Home Blog Page 5903

नेहरू के हजारों लाशों वाले कुम्भ से बदली नीयत वाली सरकार के कुम्भ तक: बदलाव हर तरफ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को उत्तरप्रदेश के कौशाम्बी में चुनावी रैली को संबोधित करते हुए कहा कि 1954 में कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान जब पूर्व प्रधानमंत्री पंडित नेहरू कुम्भ में आए थे, तब भगदड़ मच गई थी। हजारों लोग मारे गए थे। तब सरकार की लाज बचाने के लिए, पंडित नेहरू पर कोई दाग न लग जाए, इसके लिए खबरें दबा दी गईं। मगर इस बार कुम्भ में करोड़ों लोग आए, लेकिन कोई भगदड़ नहीं हुई, कोई नहीं मरा। व्यवस्थाएँ कैसे बदलती हैं, यह उसका उदाहरण है।

ऑपइंडिया ने इस पर एक विस्तृत रिपोर्ट छापी थी जिसमें नेहरू के समय के कुम्भ में क्या हुआ था इसका विस्तृत वर्णन था। उसी रिपोर्ट से:

प्रधानमंत्री नेहरु के संसदीय क्षेत्र प्रयाग में आजादी के बाद आयोजित प्रथम कुम्भ की दर्दनाक भगदड़

जब भी कुम्भ मेले की भगदड़ों का नाम आता है तो वर्ष 1954 के प्रयाग कुम्भ का रक्तरंजित इतिहास आँखों के सामने आ जाता है। ‘द गार्जियन’ के अनुसार 3 फरवरी, 1954 को मौनी अमावस्या के दिन शाही स्नान में 800 से अधिक श्रद्धालुओं की भयानक भगदड़ में मौत हुई। ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ के अनुसार यह आँकड़ा हजार मौतों से ज्यादा का है। तत्कालीन प्रधानमंत्री और इलाहबाद से सांसद जवाहरलाल नेहरू उस दिन कुम्भ मेला क्षेत्र में ही उपस्थित थे। सरकार द्वारा केवल कुछ भिखारियों के मरने का दावा किया गया था। लेकिन तत्कालीन नेहरू सरकार का ‘सरकारी झूठ’ तब सामने आया जब एक पत्रकार ने गहनों से लदी महिलाओं की लाशों की तस्वीर अख़बार में छाप दी थी।

प्रयागराज (इलाहबाद) की इस भयावह घटना के गवाह कुछ लोग बताते हैं कि मृतक संख्या कम दिखाने के लिए शासन द्वारा दर्जनों शव पेट्रोल डाल कर जला दिए गए थे। हालाँकि, यह सब आधिकारिक रिकॉर्ड्स में कब दर्ज होता है? लाशों के कई ढेर पुलिस की घेराबंदी करके जलाए गए लेकिन कुछ पत्रकार फिर भी तस्वीरें खींच लाए। हादसे की तस्वीरें खींचने वाले अकेले फोटो पत्रकार एनएन मुखर्जी ने संस्मरण में बताया था कि दुर्घटना के अगले दिन अख़बारों में शवों की तस्वीरें देखकर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंदबल्लभ पंत ने दाँत पीसते हुआ कहा था, “कौन है ये हरामज़ादा फ़ोटोग्राफ़र?”

कुम्भ मेले में भगदड़ से मौतों का सिलसिला यहीं नहीं थमा। ‘द गार्जियन’ के अनुसार, मार्च 1986 के हरिद्वार कुम्भ मेले में हुई 3 भगदड़ों 600 से भी ज्यादा लोगों की मौत हुई। इसी साल 1986 में ही जनवरी में हुए प्रयाग कुम्भ मेले में भगदड़ में 50 से अधिक लोगों की मौत हुई थी।

सरकार बदली, नियत बदला तो बदलाव दिख रहा है

मोदी ने कहा कि मुझे पिछली बार कुम्भ में अनेक बार आने का मौका मिला। जब सरकार बदलती और नीयत बदलती है तब कैसा परिणाम आता है, यह प्रयागराज ने इस बार दिखा दिया है। पहले कुम्भ होता था तो खबरें आती रहती थीं कि अखाड़ों के बीच जमीन को लेकर विवाद है। किसी को इतनी जमीन दी, किसी को यह किया। पहले कुम्भ मेले में भ्रष्टाचार की बातें सामने आती थीं। इस बार मेला हुआ, शान से माथा ऊँचा हो गया। एक आरोप नहीं लगा। पहले मेला होता था तो यह चोरी हो गया, वो चोरी हो गया, शिकायत आती थीं। इस बार चोरी, मारधाड़ की कोई शिकायत नहीं आई।

मोदी ने बताया कि इस बार कुम्भ का मेला दुनियाभर के अखबारों में छपा है। पहले सिर्फ नागा साधुओं के बारे में छपता था। इस बार कुम्भ में सफाई के बारे में छपा। पहले कहा जाता था उत्तर प्रदेश में व्यवस्था की बातें हो ही नहीं सकतीं। इस बार यूपी ने दिखा दिया कि आप लोग बहादुर हैं और व्यवस्था को मानने वाले हैं।

मोदी ने कहा कि पंडित नेहरू जब प्रधानमंत्री थे, तब वे एक बार कुम्भ के मेले में आए थे। मैं जो बात आज बता रहा हूँ, उसे पाँच-छह दशक में दबा दिया गया, छिपा दिया गया। असंवेदनशीलता की सीमा पार की गई। जब नेहरू जी आए तो मेला इतना बड़ा नहीं होता था। दूसरी पार्टियों का तो निशान भी नहीं था। केंद्र और राज्य में कॉन्ग्रेस की सरकार थी। तब कुम्भ में भगदड़ मच गई थी। हजारों लोग कुचल के मारे गए थे। लेकिन सरकार की लाज बचाने के लिए, पंडित नेहरू पर कोई दाग न लग जाए, इसके लिए खबरें दबा दी गईं। कुछ अखबारों में कोने में खबर छिपा दी गई। इसमें पीड़ितों को भी कुछ नहीं दिया गया। ऐसा पाप देश के पहले प्रधानमंत्री के काल में हुआ। इस बार करोड़ों लोग आए लेकिन कोई भगदड़ नहीं हुई, कोई नहीं मरा।

AIDS पीड़ित पाकिस्तानी डॉक्टर ने सैकड़ों को लगाया संक्रमित इंजेक्शन, 59 के टेस्ट HIV+

पाकिस्तान के सिंध प्रांत के लरकाना क्षेत्र में एक ऐसी सनसनीखेज वारदात सामने आई है, जिसे सुनकर हर कोई दहशत में है। दरअसल, लरकाना के रातोदेरो जिले में एक साथ कम से कम 59 लोगों के HIV पॉजिटिव होने का मामला सामने आया है, जिसमें 25 बच्चे शामिल हैं।

मामला सामने आते ही उस इलाके में हड़कंप मच गया। लरकाना के पुलिस कमिश्नर के अनुसार, जाँच में रातोदेरो जिले का एक क्लिनिक शक के दायरे में आया। मामले की पड़ताल करने पर पता चला कि इस क्लिनिक का एक डॉक्टर मुज्फफर घांघर खुद HIV पॉजिटिव है। रिपोर्ट्स के अनुसार, डॉक्टर ने ही क्लिनिक में आने वाले बच्चों और बाकी मरीजों को HIV संक्रमित इंजेक्शन लगाया, जिससे ये बीमारी अचानक से फैल गई। पुलिस ने डॉक्टर को गिरफ्तार कर लिया है।

बताया जा रहा है कि किसी ‘इंतकाम’ को पूरा करने के लिए डॉक्टर ने सैंकड़ों मरीजों को संक्रमित सूई से इंजेक्शन लगाया है। इस वहशियाना हरकत का मंजर ये है कि अब तक 25 बच्चों के मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें ज्यादातर बच्चों की उम्र 4 महीने से 8 साल के बीच है।

हालाँकि, अभी तक ये पता नहीं चल पाया है कि डॉक्टर ने ऐसा क्यों किया। पुलिस का कहना है कि डॉक्टर एड्स पीड़ित होने के चलते दिमागी से रूप अस्वस्थ है, जिस कारण उसने इतनी बड़ी वारदात को अंजाम दिया। पुलिस अभी तक ये उगलवाने में नाकामयाब रही है कि ये डॉक्टर कब से ऐसी हरकत कर रहा था क्योंकि मरीजों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है। पिछले हफ्ते तक सिर्फ 14 केस सामने आए थे, लेकिन अभी तक इन केसों की संख्या 59 को पार कर चुकी है।

प्रभावित इलाके में स्वास्थ्य विभाग अब उन लोगों के टेस्ट कराने को कह रहा है, जिनको कभी न कभी इस पब्लिक क्लिनिक ने इंजेक्शन लगाया था। जिससे HIV पॉजिटिव मरीजों की संख्या में भारी इजाफा होने की संभावना है। शायद ये पहला ऐसा केस होगा, जब किसी डॉक्टर ने जानबूझकर इस तरह से HIV एड्स को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया हो। पाकिस्तान अजूबों से भरा पड़ा है और ये किस्सा उसी का एक नमूना नजर आता है।

अगर जिहादी है मेरा बेटा, तो जेल में ही सड़ा दो: आइएस आतंकी के पिता

एनआइए द्वारा केरल के पलक्कड़ से गिरफ्तार 29-वर्षीय संदिग्ध इस्लामिक स्टेट आतंकी रियास अबूबकर के पिता ने साफ़ किया कि अगर उनका बेटा एंटी-नेशनल या आतंकवादी निकलता है तो वह उसकी कोई मदद नहीं करना चाहते; उनके अनुसार उस हालात में रियास को जेल में ही सड़ना चाहिए। एनआइए ने अबूबकर को कोई फिदाइन जिहादी घटना हिंदुस्तान में प्लान करने के आरोप में गिरफ्तार किया है। बीते सोमवार को गिरफ्तार आरोपी के बारे में शीर्ष आतंकी जाँच एजेंसी का कहना है कि रियास दो रविवार पहले श्री लंका में हुए ईस्टर धमाकों के सूत्रधार ज़ाहरान हाशिम के वीडियो और भाषणों से प्रभावित था।

तीन साल से हो रहे थे बदलाव, नाम रख लिया था ‘अबू दुजाना’

इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए उसके वालिद अबूबकर ने बताया कि तीन साल पहले से रियास में संदेहास्पद बदलाव आने लगे थे। उसने अरबी कपड़े पहनना, दाढ़ी बढ़ाना शुरू कर दिया था। गुमसुम और एकाकी होता जा रहा था, और परिवार के ऐतराज से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था। रियास ने फ़िल्में और टीवी आदि देखना भी एकदम से बंद कर दिए, और अपने स्मार्टफोन पर केवल इस्लाम से जुड़े वीडियो और लेखों में डूबने लगा था। उसके फेसबुक लेख भी इतने आपत्तिजनक हो गए थे कि उसके छोटे भाई को उससे बात करनी पड़ी थी।

कभी नहीं सोचा था इस्लामिक स्टेट से निकलेंगे रिश्ते  

इलाके के आम बागान में मजदूर अबूबकर को यह चिंता तो थी कि उनका सबसे बड़ा बेटा किसी गलत राह पर जा रहा है, पर यह कभी नहीं उम्मीद थी कि वह इस्लामिक स्टेट जैसे खूँखार स्तर पर पहुँच जाएगा। वहीं एनआइए का कहना है कि रियास केरल से आइएस में शामिल हो जिहाद छेड़ने गए 22 में से कम-से-कम 2 दहशतगर्दों के सम्पर्क में था। एजेंसी के अनुसार हाल ही में उसने फेसबुक पर अपना नाम भी बदल कर “अबू दुजाना” कर लिया था।

मस्जिद में मिला था आतंकियों से

याह्या और ईसा नामक पलक्कड़ के दो भाई ईसाई से इस्लाम अपनाकर आइएस में शामिल होने चले गए थे। रियास के बहनोई काजा के अनुसार रियास ने उन्हें अपना दोस्त बताया था। जब जिहादियों के तौर पर उन दोनों भाइयों के फोटो मीडिया में आने लगे तो रियास ने परिवार को बताया कि वह उनसे पलक्कड़ की एक मस्जिद में मिला था।

जब प्रियंका स्वीकारती है कि कॉन्ग्रेस वोट-कटवा पार्टी है, तो पार्टी का भविष्य चमकता है

पाँच साल पहले जब गुजरात के एक मुख्यमंत्री ने कॉन्ग्रेस के घोटालों से जर्जर देश के विकास की बात की तो ‘कॉन्ग्रेस मुक्त भारत’ का नारा दिया। वह व्यक्ति बीजेपी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और पिछले पाँच सालों में न सिर्फ देश मजबूत हुआ बल्कि पार्टी भी उतनी ही मजबूत हुई। जो कॉन्ग्रेस कभी खुद को ही लोकतंत्र समझती थी, जिसके नेताओं ने कभी ‘इंदिरा इज इंडिया’ कहा था, आज उसी कॉन्ग्रेस के कैसे दिन आ गए हैं कि देश की सबसे बड़ी पार्टी कॉन्ग्रेस का मनोबल इतना गिर चुका है कि वह अब चुनाव जीतने के लिए नहीं बल्कि ‘वोट काटने’ के लिए लड़ रही है।

यह बात कोई और नहीं बल्कि कॉन्ग्रेस की महासचिव प्रियंका गाँधी खुद कह रही हैं। तो क्या उत्तर प्रदेश में कॉन्ग्रेस और बसपा-सपा गठबंधन का चुनाव में उतरना मतदाताओं को बेवकूफ बनाने के लिए मात्र एक चाल है? क्या इनकी आपसी चुनावी बयानबाजी देश की जनता को बेवकूफ बनाने की हिस्सा है? कब तक ये लोग आम जनता को बेवकूफ समझ कर उसका बेजा फायदा उठाते रहेंगे? क्या जनता का बहुमूल्य वोट जो ऐसे वोटकटवा पार्टी को जा रही है वह लोकतंत्र के मूलभूत स्तम्भ के साथ मजाक नहीं है?

निराश-हताश कॉन्ग्रेस की महासचिव प्रियंका गाँधी ने भी जिन्हें पार्टी ने कॉन्ग्रेस की डूबती नैया बचाने के लिए आखिरी तारणहार के रूप में उतरा था, हथियार डाल दिए हैं। बुधवार (मई 1, 2019) को यूपी में एक बड़ा खुलासा करते हुए प्रियंका वाड्रा ने खुद कहा कि हर सीट जीतने के लिए नहीं होती है और हारने वाली सीटों पर हमनें वोट काटने वाले कैंडिडेट्स को उतारा है ताकि बीजेपी के वोट काटे जा सकें।

प्रियंका वाड्रा के इस खुलासे ने अब कॉन्ग्रेस पार्टी की उस मंशा पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसमें पार्टी फ्रंट फुट पर खेलते हुए हर राज्य में अपने बल पर बेहतर प्रदर्शन कर सत्ता में आने का दम भर रही थी। यहाँ तक कि लोकसभा चुनाव से पहले कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने कहा था कि उनकी पार्टी देश के हर राज्य में फ्रंट फुट पर खेलने को तैयार है। उन्होंने कहा था कि हमारी पार्टी देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी है। लिहाजा हम प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आने के लिए इस चुनाव में उतरेंगे। इसके लिए अपने तरफ से राहुल ने कोई कसर नहीं छोड़ी तमाम झूठ बोले, कई झूठे आरोप लगाए, राफेल-राफेल चिल्लाए। यहाँ तक कि अपने पूरे गिरोह को भी फर्जी माहौल बनाने के लिए लगा दिया लेकिन झूठ का हवाई किला कितनी देर तक टिकता उसे ढहना ही था और अब इसकी पूर्व सूचना प्रियंका ने अपने आज के खुलासे से दे दिया। आज का प्रियंका का बयान कॉन्ग्रेस के बचे मनोबल को भी तोड़ने वाला है।

वैसे प्रियंका और राहुल कब क्या बोल जाएँ कुछ कहा नहीं जा सकता। प्रियंका गाँधी ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में भाजपा को एक बड़ा झटका लगेगा और वे बुरी तरह हार जाएँगे। उन्होंने कहा कि उन सीटों पर जहाँ कॉन्ग्रेस मजबूत है, कॉन्ग्रेस जीत जाएगी और अन्य जहाँ कॉन्ग्रेस कमजोर है, वहाँ उम्मीदवारों का चयन यह सुनिश्चित करने के लिए किया गया है कि वे भाजपा के ‘वोट काट’ सकें।

2019 के लोकसभा चुनावों में, अनिवार्य रूप से शुरुआती कयास लगाए गए थे कि केवल दो राष्ट्रीय पार्टियाँ हैं जो चुनावी संग्राम में हैं- भाजपा और कॉन्ग्रेस। जहाँ भाजपा ने पीएम मोदी पर अपनी उम्मीदें बाँधी हैं और अपने दम पर बहुमत हासिल करने की कोशिश कर रही है, वहीं कॉन्ग्रेस अब क्षेत्रीय दलों के लिए सहायक की भूमिका निभाते हुए केवल “वोट कटर” तक ही सीमित रह गई है। कॉन्ग्रेस की स्थिति ऐसी हो गई है कि वह ‘न घर की रही न घाट की।’ सोचिए कॉन्ग्रेस के इतने बुरे दिन आ गए हैं कि बीएसपी जैसी पार्टी ने भी जिसके संसद में जीरो सांसद हैं, कॉन्ग्रेस को नकार दिया।

हालाँकि, प्रियंका गाँधी वाड्रा के बयान का एक बड़ा निहितार्थ है। मीडिया को दिए अपने बयान में, उन्होंने स्वीकार किया कि उत्तर प्रदेश में जहाँ कॉन्ग्रेस की स्थिति कमजोर है, वहाँ पार्टी ने ‘वोट-कटर’ को उतारा है। वोट काटने वाले ऐसे उम्मीदवार होंगे जो जीत नहीं पाएँगे, लेकिन भाजपा के वोट शेयर में खाएँगे, जिससे उस निर्वाचन क्षेत्र से बसपा या सपा के उम्मीदवार को मदद मिलेगी।

प्रियंका गाँधी वाड्रा के बयान से, यहाँ यह भी स्पष्ट हो जाता है कि सार्वजनिक रूप से केवल दिखावा करने के लिए था कि ये तीनों पार्टियाँ एक-दूसरे के खिलाफ हैं। दरअसल, कॉन्ग्रेस, बसपा और सपा वास्तव में बीजेपी को हराने के लिए एक साथ हैं। इनके बीच की फाइट और बयानबाजी छद्म है। इन पार्टियों को पहले से पता है कि अब ये जनता को और बेवक़ूफ़ नहीं बना सकते, इनका बचा-खुचा जनाधार भी खिसक चुका है।

पहले बसपा के लिए, कोर वोट बैंक दलित गुट, सपा के लिए कोर वोट बैंक यादव और समुदाय विशेष वाले थे। कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन से इन दोनों पार्टियों का ये जनाधार भी और बँट जाता, क्योंकि इन्हे अच्छी तरह पता था कि कॉन्ग्रेस उत्तर प्रदेश से लगभग सफा है। कॉन्ग्रेस के इनका गठबंधन इनके लिए चुनावी आपदा के रूप में साबित हो सकता है। तो ऐसे में जब सभी का सामूहिक उद्देश्य विकास या आम जनता की सेवा न होकर केवल हर हाल में मोदी को हराना रह गया है तो ऐसे में मोदी के वोटों में किसी भी प्रकार से ध्रुवीकरण या कटाव उनके जीत की सम्भावना को कुछ कम कर सकता था।

ऐसे में शुरू हुआ इनका शैडो बॉक्सिंग का खेल जिसका मक़सद बस वोट काटना और जनता को बेवकूफ बनाना रह गया। यह वही है जो प्रियंका गाँधी वाड्रा के बयान की पुष्टि करता है। कॉन्ग्रेस और एसपी, बीएसपी के बीच चुनावी मैदान में शैडो बॉक्सिंग केवल बीजेपी के वोट काटने के लिए एक छद्म मोर्चा था, क्योंकि उनमें से कोई भी वास्तव में इतना आश्वस्त नहीं था कि वो लोकसभा चुनाव में अपने दम पर कुछ कर सकते हैं।

कुल मिला कर लोकसभा चुनाव में अपने हर झूठ को प्रोजेक्ट करने के बाद भी, जनता से कई झूठे वादे करने और उन्हें बीजेपी के खिलाफ भड़काने की पूरी कोशिश के बाद भी अपना हर झूठ बेअसर और बेनकाब होता देख अब कॉन्ग्रेस सहित बाकी सभी पार्टियों ने लगभग अपनी हार मान ली है। प्रियंका के आज के बयान ने बची-खुची उम्मीद का भी बेड़ा गर्क कर दिया। अब देखना ये है कि अब कॉन्ग्रेस किसे आगे करती है जो कॉन्ग्रेस के लिए संजीवनी साबित होती है। वैसे प्रियंका ने महासचिव का दायित्व निभाते हुए कॉन्ग्रेस को ‘वोट कटवा’ पार्टी बना कर अपने दृष्टिकोण का परिचय दे दिया है। अब उनसे न पार्टी को कोई उम्मीद बची है न कार्यकर्ता को, राहुल पहले ही अपनी मेधा का परिचय दे चुके हैं।

अब शायद ही कॉन्ग्रेस कभी वापसी कर पाए, जिसका नेतृत्व ही लगातार पार्टी को गर्त की तरफ ले जा रहा हो, उससे किसी भी तरह की उम्मीद करना भी बेमानी है।

‘बुर्का छोड़िए अब तो दाढ़ी-टोपी से भी होने वाली है परेशानी’

ईस्टर के मौके पर श्री लंका में हुए सिलसिलेवार आतंकी हमले के बाद वहाँ की सरकार ने चेहरा छिपाने वाले हर एक कपड़े को प्रतिबंधित कर दिया है। इसमें मुस्लिम महिलाओं द्वारा पहना जाने वाला बुर्का और हिज़ाब, दोनों शामिल हैं। श्री लंका सरकार की ओर से इस तरह का कदम उठाए जाने के बाद शिवसेना ने इस नियम को भारत में भी लागू करने की माँग करते हुए अपने मुखपत्र ‘सामना’ में लेख लिखा है।

सामना पत्रिका में ‘प्रधानमंत्री मोदी से सवाल, रावण की लंका में हुआ, राम की अयोध्या में कब होगा?’ शीर्षक से लिखे संपादकीय में शिवसेना ने माँग की है कि श्रीलंका की तरह ही भारत में भी बुर्का पर प्रतिबंध लगना चाहिए।

‘सामना’ की इस माँग पर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने आपत्ति व्यक्त करते हुए पलटवार किया है। असदुद्दीन ओवैसी ने शिवसेना पर हमला बोलते हुए कहा है, “यह हमारा संवैधानिक अधिकार है, बाकी आप यह हिंदुत्व सब पर नहीं लागू कर सकते हैं। यही लोग कल को बोलेंगे कि आपके चेहरे पर दाढ़ी ठीक नहीं है, आप टोपी मत पहनिए।”

इसके आगे असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, “आप जींस पहनें, बुर्का पहनें, नकाब पहनें, घूँघट पहनें, आप कुछ न पहनें, ये समझने की जरूरत है। क्योंकि शिवसेना ने गुलाटी मारकर मोदी का हाथ पकड़ लिया, तो उनके पास अब कुछ छिपाने के लिए है ही नहीं, इसीलिए ये बकवास कर रहे हैं। संविधान में इसकी इजाजत है। मुझे दूसरे देशों के बारे में कुछ नहीं कहने की जरूरत है, क्योंकि हिंदुस्तान में संविधान, जो शिवसेना पोपट नहीं समझ सकती है।”

मसूद अजहर वैश्विक आतंकवादी घोषित: भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत, पाक-चीन की फजीहत

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने पाकिस्तान स्थित जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित कर दिया है। कूटनीतिक स्तर पर यह भारत के लिए बहुत बड़ी जीत है। जबकि पाकिस्तान और चीन के लिए शर्म की बात। UNSC के इस एक फैसले से यह साबित (जो पहले से तय था लेकिन अब अंतरराष्ट्रीय मुहर लग गई) हो गया कि पाकिस्तान आतंकियों और आतंकी गतिविधियों को पनाह देने वाला देश है। चीन की फजीहत इसलिए क्योंकि अपने साथी देश पाकिस्तान को वह वीटो के नाम पर कई सालों से बचाता आ रहा था।

ऑपइंडिया ने कल (30 अप्रैल, 2019) ही यह खबर प्रकाशित की थी कि अंतरराष्ट्रीय दबाव और भारतीय कूटनीति के कारण मसूद अजहर को 1 मई को वैश्विक आतंकवादी घोषित किया जा सकता है।

14 फरवरी को पुलवामा में हुए सीआरपीएफ के काफिले पर हुए आतंकी हमले की जिम्मेदारी जैश-ए-मोहम्मद ने ली थी। इससे पहले 2016 में पठानकोट एयरबेस पर हुए हमले का भी जिम्मेदार भी यही आतंकी संगठन है। पुलवामा हमले के बाद संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका, फ्रांस और यूके के नेतृत्व में मसूद को ग्लोबल टेररिस्ट घोषित करने की माँग की गई थी, लेकिन चीन ने उसका बचाव किया था। अमेरिका, ब्रिटेन और फ्राँस द्वारा 13 मार्च को रखे गए प्रस्ताव पर चीन के अलावा सुरक्षा परिषद के सभी अन्य सदस्यों ने पहले ही मंजूरी दे दी थी। आज चीन की मंजूरी भी मिल ही गई।

‘AAP’, वादे और धोखा: केजरीवाल के शिक्षा और स्वास्थ्य के दावों का कड़वा सच

श्रीमान अरविंद केजरीवाल बदलाव की राजनीति करने आए थे। वे व्यवस्था में परिवर्तन की बात करते थे और कहते थे कि सारे नेता चोर हैं और एकमात्र उनकी ‘आम आदमी पार्टी’ ही दूध की धुली है। अरविंद केजरीवाल ने 2015 के पार्टी मैनिफेस्टो में अनेक ऐसे वादे किए थे जिनसे दिल्ली की सूरत बदल सकती थी। यदि उन वादों का आधा हिस्सा भी पूरा किया जाता तो भले पूरी दिल्ली की सूरत नहीं बदलती कम से कम दिल्ली की जनता के जीवन स्तर में बहुत हद तक सुधार हो सकता था। लेकिन केजरीवाल को मैनिफेस्टो में किए गए वादे पूरे करने ही नहीं थे, उन्हें तो केवल राजनीति चमकानी थी।

केजरीवाल द्वारा किए गए अनेक वादों में यह भी था कि आम आदमी पार्टी की सरकार शिक्षा और स्वास्थ्य पर ध्यान देगी और इन क्षेत्रों में सुधार करेगी। आइये देखते हैं केजरीवाल सरकार ने बीते पाँच सालों में इन दो क्षेत्रों में क्या किया और कितने वादे पूरे किए।  

वादा #1: 500 नए सरकारी स्कूल

आम आदमी पार्टी ने 2015 के मैनिफेस्टो में वादा किया था कि 500 नए सरकारी स्कूल खोले जाएँगे। लेकिन PPRC की रिपोर्ट के अनुसार अभी तक केवल 26 स्कूल ही खोले गए हैं। हिंदुस्तान टाइम्स में 2017 में छपी रिपोर्ट के अनुसार दो सालों में केवल 17 स्कूल ही खोले गए थे। आम आदमी पार्टी सरकार यह दावा करती है कि उन्होंने 8000 ‘क्लासरूम’ खोले, और एक स्कूल में 80 क्लासरूम के हिसाब से 100 नए स्कूल खुले। यह दावा अपने आप में खोखला है क्योंकि क्लासरूम की संख्या तो पहले से बने स्कूलों में भी बढ़ाई जा सकती है। 2016 की रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली सरकार के स्कूलों की दीवारों पर दरारें आ गई थीं। आज उनकी क्या हालत है पता नहीं।

वादा #2: हायर एजुकेशन गारंटी स्कीम

अरविंद केजरीवाल ने अपने चुनावी वादे में यह कहा था कि दिल्ली के किसी भी स्कूल से कक्षा 12 पास किए हुए बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए बिना किसी कोलैटरल के 10 लाख रुपये तक का लोन दिया सकेगा। लेकिन बीते चार वर्षों में इस स्कीम के प्रति जनता ने कोई ख़ास रुचि नहीं दिखाई। PPRC रिपोर्ट के अनुसार चार सालों में दिल्ली के स्कूलों से पास हुए केवल 0.13% छात्रों को ही लोन दिया गया। यह भी चिंता का विषय है कि जून 2018 तक केवल 678 छात्रों ने ही इस स्कीम का लाभ उठाने के लिए आवेदन किया। क्या केजरीवाल सरकार ने इसके कारण जानने की कोशिश की? क्या इस स्कीम का प्रचार उस स्तर पर किया गया कि छात्रों को पता चल सके कि ऐसी कोई स्कीम भी है? जनता को योजना का लाभ देने की घोषणा करने मात्र से ही जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती। उस योजना को जनता तक पहुँचाना भी सरकार का दायित्व होता है।    

वादा #3: 20 नए डिग्री कॉलेज

केजरीवाल सरकार ने दिल्ली शहर के बाहरी क्षेत्रों में 20 नए डिग्री कॉलेज खोलने का वादा किया था जो अभी तक पूरा नहीं हो सका। अब दिल्ली सरकार अंबेदकर यूनिवर्सिटी से मान्यता प्राप्त पहले से मौजूद कॉलेजों में सीटें बढ़ाने पर विचार कर रही है। हिंदुस्तान टाइम्स की 2017 की रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली सरकार में मंत्री मनीष सिसौदिया कहते थे कि नए कॉलेज नहीं खुले तो क्या हुआ सीटें बढ़ाने पर भी छात्रों की संख्या तो बढ़ ही जाएगी क्योंकि आखिरकार छात्रों को डिग्री ही चाहिए होती है। अर्थात सिसौदिया को नए कॉलेज खुलने और सीटें बढ़ाने में अंतर समझ में ही नहीं आता। मौजूदा कॉलेज में सीटें बढ़ाने से उस कॉलेज के इंफ्रास्ट्रक्चर पर अतिरिक्त भार पड़ता है जिससे शिक्षा की गुणवत्ता में कमी आती है लेकिन केजरीवाल को इससे कोई मतलब नहीं, उनको केवल डिग्री बाँटने से मतलब है।

वादा #4: प्राइवेट स्कूलों की फीस कम की जाएगी

केजरीवाल सरकार ने प्राइवेट स्कूलों की फीस कम करने के लिए तीन साल तक कोई ठोस नियमावली नहीं बनाई। अप्रैल 2018 में एक सर्कुलर के द्वारा यह निर्देश जरूर दिया गया कि सरकारी भूमि पर बने प्राइवेट स्कूल मनमाना ढंग से ट्यूशन फीस नहीं बढ़ाएँगे। लेकिन प्रश्न उठता है कि क्या दिल्ली के सभी स्कूल सरकारी भूमि पर बने हैं? जवाब है नहीं। तो उन स्कूलों की आसमान छूती फीस का क्या जो निजी भूमि पर बने हैं। कोर्ट के बाहर अभिभावकों की लंबी लाइन लगी है जो न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। लेकिन दिल्ली सरकार ने अपने स्तर पर स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए कुछ नहीं किया।

वादा #5: स्कूल एडमिशन में पारदर्शिता

आम आदमी पार्टी ने वादा किया था कि दिल्ली के स्कूलों में नर्सरी और केजी के एडमिशन में पारदर्शिता लाने के लिए एक केंद्रीकृत सिस्टम होगा। लेकिन आज तक ऐसा कोई पोर्टल या सिस्टम नहीं बन पाया है।  

वादा #6: सरकारी स्कूलों का स्तर सुधारा जाएगा ताकि वे प्राइवेट स्कूल जैसी शिक्षा दे सकें

सरकारी स्कूलों की हालत सुधारने के केजरीवाल के दावों की सच्चाई यह है कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के कुल 64,000 पद स्वीकृत हैं जिनमें से केवल 36,000 शिक्षक ही स्थाई हैं। अस्थाई रूप से अतिथि शिक्षक के रूप में 22,000 शिक्षक काम करते हैं और 6000 पद रिक्त हैं। मनीष सिसौदिया ने 2017 में कहा था कि जब तक शिक्षकों की नियुक्ति स्थाई नहीं हो जाती तब तक उन्होंने शिक्षकों का वेतन बढ़ा दिया है। मनीष सिसौदिया कहते हैं कि वे रातोंरात शिक्षकों की नियुक्ति नहीं कर सकते। जब दिल्ली सरकार सरकारी स्कूलों में नए शिक्षक नहीं रख सकती और पुराने शिक्षकों की नियुक्ति स्थाई नहीं कर सकती तो सरकारी स्कूलों में प्राइवेट स्कूल जैसी सुविधाएँ कहाँ से देगी?

चुनाव पूर्व अरविन्द केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी ने बड़े-बड़े वादे किए थे कि गेस्ट शिक्षकों को स्थाई किया जाएगा और रिक्त पड़े सभी पदों को भरा जाएगा। स्थिति यह है कि अभी भी हज़ारों पद रिक्त पड़े हैं और जिन पदों पर बहाली भी की गई है, उसमें भी हज़ारों अतिथि शिक्षक शामिल हैं। केजरीवाल यह दावा करते हैं कि उन्होंने शिक्षा व्यवथा में सुधार के लिए ज़रूरी आधारभूत संरचना का विकास किया है, इंफ़्रास्ट्रक्चर मज़बूत किया है लेकिन सवाल यह है कि शिक्षकों की बहाली के बिना ये सब अधूरा है। भवन और कक्षा भले रहें लेकिन पढ़ाने के लिए शिक्षक ही न रहें तो शिक्षा व्यवस्था में सुधार कैसे आएगा?

यही नहीं हालत यह है कि टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में 9वीं से 12वीं तक के 66% छात्र जो 2017 में अनुत्तीर्ण रह गए थे, अब औपचारिक शिक्षा प्रणाली से बाहर हो गए हैं। आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार 1,55,436 अनुत्तीर्ण छात्रों में से 52,582 छात्रों को ही फिर से कक्षा में प्रवेश दिया गया। दिल्ली के कई स्कूलों में पढ़ रहे छात्रों के माता-पिता से बातचीत करने पर पता चलता है कि 11वीं में स्ट्रीम के चयन को लेकर एक अनौपचारिक प्रचलन आम हो चुका है जिसमें कम अंक प्राप्त छात्रों को आगे की कक्षा में विज्ञान या गणित लेने की अनुमति नहीं देने का निर्णय लिया गया। सरकारी स्कूलों में अधिकतर विद्यार्थी गणित या विज्ञान में ही अनुत्तीर्ण होते हैं, अतः अनौपचारिक रूप से उनके चयन पर प्रतिबंध लगाकर सरकार उनके करियर के साथ खेल रही है ताकि उत्तीर्ण होने के प्रतिशत को ज्यादा दिखाया जा सके। थिंक टैंक PPRC के अनुसार 1029 स्कूलों में से 279 स्कूलों में ही विज्ञान और गणित की पढ़ाई हो रही है।

वादा #7: हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार किया जाएगा

केजरीवाल ने चुनाव लड़ने से पहले घोषणापत्र में कहा था कि वे 900 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बनाएँगे और दिल्ली के अस्पतालों में 30,000 अतिरिक्त बेड मुहैया कराए जाएँगे जिसमें से 4000 मैटरनिटी वार्ड में होंगे। केजरीवाल ने प्रति 1000 लोगों पर 5 बेड देने का वादा किया था। लेकिन हकीकत इन दावों से कोसों दूर है। आम आदमी पार्टी की सरकार ने 1000 मोहल्ला क्लिनिक खोलने का वादा किया था लेकिन 2018 तक केवल 160 मोहल्ला क्लिनिक ही खुल पाए थे। दिल्ली के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार अब तक 9,098 बेड की व्यवस्था ही हो पाई है।

दावा #8: अच्छी दवाइयाँ कम कीमत पर

आम आदमी पार्टी ने वादा किया था कि सरकार बनते ही वे सस्ती दवाइयाँ कम कीमत पर उपलब्ध कराएगी। लेकिन इसपर कुछ नहीं किया गया। केजरीवाल सरकार का एक लाख शौचालय बनवाने का दावा भी झूठा निकला।

अब हिंदी में भी काम करेगा पटना हाईकोर्ट, ऐसा करने वाला देश का पाँचवाँ उच्च न्यायालय

राजभाषा हिंदी को पटना उच्च न्यायालय में आखिरकार प्रवेश मिल ही गया है। अब पटना हाईकोर्ट में सुनवाई अंग्रेजी के अलावा हिंदी में दायर याचिकाओं पर भी हो सकेगी। यह निर्णय वकील इन्द्रदेव प्रसाद की याचिका की सुनवाई के बाद लिया गया। इस याचिका में उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 351 में हिंदी के प्रचार और विकास की संवैधानिक हिदायत का हवाला दिया था।

अहम है न्यायिक उपयोग में हिंदी

मंगलवार को दिए गए इस फैसले में तीन न्यायाधीशों की पूर्ण पीठ ने अपने आदेश में कहा कि पटना हाईकोर्ट के जज अब हिंदी में दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर सकेंगे। मुख्य न्यायाधीश अमरेश्वर प्रताप शाही के अलावा आशुतोष कुमार और राजीव रंजन प्रसाद इस पीठ के अन्य सदस्य हैं। याचिका में पटना हाइकोर्ट के वकील इंद्रदेव प्रसाद ने संविधान के अनुच्छेद 351 को उद्धृत करते हुए यह इंगित किया कि हिंदी का प्रचार और विकास तभी होगा जब हाईकोर्ट में याचिकाएँ दायर करने में हिंदी का प्रयोग लागू किया जाए। सुनवाई में अदालत ने यह भी कहा कि बिहार और उत्तर प्रदेश हिंदी भाषी क्षेत्र हैं और अगर यहाँ भी हिंदी के साथ भेदभाव हुआ तो यह अन्याय होगा।

सचिवालय की अधिसूचना से हुआ था भ्रम

प्रसाद ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार के मंत्रिमंडल (राजभाषा) सचिवालय ने 9 मई, 1972 को एक जारी अधिसूचना में एक ओर जहाँ आपराधिक और फौजदारी मामलों में हाईकोर्ट में हिंदी के प्रयोग की बात कही, वहीं दूसरी ओर संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत इसके विरोधाभास में हाईकोर्ट के मामलों को अंग्रेजी में दायर करने की बात की गई है।

पूर्ण पीठ ने राज्य सरकार को 4 हफ्ते के भीतर अधिसूचना को संशोधित करने का आदेश दिया था। साथ में यह भी जोड़ा था कि अगर ऐसा नहीं किया गया तो अधिसूचना रद्द भी हो सकती है।

ऐसा करने वाला पाँचवाँ हाईकोर्ट

इस आदेश के साथ ही पटना हाईकोर्ट हिंदी को अनुमति देने वाला पाँचवाँ उच्च न्यायालय बन गया है। इससे पहले मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, इलाहाबाद और राजस्थान के हाइकोर्ट भी हिंदी के न्यायिक कार्यों में प्रयोग की अनुमति दे चुके हैं।

तो भारत में हड़प्पा के सामानांतर भी थी कोई सभ्यता.. यहाँ से खुदाई में मिली चीजें करती हैं इशारा

कई बार यह सवाल पूछा जाता है कि क्या हड़प्पा सभ्यता के सामानांतर या उससे पहले भी ऐसी कोई सभ्यता थी जिनसे हम आज परिचित नहीं हैं या जिनके बारे में हमें ज्यादा कुछ नहीं पता। उत्तर प्रदेश स्थित बागपत के सनौली में खुदाई से मिली कुछ चीजें इस ओर इशारा करती हैं। आर्कोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) द्वारा क्षेत्र में की जा रही खुदाई में मिली चीजें 4000 वर्ष से भी अधिक पुरानी बताई जा रही है।

इसमें जो अहम चीजें मिली हैं। ये चीजें खुदाई के दौरान निकाले गए ‘पवित्र कक्षों’ से मिली हैं। यहाँ से ताबूत, रथ, कंकाल और मुकुट जैसी वस्तुएँ मिली हैं जो उस समय की युद्ध प्रणाली के विषय में भी बहुत कुछ कहती हैं। इसके अलावा तलवारें, ढाल और हेलमेट मिले हैं जो उस समय हुई किसी युद्ध की ओर इशारा करते हैं।

एएसआई के डायरेक्टर डॉक्टर एसके मंजुल ने कहा कि ये चीजें हड़प्पा संस्कृति से वास्ता नहीं रखतीं। वहाँ ताबूत के साथ कुछ जली हुई लकड़ियों के अवशेष भी मिले हैं जो बताते हैं कि शव के क्रिया कर्म से पहले उसे नहला कर पूजा-पाठ किया गया होगा। डॉक्टर मंजुल ने इस बारे में विशेष जानकारी देते हुए कहा:

“एक इतिहासकार (उत्खनक) के रूप में मुझे लगता है कि ये हड़प्पा संस्कृति से अलग है। यह हड़प्पा संस्कृति के अंतिम चरण के समकालीन है। उत्तरी गंगा-यमुना दोआब में पनपी संस्कृतियों को समझने के लिए ये महत्वपूर्ण साबित होगा। हमें ताँबे की तलवारें, ढाल, रथ और हेमलेट मिले। हमें कुछ बर्तनों में उड़द की दाल, चावल, जानवरों की हड्डियाँ, जंगली सूअर और नेवले भी मिले हैं जिन्हें शवों के साथ ही दफनाया गया होगा। पवित्र कक्षों में शव को किसी तरह की पूजा-पाठ वगैरह के लिए रखा गया होगा।”

सोनौली यमुना नदी के बाएँ किनारे पर स्थित है। यह दिल्ली से 68 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में बसा हुआ है। वहाँ हुई खुदाई से यह पता चला है कि यहाँ हड़प्पा के समकालीन समय का सबसे बड़ा श्मसान था। जो ताबूत मिली हैं, उसमें 4 पाए हैं। इसे चूना-मिट्टी से सजाया गया है। इसके साथ 2 महिलाओं के कंकाल मिले हैं, जिनकी उम्र 30-40 वर्ष रही होंगी। उनके पास से चूना मिट्टी का बाजूबंद और सोने का टुकड़ा मिला है। हवनकुंड में लकड़ी के जले टुकड़े मिले हैं। ताम्बे की फ्रेम वाला शीशा, सींग से बनी कंघी और चित्रकारी किया हुआ बक्सा भी मिला।

जहाँ ये चीजें पाई गईं, वहाँ से कुछ सौ मीटर की दूरी पर एक बसावट वाला स्थान मिला है। वहाँ 4 ताँबे को गलाने वाली भट्टियाँ मिलीं। पिछले साल यहीं पर हुई खुदाई में 8 शाही ताबूत, रथ और युद्ध के अन्य साजो-सामान मिले। ताम्र हथियार बनाने की ऐसी प्रक्रिया का सबूत किसी भी हड़प्पा की खुदाई में नहीं मिलता

हड़प्पा के लिए अब तक 500 से भी अधिक जगह खुदाई हो चुकी है लेकिन ऐसी चारपाई वाली शव पेटिका कहीं नहीं मिली है। डॉक्टर संजय मंजुल ने कहा है कि वो गंगा और यमुना के बीच फैली इस सभ्यता के तह तक जाना चाहते हैं। उन्हें भरोसा है कि भारत जैसे विशाल देश में उस अवधि में एक ही संस्कृति पनपी होगी, ये विश्वास करने लायक नहीं है।

शासक नहीं सेवक: PM मोदी की रैली के बाद खुद मैदान की सफाई करते दिखे देबजीत सरकार

राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने कहा था कि हमें वो बदलाव स्वयं बनना चाहिए, जो हम दूसरों में देखना चाहते हैं। सोशल मीडिया पर आजकल भाजपा नेता देबजीत सरकार की तस्वीरें खूब शेयर की जा रही हैं। इन तस्वीरों में देबजीत सरकार लोगों के साथ मिलकर चुनावी रैली के बाद मैदान की सफाई करते हुए देखे जा रहे हैं। देबजीत सरकार सेरामपुर संसदीय क्षेत्र, पश्चिम बंगाल से भाजपा के प्रत्याशी हैं।

देशभर में आम चुनाव जारी है। इस बीच तरह-तरह की घटनाएँ देखने को मिल रही हैं। एक ओर जहाँ कुछ सत्तापरस्त और वंशवाद की राजनीति में लिप्त कॉन्ग्रेस जैसे राजनीतिक दल के नेता चौकीदार और चायवालों को हीन दृष्टि से देखते हैं और उन पर अपमानजनक टिप्पणी करते हैं, वहीं दूसरी और भाजपा नेता हैं, जो आम जनता के बीच स्वयं उदाहरण पेश करते हुए आगे बढ़ते हैं।

सेरामपुर संसदीय क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी हैं युवा नेता देबजीत सरकार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अक्सर देखने को मिलता है कि उनकी पार्टी के सदस्य और नेता भी सामाजिक अवसरों से लेकर सार्वजानिक अवसरों पर भी जनता के साथ खड़े नजर आते हैं। इस बार इसी तरह का उदाहरण पेश किया है पश्चिम बंगाल के युवा नेता देबजीत सरकार ने। पश्चिम बंगाल राज्य बीजेपी युवा मोर्चा के अध्यक्ष देबजीत सरकार इस लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल के सेरामपुर लोकसभा सीट से भाजपा प्रत्याशी हैं।

शासक नहीं सेवक

जिन तस्वीरों में देबजीत सरकार सफाई करते हुए नजर आ रहे हैं, यह सेरामपुर, पश्चिम बंगाल में आयोजित पीएम नरेंद्र मोदी की अप्रैल 29, 2019 की चुनावी रैली के बाद की है। इसी दिन भाजपा नेता देबजीत सरकार के समर्थन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विशाल जनसभा को सम्बोधित करते हुए सेरामपुर की जनता से भाजपा के पक्ष में मतदान करने की अपील की थी। लेकिन, इन सबसे ज्यादा जो चर्चा का विषय है, वो है देबजीत सरकार द्वारा इस विशाल जनसभा के सफल आयोजन के बाद की तस्वीरें!

इन तस्वीरों में देबजीत सरकार पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर स्वयं सभास्थल की सफाई कर रहे हैं। देबजीत सरकार के बारे में अक्सर इस तरह के उदाहरण सोशल मीडिया पर देखने को मिलते हैं, जब वो युवाओं के साथ मिलकर इस प्रकार के उदाहरण पेश करते हैं। सेरामपुर में पाँचवें चरण के चुनाव आगामी 6 मई को होने हैं। PM नरेंद्र मोदी इसी चुनाव की तैयारियों के संदर्भ में और भाजपा कार्यकर्ताओं के उत्साहवर्धन के लिए विगत सप्ताह सेरामपुर में मौजूद थे। सेरामपुर लोकसभा पश्चिम बंगाल का महत्वपूर्ण संसदीय क्षेत्र है। स्वच्छ भारत अभियान प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी का एक बड़ा सपना है और इस तरह का सहयोग करते हुए नेताओं को देखना कहीं ना कहीं एक सकारात्मक सन्देश देता है।

‘नामपंथी, वामपंथी, दमन पंथी और चौथा, विकास पंथी’

भाजपा इस आम चुनाव में पश्चिम बंगाल से अधिक से अधिक सीट जीतने का प्रयास कर रही है। इसी रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्ष पर कटाक्ष करते हुए कहा था, “भारत की राजनीति में आज तक 4 प्रकार के दल और पॉलिटिकल कल्चर देखे गए हैं। पहला है नामपंथी, दूसरा वामपंथी, तीसरा दाम और दमन पंथी और चौथा है विकास पंथी।”

PM मोदी द्वारा विपक्ष पर किया गया यह तंज और देबजीत सरकार की ये तस्वीरें यह बताने के लिए स्पष्ट हैं कि भाजपा नेता और कॉन्ग्रेस नेताओं के बीच सबसे बड़ा फासला यही है। एक ओर जहाँ कॉन्ग्रेस नेता अपनी अभिजात्य मानसिकता के चलते समाज के मध्यम और निचले वर्ग को हीन समझते हैं, वहीं भाजपा नेता समाज के मध्यम और शोषित वर्ग के साथ कंधे से कंधे मिलाकर खड़े नजर आते हैं। ऐसा हम नहीं, जनता कहती है।