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संगठन ही नहीं, अब व्यक्ति भी घोषित होगा आतंकी, नहीं बचेंगे अर्बन नक्सल, हुआ कानून में बदलाव

बिना किसी संगठन या ढाँचे के अकेले दहशत फ़ैलाने वाले आतंकवादी को भी आतंकवादी घोषित करने वाला गैरकानूनी गतिविधि (निरोधक) संशोधन अधिनियम (UAPA) लोक सभा में पास हो गया है। इसके ज़रिए अब सरकार इस्लामिक स्टेट के इराक-सीरिया में खत्म होने के बाद हिंदुस्तान लौटे संभावित ‘लोन वुल्फ टेररिस्ट’ (अकेले जिहादियों) पर कानूनी नकेल आसानी से कस सकेगी। इस संशोधन के ज़रिए सरकार ने NIA के महानिदेशक को ऐसे लोन-वुल्फ जिहादी की सम्पत्ति मामले की जाँच के दौरान ज़ब्त कर लेने की ताकत प्रदान की है। इस दौरान सरकार की ओर से बहस का नेतृत्व गृह मंत्री और भाजपा प्रमुख अमित शाह ने किया।

कॉन्ग्रेस ने जताई थी ‘संघीय ढाँचे’ वाली आपत्ति

चूँकि NIA को इस संशोधन के ज़रिए संदिग्ध को दहशतगर्द घोषित करने और बिना राज्य पुलिस के मुखिया (डीजीपी या समकक्ष रैंक) से सहमति लिए ऐसे दहशतगर्द घोषित हुए लोगों की सम्पत्ति ज़ब्त करने का अधिकार मिल जाता है, अतः कॉन्ग्रेस इस संशोधन पर संघीय ढाँचे को दरकिनार करने का हवाला दे कर आपत्ति जता रही थी। अमित शाह ने इस पर कॉन्ग्रेस को UAPA कानून कॉन्ग्रेस द्वारा ही पास किए जाने की याद दिलाते हुए आईना दिखाया। कॉन्ग्रेस के सवाल उठाने को आड़े हाथों लेते हुए शाह ने कहा कि जब कॉन्ग्रेस राजग पर सवाल उठाती है तो भूल जाती है कि यह कानून लाया कौन (कॉन्ग्रेस) था और किसने उसे कड़ा बनाया। उन्होंने कहा कि कानून आप (कॉन्ग्रेस) लाए थे, आपने भी सही काम किया और अब हम भी (इसमें संशोधन करके) सही ही कर रहे हैं।

विपक्ष के इस संशोधन के दुरुपयोग की चिंता पर भी शाह ने सदन को आश्वस्त किया कि कानून का इस्तेमाल केवल और केवल आतंकवादियों और आतंक को जड़ से उखाड़ने के लिए ही किया जाएगा

गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में साफ़ किया है उनकी सरकार शहरी नक्सलियों और माओवादियों के प्रति किसी भी मुरौव्वत के मूड में नहीं है। उन्होंने सदन में यह भी बयान दिया कि सच में सामाजिक कार्य कर रहे कार्यकर्ताओं को पकड़ने में पुलिस की कोई रुचि नहीं है।

‘अर्बन नक्सलियों’ पर बहस का हिस्सा

‘अर्बन नक्सली’ या ‘अर्बन माओवादी’ का अर्थ वह शहरी नागरिक हैं, जो शहरी मध्य-वर्ग/उच्च-मध्यम वर्ग (मार्क्सवादी भाषा में ‘बुर्जुआ’, bourgeois) का हिस्सा होते हुए भी वैचारिक, नैतिक-राजनीतिक, और कई बार आर्थिक, समर्थन भारत-विरोधी वाम-चरमपंथी गुटों जैसे नक्सलियों और माओवादियों की ग्रामीण इलाकों में हिंसक गतिविधियों का समर्थन करते हैं। माना जाता है कि यह शब्द फ़िल्मकार विवेक अग्निहोत्री द्वारा प्रचलित किया गया था।

शहरी वाम-चरमपंथियों, और आदिवासी इलाकों में उनके हाथों जनजातियों के उत्पीड़न, को चित्रित करने वाली अग्निहोत्री की फिल्म ‘बुद्धा (बुद्ध) इन अ ट्रैफिक जाम’ की एक ओर वामपंथी धड़े में जहाँ आलोचना होती है, वहीं दूसरी ओर देश के ‘राइट विंग’ में फिल्म को ‘कल्ट स्टेटस’ मिला हुआ है। इस विषय पर जेएनयू में लगाए गए कुख्यात भारत-विरोधी नारों के बाद से कई बार राजनीतिक और सामाजिक बहस हो चुकी है।

चंद्रयान 2 की लैंडिंग साइट का नाम होगा ‘राजीव गाँधी गड्ढा केंद्र’: नरेन्द्र मोदी

इसरो द्वारा चंद्रयान 2 का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण कर लिया गया है और अब उसका चाँद के लिए सफर जारी है। इसके बाद इसरो (ISRO) के वैज्ञानिक इन्तजार कर रहे हैं इसके चन्द्रमा पर सफलतापूर्वक उतरने का। इसी बीच खबर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चंद्रयान 2 के उतरने की जगह (लैंडिंग साइट) का नामकरण कर सकते हैं। इसरो ने बताया है कि उनके पास नामों की एक लिस्ट है जिस पर विचार किया जा रहा है।

शायद आप इस तथ्य को नहीं जानते होंगे कि करीब एक दशक पहले चंद्रयान 1 की लैंडिंग के बाद भारत ने शैकलेटन क्रेटर के पास के एक क्षेत्र को ‘जवाहर पॉइंट’ का नाम दिया था। जाहिर सी बात है, उस वक़्त की सत्तरूढ़ सरकार की हड्डियों में जवाहरलाल नेहरू का नमक जो था।

14 नवंबर 2008 को जब चंद्रयान 1 चंद्रमा पर उतरा था तो उससे पहले इसरो के वैज्ञानिक समेत भारत सरकार के तमाम आला अधिकारियों की बैठक चली कि जिस जगह यान उतरेगा उसका नाम क्या रखा जाए? सोनिया, मनमोहन समेत दिग्विजय और कमलनाथ सरीखे लोगों ने इसरो से महीने भर का समय माँगा। उन्होंने साथ ही इसरो के वैज्ञानिकों से भी कहा कि वो भी नाम सोचें। एक महीने की बैठक के बाद तय हुआ कि उस जगह का नाम ‘जवाहर प्वाइंट’ रखा जाएगा।

अब चंद्रयान 2 के प्रक्षेपण के बाद इसरो के चेयरमैन ने इस बात की पुष्टि की है कि लैंडिंग साइट को नाम देने पर विचार हो रहा है और यान की सफल लैंडिंग के बाद पीएम नरेंद्र मोदी स्वयं इस नाम का ऐलान कर सकते हैं।

ऑपइंडिया तीखीमिर्ची सेल के हाथ कुछ कागजात लगे हैं, जिनसे चंद्रयान 2 के लैंडिंग साइट के नाम का खुलासा हो गया है। सूत्रों का कहना है कि नरेंद्र मोदी जी इस लैंडिंग साइट को ‘राजीव गाँधी गड्ढा केंद्र’ रखने वाले हैं। हालाँकि, इस नाम पर आखिरी मुहर अभी लगनी बाकी है।

दरअसल इस नाम में राजीव गाँधी और कॉन्ग्रेस के अगले संभावित अध्यक्ष राहुल गाँधी जी, दोनों की ही छवि मौजूद है। मोदी जी चाहते थे कि इस नाम में राहुल गाँधी द्वारा देश और भाजपा के लिए किए गए योगदान की झलक रहे इसलिए उनके गालों पर पढ़ने वाले पाताल तोड़ गहरे गड्ढों को अब चाँद पर पहुँचाने का प्रयास किया गया। ऐसा करने से भारत के हर मिशन की सफलता के पहले हकदार और कश्मीर समस्या के जिम्मेदार जवाहरलाल नेहरू जी का भी मान रह जाएगा।

चंद्रयान 2 के चाँद पर उतरने से पहले ही ट्विटर पर रोजाना ‘जवाहरु-हु-अकबर’ के नारे लगाकर पूरा दिन कॉन्सपिरेसी थ्योरी रचने वाले एक कॉन्सपिरेसी थ्योरी एक्टिविस्ट ने एक एक्सक्लूसिव जानकारी साझा की है। चंद्रयान 2 से पहले ही चाँद पर उत्तर चुके इस एक्टिविस्ट का कहना है कि चंद्रयान पर प्रॉपर्टी डीलिंग का बिजनेस बहुत चोखा चल रहा है।

राष्ट्रवादी सरकार के दौरान सोशल मीडिया पर अस्थमा की शिकायत करने वाले एक्टिविस्ट ने जब देश में बढ़ती असहिष्णुता के डर से चाँद पर एक टुकड़ा जमीन लेने के लिए सम्बंधित व्यक्ति से संपर्क किया तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

दरअसल, अपनी खोजी प्रवृत्ति से इस एक्टिविस्ट ने पता लगाया है कि चाँद पर जमीन का आधे से ज्यादा हिस्सा किसी भूमि-भक्षी रॉबर्ट ठठेरा के नाम पर पहले से ही रजिस्टर्ड है। सबसे बड़ी हैरानी की बात यह थी कि रॉबर्ट ठठेरा कोई एलियन नहीं बल्कि मनुष्य निकले।

स्टूडियो पर ही चन्द्रमा का वातावरण बनाकर चन्द्रमा से ही लाइव रिपोर्टिंग कर रही ‘खाज तक’ न्यूज़ की एक एंकर से रॉबर्ट ठठेरा ने बात करते हुए कहा कि उसके जीवन का अब एक ही मकसद है और वो है ब्रह्माण्ड पर कब्ज़ा। साथ ही श्री ठठेरा जी ने कहा कि वो इस सम्बन्ध में श्री थानोस जी से बातचीत कर रहे हैं। अपनी महत्वकांक्षी प्रवृत्ति के बारे में बात करते हुए रॉबर्ट ठठेरा ने बताया कि उन्हें यह शक्ति जवाहर लाल नेहरू के आशीर्वाद से प्राप्त हुई है कि वो भूमि के जिस भाग पर भी अपनी नजर दौड़ाते हैं, वो तुरंत उनके नाम हो जाती है।

लेकिन, चन्द्रमा पर जमीन खरीदने की बात सुनते ही रॉबर्ट ठठेरा को गुस्सा आ गया और उसने टीवी एंकर को ‘देख लेने’ की धमकी दे डाली। इसका कारण पूछने पर उन्होंने जवाब दिया कि जिस तरह से कॉन्ग्रेस लगातार हार पर हार झेल रही है, लगता नहीं है कि पृथ्वी पर उनके छुपने लायक कोई जगह बाकी बच जाएगी। यही वजह है कि वो 2024 के बाद अपने सारे परिवार, जिसमें उसका साला, साले की बहन और सासू जी भी शामिल हैं, को लेकर चन्द्रमा पर जाने की तैयारियाँ कर रहा है।

हालाँकि, उनके इस बयान पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने आश्वासन दिलाया है कि यदि वाकई में किसीको चाँद पर जमीन लेनी हो, तो वो बीच में मध्यस्थता करने के लिए तैयार हैं।

अकबरुद्दीन ओवैसी, दर्द उठा है तो अलीगढ़ के हकीम के पास जाओ, ये 2019 है

पुरानी फिल्म में एक संवाद है कि ‘भैंस पूँछ उठाएगी तो गाना नहीं गाएगी, गोबर ही करेगी’। ओवैसी नाम के दो लोग हैं, जो राष्ट्रीय परिदृश्य में काफी चर्चित रहते हैं। ये दोनों आपस में गुड ओवैसी-बैड ओवैसी करते रहते हैं। एक भाई मुँह से विष्ठा करता है, दूसरा अपनी छवि समझदारों वाली बनाए घूमता है। लेकिन ऐसा है नहीं, दोनों ही ज़हरीले हैं।

अकबरुद्दीन और असदुद्दीन नाम हैं इनके। पूरी पहचान मजहब विशेष के तथाकथित हक की राजनीति को लेकर है जिसमें इन्हें लगता है कि इनके मजहब वाले इस देश के नागरिक मात्र नहीं हैं, बल्कि कुछ और ही हैं और उन्हें उनका हक नहीं दिया जा रहा। और वो हक क्या है? ‘पंद्रह मिनट के लिए पुलिस को हटा दो’ फिर हम अदरक कर देंगे, लहसुन कर देंगे।

आज फिर एक विडियो घूम रहा है जिसमें अकबरुद्दीन बता रहा है कि उसके 15 मिनट वाले बयान को लेकर लोग अभी तक दहशत में हैं। इसीलिए मॉब लिंचिंग करने वाले और आरएसएस वाले उससे डरते हैं। उसने कहा कि मजहब वालों को शेर बनना होगा, ताकि कोई ‘चायवाला’ उनके सामने खड़ा न हो सके। छुटभैये ओवैसी ने इस्लामी भीड़ से कहा कि उन्हें डरने वाला नहीं, डराने वाला बनना चाहिए।

जाहिर है कि ऐसे मौकों पर भारत के लिबरपंथी और स्वयं को लेनिन-माओ की क्रॉसब्रीड बताने को लालायित कामभक्त वामपंथी अभी या तो गालिब की शायरी करने में मशगूल हैं या मोदी को चिट्ठियाँ लिख कर बता रहे हैं कि ‘जय श्री राम’ तो युद्धघोष बन चुका है। अब इनको ये कौन बताए कि ये तो युद्धघोष हनुमान के समय से है जब वो लंका पर कूद गए थे। साथ ही, संदर्भ सही हो तो ये अभिवादन भी है। वर्साटाइल नारा है। एक नारा और भी बहुत वर्साटाइल है लेकिन वो युद्धघोष नहीं, कामांध आतंकियों के लिए किसी आकाशी वेश्यालय तक पहुँचने का पासवर्ड है। लेकिन उस पर किसी ने चिट्ठी नहीं लिखी।

खैर, रिंकलफ्री शेरवानी पहन कर, भीड़ को उन्मादी और दंगाई बनाने को आतुर ओवैसी यह भूल गया है कि ये 2012 नहीं है, न ही ‘इस देश के संसाधनों पर पहला हक मुस्लिमों का होना चाहिए’ कहने वाली सरकार है। शायद कॉन्ग्रेसियों के इसी बयान को ओवैसी जैसे चिरकुट ने ये सोचा कि पुलिस भी तो संसाधन ही है, और उस पर पहला हक समुदाय विशेष का है तो उसे हटा दिया जाए।

डरा हुआ शांतिप्रिय बनाम डराने वाला शांतिप्रिय

अब बात यह है कि ओवैसी पहले तो यह डिसाइड कर ले कि देश का ‘शांतिप्रिय’ डरा हुआ है या वो पंद्रह मिनट में हिन्दुओं को खत्म करने के लिए तैयार है। क्योंकि उसके भाई समेत कई ‘शांतिप्रिय’ नेता आज कल डरा हुआ ‘शांतिप्रिय’ वाला ही कोरस गा रहे हैं। ये बात और है कि जिस हिसाब से उनके द्वारा किए गए बलात्कारों, मंदिरों को तोड़ने, झूठ बोल कर ‘जय श्री राम’ का एंगल डालने, तलाक देकर भाई/बाप/मामा/जीजा आदि के साथ सो कर हलाला करवाने आदि की खबरें आ रही हैं, उससे ये डरे तो बिलकुल नहीं लग रहे। मजहब विशेष के तीन लोग किसी के घर के आगे गाँजा पीता है, मना करने पर उसको चाकुओं से गोद देते हैं। डरे हुए तो नहीं लगते। काँवड़ियों का अपने इलाके से गुजरने का इंतजार करते हैं और रात के एक बजे उन पर पत्थर फेंकते हैं। ये डरे हुए तो नहीं लगते।

दूसरी बात यह भी है कि ओवैसी को बैठ कर यह सोचना चाहिए कि 2012 से 2019 में ऐसा क्या बदल गया कि पंद्रह मिनट में हिन्दुओं का सफाया करने वाला ओवैसी इस्लामी भीड़ को कह रहा है कि उनमें शहादत का जज्बा होना चाहिए। आखिर इशारा कहाँ है? क्या ओवैसी चाहता है कि उसके सामने बैठे ‘शांतिप्रिय’, और उसको सुन कर स्खलित होने वाले ‘शांतिप्रिय’, भारतीय सेनाओं में जाएँ और राष्ट्र के लिए शहादत दें? क्या ओवैसी जब इस्लामी भीड़ से कहता है कि वो डराने वाले बनें तो उसका मतलब इससे है कि सुनने वाले मजहबी लोग पाकिस्तानियों को, या देश-समाज के दुश्मनों को डराने वाले बनें?

शहादत का जज्बा यानी मर मिटने की चाहत रखना। ऐसा जज्बा इस्लामी आतंकियों में खूब देखा गया है। वो बस इसलिए देह पर बम बाँध कर अपनी बम-बिरयानी बनवा लेते हैं क्योंकि किसी ने कहा है कि ऊपर बहत्तर हूरें बुर्का पहने इंतज़ार कर रही होंगी। यही तो वो जज्बा है कि अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए मर मिटना है। आखिर ओवैसी इन लोगों को शहादत के लिए क्यों तैयार कर रहे हैं? वो भी तब जब भारत के प्रधानमंत्री, जो ओवैसी के समर्थकों के भी प्रधानमंत्री हैं, ‘सबका विश्वास’ जीतने में जी-जान से लगे हैं।

आरएसएस का हौव्वा

चूँकि ओवैसी जैसे दंगाई प्रवृत्ति के लोग बार-बार यह नहीं कह सकते कि हिन्दू तुम्हारा दुश्मन है, इसलिए उन्हें एक विकल्प चाहिए। विकल्प है संघ, जिसके नाम एक भी अपराध नहीं, जिसने कभी भी किसी भी संप्रदाय के खिलाफ कुछ गलत नहीं किया, न कहीं हम फोड़ा, न किसी मार्केट में जा कर ‘जय श्री राम’ कहते हुए फट गया, फिर भी कट्टरपंथियों के लिए एक कॉमन दुश्मन के तौर पर इसे सारे नालायक पेश करते रहे हैं।

चूँकि, इन्होंने एकजुट हो कर, नरेन्द्र मोदी को इस चुनाव में हराने के लिए एड़ी-चोटी का परिश्रम किया लेकिन हुआ कुछ भी नहीं, तो इन्हें चुनने वाले इनकी क्षमता पर सवाल कर रहे हैं कि तुमने तो कहा था कि ये उखाड़ लोगे, और वहाँ से मोदी को भगा दोगे। न्यूज वाले भी इनको भाव नहीं दे रहे, तो इनके नुमाइंदे टिकटॉक से लेकर गलियों के जलसों में पागल कुत्तों की तरह भौंक रहे हैं।

लेकिन भौंकने के लिए एक भागती हुई कार तो चाहिए। आरएसएस वही भागती हुई, चमचमाती कार है जिसे देख कर ये भौंकते हैं क्योंकि इनका एक भी संगठन इस तरह का नहीं बन पाया जो कि अपनी राष्ट्रवादी विचारधारा को सत्ता तक पहुँचा दे। इनके संगठन बड़ी पार्टियों द्वारा फेंकी गई हड्डियाँ चूसते रहे और अपने समर्थकों को ठगते रहे कि तुम्हारे लिए शहद की नदियाँ बहाने के लिए फंड इकट्ठा हो रहा है। परिणामतः मजहबी नेता रिंकलफ्री शेरवानी पहन कर घूम रहे हैं, और उनके समर्थक ‘नारा ए तदबीर अल्लाहु अकबर’ चिल्ला कर खुश हैं कि उनका मसीहा अब पर्वत को जला कर राख कर देगा। जबकि वो वास्तव में है चिरकुट।

कट्टरपंथियों का आइटम गर्ल है ओवैसी

जैसे फिल्मों में आइटम सॉन्ग हुआ करते थे और उनके आधार पर उनकी मार्केटिंग हुआ करती थी, और अब उन आइटम सॉन्ग्स में भी रीमिक्स का ही सहारा लिया जा रहा है तो ओवैसी का भी कुछ ऐसा ही है। नया है नहीं कुछ कहने को। घर की औरतें भी बुर्का पहन कर मोदी को वोट दे आती हैं, तो बेचारा भीतर से दुखी है।

ऐसे दुखी आदमी की भी जलसों में बुकिंग हो रखी होती है तो निजी दर्द को दरकिनार करते हुए माइक पर बोलना पड़ता है। ओवैसी का हाल उस बच्चे की तरह है जिसे उसका बाप मेहमानों के सामने सीधा ला कर खड़ा देता है और कहता है कि ‘अंकल को वो वाला पोएम सुना दो’। बच्चे को भी रटा हुआ रहता है, उसको पता है कि पिछले बार जो अंकल और आंटी आए थे किस लाइन पर ‘अरे वाह बेटा’ बोले थे, तो वो उस लाइन पर ज़ोर देता है।

ओवैसी को भीतर से पता है कि वो एक टुच्चा आदमी है जिसके विचार टुटपुँजिया हैं लेकिन इस देश में ऐसे लोगों के सामने भी, पंजो पर नितम्ब टिकाए लोग घुटनों पर हाथ रख कर ताली पीटने को बेकरार रहते हैं। उसे याद है कि ‘पंद्रह मिनट’ बोल कर वो अपने जेहनी बवासीर के दर्द से बिना चीर-फाड़ कराए, या अलीगढ़ के लाल कुआँ वाले हकीम के पास बिना जाए ही निजात पा सकता है। इसलिए वो बोलता है और उसके समर्थकों का भी दर्द थोड़ी देर के लिए शांत हो जाता है जो मई की 23 तारीख की सुबह से दोबारा शुरु हुआ है।

इसलिए, मेरी सलाह तो यही रहेगी कि भीड़ के सामने से हिन्दुओं के सफाए की धमकी देने वाले ओवैसी को अपनी स्पीच का प्रिंटआउट निकाल कर ठीक से पढ़ना चाहिए, फिर उसे सिलिंड्रिकल शेप में मोड़ कर स्थान विशेष में छुपा कर रख लेना चाहिए क्योंकि ये 2019 है।

अजब-गजब: केरल में कुतिया को ‘अवैध’ संबंध के लिए घर से निकाला

केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में एक कुतिया को मालिक ने पड़ोसी के कुत्ते के साथ ‘अवैध संबंध’ के लिए घर से निकाल दिया। लगभग तीन साल की सफ़ेद कुतिया पॉमेरेनियन नस्ल की है और शहर के चकई स्थित वर्ल्ड मार्केट में घूमती मिली। उसका मालिक कौन है यह पता नहीं चल पाया है।

चिट्ठी से हुआ खुलासा

कुतिया की कॉलर में लटकी चिट्ठी से पूरे मामले का खुलासा हुआ है। उसे छोड़ने वाले मालिक ने चिट्ठी में बताया है, “वह बहुत अच्छी है, केवल भौंकती है, तीन साल में किसी को कभी काटा नहीं, ज़्यादा खाना नहीं खिलाना पड़ता- आम तौर पर दूध, बिस्कुट और अण्डों से काम चल जाता है। अब हमने इसे निकाल दिया है, क्योंकि इसके पड़ोस के कुत्ते से अवैध संबंध थे।”

जानवरों के लिए काम करने वाले NGO पीपल फॉर एनिमल्स की शमीन फारूखी ने मीडिया को बताया कि फ़िलहाल कुतिया को उन्होंने अपने घर में रख लिया है। उन्हें उम्मीद है कि उसे गोद लेने वाला कोई मिल जाएगा। हालाँकि कुतिया के चेहरे पर उम्मीद के भाव ऐसे हैं जैसे मालिक उसे लेने आता ही होगा।

‘कुत्ते ऐसा ही करते हैं’

शमीम ने कहा कि कुत्ते अपने प्रजनन काल में यौन संबंध बनाते ही हैं- यही उनकी प्रकृति है। अगर मालिक को उसके बच्चे/पिल्ले नहीं चाहिए थे तो वह कुतिया की नसबंदी करा सकता था। यदि उसे अपनी कुतिया को ‘कुँवारी’ ही रखना था तो उसे घर में बंद रखने के सिवाय और कोई दूसरा रास्ता नहीं होता। शमीम के अनुसार उन्होंने घायल, बीमार वगैरह कुत्तों को छोड़े जाते तो देखा है, लेकिन ‘अवैध संबंध’ के कारण छोड़े गए कुत्ते का यह पहला मामला है।

शहरी नक्सलियों से जीरो सहानुभूति, कॉन्ग्रेस ने कानून लाकर अच्छा काम किया: अमित शाह

गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में साफ़ किया है उनकी सरकार शहरी नक्सलियों और माओवादियों के प्रति किसी भी मुरौव्वत के मूड में नहीं है। उन्होंने सदन में यह भी बयान दिया कि सच में सामाजिक कार्य कर रहे कार्यकर्ताओं को पकड़ने में पुलिस की कोई रुचि नहीं है।

‘अर्बन नक्सलियों’ पर बहस का हिस्सा

‘अर्बन नक्सली’ या अर्बन माओवादी’ का अर्थ वह शहरी नागरिक हैं, जो शहरी मध्य-वर्ग/उच्च-मध्यम वर्ग (मार्क्सवादी भाषा में ‘बुर्जुआ’, burgeoise) का हिस्सा होते हुए भी वैचारिक, नैतिक-राजनीतिक, और कई बार आर्थिक, समर्थन भारत-विरोधी वाम-चरमपंथी गुटों जैसे नक्सलियों और माओवादियों की ग्रामीण इलाकों में हिंसक गतिविधियों का समर्थन करते हैं। माना जाता है कि यह शब्द फ़िल्मकार विवेक अग्निहोत्री द्वारा प्रचलित किया गया था। शहरी वाम-चरमपंथियों, और आदिवासी इलाकों में उनके हाथों जनजातियों के उत्पीड़न, को चित्रित करने वाली अग्निहोत्री की फिल्म ‘बुद्धा (बुद्ध) इन अ ट्रैफिक जाम’ की एक ओर वामपंथी धड़े में जहाँ आलोचना होती है, वहीं दूसरी ओर देश के ‘राइट विंग’ में फिल्म को ‘कल्ट स्टेटस’ मिला हुआ है। इस विषय पर जेएनयू में लगाए गए कुख्यात भारत-विरोधी नारों के बाद से कई बार राजनीतिक और सामाजिक बहस हो चुकी है।

‘व्यक्ति को आतंकवादी घोषित करने वाले प्रावधान की ज़रूरत’

गृह मंत्री अमित शाह ने गैरकानूनी गतिविधि (निरोधक) संशोधन अधिनियम (UAPA) पर बहस करते हुए कहा कि देश में एक व्यक्ति को आतंकवादी घोषित करने के प्रावधान की सख्त ज़रूरत है। उन्होंने अपने तर्क के समर्थन में अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र से लेकर पाकिस्तान तक के उदाहरण गिनाते हुए बताया कि हर बड़े देश के पास यह कानूनी हथियार है। यह प्रावधान इस्लामिक स्टेट (आईएस) के इराक-सीरिया स्थित केंद्रीयकृत संगठन के उखड़ जाने के बाद उसके आतंकियों के स्वतंत्र टुकड़ों (‘लोन वुल्फ टेररिस्ट’, अकेला जिहादी) के रूप में बिखर जाने की खबरों के प्रकाश में सरकार का एक महत्वपूर्ण कदम है।

‘आपने सही किया था, हम भी सही कर रहे हैं’

UAPA पर कॉन्ग्रेस के सवाल उठाने को आड़े हाथों लेते हुए शाह ने कहा कि जब कॉन्ग्रेस राजग पर सवाल उठाती है तो भूल जाती है कि यह कानून लाया कौन (कॉन्ग्रेस) था और किसने उसे कड़ा बनाया। उन्होंने कहा कि कानून आप (कॉन्ग्रेस) लाए थे, आपने भी सही काम किया और अब हम भी (इसमें संशोधन करके) सही ही कर रहे हैं।

‘जो ना बोले जय श्री राम, भेज दो उसको कब्रिस्तान’, Viral हुए इस नए गाने पर बढ़ा विवाद

देश भर में हो रही मॉब लिंचिंग की घटनाओं के बीच एक गाना रिलीज हुआ है। रिलीज होने के साथ ही ये गाना विवादों में घिर गया है। इस गाने के बोल हैं- ‘जो ना बोले जय श्री राम, भेज दो उसको कब्रिस्तान।’ इस गाने को लेकर सोशल मीडिया में काफी चर्चा हो रही है। जानकारी के मुताबिक, इस गाने को वरुण बहार ने गाया है। 

इस गाने को लेकर लोग सोशल मीडया पर अपनी-अपनी अलग प्रतिक्रियाएँ दे रहे हैं। कुछ लोग इसे आपत्तिजनक बता रहे हैं, तो कुछ लोगों को इस गाने में कुछ भी गलत नहीं लग रहा है। ट्विटर यूजर प्रशांत कनौजिया ने इस वीडियो को ट्वीट करते हुए सिंगर को डिजिटल टेररिस्ट बताया है। बता दें कि प्रशांत कनौजिया वही पत्रकार है, जिसे सीएम योगी आदित्यनाथ पर आपत्तिजनक सोशल मीडिया पोस्ट करने के आरोप में यूपी पुलिस ने हाल ही में गिरफ्तार किया था।

प्रशांत ने ट्वीट में लिखा है, “भारत एकमात्र देश है जहाँ आतंकवादी अपना म्यूजिक वीडियो बनाते हैं और यूट्यूब पर चलाते हैं। इस मामले में तालिबान और आईएसआईएस भी इस तकनीक तक नहीं पहुँच पाए हैं। डिजिटल इंडिया के साथ डिजिटल आतंकवाद…” इसके साथ ही कनौजिया ने हैशटैग में डिजिटल टेरेरिस्ट भी लिखा है।

प्रशांत कनौजिया के ट्वीट पर बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो गृह मंत्रालय से लेकर यूपी पुलिस तक से वीडियो बनाने वाले शख्स के खिलाफ कार्रवाई की माँग कर रहे हैं। वहीं कुछ यूजर्स ऐसे भी हैं जो ये कह रहे हैं कि इस तरह के वीडियो मार्केट में आने से मॉब लिंचिंग जैसी घटनाएँ बढ़ सकती हैं।

वहीं, कुछ यूजर्स ऐसे भी हैं जिन्हें इस तरह के गाने में कोई बुराई नहीं दिख रही है। ऐसे लोग वीडियो ट्वीट करने वाले प्रशांत कनौजिया को ही एंटी हिंदू और एंटी नेशनलिस्ट बता रहे हैं। एक यूजर ने कमेंट करते हुए लिखा है, “सबसे बड़े आतंकी तो तुम हो। रहते हिंदुस्तान में, खाते हिंदुस्तान की लेकिन हिंदुओं को आतंकवादी बोलते हो। शांतिदूत जब खुलेआम खून खराब करते हैं, तब कहाँ मर जाते हो।”

संपादकीय नोट: ऑपइंडिया इस तरह के किसी गाने की निंदा करता है (फिर चाहे वो किसी भी धर्म विशेष को लेकर ही क्यों न हो)। इससे माहौल बिगड़ सकता है, साम्प्रदायिक तनाव बढ़ सकता है।

मोदी राज में कम हुआ साम्प्रदायिक तनाव, आईबी के आँकड़े दे रहे गवाही

‘लिबरल गैंग’ और विपक्ष के तमाम दावों के बीच आँकड़ें बताते हैं कि मोदी सरकार के कार्यकाल में देश में साम्प्रदायिक तनाव कम हुआ है। केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री जी. किशन रेड्डी ने बुधवार को राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान एक सवाल के जवाब में खुफिया ब्यूरो (आईबी) के आँकड़ों के हवाले से यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि 2013 में साम्प्रदायिक घटनाओं के 823 मामले दर्ज किए गए थे। 2018 में इनकी संख्या घटकर 708 रह गई।

रेड्डी ने कहा, “वास्तविकता यह है कि देश में साम्प्रदायिक घटनाओं में कमी आई है। साम्प्रदायिक या किसी अन्य प्रकार की हिंसा के प्रति हमारी सरकार का इरादा ‘जीरो टॉलरेंस (कतई बर्दाश्त नहीं करने)’ की नीति का पालन करने का है।”

साम्प्रदायिक हिंसा के मामलों का रिकॉर्ड दर्ज करने और इन आंकड़ों के स्रोत से जुड़े पूरक प्रश्न के जवाब में रेड्डी ने बताया कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने 2014 से देश में साम्प्रदायिक घटनाओं का रिकॉर्ड दर्ज करना शुरू किया। लेकिन राज्य सरकारों द्वारा रिकॉर्ड में भिन्नता पर आपत्ति दर्ज कराने के कारण एनसीआरबी ने 2017 में इसका रिकॉर्ड दर्ज करना बंद कर दिया।

साम्प्रदायिक हिंसा रोकने के लिए अलग से कानून बनाने के सवाल पर उन्होंने मौजूदा कानून को पर्याप्त बताते हुए कहा कि साम्प्रदायिक तनाव और हिंसा से निपटने के लिए नया कानून बनाने की कोई जरूरत नहीं है। केन्द्र सरकार समय-समय पर राज्य सरकारों को इस बारे में खुफिया जानकारियाँ साझा करने के साथ-साथ परामर्श भी जारी करती रहती है।

‘शेर’ एजाज खान आया जेल से लँगड़ाते हुए बाहर, लोगों ने पूछा- सब ठीक तो है?

सोशल मीडिया पर भड़काऊ और विवादस्पद सांप्रदायिक वीडियो बनाने के मामले में मुंबई पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए गालीबाज अभिनेता एजाज खान को गिरफ्तार कर लिया था। अभिनेता एजाज ख़ान ने टिक-टॉक ऐप पर भड़काऊ वीडियो बना कर पोस्ट किया था। लेकिन अब वो जेल से रिहा हो चुके हैं। इसकी जानकारी एजाज खान ने अपने ट्विटर अकाउंट से दी। साथ में अपनी एक दमदार तस्वीर पोस्ट करते हुए लिखा है- “A lion doesn’t concern himself with the opinions of a sheep”

गालीबाज एजाज खान की दमदार वापसी

एजाज खान एक लाख रुपए की जमानत पर रिहा किए गए हैं। मुंबई पुलिस द्वारा उन पर IPC की धारा 153-A, धारा 34 और धारा 67 के तहत केस दर्ज किया गया था।

‘लँगड़ाकर क्यों चल रहे हो?

एजाज खान के ट्वीट पर ट्विटर यूज़र्स ने जवाब देते हुए उनका एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें वो लड़खड़ाते हुए चल रहे हैं। इस पर ट्विटर यूज़र्स उनसे अपने अंदाज में सवाल करते देखे जा रहे हैं।

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कुछ दिन पहले ही एजाज ख़ान ने हिन्दुओं के विरुद्ध हिंसा की बात की थी और सोशल मीडिया पर वह भड़काऊ और विवादास्पत पोस्ट्स के लिए कुख्यात हैं। मुंबई पुलिस ने उनके ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज की थी। एजाज ख़ान ने उसी TikTok ‘सेलिब्रिटी’ के साथ यह विवादस्पद वीडियो बनाया था जिसके खिलाफ तबरेज़ अंसारी की मौत के बदले में हिंसा भड़काने के आह्वान को लेकर FIR दर्ज की गई थी।

एजाज़ खान की TikTok प्रोफाइल पर शेयर किए गए इस वीडियो में वह मुंबई पुलिस का मज़ाक उड़ाते नज़र आए थे। इसमें उनके साथ Team07 का एक सदस्य भी नज़र आया था। डायलॉग में जब पुलिस अफसर का किरदार कुछ अपराधियों को पुलिस की गाड़ी में बैठने को कहता है तो अपराधियों में से एक पुलिस वाले पर धौंस जमाता है। यह पहली बार नहीं है जब एजाज खान जेल गए हों, वो पहले भी कई बार ड्रग्स रखने और एक्ट्रेस के साथ बदसलूकी के लिए जेल की हवा खा चुके हैं।

‘मैंने BJP का झंडा लगाया, कॉन्ग्रेस के राजाराम ने मुझे और मेरी पत्नी को दिन-दहाड़े पीटा’ – देखें Video

मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ के लिधौरा थाना क्षेत्र के खरो गाँव में कॉन्ग्रेस समर्थकों द्वारा पिटाई की खबर सामने आई है। यहाँ के एक दंपती को उन लोगों ने इसलिए पीट दिया, क्योंकि उसने अपनी गाड़ी पर बीजेपी का झंडा लगाया था। पीड़ित राकेश ने बताया कि वो भाजपा समर्थक है और उसने अपनी गाड़ी के ऊपर बीजेपी का झंडा लगाया था। इस पर उसके पड़ोसी राजाराम, जो कि कॉन्ग्रेस का आदमी है, ने उससे झंडा हटाने के लिए कहा। मगर राकेश ने मना कर दिया।

जब राकेश ने झंडा उतारने से मना किया तो राजाराम ने उसके साथ बदतमीजी की। फिर उसकी और उसकी पत्नी की पिटाई कर दी। साथ ही राकेश ने बताया कि उसके पड़ोसी ने अपने विकलांग बेटे को दारू पिलाकर उसके दरवाजे पर बैठा दिया है और वो गाली-गलौज कर रहा है।

वहीं एसपी अनुराग सुजानिया का कहना है कि जब इनके विवाद का मामला दर्ज हुआ था, तो इसके पीछे का कारण अवैध शराब बेचना था। उन्होंने कहा कि अभी तक राजनीतिक झंडा उतारने को लेकर कोई सबूत सामने नहीं आया है। उन्होंने कहा कि एफआईआर दर्ज कर ली गई है इस तथ्य को लेकर भी जाँच की जा रही है।

एसपी का कहना है कि पहले भी इनके बीच विवाद के मामले सामने आ चुके हैं। राकेश ने कहा कि पहले वो अवैध शराब बेचता था, लेकिन अब नहीं बेचता है। फिर भी ये लोग उसे परेशान करते हैं, उसके साथ मारपीट करते हैं। इनके साथ हुई मारपीट का वीडियो भी सामने आया है।

गुलशनजहाँ को दूधमुँही बच्ची के साथ घर से निकाला, तीसरी बेटी पैदा होने पर शौहर ने दिया तीन तलाक

कहते हैं कि समाज बदल रहा है और अब लोगों की सोच भी बदल रही है, मगर शायद ऐसा नहीं है। इसका उदाहरण समाज में आए दिन देखने को मिलता है। ताजा मामला उत्तराखण्ड के लक्सर का है। यहाँ तीसरी बेटी पैदा होने पर शौहर द्वारा तीन तलाक देकर बीबी को छोड़ने का मामला सामने आया है।

गुलशनजहाँ को तीसरी बेटी होने पर शौहर ने तीन तलाक देकर दूधमुँही बच्ची के साथ घर से निकाल दिया। महिला ने इसकी शिकायत थाने में की, मगर पुलिस ने घटनास्थल देहरादून का बताकर उसे वापस लौटा दिया। पुलिस ने कहा कि घटना देहरादून का है, तो मामला भी वहीं दर्ज होगा। गुलशनजहाँ का निकाह तकरीबन 6 साल पहले देहरादून के पटेल नगर थाना क्षेत्र के मोहल्ला मेहूँवाला के युवक के साथ हुआ था।

निकाह के बाद गुलशनहाँ को एक के बाद एक दो बेटियाँ हुईं, जिसके बाद घर वालों उसके साथ बुरा बर्ताव करने लगे, उसे प्रताड़ित करने लगे। बात-बात पर उसे परेशान किया करते थे और जब घर वालों को उसके तीसरी बार गर्भवती होने की बात पता चली तो उन लोगों ने लिंग परीक्षण करवाने की कोशिश की, मगर डॉक्टर ने इसके लिए मना कर दिया। इसके बाद उन लोगों ने महिला को और भी ज्यादा प्रताड़ित करना शुरू कर दिया।

इसी बीच गुलशनजहाँ को तीसरी बेटी पैदा हुई। तीसरी बार भी बेटी पैदा होने से बौखलाए ससुराल वालों ने उसके साथ मारपीट करनी शुरू कर दी। कई बार उसे गर्म प्रेस (इस्त्री) से भी जलाया गया और फिर 20 जुलाई को उसके शौहर ने तीन तलाक देकर उससे सारे संबंध खत्म करते हुए दूधमुँही बच्ची के साथ घर से निकाल दिया।