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इस्लामिक बैंकिंग और हलाल निवेश के नाम पर ₹2000 करोड़ ऐंठने के बाद मंसूर खान करना चाहता है ख़ुदकुशी

बेंगलुरु में एक निवेशक फर्म का मालिक निवेशकों का सैकड़ों करोड़ रुपया लेकर चंपत हो गया है। कंपनी के मालिक के खिलाफ पुलिस विभाग में महज 5 घंटों में 3300 शिकायत दर्ज हुई। शिकायतकर्ताओं में अधिकतर बेंगलुरु के मुस्लिम समुदाय के लोग हैं।

दरअसल, सन 2006 में खाड़ी से लौटे मोहम्मद मंसूर खान ने इस्लामिक बैंकिंग और हलाल निवेश के नाम पर एक फर्म बनाई जिसका नाम रखा ‘आई मॉनेटरी एडवाइजरी’ (I Monetary Advisory). इस्लामिक बैंकिंग के नाम पर मंसूर खान ने अपने समुदाय के लोगों से इस फर्म में निवेश करने को कहा। उसने उन मुस्लिमों को निशाना बनाया जो इस्लामिक कानून के डर से किसी वित्तीय फर्म में निवेश करने से कतराते हैं। निवेश आने पर मंसूर खान ने उस पैसे से ज्वेलरी, रियल एस्टेट, बुलियन ट्रेडिंग, फार्मेसी, प्रकाशन, शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में जमकर व्यवसाय किया और धन कमाया। आई मॉनेटरी एडवाइजरी में निवेशकों का 2000 करोड़ रुपया लग चुका है

मुस्लिम समाज से पैसे निवेश करवा कर और उन्हें 14% से 18% के लाभ का सपना दिखाकर अब मंसूर खान चंपत हो गया है। निवेशक जब बेंगलुरु के शिवाजीनगर स्थित IMA के दफ्तर में अपना पैसा माँगने पहुँचे तो वहाँ कोई नहीं मिला। अब मंसूर खान कहाँ है यह किसी को नहीं पता।

मजेदार बात यह भी है कि व्हाट्सप्प पर मंसूर खान की आवाज वाली एक ऑडियो क्लिप घूम रही है जिसमें मंसूर खान यह कह रहा है कि वह नेताओं और बाबुओं को रिश्वत देते तक गया है इसलिए आत्महत्या करना चाहता है। ऑडियो क्लिप में मंसूर खान ने यह भी कहा कि बेंगलुरु के एक कॉन्ग्रेसी विधायक रोशन बेग ने उसके 400 करोड़ रुपए हड़प लिए हैं। हालाँकि रोशन बेग ने ऑडियो क्लिप के वास्तविक होने पर संदेह प्रकट किया है। पुलिस भी जाँच में जुटी है कि कहीं मंसूर खान ने सचमुच में आत्महत्या तो नहीं कर ली।

खबर के अनुसार पुलिस अधिकारी डीसीपी राहुल कुमार शाहापुरवाड़ ने बताया कि पुलिस मंसूर खान की खोज कर रही है और यह भी पता लगाने का प्रयास कर रही है कि ऑडियो क्लिप वास्तव में मंसूर खान की है या नहीं। मंसूर खान की आवाज के दावे वाली ऑडियो क्लिप मोहम्मद खालिद अहमद नामक मंसूर के एक पार्टनर की शिकायत के एक दिन बाद सामने आई थी। मोहम्मद खालिद अहमद ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी कि मंसूर ने उसे 1.3 करोड़ रुपए की चपत लगाई है।

वहीं दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस विधायक रोशन बेग भी साइबर पुलिस में केस दर्ज करवाने वाले हैं। इससे पहले एक अन्य ऑडियो क्लिप में भी IMA फर्म के साथ उनका नामा जोड़ा जा चुका है।     

1 दिन में Encephalitis ने ली 25 बच्चों की जान, 1 हफ्ते में 56 मौत: CM ने कहा ‘जागरूकता की कमी’

बिहार के मुजफ्फरपुर व आसपास के क्षेत्र में ‘एक्यूट इन्सेफ़लाईटिस सी सिंड्रोम (AIS)’ नामक बीमारी बच्चों पर कहर बन कर टूट रहा है। पिछले एक सप्ताह में 56 बच्चों की मौत के बाद राज्य के स्वास्थ्य महकमे में हड़कंप मच गया है। मुजफ्फरपुर व वैशाली के विभिन्न अस्पतालों में इस बीमारी से एक दिन के भीतर 25 बच्चों के मरने की ख़बर के बाद क्षेत्र में हाहाकार मच गया है। अस्पतालों में कई बच्चे अब भी इस बीमारी से पीड़ित हैं, जिन्हें इलाज के लिए भर्ती कराया गया है। सोमवार (जून 10, 2019) को आलम यह रहा कि हर कुछ मिनटों के अंतराल पर बच्चों की जान जाती रही।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि इतनी मौतों की वजह जागरूकता की कमी है। मुख्यमंत्री ने स्वीकार किया कि इस बीमारी से इस वर्ष पिछले साल के मुकाबले ज्यादा मौतें हुई हैं। उन्होंने स्वीकार किया कि स्थानीय स्तर पर इस बीमारी की रोकथाम को लेकर बनी गाइडलाइन्स के अनुपालन में कमी है। मुख्यमंत्री ने स्वास्थ्य विभाग को निर्देश दिया है कि लोगों को पहले से अलर्ट रखा जाए। कुल मिला कर देखा जाए तो सूबे के 25 जिले अब तक इस बीमारी की चपेट में आ चुके हैं। मुजफ्फरपुर के सरकारी अस्पताल एसकेएमसीएच की स्थिति यह है कि पीआईसीयू भर जाने के कारण एक ही बेड पर दो-तीन बच्चों का इलाज़ होता रहा।

लगातार पीड़ित बच्चों की बढ़ती संख्या को देखते हुए हॉस्पिटल प्रशासन तीसरी यूनिट खोलने की तैयारी कर रहा है। गंभीर मरीजों को भी लाइन में लगाकर पीआईसीयू में भर्ती होना पड़ रहा है। एसकेएमसीएच में सोमवार को 44 में से 20 बच्चाें की माैत हाे गई। डॉक्टरों ने बताया कि चमकी बुखार (Encephalitis के लिए स्थानीय बोलचाल का शब्द) से पीड़ित बच्चों की उम्र 5-15 साल के बीच है। इस बीमारी के लक्षण तेज़ बुखार और शरीर में ऐंठन के रूप में दिखते हैं। 2012 में इस बीमारी से 120 बच्चों की मौत हो गई थी। पिछले वर्ष यह आँकड़ा 7 था, जो इस साल बढ़ कर 56 पहुँच चुका है।

प्रमंडलीय आयुक्त नर्मदेश्वर लाल ने अधिकारियों के साथ बैठक के दौरान तैयारियों को आधा-अधूरा बताया। उन्होंने साफ़-साफ़ कहा कि इस बीमारी को लेकर प्रचार-प्रसार में कोताही बरती गई है। नगर विकास एवं आवास मंत्री सुरेश शर्मा ने अस्पतालों में जाकर पीड़ितों का हालचाल जाना। स्थिति यह थी कि मुजफ्फरपुर और वैशाली के अस्पताल एक सप्ताह से परिजनों के चीत्कार से गूँज रहे हैं। चिकित्सकों के अनुसार, चमकी बुखार से ग्रस्त बच्चों के शरीर में चीनी की कमी पाई गई। अस्पतालों में मरीजों के मुकाबले चिकित्सकों की भी भारी कमी है।

इस बीमारी से बचाव की बात करते हुए वरिष्ठ चिकित्सक ने सलाह देते हुए कहा:

“बच्चों को धूप में नही जाने दें। दिन में दो से तीन बार बच्चों को स्नान जरूर कराएँ। रात को भूखे पेट नहीं सोने दें। पानी व नींबू की शर्बत पर्याप्त मात्र में पीने के लिए दें। तेज बुखार होने पर पानी से स्नान कराते हुए सर पर पानी की पट्टी दें। इसके साथ जल्द से जल्द निकट के अस्पताल में बच्चों को लेकर पहुँचना चाहिए। किसी ओझा-गुणी के चक्कर में समय नही गँवाना चाहिए। जितना जल्द अस्पताल पहुँचेंगे, बच्चा उतना ही जल्द स्वस्थ होगा।”

मदरसे में पढ़ाने वाले मौलवी ने किया 12 वर्षीय नाबालिग बच्ची का बलात्कार, गिरफ़्तार

उत्तर प्रदेश में बलात्कार की घटनाएँ थमती नहीं नज़र आ रही हैं और कानून व्यवस्था की हालत भी काफ़ी बेहाल है। अब मेरठ के एक मरदसे में पढ़ाने वाले मौलवी द्वारा 12 वर्षीय नाबालिग के साथ दुष्कर्म करने का मामला सामने आया है। शोर मचाने पर छात्रों ने उक्त मौलवी को दबोच भी लिया लेकिन अँधेरे का फायदा उठा कर वह वहाँ से भागने में कामयाब रहा। बाद में पुलिस ने दबिश देकर उसे गिरफ़्तार कर लिया।

सुरूरपुर क्षेत्र के एक ग्रामीण के अनुसार, कस्बे के बाहरी छोर पर एक मदरसा है, जिसमें न सिर्फ़ उस इलाके के बल्कि आसपास के गाँवों के बच्चे भी पढ़ने आते हैं। आरोपित मौलवी शहीद हर्रा का रहने वाला है और वह उसी मदरसे में तालीम देता था। उसके पिता का नाम इकबाल है। शनिवार (जून 8, 2019) देर शाम मौलवी बच्ची के घर पहुँचा और पढ़ाने का बहाना कर उस 12 वर्षीय बच्ची को अपने साथ मदरसे में ले गया।

वहाँ उस मौलवी ने एक कमरे में ले जाकर उक्त बच्ची का बलात्कार किया। जब पीड़िता ने शोर मचाया तो आसपास के कमरों से छात्र दौड़े आए। बच्ची को बदहवास अवस्था में देख कर छात्रों का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया और उन्होंने आरोपित मौलवी की वहीं पर पिटाई भी कर दी। मदरसे में दिन भर पंचायत चली, जिसमें इस घटना को लेकर चर्चा की गई। पीड़िता के परिजनों ने पुलिस को इस घटना की जानकारी दी। मौलवी पर पोक्सो एक्ट के तहत कार्रवाई की गई है।

‘जय श्री राम’ का नारा लगाने पर हावड़ा में BJP कार्यकर्ता की हत्या, 2 अन्य को रॉड से पीटा

पश्चिम बंगाल में फिर से भाजपा के एक कार्यकर्ता के मारे जाने की ख़बर आई है। राजनीतिक हिंसा से ग्रस्त राज्य में ताज़ा घटना हावड़ा जिले की है। बंगाल भाजपा ने कहा है कि उसके एक कार्यकर्ता को सिर्फ़ ‘जय श्री राम’ बोलने पर मार डाला गया। पुलिस ने 43 साल के समतुल डोलोई की मौत की पुष्टि की है, जिसका शव अमता थाना क्षेत्र के सरपोता गाँव से एक खेत में मिला। हालांकि, मौत के कारणों पर अधिकारियों ने अभी तक कुछ भी स्पष्ट नहीं किया है। भाजपा ने तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडों पर हत्या के आरोप लगाए हैं। डोलोई रविवार (जून 9, 2019) की रात एक समारोह में गए हुए थे लेकिन उनके देर रात न लौटने के कारण लोगों को शक हुआ। इसके बाद सोमवार को उनका शव मिला।

भाजपा हावड़ा ग्रामीण इकाई के अध्यक्ष अनुपम मालिक के अनुसार, डोलोई भाजपा समर्थक थे और उन्हें तृणमूल के कार्यकर्ताओं द्वारा सिर्फ़ इसीलिए मार डाला गया क्योंकि उन्होंने ‘जय श्री राम’ के नारे लगाए थे। तृणमूल विधायक समीर पांजा ने इन आरोपों को सिरे से नकारते हुए कहा कि जाँच के बाद ही मौत के पीछे की असली वजह सामने आएगी। डोलोई अमता क्षेत्र में स्थित चलुनिया गाँव के निवासी थे।

भाजपा के प्रदेश स्तरीय नेताओं ने शोक संतप्त परिवार के साथ मजबूती से खड़े रहने की बात करते हुए कहा कि डोलोई की हत्या काफ़ी बेरहमी से की गई है। इस सम्बन्ध में प्रदेश भाजपा ने पुलिस में शिकायत भी दर्ज कराई है। कहा जा रहा है कि हालिया लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपने बूथ पर भाजपा उम्मीदवार को बढ़त दिलाई थी। डोलोई के एक रिश्तेदार ने कहा कि मृतक ने एक कार्यक्रम के दौरान कई बार ‘जय श्री राम’ का नारा लगाया था। इससे कार्यक्रम में शामिल तृणमूल के कुछ सक्रिय कार्यकर्ता काफ़ी नाराज़ हो गए।

इसके थोड़ी देर बाद वह लापता हो गए और उनकी लाश मिली। पुलिस ने पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने से पहले मृत्यु के समय और कारणों को लेकर कुछ भी कहने से इनकार कर दिया है। तृणमूल ने आरोप लगाया कि हर मरने वाला अब एक भाजपा कार्यकर्ता है और भाजपा ने ऐसी मौतों को राजनीतिक रंग देना जारी रखा है। तृणमूल ने इस घटना को आपसी दुश्मनी का परिणाम बताया। बता दें कि पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा की लगातार बढ़ रही वारदातों को लेकर केंद्र सरकार भी गंभीर है और राज्यपाल केसरी नाथ त्रिपाठी ने गृह मंत्री अमित शाह से मिल कर उन्हें स्थिति से अवगत कराया है।

इसके अलावा सोदपुर की एक अन्य घटना में दो सिक्यूरिटी गार्ड को तृणमूल के कार्यकर्ताओं द्वारा लोहे के रॉड से पीटे जाने की ख़बर भी आई है। दोनों ने भाजपा समर्थित यूनियन बनाने की कोशिश की थी, जिससे तृणमूल ट्रेड यूनियन के लोग भड़क उठे। दोनों को नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया है। खरदाह पुलिस स्टेशन में इस मामले में तृणमूल ट्रेड यूनियन विंग के 6 कार्यकर्ताओं के ख़िलाफ़ प्राथमिकी दर्ज कराई गई है। सोमवार को भाजपा ने राज्यभर में विरोध प्रदर्शन करते हुए अपने कार्यकर्ताओं की हत्या के ख़िलाफ़ ‘काला दिवस’ मनाया।

मोदी सरकार का कड़ा निर्णय: 12 ‘दागदार’ व ‘सुस्त’ वरिष्ठ अधिकारियों को समय-पूर्व रिटायरमेंट

निर्मला सीतारमण के वित्त मंत्री बनते ही मंत्रालय ने कड़े फैसले लेने शुरू कर दिए हैं। सोमवार को सरकार ने 12 वरिष्ठ अधिकारियों को जबरन सेवानिवृत्ति (Compulsary Retirement) दे दी। ‘डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड एडमिनिस्ट्रेटिव रिफॉर्म्स’ के नियम 56 के तहत निर्णय लेते हुए वित्त मंत्रालय ने इस कार्रवाई को अंजाम दिया। ये सभी अधिकारीगण इनकम टैक्स विभाग में चीफ कमिश्नर, प्रिंसिपल कमिश्नर्स और कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स डिपार्टमेंट जैसे महत्वपूर्ण और बड़े पदों पर तैनात थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इन अधिकारियों में से कई पर भ्रष्टाचार, बेहिसाब संपत्ति का अर्जन और यौन शोषण जैसे आरोप लगे हुए थे।

रिटायर किए गए 12 अधिकारियों के नाम हैं- अशोक अग्रवाल (आईआरएस 1985), एसके श्रीवास्तव (आईआरएस 1989), होमी राजवंश (आईआरएस 1985), बीबी राजेंद्र प्रसाद, अजॉय कुमार सिंह, बी अरुलप्पा, आलोक कुमार मित्रा, चांदर सेन भारती, अंडासु रवींद्र, विवेक बत्रा, स्वेताभ सुमन और राम कुमार भार्गव। ब्यूरोक्रेसी को स्वच्छ बनाने के लिए किए जा रहे प्रयासों के तहत यह किया गया है। मंत्रालय की अगले कुछ महीनों में ऐसे कई सुस्त और भ्रष्टाचार आरोपित अधिकारियों को रिटायर करने की योजना है, जिनके कारण शीर्ष स्तर पर कामकाज धीमा पड़ा हुआ है या सही से नहीं चल रहा।

उपर्युक्त नियम के तहत ऐसे अधिकारियों को रिटायर किया जा सकता है, जिनकी उम्र 50 से 55 वर्ष हो चुकी हो या फिर उन्होंने 30 वर्ष की सेवा अवधि पूरी कर ली हो। हालाँकि, यह नियम कई दशकों से है लेकिन नरेन्द्र मोदी सरकार ने इसका प्रयोग कर एक उदाहरण स्थापित किया है। सरकार ने ख़राब परफॉरमेंस वाले अधिकारियों की एक सूची तैयार की है, जिससे ऐसे अधिकारियों को अनिवार्य रिटायरमेंट दिया जा सके। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि इससे रोज़गार के अवसर भी बढ़ेंगे क्योंकि पद खाली होने से नई रिक्तियाँ निकलेंगी।

हिन्दू रीति-रिवाजों व साधु-संतों का अपमान करना ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’: ET की महिला पत्रकार

‘द इकनोमिक टाइम्स’ की पत्रकार ने हिन्दू रीति-रिवाजों का अपमान करने की बात कही है। पत्रकार ने कहा कि हिन्दू रीति-रिवाजों का अपमान करना ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ के अंतर्गत आता है। पत्रकार वसुधा वेणुगोपाल ने ट्विटर पर यूपी पुलिस द्वारा गिरफ़्तार किए गए पत्रकार प्रशांत कनौजिया का समर्थन करते हुए लिखा कि हिन्दू रीति-रिवाजों व साधु-संतों का अपमान करना ‘फ्रीडम ऑफ स्पीच’ है और पेरियार की भूमि पर यह सब मान्य है। एक क़दम और आगे बढ़ते ही उन्होंने दावा किया कि ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ के अंतर्गत सभी धर्मों का अपमान किया जा सकता है।

वसुधा ने लिखा कि उन्हें समझ नहीं आ रहा है लोग प्रशांत कनौजिया के उन ट्वीट्स को लेकर क्यों उनकी गिरफ़्तारी को उचित ठहरा रहे हैं, जिसमें उन्होंने हिन्दू रीति-रिवाजों व साधु-संतों को बुरा-भला कहा है। वसुधा वेणुगोपाल की इस ट्वीट का जवाब देते हुए राजू दास ने लिखा कि उन्हें ऐसा कमेन्ट करने से पहले भारत का कानून पढ़ लेना चाहिए क्योंकि भारत में धर्मों का अपमान करने की अनुमति कतई नहीं है। उन्होंने लिखा कि भारत में कई तरह के ईशनिंदा कानून हैं।

जबकि IITian और लेखक संक्रांत सानु ने उन्हें जवाब देते हुए लिखा कि यह सब हिंदुत्व पर हमला करने का एक बहाना है। उन्होंने लिखा कि पैगम्बर मुहम्मद के ख़िलाफ़ टिप्पणी करने वाले की या तो भीड़ द्वारा हत्या कर दी जाएगी या फिर प्रशासन द्वारा उसे दण्डित किया जाएगा। उन्होंने पूछा कि क्या कभी किसी पेरियार भक्त ने इसाई धर्म की आलोचना की है?

बता दें कि उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ के खिलाफ फेसबुक और ट्विटर पर आपत्तिजनक पोस्ट शेयर करने के आरोप में लखनऊ पुलिस ने शनिवार (जून 8, 2019) को स्वतंत्र पत्रकार प्रशांत जगदीश कनौजिया को उसके आवास से गिरफ्तार किया था। कनौजिया ने गुरुवार (जून 6, 2019) को अपने फेसबुक और ट्विटर अकाउंट से आपत्तिजनक पोस्ट शेयर किया था। आरोपित प्रशांत कनौजिया सोशल मीडिया में फर्जी खबरें फैलाने, हिंदू विरोधी घृणा फैलाने के लिए और खासतौर पर दलितों के खिलाफ घटिया बयानबाजी करने के लिए जाना जाता है। प्रशांत कनौजिया का दलितों और हिंदू संतों पर अभद्र टिप्पणी करने का इतिहास रहा है।

विरोध के लिए त्रिशूल पर कंडोम देखकर खुश होने वाले लिबरल्स आपत्ति करने का खो चुके हैं हक़

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन का धर्म के बारे में कहना था – “मैं जब कुछ अच्छा करता हूँ तो मुझे अच्छा महसूस होता है, मैं जब बुरा करता हूँ तो मुझे बुरा महसूस होता है और यही मेरा धर्म है।”

लेकिन भारत के संदर्भ में इस प्रकार के कथन मजाक बनकर रह गए हैं। और इसे मजाक बनाया है उन लोगों ने, जो एक लम्बे समय से सूचना के माध्यमों को अपनी बपौती समझते आ रहे थे। आज भी सूचना के बाजार में एक आसमानी मत यह है कि बुद्धिजीवी वही कहलाएगा, जो हिन्दुओं की आस्था पर बेहूदा तरीके से घटिया प्रहार कर सकेगा। इसी होड़ के बीच वो समय भी आया जब ‘त्रिशूल पर कंडोम’ की कविताएँ लिखी जाने लगीं। सेकुलरिज्म का सीधा सा अर्थ मुस्लिम समुदाय से जुड़ी ख़बरों को छुपा देना हो गया।

समाज का वास्तविक ध्रुवीकरण करने वाले भेड़िए कठुआ रेप केस के समय बाहर आ गए और प्लाकार्ड के जरिए हिंदुत्व को ही बलात्कार का केंद्र बना दिया गया। लिबरल प्रतीत होने के लिए बॉलीवुड से लेकर सोशल मीडिया के सिपाहियों ने जमकर बलात्कार के मुद्दे को हिंदुत्व में समेटने का काम किया। लेकिन तब शायद उन्हें यह आभास तक नहीं था कि वो समाज को कितना गहरा जख्म दे चुके हैं।

ये लिबरल्स ऐसी किसी भी घटना के इन्तजार में गिद्दों की तरह नजर गड़ाए बैठे रहते हैं, जिसके जरिए हिंदुत्व और उसकी आस्था को चोट पहुँचाई जा सके। लेकिन, इस हड़बड़ी में वो भूल ही गए कि यदि किसी भी अपराध को धर्म तक समेट दिया जाने लगा तो आगे ऐसे कितने मौके होंगे जब यही तीर उड़ता हुआ वापस उन्हीं को सहन करना होगा। रवीश कुमार जैसे बड़े नाम भी कहते नजर आए कि बलात्कार करने वालों के घरों में देवताओं की तस्वीरें लगी होती हैं। आखिर में यह लिबरल्स द्वारा बेहद जल्दबाजी में किया गया एक सेल्फगोल से ज्यादा कुछ साबित नहीं हुआ।

नतीजा ये हुआ कि सामाजिक विकृति से जन्मे किसी भी अपराध के ‘नायक’ को तलाशा जाने लगा। यदि 1 कठुआ में आरोपित हिन्दू था तो अन्य 10 मामलों में आरोपित मुस्लिम नजर आने लगे। इस सबका भुगतान किसे करना पड़ रहा है? क्या प्लाकार्ड के जरिए वर्चुअल फेम बटोर रहे लोगों को अलीगढ़ में ढाई साल की बच्ची के साथ हुई वीभत्स घटना से फ़र्क़ पड़ता भी है? बल्कि सवाल यह होना चाहिए कि क्या उनके पास इतनी फुरसत है भी कि वो इसे महसूस कर सकें?

जवाब बेहद स्पष्ट है कि उनका अपनी सस्ती लोकप्रियता के अलावा दूसरा कोई नहीं है। सामाजिक विकृतियाँ उनका पहला मुद्दा हैं भी नहीं। उनका मुद्दा इन बातों का नहीं है कि समाज में इस तरह के लोग हैं जो आपसी बदले के लिए ढाई साल की बच्ची तक को अपना शिकार बना सकते हैं। उनके लिए ये सिर्फ हार और जीत का मुद्दा है। वो लोग ऐसी ख़बरें सुनने के बाद सबसे पहले यह तलाश करते हैं कि कहीं आरोपित वो तो नहीं जिनके लिए उन्होंने तख्तियाँ उठाई थीं। यदि ऐसा हुआ तो यह उनकी विचारधारा की हार हुई।

अलीगढ़ में हुई इस घटना के बाद मुद्दा बलात्कार जैसे अपराध से बदलकर हिन्दू-मुस्लिम की चर्चा पर सिमट गया। ‘मेरे अपराधी’ और ‘तेरे अपराधी’ के इस द्वन्द्व में हम लोगों ने अपराध के लिए एक बड़ी जगह छोड़ दी है।
अपराधियों में हिन्दू नामों को तलाशकर उत्साह में त्रिशूल पर कंडोम की तस्वीरें शेयर कर देने वाले लोग आज अलीगढ़ कांड में भीगी बिल्ली बनकर खुद को पीड़ित बता रहे हैं।

ऐसे वैचारिक नंगे लोग ट्विटर से लेकर फेसबुक, समाचार पत्र और न्यूज़ डिबेट में बड़ी बेशर्मी से यह कहते देखे जा रहे हैं कि नाम में मजहब नहीं ढूँढा जाना चाहिए। या उल्टा सवाल पूछकर अपने दुराग्रहों का परिचय देते फिर रहे हैं कि सवाल हमसे क्यों पूछा जा रहा है? वास्तव में वह जवाब दे रहे हैं कि आपको पता होना चाहिए कि उन एक्टिविस्ट्स का हृदय सिर्फ विशेष अवसरों पर पिघलता है और तब उन्हें सवाल करने का इंतजार नहीं करना होता है।

राणा अय्यूब जैसे लोग हों या फिर स्क्रॉल जैसे मीडिया गिरोह, अलीगढ़ काण्ड में अपराधियों के नाम असलम और जाहिद होने के कारण उन सबका रोना यही है कि अपराध को साम्प्रदायिक रंग दिया जा रहा है। उन्हें समझना होगा कि यह सांप्रदायिक रंग नहीं दिया जा रहा है, बल्कि जो जहर उन लोगों ने बोया था, ये उसी के रुझान देखने को मिल रहे हैं।

आजकल हर दूसरी बलात्कार की घटना में अपराधी मौलवी या फिर किसी मुस्लिम युवक के होने का मतलब ये नहीं है कि भविष्य में कभी किसी दूसरे समुदाय द्वारा अपराध नहीं किए जा सकते हैं। इस बात की गारंटी कोई भी नहीं दे सकता है कि समाज में अपराध होने बंद हो जाएँगे। या अगर होंगे तो आरोपित सिर्फ मुस्लिम ही होंगे, लेकिन यह प्रचलन हिन्दू आतंकवाद शब्द गढ़ने वाले, विरोध के लिए त्रिशूल पर कंडोम लगाकर और तख्तियों पर सामाजिक अपराधों के लिए हिंदुत्व को जिम्मेदार ठहराने वाले लोगों ने ही शुरू किया है।

जो समाचार पत्र आज शिकायत करते नजर आते हैं कि हेडलाइन में मुस्लिम युवक का नाम लिखना सही नहीं है, वही लोग ‘हिन्दू अपराधी’ कहते हुए जोर से चिल्लाते हुए देखे गए हैं। इतिहास हम सबके अपराध का लेखा-जोखा रख रखा है और यदि सूचना के माध्यमों ने जिम्मेदारी नहीं दिखाई तो समाज ही इसके व्यापक नतीजे भी भुगतेगा। यह भी सच है कि इसमें नुकसान विचाधारा को अपना अहंकार बनाने वाले लोगों के बजाए सड़क पर मेहनत मजदूरी करने वाले लोगों का ही होना है।

गूगल पढ़कर ट्विटर पर लिखने वाले इन सोशल मीडिया एक्टिविस्ट्स को एक के बाद एक आ रहे अलीगढ़ से लेकर मौलवी तक के किस्सों से अब परेशानी होने लगी है। इस प्रकार के जघन्य अपराध को जो लोग खेल समझकर आगे बढ़ रहे थे शायद वो लोग समझ गए हैं कि अब यह इकतरफा नहीं है। उन्हें समझना होगा कि यदि यह खेल ही है, तो जिसे खेल समझकर वो उन्माद कर रहे थे उसे ख़त्म करने का मन बनाकर अब ‘दूसरी’ टीम भी मैदान में उतर गई है। लेकिन यह दुर्भाग्य है, इस खेल के बीच समाज हार गया है और बुराइयाँ चुपके से अपने लायक जगह तलाश रही हैं।

सोशल मीडिया लिबरल्स का दुःख प्रकट करने का तरीका अभी भी ‘हिंदूवादी एक्टिविस्ट्स’ से शुरू हो रहा है। यानी कम से कम यह तो साफ है कि पीछे हटने के मूड में कोई भी नहीं है। जाहिर सी बात है, आप सिर्फ एक समय में मुखर होकर दूसरी बार इसलिए नहीं चुप रह सकते क्योंकि यह आपके एजेंडा के मुताबिक़ नहीं है। आप या तो लिबरल हो सकते हैं या फिर नहीं होते हैं। यह बीच की कड़ी सिर्फ घृणा और दोहरे जहर का सबूत देती है। और अगर ऐसा है तो स्पष्ट है कि लोग प्रशासन से पहले स्वरा भास्कर और सोनम कपूर जैसे पार्ट टाइम लिबरल्स से सवाल करेंगे। तंत्र की विफलता के लिए यदि हिंदुत्व की जवाबदेही तय की जाएगी तो अगली बार इस्लाम की तय की जाएगी और इन सबके बीच हम लोग आपत्ति करने का अधिकार खो बैठेंगे।

अब देखना यह है कि आखिर कब तक हमारा मन इस रस्सा-कस्सी से भरता है और हम स्वीकार करते हैं कि इस समाज के कसूरवार हम लोग हैं, न कि हमारी आस्थाएँ। हमें मौकापरस्त होने से बचना होगा। हमारे नैतिक मूल्यों की जवाबदेही तय करने कोई बाहर से नहीं आएगा। लेकिन हकीकत ये है कि जब भी कभी कोई कठुआ और अलीगढ़ होगा, तो हम वही क्रम दोहराने वाले हैं क्योंकि हमारी जंग अपराध से नहीं बल्कि विचारधाराओं से हो चुकी है। हम आँसुओं को पोंछने से पहले दूसरे को ठेस पहुँचाना चाहते हैं। हमारे अपराधों के परिणाम भुगतने के लिए समाज तो है ही!

गाय भगवान है तो मैं तुम्हारे भगवान को खाता हूँ: फ़िल्म निर्देशक ने इस महान राजा को भी दी ‘गाली’

तमिल फ़िल्मों के निर्देशक पा रंजीत ने हिंदुत्व और महान तमिल शासक राजाराज चोल को लेकर ज़हर उगला है। सुपरस्टार रजनीकांत अभिनीत ‘कबाली’ व ‘काला’ जैसी बड़ी फ़िल्में निर्देशित कर चुके पा रंजीत शुरू से ही अपनी फ़िल्मों के जरिए वामपंथी विचारधारा का प्रचार करते रहे हैं। अब नया विवाद खड़ा करते हुए विवादित फ़िल्म डायरेक्टर ने कहा कि हिन्दुओं ने दलितों से ज़मीन छीन ली है। रंजीत ने हिन्दुओं व दलितों को अलग-अलग कर के देखने की कोशिश की। 2012 में रोमांटिक कॉमेडी ‘अताकथी’ से निर्देशन के क्षेत्र में क़दम रखने वाले रंजीत ने कहा कि सरकार को सभी मठों की ज़मीनें छीन कर उसे वापस दलितों को दे देना चाहिए।

पा रंजीत यहीं नहीं रुके। उन्होंने इतिहास की बात छेड़ते हुए महान तमिल शासक राजाराज चोल को एक ज़मीन हड़पने वाला बताया और कहा कि उनका शासन तमिल इतिहास के अन्धकार भरे युग में से एक था। उन्होंने दावा किया कि राजाराज चोल के समय ही जाति सम्बन्धी अत्याचार शुरू हुए थे। जबकि, इतिहास इसके एकदम उलट है। शैव सम्प्रदाय के पुरोधा राजाराज चोल ने वैष्णव सम्प्रदाय को भी बढ़ावा दिया और भगवान विष्णु के कई मंदिर बनवाए। उन्होंने कई बौद्ध स्थलों का भी निर्माण करवाया। उन्हें धर्मनिरपेक्ष और पंथनिरपेक्ष राजा के रूप में याद किया जाता है।

राजाराज चोल का साम्राज्य कलिंग से लेकर लंका तक फैला हुआ था। उस समय के शिलालेखों के अनुसार, भगवान श्रीराम से उनकी तुलना करते हुए लिखा गया है कि राजाराज चोल उनके सदृश ही श्री लंका में विजय पताका फहराने वाले भारतीय राजा थे। नौसेना के इस्तेमाल के लिए सुप्रसिद्ध राजाराज चोल एक बड़े योद्धा भी थे। मालदीव के कुछ हिस्सों पर भी उनका राज चलता था। यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साईट के अंतर्गत आने वाला बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण भी राजाराज चोल ने ही करवाया था। बाद में मदुरई पर नियंत्रण रखने वाले मुस्लिम सुल्तानों ने मंदिर को खासा नुकसान पहुँचाया।

हिन्दुओं व राजाराज चोल के बारे में आपत्तिजनक बयान देने वाले पा रंजीत के ख़िलाफ़ सोशल मीडिया पर लोगों ने गुस्सा जताया। गोहत्या का समर्थन करते हुए पा रंजीत ने आगे कहा कि अगर गाय हिन्दुओं की माता है तो वह हिन्दुओं के भगवान को खाने वाले व्यक्ति हैं। राजाराज चोल पर तमिल सिनेमा में कई फ़िल्में बन चुकी हैं और तमिल इंडस्ट्री के महान अभिनेता शिवाजी गणेशन उनका किरदार निभा चुके हैं। ऐसे में, हिन्दुओं के साथ-साथ राजाराज चोल और गाय को लेकर पा रंजीत का बयान समाज को बाँटने वाला है, ऐसा सोशल मीडिया पर लोगों ने करार दिया।

ये सारी बातें बोलते समय रंजीत ने ख़ुद को पेरियार और आंबेडकर का भक्त बताया। उन्होंने इस बात को नज़रंदाज़ कर दिया कि चीन से व्यापारिक संधि कर राजाराज चोल ने भारतीय दबदबा बढ़ाने का काम किया था। अभी पा रंजीत स्वतन्त्रता सेनानी बिरसा मुंडा पर फ़िल्म बनाने की तैयारी कर रहे हैं। एक और चौंकाने वाला दावा करते हुए उन्होंने कहा कि राजाराज चोल के काल में सैकड़ों लड़कियों को वेश्यावृत्ति में ढकेल दिया गया था, जबकि इतिहास में ऐसा कोई तथ्य दर्ज नहीं है।

पूर्व Pak राष्ट्रपति ज़रदारी गिरफ़्तार: 62 संदिग्ध बैंक खाते, 210 कम्पनियों से लिंक, करोड़ों की हेराफेरी

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी गिरफ़्तार कर लिए गए हैं। ज़रदारी को उन पर चल रहे मनी लॉन्ड्रिंग के मामलों के तहत गिरफ़्तार किया गया। यह गिरफ़्तारी उनके इस्लामाबाद स्थित आवास से हुई। यह कार्रवाई नेशनल एकाउंटेबिलिटी ब्यूरो (NAB) की 15 सदस्यीय टीम ने की। ज़रदारी पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (PPP) के सह-अध्यक्ष भी हैं। पाकिस्तान के 11वें राष्ट्रपति के रूप में ज़रदारी ने सितम्बर 2008 से सितम्बर 2013 तक यह पद सम्भाला था। ज़रदारी की पत्नी बेनज़ीर भुट्टो पाकिस्तान की प्रधानमंत्री रही थीं। ज़रदारी के परिजनों की मौजूदगी में उन्हें काले रंग की लैंडक्रूजर से ले जाया गया। इस दौरान उनकी पार्टी के कई कार्यकर्ता भी उपस्थित थे।

फेक बैंक खातों के मामले में इस्लामाबाद हाई कोर्ट ने जरदारी व उनकी बहन को गिरफ़्तारी से राहत देने से इनकार कर दिया, जिसके कुछ घंटों बाद यह कार्रवाई हुई। पुलिस ने उनके घर को जाने वाली सभी सड़कों को ब्लॉक कर दिया था। ज़रदारी को गिरफ़्तार करने उनके घर के भीतर गए अधिकारियों में महिलाएँ भी शामिल थीं। अदालत में फैसला सुनाए जाने से पहले ही ज़रदारी निकल गए थे। अभी तक उनकी बहन फरयाल तालपुर के ख़िलाफ़ कोई वॉरंट नहीं जारी किया गया है। दोनों भाई-बहनों की जमानत अवधि इससे पहले कई बार बढ़ाई गई थी।

शीर्ष अधिकारियों के मुताबिक, उनकी गिरफ़्तारी के लिए दो टीमें गठित की गई थीं। इनमें से एक ज़रदारी के निवास पर गई तो दूसरी पार्लियामेंट हाउस की तरफ़ गई। हालाँकि, अभी ज़रदारी के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प बचा हुआ है। दोनों भाई-बहनों के भविष्य को लेकर कानूनी विकल्पों पर विचार-विमर्श के लिए पीपीपी की बैठक भी बुलाई गई है। पार्टी नेताओं ने कहा कि उन्हें अभी हाईकोर्ट के लिखित आदेश का इन्तजार है, जिसके बाद आगे के विकल्पों पर विचार-विमर्श किया जाएगा। शीर्ष नेताओं ने समर्थकों से शांति बनाए रखने की अपील की है।

2015 में फ़ेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (FIA) ने जरदारी से जुड़े कई फेक एकाउंट्स और संदिग्ध लेनदेन को लेकर जाँच शुरू की थी। ये ट्रांजेक्शंस 29 बेनामी खातों द्वारा समिट बैंक, सिंध बैंक और युबीएल में स्थित खातों में किए गए थे। आरोप है कि इन एकाउंट्स में हुए लेनदेन की मदद से किकबैक में मिले रुपयों को ठिकाने लगाया जाता था। पाक सुप्रीम कोर्ट ने एक जॉइंट इन्वेस्टिगेशन टीम (JIT) बनाकर जाँच बैठाई थी। इसके बाद इस मामले में 170 लोगों के जुड़े होने की बात सामने आई और 33 अन्य संदिग्ध बैंक खातों की जानकारियाँ मिली।

इतना ही नहीं, 210 कम्पनियों के भी इस मामले से जुड़े होने की बातें पता चलीं। इनमें से 47 कम्पनियाँ ओमनी समूह से जुड़ी थीं, जिसे ज़रदारी के ख़ास करीबी द्वारा चलाया जाता है। इसमें से एक अकाउंट में 4.4 बिलियन पाकिस्तानी रुपया ट्रान्सफर किया गया और इनमें से 30 मिलियन रुपए ज़रदारी ग्रुप को 2 बार दिए गए। आरोपितों में से दो लोग जरदारी के ख़िलाफ़ अदालत में अप्रूवर बन गए थे। इस मामले में ज़रदारी के कई मित्रों को पहले ही गिरफ़्तार किया जा चुका है। ज़रदारी और उनकी बहन के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार व वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े 7 अन्य मामले भी चल रहे हैं।

वाड्रा के बाद अब AgustaWestland के दलाल सक्सेना को अदालत ने दी विदेश जाने की अनुमति

दिल्ली हाईकोर्ट ने अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले के आरोपित राजीव सक्सेना को विदेश जाने की अनुमति दे दी है। राजीव सक्सेना अगस्ता-वेस्टलैंड वीवीआईपी चॉपर घोटाले के दलालों में से एक है। अदालत ने उसे कुछ शर्तों के साथ विदेश जाने की अनुमति दी है। सक्सेना ने मेडिकल ग्राउंड पर विदेश जाने की अनुमति माँगी थी। उसका कहना था कि वह इलाज कराने के लिए विदेश जाना चाहता है। सक्सेना को प्रवर्तन निदेशालय से अपनी यात्रा की जानकारी साझा करने को कहा गया है। वह कब किस होटल में रुकेंगे और कहाँ ठहरेंगे, इस बारे में उन्हें पूरी जानकारी सरकारी एजेंसियों से साझा करनी होगी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राजीव सक्सेना जून के आख़िरी हफ्ते से लेकर जुलाई के अंतिम सप्ताह तक विदेश में रहेगा। इससे पहले गुरुवार (जून 6, 2019) को वीवीआईपी चॉपर डील से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में बिचौलिये से गवाह बने राजीव सक्सेना को विदेश यात्रा की अनुमति पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी। उससे पहले निचली अदालत ने उसे विदेश जाने की अनुमति दे दी थी। कई ज़मीन घोटालों में आरोपित चल रहे वाड्रा को भी हाल ही में विदेश में इलाज कराने की अनुमति मिली है।

जानकारी के लिए यह जानना ज़रूरी है कि अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले के सह-अभियुक्त राजीव सक्सेना को जनवरी 30, 2019 की सुबह 9:30 बजे उनके आवास से UAE की सुरक्षा एजेंसी द्वारा उठा लिया गया था और शाम 5:30 को भारत के लिए प्रत्यर्पित किया गया था। उनके वकीलों, गीता लूथरा और प्रतीक यादव ने इस पूरे प्रकरण को ग़ैरक़ानूनी बताया था। भारतीय वायुसेना के लिए 12 वीवीआईपी हेलि‍कॉप्टरों की खरीद के लिए इटली की कंपनी अगस्ता-वेस्टलैंड के साथ साल 2010 में करार किया गया था। 3,600 करोड़ रुपए के करार को जनवरी 2014 में भारत सरकार ने रद्द कर दिया था।