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जब रिपोर्टर मरे बच्चे की माँ से भी ज़्यादा परेशान दिखने लगें…

‘आप कैसा महसूस कर रहे हैं?’, ‘आपका बेटा जिंदगी के लिए तड़प रहा है, आप कुछ कहना चाहेंगे?’, ‘आपके पति की मौत हो गई, आपको कैसा फ़ील हो रहा है?’, आदि सवाल ऐसे हैं जो सवाल नहीं सामान्य बुद्धि के दायरे से बाहर के हैं। ये संवेदनहीनता से भरे तो हैं ही, साथ ही यह आपको एक पेशे का ऐसा चेहरा दिखाती है जो क्लेम करती है कि वो जो कर रहे हैं, वो जनता की आवाज बन कर कर रहे हैं।

सौ से ज्यादा बच्चे मर गए। वो मर गए। वो वापस नहीं आएँगे। हो सकता है, अगले साल फिर मर जाएँगे क्योंकि कुछ लोग अपना काम ठीक से नहीं कर रहे। ऐसे में मीडिया की क्या ज़िम्मेदारी है? मीडिया के लिए, ऐसे विषयों पर, दो काम बनते हैं। पहला यह है कि वो उन लोगों से सवाल करे जो इन मौतों को एक तय तरीके से होने देते हैं। और दूसरा यह कि वो वह काम करें जो उन लोगों ने नहीं किया, यानी जागरूकता फैलाने का।

इसमें कुछ मीडिया वाले बदतमीज़ी करते हुए हॉस्पिटल में पहुँच गए जैसे कि उनके जाने से सब कुछ सही हो जाएगा। पत्रकारों को, जिसमें कुछ बड़े एंकर शामिल हैं, लगता है कि उन्हें डिप्लोमैटिक इम्यूनिटी टाइप की कोई चीज मिली हुई है जिस कारण वो ब्रह्मांड के किसी भी कोने में माइक ले कर जा सकते हैं। ये सोच गलत है, कई बार ग़ैरक़ानूनी भी, लेकिन हमारा पेशा इतना विकृत रूप ले चुका है कि आप उन पर सवाल नहीं उठा सकते।

आप जरा सोचिए कि जिस हॉस्पिटल का नाम गलत कारणों से न्यूज में आया हुआ हो, वो कितने दबाव में काम कर रहे होंगे। मैं यह भी मान लेता हूँ कि हॉस्पिटल साफ-सुथरा नहीं होगा, लेकिन यह बताने के लिए जीवन और मौत से संघर्ष कर रहे बच्चों के वार्ड में आप यह दिखाने के लिए अराजकता फैलाने लगेंगे कि देखिए यहाँ कितनी गंदगी है?

अस्पतालों की गंदगी उत्तर भारत के लिए कोई ख़बर नहीं है। जो सरकारी अस्पतालों में गए हैं, उन्हें पता है कि वो गंदे हैं। ये कोई बताने की चीज नहीं है। बता भी दें तो कैमरा लेकर दिखाने से आप किसी की मदद नहीं कर रहे। यहाँ सबको वस्तुस्थिति पता है।

नर्स एक बीमार बच्चे के बेड के पास खड़ी होकर कुछ निर्देश दे रही है और हमारे पत्रकार माइक लेकर पिले पड़े हैं! ये कौन-सी पत्रकारिता है? इसका लक्ष्य क्या है? इससे समाज के किस हिस्से को आवाज मिल रही है या ऐसा कौन-सा मुद्दा आप दिखा रही हैं जो लोगों को पता नहीं है?

लोगों को आपके पहुँचने से पहले से मुद्दा पता है कि अस्पताल में बच्चे मर रहे हैं। लोगों को ये ख़बर तब से पता है जब से बाकी चैनल जगे नहीं थे। आज राहुल गाँधी लोकसभा में आँख मार दे या मोदी राहुल गाँधी की चुटकी ले ले तो आप इन सारी मौतों को भूल जाएँगे क्योंकि आप के लिए मौतें मुद्दा नहीं हैं। मुद्दा है आपका खलिहर होना और इस मातम में लोगों से पूछना कि उनको कैसा लग रहा है!

कैसा लगेगा जब इन एंकरों के बच्चे तड़पते रहेंगे और एक आम आदमी इनसे पूछे कि आपको एक माँ के लिहाज से कैसा महसूस हो रहा है? वो माइक इनके मुँह में ठूँस दे और नाक से कैमरा सटा कर पूछे कि आप कैसा फ़ील कर रही हैं? अच्छा नहीं लगेगा, आप उन्हें झिड़क कर भगा देंगे।

आप जैसे एंकरों ने अपनी तस्वीरें खींचने पर प्राइवेसी की दुहाई दी है। क्या उस बच्चे के पिता को प्राइवेसी का हक़ नहीं जिसके लिए प्राथमिकता उसके बच्चे की साँसें हैं, और यह कि वो दवाई कहाँ से लाएगा?

मीडिया अपने आप को समझता क्या है? ये ज़िम्मेदारी है मीडिया की? ऐसे आप रिपोर्टिंग करेंगे? ये मीडिया नहीं थिएटर है। यहाँ लोग चिल्लाएँगे नहीं, ड्रामा नहीं करेंगे, आवाज को मॉड्यूलेट नहीं करेंगे तो लोग उन्हें सुनेंगे नहीं। जबकि ऐसे कई एंकर हैं जो शांत हो कर अपनी बातें रखते हैं, और लोग सुनते हैं। ये फर्जी बुलबुला बना कर उसी में लोग जी रहे हैं जिसका परिणाम बाथ टब में श्री देवी की मौत कैसे हुई बताने के लिए चम्पक पत्रकार बाथ टब में लेट जाने पर दिखता है।

तो फिर ऐसे मामलों में मीडिया क्या करे? मीडिया को कम से कम आधे घंटे जागरूकता अभियान चलाना चाहिए चैनलों के माध्यम से। इन्हीं पत्रकारों को अगर लगता है कि लोग उन्हें सुनते हैं तो उन्हें स्थानीय भाषा में यूट्यूब या चैनल के माध्यम से डॉक्टरों की बातचीत दिखा कर लोगों को ऐसी बीमारियों से बचाव के तरीके बताने चाहिए। विज्ञापनों के बीच लोगों को साफ-सफ़ाई रखने का आग्रह करना चाहिए।

पत्रकारों का काम नौटंकी करके भीड़ जुटा कर लोगों को अचंभित करने का नहीं है कि लोग यह चर्चा करें कि ‘अरे देखो, कितना गंदा है हॉस्पिटल’। इससे किसे क्या लाभ होगा पता नहीं। क्या इस शो के दो दिन बाद भी कोई याद रखेगा कि हॉस्पिटल गंदा था? उस हॉस्पिटल का नाम भी ध्यान में रहेगा? ये इम्पैक्ट किसके लिए क्रिएट हो रहा है? क्या ये मनोरंजन है कुछ लोगों के लिए जिनके लिए आप पैकेज तैयार करते हैं? फिर आपने क्या योगदान दिया इस मुद्दे को लेकर बतौर पत्रकार? यही आधे घंटे अगर आपने किसी जानकार डॉक्टर से बात करते हुए, बार-बार यह बताया होता कि लक्षणों को तुरंत ऐसे पहचानें और अस्पताल जाएँ, तो कल को होने वाली कुछ मौतें कम हो सकती थीं।

जब मीडिया सरकार को निकम्मी मानती ही है, फिर मीडिया ने इस जानकारी के साथ खुद क्या किया? क्या हमने इस सीज़न की शुरुआत में ही कैलेंडर बनाया कि हर साल बच्चे मरते हैं, हम पहले ही जा कर हॉस्पिटल से और मंत्रालय से पता करें कि इस बार आपने बचाव के लिए क्या प्रयास किए हैं? ज़िम्मेदार पत्रकार तो पहले ही सरकार को आगाह करने की कोशिश करेगा। अगर सरकार या स्वास्थ्य तंत्र उदासीन दिखे, तो वो इस पर चर्चा करे कि मुज़फ़्फ़रपुर वालो, हमने तो तुम्हारे इलाके के लिए इतना प्रयास किया, देखो तुम्हारा नगर निगम, सदर अस्पताल, मंत्री, सांसद, विधायक, जिला परिषद सदस्य आदि सो रहे हैं।

लेकिन पत्रकार तो इन मौक़ों पर हमेशा सबसे बाद में आते हैं। इनके लिए कैलेंडर के हिसाब से सिर्फ जन्मदिन और श्रद्धांजलि के ही दिन बनते हैं। जबकि इन दोनों से किसको क्या लाभ होता है मुझे नहीं पता। अगर मीडिया, जो गले फाड़-फाड़ कर यह सवाल कर रही है कि किसी ने कुछ क्यों नहीं किया, स्वयं ही पहले कुछ करती, और जो आँकड़े ये हर साँस में गिना रही है कि इस साल इतने मरे, उस साल उतने मरे, वो पहले गिन लेती, तो शायद इस त्रासदी की चोट थोड़ी कम लगती।

हम सब जानते हैं कि इसमें दोष सरकार का है जो निकम्मी है, उपेक्षा करती है अपनी जनता का और ज़िम्मेदारी लेने से भागती है। ये बात सबको पता है। आँख मूँद कर ये बातें आप हर त्रासदी के बाद कह सकते हैं और आप गलत नहीं होंगे। लेकिन हम पत्रकारों की क्या ज़िम्मेदारी है? क्या हमने अपने अनुभव ये कुछ भी सीखा है? क्या हम प्रो-एक्टिव हैं किसी भी भयावह आपदा को लेकर? क्या हमें अंदाज़ा भी था कि इस साल भी बच्चे मरने वाले हैं या फिर हम उस दिन के बवाल में बिजी थे जिससे हमें ट्रैफिक और टीआरपी मिलें?

ये दोष मुझ पर भी है, और मेरे साथी पत्रकारों और संस्थानों पर भी। मीडिया को अपने ज़िम्मेदार होने का मेडल तब ही लटकाना चाहिए जब उसने ऐसी आपदाओं को आने से पहले ही लोगों को आगाह किया हो कि अब बारिश का मौसम आ रहा है, डेंगू फैलना शुरु होगा, हॉस्पिटलों की तैयारी पता की जाए। बारिश के बाद नालों के जाम होने पर सरकारों से सवाल पूछने से बेहतर है कि बारिश की शुरुआत में पूछा जाए कि क्या नालों की सफ़ाई हो गई?

अभी जो टीवी पर चल रहा है वो इतना घटिया और संवेदनहीन है कि उसमें दोष मढ़ने, नाटकीयता दिखाने और चेहरे पर पानी मार कर अपने आप को बदहवास दिखा कर यह बताने की होड़ मची है कि हमारे टीवी की एंकर उस माँ से ज़्यादा परेशान है जिसका मृत बच्चा उसकी गोद में पड़ा है और उसके आँसू सूख चुके हैं।

अपहृत सपा नेता की धारदार हथियार से हत्या, नक्सलियों ने सड़क पर फेंका शव

छत्तीसगढ़ में नक्सलियों का आतंक थमता नहीं दिख रहा है। ताज़ा घटना में समाजवादी पार्टी के एक नेता की निर्मम हत्या कर दी गई है। राज्य के बीजापुर में सपा नेता की पहले तो धारदार हथियार से हत्या कर दी गई और फिर शव को सड़क पर फेंक दिया गया। मंगलवार (जून 18, 2019) को नक्सलियों ने उन्हें उनके पैतृक आवास से अपहृत कर लिया था। बीजापुर के एसपी दिव्यांग पटेल ने बताया कि अभी तक इस घटना के कारणों का पता नहीं चल पाया है। ये वारदात इलमिडी थाना क्षेत्र के मरिमल्ला गाँव में हुई है।

मृतक नेता का नाम संतोष पुनेम है और वह पार्टी के विधानसभा प्रत्याशी रह चुके हैं। वह किसी काम से गाँव स्थित अपने पैतृक आवास पहुँचे थे, जहाँ नक्सलियों ने मौक़ा देखते ही उनका अपहरण कर लिया। इसके बाद तमाम तरह के क़यास लगाए जा रहे थे लेकिन उनके बारे में कुछ पता नहीं चल पा रहा था। बुधवार की सुबह उनकी लाश सड़क पर पड़ी मिली। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत लोधेड़-मारिमल्ला में निर्माण कार्य किया जा रहा था, जिस वजह से संतोष नक्सलियों के निशाने पर थे।

वहीं पुलिस ने अभी तक इस बारे में खुल कर कुछ नहीं बताया है, अतः हत्या के और भी कारण हो सकते हैं। पुलिस मामले की छानबीन कर रही है। संतोष कॉन्ट्रेक्टर भी थे। वह गाँव में सड़क निर्माण सम्बन्धी कार्यों का जायजा लेने पहुँचे थे। जहाँ उनकी लाश मिली, वह जगह पुलिस थाने से 16 किलोमीटर दूर जंगल के भीतर है। पुनेम को विधानसभा चुनाव में 999 मत प्राप्त हुए थे। बता दें कि हाल ही में नक्सलियों ने बस्तर से एकमात्र भाजपा विधायक भीमा मंडावी की भी हत्या कर दी थी।

जब पुनेम की लाश मिली, तब आसपास काफ़ी ख़ून बिखरा हुआ था। वह बस्तर में सपा के उपाध्यक्ष भी थे। छत्तीसगढ़ में बिगड़ती क़ानून व्यवस्था को लेकर सरकार विपक्ष के निशाने पर है।

लोग नहीं चाहते कि नेहरूभक्त, गाँधीव्रता BBC अपने चक्रवर्ती सम्राट राहुल बाबा का बड्डे मनाए

स्वामिभक्ति और पत्नीव्रता जैसे शब्द बीते समय की बातें हो चुकी हैं। जहाँ तक मुझे याद है, बीबीसी जैसे ही किसी मीडिया ने धीरे-धीरे कर के लोगों को इसे पितृसत्तात्मक समाज का चेहरा बताकर ‘ओल्ड स्कूल थिंग्स’ की कैटेगरी में डाल देने का पूरजोर प्रयास किया है। ये अच्छी बात है अगर यह वाकई में पुरुषों द्वारा महिलाओं पर अधिकार जैसे तर्कों की वकालत करता है तो इसे नकार दिया जाना चाहिए। लेकिन यदि इन विशेषणों में बुराई थी तो BBC या ऐसा ही कोई लगभग-प्रगतिशील स्वयं क्यों इन विशेषणों से मोह त्याग नहीं पाया है?

मामला देश के ‘पहले’ युवा अध्यक्ष और नेहरूवियन सभ्यता के आखिरी खेवनहार राहुल गाँधी के जन्मदिन का है। ये वही राहुल गाँधी हैं, जिनके भगीरथ प्रयासों की बदौलत भाजपा इस बार के लोकसभा चुनावों में 300 का आँकड़ा अकेले अपने दम पर ले आने में सफल हुई। आज राहुल गाँधी का अवतरण दिवस है। एक ओर जहाँ देश ‘चमकी बुखार’ जैसी महामारी से आतंकित है, वहीं दूसरी ओर नेहरूघाटी सभ्यता में जन्मे कुछ मीडिया गिरोहों के कुछ बड़े स्तम्भों ने अपनी प्राथमिकता चुन ली।

जब नेहरूघाटी सभ्यता में जन्मे बुद्धिपीड़ितों का जिक्र आता है तो BBC का नाम सबसे पहले दिमाग में आना स्वाभाविक है। ये पत्रकारिता के कुछ ऐसे संस्थान हैं, जो भोजन शुरू करने से पहले अन्न का प्रथम अंश जवाहरलाल नेहरू और दूसरा अंश गाँधी परिवार के लिए रख देते हैं। कम ही लोग ये बात जानते हैं कि BBC जैसे मीडिया गिरोह गले में राहुल गाँधी द्वारा हर चुनाव नतीजों के बाद त्याग दिए गए जनेऊ धारण कर के ही कार्यक्षेत्र को रवाना होते हैं (व्यंग्य)। ऐसे में गाँधीव्रता, नेहरूभक्त BBC के लिए राहुल गाँधी का जन्मदिन किसी राष्ट्रीय त्यौहार से कम नहीं माना जा सकता है।

आज राहुल गाँधी का जन्मदिन है, नेहरूघाटी सभ्यता में जन्मे सभी विचारकों ने अपनी-अपनी पोजीशन सुबह ब्रह्ममुहूर्त में ही ले ली थी। जहाँ NDTV टेलीविजन के माध्यम से बार बार लूप में राहुल गाँधी का वीडियो चला कर माहौल बना रहा था वहीं BBC ने सोशल मीडिया पर अपनी स्वामिभक्ति का प्रदर्शन चालू किया। NDTV ने पलट-पलटकर दिखाया कि किस तरह से कार्यकर्ताओं से घिरे राहुल गाँधी लड्डू से भरी हुई थाली मीडिया की ओर बढ़ाकर ‘आप भी खाइए’ ‘आप भी खाइए’ कहकर उत्सव मना रहे थे। हालाँकि, इस प्रगतिशील मुजरे के बाद थोड़ी देर मुजफ्फरपुर के बच्चों की अकाल मृत्यु की रिपोर्ट दिखाई गई।

BBC देना चाहता था राहुल गाँधी को गिफ्ट, पाठकों ने गरिया दिया

BBC हिंदी के फेसबुक पेज ने स्वामिभक्ति में खुदको पिछड़ता देख तुरंत भक्तिधारा में लिखी एक तस्वीर शेयर की, जिसका कैप्शन था- ” HAPPY BIRTHDAY RAHUL : आज राहुल गाँधी का जन्मदिन है, अगर आपको उन्हें कोई एक तौहफा देने का मौका मिले तो आप क्या देंगे?”

वो अभागा पोस्ट, जिसकी किस्मत में डिलीट होना था

काबा किस मुँह से जाओगे BBC?

लेकिन कुछ देर बाद BBC को यह पोस्ट डिलीट करना पड़ा। कारण यह था कि पाठकों ने BBC के राजकुमार को “30 दिन में बुद्धिमान कैसे बनें” जैसी किताबें तो सुझाईं साथ ही, अध्यक्ष जी के लिए कुछ ‘मन की बातें’ भी खुलकर लिख डालीं। यह BBC से देखा नहीं गया और पोस्ट को डिलीट कर दिया गया। लेकिन, जिस तरह से एक विभीषण रावण की लंका में भी था, उसी तरह से शायद कोई मार्गदर्शक विभीषण BBC की लंका में भी बैठा था जिसने सलाह दी कि गाली खाने का मतलब यह नहीं कि तुम अपनी भक्ताई में कमी ले आओ, और संभव है कि यह भी याद दिलाया हो कि ‘काबा किस मुँह से जाओगे?’

इसके बाद BBC के पत्थरकारों का हौंसला बढ़ा और करीब 2 घंटे बाद नई तस्वीर और हौंसले के साथ पाठकों से दोबारा पूरी बेशर्मी के साथ राहुल गाँधी के लिए गिफ्ट माँगने वाली पोस्ट साझा की गई। हालाँकि, पाठकों की प्रतिक्रियाएँ अभी भी रोचक ही हैं। लेकिन, होशियार BBC ने इस बार एक निवेदन भी जारी करते हुए तस्वीर शेयर की। यह दर्दभरा हृदय चीर देने वाला निवेदन आप अपनी गारंटी पर ही पढ़ें-

BBC जैसे मीडिया गिरोहों का अपने अन्नदाताओं के प्रति यह समर्पण मिसाल है उन सभी बड़े-छोटे मीडिया घरानों के लिए, जिन्हें अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है। वैसे BBC को हमारी सलाह यह भी है कि आज की तारीख को यानी, जून 19 को ही गाँधी जयंती मनाना शुरू कर दे। गाँधी जी अब रहे नहीं, और एकमात्र उम्मीद अब सिर्फ राहुल गाँधी ही बाकी हैं।

BBC की स्वामिभक्ति की एक झाँकी निम्न तस्वीरों के माध्यम से समझें

दुःखद : यह चित्र आपको विचलित कर सकता है
2 घंटे तक चली उच्चस्तरीय वार्ता में लिया गया फिर से गिफ्ट माँगने का निर्णय :रुके न तू झुके न तू

One Nation, One Poll: पीएम मोदी की बैठक से माया, ममता, केजरी, नायडू, स्टालिन रहेंगे गोल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने “One Nation, One Poll” अर्थात ‘‘एक देश, एक चुनाव’’ के मुद्दे पर चर्चा के लिए सभी राजनीतिक दलों के लोकसभा और राज्यसभा में प्रतिनिधित्व करने वाले अध्यक्षों की 19 जून को एक बैठक बुलाई है। इस बैठक में राष्ट्रीय पार्टियों, क्षेत्रीय पार्टियों के अध्यक्ष को शामिल होना है। ये बैठक बुधवार दोपहर 3 बजे संसद भवन की लाइब्रेरी में होगी। इस बैठक में ‘एक देश, एक चुनाव’ के अलावा कुछ अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर भी चर्चा होगी।

इस बैठक में ‘वन नेशन वन पोल’ के अलावा भी कई अन्य मुद्दों पर चर्चा होगी। जैसे, 2022 में भारत अपनी आजादी के 75 साल पूरा कर लेगा, इसे मोदी सरकार भव्य रूप में मनाना चाहती है, जिस पर सभी दलों से चर्चा हो सकती है। साथ ही इसी साल महात्मा गाँधी की 150वीं जयंती के जश्न और सदन में कामकाज के सुचारू रूप से चलने को लेकर बैठक में प्रधानमंत्री चर्चा कर सकते हैं।

चर्चा से पहले ही विपक्ष इस बैठक से किनारा करता जा रहा है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बाद अन्य क्षेत्रीय दलों के प्रमुख भी बैठक का हिस्सा बनने से इनकार कर रहे हैं। यहाँ तक कि कॉन्ग्रेस ने भी बैठक में शामिल होने से मना कर दिया है। ममता के बाद बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती, दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी प्रमुख अरविंद केजरीवाल, तेलुगू देशम पार्टी (टीडीपी) के प्रमुख चंद्रबाबू नायडू और डीएमके अध्यक्ष एम. के. स्टालिन ने भी बैठक में नहीं शामिल होने से इनकार किया है। हालाँकि, इनमें से कुछ नेता बैठक में अपने प्रतिनिधियों को भेजेंगे।

मायावती ने बैठक में शामिल न होने की घोषणा करते हुए ट्वीट किया, “किसी भी लोकतांत्रिक देश में चुनाव कभी कोई समस्या नहीं हो सकती है और न ही चुनाव को कभी धन के व्यय-अपव्यय से तौलना उचित है। देश में ‘एक देश, एक चुनाव’ की बात वास्तव में गरीबी, मँहगाई, बेरोजगारी, बढ़ती हिंसा जैसी ज्वलंत राष्ट्रीय समस्याओं से ध्यान बाँटने का प्रयास व छलावा मात्र है।”

इससे पहले विपक्षी दलों ने इस मुद्दे पर अपनी रणनीति तय करने के लिए कॉन्ग्रेस समेत अन्य विपक्षी पार्टियों ने इसपर साझा बैठक बुलाई थी, लेकिन वह रद्द हो गई है। इस बीच NCP प्रमुख शरद पवार ने बयान दिया है कि वह प्रधानमंत्री के द्वारा बुलाई गई बैठक में शामिल होंगे।

कुछ मीडिया रिपोर्टों के अनुसार कॉन्ग्रेस ‘एक देश एक चुनाव’ का विरोध करेगी। इसके पीछे कॉन्ग्रेस का कहना है कि आज आप एक देश एक चुनाव की बात करेंगे, कल एक देश एक धर्म की बात होगी, फिर एक देश एक पहनावे की बात होगी।

इस बैठक में NDA के सभी घटक दल शामिल हो रहे हैं। साथ ही अगर गैर एनडीए दल की बात करें तो जगनमोहन रेड्डी, नवीन पटनायक, केसीआर की तरफ से उनके बेटे केटीआर और समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव भी बैठक में शामिल होंगे। अरविंद केजरीवाल की जगह इस बैठक में राघव चड्डा शामिल होंगे।

कर्नाटक कॉन्ग्रेस में उठापटक तेज, AICC ने प्रदेश कमिटी को किया भंग

कर्नाटक कॉन्ग्रेस में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। वहाँ सियासी उठापटक तेज हो गई है। ऑल इंडिया कॉन्ग्रेस कमिटी (AICC) ने कर्नाटक की प्रदेश कमिटी को भंग करने का फैसला किया है। हालाँकि आश्चर्यजनक रूप से प्रदेश कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष और कार्यकारी अध्यक्ष अपने पद पर बने रहेंगे।

आपको बता दें कि लोकसभा चुनाव के बाद राज्यों में हुए पार्टी के प्रदर्शन का आकलन करने को लेकर एक कमिटी बनाई गई थी। अभी तक यही माना जा रहा है कि उस कमिटी की रिपोर्ट के बाद ही नाराज AICC ने यह फैसला लिया है।

इससे पहले कर्नाटक कॉन्ग्रेस से ही एक और खबर आई थी – कॉन्ग्रेस ने पूर्व मंत्री रौशन बेग को पार्टी-विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने के आरोप में पार्टी से निलंबित कर दिया है। हाल ही में उन्होंने लोकसभा चुनाव में करारी हार को लेकर पार्टी के शीर्ष नेताओं की आलोचना की थी, जिस कारण उन्हें कर्नाटक प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी ने निलंबित करने का निर्णय लिया।

सोचने वाली बात यह है कि जिस कर्नाटक प्रदेश कॉन्ग्रेस कमिटी ने रौशन बेग को पार्टी से निकाला, क्या उसे जरा भी अंदाजा होगा कि अगले कुछ घंटों में वो लोग भी रफा-दफा कर दिए जाएँगे! शायद नहीं। कॉन्ग्रेस की उठा-पटक वाली राजनीति में अभी और भी बहुत कुछ देखना शायद बाकी है।

रावण-1: श्री लंका ने अंतरिक्ष में दिखाई धाक, कक्षा में स्थापित किया अपना पहला उपग्रह

श्री लंका ने भी अब अंतरिक्ष में अपनी धाक दिखाई है। हालाँकि, यह द्वीपीय देश इससे पहले अंतरिक्ष में अपने क्रियाकलापों के लिए बहुत चर्चा में नहीं रहा है लेकिन पिछले कुछ दिनों से श्री लंका एक सैटेलाइट को लेकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में चर्चा का बाज़ार गर्म है। ‘रावण-1’ श्री लंका का पहला ऐसा सैटेलाइट है, जिसे अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित किया गया। सोमवार (जून 17, 2019) को ये प्रक्रिया सफलतापूर्वक संचालित की गई। इसे अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन (ISS) से कक्षा में स्थापित किया गया

रावण-1 के साथ ही नेपाल और जापान के 2 BIRDS सैटेलाइट भी कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित किए गए। रावण-1 एक क्यूब सैटेलाइट है, जिसे श्री लंका के 2 रिसर्च इंजीनियरों द्वारा डिजाइन किया गया है। इन दोनों इंजीनियरों ने ही जापान क्यूशू इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में रिसर्च कर इस कार्य को अंजाम दिया और अपने देश का नाम रौशन किया। इसे सोमवार को क़रीब पौने 4 बजे कक्षा में भेजा गया। इन सैटेलाइट्स को इसी वर्ष अप्रैल में अंतरिक्ष में भेजा गया था।

यह सैटेलाइट धरती से 400 किलोमीटर की दूरी पर स्थित कक्षा में पृथ्वी की परिक्रमा करेगा। श्री लंका के इस पहले सैटेलाइट (कक्षा में स्थापित) का वजन 1.5 किलोग्राम है। यह सैटेलाइट श्री लंका और उसके आसपास के क्षेत्रों के चित्र लेकर उस इलाके की भौगोलिक परिस्थितियों को समझने में और बेहतरी प्रदान करेगा। इस सैटेलाइट को कुल 5 मिशन पूरे करने हैं। इसकी न्यूनतम जीवन अवधि डेढ़ वर्ष की है।

फ़िल्म में काम दिलाने का झाँसा देकर नाबालिग से गैंगरेप: बबलू अंसारी और ख़ालिद सहित 3 गिरफ़्तार

झारखण्ड में पुलिस ने नागपुरी फ़िल्म में काम दिलाने का झाँसा देकर बलात्कर करने वाले तीन आरोपितों को गिरफ़्तार कर लिया है। चाईबासा की नाबालिग लड़की के साथ तीन लोगों ने गैंगरेप किया था। सभी आरोपितों के नाम हैं- काँके थाना क्षेत्र में स्थित मुरूम गाँव निवासी मोहम्मद ख़ालिद, पिठोरिया थाना क्षेत्र में स्थित ओखलगड़ा गाँव निवासी बाबू अंसारी, और बीआईटी निवासी यशराज सुनेजा। इन तीनों को आज बुधवार (जून 19, 2019) को जेल भेजने की प्रक्रिया पूरी की गई।

पुलिस द्वारा पूछताछ के दौरान इन तीनों ने बताया कि इन्होंने नागपुरी फ़िल्म में काम करने का प्रलोभन देकर नाबालिग को तीन अलग-अलग जगहों पर ले जाकर रेप किया। सबसे पहले पीड़िता की बातचीत ख़ालिद से हुई। ख़ालिद ने उसे फ़िल्म में काम देने के बहाने राँची बुलाया था। यह 13 जून की घटना है। उसने लड़की को काँटाटोली बस स्टैंड से अपने बाइक पर बिठाया और अपने दोस्त यशराज के बरियातू भरमटोली पहाड़ी स्थित घर पर ले गया। वहाँ ख़ालिद और यशराज ने मिल कर उसके साथ गैंगरेप किया।

दैनिक जागरण के राँची संस्करण में छपी ख़बर

इस घटना के बाद ख़ालिद उसे लेकर बबलू अंसारी के घर गया। ख़ालिद ने लड़की को अंसारी के घर छोड़ दिया, इसके बाद अंसारी ने भी पीड़िता के साथ बलात्कार किया। इन तीनों ने पीड़िता को धमकी भी दी कि किसी से भी ये बात न कहे और इस घटना का जिक्र न करे। इसके बाद कुछ लोगों की मदद से लोअर बाजार थाना पहुँची पीड़िता ने पुलिस को सारे घटनाक्रम की जानकारी दी। इस मामले में महिला थाने में प्राथमिकी दर्ज करने के साथ ही पुलिस ने कार्रवाई शुरू की और सभी आरोपितों को एक-एक कर धर दबोचा।

12 वर्ष की बच्ची के साथ दर्जनों ने 1 साल तक किया Rape, अब्दुल व तवरेज की पुलिस को तलाश

एक 12 वर्षीय बच्ची के साथ ऐसी दरिंदगी की गई कि वह राँची स्थित राजेंद्र इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (RIMS) में लगभग 8 दिनों तक बेहोश रही। ‘हिंदुस्तान’ की ख़बर के अनुसार, मुंबई में दर्जन भर लोगों ने एक साल तक बच्ची का बलात्कार किया। पीड़ित बच्ची के बयान पर शमा परवीन, तबरेज आलम और अब्दुल रहमान के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हुई है। शमा महिला हैं। बरियातू पुलिस ने अधिक जानकारी देते हुए बताया कि पीड़िता कोडरमा की रहने वाली है। डेढ़ साल पहले उसकी मौसी शमा परवीन उसे लेकर मुंबई गई। उसकी मौसी उसे पढ़ाने व अच्छी शिक्षा-दीक्षा दिलाने के बहाने मुंबई ले गई। लेकिन मुंबई ले जाने के बाद बच्ची से नौकरानी की तरह काम कराया जाने लगा।

वहाँ बच्ची से घर का कामकाज कराया जाता और अगर वो विरोध करती तो उसके साथ मारपीट की जाती। हर रात बच्ची को नशे की दवा जबरन खिलाई जाती थी और उसके साथ बलात्कार किया जाता था। जब बच्ची सुबह उठती तो उसके शरीर पर एक भी कपड़ा नहीं होता था। बच्ची ने अपनी मौसी को कई बार इस बात से अवगत कराया लेकिन उसकी मौसी उसे डाँट-डपट कर चुप करा देती थी। फ़रवरी में जब एक रात बच्ची को होश आया तो उसने देखा कि अब्दुल रहमान उसके साथ रेप कर रहा है।

जब बच्ची ने इस बात की जानकारी अपने मौसी को दी तो मौसी ने उसे खूब मारा-पीटा। बच्ची के शरीर को कई जगहों से जला दिया गया, उसे प्रताड़ित किया गया। पुलिस व डॉक्टरों को भी बच्ची के शरीर पर कई जगह जले के निशान मिले हैं। अप्रैल में जब बच्ची की तबियत बहुत ज्यादा ख़राब हो गई, तब उसकी मौसी उसे लेकर कोडरमा पहुँची। जब बच्ची की माँ ने तबियत ख़राब होने का कारण पूछा तो मौसी ने बहाने बना दिए और कहा कि इलाज के लिए वह रुपए देगी। इसके बाद मौसी बिना रुपए दिए मुंबई लौट गई और बच्ची को कोडरमा छोड़ दिया।

बच्ची का इलाज कोडरमा में क़रीब 1 महीने तक चला लेकिन उसके साथ इतनी ज्यादतियाँ हुई थीं कि उसकी तबियत में तनिक भी सुधार नहीं हुआ। इसके बाद उसे राँची स्थित रिम्स में भर्ती करा दिया गया। पुलिस पिछले 8 दिनों से पीड़िता का बयान लेना चाह रही थी लेकिन उसकी स्थिति को देखते हुए यह संभव नहीं हो पा रहा था। बच्ची अभी भी बहुत ज्यादा डरी हुई है। वह किसी को भी देख कर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाने लग रही है। महिला पुलिसकर्मियों द्वारा कोशिश करने के बाद बच्ची ने अपना बयान दर्ज कराया।

बरियातू पुलिस ने कहा कि मामले की प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है और इस मामले में आगे की कार्रवाई के लिए पुलिस की एक टीम को मुंबई भेजा जाएगा। बच्ची के परिजनों का बयान लेने के बाद पुलिस ने रिम्स प्रशासन से उसके इलाज के सम्बन्ध में भी बात की। रिम्स ने आश्वासन दिया है कि पीड़ित बच्ची का इलाज मुफ़्त में किया जाएगा और परिजनों से एक भी रुपया नहीं लिया जाएगा।

4 HoD व 3 Dean का इस्तीफा: TMC समर्थित छात्रों ने दलित प्रोफेसरों की जाति को लेकर कहे थे अपशब्द

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में स्थित रवींद्र भारती विश्वविद्यालय में बवाल खड़ा हो गया है। सोमवार को यूनिवर्सिटी के 4 विभागाध्यक्षों (HODs) और 3 डीन (Deans) ने इस्तीफा दे दिया, जिसके बाद राज्य के शिक्षा मंत्री को वहाँ पहुँच कर स्थिति का जायजा लेना पड़ा। ये सामूहिक इस्तीफा 4 प्रोफेसरों को उनकी जाति को लेकर किए गए अपशब्दों के कारण दिया गया है। ये चारों अनुसूचित जाति से आते हैं। बताया जा रहा है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस के छात्र संघ समर्थित छात्रों ने इन प्रोफेसरों के साथ जातिसूचक अपमानजनक अपशब्द कहे थे।

हिंदुस्तान टाइम्स में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, मंत्री पार्थ चटर्जी ने यूनिवर्सिटी के कुलपति सब्यसाची बासु रे चौधरी और अन्य प्रोफेसरों एवं छात्रों के साथ बैठक कर उनकी बातें सुनी और मामले की जाँच का आदेश दिया। तृणमूल समर्थित छात्रों के इस व्यवहार के कारण पूरे कैंपस में विरोध-प्रदर्शन हुए और उनके ख़िलाफ़ नारे लगे। कहा जा रहा है कि कुछ छात्र बार-बार क्लास बंक कर रहे थे, जिस कारण प्रोफेसरों ने उन्हें ऐसा करने से मना किया था। इसके बाद छात्रों व प्रोफेसरों में तीखी बहस हुई थी।

चटर्जी ने कहा कि दोषियों को नहीं छोड़ा जाएगा। पिछले महीने दलित समुदाय से आने वाली भूगोल की प्रोफेसर सरस्वती केरकेटा ने आरोप लगाया था कि छात्रों व कर्मचारियों के एक वर्ग ने उनकी जातीय पृष्ठभूमि को लेकर अपशब्द कहे थे और क्लास में जानबूझ कर उन्हें बैठने के लिए कुर्सी नहीं दी थी। ऑर्थपेडिक समस्या से जूझ रही सरस्वती ने कहा कि इस बारे में लोगों को पता होने के बावजूद उन लोगों ने उन्हें बैठने नहीं दिया। इसके बाद कुछ अन्य प्रोफेसरों ने इसी तरह के आरोप लगाए कि उनके साथ भी ऐसा ही व्यवहार समय-समय पर किया गया है।

सोमवार को मामला तब प्रकाश में आया जब बंगाली, संस्कृत, अर्थशास्त्र और राजनीतिक विज्ञान- इन चारों विभागों के प्रोफेसरों (HOD) ने अपने पद से सामूहिक इस्तीफा दे दिया। इनके अलावा स्कूल ऑफ लैंग्वेज एंड कल्चर, डिपार्टमेंट ऑफ़ विसुअल आर्ट और बी आर आंबेडकर स्टडी सेंटर के प्रोफेसरों ने सामूहिक इस्तीफा दे दिया। इस मामले पर बैठक करने के बाद पश्चिम बंगाल के शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी ने कहा:

“मैंने इन प्रोफेसरों से निवेदन किया कि वे इस्तीफा न दें। मैंने उनसे कहा कि टैगोर के नाम पर स्थापित विश्विद्यालय में हमें इस तरह की घटनाओं को नहीं होने देना चाहिए। शिक्षक और छात्र के बीच के रिश्ते की हर क़ीमत पर रक्षा की जानी चाहिए। मैंने शिक्षकों एवं छात्रों से भी कहा कि उन्हें सभी क्लासेज में उपस्थिति दर्ज करानी ही चाहिए। जाँच समिति जल्द ही अपनी रिपोर्ट सबमिट करेगी और उसे सार्वजनिक किया जाएगा। मैंने छात्रों से यह भी कहा कि अपमानित किए गए प्रोफेसरों से माफ़ी माँगें।”

प्रोफेसर सरस्वती केरकेटा ने तो यूनिवर्सिटी आना ही बंद कर दिया है। जब शिक्षा मंत्री ने उन्हें कॉल किया, तो उनका फोन ऑफ पाया गया। चटर्जी ने कहा कि अगर उनका फोन लग जाता तो वह उनकी बात सीधे मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से कराते। तृणमूल शिक्षक संघ की सदस्य जोईता रॉय ने कहा कि उन्हें भी नहीं छोड़ा गया और जातिगत टिप्पणी करते हुए प्रताड़ित किया गया। शिक्षक संघ के सचिव ने बताया कि यह सब काफ़ी दिनों से चल रहा है और शिकायत करने के बाद ऐसी घटनाएँ बढ़ ही जाती हैं।

जय भीम जय मीम की कहानी 72 साल पुरानी… धोखा, विश्वासघात और पश्चाताप के सिवा कुछ भी नहीं

बांग्ला में योगेन्द्र को अक्सर जोगेंद्र कहा जाता है। बंगाल के दलित नेता थे जोगेंद्र नाथ मंडल। आपने उनका नाम नहीं सुना होगा। आम तौर पर दल हित चिन्तक उनका नाम लेने से कतराते नजर आएँगे। आजकल जो जय भीम के साथ जय मीम जोड़ने की कवायद चल रही है, ये नाम उसकी नींव ही खोद डालता है। इसलिए इनके बारे में जानने के लिए आपको खुद ही पढ़ना पड़ेगा।

उनका जन्म ब्रिटिश बंगाल में 29 जनवरी 1904 को हुआ था। पाकिस्तान के जन्मदाताओं में से वो एक थे। सन 1940 में कलकत्ता म्युनिसिपल कॉरपोरेशन में चुने जाने के बाद से ही मुस्लिम समुदाय की उन्होंने खूब मदद की। उन्होंने बंगाल की ए.के. फज़लुल हक़ और ख्वाजा नज़ीमुद्दीन (1943-45) की सरकारों की खूब मदद की और 1946-47 के दौरान मुस्लिम लीग में भी उनका योगदान खूब था। इस वजह से जब कायदे आज़म जिन्ना को अंतरिम सरकार के लिए पाँच मंत्रियों का नाम देना था तो एक नाम उनका भी रहा।

जोगेंद्र नाथ मंडल पाकिस्तान के पहले कानून मंत्री थे। जोगेंद्र नाथ मंडल के इस पद को स्वीकारने से कॉन्ग्रेस के उस निर्णय की बराबरी हो जाती थी, जिसमें कॉन्ग्रेस ने अपनी तरफ से मौलाना अबुल कलाम आजाद को मनोनीत किया था।

आप सोचेंगे कि जोगेंद्र नाथ मंडल ने ऐसा क्या किया था कि जिन्ना ने उन्हें चुना? 3 जून 1947 की घोषणा के बाद असम के सयलहेट जिले को मतदान से ये तय करना था कि वो पाकिस्तान का हिस्सा बनेगा या भारत का। उस इलाके में हिन्दुओं और मुस्लिमों की जनसंख्या लगभग बराबर थी। चुनाव में नतीजे बराबरी के आने की संभावना थी। जिन्ना ने मंडल को वहाँ भेजा। दलितों का मत, मंडल ने पाकिस्तान के समर्थन में झुका दिया। मतों की गिनती हुई तो सयलहेट पाकिस्तान में गया। आज वो बांग्लादेश में है।

जोगेंद्र नाथ मंडल

जोगेंद्र नाथ मंडल पाकिस्तान के पहले श्रम मंत्री भी थे। सन 1949 में जिन्ना ने उन्हें कॉमनवेल्थ और कश्मीर मामलों के मंत्रालय की जिम्मेदारी भी सौंप दी थी। इस 1947 से 1950 के बीच ही पाकिस्तान में हिन्दुओं पर लौमहर्षक अत्याचार होने शुरू हो चुके थे। दरअसल हिन्दुओं को कुचलना कभी रुका ही नहीं था। बलात्कार आम बात थी। हिन्दुओं की स्त्रियों को उठा ले जाना जोगेंद्र नाथ मंडल की नजरों से भी छुपा नहीं था। वो बार-बार इन पर कार्रवाई के लिए चिट्ठियाँ लिखते रहे।

इस्लामिक हुकूमत को ना उनकी बात सुननी थी, ना उन्होंने सुनी। हिन्दुओं की हत्याएँ होती रहीं। जमीन, घर, स्त्रियाँ लूटी जाती रहीं। कुछ समय तो जोगेंद्र नाथ मंडल ने प्रयास जारी रखे। आखिर उन्हें समझ आ गया कि उन्होंने किस पर भरोसा करने की मूर्खता कर दी है। जिन्ना की मौत होते ही 1950 में जोगेंद्र नाथ मंडल भारत लौट आए। पश्चिम बंगाल के बनगांव में वो गुमनामी की जिन्दगी जीते रहे। अपने किए पर 18 साल पछताते हुए आखिर 5 अक्टूबर 1968 को उन्होंने गुमनामी में ही आखरी साँसें लीं।

अब आपको शायद ये सोचकर थोड़ा आश्चर्य हो रहा होगा कि कैसे आपने कभी इस नेता का नाम तक नहीं सुना? राजनीति में तो अच्छी खासी दिलचस्पी है ना आपकी? अपने फायदे के लिए कैसे एक समुदाय विशेष ने एक दलित का इस्तेमाल किया था उसका ये इकलौता उदाहरण भी नहीं है। बस समस्या है कि ना आपने खुद पढ़ने की कोशिश की और दल हित चिन्तक तो आपको सिर्फ एक वोट बनाना चाहते हैं! तो वो क्यों पढ़ने देते भला?

यही सिर्फ एक वोट बनकर रह जाने का अफ़सोस था जो आपने रोहित वेमुल्ला की चिट्ठी में लिखा पाया था। उनकी चिट्ठी में जो कुछ हिस्सा आप आज कटा हुआ देखते हैं वो कल कोई और लिखेगा। आप पढ़ने से इनकार करते रहेंगे उधर मासूम अपने खून से बार बार ऐसी चिट्ठियाँ लिखते रहेंगे। कभी सोचा है कि वो आपको जोगेंद्र नाथ मंडल का नाम क्यों नहीं बताते? कभी सोचा है कि वो आपको पढ़ने क्यों नहीं कहते? कभी सोचा है कि उन्होंने आपको चार किताबों का नाम बताकर खुद पढ़कर आने को क्यों नहीं कहा? वो खुद को आंबेडकरवादी कहते हैं ना? आंबेडकर और फुले दम्पति तो जिन्दगी भर शिक्षा के लिए संघर्ष करते रहे! फिर ये क्यों आपको किताबों से दूर करते हैं?

ऐसा वो इसलिए करते हैं क्योंकि पढ़ने के बाद आप सिर्फ एक वोट नहीं रह जाएँगे। पढ़ने के बाद आप दर्ज़नों तीखे सवाल हो जाएँगे। पढ़ने पर आप देखेंगे कि आंबेडकर खुद क्या कहते थे।

बाकी किसी विदेशी फण्ड पर पलने वाले की पूँछ पकड़ कर चलना है, या खुद से दलित चिंतन करना है, ये फैसला तो आपको खुद ही करना होगा।

ये फैसला भी आपको खुद ही करना होगा कि संसद में ‘जय भीम जय मीम’ का नारा लगा कर ओवैसी ने कोई इतिहास नहीं रचा है। और यह समझना भी होगा कि जिस जोगेंद्र नाथ मंडल ने इस तर्ज पर इतिहास रचा था, खुद उनका और उनके प्रयास का हश्र क्या हुआ। यह भी समझना होगा कि जोगेंद्र नाथ मंडल तो नेता थे, मंत्री थे – परिस्थितियाँ विपरीत हुईं तो गुमनामी में सही लेकिन वापस भारत आ गए – लेकिन उनका क्या जो मंडल जी के आह्वान पर मात्र एक वोट बनकर पाकिस्तानी हुए और अब बांग्लादेशी होकर भी कैसी जिंदगी जी रहे होंगे, यह सोचने के लिए किसी दिव्य-दृष्टि की जरुरत नहीं।