बाजार नियामक The Securities and Exchange Board of India (SEBI) ने न्यू दिल्ली टेलीविज़न लिमिटेड (NDTV) पर 12 लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। यह जुर्माना शेयर बाजार को समय पर जानकारी न देने के कारण लगाया गया। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने पाया कि एनडीटीवी ने नियम के तहत सूचनाएँ सार्वजनिक करने के मामले में चूक की, जिसके बाद यह आदेश दिया गया। एनडीटीवी के ख़िलाफ़ शेयरों की बड़ी ख़रीद और अधिग्रहण के नियम का अनुपालन न करने का मामला पाया गया है। अपने आदेश में सेबी ने अधिक जानकारी देते हुए बताया:
“जनवरी 2018 में इंडियाबुल्स फाइनेंसियल सर्विसेज ने एनडीटीवी के 40 लाख शेयरों का अधिग्रहण किया था। यह कम्पनी की कुल शेयर पूँजी का 6.4% है। एनडीटीवी के प्रमोटर्स ने जुलाई 2018 में 20.28% शेयर पूँजी का अधिग्रहण किया। नियमानुसार, इस प्रक्रिया के बाद कम्पनी को सम्बंधित प्रावधानों के अंतर्गत इससे जुड़ी ज़रूरी जानकारियाँ देनी थीं, जो उसने नहीं की। एनडीटीवी को इस से जुड़ी जानकारियाँ बीएसई और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज से भी साझा करनी थीं। जबकि, कम्पनी ने इस बातों को छुपाया और जानकारी देने में देरी की।”
एनडीटीवी ने अपने शेयरों में हुए बदलाव व इंडियाबुल्स के साथ हुए समझौते के बाद समय पर सब कुछ खुलासा नहीं किया, इसीलिए उस पर 12 लाख रुपए का जुर्माना लगाने का निर्णय लिया गया। इससे पहले एक मामले में NDTV के दोनों प्रमोटरों प्रणय रॉय और राधिका रॉय पर कम्पनी में किसी भी प्रकार का पद लेने से 2 साल का प्रतिबन्ध लगा दिया था। नियामक ने दोनों के होल्डिंग्स और म्यूच्यूअल फंड को भी सीज कर दिया था। सेबी ने अपनी जाँच में पाया था कि इन्होंने आईसीआईसीआई बैंक से 375 करोड़ रुपए का क़र्ज़ ले रखा था, जिसे बाद में वीसीपीएल से 350 करोड़ का क़र्ज़ लेकर चुकाया।
Markets regulator SEBI has imposed a penalty of Rs 12 lakh on New Delhi Television Ltd (@ndtv )https://t.co/04LqM1iGiI
सेबी ने कहा कि बाकी शेयरधारकों से इन बातों को छुपाया गया क्योंकि लोन लेने के दौरान तय हुई शर्तों के तहत वीपीसीएल एनडीटीवी में 30% तक शेयर हासिल करने की क्षमता रखता था। बाद में मंगलवार (जून 18, 2019) को ‘The Securities Appellate Tribunal (SAT)’ ने सेबी द्वारा रॉय दम्पति के कोई पद न लेने वाले निर्णय पर रोक लगा दी। सैट ने कहा कि ऐसा करना कम्पनी के शेयरधारकों के हित में नहीं होगा। एजेंसी ने सेबी से रॉय दम्पति को प्रत्युत्तर देने के लिए तीन सप्ताह का समय देने को कहा।
Listed Company cannot remain headless: SAT stays SEBI order against Radhika Roy, Prannoy Roy
रॉय दम्पति व एनडीटीवी की एक अन्य शेयरधारक कम्पनी आरआरपीआर होल्डिंग्स द्वारा इस तरह से क़र्ज़ लेने व समझौते करने से बाकी के निवेशकों को कम्पनी की माली हालत के बारे में अंदाज़ा नहीं लगा, जिस कारण सेबी ने एक्शन लिया। फिलहाल इस मामले में रॉय दम्पति के प्रत्युत्तर के बाद एजेंसियाँ आगे का निर्णय लेंगी। प्रणय रॉय और राधिका रॉय ने बयान जारी कर सेबी के आदेश को क़ानूनी रूप से ग़लत एवं नियमों के ख़िलाफ़ बताया था। उनका आरोप था कि जिन बातों को आधार बना कर ये आदेश दिए गए हैं, उसके बारे में उन्हें भेजे गए ‘कारण बताओ नोटिस’ में कोई चर्चा ही नहीं थी।
कॉन्ग्रेस ने पूर्व मंत्री रौशन बेग को पार्टी-विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने के आरोप में पार्टी से निलंबित कर दिया है। हाल ही में उन्होंने लोकसभा चुनाव में करारी हार को लेकर पार्टी के शीर्ष नेताओं की आलोचना की थी, जिस कारण उन्हें कर्नाटक प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी ने निलंबित करने का निर्णय लिया। कॉन्ग्रेस ने कहा कि प्रदेश यूनिट की तरफ से की गई सिफारिश को स्वीकार करते हुए रौशन बेग को निलंबित किया जाता है। पार्टी ने कहा कि यह निर्णय इस मामले की जाँच पूरी करने के बाद लिया गया। रौशन बेग ने पूर्व मुख्यमंत्री सिद्दारमैया को ‘दम्भी’ बताया था और प्रदेश कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष दिनेश गुंडु राव को ‘अपरिपक्व’ कहा था।
रौशन बेग 7 बार विधायक रह चुके हैं और वह कॉन्ग्रेस-जेडीएस गठबंधन सरकार में मंत्रीपद न मिलने से नाराज़ चल रहे थे। उनके क्षेत्र शिवाजीनगर में एक पोंजी स्कीम से भी उनका नाम जुड़ा है, जिसे आईएमए ज्वेल्स द्वारा शुरू किया गया था और इसके तहत सैकड़ों निवेशकों के साथ धोखाधड़ी की गई थी। इन निवेशकों में अधिकतर मुस्लिम हैं। रौशन ने इन आरोपों से इनकार किया लेकिन सीनियर कॉन्ग्रेस नेताओं का कहना है कि रौशन ने आईएमए ज्वेल्स के संस्थापक मंसूर खान के साथ उन लोगों से संपर्क साधा था। एक ऑडियो क्लिप भी काफ़ी सर्कुलेट हुआ था, जिसमें मंसूर यह कहते पाए गए थे कि उन्होंने बेग को 400 करोड़ रुपए दे रखे हैं, जो उन्हें अभी तक नहीं लौटाया गया।
कर्नाटक कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष गुंडु ने मंगलवार (जून 18, 2019) को कहा कि इस स्कैम से रौशन बेग के साथ जुड़े तार को आलाकमान के ध्यान में लाया जाएगा। अभी एक स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम इसकी जाँच कर रही है और शिकायतकर्ता निवेशकों की संख्या 38,000 पार हो चुकी है। बताया जाता है कि यह 15,000 करोड़ का स्कैम है। लोकसभा चुनावों में राज्य में मिली बुरी हार के बाद कॉन्ग्रेस-जेडीएस गठबंधन की हालत ख़राब है और हाल ही में मंत्रिमंडल विस्तार कर के निर्दलियों को जगह दी गई ताकि सरकार को स्थिर रखा जा सके। एक अन्य पूर्व मंत्री रमेश जर्किहोली भी सरकार की आलोचना कर चुके हैं।
कॉन्ग्रेस ने रौशन बेग को निलंबित करने का निर्णय लिया
रौशन बेग ने हाल ही में अल्पसंख्यकों को ख़ास सलाह देते हुए कहा था कि अगर अगली बार भी राजग की सरकार बनती है तो वे लोग समझौता कर लें। उन्होंने कहा था कि राजग की सरकार बनने की स्थिति में उन्हें परिस्थितियों से समझौता कर लेना चाहिए। उन्होंने सलाह दी कि अगर ज़रूरत पड़ती है तो मुस्लिमों को भाजपा से हाथ मिलाने से भी नहीं हिचकना चाहिए। रौशन बेग समुदाय विशेष के बीच राज्य में जाना-पहचाना चेहरा हैं। उन्होंने समुदाय विशेष को सलाह देते हुए कहा था कि उन्हें किसी ख़ास पार्टी का वफ़ादार नहीं बने रहना चाहिए। उन्होंने कॉन्ग्रेस पर अल्पसंख्यकों की उपेक्षा करने का आरोप लगाते हुए यह भी कहा था कि पार्टी ने एक ही मुस्लिम को टिकट दिया है।
Karnataka MLA Roshan Baig suspended for anti-party activities/indiscipline. Sources : Baig indulged in anti-party activities during last LokSabha poll. A Lok Sabha candidate from Karnataka had complained about him to Cong Chief Rahul Gandhi & now Baig has been suspended by Aicc
कहा जा रहा है कि रौशन बेग इसीलिए भी नाराज़ चल रहे थे क्योंकि राज्य के अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री बी जेड अमीर अहमद ख़ान का क़द राजनीति में लगातार बढ़ रहा है और वह उनकी जगह मुस्लिमों का चेहरा बन सकते हैं।
सार्वजनिक या सरकारी जमीनों का धर्म के नाम पर अतिक्रमण होना आम है। छोटे-मोटे स्तर पर यह हर जगह देखने को मिल जाता है। लेकिन है यह गैरकानूनी। पश्चिम दिल्ली लोकसभा क्षेत्र से भाजपा के सांसद प्रवेश साहिब सिंह ने अब इसके खिलाफ आवाज उठाई है। सांसद साहिब सिंह ने दिल्ली के उप राज्यपाल अनिल बैजल को इस मामले से संबंधित एक पत्र लिखा है।
अपने पत्र में साहिब सिंह ने उप राज्यपाल बैजल को पश्चिमी दिल्ली लोकसभा क्षेत्र में सार्वजनिक भूमि पर मस्जिदों के गैर-कानूनी रूप से बढ़ते निर्माण को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने लिखा कि उनके संसदीय क्षेत्र में सरकारी जमीन, सड़कों, पार्कों और दूसरे अनुचित स्थानों पर मस्जिदों का निर्माण किया जा रहा है। इस ओर ध्यान दिलाते हुए सासंद ने उप राज्यपाल से इन गैर-कानूनी निर्माण कार्यों की जाँच की माँग की है।
सांसद प्रवेश साहिब सिंह ने अपने पत्र में गैर-कानूनी मस्जिद निर्माण से जुड़ी समस्याओं की ओर भी ध्यान दिलाया। उन्होंने लिखा कि सार्वजनिक जमीनों पर बनी मस्जिदों के कारण न सिर्फ ट्रैफिक की समस्या होती है, बल्कि आस-पास रहने वाले लोगों को भी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
इस समस्या के निदान के लिए सासंद साहिब सिंह ने एलजी से एक कमिटी गठित करने की माँग की। कमिटी की संरचना को लेकर उन्होंने सुझाव दिया कि इसमें एमसीडी, पीडब्ल्यूडी, एनडीएमसी, पुलिस, सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण विभाग के प्रतिनिधि तक शामिल होने चाहिए ताकि हर दृष्टिकोण से इस पर जाँच हो और उसके अनुरूप आवश्यक कदम उठाए जाएँ। साहिब सिंह का कहना है कि इस गंभीर मामले की जाँच संबंधित इलाके के डिस्ट्रिक मजिस्ट्रेट करें। सांसद ने यह भी सुझाव दिया कि संबंधित विभाग के अधिकारी जिन इलाकों में मस्जिद बने हैं, वहां का सर्वे करें।
उप राज्यपाल अनिल बैजल को इस मामले से संबंधित जो पत्र सासंद साहिब सिंह ने लिखा है, उसमें उन्होंने आगाह किया है कि अगर इस समस्या का निदान नहीं किया गया तो यह मामला आगे चलकर बहुत मुश्किल पैदा कर सकता है।
पूर्व मिस इंडिया यूनिवर्स उशोषी सेनगुप्ता ने फेसबुक पर अपनी दास्ताँ बयाँ की है, और बताया है कि कैसे 6 लड़कों ने उनकी गाड़ी के साथ अपनी बाइक भिड़ाने के बाद उनके ऊबर कैब के ड्राइवर को बेरहमी से पीटा, उसकी गाड़ी तोड़ दी और उशोषी के भी साथ बदतमीज़ी की। और इस दौरान कोलकाता की पुलिस मूकदर्शक बनी ज्यूरिस्डिक्शन-ज्यूरिस्डिक्शन (मेरा एरिया-उनका एरिया) खेलती रही। मामले की प्राथमिकी दर्ज करने से भी इनकार किया और मामला तूल पकड़ने के बाद ही ढंग से प्राथमिकी हुई।
फेसबुक पर सुनाया दर्द
उशोषी ने फेसबुक पर पोस्ट कर बताया कि कैसे देर रात जब वह एक समारोह में भाग ले कर ऊबर के कैब से निकलीं तो कैब में आकर कुछ लड़कों ने टक्कर मार दी। उसके बाद वे उनके ड्राइवर को निकाल कर पीटने लगे। जब ज़रा दूर खड़े पुलिस वालों से उन्होंने मदद माँगनी चाही तो उन्होंने यह कह कर मना कर दिया कि मामला उनके ‘अधिकार क्षेत्र’ के बाहर दूसरे थाने का है। उशोषी के दबाव बनाने पर जब पुलिस वाले आए तो वह लड़के भाग खड़े हुए।
लेकिन कैब का पीछा कर रहे लड़कों ने फिर से उन्हें रोका। इस बार उनका निशाना उशोषी थीं क्योंकि उन्होंने वारदात का वीडियो बना रखा था। लड़कों ने उशोषी को कार के बाहर घसीटा, और उनका फोन छीन कर तोड़ने की कोशिश की। स्थानीय लोगों के आ जाने पर उन्हें फिर भागना पड़ा। उशोषी ने अपने घर वालों और पुलिस को फोन किया। वहाँ पहुँची पुलिस ने फिर से ज्यूरिस्डिक्शन-ज्यूरिस्डिक्शन का नाटक शुरू कर दिया, और उशोषी की तो प्राथमिकी लिखी लेकिन ड्राइवर (जिसकी गाड़ी को बुरी तरह से क्षतिग्रस्त कर दिया गया था) की एफआईआर लिखने से मना कर दिया।
उशोषी ने तंज कसते हुए कहा, “अगर आपके साथ मारपीट, बदसलूकी, छेड़खानी या फिर मर्डर की घटना हो, तब पुलिस के पास जाने से पहले उनके सीमा क्षेत्र के बारे में जान लें, क्योंकि घटनास्थल पुलिस थाने की सीमा से 100 मीटर भी बाहर हुआ, तो वे मदद नहीं करेंगे।”
लड़के के हेलमेट न लगाने को लेकर उन्होंने लिखा, “आखिर 15 बाइक सवार लड़के बगैर हेलमेट के कैसे आसानी से कैब ड्राइवर को सरेराह पीट सकते हैं और गाड़ी को नुकसान पहुँचा सकते हैं? मुझे लगता है कि उन्होंने ड्राइवर को भीड़ के सामने धमका कर पैसे ऐंठने के लिए ऐसा किया।”
उशोषी ने घटना का ब्यौरा और वीडियो फेसबुक पर पोस्ट करते हुए लिखा:
तूल पकड़ने के बाद जागी कोलकाता पुलिस
जब इंडिया टुडे ने इस मामले को उठाया और मामला तूल पकड़ने लगा तो कोलकाता पुलिस ने ट्विटर पर सूचना दी कि सात लोगों को मामले में गिरफ्तार कर लिया गया है, और मामले की एफआईआर ‘बहुत सीनियर लेवल’ पर की गई है। लेकिन मामले में पहले हीला-हवाली करने वाले पुलिस अफसरों पर किसी भी तरह की कार्रवाई की सूचना इसमें भी नहीं है।
We have taken this incident very seriously and seven persons have been arrested so far. On the order of the Commissioner of Police, Kolkata, an inquiry regarding the non-registration of F.I.R. has been initiated into this incident, at a very senior level.
आने वाले चुनावों को देखते हुए दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने महिलाओं को मुफ्त मेट्रो सफर का वादा तो कर दिया है लेकिन हो सकता है कि केजरीवाल के इस ‘मुफ्त-मुफ्त-मुफ्त’ के चुनावी अजेंडे का दिल्लीवासियों को बड़ा भुगतान करना पड़े।
प्राइवेट पॉवर डिस्ट्रीब्यूशन कम्पनी टाटा पॉवर-DDL ने आम आदमी पार्टी सरकार को धमकी देते हुए स्पष्ट कहा है कि दिल्ली की सरकारी एजेंसियों द्वारा उनके साल भर से रोके गए करीब 7 करोड़ रुपए का भगुतान यदि नहीं किया गया तो वो अनाधिकृत इलाकों में लगी 50,000 स्ट्रीटलाइट्स की बिजली सप्लाई रोक देगी।
टाटा पॉवर-DDL ने, जो कि उत्तर दिल्ली में लगभग 10 लाख लोगों को बिजली सप्लाई दे रही है, जोर देते हुए कहा है कि वो 68 लाख रुपए हर महीने इन स्ट्रीटलाइट्स के रख-रखाव में ही खर्च करते हैं, लेकिन दिल्ली स्थित आम आदमी सरकार की एजेंसियों ने अभी तक उनके रुपयों का भुगतान नहीं किया है।
टाटा पॉवर-DDL के CEO संजय बंगा का कहना है, “कम्पनी ने दिल्ली मुख्य सचिव को इस मामले में संज्ञान लेने के लिए कह दिया है। उत्तर दिल्ली नगर निगम और दिल्ली स्टेट इंडस्ट्रियल एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन, दोनों ने ही इन स्ट्रीटलाइट्स की जिम्मेदारी लेने से मना कर दिया है, जिस कारण भुगतान की राशि बढ़ती ही जा रही है।”
आम आदमी पार्टी की सरकार द्वारा बकाया भुगतान ना किए जाने की वजह से स्ट्रीटलाइट्स की मेंटेनेंस प्रभावित हो रही है, जो कि इलाके चोरी, लूटपात, एक्सीडेंट और महिलाओं की सुरक्षा में एक बड़ा मुद्दा साबित हो सकता है।
हालाँकि, टाटा पॉवर-DDL ने कहा है कि वो उन जगहों का नाम अभी नहीं बताना चाहते हैं जहाँ पर लाइट सप्लाई बंद की जा सकती है और कम्पनी कब इस पर काम करना शुरू करने वाली है यह भी अभी स्पष्ट नहीं है। संजय बंगा के अनुसार, “हमें इस बात का एहसास यह एक बेहद जरूरी व्यवस्था है, जो कई प्रकार के अपराधों को रोकती है। इसलिए यह आवश्यक है कि भुगतान के कारण होने वाली समस्याओं को जल्द सुलझाया जा सके।”
अरविन्द केजरीवाल को यह समझना चाहिए कि लोग अपने मेट्रो सफर का किराया देने में सक्षम हैं लेकिन उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी दिल्ली सरकार के हाथ में है। साथ ही, यदि टाटा पॉवर-DDL भुगतान ना किए जाने की दशा में स्ट्रीटलाइट्स की बिजली आपूर्ति बंद कर देती है, तो यह अरविन्द केजरीवाल के दिल्ली के एकमात्र 24 घंटे बिजली आपूर्ति वाला शहर होने के दावे की भी पोल खोल सकता है।
14 जून को रात 9.25 पर एक लड़की हुडा सिटी सेंटर मेट्रो स्टेशन में बने स्टोर से निकल कर स्वचालित सीढ़ियों से नीचे उतर रही थी कि उसे ‘कुछ अजीब’ लगा। औरतों में सिक्स्थ सेन्स बहुत एक्टिव होता है, जिससे हम अमूमन खतरा भाँप ही लेतीं हैं। उस लड़की के ठीक पीछे एक लड़का हस्तमैथुन कर रहा था।
I was climbing down escalators just outside the store when I felt something was wrong at my back. When I turned, a guy was shagging just behind me and I realised that he masturbated on me. #gurgaonpolice#gurgaonmetro
यह एक सार्वजनिक स्थान था- एक मेट्रो स्टेशन। वह समय देर रात का नहीं था (हालाँकि, रात होने से भी पुरुष शिकारियों को कोई छूट नहीं मिल जाती, लेकिन महिलाएँ जब यौन उत्पीड़न की शिकायत करतीं हैं तो अक्सर ऐसे बहाने दिए जाते हैं)। और यह ऐसे स्थान पर था जोकि सीसीटीवी की निगाह में था।
अपनी मानसिक पीड़ा सुनाते हुए वह लड़की बताती है कि कैसे वह आदमी एक बार फिर अपना गुप्तांग उसे दिखाकर भाग खड़ा हुआ। वह बयाँ करती है कि कैसे वह सन्न रह गई कि ऐसी घटना मेट्रो स्टेशन के अंदर भी हो सकती है, जो महिलाओं के लिए सार्वजनिक परिवहन के लिहाज से सबसे सुरक्षित माना जाता है और जिसका महिलाओं द्वारा इस्तेमाल बढ़ाने के लिए दिल्ली के मुख्यमंत्री औरतों को मुफ्त की मेट्रो यात्रा से लुभा रहे हैं।
This gave him a window and he ran away again flashing at me. I ran outside towards the police chowki, and it was closed ! No one was around except a few distant standing police walas making their evening with autowalas. #gurgaonpolice
इसके बाद वह लड़की वही कहती है, जो केजरीवाल के इस चुनावी लोकलुभावन योजना से ज़्यादा ज़रूरी है। लगभग हर महिला की पहली प्राथमिकता है- हमें मुफ्त यात्रा नहीं, सुरक्षा चाहिए।
Should it be even a concern at the first place that women should take care of their safety themselves after it gets dark? Are we so ok with harassment and molestation and rapes that we have accepted them as a part of our society? #PMNarendraModi#PMModi#arvindkejriwal#DMRC
आप शायद ‘सुरक्षा’ के नाम पर महिलाओं को बस और मेट्रो में मुफ्त यात्रा करा सकते हैं, लेकिन आप यह कैसे सुनिश्चित करेंगे कि महिलाएँ यहाँ सुरक्षित हैं? हो सकता है कि मेट्रो बाकी सार्वजनिक परिवहन के साधनों से अधिक सुरक्षित हो लेकिन मेट्रो से घरों की कनेक्टिविटी पर आप क्या करेंगे? स्ट्रीट लाइट अक्सर काम नहीं करतीं अँधेरी गलियों में, और चेन-छिनैती या लूटपाट की घटनाएँ हो जातीं हैं। आप यह क्यों नहीं करते कि बिजली कंपनियों को उनकी बकाया राशि चुका दीजिए ताकि वह अपनी चेतावनी के मुताबिक स्ट्रीटलाइटों को बंद न कर दें क्योंकि आप उन्हें उनके पैसे नहीं दे रहे?
आपका विचार न केवल आर्थिक रूप से अव्यवहारिक है, बल्कि इसे ‘महिला सुरक्षा’ का कदम बताना आपकी पार्टी के अस्तित्व से भी ज़्यादा हास्यास्पद है।
भवदीया, दिल्ली की एक नागरिक
(OpIndia.com पर अंग्रेजी में प्रकशित मूल लेख का अनुवाद मृणाल प्रेम स्वरूप श्रीवास्तव ने किया है)
वामपंथी प्रोपेगैंडा पोर्टल The Wire ने आजकल नई ‘ब्रांच’ खोली है- झोलाछाप अर्थशास्त्र पढ़ाने की। और अपने पहले चैप्टर में लेकर आए हैं झोलाछाप नुस्खा, कि आखिर क्यों शर्तिया तौर पर वाहियात और आर्थिक रूप से बोझिल विचार होने के बावजूद महिलाओं को मेट्रो में मुफ़्त यात्रा करने देना चाहिए। इसमें अमेरिका में की गई एक रिसर्च को भारत में लागू कर देने से लेकर अर्थशास्त्रीय परिभाषाओं को शीर्षासन करा देने और टैक्स पर प्रवचन वगैरह काफी कुछ है। अगर किसी चीज़ की कमी है, तो केवल एक अदद तर्कसंगत वाक्य की, जिसे पढ़कर ऐसा लग सके कि हाँ भाई, मेट्रो महिलाओं के लिए मुफ्त कर दी जानी चाहिए।
सड़क के साथ तुलना कृत्रिम समानता (false equivalence), और स्पष्ट झूठ
लेखिका सानिका गोडसे यह तर्क करतीं हैं कि जिन लोगों को अपना टैक्स का पैसा महिलाओं की मुफ्त की मेट्रो यात्रा में ‘बर्बाद’ होता दिख रहा है, उन्हें आखिर इस पर क्यों शिकायत नहीं होती कि सड़क टैक्स के पैसे से बनती है, और उस पर बड़ी गाड़ियाँ लगभग मुफ्त में जगह घेर-घेर कर चलतीं हैं।
मुझे समझ नहीं आ रहा कि ऐसा तर्क देना वाला खुद अर्थशास्त्र में काला अक्षर भैंस बराबर है, या धूर्त वायर वाले अपने पाठकों को मूर्ख समझते हैं कि ज़रा सा विक्टिम-कार्ड खेल कर, महिला-सेंटीमेंट की अपील कर कुछ भी पढ़ा दो, पब्लिक इमोशनल मूर्ख है, पचा लेगी। गोडसे जी, पहली बात तो सड़कों पर यह गाड़ियाँ ‘लगभग मुफ़्त’ में नहीं चलतीं। वह रोड टैक्स देतीं हैं, टोल टैक्स देतीं हैं, उनके ईंधन पर टैक्स लगता है, और अगर ‘लग्ज़री’ गाड़ियाँ हैं तो ऊँची दर का जीएसटी और सरचार्ज भी लगता है।
इसके अलावा जिन टैक्स भरने वालों को अपने टैक्स के अनुपात में आउटरेज न करने और अपने टैक्स के बराबर ‘हिस्सेदारी’ न माँगने के लिए लताड़ रहीं हैं, अगर आपके इसी लॉजिक को वह हर जगह इस्तेमाल करने लगें तो आपकी रेवड़ी-नॉमिक्स धरी-की-धरी रह जाएगी। इस देश में आयकर देने वालों का अनुपात जनसंख्या के मुकाबले बहुत कम है- शायद 5% या 10%। आप जिस लॉजिक को ‘हर जगह लगाने’ की चुनौती दे रहीं हैं, अगर वह सच में ‘हर जगह’ लगने लगे, तो इस देश का गरीब कहाँ जाएगा? और तब आप ही यह प्रवचन भी लेकर आ जाएँगी कि टैक्स भरने वालों की ‘सामाजिक जिम्मेदारी’ है…
आपने कौन सा सर्वे किया जिससे आपको पता चला कि अधिकांश हिस्सा सड़कों पर निजी, महँगी गाड़ियाँ ही छेंक कर चलतीं हैं? या अपनी मर्जी से, शैम्पेन की चुस्की लेते हुए अपनी खिड़की के बाहर देखा और राष्ट्रीय सर्वेक्षण हो गया? शैम्पेन लिबरल्स का एसी में बैठकर गरीबनवाज़ बनना ही वामपंथ को लील रहा है। सुधर जाइए!
जवान, स्वस्थ पुरुषों ने आपका क्या बिगाड़ा है?
अगला आउटरेज गोडसे जी का यह है कि प्रधानमंत्री को हाल ही में पत्र लिखने वाले डीएमआरसी के पूर्व अध्यक्ष श्रीधरन इस पर चिंता क्यों जता रहे हैं कि आज महिलाओं को मुफ्त यात्रा करने की सुविधा दे दी गई तो कल बूढ़े, बीमार, विकलांग, छात्र आदि लगभग हर समूह पाने लिए मुफ्त यात्रा माँगने चला आएगा। इस पर वह यह आउटरेज करतीं हैं कि इसमें बुराई ही क्या है; सार्वजनिक स्थलों पर जवान, स्वस्थ पुरुषों की ‘ऐसी भीड़ जमा है’, सामाजिक न्याय के तहत सभी समूहों को बराबरी से सार्वजनिक स्थलों के इस्तेमाल का हक़ मिलने का स्वागत किया जाना चाहिए।
यह तर्क भी कोरी लफ़्फ़ाज़ी और अमेरिका से उठाए वामपंथी समाजशास्त्र को (जिसे वहाँ भी गालियाँ पड़ रहीं हैं, और दुत्कारा जा रहा है) धूर्तता से यहाँ लागू करने का प्रयास है। इसके लिए श्रीधरन के कथन को भी तोड़ने-मरोड़ने से गोडसे नहीं चूकतीं। न ही श्रीधरन ने जवान, स्वस्थ पुरुषों के अलावा बाकी सामाजिक समूहों के सार्वजनिक स्थलों के इस्तेमाल पर आपत्ति की थी, और न ही ऐसा है भी असल में कि जवान, स्वस्थ पुरुष सारी सार्वजनिक बेंचें, मेट्रो की सीटें, सड़क आदि घेर कर खड़े और बैठे हुए हैं, और औरों को आने नहीं दे रहे।
श्रीधरन ने यह चिंता जताई थी कि ऐसे हर समूह से माँग उठने लगेगी मुफ्त यात्रा की, और अगर सरकार उनकी माँगें मना करेगी तो किस न्यायसंगत आधार पर, और अगर मना नहीं करती तो आखिर मेट्रो चलाने का पैसा आएगा कहाँ से? क्या जवाब है गोडसे के पास? क्या यह कि सारा पैसा जवान, स्वस्थ पुरुषों की जेब से निकाला जाना चाहिए? क्यों? जवान, स्वस्थ पुरुषों ने ठेका ले रखा है बाकियों का?
और फिर वहाँ पर यह सनकी रुक जाएँगे इसकी क्या गारंटी है? कल को हो सकता है जवान, स्वस्थ हिन्दू-सवर्ण पुरुषों पर उतर आएं, परसों जवान, स्वस्थ हिन्दू-सवर्ण हिंदी-भाषी पुरुषों तक जाने लगें, परसों न जाने क्या ले आएं। विक्टिम-कार्ड और पहचान की राजनीति (idenity politics) का पागलपन एक बार शुरू ही जाए तो रुकता नहीं है…
क्रय-क्षमता (purchasing power) क्या पुरुषों में नहीं होती?
अगला वाहियात तर्क दिया जाता है कि महिलाएँ मुफ़्त यात्रा होने पर अधिक यात्रा करेंगी, उनके लिए अधिक आर्थिक मौके उत्पन्न होंगे, और उनके ज्यादा पैसा कमाने से उनकी क्रय-क्षमता बढ़ेगी (जिसे वह मानकर चलतीं हैं कि केजरीवाल सरकार किसी-न-किसी तरह चूस कर अपना घाटा पूरा कर लेगी)। लेकिन एक बार फिर से अपने ऐसा मान कर चलने के पीछे वह किसी अध्ययन, किसी डाटा, किसी ठोस आधार का हवाला नहीं दे पातीं।
ऐसा उन्हें किस पैगंबर ने (क्योंकि अगर मैं ‘किस देवता या देवी ने’ पूछूँगा तो मान लिया जाएगा कि मैं अपना धर्म थोप रहा हूँ) सपने में आकर ऐसा बताया कि महिलाएँ वह अतिरिक्त पैसा बचाकर म्यूचुअल फंड में नहीं डाल देंगी, लखनऊ (या दिल्ली और केजरीवाल के टैक्स-दायरे के बाहर के किसी भी अन्य क्षेत्र) में रह रहे अपने रिश्तेदारों को नहीं भेज देंगी या उसे महज़ नकद में नहीं रखे रहेंगी? ऐसी हवाई उम्मीदों के आधार पर ₹1500 करोड़ से अधिक का सालाना आर्थिक बोझ झेलने से ज्यादा वाहियात अर्थशास्त्रीय तर्क की सानी मिलना मुश्किल है।
इसके अलावा अगर उनके उपरोक्त तर्क को मान भी लिया जाए तो क्या पुरुषों को मुफ्त यात्रा देने से भी यही सब नहीं सम्भव हो जाएगा? क्यों न सभी के लिए मेट्रो यात्रा मुफ्त कर दी जाए, ताकि जो ‘फ़ायदे’ होने का दावा सानिका गोडसे कर रहीं हैं, वह दुगने हों?
अमेरिका की स्टडी यहाँ की नीतियों के आधार में लगाने का क्या तुक है?
अमेरिका में किए गए एक अध्ययन के आधार पर सानिका गोडसे यह तय कर देतीं हैं कि चूँकि अमेरिका में औरतें पुरुषों से अधिक यात्रा करतीं हैं, तो भारत में भी सभी महिलाएँ ऐसा करतीं ही होंगी, और अतः महिलाओं को मुफ्त मेट्रो दे देनी चाहिए। तो गोडसे जी, भारत अमेरिका नहीं है। अमेरिका में हो जाने भर से कोई चीज़ भारत का भी सत्य नहीं बन जाती। आपमें हिम्मत है तो ऐसा ही अध्ययन भारत में कर के आइए, तब आगे बात की जाएगी।
कुल मिलाकर यह लेख वायर ही नहीं, सभी वामपंथी-चरमपंथियों में बढ़ती हुई खीझ की नुमाईश भर है। मोदी के लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री बन जाने से, इनका प्रोपेगैंडा धराशायी हो जाने से इनके दिमागों के फ्यूज़ बुरी तरह जल गए हैं। इसीलिए कभी जनेऊ के खिलाफ अनर्गल प्रलाप आता है, कभी राम नवमी को निशाना बनाया जा रहा है, और अब जेंडर-जस्टिस के नाम पर पुरुष-विरोधी नीतियों के ज़रिए पुरुष-घृणा (misandry) भड़काने का प्रयास हो रहा है। कॉमरेड लोग अब बस हिंसा पर नहीं उतर आए हैं, गनीमत यही है…
लोकसभा चुनाव 2019 थम गए हैं लेकिन इसके नतीजे और रुझान थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। चुनाव में बहन मायावती की पार्टी BSP को मिली करारी हार के बाद पार्टी में असंतोष खुलकर सामने आ गया है। ताजा मामला महाराष्ट्र के अमरावती का है, जहाँ BSP की समीक्षा बैठक में जमकर हंगामा हुआ और बात मारपीट तक पहुँच गई। इस दौरान पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच जमकर मारपीट हुई।
सोमवार (जून 17, 2019) को हुई इस निंदनीय घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। समीक्षा बैठक में BSP कार्यकर्ताओं ने एक नेता को न सिर्फ मारा बल्कि उसके कपड़े तक फाड़ दिए। नेता पर लात-घूसों और कुर्सियों से हमला किया गया और दौड़ा-दौड़ाकर मारा गया। बताया जा रहा है कि इस बैठक में बसपा के राज्य प्रभारी संदीप ताजने सहित अन्य बड़े नेता भी आए थे।
दरअसल, यह घटना तब घाटी जब सोमवार को लोकसभा चुनाव में पार्टी को मिली हार के बाद अमरावती में एक समीक्षा बैठक बुलाई गई थी। लेकिन बैठक के दौरान इसमें मारपीट हो गई। इस वायरल वीडियो में राज्य के बसपा प्रमुख संदीप ताजने उत्तेजित पार्टी कार्यकर्ताओं की भीड़ से घिरे हुए दिखाई दे रहे हैं। जिसमें कुछ लोग उनकी शर्ट खींचते हुए नजर आ रहे हैं। इस बैठक में मंच पर बैठे नेताओं पर बसपा कार्यकर्ताओं ने जमकर कुर्सियाँ फेंकी। इसके बाद मंच से घसीटकर लात-घूँसों से भी पिटाई की गई। कार्यकर्ताओं ने विधान परिषद और लोकसभा चुनाव में पार्टी नेताओं पर पैसे खाने का आरोप लगाया है।
यूँ तो लैला नाम सुन कर मजनू की याद आती है लेकिन पॉपुलर कल्चर में इसे अब दूसरे कारणों से याद कराने की एक कुत्सित कोशिश की जा रही है। लैला की कहानी प्रेम की कहानी है, लेकिन नेटफ्लिक्स इसे हिन्दुओं के प्रति घृणा जगाने वाले नाम के रूप में परोस रही है। हर तरह के प्रयासों के बावजूद जब न तो किसी भी प्रकार के ऐतिहासिक साक्ष्य से, या फिर आधुनिक काल में कानूनी तरीक़ों से, हिन्दू धर्म और भारतीय सनातन संस्कृति पर नकारात्मकता के धब्बे नहीं चिपक सके, तो अब यह नया प्रयास है।
याद कीजिए एक दौर जब फ़िल्मों में पंडित या ब्राह्मण हमेशा किसी व्यभिचारी की तरह दिखाया जाता था। साधु वेश वाला व्यक्ति हमेशा ठगी के लिए इस्तेमाल होता था। लाला या बनिया हमेशा सूदखोर और रक्तचूसक ही दिखाया जाता था। इसका परिणाम यह हुआ कि ब्राह्मणों की छवि व्यभिचारियों, चोरों और ठगों वाली हो गई जबकि भारत के गाँवों में जा कर लोगों को देखना चाहिए कि पूजा-पाठ कर के अपनी क्षुधा मिटाता ब्राह्मण किसको ठग पा रहा है।
कहने का अर्थ यह है कि फ़िल्मों का असर बहुत व्यापक होता है। एक दौर था जब हिन्दी सिनेमा इंडस्ट्री में वामपंथी विचारधारा वाले ‘प्रोग्रेसिव रायटर्स असोसिएशन’ जैसी संस्थाओं से जुड़े लोगों ने फिल्म इंडस्ट्री पर ऐसी पकड़ बना रखी थी कि उनके लिए हर हिन्दू पात्र (जो एक प्रतीक की तरह दिखाया जा सके) नकारात्मक हुआ करता था, और वहीं कोई एंथनी अनाथ को पालता हुआ दिखाया जाएगा, अब्दुल का पिता देश पर बेटे न्योछावर करने की बातें करता दिखेगा।
समस्या इससे नहीं है कि एंथनी ने अनाथ बच्चों को आसरा दिया या अब्दुल का पिता देशभक्त है, लेकिन समस्या तब है कि आपने ब्राह्मण को किसी अबला का आँचल खींचता दिखा दिया और सूदखोर लाला बलात्कारी बन कर सामने आया। फिर लगने लगता है कि ये अनायास नहीं होता। ये एक मशीनरी है जो समाज के मनोविज्ञान पर खेलती है। जो कभी किसी साधु से ठगी का शिकार न हुए हों, वो ऐसी फिल्म देख कर सारे साधुओं को वैसा ही मानने लगेंगे। इस तरह के पात्र इतनी बार गढ़े गए हैं कि जनमानस में साधु-संन्यासी आदि को देख कर लोग उन्हें पहले ही ठग मान लेते हैं। अगर वो अच्छा निकल गया तो सोचते हैं कि ये अपवाद है।
ये एक सतत प्रक्रिया है एक धर्म, उसके प्रतीकों की छवि बर्बाद कर, समाज को तोड़ने की जो पहले अंग्रेज़ों का प्रमुख कार्य था, अब उनका एकसूत्री अजेंडा हो गया है जो सत्ता की मलाई से दूर हो गए हैं। आप जरा सोचिए कि जब भी दूसरे मज़हबों के प्रतीकों पर एक ट्वीट भी लिखा जाता है तो उसे एक पूरी लॉबी कैसे देखती है। आप याद कीजिए कि हिजाब और बुर्के को वैज्ञानिक बताने से लेकर ‘माय च्वाइस’ तक कहने वाले साड़ी और घूँघट को बंधन कैसे बताते रहते हैं!
नेटफ्लिक्स द्वारा ‘लैला’ वेब सीरीज़ का भारत में प्रदर्शन उसी लॉबी के अजेंडे की अगली कड़ी है। ‘हिन्दू टेरर’ का शिगूफ़ा छोड़ा गया था, वो फुस्स हो गया। पाँच साल तक लोग इस इंतजार में रहे कि कोई बड़ा दंगा हो जाए, कुछ बड़े स्तर पर नरसंहार हो जाएँ कि सत्ताधारी दल और उसके नेता की छवि को लेकर जो अवधारणाएँ इन्होंने 2013-14 में बनाई थीं, वो किसी भी तरह से सच हो जाएँ। वैसा हुआ नहीं।
न तो हिन्दू सड़कों पर तलवार लेकर दौड़ा, न ही भाजपा शासित राज्यों में दंगे भड़के। ये बात और है कि कुछ एंकरों ने स्टूडियो से बैठ कर ‘डर का माहौल’ खूब बेचा। समाज में जहाँ दो मजहब ठीक से रह रहे थे, वहीं मीडिया ने ऐसा क़िस्सा बनाया कि हर जगह हिन्दू और समुदाय विशेष एक दूसरे के जान लेने पर उतारू हैं। 2019 का चुनाव भी हो गया, और ये अजेंडा भी फ़्लॉप रहा।
आजकल जनता इतनी जागरूक है कि फ़िल्मों के ज़रिए अगर ऐसा करने की कोशिश होती है तो वो उनके रिलीज़ पर भी रोक लगा देते हैं, या हंगामा करते हैं जिससे कई बार फ़िल्मों को आर्थिक नुकसान पहुँचता है। इसलिए, अब इनकी योजना बदल गई है। अब नेटफ्लिक्स जैसी स्ट्रीमिंग सर्विस के ज़रिए यही घृणा परोसी जा रही है क्योंकि उसे देखने के लिए सिनेमा हॉल में जाने की आवश्यकता नहीं है। उसे आप घर में बैठ कर देख सकते हैं।
वो पीढ़ी जिसने जब से होश संभाला है, या राजनैतिक रूप से जागरुक हुए हैं, उन्होंने भारत का इतिहास भी ढंग से नहीं पढ़ा, उनके लिए ऐसे सीरिज़ ही अंतिम सत्य हो जाते हैं। उनके लिए यह विश्वास करना आसान हो जाता है कि अगर इस्लामी आतंक है तो हिन्दू टेरर क्यों नहीं हो सकता। ये कच्चे दिमाग के बच्चे हैं, जो हर सामने आती बात पर विश्वास कर लेते हैं।
‘लैला’ में कथानक बुना गया है एक ऐसे ‘आर्यावर्त’ का जहाँ हिन्दू अतिवादी (एक्सट्रेमिस्ट) हर जगह हैं, हिन्दुओं का शासन है जो तालिबान जैसा है। यहाँ एक तानाशाही सत्ता है और जनता हर तरह से व्याकुल है। बताया गया है कि हर समय सत्ता की निगाह आप पर है और जो हिन्दू और दूसरे मजहब की शादियों से जन्में हैं वो ‘शुद्ध’ नहीं हैं। कुल मिला कर एक घृणित सोच को कल्पना का जामा पहना कर वास्तविकता की तरह दिखाने का घटिया प्रयास है।
इस वेब सीरीज़ में कोशिश यह दिखाने की है कि भारत हिटलर जैसे तानाशाह के शासन में है और लोकतंत्र ख़त्म हो चुका है। यही बात तो पाँच साल से मीडिया के एक हिस्से ने खूब बताई और परिणाम यह आया कि अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में आधी से ज़्यादा सीटें भाजपा ने जीतीं। सीधा मतलब यह है कि मीडिया और एक खास विचारधारा के प्रोपेगेंडा को चलाने वालों का आम जनता से एक पूरा डिसकनेक्ट हो चुका है। ये लोग कमरे में बैठ कर यह सोचते हैं कि लोग ऐसा सोचते होंगे, तो वो हो जाएगा। लेकिन ऐसा होता नहीं है। इस बात को हाल ही में ‘द प्रिंट’ के शेखर गुप्ता से लेकर कई बड़े मीडियाधीशों ने स्वीकारा कि वो लोग जनता की नब्ज पकड़ने में नाकाम रहे।
इनके पाँच साल ऐसे ही बीते हैं जहाँ ये मनाते रहे कि ऐसा हो जाए, वैसा हो जाए, लेकिन न तो ऐसा हुआ, न वैसा। इसलिए, अब योजना में बदलाव लाया गया है। हर घर में पहुँचती मीडिया और हर हाथ में विद्यमान सोशल मीडिया जब इनके नैरेटिव को लोगों के दिमाग में नहीं उतार पाए तो अब वेब सीरीज़ का सहारा लिया जा रहा है।
हम इन्हें महज़ कल्पना कह कर छोड़ नहीं सकते। हम इन्हें हैशटैग से बायकॉट नेटफ्लिक्स या अनइन्सटॉल नेटफ्लिक्स कह कर ही अपनी ज़िम्मेदारी नहीं निभा सकते। इस पर चर्चा होनी ज़रूरी है क्योंकि नैरेटिव को बेहतर नैरेटिव ही काट सकता है। अगर ये हिन्दुओं को तानाशाही और तालिबानी बताएँगे तो हमारा नैरेटिव सत्य को उजागर करने पर फोकस्ड होना चाहिए। हमारा नैरेटिव ऐसे लोगो की चर्चाओं में घुस कर इन्हें यह सवाल पूछने पर आधारित होना चाहिए कि किसी हिन्दू तानाशाह का नाम बता दे कोई। इनसे पूछिए कि ऐसा कौन-सा उदाहरण है उनके पास जहाँ से ये ‘शुद्ध’ हिन्दू वाली बात निकल कर आती है?
आप मनोरंजन को इतनी आसानी से मत जाने दीजिए। अगर टेलिग्राफ़ वाले अपनी चिरकुटई में इस सीरीज़ को ऐसे दिखा रहे हैं कि यही हमारे समय का सच है, तो आप को इस टुच्चे पेपर वालों को बताना होगा कि अपने हेडलाइनों से लेकर पूरे पेपर में जो विष्ठा करते हैं, उसकी बदबू इन्हीं का दम घोंट देगी एक दिन।
ये हमारे समय का सच नहीं है। सारे वामपंथी और दक्षिण-विरोधी मीडिया इसे ऐसे ही दिखा रहे हैं जैसे पिछले पाँच साल में ‘आपातकाल’ जैसे शब्द और ‘डर का माहौल’ जैसे वाक्यांश को दिखाया था। इन लोगों ने हर रात चैनलों के स्टूडियो में बैठ कर अल्पसंख्यकों को डराया है कि वो घर से बाहर निकलेंगे तो हिन्दू तलवार लेकर बैठा हुआ है, और उसके कान में हैंड्स-फ़्री पर अमित शाह और मोदी कॉन्फ़्रेंस कॉल कर रहे हैं। इन्हीं लोगों की आँखों में घोड़े का बाल घुस गया था जब पूरा बंगाल इस्लामी आतंक और साम्प्रदायिक दंगों से जूझ रहा था।
इसलिए, चुप तो मत ही बैठिए। कायर और भीरू चुप बैठते हैं। आप से जो बन पड़ता है, कीजिए। सीरीज़ देखने की आवश्यकता नहीं है। उसमें क्या है, बस इतना जानिए, जो मैंने ऊपर बता दिया है। इसके बाद हर समझदार भारतीय की प्रतिक्रिया यही होनी चाहिए कि राजनीति से जब हमें तोड़ा नहीं जा सका, तो फ़िल्मों और धारावाहिकों के ज़रिए हमारे समाज में ज़हर मत घोलो। अगर आप इस सोशल मीडिया के दौर में चूक गए, तो आप इतिहास में उन्हीं हिन्दुओं की भीड़ की तरह याद रखे जाएँगे जिनके सामने से गाय दौड़ा कर मंदिर लूट लिए जाते थे।
अपने अस्तित्व को पहचानिए। अपनी सर्वसमावेशी संस्कृति पर हो रहे इन हमलों को नाकाम बनाना सीखिए। ये बातें आपकी अगली पीढ़ी का आँख बंद करने के लिए तैयार की जा रही हैं। ये सामान्य जीवन में ज़हर घोलने का प्रयास है। ये हिन्दुओं की छवि बर्बाद करने की बात है। कल्पना को आधार बना कर एक वैसे समाज को तानाशाही दिखाने का प्रयास है यह जिस समाज ने हर बार इस्लामी और ईसाई आतंक को झेला है, और इतने सहिष्णु थे कि उन्हें भी यहाँ बसने दिया। इतने सहिष्णु हमेशा रहे कि बहुसंख्यक होने के बावजूद, सत्ता पाने के बावजूद, अल्पसंख्यकों के आतंक को झेला ही है, उन पर उनके पूर्वजों या मजहबी आतंकियों की करतूतों के लिए हमला नहीं बोला है।
हमला इसलिए नहीं बोला है क्योंकि वो हमारी संस्कृति नहीं है। हमारी संस्कृति स्वीकार्यता पर आधारित है। लेकिन हाँ, कायरों की तरह आक्रमण को झेलना भी हमारी संस्कृति नहीं रही है। जब दुश्मन अपने तौर-तरीके बदल रहा हो तो हमें उन्हें पहचानना चाहिए। हमें उन्हें उन्हीं की भाषा में जवाब देना चाहिए। मैं आपको नेटफ्लिक्स अनइन्स्टॉल करने नहीं कहूँगा, मैं आपको यह भी नहीं बताऊँगा कि यही सीरीज़ आपको किस वेबसाइट पर आसानी से पायरेटेड कॉपी में मिल जाएगी। ऐसा करना गलत है। गलत तो खैर हिन्दुओं को आतंकी और तालिबानी कहना भी है। निर्णय आपका है कि यह लड़ाई आप कैसे लड़ेंगे।
हाल ही में ‘दि प्रिंट’ वेबसाइट पर जनमोर्चा अखबार के स्थानीय संपादक का लेख छपा। इस लेख में लेखक ने योगी सरकार की आलोचना करने के लिए उन सभी हालिया घटनाओं की एक-एक पैराग्राफ में जानकारी दी गई जिन्हें आधार बनाकर योगी सरकार को निशाना बनाया जा सकता था। सामाजिक कृत्यों को राजनैतिक रूप देकर कैसे परोसा जाता है, ये हमें डिजिटल प्लैटफॉर्म पर मौजूद कई वामी पोर्टल पहले ही बता चुके हैं। लेकिन गुप्ता जी का ‘दि प्रिंट’ उन सबसे 2 पायदान ऊपर चढ़ने के लिए हमेशा ही प्रयासरत रहता है।
‘दि प्रिंट’ में प्रकाशित हुए लेख ‘उत्तर प्रदेश में जंगल राज जारी है और योगी देश और धर्म को सुरक्षित बता रहे हैं’ में हेडलाइन को विचारधारा के साथ सार्थक बनाने के लिए लेखक ने शुरू से अंत तक भरसक प्रयास किया। यहाँ योगी आदित्यानाथ को ‘अलबेले’ मुख्यमंत्री कहकर शुरूआत हुई और उनपर इस बात पर निशाना साधा गया कि योगी आदित्यनाथ अपनी सरकार और प्रदेश की बातें कम करते हैं तथा मोदी सरकार और देश की बातें ज्यादा करते हैं। उनके उस वक्तव्य को पूरे लेख का आधार बनाया गया जिसमें सीएम योगी ने कहा था कि अब देश भी सुरक्षित है और धर्म भी।
जाहिर है कि योगी आदित्यनाथ के इस वक्तव्य से कुछ विशेष समुदाय के लोगों को आपत्ति होनी ही थी क्योंकि यहाँ देश और धर्म एक साथ सुरक्षित बताए जा रहे थे, जो कि पत्रकरिता के समुदाय विशेष की विचारधारा के मुताबिक बिलकुल असंभव है। उन्हें चाहिए कि कोई मुख्यमंत्री इस तरह के बयान दे कि जब तक देश में धर्म है तब तक देश असुरक्षित है। यहाँ धर्म और मजहब में फर्क़ की सेकुलरिज्म के नाम पर मोटी रेखा खींच दी जाती है, वो अलग बात है।
लेखक को देश में, और खासकर यूपी में, सुरक्षा को लेकर इसलिए संदेह है क्योंकि अभी हाल ही में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर करने के कारण एक पत्रकार को गिरफ्तार कर लिया गया। उस पर कार्रवाई हुई। वो कहते हैं कि देश आखिर कैसे सुरक्षित है जब सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर भर कर देने से गिरफ्तारी हो रही है। यूपी में इन घटनाओं को लेकर सुरक्षा व्यवस्था को कटघरे में रखने वाले पत्रकार की यूपी की चिंता से साफ़ पता चलता है वे कि बंगाल और छत्तीसगढ़ में हुई घटनाओं से अभी अपरिचित हैं या वो उनपर बात करना ही नहीं चाहते हैं या शायद उनके लिए योगी सरकार का बयान गलत साबित करना ज्यादा बड़ा विषय है।
दूसरी बात यह है कि देश में अगर अपराध हो रहे हों, और कानून अपना काम कर रहा हो तो उस से देश सुरक्षित रहता है, असुरक्षित नहीं। संपादक महोदय शायद किसी गुफा में रहते हैं जहाँ उन्हें किसी कबूतर के टाँग में फँसी चिट्ठी से पता चलता रहता है कि अपराध तो बस भारत में ही हो रहे हैं, बाकी जगह तो आदर्श स्थिति में है। अगर इस तरह के अपराधों को आधार बना कर जंगल राज बताया जाने लगे तब तो मैं जितनी द्रुत गति से टाइप कर सकूँ उतनी देर में देश का हर जिला और राज्य जंगल राज बना दिखेगा। सेलेक्टिवली अपराधों को निकाल कर, उन्हें उदाहरण बना कर दिखाना बताता है कि पत्रकार अजेंडाबाज़ी करना चाहता है क्योंकि पत्रकारिता तो उस से हो नहीं रही।
खैर, हैरानी की बात यह है कि इस लेख में अलीगढ़ मामले को भी आधार बनाकर योगी सरकार को घेरा गया। एक जघन्य अपराध जिसका पूरा जिम्मा सिर्फ़ कुंठित समाज में मौजूद घटिया मानसिकता को जाना चाहिए उसके लिए प्रशासन पर सवाल उठाए गए। यहाँ बताने की कोशिश हुई कि किस तरह से सरकार और प्रशासन ने मामले को सांप्रदायिक एंगल देने की कोशिश की है। अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता को उचित साबित करने के लिए लेखक यहाँ तथ्यों के साथ ही खेल गए। संपादक पद पर पहुँचने के बाद भी जहाँ एक व्यक्ति एक अनुभवी पत्रकार और लेखक में बदल चुका होता है, वहीं उसे बहुत अच्छे से मालूम होता है कि उसका पाठक उसकी लेखनी से कहीं न कहीं एक सोच को विकसित करेगा, जिसका फर्क़ समाज पर भी निश्चित रूप से पड़ेगा।
अपने लेख में योगी आदित्यनाथ पर सवालों के तीर चलाने में लेखक इतने व्यस्त रहे कि उन्होंने शायद मामले का जिक्र करने से पहले उससे जुड़ी जानकारी भी नहीं ली या फिर पाठक को बरगलाना ही उनका मूल मकसद था। संपादक महोदय ने इस लेख में बताया, “गुनहगारों की गिरफ्तारी के बाद जिलाधिकारी ने जब मामले की मजिस्ट्रेट जाँच का ऐलान कर दिया तो भी हिन्दू-मुस्लिम एंगल तलाशने और लाभ उठाने की कोशिशें तब तक हार मानने को तैयार नहीं हुईं, जब तक यह बात सामने नहीं आ गई कि हिन्दुओं के शुभ की भाजपा अथवा योगी राज की तमाम चिंताओं का सच यह है कि एक सामान्य हिन्दू परिवार के लिए उस पर चढ़ा 10 हजार रुपयों का कर्ज चुकाना भी मुश्किल हो गया है।”
द प्रिंट के लेख में परोसे गए झूठे तथ्य का स्क्रीनशॉट
इस लेख में प्रशासन पर हिंदू-मुस्लिम का एंगल देने का इल्जाम लगाने वाले लेखक देखते ही देखते कैसे यहाँ हिन्दू और समुदाय विशेष का खेल कर गए, शायद किसी नए पाठक को इसका पता भी न चले। क्योंकि जिन्हें अपने लेखक पर यकीन होता है वो उसके लिखे को ही अंतिम सत्य मान लेता है। खबर की हकीकत ये थी कि टप्पल की उस बच्ची की जान उस जाहिद ने ली जिसके ऊपर बच्ची के पिता के 10,000 रुपए उधार बाकी थे। यहाँ उधार देने वाला हिन्दू है, लेने वाला समुदाय विशेष का, न कि उल्टा जो कि पत्रकार ने लिखा और ‘दि प्रिंट’ ने छाप दिया। पैसे न देने के कारण जाहिद की बच्ची के पिता के साथ कहा-सुनी हुई और बेइज्जती का बदला लेने के लिए जाहिद ने अपने साथियों के साथ मिलकर इस घटना को अंजाम दिया। लेकिन ‘द प्रिंट’ में प्रकाशित लेख में नैरेटिव ये बनाने का प्रयास हुआ कि योगी सरकार के सत्ता में होने के बावजूद एक हिंदू इस काबिल नहीं था कि वो अपना कर्ज चुका सके।
इतना बड़ा मामला और अखबार का संपादक इस मुख्य तथ्य से अनभिज्ञ रह गया? या ये कहें कि इस मामले में संपादक ने खबर की गंभीरता और तथ्यों से ज्यादा अपनी विचारों को परोसना उचित समझा, ताकि अन्य अपराधों की सूची के बीच उनका ये झूठ छिप जाए और पाठक वर्ग की मानसिकता पर ये छाप भी छूटे कि यहाँ भी सरकार और प्रशासन ही दोषी है, उन्हीं के कारण एक मासूम के साथ किसी घृणित मानसिकता के व्यक्ति ने और उसके साथियों ने इतना बड़ा अपराध किया। इसमें किसी समुदाय विशेष से जुड़े व्यक्ति का कोई दोष नहीं है। बल्कि योगी सरकार का है जो एक हिंदू को इस लायक भी नहीं बना पाई कि वो अपना कर्ज चुकाए, जो वास्तविकता में उसने लिया ही नहीं है।
ये किस तरह की पत्रकारिता है, जहाँ अगर तथ्यों को हटा भी दिया जाए तो भी यह लिखा जा रहा है कि अगर आप कर्ज़ा नहीं चुका सकते तो सामने वाले द्वारा अपनी बेटी की हत्या के जिम्मेदार आप और सरकार हैं जो आपको इस लायक नहीं बना पाई कि आप क़र्ज़ चुका सकें। ये कैसी बेहूदी दलील है?
इस लेख में कुछ हालिया अपराधों का भी जिक्र है जिनपर बतौर इंसान हमें विचार-विमर्श और मंथन करने आवश्यकता है कि आखिर हम कैसे समाज का निर्माण कर रहे हैं, जहाँ हर लड़की और हर महिला हमेशा असुरक्षित है। लेकिन बतौर पाठक हमें इतना जागरूक रहने की भी जरूरत है कि हम ‘संपादक महोदय’ जैसे लोगों के गढ़े गए नैरेटिव में सच को गलत और गलत को सच न समझने लगें।
असली खबर से इतनी बड़ी छेड़-छाड़ के बाद प्रकाशित हुआ ‘दि प्रिंट’ पर ये लेख इस बात का सबूत है कि आज सरकार के प्रति मीडिया गिरोह में इतनी घृणा भर चुकी है कि यदि कोई व्यक्ति सरकार पर झूठा इल्जाम भी लगा दे तो वो उसे पब्लिक डोमेन में पहुँचाने में गुरेज नहीं करेंगे, क्योंकि इस मीडिया गिरोह के लिए अब पत्रकारिता का मतलब सिर्फ़ सरकार की आलोचना है। लेख के आखिर में लेखक का परिचय देना और लेख को संपादक के निजी विचार कहना, इस बात को दर्शाता है कि अब पत्रकारिता में निहित नैतिकता के मूल तत्व से वैचारिक संतुष्टि रिप्लेस हो चुके हैं।