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डबल मर्डर: जुनैद की बहन से अजीम को था प्यार… लेकिन किसी और से सगाई पर गिराई 2 लाशें

उत्तर प्रदेश के मेरठ में ख़ौफ़नाक वारदात को अंजाम देने की ख़बर सामने आई है। गाज़ियाबाद में एक कार में गोली चलाकर दो लोगों की हत्या कर दी गई। पुलिस के अनुसार, हत्या करने का आरोप जुनैद के फुफेरे भाई अजीम पर है। दरअसल, रविवार (30 जून 2019) को जुनैद की बहन की सगाई होनी थी। लेकिन, सगाई से पहले जुनैद और ड्राइवर दानिश की गोली मारकर हत्या कर दी गई। हत्या की इस वारदात के पीछे अवैध संबंधों का हवाला दिया जा रहा है।

ख़बर के अनुसार, शनिवार (29 जून 2019) की सुबह कोतवाली क्षेत्र में ढलाई वाली गली के निवासी अजीम, जमील और महमूदनगर के निवासी जुनैद कार बुक करके दिल्ली के सीलमपुर इलाक़े में गए थे। तीनों युवकों के बारे में पता चला है कि वे सोना गलाकर जेवर बनाने का काम करते हैं। तय योजना के अनुसार, रास्ते में ड्राइवर के बराबर वाली सीट पर बैठे जुनैद पर अजीम और जमील ने गोली चला दी। ड्राइवर दानिश की भी गोली मारकर हत्या कर दी। पुलिस ने भी इस बात की पुष्टि की है कि जुनैद और दानिश के सिर में पीछे से गोली मारी गई। इससे यह स्पष्ट होता है कि दोनों पर गोली कार में पीछे बैठे व्यक्तियों ने ही चलाई है।

छानबीन में ख़ुलासा हुआ है कि अजीम का प्रेम-प्रसंग जुनैद की बहन से चल रहा था। लेकिन, जुनैद को यह रिश्ता बिल्कुल पसंद नहीं था, और इसलिए उसने अपनी बहन का रिश्ता कहीं और तय कर दिया। वहीं, अजीम को यह बात इतनी नागवार लगी कि उसने सगाई से पहले ही जमील के साथ मिलकर हत्या की इस वारदात को अजाम दे डाला।

वारदात के बाद दोनों आरोपित कार को लोनी-गाज़ियाबाद रोड पर टीला शाहबाजपुर गाँव के सामने खड़ी करके वहाँ से रफूचक्कर हो गए। मृतकों से बरामद आईडी-कार्ड से उनकी पहचान की गई। इसके बाद मेरठ पुलिस तुरंत हरक़त में आई और हत्या के दोनों आरोपितों अजीम और जमील को गिरफ़्तार कर लिया। गोलीबारी के दौरान अजीम को भी गोली छूकर निकली थी, इससे पहले कि वो अपने कपड़े बदल पाता, पुलिस ने उसे धर-दबोचा। फ़िलहाल, दोनों को लोनी पुलिस के हवाले कर दिया गया है।

J&K में पत्थरबाजी की घटनाएँ 3.25% बढ़ीं, लेकिन 59% ज्यादा गिरफ्तार किए गए पत्थरबाज

जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजी एक बड़ी समस्या है। आतंकियों के विरुद्ध कार्रवाई करने में इस कारण सुरक्षा बलों को खासी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। पत्थरबाजों से सख्ती से निपटने की नीति को देखते हुए हालाँकि पिछले दो वर्षों के आँकड़े थोड़े सुकून देने वाले हैं। 2017 के मुकाबले 2018 में पत्थरबाजों की गिरफ्तारी में भारी बढ़ोतरी हुई है जबकि इन घटनाओं में बहुत मामूली वृद्धि देखने को मिली। जानकारी के अनुसार 2017 में 1412 पत्थरबाजी की घटनाएँ हुईं जबकि इस दौरान 2388 पत्थरबाजों की गिरफ्तार किया गया। वहीं 2018 में पत्थरबाजी की 1458 घटनाएँ (पिछले वर्ष की तुलना में सिर्फ 46 ज्यादा) हुईं जबकि इस मामले में 3797 पत्थरबाजों को गिरफ्तार (पिछले वर्ष की तुलना में 1409 ज्यादा) किया गया।

सालपत्थरबाजी की घटनाएँपत्थरबाजों की गिरफ्तारी
201714122388
201814583797

प्रतिशत की बात करें तो एक तरफ जहाँ सिर्फ 3.25% पत्थरबाजी की घटनाओं में वृद्धि हुई है, वहीं पत्थरबाजों की गिरफ्तारी में 59% का इजाफा हुआ है। इस बात की जानकारी गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी ने राज्यसभा में पूछे गए सवाल के जवाब में दी। उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष 2018 में 3797 पत्थरबाजों की गिरफ्तारी हुई थी जिसमें से 65 को जेल भेजा गया था। जबकि 2017 में 2388 पत्थरबाजों को गिरफ्तार किया गया था और 63 को जेल भेजा गया था।

राज्यसभा में गृह राज्य मंत्री के जवाब से इस बात का भी पता चला कि पिछले वर्षों के मुकाबले 2018 में सुरक्षाबल से मुठभेड़ में स्थानीय आतंकी ज्यादा मारे गए।

आँकड़ों के अनुसार 2018 में सुरक्षाबलों ने कुल 257 आतंकी मारे। इनमें 146 कश्मीरी थे, जबकि 111 आतंकी दूसरे मुल्क के थे। जबकि 2016 और 2017 में ये आँकड़े उलटे देखने को मिले थे। इन वर्षों में सुरक्षाबल द्वारा दूसरे मुल्कों के आतंकी ज्यादा मारे गए थे और स्थानीय कम।

सालकुल मारे गए आतंकीस्थानीय आतंकीविदेशी आतंकी
2018257146111
201721386127
20161506486

टाइम्स ऑफ इंडिया की छपी रिपोर्ट के अनुसार 2017 में सुरक्षाबलों ने 86 स्थानीय आतंकियों के मुकाबले 127 बाहरी आतंकी का सफाया किया था जबकि 2016 में 86 बाहरी आतंकियों के मुकाबले 64 स्थानीय आतंकियों को मारा था।

‘इस जर्सी ने ही वर्ल्‍ड कप में भारत की जीत के सिलसिले को रोक दिया’

विश्वकप 2019 के 38वें मैंच में इंग्लैंड ने भारत को कल (जून 30, 2019) 31 रनों से हरा दिया। चूँकि यह भारत की विश्व कप 2019 में पहली हार थी इसलिए जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री ने इसके लिए भगवा जर्सी को जिम्मेदार ठहराया।

मुकाबले में भारत के हारने के बाद महबूबा मुफ्ती ने ट्वीट किया, “आप मुझे अंधविश्वासी कह सकते हैं, लेकिन इस जर्सी ने ही वर्ल्‍ड कप में भारत की जीत के सिलसिले को रोक दिया है।”

वहीं, नेशनल कॉन्फ्रेंस लीडर उमर अब्दुल्ला ने भी भारत की हार पर सवाल उठाया है। उमर ने ट्वीट करके पूछा है, “पाकिस्तान और इंग्लैंड की जगह अगर हमारा सेमीफाइनल का टिकट दाँव पर लगा होता, तब भी क्या टीम इंडिया ऐसे ही बल्लेबाजी करती।”

बता दें कि 1992 के बाद से यह पहला मौका है जब विश्वकप के किसी मैच में इंग्लैंड ने भारत को मात दी है। इस मैच में भारत की जीत के लिए पाकिस्तानी प्रशंसक भी उनको प्रोत्साहित कर रहे थे, क्योंकि इंग्लैंड की हार से वर्ल्ड कप के सेमीफाइनल में पहुँचने की पाकिस्तान की उम्मीदें बढ़ रही थीं।

कहानी राजर्षि की: जिसे बोस और पटेल की तरह कॉन्ग्रेस अध्यक्ष का पद त्यागना पड़ा, कारण- नेहरू

राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन- एक ऐसा नाम जिसने उत्तर प्रदेश में कॉन्ग्रेस की जड़ें मजबूत करने में अपनी ज़िंदगी खपा दी। यूपी के गाँव-गाँव में घूम कर निःस्वार्थ भाव से जिस तरह उन्होंने पार्टी की सेवा की थी, उनका लोकतान्त्रिक तरीके से कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बनना शायद ही किसी को अखरता। लेकिन, कॉन्ग्रेस पार्टी का शायद यह दुर्भाग्य ही था कि राजर्षि का अध्यक्ष बनना ‘किसी’ को रास नहीं आया और उन ‘किसी’ का नाम था- जवाहरलाल नेहरू। भारतीय राजनीतिक इतिहास की यह घटना उस समय की है जब नेहरू कॉन्ग्रेस के सबसे लोकप्रिय नेता थे और जनता के बीच उनकी छवि भी बहुत ही पूजनीय किस्म की थी। लेकिन, ऐसा तीसरी बार हुआ जब नेहरू ने लोकतान्त्रिक तरीके से चुने गए पार्टी अध्यक्ष के साथ सहयोग नहीं किया।

सोमवार (जुलाई 1, 2019) को देशरत्न पुरुषोत्तम दास टंडन की पुण्यतिथि है और इस अवसर पर यह याद करना ज़रूरी है कि कैसे नेहरू ने लोकतान्त्रिक तरीके से चुने गए व्यक्ति को राजनीतिक वनवास पर जाने को मजबूर कर दिया। इलाहाबाद- नेहरू और टंडन, दोनों इसी शहर से आते थे। इलाहाबाद की राजनीति में जिसका भी दखल होता, वो कॉन्ग्रेस पार्टी में ऊँचे मुकाम पर पहुँचता- चाहे वो नेहरू हों, टंडन हों या फिर दोनों के शिष्य लाल बहादुर शास्त्री। जी हाँ, शुरुआती दिनों में लाल बहादुर शास्त्री ने दोनों के बीच एक पुल का काम किया था। तब शास्त्री दोनों के बीच पत्रों का आदान-प्रदान करते थे और सबसे बड़ी बात तो यह कि ये पत्र ख़ुद शास्त्री ही लिखा करते थे।

जब टंडन शास्त्री को कोई पत्र लिखने को कहते और वह पत्र नेहरू को जाने वाला होता तो शास्त्री उसी भाषा में लिखते जो नेहरू को पसंद आए। इसी तरह वह नेहरू द्वारा टंडन को भेजे जाने वाले पत्रों के मामले में करते थे। राजर्षि टंडन के योगदानों की बात करने से पहले उस 1950 के चुनाव को याद करना ज़रूरी है, जब कॉन्ग्रेस को नेहरू की ज़िद के आगे झुकना पड़ा था। माना जाता है कि उस समय कॉन्ग्रेस में दो खेमे थे, एक का नेतृत्व नेहरू करते थे और दूसरे के नेता पटेल थे। जहाँ पटेल को दक्षिणपंथी विचारधारा का माना जाता है, वहीं नेहरू वामपंथी झुकाव वाले नेता थे।

1950 में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष का चुनाव हुआ और जवाहरलाल नेहरू के समर्थन में जेपी कृपलानी मैदान में उतरे। जेपी कृपलानी आज़ादी के समय भी कॉन्ग्रेस पार्टी के अध्यक्ष थे। आचार्य कृपलानी को नेहरू का पूरा समर्थन मिला और नेहरू ने इस चुनाव को अपने स्वाभिमान पर लिया। कारण- जिस व्यक्ति को देश का सबसे ‘लोकप्रिय’ नेता कहा जाता था, उसके उम्मीदवार की पार्टी में ही हार होने से तरह-तरह की चर्चाओं को बल मिल सकता था। लोग सोचते कि जो व्यक्ति अपनी पार्टी में ही लोकप्रिय नहीं है, वह पूरे देश में प्रचंड लोकप्रियता का दावा कैसे कर सकता है! लेकिन हुआ वही जो ‘किसी’ की इच्छा के अनुरूप नहीं था।

उप-प्रधानमंत्री सरदार पटेल के समर्थन और गाँव-गाँव में अपनी मजबूत छवि के कारण टंडन इस चुनाव को जीतने में कामयाब रहे। बेदाग़ चरित्र और विवादों से दूर रहने वाले टंडन हिंदुत्व की तरफ़ झुकाव वाले नेता थे। इस चुनाव परिणाम को नेहरू ने अपने स्वाभिमान पर धक्का के रूप में लिया और यही वह समय था जब देश के प्रधानमंत्री ने अपना असली ‘खेल’ दिखाया। इससे पहले वह ऐसे ‘खेल’ दो बार और दिखा चुके थे। टंडन के साथ खेला गया ‘खेल’ आगे लेकिन उससे पहले जरा उन दोनों घटनाओं को याद कर लेते हैं। 1946 में कॉन्ग्रेस पार्टी के अध्यक्ष के लिए नेहरू और पटेल नामांकन की दौर में थे। गाँधीजी का पूरा समर्थन नेहरू के साथ था, ऐसा उन्होंने जता दिया था। इसके बावजूद 15 में से 12 स्टेट कमिटियों ने पटेल को अपना नेता चुना।

अब आप जानना चाहेंगे कि 15 में से नेहरू कितने स्टेट कमिटियों की पसंद थे? इसका जवाब है- एक भी नहीं। पटेल को 12 और नेहरू को शून्य स्टेट कमिटियों का समर्थन मिला। जो कॉन्ग्रेस अध्यक्ष चुना जाता, उसका प्रधानमंत्री बनना भी लगभग तय था। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद जैसे दिग्गज की आपत्ति के बावजूद गाँधीजी ने पटेल को अपना नामांकन वापस लेने को कहा। नेहरू ने अपने पक्ष में एक भी स्टेट कमिटी को न पाकर चुप्पी साध ली थी लेकिन अपने अनुयायी के दुःख को गाँधीजी कैसे सह सकते थे! विचार-विमर्श का दौर चला और अंततः राष्ट्र के लिए सोचने वाले पटेल ने जनहित में गाँधीजी की भावनाओं का ख्याल रखा और अपना इस्तीफा सौंप दिया। यह दूसरा ऐसा मौका था जब नेहरू के कारण लोकतान्त्रिक प्रक्रिया को ताक पर रखा गया।

पहली वाली घटना लगभग सबको पता है। जब सुभाष चंद्र बोस कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष बने, तब नेहरू ने उनके साथ सहयोग करना बंद कर दिया और गाँधी-नेहरू का सहयोग न मिलने के कारण बोस को इस्तीफा देना पड़ा। अब वापस 1950 में आते हैं। पुरुषोत्तम दास टंडन के मामले में इतिहास ने अपने आपको तीसरी बार दोहराया। टंडन चुनाव जीत चुके थे। लेकिन गुस्साए नेहरू ने पार्टी को साफ़-साफ़ बता दिया कि अगर अध्यक्ष उनकी पसंद का न हो तो उनके लिए काम करना मुश्किल है। यहाँ तक कि नेहरू ने प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने की भी धमकी दे डाली। कॉन्ग्रेस पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को पता था कि उन्हें चुनाव जितने के लिए नेहरू की लोकप्रियता की आवश्यकता है। नेहरू ने इसी कमजोरी का फायदा उठाया।

जवाहरलाल नेहरू ने पार्टी के मामलों में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष टंडन का सहयोग करना बंद कर दिया। अड़ियल रवैया वाले नेहरू ने संगठन की विभिन्न निर्णय लेने वाली समितियों को अपने पक्ष में करने के लिए एक राजनीतिक द्वंद्व छेड़ दिया। उन्होंने ‘धर्मनिरपेक्षता’ के मुद्दे पर टंडन का विरोध किया और अपनी यह सोच ज़ाहिर की कि इससे कोई समझौता नहीं हो सकता। आख़िर ऐसा हो भी क्यों न! टंडन उन विरले नेताओं में से थे, जिन्होंने धर्मान्तरण के ख़िलाफ़ अभियान छेड़ा था। यहाँ तक कि संविधान सभा में भी बहस करते हुए टंडन ने सभा को धर्मान्तरण की निंदा करने को कहा था। शायद नेहरू को टंडन में एक सॉफ्ट हिंदुत्व वाला नेता दिखता था और इसीलिए वह उनसे ख़फ़ा रहते थे।

जिस तरह गाँधीजी ने बोस के साथ किया था, नेहरू उससे भी दो क़दम आगे बढ़ गए। देश के प्रधानमंत्री ने देश की सबसे बड़ी और सत्ताधारी पार्टी के अध्यक्ष के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया था। गाँधी-बोस एपिसोड और नेहरू-पटेल एपिसोड एक बार फिर से ख़ुद को दोहरा रहा था। भले ही इस बार नेहरू के सहयोग के लिए हमेशा की तरह गाँधीजी नहीं थे लेकिन नेहरू ने इतना तो अब तक सीख ही लिया था कि ऐसे मसलों को कैसे हैंडल करना है। 1952 में होने वाले लोकसभा चुनाव को लेकर कॉन्ग्रेस पार्टी के भीतर एक भय का माहौल था। यूपी में कॉन्ग्रेस की जड़ों को गहरे तक स्थापित करने वाले टंडन अपनी लोकप्रियता से पूरे भारत में शायद चुनाव नहीं जिता सकते थे, ऐसा पार्टी के अन्य नेताओं को लगता था।

2016 में आज़ादी की 70वीं वर्षगाँठ पर सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने राजर्षि टंडन के योगदानों को याद किया

इन राजनीतिक उठा-पटक के बीच पुरुषोत्तम दास टंडन ने ठीक वैसा ही त्याग किया, जैसा 1938 में बोस और 1946 में पटेल ने किया था। पार्टी के हित में और देश के भविष्य की सोचते हुए टंडन ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। अफ़सोस यह कि राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन को शायद इतिहास ने वो स्थान नहीं दिया, जो उन्हें मिलना चाहिए था। इसके बाद नेहरू कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बने। नेहरू ने देश और कॉन्ग्रेस, दोनों पर ही राज किया। पटेल की मृत्यु के बाद कॉन्ग्रेस में नेहरू का कोई प्रतिद्वंद्वी भी नहीं रहा और पार्टी और देश, दोनों के ही सत्ता के सिरमौर वही रहे। राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन को अपनी ज़िंदगी कॉन्ग्रेस के लिए खपाने का इनाम राजनीतिक वनवास के रूप में मिला।

हालाँकि, 1952 और 1956 में उन्हें राज्यसभा के लिए चुना गया लेकिन उनकी सक्रियता कम होती चली गई। अहिंसावादी टंडन स्वास्थ्य कारणों से भी राजनीति से दूर रहने लगे थे। उनके बारे में कहा जाता है कि वह रबर का चप्पल पहना करते थे क्योंकि हिंसा के विरुद्ध चमड़े की चीजों से उन्होने दूरी बना ली थी। उनके बारे में एक कहानी बड़ी प्रचलित है। एक बार जब वह संसद में अपना वेतन लेने पहुँचे, तो उन्होंने अधिकारियों को वो रुपए तत्काल पब्लिक सर्विस फंड में ट्रांसफर करने को कहा। हतप्रभ अधिकारियों व नेताओं ने उनसे पूछा कि आपको 400 रुपए ही मिलते हैं और वो भी आप देशसेवा में दे देना चाहते हैं? इस पर राजर्षि ने कहा कि उनके सातों बेटे नौकरी कर रहे हैं और वे सभी उन्हें 100-100 रुपए हर महीने भेजते हैं।

उन्होंने कहा कि उसमें से वे 300-400 रुपए ख़र्च करते हैं और बाकी के समाज सेवा में लगा देते हैं। उन्होंने अपने संसदीय वेतन के बारे में कहा कि यह मेरी अतिरिक्त कमाई है और इसकी मुझे कोई ज़रूरत नहीं है, इसलिए यह समाज सेवा में जाएगा। टंडन के निःस्वार्थ जीवन को देखते हुए महात्मा गाँधी उन्हें ‘राजर्षि’ कह कर पुकारा करते थे। देश का शायद यह दुर्भाग्य रहा कि उनके जैसे नेता की सेवा कुछ और दिन नहीं मिल पाई। अगर उन्हें कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पद त्यागने को मजबूर न किया गया होता तो शायद देश और कॉन्ग्रेस को उनके अनुभव और ज्ञान से और लाभ मिलता। लेकिन अफ़सोस, जिस नेहरू ने कहा था कि टंडन की जीत को वह अपने ख़िलाफ़ ‘अविश्वास प्रस्ताव’ मान कर पीएम पद से इस्तीफा दे देंगे, अपनी इस धमकी से वह तो अपने पद पर बने रहे और पार्टी अध्यक्ष भी बने लेकिन लोकतान्त्रिक तरीके से जीते टंडन को राजनीतिक वनवास पर जाना पड़ा।

VIDEO: सूखी नदी में बनाया जा रहा था पुल, अचानक आई पानी की तेज़ धार में फँसे 7 मजदूर

मध्य प्रदेश में एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसे जान कर आप भी चौंक जाएँगे। दरअसल, यहाँ एक सूखी नदी में पानी की तेज़ रफ़्तार वाली धार ने सभी मज़दूरों को फँसा दिया। सूखी नदी में ये सारे मजदूर पुल बनाने का काम कर रहे थे और इन्हें दूर-दूर तक पानी के आने की कहीं से भी आशंका नहीं थी। हालाँकि, बाद में सभी मजदूरों को सुरक्षित बचा लिया गया। नीचे संलग्न की गई वीडियो में आप इस घटना को देख सकते हैं कि कैसे जल से विहीन नदी में अचानक से पानी की तेज़ धार आ गई।

जानकारी देते चलें कि पिछले वर्ष 2018 में मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में भी इसी तरह की एक घटना सामने आई थी। वहाँ बारिश के कारण नाले का जलस्तर अचानक से बहुत ज्यादा बढ़ गया था और इसकी वजह से कार पानी के तेज बहाव में बह गई थी। उस दुर्घटना में 4 कार सवारों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था।

ताज़ा मामले में भी ऐसा ही कुछ देखा जा सकते है जो यह बताता है कि पानी की तेज़ धार अगर सामने आ रही है तो वह किसी को भी नहीं बख्शती। मंदसौर वाली घटना में ग्रामीणों के लाख मना करने के बावजूद कार सवारों ने आगे जाने की सोची और फिर उनकी मौत हो गई। यह उनके लिए सबक है जो पानी की धार से मज़ाक करते हैं या इसे हलके में लेते हैं।

बौद्ध, जैन, सिख, यहूदी, पारसी: इन्हें कभी ‘इनटॉलेरेंस’ की पीड़ा क्यों नहीं होती?

जिस अमेरिकी कमीशन ने हिंदुस्तान में ‘डर का माहौल’ के झूठे कथानक (नैरेटिव) पर अपनी अनिमंत्रित चौधराहट की मुहर लगाई, उसी कमीशन के चेयरपर्सन डॉ. तेंज़िन दोरजी ने कमीशन के बहुमत से अलग न केवल राय रखी बल्कि संख्याबल से दबाए जाने पर कमीशन की रिपोर्ट से अलग राय का असहमति-पत्र (डिसेंट नोट) लिखा। इस नोट में डॉ. दोरजी ने साफ-साफ लिखा कि कमीशन की रिपोर्ट ने हिंदुस्तान का जो चित्रण किया है, उनके व्यक्तिगत अनुभव उससे कतई मेल नहीं खाते। उन्होंने बताया कि एक तिब्बती बौद्ध होने के नाते वह हिंदुस्तान के सबसे कमज़ोर अल्पसंख्यक वर्ग के तौर पर 30 वर्ष रहे हैं। इस दौरान उन्होंने “पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता” का अनुभव किया है।

‘खुला समाज, सुदृढ़ लोकतंत्र और न्यायपालिका’

डॉ. दोरजी ने हिंदुस्तान को महान सभ्यता और प्राचीन समय से ही बहुपंथिक, बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक समाज बताया। उन्होंने लिखा कि हालाँकि छिटपुट हिंसक घटनाएँ (जो दुर्भाग्यपूर्ण, गैरकानूनी और गलत हैं, इसमें कोई दोराय नहीं) होती रहतीं हैं, लेकिन हिंदुस्तान के बहुपंथिक और सेक्युलर (लिबरल गैंग के नीम-हकीमी अर्थ में नहीं, सही अर्थ में) होने में कोई शक नहीं। वह दलाई लामा को भी उद्धृत करते हुए कहते हैं कि हिंदुस्तान की भिन्नता, समरसता और आदर व करुणा के कायल दलाई लामा भी हैं।

डॉ. दोरजी अपने भारतीय ‘गृह-राज्यों’ कर्नाटक और हिमाचल का ज़िक्र करते हुए उनकी और समूचे हिंदुस्तान की तुलना तिब्बत पर कब्ज़ा किए हुए चीन से करते हैं। वह बताते हैं कि कैसे हिंदुस्तान में समृद्ध हो रही तिब्बती भाषा और संस्कृति खुद तिब्बत में चीनी बूटों तले दम तोड़ रहे हैं।

इतिहास भी करता है तस्दीक

डॉ. दोरजी के इन कथनों की तस्दीक हिंदुस्तान का समूचा इतिहास भी करता है- चाहे आप कितने हज़ार साल भी चले जाएँ। दुनिया के सबसे छोटे और प्राचीनतम धार्मिक समूहों में शामिल पारसियों से लेकर यहीं वैदिक समाज से विद्रोह कर उत्पन्न हुए बौद्धों, जैनों, सिखों और इस्लाम-ईसाईयत के पुरोधा यहूदियों तक हिंदुस्तान में विभिन्न ही नहीं, परस्पर विरोधी आस्था के लोग हज़ारों सालों से रहते आए हैं। यहूदी तो दुनिया की सबसे प्रताड़ित कौम हैं, और इतनी सदियों में इकलौता हिंदुस्तान है, जहाँ कभी उन्हें मज़हबी वजह से निशाना नहीं बनाया गया।

आखिर ख़ास समुदाय और ईसाईयों में से ही क्यों आती है “इनटॉलेरेंस” की शिकायत?

अगर उपरोक्त बातें सही हैं, कि हिंदुस्तान की संस्कृति सर्व-समावेशी और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की है, तो सवाल यह है कि आखिर आज ‘इनटॉलेरेंस’ का इतना बाजा क्यों बज रहा है? तो जवाब जानने के लिए समकालीन हिन्दू समाज के साथ-साथ यह शोर जिस तबके से आ रहा है, उसकी ओर भी एक नज़र गहराई से डालना ज़रूरी हो जाता है।

आखिर ऐसा क्यों है कि हिंदुस्तान में सारी दिक्कतें केवल दो पंथों इस्लाम और ईसाईयत को मानने वालों को ही हो रहीं हैं? क्या इसका कारण यह है कि हिंदुस्तान की बहुसंख्यक आबादी हिन्दुओं का इन दोनों मज़हबों से कोई खास बैर है? या फिर ये कि इन पंथों की विचारधारा या इनके अनुयायियों के आचरण में कुछ ऐसा है जो इनके अन्य के साथ टकराव का कारण बन जाता है?

अगर खोट हिन्दुओं में है तो यहूदी क्यों नहीं शिकार?

अगर एकबारगी यह मान लिया जाए कि खोट हिन्दुओं में ही है, हिन्दुओं में इस्लाम और ईसाईयत के प्रति शत्रुता किसी बहाने ‘इनबिल्ट’ है, तो सवाल यह उठेगा कि इसी विचारधारा के पूर्ववर्ती यहूदियों को हिंदुस्तान में कोई दिक्क्त क्यों नहीं हुई? यहूदियों में भी ‘एक ही अदृश्य, अव्यक्त ईश्वर; मूर्तिपूजा/अन्य किसी शक्ति की उपासना अनंतकाल के नर्कभोग वाला पाप’ आदि अधिकांश वही सब बातें मान्य हैं जो इस्लाम और ईसाईयत में प्रचलित हैं। जहाँ तक मेरी जानकारी है, बड़ा अंतर खाली अंतिम नबी के सवाल पर है- यहूदी इंतजार में हैं, ईसाईयों के हिसाब से ईसा थे, इस्लाम के हिसाब से हज़रत मोहम्मद। क्या इतने से ही हिन्दू भड़के हुए हैं?

या फिर जबरिया मतांतरण की ज़िद है ‘इनटॉलेरेंस’ की जड़ में?

अब दूसरी संभावना पर गौर करते हैं- कि हिन्दू विरोध इस्लाम और ईसाईयत की विचारधारा का नहीं करते, मजहब विशेष और ईसाई अपने दिमागों में क्या सोचते हैं इसका नहीं करते, बल्कि विरोध करते हैं कि अपनी सोच, अपना पंथिक आग्रह दूसरों पर थोपने की प्रवृत्ति का। विरोध करते हैं ईसाईयों के हिन्दुओं के पवित्र प्रतीक चिह्नों को ‘हड़प’ कर उन्हें हिंदुत्व से लोगों को काटने के प्रयोग का। विरोध करते हैं हिंसा और ज़ोर-ज़बर्दस्ती से लोगों के मतांतरण का, जो समुदाय विशेष द्वारा किए जाने की खबरें हम सुनते रहते हैं।

यहूदी इसी मामले में इस्लाम और ईसाईयत से अलग हैं- वे भले यह मानें कि हिन्दू ‘पापी’ हैं और नर्क के भागी होंगे मरने के बाद, लेकिन वे अपना मत, अपनी आस्था थोपते नहीं हैं। पारसियों में (जहाँ तक मेरी जानकारी है, जोकि शायद बहुत ज़्यादा नहीं है) ‘अहुरों’ की पूजा होती है और ‘दैवों’ की निंदा- सुनने में ऐसा लगता है (जोकि सम्भवतः सही न भी हो) मानो जिन असुरों के विरुद्ध हिन्दू देवता लड़ते थे, शायद पारसी उन्हीं के पूजक हैं। लेकिन तब भी कभी पारसी-विरोधी हिंसा क्यों नहीं हुई? क्योंकि उन्होंने कभी अपनी अहुर-पूजा को हिन्दुओं पर लादने की कोशिश नहीं की- न तलवार के दम पर, न पिछले दरवाज़ों से।

एक और बात, इस लेख में उठाना पढ़ रहा कोई छद्म-लिबरल उठाने को यह भी सवाल उठा सकता है कि हो सकता है ईसाईयों और समुदाय विशेष ने हिंदुत्व (हिन्दू धर्म) की ऐसी कोई विद्वत्तापूर्ण निंदा या आलोचना की हो जो और कोई पंथ न कर पाया हो, और यह ‘असहिष्णुता’ उस वजह से हो। हो “सकता” है, पर ऐसा है नहीं। है इसका उलट। इस्लामिक इतिहास हिंदुस्तान में अधिकाँश समय मंदिर-ध्वंस, बलात्कार और सामूहिक हत्याकांड, आदि का रहा है- और अब तो यह छद्म-लिबरल भी मानने को मजबूर हैं। और ईसाई ‘विद्वानों’ ने तर्कपूर्ण आलोचना तो दूर की बात, अनुवाद भी फ़र्ज़ी किए ताकि आर्यन आक्रमण थ्योरी की आड़ में हिन्दुओं को बाँटकर चर्च का साम्राज्य फैलाया जा सके।

वहीं बौद्धों ने वैदिक ऋचाओं से लेकर कर्मकांडों की, जैनों ने वैदिक यज्ञ-हिंसा से लेकर युद्ध में हिंसा करने वाले राम-कृष्ण जैसे अवतारों की आलोचना में ग्रंथ-के-ग्रंथ लिखे हैं, जिस पर सदियों हिन्दुओं ने बहस की है, शास्त्रार्थ हुए हैं, हिन्दुओं और अन्य ने एक-दूसरे के आगे सर मुड़ाया है, शिष्यत्व स्वीकार किया है। लेकिन मंदिर ढहाना, आर्य-द्रविड़ का कृत्रिम भेद खड़ा करने जैसे काम नहीं हुए हैं। हिन्दुओं ने तो किसी भी प्रकार की परा-शक्ति को नकारने वाली चार्वाक परम्परा को भी ऋषि-परम्पराओं में स्वीकार किया है। अतः डॉ. दोरजी के इस बयान के आलोक में इस्लाम के समर्थकों और ईसाईयों को आत्म-विवेचन करने की जरूरत है कि ‘इनटॉलेरेंस’ के लिए जिम्मेदार ‘भगवाकरण’ है, ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ है, या हिन्दुओं को आक्रामकता अख्तियार करने के लिए मजबूर करने वाले उनके आचरण।

लखनऊ इमामबाड़ा में ‘छोटे कपड़ों’ में नहीं मिलेगी एंट्री, मौलवियों ने कहा यह कोई पर्यटन स्थल नहीं

अब लखनऊ के इमामबाड़े में लड़कियों के कपडे देख कर उन्हें एंट्री दी जाएगी। जहाँ दुनियाभर में महिलाओं को समानता का अधिकार दिए जाने वाली बात की जा रही है, इमामबाड़े का यह निर्णय हैरान कर देने वाला है। मुस्लिम धर्मगुरुओं के सुझावों के बाद जिला प्रशासन ने यह निर्णय लिया है। कोई भी महिला अब शॉर्ट्स पहन कर इमामबाड़े के परिसर में नहीं घुस सकेगी। इसकी निगरानी की ज़िम्मेदारी सिक्योरिटी गार्ड्स को सौंपी जाएगी। इमामबाड़े के परिसर में अब प्रोफेशनल शेयरिंग और फोटोग्राफी भी नहीं होगी। इन सब पर रोक लगा दिया गया है। सीसीटीवी कैमरे भी लगाए जाएँगे।

शिया समुदाय के साथ हुई बैठक के बाद जिला प्रशासन ने फरमान जारी किया कि छोटे कपड़े पहनने वाली कोई भी लड़की या महिला इमामबाड़े के परिसर में प्रवेश नहीं कर सकेंगी। जिला प्रशासन के अनुसार, इमामबाड़े की पवित्रता को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया गया है कि वहाँ शार्ट स्कर्ट्स और छोटे कपड़े पहनने वाली महिलाओं की एंट्री प्रतिबंधित की जाएगी। अब पर्यटकों को भी पूरे कपड़े पहनने होंगे।

जिला प्रशासन ने कहा है कि गार्ड्स को इस बात के लिए अनुमति दे दी गई है कि वे ‘धार्मिक भावनाएँ आहत करने वाले और अश्लील’ कपड़ों में किसी भी पर्यटक को अंदर न घुसने दें। पर्यटकों को ‘गरिमामय’ कपड़े पहनने की सलाह दी गई है। प्रशासन ने कहा कि बार-बार ये शिकायतें आ रही थीं कि लोग बड़े एवं छोटे इमामबाड़े में ‘अशोभनीय’ कपड़े पहन कर आ रहे हैं। इसके बाद नाराज़ शिया मुस्लिम धर्मगुरुओं ने पीएम मोदी व सीएम योगी को पत्र लिख कर मामले से अवगत कराया। शिया धर्मगुरुओं ने माँग की कि इमामबाड़े में भी स्वर्ण मंदिर की तरह ही ड्रेस कोड लागू किया जाए।

बैठक में हुसैनाबाद एलाइड ट्रस्ट और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। मौलवियों का कहना है कि बड़ा इमामबाड़ा कोई पर्यटन स्थल नहीं है। यह 235 साल पुरानी ऐतिहासिक इमारत है। इस धरोहर का अपना इतिहास है। यह मुस्लिमों की भावनाओं से जुड़ा स्थल है। इसलिए इसकी धार्मिक पवित्रता को बनाए रखना जरूरी है। सारे मौलवी इस बात से भी नाराज़ हैं कि इमामबाड़ा परिसर में युवा जोड़े एक-दूसरे से प्यार का इजहार करते नज़र आते हैं।

टीम इंडिया की नई जर्सी से 2019 के ‘भगवाकरण’ और 2001 में गांगुली के गंडे-ताबीज़ का कनेक्शन जोड़ रहे हैं लिबरल

टीम इंडिया की नई जर्सी लिबरलों को कितना दुःख दे रही है, राष्ट्रवादियों को इसका ज़रा भी इल्म नहीं है। मोदी के हाथों मुँह की खाने के बाद उनकी ‘भगवा’ से ही एलर्जी बढ़ गई है। जैसे सावन के अंधे को हर जगह हरा ही हरा दिखता है, उसी तरह हमारे लिबरल राजनेताओं और पत्रकारों को हर भगवे में ‘मोदी के एजेंट’ दिखने लगे हैं। और उन्हें पूरी तरह दोष भी नहीं दिया जा सकता- पाँच साल खटने के बाद 303-52 की हार किसी को भी मानसिक तौर पर ‘हिला देगी’।

कुछ के दिमाग तो इतने ज्यादा ध्वस्त हो गए हैं कि उन्हें अब जीतती हुई टीम इंडिया पर भी आपत्ति होने लगी है। एक फैन फहद मसूद (किस विशेष समुदाय का, यह बताने की ज़रूरत नहीं है) को कोहली एंड कम्पनी की जीत भी ‘पत्थरदिल विजेता’ लगने लगी!

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यह महज़ एक आदमी का फितूर नहीं है- हर दूसरे-तीसरे छद्म-लिबरल से बात करिए तो वह ‘उन पुराने दिनों’ की ही याद में विषादी हुए जा रहे हैं। टॉलरेंस, ‘सरल समय’, ‘ओल्ड-फैशन्ड’ के पीछे नेहरूवियन भारत की जो याद है, वह असल में उसी निकम्मेपन की सताती हुई याद है, जिसमें एक मुट्ठी-भर लोगों के पास हर तरह की सुविधा थी, और बाकी लोगों के पास केवल संघर्ष था। उसी का प्रतिबिम्ब वह क्रिकेट टीम में देख कर खुश होते थे कि एक बार में खाली एक-आध खिलाड़ी चल रहे हैं और बाकियों को ढो रहे हैं।

आज भारत और भारत की क्रिकेट टीम दोनों में कुशलता बढ़ गई है। कई सारे स्टार आ गए हैं। कई लोग अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं और प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। यह उन्हें अजीर्ण का मरीज बना रहा है, जो न केवल अकुशल, अक्षम टीम और देश के आदी थे, बल्कि कारक भी।

कोहली EVM पर जाकर किस पार्टी का बटन दबाते हैं, यह तो शायद ही कोई पक्का कह सकता है, लेकिन मीडिया गिरोह को तो पक्का कोहली और मोदी में समानता दिखती होगी- एकमनस्क भाव से लक्ष्य का पीछा, और उसकी प्राप्ति। ‘निष्ठुर’ और निर्बाध बढ़ रहे दोनों के विजय-रथ से खुद असफलता-पर-असफलता झेल रहे लिबरलों के दिलों में डाह की आग तो सुलगनी ही थी, और उस पर ‘भगवा पेट्रोल’!

कोहली से मन नहीं भरा, ‘दादा’ को भी घसीट लिया

लेकिन केवल कोहली और भगवा जर्सी पर नाराज़गी जताने से मन नहीं भरा तो लिबरल गिरोह ने ‘समय-यात्रा’ कर के मोदी के भगवाकरण प्लान में गांगुली का 2001 में टी-शर्ट लहराना शामिल कर लिया। उनके हिसाब से गांगुली के लॉर्ड्स में टी-शर्ट लहराते समय उनके शरीर पर मौजूद गंडे-ताबीज़ आदि धार्मिक और आस्था के प्रतीक-चिह्न ‘शर्मनाक’ और ‘अंधविश्वासी’ थे!

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प्रिय लिबरलों, आपकी ही सलाह आपके लिए: खेल को खेल रहने दें। राजनीति का अड्डा न बनाएँ।

बॉलीवुड का ‘दंगल’ छोड़ने पर उमर अब्दुल्ला और फ़ैसल ने ज़ायरा का किया समर्थन

नेशनल अवॉर्ड जीत चुकी एक्ट्रेस ज़ायरा वसीम के बॉलीवुड छोड़ने के फ़ैसले का जम्मू-कश्मीर के नेताओं ने समर्थन किया है। समर्थन के साथ-साथ ज़ायरा को भविष्य के लिए शुभकामनाएँ भी दी हैं। 

जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्वीट किया और लिखा, “ज़ायरा वसीम की पसंद पर सवाल उठाने वाले हम कौन होते हैं? वो जैसे चाहें वैसे अपनी ज़िंदगी जिएँ। मैं बस उन्हें शुभकामना दे सकता हूँ और कामना करता हूँ कि वो जो करें उससे उन्हें ख़ुशी मिले।”

इसके अलावा, भारतीय प्रशासनिक सेवा छोड़कर राजनीति में उतरने वाले शाह फ़ैसल ने शुभकामनाएँ देते हुए कहा कि वो ज़ायरा वसीम फ़ैसले का सम्मान करते हैं। अपने ट्वीट में फ़ैसल ने लिखा, “मैंने ज़ायरा वसीम के एक्ट्रेस बनने के फ़ैसले का हमेशा सम्मान किया। शायद ही किसी अन्य कश्मीरी ने इतनी कम उम्र में इस तरह की लोकप्रियता और ऐसी सफलता हासिल की हो। आज जब उन्होंने फ़िल्म जगत छोड़ा ही है तो मेरे पास उनके फ़ैसले का सम्मान करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। उन्हें शुभकामनाएँ।”

दरअसल, ज़ायरा वसीम ने यह कहकर बॉलीवुड को बॉय-बॉय कह दिया कि अपने काम से ख़ुश नहीं हैं। अपने फेसबुक पेज पर उन्होंने लिखा कि वो ख़ुश इसलिए नहीं हैं क्योंकि बॉलीवुड उन्हें उनके अल्लाह और उनके मज़हब इस्लाम से दूर कर रहा था। उन्होंने यह भी कहा कि हालाँकि बॉलीवुड ने उन्हें बहुत प्रेम और समर्थन दिया है, लेकिन उनके ईमान से दूर कर दिया है।

कोई भी पलायन नहीं कर रहा है, अब जब हम सत्ता में हैं, कौन पलायन करेगा: योगी आदित्यनाथ

उत्तर प्रदेश के मेरठ में हिन्दू परिवारों के पलायन की ख़बरों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने माइग्रेशन एंगल को ख़ारिज कर दिया और कहा कि व्यक्तिगत विवादों के कुछ मामले हो सकते हैं, लेकिन माइग्रेशन की ख़बर झूठी है।

आज एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए, सीएम योगी ने कहा, “कोई भी पलायन नहीं कर रहा है, अब जब हम सत्ता में हैं, कौन पलायन करेगा?”

दरअसल, NaMo ऐप पर एक भाजपा नेता द्वारा हाल ही में दावा किया गया था कि मेरठ के प्रहलाद नगर से कम से कम 125 हिन्दू परिवारों ने इलाक़े में मुस्लिम महिलाओं द्वारा हिन्दू महिलाओं के उत्पीड़न के कारण पलायन किया है। इस क्षेत्र में मुस्लिम बहुसंख्यक हैं जबकि हिंदू परिवारों की संख्या 425 के आसपास है।

NaMo ऐप पर मिली शिक़ायत को प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) द्वारा मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) को भेज दिया गया, जिसके बाद इस मामले पर रिपोर्ट माँगी गई। मेरठ के बीजेपी सांसद राजेंद्र अग्रवाल ने स्थिति को गंभीर बताते हुए कहा कि वह सीएम से इस बारे में बात करेंगे। विश्व हिंदू महासभा द्वारा पत्र लिखकर मेरठ में हिन्दुओं के लिए सुरक्षा की माँग की गई थी।