शुक्रवार (जून 14, 2019) को पाकिस्तान ने भारत पर आरोप लगाया कि भारत ने विशेष ट्रेन को सीमा पार करने और ‘जोर मेला’ उत्सव के लिए आ रहे करीब 200 श्रद्धालुओं को पाकिस्तान आने की इजाजत ही नहीं दी। खबरों के मुताबिक, इवैक्यूई ट्रस्ट प्रॉपर्टी बोर्ड (ईटीपीबी) के प्रवक्ता आमिर हाशमी ने बताया कि पाकिस्तान ने करीब 200 भारतीय सिखों को जोर मेला में शामिल होने के लिए वीज़ा जारी किया था। ये श्रद्धालु एक विशेष पाकिस्तानी ट्रेन से शुक्रवार को पाकिस्तान पहुँचने वाले थे, ट्रेन उन्हें लेने भारत आने वाली थी, लेकिन भारत सरकार ने ट्रेन को अपनी सीमा में प्रवेश देने से इंकार कर दिया।
हाशमी का कहना है कि भारत ने अनुमति न देने की कोई वजह नहीं बताई है, जबकि अन्य जानकारी एवं खबरों के अनुसार बताया जा रहा है कि इन श्रद्धालुओं को वीजा होने के बाद भी पाकिस्तान इसलिए जाने से रोका गया क्योंकि ये एसजीपीसी (शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी) के माध्यम से नहीं जा रहे थे। इसी कारण इनको अटारी रेलवे स्टेशन पर दाखिल नहीं होने दिया गया। बता दें सिख श्रद्धालुओं को एसजीपीसी की निगरानी और उसकी अगुवाई में ही पाकिस्तान जाने दिया जाता है।
पाकिस्तान का दावा है कि भारत ने 200 सिख तीर्थयात्रियों को लाने के लिए अपनी ट्रेन की सीमा पार करने से इनकार कर दिया https://t.co/2YThJwb5Au
लाहौर: पाकिस्तान ने शुक्रवार को दावा किया कि भारत ने अपनी ट्रेन को सीमा पार करने और जोहड़ मेला उत्सव के लिए लाहौर में कुछ 200 सिख यत्रों क…
सिखों के इस जत्थे में देश के विभिन्न राज्यों के 200 (कुछ खबरों के मुताबिक 130) सिख श्रद्धालु शामिल थे, इन लोगों ने पाकिस्तान जाने नहीं देने पर रेलवे स्टेशन के बाहर ही नारेबाजी की। दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर के अनुसार जत्थे की अगुआई परमजीत सिंह जिजेआनी कर रहे थे। परमजीत ने बताया कि गुरु अर्जुन देव जी के शहीदी दिवस पर गुरुधामों के दर्शन के लिए पाकिस्तानी दूतावास द्वारा इन श्रद्धालुओं को वीजा दिया गया था। इन सिख श्रद्धालुओं को विशेष ट्रेन से पाकिस्तान जाने की मंजूरी दी गई थी। इस जत्थे में बच्चे और 60-70 वर्ष के बुजुर्ग भी थे। उन्होंने बताया कि भारत सरकार द्वारा सुरक्षा का हवाला देकर स्पेशल ट्रेन को भारत में दाखिल नहीं होने दिया गया।
इसके बाद ये श्रद्धालु रेलवे स्टेशन के मुख्य द्वार पर बैठकर ट्रेन का इंतजार करने लगे। इस दौरान सिख श्रद्धालुओं को रोकने के लिए आरपीएफ, जीआरपी व कई सुरक्षा एजेंसियों के जवानों का पहरा गेट पर लगाया गया। जत्थे की अगुआई कर रहे जिजेआनी मुताबिक सिख श्रद्धालुओं को बिना वजह ही परेशान किया गया। उन्हें संघर्ष करने पर मजबूर किया गया। जब ट्रेन के सीमा के अंदर न आने की बात उन्हें पता चली तो उन्होंने अपना गुस्सा दिखाया और नारेबाजी की। रेलवे के कुछ अधिकारियों ने उन्हें कहा कि वे अटारी सीमा पर बनी इंटरग्रेटिड चेकपोस्ट के रास्ते पाकिस्तान जा सकते है। जब श्रद्धालु चेकपोस्ट पर पहुँचे तो उन्हें वहाँ भी निराशा हाथ लगी।
पाकिस्तान में ईटीपीबी जो कि एक सरकारी विभाग है और पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थलों एवं मामलों को देखता है, उसने भारतीय निर्णय का विरोध किया है। उनका कहना है पाकिस्तानी उच्चायोग ने जब सिख यात्रियों के लिए वीजा जारी किया था तो उन्हें लाहौर आने से रोकने की कोई वजह ही नहीं थी। पाकिस्तान ने इस मुद्दे को सरकारी स्तर पर उठाने की बात की है। पाक सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष तारा सिंह का कहना है कि भारत के इस फैसले ने सिख समुदाय को निराश किया है।
पश्चिम बंगाल के सरकारी अस्पताल के 700 से ज्यादा डॉक्टरों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। ऐसा उन्होंने हड़ताल कर रहे जूनियर डॉक्टरों के प्रति एकजुटता दिखाने के लिए किया। कोलकाता स्थित नील रतन सरकार मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में सोमवार (10 जून) को दो जूनियर डॉक्टरों के साथ हुई मारपीट के बाद से शुरू हुआ डॉक्टरों का विरोध प्रदर्शन लगातार तेज होता जा रहा है। इस विरोध प्रदर्शन में डॉक्टरों को दिल्ली, मुंबई, कर्नाटक समेत कई बड़े शहरों के डॉक्टरों का साथ मिला। इससे पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई है। ममता की जिद की वजह से लोगों की जान पर बन आई है। मगर ममता की असंवेदनशीलता बरकरार है और वो अपनी जिद पर कायम हैं।
डॉक्टरों ने काम पर वापस लौटने के लिए माँग की है कि उन्हें पर्याप्त सुरक्षा दी जाए और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो, साथ ही सीएम ममता बनर्जी बिना शर्त डॉक्टरों से माफी माँगे। यही नहीं, दिल्ली स्थित एम्स के डॉक्टरों की असोसिएशन ने भी ममता सरकार को दो दिन (48 घंटे) का अल्टीमेटम दिया है। उन्होंने कहा है कि यदि दो दिनों में पश्चिम बंगाल सरकार ने डॉक्टरों की माँगें स्वीकार नहीं की, तो फिर एम्स में भी अनिश्चितकालीन हड़ताल की जाएगी।
Bengal healthcare in coma as over 700 doctors quit
गुरुवार (जून 13, 2019) को मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एसएसकेएम अस्पताल पहुँची और उन्होंने विरोध प्रदर्शन कर रहे डॉक्टरों को 4 घंटे में काम पर वापस आने का अल्टीमेटम दिया और कहा कि अगर वो 4 घंटे में काम पर नहीं लौटते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इसने डॉक्टरों में व्याप्त गुस्से को शांत करने की बजाए भड़काने का काम किया। इसी का नतीजा है कि एक ही दिन में 700 से ज्यादा डॉक्टरों ने इस्तीफा दे दिया। ममता के बयान के बाद डॉक्टरों में हलचल और तेज हो गई और सीनियर डॉक्टर उनके समर्थन में खड़े हो गए। इससे पहले, गुरुवार को एनआरएस अस्पताल के प्रिंसिपल और वाइस प्रिंसिपल ने पद से इस्तीफा दिया था। वहीं, कॉलेज ऑफ मेडिसिन एंड सागोर दत्ता अस्पताल के 21 सीनियर डॉक्टर भी इस्तीफा दे चुके हैं।
शुक्रवार (जून 14, 2019) को सबसे पहले आरजी कार मेडिकल कॉलेज के 107 डॉक्टरों ने इस्तीफा दिया। इसके बाद तो इस्तीफों का दौर शुरू हो गया। मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के 100, एसएसकेएम के 175, चित्तरंजन नेशनल मेडिकल कॉलेज के 16, एनआरएस मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल के 100 और स्कूल ऑफ ट्रॉपिकल मेडिसिन के 33 डॉक्टरों से पद से त्यागपत्र दे दिया। जिन लोगों ने इस्तीफा दिया है उसमें सीनियर डॉक्टरों के अलावा विभागाध्यक्ष भी शामिल हैं। मंगलवार (जून 11, 2019) से ही राज्य की स्वास्थ्य सेवा चरमराई हुई है। शुक्रवार को भी सरकारी अस्पतालों की ओपीडी बंद रहीं।
लगातार सिमटता जा रहा माओवाद झारखंड में फिर सर उठाने की कोशिश कर रहा है। वामपंथी चरमपंथियों ने हमला कर 3 कॉन्स्टेबलों और 2 सब-इंस्पेक्टरों की हत्या कर दी है। सरायकेला-खरसावां जिले में हुए इस हमले में पुलिस के हथियार भी लूट लिए। हमला तब हुआ जब पुलिस टीम स्थानीय साप्ताहिक बाजार में तलाशी अभियान चलाने के लिए जा रही थी।
Jharkhand: Five policemen shot dead in Saraikela district.More details awaited. pic.twitter.com/mALCjLoJCz
पुलिस टीम तिरुलडीह पुलिस थाने के पास स्थित कुडू बाज़ार जैसे ही पहुँची, वहाँ पहले से मौजूद माओवादियों के दस्ते ने उन पर भारी गोलीबारी शुरू कर दी। पाँच पुलिसकर्मी मारे गए और चालक सुकलाल कुदड़ा ने भाग कर अपनी जान की हिफाज़त की। इस नृशंस हत्याकांड के बाद पाँच से दस मोटरसाइकिलों पर सवार नक्सल आतंकियों ने ‘माओवाद जिंदाबाद’ और ‘नक्सलवाद जिंदाबाद’ के नारे भी लगाए। हमले के बाद उन्होंने हथियार लूटे और नारे लगाते हुए फरार हो गए। प्रत्यक्षदिर्शियों के अनुसार नक्सली बुंडू क्षेत्र की तरफ भागे थे।
मुख्यमंत्री ने जताया शोक, 28 मई के हमले में घायल जवान की मृत्यु
झारखंड के मुख्यमंत्री रघुबर दास ने घटना पर शोक जताते हुए कहा कि समस्त राज्यवासी और सरकार हमले के हताहतों के परिवार के साथ हैं। उन्होंने कहा कि इस हमले से राज्य के सुरक्षाकर्मी विचलित नहीं होंगे और कड़ी कार्रवाई जारी रहेगी। उन्होंने घटना के पीछे कारण वामपंथी आतंकियों की अपनी विचारधारा की अंतिम साँसें लेने से उत्पन्न हताशा को बताया। इस बीच 28 मई को हुए पिछले हमले में घायल कोबरा फ़ोर्स के कांस्टेबल सुनील कलिता की मौत दिल्ली के ईएमएस में हो गई। वह 28 मई को हुए आईईडी धमाके में बुरी तरह ज़ख़्मी हो गए थे।
Constable Sunil Kalita of 209 CoBRA who sustained injures in an IED blast on 28 May during anti-naxal operations in Saraikela, Jharkhand and was under treatment at AIIMS, Delhi succumbed to his injuries, yesterday.
साल-दर साल जिस तरह मौसम का मिजाज बदलता जा रहा है उसका असर न सिर्फ इंसानों पर बल्कि पूरे के पूरे जैवमंडल से लेकर पारिस्थितिकी तंत्र पर दृष्टिगत हो रहा है। लेकिन, पिछले कई सालों में मौसम की अनिश्चितता ने यदि सबसे ज़्यादा किसी को प्रभावित किया है तो वह है माइग्रेटरी बर्ड्स। इस समय कुछ शहरों का तापमान 45-47 डिग्री है। जहाँ सबसे ज़्यादा उड़ते हुए पक्षी गिरकर घायल होने या हीटस्ट्रोक के कारण मर जा रहे हैं।
द हिन्दू की एक रिपोर्ट के अनुसार, गर्मी से बेहाल होकर, बुरी तरह थककर कई पक्षियों को गिरते हुए कई लोगो द्वारा देखा गया है। जिसकी सूचना एनिमल वेलफेयर संस्था को दे दी जा रही है। भारतीय प्राणी मित्र संघ के महेश अग्रवाल ने बताया कि कल ही उन्हें हैदराबाद के दिलसुखनगर से ऐसे ही एक गर्मी से बेहाल पक्षी के गिरने की सूचना मिली, जिसे प्राथमिक चिकित्सा देकर बचा लिया गया।
साथ ही, उन्होंने यह भी बताया की नजदीकी पक्षियों को तो बचा लिया जा रहा है लेकिन दूर के पक्षी तक हमारे स्वयंसेवकों को पहुँचने से पहले ही वो दम तोड़ दे रहे हैं।
एक वेटनरी डॉक्टर ने बताया, “इतनी गर्मी में क्रेन और स्टॉर्क जैसे पक्षी उतने प्रभावित नहीं हो रहे हैं क्योंकि ये वॉटर बॉडीज में रहते हैं। लेकिन ऊँची उड़ान भरने वाले दूसरे पक्षी इतनी अधिक गर्मी को बर्दास्त न कर पाने के कारण बुरी तरह थककर गिरने से दम तोड़ दे रहे हैं।”
गिद्ध भी ऊँचा उड़ते हैं लेकिन आमतौर पर ये बादलों से ऊपर उड़ान भरते हैं और ये 50 डिग्री तक के तामपान को सहने में सक्षम होते हैं। इन पर गर्मी का प्रभाव उतना नहीं देखने को मिल रहा है।
कारणों की पड़ताल में विशेषज्ञ लगे हुए हैं लेकिन प्राथमिक कारण गर्मी में पक्षियों के लिए शेल्टर का अभाव और वाटर बॉडीज का सुख जाना भी एक कारण बताया जा रहा है। ज़्यादातर पक्षी गर्मी में हार्टस्ट्रोक से भी मर रहे हैं।
यह सब देखकर पर्यावरणविद चिंतित हैं। साथ ही उनका कहना है कि आने वाले समय अगर पर्यावरण पर ध्यान नहीं दिया गया तो पर्यावरणीय क्षति पक्षियों के साथ-साथ मनुष्यों के लिए भी घातक परिणाम लेकर आने वाला है।
पश्चिम बंगाल में डॉक्टरों की जारी हड़ताल और उनकी सुरक्षा आश्वासन देने की माँग न मानने के ममता बनर्जी के हठ ने एक मासूम को लील लिया। बंगाल में 3 दिन के एक बच्चे की जान इलाज के अभाव में चली गई है। उसके पिता के अनुसार वह उसे जहाँ-जहाँ लेकर गए, डॉक्टरों ने इलाज करने से मना कर दिया। खबर सोशल मीडिया पर सबसे पहले आनंद बाजार पत्रिका की फोटो जर्नलिस्ट ने ब्रेक की है।
मासूम का शव हाथ में ले फफकता पिता
आनंद बाजार पत्रिका की छायाकार दमयंती दत्ता ने सफ़ेद कफ़न में लिपटे मासूम के शव को लिए हुए फफकते पिता की फ़ोटो शेयर करते हुए लिखा, “#Savethedoctors और #SaveBengal के बीच यह एक पिता है जिसने अपने नवजात को इसलिए खो दिया क्योंकि डॉक्टरों ने शिशु का इलाज नहीं किया। आज का @MyAnandBazar चित्र।” (अनूदित)
फर्स्टपोस्ट की खबर के अनुसार शिशु के पिता अभिजित मलिक का बयान है, “उसे (उनके बेटे को) डॉक्टरी सहायता की ज़रूरत थी। मैं उसे कई अस्पतालों में लेकर गया। किसी ने सहायता नहीं की। उसकी गलती क्या थी? इस हड़ताल ने मेरे बेटे की जान ले ली।”
फर्स्टपोस्ट की खबर
मालूम हो कि पश्चिम बंगाल में एनआरएस अस्पताल में एक समुदाय विशेष मरीज की हृदयघात से मृत्यु हो जाने के बाद उसके तीमारदारों द्वारा भीड़ जुटाकर जूनियर डॉक्टरों पर हमला बोल दिया गया था। पुलिस ने भी सक्षम तरीके से डॉक्टरों की सहायता नहीं की (जिसके पीछे कारण ममता बनर्जी की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति माना जा रहा है), और दो डॉक्टरों को इतनी गंभीर चोटें आईं कि उन्हें आईसीयू में भर्ती करना पड़ा। इसके बाद इसके विरोध में पहले तो एनआरएस के और फिर पूरे प्रदेश में जूनियर डॉक्टर बड़ी तादाद में हड़ताल पर चले गए हैं। डॉक्टरों की माँग है कि ममता बनर्जी हमले के आरोपितों को तुरंत गिरफ़्तार करवाएँ और डॉक्टरों की अस्पताल में सुरक्षा सुनिश्चित करें।
वहीं मुख्यमंत्री ने उनकी माँगें माँगने की बजाय पहले तो उन्हें हड़ताल से दिक्कतें और इलाज के आभाव में मौत का खतरा झेल रहे मरीजों का हवाला दे कर मनाने की कोशिश की। लेकिन जब वह नहीं माने तो बनर्जी ने उन्हें हड़ताल खत्म करने का अल्टीमेटम और न करने पर गंभीर परिणाम की चेतावनी दी। इसके अलावा पूरे मामले में उन्होंने भाजपा और माकपा पर भी प्रदेश में साजिश करने का आरोप लगाया है।
उच्च न्यायालय की अपील
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने मामले में एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए तरफ़ डॉक्टरों को मरीज की भलाई को सर्वोपरि रखने की अपनी व्यवसायिक शपथ (हिप्पोक्रेटिक ओथ) याद दिलाई, और दूसरी ओर सरकार से आग्रह किया कि डॉक्टरों की सुरक्षा सुनिश्चित करे और मामले का शांतिपूर्ण हल निकाले। उच्च न्यायालय ने जनहित याचिका की सुनवाई के लिए एक हफ़्ते बाद 21 जून की तारीख़ मुकर्रर की है।
NDTV पिछले कई सालों से वित्तीय अनियमितताओं और टैक्स फ्रॉड के कारण जाँच एजेंसियों के रडार पर थी। NDTV प्रमोटर्स प्रणय रॉय और उनकी वाइफ राधिका रॉय को एक बड़ा झटका देते हुए सेबी ने सिक्योरिटी एक्सचेंज मार्केट में लेन-देन और NDTV मैनेजमेंट में किसी भी पोस्ट से 2 साल के लिए बाहर कर दिया है। 2009-10 से ही विभिन्न जाँच एजेंसियाँ प्रणय और राधिका के कई टैक्स फ्रॉड और वित्तीय अनियमितताओं की जाँच कर रही थी। इससे पहले प्रणय और राधिका रॉय को सेबी ने 10 सितम्बर 2018 को कारण बताओ नोटिस भेजा था।
.@SEBI_India: BARS NDTV PROMOTERS FROM ACCESSING SECURITIES MARKETS FOR 2 YEARS
BSE द्वारा दी गयी सूचना के अनुसार, प्रणय रॉय और राधिका रॉय को, जो NDTV के प्रमोटर हैं, 10 सितम्बर 2018 को कारण बताओ नोटिस मिला था। यह नोटिस 31 अगस्त 2018 को SEBI द्वारा SEBI एक्ट के सेक्शन 11(1), 11(4) और 113 के तहत भेजा गया था जिसमें इसी एक्ट के सेक्शन 12A (d)और (e) के उल्लंघन के मामले का ज़िक्र है। इस नोटिस में SEBI (Prohibition of lnsider Trading) Regulations, 1992 के रेगुलेशन 3(i) और 4 का उल्लंघन भी शामिल है।
SEBI एक्ट का सेक्शन 12A इनसाइडर ट्रेडिंग से ताल्लुक रखता है जिसका मतलब है कि वैसे व्यक्ति कंपनी के शेयर/सिक्योरिटी आदि खरीद-बेच नहीं सकते जिनके पास कंपनी की भीतरी जानकारियाँ उपलब्ध होती हों। इससे पहले भी NDTV का पाला इनकम टैक्स डिपार्टमेंट से पड़ चुका है।
इससे पहले, इनकम टैक्स डिपार्टमेंट द्वारा भेजा गया कारण बताओ नोटिस 2009-10 में IT डिपार्टमेंट द्वारा 436.80 करोड़ रुपए की पैनल्टी के सन्दर्भ में था। NDTV ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया लेकिन उन्होंने इस मामले में दखल देने से मना कर दिया था और कहा था कि चैनल इनकम टैक्स कमिशनर (अपील) के पास जाए। कमिशनर ने उनकी अपील ठुकरा दी और पूरा फाइन भरने के लिए 15 जून, 2018 तक की मोहलत दी थी।
पूर्व भारतीय क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर ने एक ऑस्ट्रेलियाई बैट निर्माता कंपनी स्पार्टन पर मुक़दमा दायर किया है, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि कंपनी ने अपने उत्पादों को प्रमोट करने के लिए उनके नाम और फोटो का इस्तेमाल किया और उन्हें रॉयल्टी के रूप में 20 लाख डॉलर (क़रीब 14 करोड़ रुपए) का भुगतान भी नहीं किया।
दस्तावेज़ों के अनुसार, सचिन ने यह मुक़दमा 5 जून को फेडरल कोर्ट में दायर किया। सिडनी स्थित स्पार्टन स्पोर्ट्स इंटरनेशनल कंपनी ने 2016 में सचिन के नाम और फ़ोटो का इस्तेमाल अपने उत्पादों को प्रमोट करने के लिए उन्हें कम से कम 1 मिलियन डॉलर (क़रीब 7 करोड़ रुपए) का भुगतान करने की बात कही थी। सचिन तेंदुलकर ने कंपनी के उत्पादों को प्रमोट करने के लिए लंदन और मुंबई में आयोजित होने वाले कार्यक्रमों में हिस्सा भी लिया था।
ख़बर के अनुसार, दस्तावेज़ों से पता चला है कि सितंबर 2018 तक सचिन को कंपनी द्वारा किसी भी तरह का कोई भुगतान नहीं किया गया। तेंदुलकर ने बताया कि कंपनी द्वारा उन्हें भुगतान न किए जाने पर उन्होंने भुगतान के लिए औपचारिक अनुरोध भी किया। लेकिन, जब कोई जवाब नहीं आया, तो उन्होंने समझौते को समाप्त कर दिया और कंपनी से अपने नाम व फ़ोटो के इस्तेमाल करने के लिए मना कर दिया। बावजूद इसके कंपनी ने उनके नाम व फ़ोटो का इस्तेमाल करना जारी रखा। न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स ने इस मामले में कंपनी के चीफ़ ऑपरेटिंग ऑफ़िसर से सवाल किए, जिसका अब तक कोई जवाब नहीं दिया गया।
पूर्व क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर टेस्ट और वन-डे में सबसे अधिक रन बनाकर इतिहास रचने वाले खिलाड़ी हैं। उन्होंने इंटरनेशनल क्रिकेट में 34 हज़ार से अधिक रन बनाए हैं। इतना ही नहीं उन्होंने शतकों के शतक का शानदार इतिहास भी रचा है। सचिन के 24 साल के क्रिकेट करियर पर वर्ष 2013 में विराम लगा था। 2012 में उन्हें ऑस्ट्रेलिया ने अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान में से एक ‘ऑर्डर ऑफ़ ऑस्ट्रेलिया’ का सम्माननीय सदस्य बनाया था।
ममता बनर्जी अपने ही राज्य के डाक्टरों को बाहरी बताते हुए उन पर हमलावर हैं। जबकि, डॉक्टरों की माँग इतनी थी कि हमलावरों-गुंडों पर गैरजमानती धाराओं में मुकदमा दर्ज किया जाए और उनकी सुरक्षा राज्य सुनिश्चित करे। अलबत्ता, मुद्दा सुलझाने को कौन कहे, ममता ने डॉक्टरों को हड़ताल ख़त्म करने की धमकी देकर, अपनी गैर-जिम्मेदारी का परिचय और गुंडों को समर्थन, दोनों, दे दिया। ममता की धमकी को डॉक्टरों ने न सिर्फ नज़रअंदाज किया बल्कि अपनी सुरक्षा और गुंडों पर कार्रवाई जैसी बुनियादी माँगों के लिए, अपना इस्तीफा तक देने को तैयार हो गए। इतने पर भी ममता का अहंकार शांत नहीं हुआ, उन्होंने उल्टा आरोप लगा दिया की बीजेपी है इन सबके पीछे।
ऐसा करके ममता बनर्जी डॉक्टरों के दोनों जायज़ और बुनियादी माँगों से कन्नी काट गईं। फिर क्या था पूरे देश के डॉक्टरों ने पश्चिम बंगाल के डॉक्टरों को समर्थन देने के लिए शुक्रवार (जून 14, 2019) को ‘ऑल इंडिया प्रोटेस्ट डे’ के रूप में सड़क पर आ गए। हालाँकि, यहाँ भी मीडिया का एक बड़ा धड़ा, इस मुद्दे पर ममता की सनक साफ देखते हुए भी कुछ भी बोलने से कतरा रहा है। क्योंकि, यहाँ भी पीड़ित डॉक्टर हिन्दू और डॉक्टरों को पीटने वाले दबंग गुंडे मजहब विशेष के, आम तौर पर पश्चिम बंगाल में तृणमूल के कोर वोटर हैं। अब ममता उन पर कोई एक्शन ले तो कैसे ले। उन पर एक्शन लेना मतलब अपनी राजनीतिक जमीन में खुद ही सेंध लगा देना, वो भी ऐसे समय में जब वह हाल के ही लोकसभा चुनावों में एक तरह से अपनी आधी सत्ता बीजेपी को सौंप चुकीं हैं।
तो, ममता ने इससे पहले होती बीजेपी कार्यकर्ताओं की निर्मम हत्याओं की तरह ही इसे भी राजनीतिक रंग देते हुए शोर मचाना शुरू कर दिया कि बीजेपी वर्कर और ‘बाहरी’ ही उनके खिलाफ लगातार प्रोटेस्ट कर रहे हैं।
जबकि, प्रदर्शनकारी डॉक्टरों ने ममता के इस आरोप को सिरे से ख़ारिज करते हुए ममता को यह याद दिलाने के लिए मुखर हो उठे कि वह सभी इसी राज्य के डॉक्टर्स हैं न कि बाहरी व्यक्ति। इस समस्या से खुद को निपटने में अक्षम पाकर उल्टा ममता बनर्जी डॉक्टरों पर ही आरोप मढ़ने लगीं हैं। उन्होंने कल यहाँ तक कह दिया, “जब मैं कल हॉस्पिटल के आपात चिकित्सा में गई तो वहाँ मुझे गालियाँ दी गई लेकिन मैंने उन्हें माफ़ कर दिया।”
ममता बनर्जी के इस स्टेटमेंट से भी साफ है कि वह इस मसले में यह नहीं कह रहीं कि दोषियों पर राज्य करवाई करेगी जबकि कल ही जब राज्यपाल ने सर्वदलीय बैठक बुलाई तो ममता ने राज्यपाल पर ही आरोप लगाते हुए यह कह दिया, “राज्यपाल बीजेपी के आदमी हैं उनका यहाँ के कानून से कोई लेना-देना नहीं। कानून राज्य का विषय है, इसलिए मैं नहीं जा रही, मेरी तरफ से कोई जाएगा, चाय पी के आ जाएगा।”
सही कहा ममता बनर्जी ने कि लॉ एंड ऑर्डर राज्य का विषय है लेकिन यह बताना भूल गईं कि जब राज्य कानून व्यवस्था सम्भालने में अक्षम हो जाए या जानबूझकर राज्य गुंडागर्दी, अराजकता, दंगा और हत्याओं को खुला समर्थन दे तो संविधान में इसका भी प्रावधान राज्यपाल के ही माध्यम से राष्ट्रपति शासन के रूप में किया गया है।
ममता बनर्जी शायद खुद को ही संविधान मानने लगी हैं या संविधान से भी ऊपर की सत्ता साम्राज्ञी, तभी तो अक्सर वह पश्चिम बंगाल में जघन्य से जघन्य अपराधों पर लगातार राजनीति की आड़ ले पर्दा डालती नज़र आती हैं। खुद प्रधानमंत्री के शपथ ग्रहण का बहिष्कार तक कर देतीं हैं, क्योंकि उसमें जिन बीजेपी कार्यकर्ताओं को तृणमूल के गुंडों ने मौत के घाट उतारा था, उनके परिवारों को बुलाया गया था। इसके बाद भी वह राज्य में लगातार हो रही बीजेपी कार्यकर्ताओं की हत्या पर मौन हैं क्योंकि उन्हें पता है कि हत्यारे उनकी ही पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडे हैं। जिनका बचाव आजकल यह कहकर किया जा रहा है कि ‘ऐसा तो बंगाल में होता ही रहता है।’ उनके खिलाफ राज्य में कोई भी आवाज उठाता है तो उसे तत्काल बाहरी कहने से नहीं चूकने वाली ममता शायद भूल गई हैं कि बंगाल उनका ‘गणराज्य’ नहीं बल्कि देश का ही एक छोटी-सी इकाई ‘राज्य’ है और देश में किसी भी नागरिक को कहीं भी आने-जाने और व्यवसाय की निर्बाध स्वतंत्रता है।
मीडिया का एक धड़ा जो खुद को लगातार निष्पक्ष बताता आया है, वह इस पर मौन है और तमाम वामपंथी बुद्धिजीवियों ने इस पर चुप्पी साध ली है, जैसे बंगाल में या तो ‘कुछ हुआ ही नहीं’ या ‘हुआ तो हुआ।’ अब यहाँ किसी अवार्ड वापसी गैंग को अराजकता और तानाशाही नज़र नहीं आ रही, लेकिन इन मौन आवाजों के बीच भी आवाज उन्हीं डॉक्टरों ने उठाई है, जिन पर पश्चिम बंगाल के स्वास्थ्य देखभाल की जिम्मेदारी है, जो आज अपने ही स्वास्थ्य और सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। उनका एक साथी डॉक्टर गंभीर रूप से घायल है और दूसरा ज़िन्दगी और मौत के बीच झूल रहा है। यहाँ 200 से अधिक लोगों की अराजक और आक्रोशित भीड़ में किसी को भी अपराधी या गुंडे नज़र नहीं आ रहे क्योंकि पीड़ित यहाँ न ‘नज़ीम’ है, न ‘अख़लाख़’ बल्कि यहाँ दंगाइयों और उपद्रवियों के नाम में मोहम्मद या ऐसा ही कुछ जुड़ा है।
डॉक्टरों की न्याय की माँग को नज़रअंदाज करते हुए जब राज्य की मुखिया ही अन्याय के आगे ढाल बनकर खड़ी हो तो ऐसी तानाशाही का मुखर विरोध ज़रूरी है। विरोध में, पश्चिम बंगाल में लगातार डॉक्टरों के इस्तीफे जारी हैं। देश के विभिन्न राज्यों के डॉक्टर्स खुलकर इस अन्याय के खिलाफ खड़े हो गए हैं। सबकी एक ही माँग है दोषियों पर कार्रवाई और डॉक्टरों की सुरक्षा का इंतज़ाम ताकि वे निश्चिन्त हो अपना काम कर सकें। कायदे से वहाँ सुरक्षा तो उन सभी नागरिकों को मिलनी चाहिए जो उनके ही पार्टी के गुंडों के सताए हुए हैं और उनको भी न्याय की दरकार है जो एक सत्तालोलुप मुख्यमंत्री की राजनीतिक दुश्मनी में अपने जान गँवा चुके हैं।
मुखर आवाजों ने विरोध का बिगुल बजा दिया है। ममता के ‘बाहरी’ राग के गुब्बारे की हवा निकाल दी है। रिपब्लिक को दिए अपने बयानों में सबने पश्चिम बंगाल के मौजूदा हालात की पोल खोल दी है।
NRS हॉस्पिटल में न्याय की माँग के लिए आवाज बुलंद करते हुए एक डॉक्टर ने कहा, “मैं अपने मुख्यमंत्री के बयान पर शर्मिंदा हूँ, यदि वह चाहतीं तो समस्या को सुलझा सकती थीं। वह उन पर तुरंत कार्रवाई कर सकती थीं लेकिन वह इसे नज़रअंदाज कर रही हैं। वह न्याय को नकार रहीं हैं। इस प्रतिरोध में कोई भी बाहरी नहीं है, ममता बनर्जी इस पूरे घटनाक्रम को राजनीतिक रंग देना चाहतीं हैं।”
#DoctorsFightBack | ‘We are not outsiders,’ say protesting doctors at NRS Hospital in Kolkata in unanimous response to West Bengal CM Mamata Banerjee. Tune in for #LIVE updates as doctors from across the country show solidarity with them https://t.co/LGCyJUEBn5pic.twitter.com/Ujz5bHqVeo
एक दूसरे डॉक्टर ने ममता बनर्जी के बाहरी के कहने का जवाब दिया कि “हम डॉक्टर्स हैं और आज यहाँ सफ़ेद एप्रन के लिए लड़ रहे हैं, हम बाहरी नहीं हैं, हमारा सी.पी.एम. या बीजेपी से कोई सम्बन्ध नहीं।”
#DoctorsFightBack | ‘We are doctors, we are not CPM, we are not BJP, we are not outsiders, we are doctors!,’ say protesting doctors at NRS Hospital in Kolkata refuting West Bengal CM Mamata Banerjee, even as doctors from across India stand with them https://t.co/LGCyJUEBn5pic.twitter.com/C0dRZfqxto
ममता के आरोपों और धमकियों का विरोध कर रहे, डॉक्टरों के एक दूसरे समूह ने भी ममता के बेतुके बयानों को आड़े हाथों लेते हुए, उन्हें सिर्फ इतना याद दिलाया कि न्याय का गला घोंटकर दोषियों के साथ मत खड़े होइए, जिन्होंने डॉक्टरों पर हमला किया, उन पर तत्काल कार्रवाई किया जाए।
रेजिडेंट डॉक्टरों के एक बड़े संगठन URDA के प्रेजिडेंट डॉ मनु गौतम ने कहा, “हम आज ममता बनर्जी के बयान से केवल नाराज ही नहीं हैं, हम उम्मीद भी खोते जा रहे हैं क्योंकि अब जो हो रहा है वह बहुत ज़्यादा है। हम इसलिए डॉक्टर्स नहीं बने हैं कि इस तरह से पब्लिक द्वारा पीटें जाएँ। लोगों को समझना होगा कि हम भगवान नहीं हैं।” साथ ही यह भी कहा कि पश्चिम बंगाल में इंटर्न और रेजिडेंट डॉक्टर्स 36-42 घंटे तक लगातार काम करते हैं वह भी बहुत ही अमानवीय स्थिति में….
फ़िलहाल, हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल में डॉक्टरों के हड़ताल का समाधान बातचीत से हल करने का निर्देश दे दिया है। लेकिन ममता बनर्जी अभी भी जिद पर अड़ी हैं। एक तरफ राजनीति है तो दूसरी तरफ राज्य का लॉ एंड ऑर्डर और अब इस मुहीम में डॉक्टरों का साथ देने के लिए न सिर्फ पश्चिम बंगाल में बल्कि अन्य राज्यों के भी साथी डॉक्टरों भी विरोध प्रदर्शन में शामिल हो गए हैं। कोलकाता में अब तक लगभग 69 डॉक्टरों ने अपना इस्तीफ़ा सौंप दिया है, साथ ही एनआरएस मेडिकल कॉलेज और अस्पताल में डॉक्टरों के खिलाफ हिंसा को लेकर बंगाल में दो प्रोफेसरों ने भी अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। प्रोफेसर सैबाल कुमार मुखर्जी ने एनआरएस मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल कोलकाता के प्रिंसिपल और मेडिकल सुपरिटेंडेंट के पद से इस्तीफा दिया तो वहीं, प्रोफेसर सौरभ चट्टोपाध्याय ने वाइस-प्रिंसिपल पद से इस्तीफा दे दिया और अब डॉक्टर्स के इस्तीफे की झड़ी सी लग गई है। सीनियर डॉक्टर भी ममता बनर्जी के विरोध में उतर आए हैं।
#DoctorsStrike: Intensifying the protest, at least 69 doctors at Kolkata’s RG Kar Medical College and Hospital submit mass resignation.
They are demanding an unconditional apology from @MamataOfficial.
जिस तरह से पिछले पाँच दिनों से यह सब घटित हो रहा है और ममता बनर्जी का अभी तक का जो रवैया रहा है, लगता ही नहीं कि उन्हें सिवाय अपनी राजनीति और वोट बैंक के, डॉक्टरों की सुरक्षा या आम मरीज़ के जीवन की तनिक भी चिंता है। फिर भी, अब देखना यह है कि क्या अब भी ममता चेततीं हैं, इस घटना से सबक लेतीं हैं या अभी भी इस मुद्दे को राजनीति के चश्में से ही देखतीं हैं। उम्मीद कम ही है क्योंकि, अभी भी एक आसान सी माँग पर कुछ भी ढंग का नहीं बोल पाई हैं। सवाल ज्यों का त्यों है, क्या उनकी सरकार डॉक्टरों के काम करने हेतु सुरक्षित माहौल दे सकेगी? क्या बंगाल में बीजेपी कार्यकर्ताओं की नृशंष हत्या का सिलसिला रुकेगा या राजनीतिक जंग के नाम पर बुरे से बुरे और बर्बर कृत्य को भी जायज ठहराने का सिलसिला यूँ ही जारी रहेगा? यह वक्त ही बताएगा।
पिछले दिनों दिल्ली सरकार ने मेट्रो, डीटीसी बसों और क्लस्टर बसों में महिलाओं के लिए मुफ़्त सफर की घोषणा की थी। सरकार अब मेट्रो की फीडर बसों में भी महिलाओं के लिए मुफ़्त सफर की तैयारी में है। वर्तमान में, दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (DMRC) के पास 174 फीडर बसे हैं और जल्द ही 905 फीडर बसों को जोड़े जाने की योजना है। भारतीय जनता पार्टी ने इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ आम आदमी पार्टी पर निशाना साधा है और कहा है कि इस योजना को आगामी विधानसभा चुनावों के लिए वोटर्स को लुभाने का प्रयास बताया है।
DMRC ने दिल्ली सरकार को सौंपे अपने प्रस्ताव में कहा कि महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा को लागू करने से लगभग 1560 करोड़ रुपए का वार्षिक ख़र्च होगा, इसमें से 11 करोड़ रुपए का ख़र्च फीडर बसों पर आएगा।
बुधवार (12 जून) को, मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि दिल्ली सरकार द्वारा DMRC को इस रकम का भुगतान किया जाएगा। DMRC ने अपनी 8 पेज की रिपोर्ट में, इस बात का भी ज़िक्र किया कि महिलाओं को मुफ़्त सफर कराने वाली इस योजना का भविष्य में दुरुपयोग भी हो सकता है। DMRC ने क़ानूनी सलाहकार से भी चर्चा की और यह जानने का प्रयास किया कि क्या इस तरह की वित्तीय सब्सिडी या अनुदान राज्य सरकार द्वारा दिल्ली मेट्रो रेलवे (संचालन और रखरखाव) अधिनियम, 2002 के तहत यात्रियों के एक विशेष वर्ग को दी जा सकती है?
लीगल टीम ने इलेक्ट्रिसिटी एक्ट 2003, राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण अधिनियम 1988 और एयरपोर्ट इकोनॉमिक रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया एक्ट, 2008 जैसे क़ानूनों का भी विश्लेषण किया ताकि यह निष्कर्ष निकाला जा सके कि मेट्रो अधिनियम के तहत इस तरह का कोई प्रावधान मौजूद है कि नहीं? इस विश्लेषण से पता चला कि इस तरह का कोई प्रावधान नहीं है।
इससे पहले, DMRC ने सरकार के सामने मुफ़्त सफर की व्यवस्था को लागू करने के लिए दो प्रस्ताव रखे थे। इसमें से पहले प्रस्ताव में योजना को लंबे समय के लिए लागू करने के लिए तक़रीबन 12 महीने से अधिक समय लगने की बात कही गई थी, क्योंकि इस व्यवस्था को कार्यान्वित करने के लिए सॉफ्टवेयर बदलना पड़ेगा। वहीं, दूसरे प्रस्ताव में अस्थायी रूप से लागू करने के लिए गुलाबी टोकन व्यवस्था के ज़रिए 8 महीने का समय माँगा।
एंटी-करप्शन ब्यूरो (एसीबी) की टीम ने राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) में नाम जोड़ने के एवज में रिश्वत लेते हुए दो अधिकारियों को गिरफ्तार किया है। टीम ने गुरुवार (जून 13, 2019) को सैयद शाहजहाँ और राहुल परासर को 10 हजार रुपए बतौर रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा है। इन दोनों को गुवाहाटी स्थित दिसपुर एनआरसी केंद्र नंबर आठ के कार्यालय से गिरफ्तार किया गया है।
Assam: 2 NRC officials in Dispur were caught red-handed by Directorate of Vigilance&Anti-Corruption y’day while accepting bribe of Rs 10,000 from a man for entering his name in draft NRC. Arrested officials Syed Shahjahan&Rahul Parashar will be produced before Special Court today pic.twitter.com/utpRhHPZvP
सैयद शाहजहाँ फील्ड लेवल अधिकारी और राहुल पराशर असिस्टेंट लोकल रजिस्ट्रार ऑफ सिटिजन रजिस्ट्रेशन के पद पर तैनात हैं। दोनों के खिलाफ दिसपुर जिले की आनंद नगर निवासी कजरी घोष दत्ता ने एंटी-करप्शन ब्यूरो में शिकायत की थी। कजरी के अनुसार उनका नाम एनआरसी के ड्राफ्ट में शामिल नहीं हैं। उनका कहना है कि जब उन्होंने एनआरसी ड्राफ्ट में नाम शामिल करने के लिए आवेदन किया, तो अधिकारियों ने उनसे रिश्वत के तौर पर 10 हजार रुपए माँगे।
एसीबी निदेशक ने घटना की जानकारी देते हुए बताया कि आरोपितों के पास से रुपए और महत्वपूर्ण दस्तावेज जब्त कर लिए गए हैं। एनआरसी सेवा केंद्र पर भी जाँच की जा रही है। दरअसल, दोनों आरोपितों ने महिला के आवेदन में कुछ गलतियाँ निकाली थी और इन्हीं गलतियों को दूर करने के बदले में महिला से 10 हजार रुपए की माँग की गई थी। फिलहाल, दोनों आरोपितों को अदालत में पेश किया जाएगा।
जानकारी के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट के आदेशनुसार आगामी 31 जुलाई से पहले एनआरसी का फाइनल और सम्पूर्ण ड्राफ्ट प्रकाशित हो जाएगा। पिछले साल जुलाई में एनआरसी की सूची आने के बाद पूर्वोत्तर के दो राज्य पश्चिम बंगाल और असम में खासा राजनीतिक हंगामा हुआ था। जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 8 मई को सुनवाई करते हुए आदेश दिया था कि एनआरसी का अंतिम प्रकाशन 31 जुलाई तक हो जाना चाहिए। कोर्ट ने पहले चरण में ड्राफ्ट से शामिल न हो पाए असम के 40 लाख आवेदकों को भारतीय नागरिकता के प्रमाण के लिए 25 मार्च, 1971 या उससे पहले के किसी भी सरकारी दस्तावेज के साथ आवेदन करने का दोबारा मौका दिया है।