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कामदार सरकार: सीमान्त ही नहीं, हर किसान के खाते में आएँगे ₹6000, पेंशन की भी मिलेगी सुविधा

17वीं लोकसभा का आगाज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज कैबिनेट की प्रथम बैठक के साथ कर लिया है। दूसरे कार्यकाल की अपनी पहली कैबिनेट मीटिंग में पीएम मोदी ने सेना और किसानों के लिए बड़ी सौगात दी है और
किसान सम्मान निधि का दायरा बढ़ा दिया है। सैनिकों के बाद मोदी 2.0 कैबिनेट ने घोषणा की है कि पीएम किसान सम्मान निधि योजना के तहत अब सभी किसानों को सालाना ₹6,000 रुपए मिलेंगे।

साथ ही, योजना से 5 हेक्टयर वाली शर्त को भी हटा दिया गया है। इसके अतिरिक्त किसानों के लिए पेंशन योजना का ऐलान किया गया है। इसमें सरकार किसानों द्वारा जमा की गई राशि के बराबर योगदान देगी।

पीएम किसान योजना पहले सिर्फ लघु और सीमांत किसानों के लिए थी। लेकिन बीजेपी ने अपने चुनावी संकल्प पत्र में इस योजना में सभी किसानों को शामिल करने का वादा किया था, जिस पर पहली ही कैबिनेट मीटिंग में मुहर लगाई गई। इस योजना का देश के 14.5 करोड़ किसानों को सीधा लाभ मिलेगा। पीएम किसान सम्मान निधि योजना की घोषणा सरकार ने पिछले कार्यकाल के अंतरिम बजट में की थी।

नए फैसले के तहत अब 3 करोड़ और किसानों को हर साल ₹6 हजार मिलेंगे। यानी अब इस योजना का लाभ देश के करीब 15 करोड़ किसानों को मिलेगा। पहले इस योजना के दायरे में सिर्फ 12.5 करोड़ किसान ही थे। इस प्रकार अब सभी किसान इसके दायरे में होंगे। इस योजना के तहत लाभार्थी किसान को साल में तीन बार कुल ₹2000 की किस्त सीधे उसके खाते में पहुँचेगी।

कैबिनेट मीटिंग में लिए गए फैसलों की जानकारी देते हुए कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बताया कि पीएम ने कहा था कि किसान की आमदनी अगले 5 साल में दोगुनी करने की कोशिश करेंगे। फसल की लागत का कम से कम डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य मिले, यह पीएम मोदी ने सुनिश्चित किया। कृषि मंत्री ने कहा कि पीएम किसान सम्मान निधि के तहत 3 करोड़ से अधिक किसानों के खातों में पैसा पहुँच चुका है। इस योजना पर पहले ₹75 हजार करोड़ खर्च होते, लेकिन अब ₹12 हजार करोड़ रुपए का अतिरिक्त खर्च बढ़ेगा। यानी अब कुल ₹87 हजार करोड़ सालाना खर्च होंगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज लिए इन 2 बड़े फैसलों से संकेत दे दिया है कि अपने दूसरे कार्यकाल में उनकी प्राथमिकता जवान और किसान रहेंगे। अपने संकल्प पत्र के आधार पर मोदी सरकार द्वारा लिया गया यह निर्णय जनता के लिए उत्साहवर्धक तो है ही, साथ ही नई उम्मीदें भी जगाता है।

लल्लनटॉप समेत मीडिया गिरोह ने रचा ‘मुस्लिम लुक वाले’ की गिरफ्तारी की फर्जी खबर पर भावुक साहित्य

पिछले कुछ सालों में अचानक से मीडिया में असहिष्णुता और डरा हुआ अल्पसंख्यक जैसे शब्दों को स्थापित करने का जमकर प्रयास किया गया है। सच्चाई चाहे कुछ भी हो लेकिन मीडिया का एक विशेष गिरोह है, जो यह चाहता है कि इस प्रकार की शब्दावली को वो एक आकार और रूप देकर समाज के बीच स्थापित करे ताकि इसके ऊपर जमकर अपनी घटिया विचारधारा की रोटियाँ सेंकता रहे। ख़ास बात यह है कि मजहब विशेष के हित की ‘अच्छी बातें’ करते हुए ये लोग बाहर से तो बढ़िया नजर आते हैं (जिसका उदाहरण आप आगे पढ़ेंगे), लेकिन यदि गहराई में उतरकर देखा जाए, तो समुदाय विशेष को सबसे ज्यादा डराने का काम इन्हीं कुछ लोगों ने किया है। किसी झूठ को बार-बार बोलकर उसे दिशा देना स्वघोषित निष्पक्ष और क्रन्तिकारी पत्रकारों को बखूबी आता है।

इस बात को इस ताजा प्रकरण से समझा जा सकता है, जिसमें मीडिया ने एक ऐसी वाहियात और फर्जी खबर को ‘समुदाय विशेष पर होने वाले जुर्म’ की दास्तान बनाकर पेश किया है, जो वास्तव में कभी हुई ही नहीं। यानी, पूर्ण रूप से काल्पनिक घटना पर जमकर ज्ञान दिया जा रहा है।

मई 29, 2019 को टीवी9 गुजराती ने एक खबर ट्वीट की, जिसमें कहा गया कि मुंबई पुलिस ने फिल्म इंडस्ट्री में काम करने वाले 2 मुस्लिम युवकों को इसीलिए आतंकी समझकर गिरफ्तार कर लिया क्योंकि उनका ‘गेट-अप’ आतंकियों जैसा था। साथ ही, यह भी बताया गया कि ये दोनों रितिक रोशन और टाइगर श्रॉफ की मूवी की शूटिंग के लिए जा रहे थे।

फिर क्या था, ‘समुदाय विशेष‘ शब्द सुनते ही लार टपकाकर बैठे हुए मीडिया के गिरोहों के प्रमुख एनडीटीवी, टीवी-18, इंडियन एक्सप्रैस, इंडिया टुडे, आज तक और रशिया टुडे जैसे कई इंटरनेशनल मीडिया ग्रुप ने इस खबर को बिना सत्यापित किए ही ज्यों का त्यों छाप दिया। सोशल मीडिया और यूट्यूब के माध्यम से कुणाल कामरा जैसे सस्ते कॉमेडियंस से ‘दर्शनशास्त्र’ में पीएचडी कर रहे महान विचारकों, क्रांतीजीवों और सोशल मीडिया एक्टिविस्टों ने जमकर अपनी भड़ास निकाली।

डर का माहौल शब्द को ही नाश्ता, लंच और डिनर में भेजने वाले क्रांतिकारियों ने यहाँ तक भी निष्कर्ष निकला कि भाजपा शासित महाराष्ट्र के मुंबई में क्या हालात हैं। लोगों को मुस्लिम हुलिए के कारण ही आतंकी समझकर गिरफ्तार किया जा रहा है। पाकिस्तान में भी इस खबर पर इंडिया के खिलाफ जमकर माहौल बनाया गया।

सोशल मीडिया पर भी अरस्तू और सुकरात के बाद जन्मे कुछ ‘महान विचारकों’ ने जमकर इस घटना पर सत्संग और ‘अच्छा महसूस होने वाला’ साहित्य लिखा, लेकिन आखिरकार मुबंई पुलिस ने इस खबर की सच्चाई उजागर कर दी। मुंबई पुलिस ने ट्वीट करके बताया कि मुंबई पुलिस ने ऐसे किसी शख्स को गिरफ्तार नहीं किया है, कृपया फैक्ट्स की जाँच करें।”

लेकिन मीडिया में कुछ ऐसे गिरोह सक्रिय हैं, जो स्वयं को संस्थाओं से भी ऊपर सिर्फ इस वजह से रखते हैं क्योंकि केंद्र में कॉन्ग्रेस की सरकार नहीं है। ये मीडिया गिरोह अभी भी अपने समाचार में लिख रहे हैं कि पुलिस के बताए पर इन्हें यकीन नहीं है। ठीक इसी तरह का दुराग्रह करते हुए इसी प्रकार की विचारधारा वाली फ्रीलांस प्रोटेस्टर और चंदा-भक्षी शेहला रशीद भी पुलवामा आतंकी हमले के समय देखी गई थी। उत्तराखंड पुलिस के तमाम स्पष्टीकरण के बावजूद भी उसने अपने ही सुविधाजनक झूठ को सच मानने का प्रण किया। यदि बारीकी से देखें तो इन सभी दुराग्रही लोगों में एक चीज कॉमन है और वो है ‘लाल सलाम’ और क्रांति की चॉइस।

इन्हीं कुछ चुनिंदा क्रांति के सेवकों के कारण हमारे लिए यह समझ पाना मुश्किल होता जा रहा है कि कथित तौर पर समुदाय विशेष को डराने वाले लोग तो वास्तव में यही लोग हैं, जो झूठी ख़बरों को सिर्फ अपनी दुकान चलाने के लिए भुनाते हैं। ये लोग पत्रकारिता के नाम पर सिर्फ इसी प्रकार की कुछ चुनिंदा झूठी अफवाहों का इन्तजार करते हैं, ताकि अपनी छवि को चमका सकें और उन पर अंधों की तरह यकीन करने वाले कुछ लोग इस पर यकीन कर के डरना शुरू करें।

इसी का एक उदाहरण सोशल मीडिया पर इसी एक घटना पर वायरल हो रहे पोस्ट्स के माध्यम से समझा जा सकता है कि कितनी भावुक कलम से एक सज्जन ने इसी एक घटना को आधार बनाकर जमकर ज्ञान और सत्संग किया है। इस सज्जन के प्रोफ़ाइल पर जाने पर पता चलता है कि ये तो उसी ‘दी लल्लनटॉप’ नामक पत्रकारिता के संक्रामक रोग के ही एक कर्मचारी हैं, जो हिटलर के लिंग की नाप-छाप करने के कारण पाठकों के बीच बेहद लोकप्रिय है।

ये वही दी लल्लनटॉप (The Lallantop) है जो कुछ दिन पहले ही एक के बाद एक फेकिंग न्यूज़ और पेरोडी वेबसाइट्स की ख़बरों का फैक्ट चेक कर जीवनयापन करते हुए पाया गया है। ‘दी लल्लनटॉप’ (The Lallantop) में तो ये सब चलता रहता है लेकिन, कुछ बड़े मीडिया गिरोहों ने भी इस खबर के जरिए जमकर ‘ज्ञान’ दिया है और समुदाय को डराने का प्रयास किया है।

फर्जी खबर की काफी सुंदर किन्तु ‘अपमानास्पद’ विवेचना – दी लल्लनटॉप

‘फर्जी खबर’ से मुहम्मद असगर को डर सता रहा है कि ‘कपड़े देखकर एन्काउंटर भी हो सकता था’, अपना फर्जी डर अपने साथियों में बाँटते हुए –

फर्जी खबर पर इतना साहित्य लिखने के लिए आपको दी लल्लनटॉप का कर्मचारी होना पड़ता है। क्या ये कम बड़ा खौफ है?
तो मोहम्मद असगर भी मारक मजा देने की ‘मम्मी कसम’ से बंधे हैं
बहुत ज्यादा क्रांतिकारी
फेक ख़बरों की हैट्रिक बनाकर ‘दी लल्लनटॉप’ वर्ड कप क्रिकेट में सबसे आगे चल रहे हैं

दी लल्लनटॉप के ‘सूत्र’

दी लल्लनटॉप यानी ‘फेकिंग न्यूज़ 2.0’
‘डर का माहौल’
मीडिया गिरोह प्रमुख

यानी, मीडिया ने बिना मुंबई पुलिस से फैक्ट वेरिफाई किए ही एक फेक न्यूज को प्रोपगैंडा की तरह खूब चलाया। आपको बता दें कि पिछले 5 दिनों में ये तीसरी फेक न्यूज है, जिसे मुस्लिमों पर हमला करार देकर प्रोपगैंडा चलाया जा रहा था। इससे पहले, ऑपइंडिया पर गुरूग्राम औऱ बेगूसराय के हमलों से जुड़ी फेक न्यूज का भी पर्दाफाश किया गया है। इसके अलावा, मीम्स और फेकिंग न्यूज़ की ख़बरों का फैक्ट चेक करने वालों का फैक्ट चेक तो हम समय-समय पर करते ही हैं।

अमित शाह के गृह मंत्री बनते ही राणा अय्यूब ने एक साथ उगला झाग और जहर

ऐसा लगता है जैसे राणा अय्यूब भाजपा की लोकसभा चुनाव में मिले प्रचंड बहुमत के सदमे से अभी तक भी नहीं उबर पाई है। कम से कम ट्विटर पर उनके दैनिक प्रलाप को देखकर तो यही निष्कर्ष निकलता है। आज सुबह ही अमित शाह के गृह मंत्री बनने के बाद जहाँ एक ओर कई निष्पक्ष पत्रकारों में सन्नाटा देखने को मिला, वहीं दूसरी ओर राणा अय्यूब अपने मन के भावों को रोक पाने में नाकामयाब रही।

राणा अय्यूब ये देखकर शायद अपने होशो-हवास गँवा बैठी कि उनके ‘कट्टर दुश्मन’ अमित शाह को देश की आतंरिक सुरक्षा सौंपी गई है। इस बात से सदमे में डूबा राणा अय्यूब का दुखी हृदय ट्विटर पर फूट पड़ा और वो एक के बाद एक ट्वीट कर के भारत के नए गृह मंत्री के खिलाफ अपना जहर उगलते हुए देखी गई। राणा अय्यूब का दर्द यह था कि अमित शाह को मर्डर के केस में गिरफ्तार किया गया था, जब वो गुजरात के गृह मंत्री थे।

हालाँकि, आदर्श लिबरल के ‘स्वयं न्यायाधीश’ होने के अनोखे गुण के चलते राणा अय्यूब यह बात भी भूल गई कि जिस बेबुनियाद आरोप को वो गृह मंत्री अमित शाह पर लगा रही है, कोर्ट उसके लिए अमित शाह को आरोपमुक्त कर चुकी है।

अय्यूब तो उसी वक़्त से दुखी चल रही थी जब एग्जिट पोल में भाजपा की जीत तय मानी जा रही थी। लेकिन किसी चमत्कार के इंतज़ार में तथाकथित पत्रकार ने खुद पर तब तक कण्ट्रोल बनाए रखा जब तक शुरुआती रुझानों में भाजपा की सरकार बनती दिखाई देने लगी।

तब भी राणा अय्यूब को यह बात अपच की तरह परेशान कर रही थी कि, जिनसे वो सबसे ज़्यादा घृणा करती है वो सरकार में बहुमत से वापस आएँगे। अत्यंत दुख और आतंरिक परेशानियों से जूझती अय्यूब ने कॉन्ग्रेस पर निशाना साधा कि वो भाजपा को क्यों नहीं रोक पाए। दुखातिरेक में अय्यूब ने याद किया कि कॉन्ग्रेस में 5 सालों में कुछ भी नहीं बदला।

चूँकि अमित शाह अब कैबिनेट में गृह मंत्री हैं, हमें यह पूरी आशा है कि अपने कुत्सित इरादों को शब्दों का कपड़ा पहना कर मोदी, शाह और पूरे PMO के लिए ट्विटर एवं अन्य वैश्विक मंचों पर राणा अय्यूब ओवरटाइम खटते हुए घृणा और झूठ का विषवमन करती रहेगी।

मुस्लिम टोपी विवाद: क्या मोहम्मद बरकत को गलत बयान देने की ट्रेनिंग दी गई थी?

पिछले दिनों गुरूग्राम में एक हमले की ख़बर सामने आई थी जिसे बाद में साम्प्रदायिक हिंसा का रूप देने की कोशिश की गई। इस घटना में मोहम्मद बरकत आलम, जो कि इस हमले का केंद्रबिन्दु था उसने फोन पर बात करने से मना करते हुए अपना मोबाइल फोन चचेरे भाई मुर्तजा को थमा दिया था। मुर्तजा ने स्वराज मैगज़ीन की पत्रकार स्वाति गोयल को बताया कि 25 वर्षीय बरकत युवा और भोला-भाला है और उसके अभिभावक ने उसे मीडिया से न बात करने की सलाह दी है। उनका मानना है कि मीडिया से बातचीत करके वो किसी भी तरह का कोई बखेड़ा खड़ा नहीं करना चाहते।

कड़ी मशक्कत के बाद मुर्तजा गुरूग्राम में अपने कार्यस्थल पर पत्रकार स्वाति गोयल से इस मामले पर बातचीत के लिए राजी हो गया। लेकिन इस मुलाक़ात के लिए उसने एक शर्त भी रखी और वो शर्त थी कि मुलाक़ात के दौरान किसी तरह की वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं की जााएगी।

पत्रकार स्वाति के अनुसार, मुर्तजा, नई दिल्ली से लगभग 30 किलोमीटर दूर गुरुग्राम के जैकब पुरा में एक सिलाई की दुकान में काम करता है। दुकान ‘याकूब पुरा मीट मार्केट’ नामक एक गली में एक तहखाने में स्थित थी। हालाँकि, एक बंद दुकान के बाहर ‘होलसेल चिकन और रिटेल’ के एक छोटे बैनर के अलावा मीट मार्केट का कोई संकेत नहीं था। आसपास की सभी दुकानें बंद थीं। स्थानीय लोगों का कहना है कि दो साल पहले मीट मार्केट बंद कर दिया गया था।

25 मई को, बरकत ने शहर के पुलिस स्टेशन में अज्ञात पुरुषों के ख़िलाफ़ FIR दर्ज कराई, जिसके अनुसार जब वह करीब 10.15 बजे सदर बाजार में जामा मस्जिद से लौट रहा था, तो कथित तौर पर छः अज्ञात लोगों ने उस पर हमला किया – इनमें से चार मोटरसाइकिल पर थे और दो पैदल थे। वे नशे में थे, उन्होंने बरकत को इस क्षेत्र में टोपी न पहनने को कहा। उन्होंने उसे गालियाँ दीं और दो लोगों ने उसकी पिटाई भी की। इसके अलावा उसे जान से मारने की धमकी भी दी गई।

पुलिस ने धारा 153A (धर्म के आधार पर समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देना), 147 (दंगा भड़काना), 149 (ग़ैर-क़ानूनी विधानसभा), 323 (चोट पहुँचाना) और आईपीसी या भारतीय दंड संहिता की 506 (आपराधिक धमकी) के तहत मामला दर्ज किया।

अगले दिन यह मामला एक साम्प्रदायिक हिंसा के रूप में सामने आया क्योंकि बरकत ने कई टेलीविजन समाचार चैनलों को बयान दिय कि उसे ‘जय श्री राम’ और ‘भारत माता की जय’ कहने के लिए मजबूर किया गया था। लेकिन, जल्द ही बरकत के इस झूठ का पर्दाफ़ाश हो गया। पुलिस की छानबीन में जब यह बात सामने आई कि मुस्लिम युवक के साथ मारपीट तो हुई थी, लेकिन इस दौरान न तो उसकी टोपी फेंकी गई और न ही उसकी शर्ट फाड़ी गई। यह सब सीसीटीवी फुटेज को खंगालने के बाद सामने आया।

पत्रकार स्वाति गोयल जब बुधवार (29 मई) को बरकत से मिलीं, तो उसे (बरकत) यह नहीं पता था कि उसके कई दावों को गुरुग्राम पुलिस एक दिन पहले ही ख़ारिज कर चुकी थी। दरअसल, 28 मई को गुरुग्राम के पुलिस आयुक्त मोहम्मद अकिल ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की और कहा कि बरकत के कई आरोप FIR में उसके बयान के साथ-साथ सीसीटीवी कैमरों की फुटेज से मेल नहीं खाते।

उदाहरण के लिए, बरकत ने अपनी FIR में छः लोगों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज करवाया था, जबकि सीसीटीवी फुटेज में केवल दो ही आदमी दिखाई दे रहे थे, जिसमें से केवल एक ने ही उस पर हमला किया था। इसके अलावा बरकत ने मीडिया को बताया कि उसकी सिर की टोपी को जबरन हटाया गया। वीडियो में दिखाया गया कि जब हमलावर ने उसके सिर पर वार किया था, तो उसकी टोपी अव्यवस्थित हो गई, जिसे बरकत ने ख़ुद अपनी जेब में रख लिया था। बरकत ने मीडिया को बताया था कि उसे ‘जय श्रीराम’ और ‘भारत माता की जय’ बोलने के लिए कहा गया। इस पर पुलिस का कहना था कि अगर वास्तव में ऐसा था तो FIR में इसका ज़िक्र क्यों नहीं किया गया?

पुलिस आयुक्त अकील ने मीडिया को यहाँ तक ​बताया कि उन्हें लगता है कि जैसे पीड़ित को इस घटना के लिए पहले से ही ट्रेनिंग दी गई हो। अकील ने कहा, “मुझे लगता है कि किसी ने उसे प्रशिक्षित किया है, क्योंकि अगर आप मीडिया में दिए गए उसके बयानों पर ग़ौर करेंगे तो आपको यह महसूस होगा कि उसे सिखाया गया है।”

यदि पूरे मामले को ग़ौर से देखा जाए तो यह समझते देर नहीं लगेगी कि मोहम्मद बरकत ने एक मामूली विवाद को साम्प्रदायिक विवाद बनाने की पूरी कोशिश की। ऐसा लगता है जैसे बरकत को इस घटना के लिए पूरी तरह से समझा-बुझाकर तैयार किया गया हो जिससे समाज में हिन्दुओं के लिए नफ़रत का बीज बोया जा सके।

UP में भीषण गर्मी में दिमाग की नस फटने के कारण बस यात्री की मौत

कासगंज में भीषण गर्मी अब जानलेवा साबित हो रही है। शुक्रवार (मई 31, 2019) दोपहर को गर्मी के कारण एक व्यक्ति की मौत हो गई। वो बस में सवार होकर एटा से कासगंज आ रहे थे। चिकित्सक ने मौत की वजह गर्मी के कारण दिमाग की नस फटना बताया है।

ये घटना गाँव जनियापुर की है, जहाँ 55 साल के शिवराज (कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में मृतक का नाम सोबरन भी बताया जा रहा है) अपने 8 साल के बेटे मंगल के साथ कासगंज जा रहे थे। नदरई के पास बस में उनकी हालत बिगड़ गई और बस परिचालक ने उन्हें नदरई चौकी के पास उतार दिया। इसके बाद शिवराज बेहोश हो गए। मृतक शिवराज के बेटे ने पुलिस को सूचना दी। इस पर चौकी इंचार्ज अवनीश कुमार बेहोश शिवराज को जिला अस्पताल लेकर गए, जहाँ डॉक्टरोंं ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। डॉक्टर लव कुमार ने बताया कि गर्मी के कारण दिमाग की नस फटने से उनकी मौत हुई है।

मृतक शिवराज के परिवार में सिर्फ उनका 8 वर्षीय बेटा मंगल रह गया है, उसके अलावा और कोई नहीं है। दोपहर बाद रिश्तेदार उनका शव ले गए। पूरे उत्तर भारत के साथ ही कासगंज समेत पूरे ब्रज में प्रचंड गर्मी का प्रकोप है। दोपहर के समय आसमान से आग बरस रही है और लू के थपड़े चल रहे हैं। शुक्रवार दोपहर को अधिकतम तापमान 43 डिग्री से अधिक दर्ज किया गया।

कैसे करें बचाव

गर्मी में खूब पानी पिएँ, तरल पदार्थों का सेवन करें। बहुत जरूरी न हो तो सुबह 10 से शाम चार बजे तक बाहर निकलने से बचें। यदि बाहर निकलना जरूरी हो तो सिर पर अंगोछा डाल लें और सूती कपड़े पहनें।

हिंदुओं को वोट देने की अनुमति न दी जाए: तृणमूल सांसद ने जारी किया निर्देश, वीडियो वायरल

लोकसभा चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल में भाजपा ने बेहद शानदार प्रदर्शन करते हुए 42 में से 18 सीटों पर जीत हासिल की, जबकि ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस के खाते में 22 सीटें आई। इस चुनाव के दौरान बंगाल में काफी हत्याएँ और मारपीट की घटनाएँ देखने को मिली। कथित तौर पर ये हत्याएँ और मारपीट तृणमूल द्वारा करवाए गए थे। अब तृणमूल राज्यसभा सांसद शुभाशीष चक्रवर्ती का एक चौंकाने वाला वीडियो सामने आया है,जिसमें वो अपने सहयोगियों से कहते हुए दिखाई दे रहे हैं कि आगामी चुनाव में हिंदुओं को वोट देने की अनुमति न दी जाए।

शुभाशीष चक्रवर्ती दक्षिण 24 परगना के तृणमूल प्रमुख भी हैं। बंगाली पोर्टल ई बंगला 24×7 के अनुसार, उन्होंने हालिया लोकसभा चुनावों के परिणामों का विश्लेषण करते हुए अपनी पार्टी के सहयोगी को यह निर्देश दिया है। तृणमूल ने दक्षिण 24 परगना में चार सीटों-  डायमंड हार्बर, मथुरापुर, जयनगर और जादवपुर पर अच्छे अंतर से जीत दर्ज की। भाजपा ने इन सभी चार निर्वाचन क्षेत्रों में तीसरा स्थान हासिल किया। पूरे बंगाल में भाजपा के बढ़ते ग्राफ को देखते हुए ममता सरकार बौखला गई है और टीएमसी के ऊपर खतरे की घंटी बजता देख सांसद शुभाशीष ने इस तरह का निर्देश दिया है।

दरअसल, तृणमूल के कुछ पदाधिकारी चक्रवर्ती से मिलने से गए थे। इन पदाधिकारियों में अधिकतर मुस्लिम थे। इस दौरान जब चुनावी परिणामों का विश्लेषण किया गया, तो पता चला कि चिलता गाँव के तीन बूथों पर अधिकतर वोट भाजपा के पक्ष में डाले गए थे। इस बात के सामने आने के बाद चक्रवर्ती अपने पार्टी सहयोगियों को गाँव पर नज़र रखने के लिए कहते हैं। वो कहते हैं कि वहाँ के हिंदुओं को वोट देने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। इसे स्पष्ट तौर पर वीडियो में देखा जा सकता है।

गौरतलब है कि, लोकसभा चुनाव से ठीक पहले हजारों हिंदुओं को डायमंड हर्बर के कुछ मुस्लिम बहुल इलाकों से जबर्दस्ती भागने के लिए मजबूर किया गया था। इस दौरान मस्जिदों से घोषणा करते हुए हिंदुओं से कहा गया था कि अगर वो अपने घरों को छोड़कर नहीं भागते हैं, तो उन पर हमला किया जाएगा। उनसे कहा गया था कि लोकसभा चुनाव के खत्म होने के बाद ही वो यहाँ पर लौट सकते हैं। खबर के मुताबिक, उन क्षेत्रों से हिंदूओं को भगाने के बाद मतदान में धांधली की गई और सभी हिंदू मतदाता के वोट तृणमूल कॉन्ग्रेस के पक्ष में डाले गए थे।

हमारी सरकार का पहला फैसला रक्षकों को समर्पित: मोदी कैबिनेट

आखिरकार तीन महीने की चुनावी प्रक्रिया खत्म होने के बाद सरकार का गठन हो गया है। बृहस्पतिवार को नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली और उनके साथ कुल 58 मंत्रियों ने शपथ ली है। इसमें कुल 25 कैबिनेट मंत्री हैं (PM समेत) जबकि 9 स्वतंत्र प्रभार, 24 राज्य मंत्री शामिल हैं।

पीएम नरेंद्र मोदी ने कार्यभार संभालने के बाद पहले फैसले के रूप में ‘पीएम स्कॉलरशिप स्कीम‘ में बड़े बदलाव को मंजूरी दी है। इसकी जानकारी नरेंद्र मोदी ने अपने ट्विटर हैंडल से दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी सरकार का पहला बड़ा फैसला लिया है। पीएम मोदी ने ट्वीट करते हुए लिखा है, “हमारी सरकार का पहला फैसला भारत की रक्षा करने वालों को समर्पित है!” पहले फैसले में राष्ट्रीय रक्षा कोष के तहत प्रधानमंत्री छात्रवृत्ति योजना में बदलाव करते हुए पीएम मोदी ने आतंकी, माओवादी हमलों में बलिदान हुए जवानों के बच्चों की छात्रवृत्ति बढ़ाने का फैसला लिया।

लड़कों के लिए मासिक स्कॉलरशिप 25% बढ़ोत्तरी के साथ ₹2500 कर दी गई है जो कि पहले ₹2000 प्रति माह थी। वहीं, लड़कियों के लिए यह 33.33% बढाकर ₹3000 प्रति माह कर दी गई है, जो कि पहले ₹2250 प्रति माह थी। इस स्कॉलरशिप का दायरा पुलिसकर्मियों के लिए बढ़ा दिया गया है, जो कि किसी भी प्रकार की आतंकी और माओवादी गतिविधियों में बलिदान हुए थे। नई स्कॉलरशिप का कोटा राज्य पुलिस अधिकारियों के लिए 500/वर्ष कर दिया गया है। गृह मंत्रालय इन मामलों की निगरानी करेगा।

शपथ ग्रहण के साथ ही पीएम मोदी ने काम भी शुरू कर दिया है, इसके अलावा सभी मंत्रियों के कामकाज का बँटवारा भी हो गया है। मोदी कैबिनेट की पहली बैठक शुरू हो चुकी है। गृहमंत्री अमित शाह बैठक में पहुँच गए हैं। मुख्तार अब्बास नकवी और सदानंद गौड़ा भी बैठक में उपस्थित हैं। बैठक दिल्ली के साउथ ब्लॉक में शुरू हुई।

मंत्रियों के जाति-धर्म पर चल रहे मीडिया शोध से आखिर कौन-सी अच्छी बात हो जाएगी?

इतिहास में मौजूद हजारों किस्से-कहानियाँ इस बात का सबूत हैं कि हमारा देश जातिव्यवस्था का भुक्तभोगी रहा है। देश में लोकतंत्र आने के बाद भी जाति/धर्म पर राजनीति लगातार होती रही। नतीजतन आजतक इससे मुक्ति नहीं पाई गई, और जाति का प्रभाव अब भी हमारे समाज में कुरीति की तरह मौजूद है। जाति के नाम पर बनी कई क्षेत्रीय पार्टियाँ इसका जीवंत उदहारण हैं कि संविधान भले ही सभी नागरिकों को समानता का अधिकार औपचारिक रूप से प्रदान करता हो लेकिन व्यवहारिक जिंदगी में समाज की कड़वी सच्चाई अब समाज से उठकर राजनीति की मुख्यधारा बन चुकी है और इसका अनुसरण अब ‘निष्पक्ष’ मेनस्ट्रीम मीडिया द्वारा भी लगातार किया जा रहा है।

हालिया उदहारण के लिए टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर को पढ़ा जा सकता है। शपथ ग्रहण समारोह को अभी एक दिन भी नहीं बीता है कि मीडिया ने इस तरह की खबर बनानी शुरू की जिसकी शायद ज़रूरत नहीं। 30 मई को जिन मंत्रियों ने शपथ ली, उनकी जाति-धर्म पर शोध हुए और खबरें बना दी गईं। जाति और धर्म का एंगल देकर निष्कर्ष ये निकाला गया कि मोदी सरकार ने भले ही ‘सबका साथ-सबका विकास’ करने की कितनी ही कोशिश क्यों न की हो, लेकिन उनकी मंत्रिपरिषद की सूची में ऊँची जाति वालों का ही आधिपत्य है।

मंत्रियों का नाम और उनकी पार्टी का उल्लेख करके ‘समझाया’ गया कि कौन सा नेता समाज के किस तबके का प्रतिनिधि है। मसलन, अल्पसंख्यक नेता के रूप में सिर्फ़ मुख्तार अब्बास नकवी ने कल शपथ ली, जबकि हरसिमरत कौर और हरदीप पुरी के रूप में दो सिख नेताओं को शपथ दिलवाई गई, अनुसूचित जनजाति के सिर्फ़ 6 नेता कैबिनेट में शामिल हैं और अनुसूचित जनजाति से सिर्फ़ 4 नेताओं को चुना गया है। इन बिंदुओं को खबर में अलग से उल्लेखित किया गया कि मंत्रिपरिषद में नौ ‘ब्राहमण’ नेताओं को जगह दी गई है।

अब सोचने वाली बात है कि खुद को ‘निष्पक्ष’ कहने वाला मीडिया जिन राजनेताओं की जाति/धर्म से जनता को परिचित करवा रहा है, उसका क्या औचित्य है? जिनका जीवन-मरण इन बिंदुओं पर टिका है वो कहीं न कहीं से जाति खोज ही लेंगे, लेकिन सार्वजनिक स्तर पर क्या मीडिया संस्थानों को इस तरह की खबर करनी चाहिए? क्या इसका प्रभाव एक बड़े पाठक वर्ग पर नहीं पड़ेगा जो इस खबर को पढ़ने के साथ ही खुद को सरकार से अलग मान लेगा? क्या होगा अगर निर्वाचित सरकार से सकारात्मक उम्मीद की जगह, नकारात्मक अवधारणा कायम कर ली जाएगी?

तब तो सरकार जो भी करेगी हमें सब हमारे विरोध में ही लगेगा। क्या मीडिया हम से यही चाहता है कि हम आशा में नहीं बल्कि घुटन में पाँच साल गुजारें? ऐसे मुद्दे उठाकर आखिर क्यों नेगेटिव माहौल का निर्माण किया जा रहा है, जब चुने गए मंत्री वहीं निर्वाचित नेता हैं जिनपर जनता ने इन चुनावों में अपना विश्वास दिखाया है। अगर उन्हें जाति-धर्म में उलझना होता, तो वो मतदान के समय ही उलझ चुके होते। फिर अब ऐसी बातों को क्यों उकेरा जा रहा है?

मीडिया में मौजूद ऐसी खबरों को पढ़ने के बाद लगता है कि जाति-धर्म में उलझाने का काम अब सिर्फ़ राजनेताओं का नहीं रहा है बल्कि मीडिया भी इसमें अपनी विशेष भूमिका निभा रहा है। अपनी नैतिक जिम्मेदारियों से विमुख हो चुका मीडिया ऐसी खबरों को करते समय भूल रहा है कि भाजपा को मिला प्रचंड बहुमत इस बात का सबूत है कि इन चुनावों में जाति-धर्म से उठकर लोगों ने मोदी सरकार को वोट दिया है। मोदी सरकार किसी विशेष जाति के कारण पूरे देश भर में 303 सीटें हासिल कर पाने में सक्षम नहीं हुई है, उनकी ये जीत इस बात का सबूत है कि अब देश की जनता अपने प्रतिनिधि से जाति-धर्म की जगह देश की अखंडता को बनाए रखने की उम्मीद करती है।

ये बात सच है कि एक समय था जब भाजपा पार्टी की विचारधारा को कट्टर हिंदुत्व का आईना माना जाता था, लेकिन आज ऐसा नहीं है। देश में जाति की जकड़ मजबूत होने के बावजूद भी अलग-अलग समुदायों ने मोदी को वोट देकर ये साबित किया है कि वो खुद भी ऐसी सोच से उबर रहे हैं, जो देश को बाँटती है। सीएसडीएस की वेबसाइट पर मौजूद आँकड़े और दलित एवं मुस्लिम बहुल इलाकों में दर्ज हुई मोदी सरकार की जीत बताती है कि इस सरकार पर जनता को यकीन है तभी वो सत्ता में लौटे हैं। (भाजपा ने इस बार 90 ऐसे जिलों में 50% से अधिक सीटों को हासिल किया है, जो अल्पसंख्यक बहुल (Minority Concentration Districts) हैं।)

इस ऐतिहासिक जीत को ‘लहर’ का नाम देकर सीमित नहीं किया जा सकता, व्यक्ति विशेष की ‘लहर’ तभी होती है जब व्यक्तित्व या नीतियाँ प्रभावशाली हो। 2014 में मोदी के व्यक्तित्व में जनता को एक बेहतर विकल्प दिखा और मोदी लहर उमड़ गई, लेकिन 2019 सत्ता में सरकार की वापसी उनके काम को देखते हुए हुई है। पिछले 5 सालों में अगर आप गौर करेंगे तो मालूम चलेगा कि अपराधों को भी राजनैतिक चेहरा देकर मोदी सरकार पर सवाल उठाए जाते थे, ताकि मोदी सरकार की छवि धूमिल हो।

बिलकुल यही काम अब फिर शुरू हो गया है, पहले मंत्रियों की जाति के आँकड़े निकाले गए हैं, फिर बेवजह के सवाल तैयार किए जाएँगे, फिर आपसी रंजिश जैसे मामलों का ठीकरा भी मोदी सरकार की नीतियों के माथे फोड़ दिया जाएगा और फिर घूम-फिरा कर बहस यहाँ रोकी जाएगी कि अगर मोदी सरकार वाकई सबका साथ-सबका विकास चाहती है तो ऊँची जाति वाले नेताओं की संख्या पार्टी में क्यों ज्यादा है?

अंत में एक और बात। गाँव-शहर के वार्ड कमिश्नर से लेकर सांसद तक ‘प्रतिनिधित्व’ ही करते हैं। हमारे लोकतंत्र की खूबसूरती और बेहतर बात यही है कि हर स्तर पर जन-प्रतिनिधि लोक कल्याण के लिए चुने जाते हैं। अब अगर मंत्रालय में प्रतिनिधित्व देखा जाए तो फिर क्या भारत की हर जाति, जनजाति, धर्म, मज़हब, पेशा आदि को आधार बना कर मंत्रालयों में मंत्री बनाना संभव है? अभी चर्चा ‘दलित-सवर्ण’ का है, कल को ये लोग अपना नया एंगल बनाने के लिए दलितों में भी ‘किस जाति को कितने मंत्रालय मिले’, ‘कौन-सा मंत्रालय ज़्यादा बड़ा है’, ‘किस मंत्रालय का प्रभाव व्यापक है’ आदि मुद्दे चर्चा में नहीं आएँगे?

मीडिया को अपनी ज़िम्मेदारी सकारात्मक तरीके से निभानी चाहिए न कि समाज में पहले से प्रचलित दरारों को और बड़ा बनाने की कोशिश करनी चाहिए। इस तरह के लेख जनता के बीच गलत डिबेट की शुरुआत करते हैं जिसकी नकारात्मकता वृहद् तौर पर प्रभाव छोड़ती है।

अल्पसंख्यक बहुल इलाके में भाजपा की जीत के बारे में पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें-90 जिले अल्पसंख्यक बहुल, 50% से अधिक सीट BJP को: मुस्लिम वोटरों ने फर्जी सेकुलरों को दिखाया ठेंगा

पहली महिला वित्त मंत्री, IFS बने विदेश मंत्री, मंत्रिमंडल 2.0 की ये हैं खास बातें

नरेंद्र मोदी सरकार के मंत्रियों ने कल शपथ लेने के बाद आज अपने-अपने मंत्रालय में पदभार ग्रहण कर लिया। आइये जानते हैं मोदी सरकार के मंत्रियों के बारे में ख़ास बातें।

निर्मला सीतारमन

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में पूर्व रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन को वित्त मंत्रालय का कार्यभार सौंपा गया है। देश की पहली रक्षा मंत्री बनकर इतिहास रचने वाली निर्मला सीतारमन ने एक बार फिर से पूर्णकालिक महिला वित्त मंत्री बनने का गौरव अपने नाम कर लिया है। हालाँकि, इससे पहले प्रधानमंत्री रहते हुए इंदिरा गाँधी ने 1970 से 1971 के बीच वित्‍त मंत्री का अतिरिक्‍त कार्यभाल संभाला था।

निर्मला सीतारमन की गिनती उन महिलाओं में होती है, जिन्होंने बेहद कम समय में राजनीति में अपना अलग मुकाम हासिल किया है। बतौर रक्षा मंत्री उन्होंने कड़ी चुनौतियों का सामना किया। नई सरकार में सीतारमन को वित्त मंत्रालय के साथ-साथ कॉरपोरेट अफेयर्स मंत्रालय संभालने का जिम्मा भी सौंपा गया है।

सुब्रमण्यम जयशंकर

पूर्व विदेश सचिव एस जयशंकर भारत के नए विदेश मंत्री हैं। वे भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी रह चुके हैं। पद्मश्री से सम्मानित एस जयशंकर बिना चुनाव लड़े ही मंत्री बने हैं। जयशंकर को राज्यसभा का सदस्य बनाए जाने की पूरी संभावना है क्योंकि उन्होंने लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ा है। दरअसल, केंद्रीय मंत्री को पदभार ग्रहण करने के 6 महीने के भीतर एक सदन का सदस्य होना आवश्यक होता है।

जनवरी 2015 से लेकर जनवरी 2018 तक विदेश सचिव रहते हुए उन्होंने मोदी के पहले कार्यकाल के दौरान उनकी विदेश नीति को आकार प्रदान करने में अहम भूमिका निभाई। इससे पहले यूपीए सरकार में भी इनका काम काफी अच्छा रहा। जयशंकर ने विदेश सचिव के रूप में अमेरिका, चीन समेत बाकी देशों के साथ भी महत्वूर्ण समझौतों में हिस्सा लिया। चीन के साथ 72 दिन तक चले डोकलाम विवाद को सुलझाने में भी जयशंकर का अहम रोल रहा। डोकलाम विवाद को सुलझाने में जयशंकर, डोभाल और मोदी रात-रात भर जागकर काम किया करते थे

गिरिराज सिंह

भाजपा के फायर ब्रांड नेता गिरिराज सिंह को पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन मंत्रालय की जिम्‍मेदारी दी गई है। मंत्रालय के आवंटन के बाद गिरिराज सिंह ने कहा कि उन्‍हें जो भी जिम्मेदारी दी गई है, उसे वह पूरी जवाबदेही के साथ निभाएँगे। बेगूसराय से कम्युनिस्ट कन्‍हैया कुमार को हराने वाले गिरिराज सिंह ने कहा कि वह पीएम मोदी के रोडमैप को आगे ले जाने के लिए काम करेंगे। उन्होंने बताया कि बिहार सरकार में बतौर मंत्री वह इस विभाग को संभाल चुके हैं।

जनरल वी के सिंह

पिछली सरकार में विदेश राज्य मंत्री का पदभार संभाल चुके जनरल वी के सिंह को सड़क परिवहन मंत्रालय में राज्य मंत्री का ओहदा दिया गया है। इस जिम्मेदारी के मिलने पर वी के सिंह ने सड़क एवं परिवहन मंत्रालय को महत्त्वपूर्ण मंत्रालय बताते हुए नितिन गडकरी के साथ मिलकर काम को आगे बढ़ाने की बात कही। हालाँकि इससे पहले उन्हें विदेश या रक्षा मंत्रालय मिलने के कयास लगाए जा रहे थे क्योंकि उन्होंने 40 साल सेना में और 5 साल विदेश मंत्रालय में बतौर राज्य मंत्री काम किया है।

प्रताप चंद्र सारंगी

ओडिशा के मोदी के नाम से मशहूर प्रताप चंद्र सारंगी को सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम और पशुपालन, डेयरी एवं मत्स्य पालन राज्य मंत्री बनाया गया है। प्रताप चंद्र सारंगी ने इस बार के लोकसभा चुनाव में बालासोर संसदीय सीट से बीजद प्रत्याशी रबींद्र कुमार जेना को 12,956 मतों से हराया। सारंगी को उनके सादे जीवन के लिए भी जाना जाता है। मंत्रालय का कार्यभार मिलने के बाद उन्होंने पीएम मोदी का आभार जताया और कहा कि आम आदमी और पीएम मोदी का विश्वास जीतने के लिए वह अपना सर्वश्रेष्ठ देंगे।

गजेंद्र सिंह शेखावत

इस बार की सरकार में एक नए मंत्रालय जल शक्ति का गठन किया गया। दरअसल, नरेंद्र मोदी ने अपने चुनावी वादे को निभाते हुए इस मंत्रालय का गठन किया है, ताकि लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध हो सके। इस मंत्रालय का कार्यभार जोधपुर से सांसद गजेंद्र सिंह शेखावत को सौंपी गई है, जिन्होंने जिन्होंने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के बेटे को हराया था।

सच हुई गृहमंत्री अमित शाह को लेकर अरविन्द केजरीवाल की भविष्यवाणी

देश में चल कुछ भी रहा हो, लेकिन देश की राजनीति से लेकर मीडिया में कुछ ऐसे लोग आ गए हैं, जिनका जिक्र किए बिना लोगों का दिन गुजरता ही नहीं। आम आदमी पार्टी अध्यक्ष अरविन्द केजरीवाल भी उन्हीं कुछ चुनिंदा हस्तियों में से एक हैं।

मोदी सरकार और मंत्रिमंडल के शपथग्रहण और विभागों के आवंटन के बाद अरविन्द केजरीवाल एक बार फिर ट्विटर और सोशल मीडिया पर शेयर किए जाने लगे। दरअसल दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने चुनाव से पूर्व मतदाताओं के बीच अफवाह और डर का माहौल तैयार करने के लिए अपनी एक चिंता जाहिर कर दी थी। अरविन्द केजरीवाल का डर था कि अगर अमित शाह देश के गृह मंत्री बन गए तो फिर क्या होगा?

आज सुबह ही अमित शाह को गृह मंत्री बनाए जाने की सूचना मिलते ही सोशल मीडिया यूज़र्स ने अरविन्द केजरीवाल के 21 दिन पुराने उस ट्वीट को ढूँढ निकाला और अमित शाह की जगह एक बार फिर सारी अटेंशन अरविन्द केजरीवाल ले गए।

अरविन्द केजरीवाल ने इस ट्वीट में लिखा था, “देशवासियों, वोट देते वक़्त सोचना। अगर मोदी जी दोबारा आ गए तो अमित शाह गृह मंत्री होंगे। जिस देश का गृह मंत्री अमित शाह हो, उस देश का क्या होगा, ये सोच के वोट डालना।”

केजरीवाल के इस ट्वीट को पढ़कर तो यही लगता है कि जनता ने उनकी बात को दिल पर ले लिया था और इसी कारण भाजपा 300 का आँकड़ा पार करने में सफल रही। लेकिन घटनाक्रम कोई भी हो, अरविन्द केजरीवाल का अचानक से प्रासंगिक हो जाना एक कौतुहल का विषय रहता है। मानो राहुल गाँधी और अरविन्द केजरीवाल ने कसम खाई हो कि जनता को पूर्ण मनोरंजन देकर रहेंगे। यही जेसीबी की खुदाई जब सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगी तो अरविन्द केजरीवाल उस वक़्त भी प्रासंगिक हो पड़े थे।