मुद्दा है क्योंकि अगली बार से उनके पास ये मुद्दा रहेगा ही नहीं!
एक से दो चुनाव और बचे हैं जब जेएनयू भी कश्मीर की तरह बदल जाएगा। यहाँ से वामपंथ का कोढ़ समाप्त हो जाएगा और इनके रहनुमाओं को जनता हर जगह घेर कर सवाल करेगी कि ये जो पढ़-लिख कर चिरकुटों वाली हरकतें करते हो, वो क्यों करते हो। ये जो आजादी लेने की बातें करते हो, वो लेकर कहाँ रखोगे? भारत क्या परचून की दुकान है कि तुम्हें डब्बे में बंद आजादी दिख रही है, और गुल्लक में पैसे हैं नहीं, लेकिन एक दिन वो भरेगा और तुम आजादी ले कर रहोगे?
खैर, अंत में, सीरियसली वामपंथियो! मीडिया के कैमरे से बचते हो? इतने फट्टू हो गए हो! लानत है!
कर्नाटक में कॉन्ग्रेस-जेडीएस के गठबंधन वाली सरकार गिरने के बाद जेडीएस नेता एचडी कुमारस्वामी ने कई बातों का खुलासा करते हुए बताया कि उन्होंने 14 महीने कॉन्ग्रेस के लिए गुलाम की तरह काम किया, लेकिन उनके काम की कभी किसी ने सरहाना नहीं की। उनकी मानें तो उन्होंने सभी विधायकों और निगम अध्यक्षों को पूरी स्वतंत्रता दी थी, लेकिन फिर भी कॉन्ग्रेस सरकार गिरने का दोष उन्हें दे रही है।
गौरतलब है कि कर्नाटक में लंबे समय से चले राजनैतिक संकट के कारण 14 महीने पुरानी सरकार गिरने के बाद राज्य में येदियुरप्पा के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी है। जिसके बाद कुमार स्वामी ने मीडिया से बातचीत में बताया कि वह मुख्यमंत्री का पद छोड़ने के बाद बेहद खुश हैं। उनकी मानें तो उन्होंने 14 महीने तक राज्य के विकास के लिए काम किया। लेकिन उन्हें दुख सिर्फ़ ये हुआ कि किसी ने भी उनके काम की सराहना नहीं की।
एचडी कुमारस्वामी ने बातचीत के दौरान यह भी बताया कि राज्य में कई कॉन्ग्रेसी नेता गठबंधन की सरकार नहीं बनाना चाहते थे। लेकिन राज्य में किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था। ऐसे में कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेता दिल से चाहते थे कि वह जेडीएस के साथ सरकार बनाएँ। हालाँकि, कुछ स्थानीय नेता इसमें दिलचस्पी नहीं रख रहे थे लेकिन फिर भी सरकार बनी।
मीडिया खबरों की मानें तो कर्नाटक के पूर्व सीएम कहते है कि सरकार के गठन के पहले दिन से ही कॉन्ग्रेस नेताओं के एक वर्ग ने जनता के साथ कैसा व्यवहार किया, यह सभी जानते हैं।
पूर्व मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि उनकी सरकार ने जेडीएस की तुलना में कॉन्ग्रेस विधायकों के निर्वाचन क्षेत्रों के लिए अधिक धन आवंटित किया था ताकि विकास कार्य में दुविधा न आए।
अपना दुख जाहिर करते हुए कुमारस्वामी ने बताया कि जब भी कोई विधायक बिना अपॉइंटमेंट के उनसे मिलने आता था, तो भी वे उनसे मिलते थे। वह कहते है कि उनके निर्वाचन क्षेत्रों के विकास के लिए उनके पास जो भी अनुरोध आए, उन्होंने तत्काल उन पर फैसला लिया।
पूर्व मुख्यमंत्री के अनुसार “मैंने 14 महीनों में जितना काम किया, पिछली कॉन्ग्रेस सरकार ने कुछ नहीं किया। मैंने कॉन्ग्रेस विधायकों के निर्वाचन क्षेत्रों को 14 महीनों में 19,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का आवंटन किया।”
बता दें कि कुछ मीडिया खबरों के मुताबिक कर्नाटक में जेडीएस-कॉन्ग्रेस की सरकार गिरने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री राजनीति छोड़ने की सोच रहे हैं। वह कहते हैं, “मैं घृणित हूँ, व्यक्तिगत रूप से मुझे राजनीति में बने रहने का कोई शौक नहीं है, लेकिन मेरी पार्टी के कार्यकर्ताओं के कारण, मैं निरंतर काम कर रहा हूँ। अब राजनीति जातिगत, बाहुबल और धन शक्ति से चल रही है। आजकल राजनीतिक गतिविधियों में कोई निष्पक्षता नहीं है। अच्छे लोगों के लिए, यह बहुत मुश्किल है।”
जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने वाले अनुच्छेद-370 में किए गए बदलाव पर देश में ही दो गुट दिखाई दे रहा है। अपने ही देश में विपक्षी पार्टियों द्वारा इसका विरोध किया जा रहा है, जिसका फायदा हमारा दुश्मन देश पाकिस्तान उठा रहा है। सरकार ने जो कश्मीर पर फैसला लिया, वो हमारे देश के लिए है। यहाँ के लोगों के लिए है। तो जाहिर सी बात है कि पाकिस्तान का इस पर बोलने का कोई औचित्य ही नहीं बनता है, मगर जब अपने ही घर में फूट हो, तो पड़ोसी तो फायदा उठाएँगे ही। वो मौका देखकर वार करेंगे ही।
सरकार के फैसले का विरोध करना या फिर उस पर अपनी बात रखना सही है, लेकिन राजनीति साधने के लिए नहीं, बल्कि देश हित के लिए, लोक हित के लिए। अगर आप देश हित को ताक पर रखकर सिर्फ अपनी राजनीति को चमकाने के लिए सरकार के फैसले का विरोध करेंगे तो पड़ोसी मुल्क को बोलने का मौका तो मिलेगा ही। जब देश हित की बात पर भी देश में लोग एकमत नहीं है, तो पड़ोसी मुल्क का इस पर बोलना तो वाजिब है और ये मौका हमारे देश के नेता ही दे रहे हैं।
सोमवार (अगस्त 5, 2019) को संसद में अनुच्छेद-370 पर जिस तरह से कॉन्ग्रेस के नेताओं ने हल्ला बोला, वो पड़ोसी मुल्क को बोलने का मौका देने के लिए काफी है। कॉन्ग्रेस के सीनियर लीडर गुलाम नबी आजाद ने 370 पर किए गए बदलाव के फैसले का विरोध करते हुए इसे भारतीय इतिहास का काला दिन बताया। उन्होंने कहा कि बीजेपी की सरकार ने सत्ता के नशे में और वोट हासिल करने के लिए एक झटके में अनुच्छेद 370 के साथ 35A को खत्म कर दिया। इसके साथ खिलवाड़ कर बहुत बड़ी गद्दारी की जा रही है।
इसके साथ ही गुलाम नबी ने कहा कि 370 को खत्म कर दिया और साथ ही राज्य को भी बाँटकर दो केंद्रशासित प्रदेश बना दिया। जम्मू-कश्मीर में अब उप राज्यपाल होगा। यह तो कभी सपने में नहीं सोचा जा सकता था कि एनडीए सरकार यहाँ तक जाएगी कि जम्मू कश्मीर राज्य का अस्तित्व खत्म कर देगी। उन्होंने बीजेपी की तरफ इशारा करते हुए कहा कि इनको पता नहीं कि एक तरफ चीन की सीमा, एक तरफ पाकिस्तान सीमा है और एक तरफ POK की सीमा है। ऐसे में भाजपा सरकार ने इस तरह से राज्य के साथ खिलवाड़ करके देश के साथ गद्दारी करने का काम किया है। किसी सीमावर्ती राज्य में सिर्फ फौज की बदौलत दुश्मन को नहीं रोक सकते। इसके लिए स्थानीय लोगों का विश्वास होना चाहिए। भाजपा सरकार ने आज हमारे देश का सिर काट लिया। भाजपा की सरकार ने भारत को बिना सिर का बना दिया।
Modi Govt is trying to make Kashmir another Palestine by changing the population demography and bringing settlers into Kashmir, Parliamentarians must stop fighting on trivial issues lets respond India by blood, tears, toil and sweat, we must be ready to fight if war is imposed
गुलाम नबी की इस तरह की बयानबाजी के बाद अब पाकिस्तान की तरफ से विरोधी सुर उठने शुरू हो गए हैं। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के बाद अब वहाँ की सेना समेत अन्य मंत्री भी इस पर भारत के खिलाफ बोल रहे हैं। वहाँ के एक मंत्री ने तो ‘जंग का जवाब’ देने तक की बात कह डाली। बता दें कि, पाकिस्तान के मंत्री चौधरी फवाद हुसैन ने भी इस पर ट्वीट किया। उन्होंने लिखा, “मोदी सरकार कश्मीर को दूसरा फिलिस्तीन बनाना चाहती है। वह वहाँ की जनसांख्यिकी में बदलाव करने के लिए बाकी लोगों को कश्मीर में बसाना चाहती है। सांसदों को तुच्छ मुद्दों पर लड़ना बंद करके भारत को खून, आँसू और पसीने से जवाब देना चाहिए और अगर जंग थोपी जाए तो हमें जंग के लिए तैयार रहना चाहिए।”
लोकसभा में कॉन्ग्रेस संसदीय दल के नेता अधीर रंजन चौधरी के विवादस्पद बयानों की झड़ी लगी हुई है। पहले कश्मीर के हिन्दुस्तान का आंतरिक मसला होने और सरकार के उस पर बिल लाने के अधिकार पर ही सवाल उठाने के बाद अब वह सरकार पर POK (पाक-अधिकृत, गुलाम कश्मीर) से पल्ला झाड़ लेने का आरोप लगाते पाए जा रहे हैं।
मैंने पूछा था POK का क्या होगा
समाचार एजेंसी ANI से बात करते हुए अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि उन्होंने सवाल यह पूछा था कि अब (जबकि सरकार ने जम्मू-कश्मीर को पूर्ण विधानसभा वाला केंद्र-शासित प्रदेश बना दिया है) POK की स्थिति क्या होगी। उन्होंने यह भी कहा कि इसमें उन्होंने गलत क्या कहा है?
“what will be the status of Pak Occupied Kashmir now, because now the Jammu Kashmir status has changed, that is what I said, what is wrong with this?” Adhir Ranjan Chowdhury, Congress. pic.twitter.com/PcHMmiEH2l
अधीर चौधरी ने यह भी कहा कि इतने बड़े बिल (जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल) में कहीं भी POK भूभाग का ज़िक्र नहीं है। उनके अनुसार इसका अर्थ यह है कि हिंदुस्तान ने गुलाम कश्मीर को पाने की आशा छोड़ दी है।
“They have ceded POK territory. Such a big bill they have brought out and no reference to POK. I challenge you to show me where they have written POK in bill? They have given up on it” Adhir Ranjan Chowdhury to ANI
इसके पहले उन्होंने कश्मीर मसले पर बिल लाने की सरकार की हैसियत को ही चुनौती दे डाली थी। उनके इस बयान पर भड़के गृह मंत्री और भाजपा सुप्रीमो अमित शाह ने तो उन्हें खरी-खोटी सुनाई ही, खुद सोनिया गाँधी भौंचक्की नज़र आईं। शाह ने सदन में यह भी साफ़ किया कि भाजपा नेता कश्मीर के लिए जान भी दे देंगे, और वह जब भी “कश्मीर” बोलेंगे, तो उनका तात्पर्य पाकिस्तान और चीन के कब्ज़े वाले गुलाम कश्मीर से भी होगा।