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गिलगित बल्तिस्तान: LoC के उस पार का भारत, जहाँ आज भी लोग भारतीय सेनाओं का इंतज़ार करते हैं

भूराजनैतिक पक्ष:-

1947 में जब देश ब्रिटिश राज से मुक्त हुआ तब जम्मू कश्मीर का विलय भारत में उस प्रकार नहीं हुआ जिस प्रकार अन्य रियासतें भारत संघ का अंग बनीं। जम्मू कश्मीर राज्य भूराजनैतिक विविधताओं से भरा पड़ा है। सन ’47-’48 में भारत-पाक युद्ध के पश्चात 27 जुलाई 1949 को कराची समझौते में युद्धविराम पर हस्ताक्षर कर तत्कालीन सरकार ने उस भूमि को पुनः हासिल करने का प्रयास नहीं किया जिस पर पाकिस्तान ने जबरन कब्जा कर लिया था। जानने लायक बात यह भी है कि पाक अधिकृत जम्मू कश्मीर पाकिस्तान का कोई आधिकारिक प्रांत नहीं है। आज जिसे हम PoK अथवा PoJK कहते हैं उसके शासकीय अधिकारों पर पाकिस्तान का संविधान मौन है।

बहरहाल, पाकिस्तान ने जो भूमि हथियाई थी उसे उसने दो भागों में बाँटा: एक का नाम रखा आज़ाद कश्मीर तथा दूसरे को कहा नॉर्दर्न एरिया। कथित आज़ाद कश्मीर दरअसल नियंत्रण रेखा के पश्चिम में मीरपुर मुजफ्फराबाद का क्षेत्र है, जिसकी सीमा जम्मू और कश्मीर घाटी के थोड़ा ऊपर तक लगती है। यह पाक अधिकृत जम्मू कश्मीर का छोटा भाग है। (मानचित्र में देखें)

आभार : जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र (नई दिल्ली )

यह उस पूरी भूमि का मात्र 15% भाग है जिस पर पाकिस्तान ने कब्जा किया था। पाकिस्तान ने बड़ी चालाकी से इस क्षेत्र को छद्म स्वतंत्रता प्रदान की है। शेष पाकिस्तान से अलग यहाँ का एक वजीरे आजम, सुप्रीम कोर्ट आदि स्थापित किए गए हैं। मीरपुर मुजफ्फराबाद का क्षेत्र रावलपिंडी के समीप है जहाँ पाकिस्तानी फ़ौज का जनरल हेडक्वार्टर स्थित है। इसलिए रणनीतिक रूप से पाकिस्तानी फ़ौज को इस क्षेत्र को आज़ाद कश्मीर घोषित कर यहाँ से भारत विरोधी गतिविधि संचालित करने में सुविधा होती है।

पाकिस्तान अधिकृत क्षेत्र को कायदे से ‘पाक अधिकृत जम्मू कश्मीर’ कहना चाहिए। इसके दो कारण हैं- पहला यह कि वह भारत के संवैधानिक रूप से स्वीकृत जम्मू कश्मीर राज्य का भाग है। दूसरा यह कि कथित आज़ाद कश्मीर में वास्तविक कश्मीर का एक इंच भाग भी नहीं आता। फिर भी पाकिस्तान इसे आज़ाद कश्मीर कहता है ताकि जो नैरेटिव सेट हो वह कश्मीर के नाम से हो न कि ‘भारत के जम्मू कश्मीर राज्य’ के नाम से।

पाक अधिकृत जम्मू कश्मीर का दूसरा तथा बड़ा भाग (85%) गिलगित बल्तिस्तान है जिसे 2009 तक नॉर्दर्न एरिया कहा जाता था। इसकी सीमा दक्षिण में मीरपुर मुजफ्फराबाद क्षेत्र, कश्मीर घाटी और कारगिल से लगती है। पूर्व में गिलगित बल्तिस्तान की सीमा पॉइंट NJ9842 तक लेह से लगती है। पॉइंट NJ9842 के ऊपर सियाचेन ग्लेशियर है और उसके ऊपर काराकोरम दर्रा है। सियाचेन के ठीक ऊपर शक्सगाम घाटी है जो गिलगित बल्तिस्तान का ही अंग है। पाकिस्तान ने 1963 में शक्सगाम घाटी अनधिकृत रूप से चीन को दे दी थी।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:-

गिलगित तथा बल्तिस्तान ऐतिहासिक रूप से दो भिन्न राजनैतिक इकाइयों के रूप में विकसित हुए थे। गिलगित को दर्दिस्तान भी कहा जाता है क्योंकि यहाँ दरदी भाषा बोलने वाले लोग रहते हैं। बल्तिस्तान को मध्यकाल में छोटा तिब्बत कहा जाता था। गिलगित और बल्तिस्तान का एक प्रांत के रूप में एकीकरण डोगरा शासनकाल में हुआ। पुरातन काल में गिलगित मौर्य वंश के अधीन रहा। कराकोरम राजमार्ग पर स्थित सम्राट अशोक के 14 शिलालेख इसका प्रमाण हैं। ललितादित्य (724-761 ई०) और उसके पश्चात कार्कोट वंश के समय भी गिलगित बल्तिस्तान काश्मीर साम्राज्य का अभिन्न अंग रहा।

ललितादित्य ने अपने शासनकाल में शेष भारत से काश्मीर के ऐतिहासिक सम्बन्धों को मजबूत किया। कालांतर में गिलगित और बल्तिस्तान मुग़ल शासन के अधीन भी रहा। मुग़ल शासन के दुर्बल होने के पश्चात साठ वर्षों तक काश्मीर में अफगान शासन रहा। उस समय भी गिलगित और बल्तिस्तान काश्मीर साम्राज्य का अंग था। अफगानी शासन के अत्याचारों से पीड़ित होकर एक काश्मीरी पण्डित बीरबल धर के नेतृत्व में काश्मीर की जनता ने सिख महाराजा रणजीत सिंह से गुहार लगाई। तब महाराजा रणजीत सिंह जी ने 15 जून 1819 को काश्मीर पर आक्रमण किया और अफगानी शासन से मुक्ति दिलाई।

महाराजा रणजीत सिंह जी ने जम्मू का क्षेत्र गुलाब सिंह को जागीर के रूप में दिया। कालांतर में कई युद्ध हुए और राजनैतिक घटनाक्रम परिवर्तित हुए। अंग्रेजों द्वारा सिखों को पराजित करने और 9 मार्च 1846 की लाहौर सन्धि के फलस्वरूप समूचे जम्मू कश्मीर राज्य पर गुलाब सिंह का एकछत्र राज स्थापित हुआ। बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में रूस में हुई क्रांति और सत्ता परिवर्तन के कारण बिगड़ते शक्ति सन्तुलन से घबराये अंग्रेजों ने डोगरा महाराजा से गिलगित एजेंसी 60 वर्षों के पट्टे पर छीन ली। जब सोवियत रूस ने 1934 में चीन के शिनजिआंग प्रांत पर कब्जा कर लिया तब ब्रिटेन ने महाराजा से संधि कर जम्मू कश्मीर को 60 साल के लिए पट्टे पर ले लिया था। उसके बाद अंग्रेज़ों ने गिलगित एजेंसी बनाई और गिलगित स्काउट नामक सैन्य टुकड़ी की स्थापना की जिसमें अधिकांश अफसर ब्रिटिश थे। 3 जून 1947 को मॉउंटबैटन प्लान की घोषणा के बाद गिलगित को पुनः महाराजा को सौंप दिया गया और इसके साथ ही गिलगित स्काउट्स भी महाराजा के अधीन हो गयी।

जब महाराजा ने 30 जुलाई 1947 को गवर्नर और चीफ ऑफ़ स्टाफ को गिलगित भेजा तो उन्हें पता चला कि गिलगित स्काउट्स ने पाकिस्तानी फ़ौज में सम्मिलित होने का निर्णय लिया है। 31 अक्टूबर 1947 को गिलगित स्काउट्स ने गवर्नर का आवास घेर लिया और अंतरिम सरकार बनाने की घोषणा कर दी। 4 नवंबर को मेजर ब्राउन ने पाकिस्तान का झंडा फहरा दिया और 21 नवंबर को खुद को एक पॉलिटिकल एजेंट बताने वाले एक पाकिस्तानी ने आकर अड्डा जमा लिया।

तत्कालीन भारतीय शासन व्यवस्था इस पूरे घटनाक्रम पर मौन रही और स्कर्दू को बचाने में भी असफल रही। इस प्रकार अंग्रेज़ों द्वारा गिलगित बल्तिस्तान समेत पूरे जम्मू कश्मीर को महाराजा के हाथों सौंपे जाने के बावजूद गिलगित स्काउट्स की गद्दारी के कारण वह हिस्सा पाकिस्तान में चला गया। सन 1947-48 के बाद के घटनाक्रम और जवाहरलाल नेहरू के कारनामे आज इतिहास का एक हिस्सा हैं। सन् 1947 में जब अंग्रेज भारत से जाने लगे तो उस समय अनेक षड्यंत्र तथा नाटकीय घटनाक्रम हुए। परन्तु यह भी सत्य है कि अंग्रेजों ने 1 अगस्त 1947 को गिलगित एजेंसी के सभी क्षेत्र महाराजा हरि सिंह को सौंप दिए थे।

इस संक्षिप्त ऐतिहासिक वर्णन से यह सिद्ध होता है कि गिलगित बल्तिस्तान पर शासन करने का पाकिस्तान का ऐतिहासिक रूप से भी कोई अधिकार नहीं बनता क्योंकि प्राचीनकाल से लेकर 1947 तक यह क्षेत्र अधिकांश समय भारतीय राजाओं के अधीन रहा। ऐसे में पाकिस्तान प्रायोजित यह प्रोपेगैंडा निराधार है कि गिलगित बल्तिस्तान भारत को अंग्रेजों ने दिया था।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य:-

आज के समय में गिलगित बल्तिस्तान सामरिक रूप से अतिमहत्वपूर्ण क्षेत्र है। यहाँ प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक संसाधन हैं तथा सांस्कृतिक संरचना पर इस्लामी प्रभाव होने के बावजूद विविधता है। यहाँ कई इस्लामी सम्प्रदाय के लोग रहते हैं जैसे- नूरबक्शी सम्प्रदाय, ट्वेलवर शिया सम्प्रदाय और सुन्नी मतावलंबी। गिलगित बल्तिस्तान के सिंकरी प्रदेश के निवासी गाय को पवित्र मानते थे किंतु इस्लामियों के भय के मारे अब वे अपनी प्राचीन मान्यताओं को तजने के लिए बाध्य हैं।

पाकिस्तान की सरकार ने कथित आज़ाद कश्मीर में बाहरी लोगों के बसने पर पाबन्दी लगा रखी है किंतु गिलगित बल्तिस्तान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए यहाँ शेष पाकिस्तान से आये इस्लामियों ने जनसंख्या परिवर्तन कर कट्टरपंथ को बढ़ावा देने का काम किया है। गिलगित बल्तिस्तान में पाकिस्तान सरकार के अत्याचारों और मानवाधिकार उल्लंघन पर ब्रिटिश बैरोनेस एम्मा निकोलसन ने यूरोपियन पार्लियामेंट (जब ब्रिटेन EU का सदस्य थ) में एक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। एक उदाहरण देखिये- गिलगित बल्तिस्तान के निवासियों को पाकिस्तान कोई नागरिक अधिकार नहीं देता।

गिलगित बल्तिस्तान का कोई निवासी वहाँ कोई रोजगार प्राप्त नहीं कर सकता। नौकरी के लिए उसे बाहर शेष पाकिस्तान के किसी नगर में जाना होगा। पाकिस्तान गिलगित बल्तिस्तान में बांध बना रहा है जिसका पानी बिजली या रॉयल्टी कुछ भी इस क्षेत्र को नहीं मिलने वाला। इस क्षेत्र के ऊपर से चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) होकर गुजरता है और शक्सगाम घाटी से निकटता के चलते चीन बड़ी आसानी से यहाँ अपने कर्मचारी भेज कर निर्माण कार्य करवा रहा है।

गिलगित बल्तिस्तान में कई प्राचीन भाषाएँ विलुप्त होने की कगार पर हैं। गिलगित के समीप स्थित चित्राल घाटी के आसपास कलश समुदाय के लोग रहते हैं। इनकी बेटियों को विवश होकर इस्लाम कबूल करना पड़ता है क्योंकि गर्मियों में कामांध भेड़िये अपनी हवस मिटाने इनके पास आते हैं। पाकिस्तानी शासन में ऐसी अनेक विषमताओं से जूझते हुए गिलगित बल्तिस्तान और आसपास के लोग कश्मीर नामक स्वर्ग में नरक भोगने को मजबूर हैं। सन 2005 में आये भूकंप के पश्चात स्थिति और खराब हुई है। कैप्टन सिंकदर रिज़वी अपने भाषणों में बताते हैं कि वहाँ के बच्चों के लिए चीनी जैसी चीज़ एक लक्ज़री की तरह है। स्कर्दू के आसपास गाँवों के लोग आज भी जब खाना बनाते हैं तो हर घर में 10 रोटी अधिक बनती है ताकि जब भारतीय सेनाएँ उन्हें पाकिस्तान से मुक्त कराने आएँगी तो वे भूखी न जाएँ। वहाँ के लोग आज भी इस इंतज़ार में हैं कि एक दिन भारतीय सेना उन्हें पाकिस्तानी कब्जे से छुड़ाने आएगी।

वैसे तो गिलगित-बल्तिस्तान दुनिया सबसे बड़े ग्लेशियर्स में से एक का क्षेत्र है लेकिन इसी वर्ष फरवरी में खबर आई कि गिलगित-बल्तिस्तान में रहने वाले लोगों में पानी के लिए हाहाकार मचना शुरू हो गया है। रिहायशी इलाकों में पीने लायक पानी उपलब्ध नहीं है। इसके पीछे पाकिस्तान का एक खतरनाक प्लान काम कर रहा है। इस प्लान के तहत सिलसिलेवार तरीके से गिलगित बल्तिस्तान में ‘Water-Crisis’ पैदा किया जा रहा है ताकि लोग पानी की कमी के चलते पाकिस्तान के दूसरे शहरी इलाकों दूसरे इलाकों में बसें या फिर गिलगित बल्तिस्तान के ही प्लानंड रिहायशी इलाकों लोगों को बसाया जाये। इसके दो प्रमुख कारण हैं- 1. गिलगित-बल्तिस्तान में डेमोग्राफी चेंज कर, यहां के प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करना 2. चीन के बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट के लिए उपयुक्त माहौल पैदा करना।

भविष्य की चिंताएँ तथा उपाय:-

भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जी ने 1 अक्टूबर 2015 को पाक अधिकृत जम्मू कश्मीर की राजनैतिक दुर्व्यवस्था पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित कराया था। IDSA की एक रिपोर्ट बताती है कि 2006 में गिलगित बल्तिस्तान के छात्रों ने भारत के IIT और IIM में दाखिले में आरक्षण की मांग की थी। गिलगित बल्तिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा पर वाखन दर्रा एवं सड़क मार्ग स्थित है जो शक्सगाम घाटी के समीप ही है। युद्धकाल में यह चीन को अपनी सेनाएं गिलगित में घुसाने का अवसर प्रदान करेगा। सेंगे हसनान सेरिंग अमरीका में Institute for Gilgit Baltistan Studies नामक संस्था चलाते हैं। वे बताते हैं कि चीन गिलगित में मिसाइलें ले जाने हेतु सुरंगे बना रहा है। अजमल आमिर कसाब और डेविड कोलमैन हेडली इन दोनों ने स्वीकार किया था इन्हें PoJK में आतंकी प्रशिक्षण मिला था।

उपरोक्त तथ्य एवं चिंताओं पर समूचे भारत में विमर्श तथा जागरूकता आवश्यक है। हमारी सीमाओं पर यह समस्याएँ एक दिन अथवा एक दशक में समाप्त नहीं होने वालीं। इसके लिए व्यापक जनसमर्थन आवश्यक है। महत्वपूर्ण यह भी है कि जब लिबरल बुद्धिजीवी रोहिंग्यों के लिए आँसू बहा रहे होते हैं तब उन्हें गिलगित बल्तिस्तान में रह रहे लोगों की सिसकियाँ सुनाई नहीं देतीं। कुछ साल पहले तक दूरदर्शन समाचार गिलगित बल्तिस्तान क्षेत्र के मौसम की जानकारी भी देता था लेकिन अब वह जानकारी भी नहीं मिलती। जबकि यह स्थापित सत्य है कि नियंत्रण रेखा के उस पार के लोग बड़ी उम्मीदों से भारत की ओर देख रहे हैं।

80 लाख किसानों को डायरेक्ट लाभ, BT कॉटन बीजों के बिक्री मूल्य में कटौती

केंद्र सरकार ने बीटी कपास के बीजों के अधिकतम बिक्री मूल्य में कटौती की है। इससे देश भर में लगभग 80 लाख कपास किसानों को लाभ मिलने की संभावना है। शुक्रवार (मार्च 8, 2019) को कृषि मंत्रालय द्वारा अधिसूचित किया गया कि नए मूल्य के तहत 450 ग्राम वाले पैकेट के दाम घटाकर ₹730 रुपए (₹20 रॉयल्टी समेत) कर दिया गया है। 2018-19 में बीटी कपास बीजों का अधिकतम बिक्री मूल्य ₹740 था, जिसमें ₹39 का रॉयल्टी शुल्क शामिल था।

नए अधिकतम बिक्री मूल्य (MSP) में प्रति वर्ष ₹20 प्रति पैकेट (रॉयल्टी) के रूप में शामिल है, जबकि पिछले वर्ष ₹39 प्रति पैकेट था। इसका मतलब है कि किसानों को 2018 सीज़न की तुलना में इस साल ₹10 प्रति पैकेट कम भुगतान करना होगा। साथ ही घरेलू बीज कंपनियों को बड़ा लाभ होगा क्योंकि उन्हें डेवलपर को ट्रेट शुल्क के रूप में प्रति पैकेट ₹19 कम देने होंगे।

बीटी कपास बीज के MSP को कम करने के क़दम के तहत स्वदेशी जागरण मंच (SJM) सहित कई संगठनों ने माँग की थी कि ट्रेट शुल्क को पूरी तरह से हटा दिया जाए ताकि किसानों को उच्च क़ीमतों का ‘अनावश्यक बोझ’ न उठाना पड़े।

SJM के सह-संयोजक अश्वनी महाजन ने 1 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर बीटी कपास के बीजों के MSP में ट्रेट शुल्क हटाने के लिए हस्तक्षेप करने की माँग की थी। कुछ रिपोर्टों का हवाला देते हुए उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि बीटी ट्रेट कपास के पौधों को पिंक बोलवर्म (कीट) से बचाने का काम नहीं करता इसलिए ऐसी फीस वसूलने का कोई मतलब नहीं बनता।

महाजन ने आरोप लगाया कि कृषि मंत्रालय ने न तो ट्रेट मूल्य निकाला और न ही उन डेवलपर के ख़िलाफ़ कोई दंडात्मक कार्रवाई ही की, जो किसानें से धन तो इकट्ठा कर लेते हैं लेकिन कोई काम नहीं करते।

मध्यम या बड़े कपास किसानों के पास चिंता के अलग-अलग कारण हैं। कपास की कुल उत्पादन लागत में बीज की लागत ज़्यादा नहीं होती है। ख़बर के अनुसार महाराष्ट्र में यवतमाल ज़िले के कपास किसान विजय नीवाल ने बताया कि रॉयल्टी में कटौती के क़दम से प्रौद्योगिकी डेवलपर्स का मनोबल गिर सकता है और अगर वे अगले कुछ वर्षों में पुराने हो जाते हैं, तो फिर वे नई किस्मों के साथ बाहर नहीं आते।

बता दें कि इससे पहले केंद्र द्वारा दिसंबर 2015 में गठित एक पैनल द्वारा कपास बीज मूल्य नियंत्रण आदेश के तहत बीटी कपास बीजों के दाम पहली बार 2016-17 में घटाए गए थे। पैनल ने 830-1,030 रुपए के पुराने दाम घटाकर प्रति पैकेट 800 रुपए कर दिए थे। इसी तरह प्रति पैकेट 163 रुपए ट्रेट वैल्यू को लगभग 70 प्रतिशत घटाकर 49 रुपए कर दिया गया था। यह कदम मई 2016 में जारी प्रारूप दिशा-निर्देशों के बाद उठाया गया था, जिसमें ट्रेट वैल्यू को बीज के बिक्री मूल्य के 10 प्रतिशत पर सीमित कर दिया गया था और इसके बाद समय-समय पर इसे कम किया गया।

शादी के महज़ तीन महीने बाद पत्नी ने की पति की हत्या,जानिए क्या थी वजह

ऐसा कहा जाता है कि शादी के बाद इंसान की ज़िंदगी के एक नए सफर की शुरुआत होती है, मगर मुंबई से एक ऐसी ख़बर आई है, जिसने इस बात को पूरी तरह से झुठला दिया है। शादी के महज़ तीन महीने बाद ही पत्नी ने पति की ज़िंदगी के सफर को हमेशा-हमेशा के लिए समाप्त कर दिया।

दरअसल, मुंबई में एक नवविवाहिता ने शादी के मात्र तीन महीने बाद ही पति की हत्या कर दी। इसकी वजह इतनी थी कि महिला को अपना पति ही पसंद नहीं था जिसके चलते उसने हत्या की इस वारदात को अंजाम दिया। पत्नी ने पति को ज़हर दिया और फिर गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी। इतना ही नहीं, इसके बाद उसने ख़ुद को निर्दोष साबित करने के लिए झूठी कहानी भी गढ़ी। पति जगदीश की हत्या करने के बाद पत्नी वृषाली पुलिस स्टेशन पहुँची और वहाँ उसने पुलिस से शिक़ायत दर्ज कराई कि उसके घर में चोर घुस आए थे और उसके सामने ही उसके पति की हत्या कर दी गई।

मगर पत्नी के इस झूठ का पर्दाफ़ाश तब हुआ, जब जगदीश के पोस्टमॉर्टम की रिपोर्ट आई। इस रिपोर्ट के मुताबिक पति की मौत ज़हर और गला घोंटने से हुई थी। पत्नी की बात और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट की बातों में जब कोई समानता नज़र नहीं आई तो पुलिस को महिला पर शक हुआ और उसने उसे हिरासत में ले लिया और उससे पूछताछ करना शुरू कर दिया। पूछताछ के दौरान पहले तो वृषाली ने अपने झूठ को ही सच साबित करने की कोशिश की, लेकिन जब पुलिस ने सख़्ती से पूछताछ की तो उसने अपना गुनाह कबूल कर लिया।

वृषाली ने बताया कि उसे अपना पति पसंद नहीं था, इसलिए उसने उसकी हत्या कर दी। बता दें कि जगदीश अपनी पत्नी वृषाली के साथ कल्याण पूर्व स्थित कोलसेवाडी परिसर के दुर्गा मंदिर के पास रहता था। वृषाली बताती है कि शादी के बाद दोनों का रोज आपस में झगड़ा होता था और फिर 6 मार्च को वृषाली ने जगदीश की हत्या कर दी।

#Ramzan और लोकसभा चुनाव में क्या है कनेक्शन? फेसबुक और ट्विटर पर क्यों मचा हुआ है घमासान?

लोकसभा चुनावों की तारीखों की घोषणा हो चुकी है। चुनाव आयोग ने इस बार लोकसभा चुनाव को 7 चरणों में करवाने का फैसला किया है। लोकसभा का चुनावी समर 11 अप्रैल से शुरू होकर 19 मई तक चलेगा जबकि 23 मई को मतों की गणना होगी। चुनाव आयोग भले EVM के साथ VVPAT लगवा दे, कितना भी निष्पक्ष हो ले… लेकिन कुछ लोगों का काम है सवाल खड़े करना सो बेचारे करते हैं। अबकी बार सवाल है रमजान का!

जी हाँ। रमजान पर राजनीति हो रही है। चुनाव आयोग को घेरा जा रहा है। बीजेपी को फायदा दिलाने का आरोप आयोग पर लगाया जा चुका है। आम आदमी पार्टी से लेकर टीएमसी तक बिना वजह रमजान पर राजनीति कर रहे हैं। जो इस पर राजनीति कर रहे हैं उनका (कु)तर्क यह है कि 5 मई से शुरू होकर 4 जून तक रमजान चलेगा। और इसी बीच पाँचवें से लेकर सातवें चरण (पाँचवा फेज- 6 मई, छठा फेज- 12 मई, सातवाँ फेज- 19 मई) का चुनाव भी होगा।

ऐसे तर्क देने वाले मानसिक रोगी ही हो सकते हैं और कुछ नहीं। क्योंकि रमजान हो या होली या फिर हो क्रिसमस… कोई भी आवश्यक काम न तो कभी रुकता है न कभी रोका जाएगा। ऐसा होता तो इन दिनों पुलिस, रेल, अस्पताल सब जगह छुट्टी होती! लेकिन ऐसा होता नहीं है। क्योंकि पर्व-त्योहार उत्सव है, आवश्यकता नहीं कि इसके लिए जीवन-मरण की नौबत आ जाए।

रमजान पर राजनीति कर रहे टीएमसी लीडर को बीजेपी के अरशद आलम का करारा जवाब

जो लोग लोकतंत्र में आस्था रखते हैं, उन्हें इसकी अहमियत पता है। बीजेपी अखिल भारतीय अल्पसंख्यक मोर्चा के सचिव अरशद आलम ने ऐसे लोगों को अपने तर्क से पस्त कर दिया है। रमजान है इसका मतलब यह तो नहीं कि आप पूरे महीने घर में बिताते हैं, बिना कोई काम किए।

मौलाना साहब को अब कौन समझाए! जिन्हें न लोकतंत्र की समझ है न ही राजनीति की और न ही देश की जनसंख्या और भूगोल की… वो चले चुनाव आयोग को तारीखें बदलने की सलाह देने। अपने आस-पास देखिए मौलाना साहब। रमजान के दौरान न तो कोई समुदाय विशेष वाला दुकान बंद करता है और न ही कोई मजहबी मजदूर कुदाल-फावड़ा चलाने छोड़ता है। रमजान चलता रहता है, साथ में चलती रहती है जिंदगी।

ब्लू-टिकधारी लोग भी नेताओं के साथ कूद गए हैं चुनाव आयोग के विरोध में। गिरोह में बने रहने के लिए और अपनी दुकान चलाने के लिए इतना तो खैर बनता है! हालाँकि कुछ लोगों ने इन जैसों को बढ़िया आईना दिखाया है – एकदम चौंधिया गए होंगे (अगर पढ़े होंगे तो)। मोदी के पक्ष में या विरोध में – वोट करने जाना है, इसमें रमजान कहाँ से घुसा दिए भाई?

कॉन्ग्रेस के सामने यक्ष प्रश्न: क्या मनमोहन सिंह चुनाव लड़ेंगे?

पंजाब कॉन्ग्रेस द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से अनुरोध किया गया है कि वे आगामी लोकसभा चुनाव में अमृतसर की सीट पर लड़ें। लेकिन खबरों की मानें तो मनमोहन सिंह ने इस अनुरोध पर अभी तक कोई भी सकारात्मक प्रक्रिया नहीं दी है। इसलिए यह साफ़ नहीं हो पाया है कि वह चुनाव लड़ेंगे या नहीं।

हालाँकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि मनमोहन सिंह को चुनाव लड़ने के लिए कहा गया है। 2009 के लोकसभा चुनावों में भी उनसे चुनाव लड़ने की माँग की गई थी लेकिन अस्वस्थ होने के कारण उन्होंने अनुरोध को अस्वीकार कर दिया था।

इस बार पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह, पंजाब कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सुनील जाखड़ और प्रभारी आशा कुमारी ने खुद पूर्व प्रधानमंत्री से क़रीब आधे घंटे तक मुलाकात की और आग्रह किया कि मनमोहन सिंह इस बार अमृतसर से चुनाव लड़ें।

एनडीटीवी में छपी ख़बर के अनुसार पंजाब कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष सुनील जाखड़ ने एनडीटीवी इंडिया को बताया कि उन्होंने पूर्व पीएम मनमोहन सिंह से आग्रह किया है कि वह पंजाब सीट से चुनाव लड़ें। उन्होंने कहा कि यह पंजाब और पंजाब कॉन्ग्रेस के लिए गर्व की बात होगी।

लेकिन जब जाखड़ ने सवाल किया गया कि क्या मनमोहन सिंह चुनाव लड़ने को तैयार हो गए हैं, तो उन्होंने जवाब दिया कि हम उनसे बोलकर आ गए हैं लेकिन फ़ैसला अब उनको करना है।

वैसे बता दें कि मनमोहन सिंह 1991 से असम से राज्यसभा सदस्य हैं और उनका कार्यकाल 14 जून को समाप्त हो रहा है। मनमोहन सिंह ने कभी भी लोकसभा चुनाव नहीं जीता है। 1999 में वह दक्षिणी दिल्ली से कांग्रेस के उम्मीदवार थे, जो राजधानी की सात संसदीय सीटों में से एक थी, लेकिन इन चुनावों में वह भाजपा के वीके मल्होत्रा से हार गए थे।

लोकसभा चुनाव 2019 में सभी EVM के साथ VVPAT, जानिए क्या है यह और कैसे करता है काम?

चुनाव आयोग ने आगामी लोकसभा चुनाव में सभी ईवीएम (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) के साथ वीवीपैट (Voter verifiable paper audit trail) जोड़ने की घोषणा की है। ऐसा राजनीतिक दलों द्वारा ईवीएम के ख़िलाफ़ किए जा रहे विरोध प्रदर्शनों और उसे कटघरे में खड़ा करने के प्रयासों के कारण किया गया है। कई राजनीतिक दलों की माँग है कि वापस बैलेट पेपर से चुनाव होने चाहिए। वैसे बैलेट पेपर के दिनों में बूथ लूट की घटनाएँ किसी से छिपी नहीं हैं। जब पूरी दुनिया आधुनिकता की तरफ़ बढ़ रही है, भारतीय विपक्षी दल भूतकाल में लौटने की बातें कर रहे हैं।

वीवीपैट की वर्किंग समझें (साभार: ECI)

इंग्लैंड और अमेरिका का उदाहरण देने वाले ये नेता उन देशों और भारत के बीच के जनसंख्या गैप को भी काफ़ी आसानी से नज़रअंदाज़ कर देते हैं। कभी अमेरिका में कोई नकाबपोश कथित ख़ुलासे करता है तो कभी ब्लूटूथ से ईवीएम ‘हैक’ होने लगता है। अब जब चुनाव आयोग ने वीवीपैट (VVPAT) लाने की घोषणा की है, तो आइए जानते हैं कि ये क्या है और किस तरह कार्य करता है।

क्या है VVPAT?

वीवीपैट भी एक तरह की मशीन ही होती है जिसे ईवीएम के साथ जोड़ा जाता है। ईवीएम से वीवीपैट को जोड़ने के बाद अगर कोई मतदाता वोट डालता है तो उसके तुरंत बाद एक पर्ची निकलती है, जिसमें जिस उम्मीदवार को मत दिया गया है, उसका नाम और चुनाव चिह्न छपा होता है। किसी भी प्रकार के विवाद की स्थिति में ईवीएम में डाले गए वोट और पर्ची का मिलान कर यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि वोट उस उम्मीदवार को गया है या नहीं, जिसपर बटन दबाया गया हो। ईवीएम में लगे शीशे के एक स्क्रीन पर यह पर्ची 7 सेकेंड तक दिखाई देती है।वीवीपैट को भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड और इलेक्ट्रॉनिक कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड ने डिज़ाइन किया है। 2013 में डिज़ाइन की गई इस व्यवस्था का प्रथम प्रयोग उसी साल हुए नागालैंड के चुनावों में किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश देते हुए वीवीपैट मशीन बनाने और इसके लिए वित्त की व्यवस्था करने को कहा था। चुनाव आयोग ने जून 2014 में ही तय कर लिया था कि आगामी लोकसभा चुनाव में वीवीपैट का इस्तेमाल किया जाएगा। आयोग ने इसके लिए केंद्र सरकार से 3174 करोड़ रुपए की माँग की थी। बीईएल ने वर्ष 2016 में 33,500 वीवीपैट मशीनों का निर्माण किया था। 2017 के गोवा के चुनावों में इसका इस्तेमाल किया जा चुका है। 2018 में हुए पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी 52,000 वीवीपैट मशीनों का इस्तेमाल किया गया था।

चुनाव आयोग ने केंद्र सरकार से वीवीपैट के लिए वित्त मुहैया कराने की बात कही थी

यह भी आपके जानने लायक है कि वीवीपैट में जिस प्रिंटर का इस्तेमाल किया जाता है, वह भी काफ़ी उत्तम क्वॉलिटी का होता है। इस पर्ची पर जिस स्याही का इस्तेमाल होता है, वो जल्दी नहीं मिटती। इतना ही नहीं, इस प्रिंटर में एक ऐसा सेंसर भी लगा होता है, जो ख़राब प्रिंटिंग को तुरंत चिह्नित कर लेता है। ईवीएम को लेकर विपक्षी राजनीतिक पार्टियों द्वारा कई प्रकार के अफवाह फैलाए जाते रहे हैं। ईवीएम को हैक करने की ख़बरों के बीच एक चुनाव अधिकारी ने बताया:

ईवीएम एक चिप आधारित मशीन है, जिसे केवल एक बार प्रोग्राम किया जा सकता है। उसी प्रोग्राम से तमाम डेटा को स्टोर किया जा सकता है लेकिन इन डेटा की कहीं से किसी तरह की कनेक्टिविटी नहीं है लिहाजा, ईवीएम में किसी तरह की हैकिंग या रीप्रोग्रामिंग मुमकिन ही नहीं है। इसलिए यह पूरी तरह सुरक्षित है।”

अप्रैल 2017 में केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बताया था कि अगस्त 2018 तक 16 लाख 15 हजार वीवीपीएटी मशीनों की ख़रीद की जाएगी। सबसे बड़ी बात कि वीवीपैट की पर्ची में मतदाता को उसके द्वारा वोट किए गए प्रत्याशी के नाम और उसके चुनाव चिह्न उसी भाषा में दिखाई देते हैं, जो मतदाता चुनता है, बशर्ते की वह भाषा सूचीबद्ध हो। वैसे अब वीवीपैट को लेकर भी नया विवाद खड़ा हो जाए, इस सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता। क्या गारंटी है कि ईवीएम जैसी सुरक्षित और विश्वसनीय मशीन को लेकर राजनीति चमकाने वाले नेता वीवीपैट को सवालों के घेरे में खड़ा नहीं करेंगे?

जानिए भारत में क्यों इतने चरणों में होते हैं चुनाव? समझें इसके कारकों को

लोकसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान किया जा चुका है। मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा ने 7 चरणों में चुनाव संपन्न कराने की घोषणा की है। इसमें तीन राज्य ऐसे हैं, जिनमें सभी 7 चरणों में चुनाव होंगे। ये राज्य हैं- उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल। किस राज्य में कब और कितने चरणों में चुनाव होंगे, इसके बारे में हम पहले ही बता चुके हैं। इन सबके बीच एक सवाल ऐसा है जो कितनी बार उठ चुका है। भारत में एक राज्य स्तरीय चुनाव भी कई चरणों में होते हैं। 2015 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव भी 5 चरणों में संपन्न कराए गए थे। इसी तरह अन्य राज्यों के चुनाव भी कई फेज में आयोजित कराए जा चुके हैं। सवाल यह है कि आख़िर क्या कारण है कि एक ही चरण में पूरे भारत में चुनाव आयोजित नहीं कराए जा सकते? क्या एक विशाल और विविधताओं (भौगोलिक और राजनीतिक रूप से) से भरे देश होने के कारण ऐसा होता है या फिर सुरक्षा व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए ऐसा किया जाता है? एक सवाल यह भी उठता है कि क्या चुनाव आयोग को राज्य पुलिस पर अब भरोसा नहीं रहा?

यहाँ हम कई चरणों में होने वाले चुनाव के पीछे जो कारक हैं, उनकी चर्चा करेंगे और साथ ही यह भी देखेंगे कि इसके पक्ष में क्या तर्क दिए जाते हैं। जनवरी 2017 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम ज़ैदी ने कहा था कि भारत में कई चरणों में चुनाव आगे भी होते रहेंगे। उन्होंने कहा था कि इसका सीधा कारण है चुनाव को निष्पक्ष और शांतिपूर्ण तरीके से संपन्न कराने के लिए केंद्रीय बलों का उपयोग करना। पाँच राज्यों में चुनाव संपन्न कराने के बाद तनावमुक्त ज़ैदी ने कहा था कि चुनाव आयोग द्वारा केंद्रीय बलों का प्रयोग करना और राज्य पुलिस पर भरोसा कम होना। उन्होंने कहा था कि सिर्फ़ चुनाव आयोग ही नहीं बल्कि उम्मीदवार, मतदाता और राजनीतिक दल भी इसके लिए ज़िम्मेदार हैं। उनका कहना था कि ख़ुद राजनीतिक पार्टियों, मतदाताओं व उम्मीदवारों को केंद्रीय बलों पर ज़्यादा भरोसा है।

पूर्व चुनाव आयुक्त नसीम ज़ैदी ने समझाया था कि कैसे चुनाव आयोग हर एक बूथ पर अर्धसैनिक बलों की तैनाती करने की कोशिश करता है क्योंकि राज्य पुलिस के बारे में राजनीतिक दलों के अपने-अपने अलग विचार होते हैं। उन्होंने कहा था कि मतदाता भी अर्धसैनिक बलों की तैनाती से निश्चिन्त रहते हैं और चुनाव कई चरणों में होने के बावजूद वे धैर्य बनाए रखते हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव तो 9 चरणों में हुए थे। 36 दिनों तक चलने वाला वह चुनाव विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के इतिहास में सबसे लम्बा चलने वाला चुनाव था। इसी तरह 2009 के लोकसभा चुनाव 5 चरणों में आयोजित हुए थे। इसके पीछे भारत के भौगोलिक भागों के अलग-अलग शासकीय और राजनीतिक परिस्थितियाँ होती हैं।

जैसे उत्तर-पूर्व भारत को ही ले लीजिए। उत्तर पूर्व भारत में आने वाले आठ राज्यों को देखिए। उन आठ राज्यों में 25 लोकसभा सीटें आती है (अरुणाचल प्रदेश-2, असम-14, मणिपुर-2, मेघालय-2, मिजोरम-1, नागालैंड-1, सिक्किम-1, त्रिपुरा-2)। इन राज्यों में अलग-अलग मुद्दों को लेकर दशकों से अलगाववादी संगठनों और भारत सरकार में ठनी रही है। चीन, बांग्लादेश और म्यांमार से सीमा लगी होने के कारण इन सभी राज्यों में विशेष सुरक्षा व्यवस्था की ज़रूरत पड़ती है। सर्वविदित है कि भारत से सटा चीन कई भारतीय राज्यों के क्षेत्रों पर अपना दावा ठोकता रहा है। उत्तर-पूर्वी राज्यों में भारतीय लोकतंत्र की सफलता उसे चुभती है। ऐसे में, ऐसी ताक़तों के रहते पूर्ण सुरक्षा व्यवस्था की ज़रूरत पड़ती है। यही कारण है कि इन राज्यों में कई चरणों में चुनाव होते आए हैं।

कहाँ कब और किस चरण में होंगे लोकसभा चुनाव

बिहार, छत्तीसगढ़ और झारखण्ड देश के सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित इलाक़ों में से एक रहे हैं। अब स्थिति कुछ सुधर गई है लेकिन पहले हालात इतने कठिन थे कि राज्य पुलिस तो छोड़िए, अर्धसैनिक बलों को भी नक्सलियों को क़ाबू में करने के लिए काफ़ी मशक्कत करनी पड़ती थी। छत्तीसगढ़ में तो नक्सलियों ने एक बार कॉन्ग्रेस के कई बड़े नेताओं की एक साथ हत्या कर उनका पूरा नेतृत्व ही साफ़ कर दिया था। ऐसे में, इन संवेदनशील इलाक़ों में ज्यादा से ज्यादा सुरक्षा व्यवस्था मुक़म्मल कर जनता को इस बात का एहसास दिलाना पड़ता है कि वे वोट देने निकले तो किसी प्रकार की हिंसा नहीं होगी। इन राज्यों में चुनाव के वक़्त हिंसक माओवादी वारदातों की संख्या बढ़ती रही है। अतः इनका प्रभाव कम होने के बावजूद कोई रिस्क नहीं लिया जा सकता।

इसके अलावा भारत जैसे विशाल देश में सबसे बड़ी चुनौती होती है, अर्धसैनिक बलों की टुकड़ियों को एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाना। हो सकता है कि सीआरपीएफ की एक टुकड़ी आज बिहार में चुनाव संपन्न करा रही है और 2 दिनों बाद उनकी तैनाती आंध्र प्रदेश में हो। ऐसे में, उनकी सुगमता के लिए भी ज़रूरी है कि चुनाव एक से ज्यादा चरणों में हों और उनके बीच प्रॉपर गैप हो ताकि ये एक जगह से दूसरे जगह पहुँच सकें। एक राज्य से दूसरे राज्य में जाना और काम पर लग जाना उतना आसान भी नहीं होता। उनके रहने, खाने-पीने व ट्रांसपोर्टेशन की व्यवस्था भी करनी होती है। इसमें समय लगाना लाजिमी है। जम्मू-कश्मीर के बारे में सर्विदित है कि वहाँ कैसे हालात रहते हैं और इन कार्यों के लिए सुरक्षा बलों को कितनी मुश्किल हालातों का सामना करना पड़ता है?

ऐसा नहीं है कि भारत में चुनाव हमेशा से इतने ज्यादा चरणों में ही होते रहे हैं। हाँ, 1951-52 में हुए पहले ऐतिहासिक चुनाव को संपन्न कराने में ज़रूर 3 महीने लगे थे लेकिन 1980 में एक ऐसा समय भी आया जब 4 दिनों में ही लोकसभा चुनाव निपटा दिया गया। यह भारतीय लोकतान्त्रिक इतिहास में अभी तक एक रिकॉर्ड है। इसके बाद जैसे-जैसे चुनौतियाँ बढ़ती गयीं, चुनाव लम्बे होते गए। पूर्व चुनाव आयुक्त एसवाई क़ुरैशी कहते हैं कि पहले के चुनावों में बूथ लूटना और वोटरों को प्रभावित करना आम बात हो गई थी। राज्य पुलिस पर स्थानीय नेताओं के दवाब में किसी पक्ष विशेष की तरफदारी करने के आरोप लगते थे। अतः 1990 के दशक में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने केंद्रीय बलों की नियुक्ति का निर्णय लिया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र सरकार को ये सुनिश्चित करने को कहा।

क़ुरैशी के मुताबिक़, केंद्रीय बलों को एक जगह से दूसरी जगह आवागमन करने में लगने वाले समय की वजह से चुनाव लम्बे होने लगे। केंद्रीय सुरक्षा बलों के इन जवानों को बस और ट्रेन से सफ़र कर गंतव्य तक पहुँचना होता है, जिसमें समय लगता है। इसी तरह पाकिस्तान सीमा से लगे इलाक़ों में विशेष सतर्कता की ज़रूरत पड़ती है। लिट्टे के दिनों में तमिलनाडु व दक्षिण भारतीय राज्यों में विशेष सतर्कता बरती जाती थी। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की हत्या भी एक जनसभा को सम्बोधित करने के दौरान कर दी गई थी। वे दक्षिण भारतीय राज्यों में चुनाव प्रचार के लिए निकले थे। इसी तरह भारत के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग समय पर विभिन्न समस्याएँ आती रहती है, जिस कारण पूरे भारत में एक साथ चुनाव नहीं कराए जा सकते।

कई बार कहा जाता है कि अमेरिका या इंग्लैंड में एक चरण में ही चुनाव हो जाते हैं लेकिन हमें ये समझना जरूरी है कि 125 करोड़ से भी अधिक जनसंख्या वाले एक देश और 10 करोड़ से भी कम जनसंख्या वाले देश में सारे नियम एक समान नहीं हो सकते। भौगोलिक परिस्थितियाँ, जनसंख्या, सुरक्षा बलों के आवागमन, अशांत अंतरराष्ट्रीय सीमाएँ व विभिन्न हिंसक संगठनों के कारण भारत में एक चरण में चुनाव संपन्न कराना संभव नहीं है।

महारानी वीणापाणि देवी के निधन से ममता का बिगड़ा चुनावी गणित, BJP के हिस्से में 1.5 करोड़ वोट!

मंगलवार (मार्च 6, 2019) को महारानी वीणापाणि देवी के निधन के साथ ही बंगाल की राजनीति में उथल-पुथल तेज़ हो गई है। बंगाल से बाहर अधिकतर लोगों ने भले ही वीणापाणि देवी ठाकुर का नाम नहीं सुना हो लेकिन पश्चिम बंगाल की राजनीतिक और धार्मिक व्यवस्था में उनका अहम किरदार रहा है। मतुआ समुदाय द्वारा ‘बड़ो माँ’ के नाम से पुकारी जानी वाली 100 वर्षीय महारानी समुदाय के 1.5 करोड़ लोगों की मार्गदर्शिका रहीं हैं। दशकों से उनका नेतृत्व करती आईं हैं। वैष्णव हिंदुत्व के एक भाग के रूप में मतुआ समुदाय ‘स्वयं दीक्षिति’ के सिद्धांत में विश्वास रखता है। हरिचंद ठाकुर के सिद्धांतों पर चलते हुए दिवंगत प्रमथ रंजन ठाकुर ने समुदाय की एकता व अखंडता के लिए प्रयास किया और भारत की आज़ादी के बाद अधिकतर मतुआ बांग्लादेश से विस्थापित होकर भारत आ गए। ऐसी कठिन परिस्थिति में इन्होने अपने समाज का नवनिर्माण किया और बंगाल की सामाजिक, राजनीतिक व धार्मिक व्यवस्था का एक अहम भाग बन कर उभरे।

वीणापाणि देवी प्रमथ रंजन ठाकुर की अर्धांगिनी थी। उनके निधन के बाद मतुआ समुदाय में एक नेतृत्व शून्य पैदा हो गया है। लेकिन, मतुआ महासंघ के रूप में उनके नेतृत्व के लिए एक संस्था है, जिसका निर्णय सर्वमान्य होता आया है। प्रमथ रंजन ठाकुर 1962 में कॉन्ग्रेस के टिकट पर विधायक भी बने थे। पूर्व के दिनों में छुआछूत का शिकार रहे नामशूद्र जाति से आने वाले ठाकुर परिवार ने इस समुदाय को नीचे से उठा कर काफ़ी उच्च स्थान तक पहुँचाया। इसके लिए कई आंदोलन हुए। पिछले 2 चुनावों से मतुआ समुदाय बड़ी संख्या में ममता बनर्जी को वोट करता रहा है। वीणापाणि देवी के कद का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके निधन के बाद मुख्यमंत्री बनर्जी के निर्देशानुसार बंगाल सरकार के आधे दर्जन मंत्री महारानी के अंतिम क्रिया-कर्म संपन्न कराने की व्यवस्था देख रहे थे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महारानी के निधन के बाद उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए लिखा-

“बड़ो माँ वीणापाणि देवी हमारे समय की एक आइकॉन रहीं हैं। कई लोगों के लिए महान शक्ति और प्रेरणा का स्रोत रहीं बड़ो माँ के आदर्श आने वाली पीढ़ियों को प्रभावित करते रहेंगे। सामाजिक न्याय और सौहार्द को स्थापित करने की दिशा में उनके प्रयास सराहनीय हैं। पिछले महीने, मुझे ठाकुरनगर में बड़ो माँ वीणापाणि ठाकुर का आशीर्वाद प्राप्त करने का मौक़ा मिला। मैं हमेशा उसके साथ हुई बातचीत को संजो कर रखूँगा। दुःख की इस घड़ी में हम मतुआ समुदाय के साथ एकजुटता से खड़े हैं।”

वीणापाणि देवी ने निधन के बाद का चुनावी गणित समझने से पहले हम आपको एक ऐसी चिट्ठी के बारे में बताना चाहेंगे, जिसे उनके द्वारा निधन से कुछ दिनों पूर्व लिखा गया था। तृणमूल अध्यक्ष और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सम्बोधित इस पत्र में उन्हें मतुआ समुदाय के लिए किए गए उनके वादों की याद दिलाई गई थी। इस पत्र में वीणापाणि ठाकुर ने लिखा था:

“मैं आपको याद दिला दूँ कि शरणार्थियों की नागरिकता और पुनर्वास लंबे समय से मतुआ समुदाय की स्थायी माँग रही है। आपने मुझसे वादा किया था कि आप मतुआ हितों की देखभाल करेंगी। नागरिकता हमारी काफ़ी दिनों से एक लंबित माँग रही है। अब चूँकि एक अवसर है, मैं आपसे अनुरोध करती हूँ कि आपकी अपनी पार्टी (तृणमूल कांग्रेस) को राज्यसभा में नागरिकता (संशोधन) विधेयक का समर्थन करे अन्यथा मतुआ समुदाय अब आपका समर्थन नहीं करेगा।”

तृणमूल ने वीणापाणि देवी के पत्र को बताया फेक

इस पत्र ने बंगाल की सत्ताधारी पार्टी को हिला कर रख दिया। नागरिकता संशोधन विधेयक भाजपा की बड़ी नीतियों में से एक रही है और एक तरह से इसे भाजपा का ड्रीम प्रोजेक्ट कह सकते हैं। उत्तर-पूर्व और बंगाल में भाजपा नागरिकता संशोधन विधेयक को भुनाने के लिए पूरी तरह तैयार है। ऐसे में वीणापाणि देवी के इस पत्र में इस विधेयक का समर्थन करना तृणमूल के लिए कबाब में हड्डी बन गया और पार्टी ने इस पत्र को फेक करार दिया। लोगों का मानना है कि मतुआ महासंघ में अब दो गुट हो चुके हैं लेकिन महासंघ के अध्यक्ष शांतनु ठाकुर के बयानों और क्रियाकलापों पर गौर करें तो पता चलता है कि भाजपा अगर थोड़ी सी और गंभीरता दिखाए तो उसे मतुआ समुदाय के 1.5 करोड़ वोट मिलने से कोई नहीं रोक सकता।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और मतुआ समुदाय की मार्गदर्शिका दिवंगत वीणापाणि देवी ठाकुर

शांतनु ठाकुर ने अपने बयानों में कई बार कहा है कि ममता बनर्जी चाहती हैं कि मतुआ फिर से वापस बांग्लादेश में चले जाएँ। आपको बता दें कि पीएम मोदी की बंगाल में हुई हालिया रैली के आयोजन में भी उनका ख़ासा योगदान था। तृणमूल कॉन्ग्रेस का मानना है कि इतनी उम्र में बड़ो माँ हस्ताक्षर कर ही नहीं सकतीं, इसलिए ये पत्र उनका नहीं है। ख़ैर, अब बात करते हैं मतुआ मतों के प्रभाव की। संघाधिपति के पद के लिए अभी से चर्चा शुरू हो गयी है लेकिन मतुआ समुदाय के तृणमूल वर्ग का मानना है कि संघ का जो निर्णय होगा, वो एकमत से सभी को स्वीकार्य होगा। पिछले दिनों तृणमूल विधायक सत्यजीत विश्वास की हत्या को भी इसी राजनीति से जोड़ कर देखा जा रहा है। दशकों से वाम-तृणमूल के ख़ूनी संघर्ष का गवाह रहे पश्चिम बंगाल में इस तरह की राजनीतिक हत्याएँ कोई नई बात नहीं है।

दरअसल, कृष्णगंज के विधायक विश्वास तृणमूल कॉन्ग्रेस और मतुआ समुदाय के बीच एक अहम कड़ी का कार्य कर रहे थे। एक तरह से दोनों पक्षों के बीच के सेतु थे। उनकी हत्या के साथ ही यह सेतु टूट चुका है और ममता बनर्जी की पार्टी मतुआ समुदाय से और दूर ही होती गयी है। चर्चा तो यह भी है कि वीणापाणि देवी के पोते शांतनु ठाकुर भाजपा के टिकट पर चुनाव भी लड़ सकते हैं। उनकी चाची तृणमूल का हिस्सा हैं। हो सकता है कि पारिवारिक कलह राजनीतिक युद्ध का रूप ले ले। चुनावों के इस मौसम में किसी भी ऐसी सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसी 6 लोकसभा सीटें हैं जहाँ मतुआ वैष्णव समुदाय चुनाव परिणाम को पलटने की ताक़त रखते हैं। वे हैं- कृष्णानगर, राणाघाट, बैरकपुर, बरसात, वनगाँव और कूचविहार।

मतुआ समुदाय के सबसे मजबूत किले ठाकुरगंज में रैली कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस दिशा में कार्य शुरू कर दिया है। दिवंगत महारानी के पुत्र मंजुल कृष्णा ठाकुर पहले ही भाजपा में शामिल हो चुके हैं और उनके बेटे शांतनु तृणमूल के ख़िलाफ़ मुखर हैं। ऐसे में, ममता बनर्जी का सिरदर्द बन चुका नागरिकता संशोधन विधेयक अब उनके गले का फाँस बन चुका है। बता दें कि बरसात लोकसभा क्षेत्र में अच्छा-ख़ासा प्रभाव रखने वाले सीनियर तृणमूल नेता और विधाननगर के मेयर सब्यसाची दत्ता ने भाजपा नेता मुकुल रॉय से मुलाक़ात की है, जिसके बाद तृणमूल इस क्षेत्र में और भी कमजोर नज़र आ रही है। आगामी चुनाव और वीणापाणि देवी के निधन के बीच वामपंथी पराभव के इस दौर में बंगाल के अधिपत्य का ज़ंग जारी रहेगा। ये और गहरा होगा।

23 साल का मुदासिर अहमद ख़ान उर्फ़ ‘मोहम्मद भाई’ था पुलवामा अटैक का मास्टरमाइंड

14 फ़रवरी 2019 को जम्मू-कश्मीर के हुए पुलवामा आत्मघाती हमले के मास्टरमाइंड के रूप में जैश-ए-मुहम्मद के मात्र 23 साल के आतंकवादी मुदासिर अहमद खान उर्फ़ ​​’मोहम्मद भाई’ की पहचान की गई है। पुलिस द्वारा इसकी जानकारी आज (मार्च, 10, 2019) दी गई।

सुरक्षा अधिकारियों ने बताया कि पुलवामा ज़िले से स्नातक उपाधि प्राप्त इलेक्ट्रीशियन 23 वर्षीय ख़ान ने आतंकवादी हमले में प्रयुक्त वाहन और विस्फोटकों की व्यवस्था की थी।

त्राल के मीर मोहल्ला का निवासी, ख़ान 2017 में जैश-ए-मुहम्मद में एक ओवरग्राउंड वर्कर के रूप में शामिल हुआ था और बाद में नूर मोहम्मद तांत्रे, उर्फ़ ​​’नूर त्राली’ द्वारा आतंकी संगठन जैश में शामिल हो गया, जिसके बारे में माना जाता है कि उसने आतंक को बढ़ावा देने में मदद की।

दिसंबर 2017 में तांत्रे के मारे जाने के बाद, ख़ान 14 जनवरी, 2018 को अपने घर से ग़ायब हो गया था और तब से वो आतंकी गतिविधियो में सक्रिय था। अधिकारियों ने बताया कि आत्मघाती हमलावर आदिल अहमद डार, जिसने 14 फ़रवरी को CRPF के क़ाफ़िले में एक बस के आगे अपने विस्फोटक से भरे वाहन को उड़ा दिया था, वो आतंकवादी ख़ान के साथ लगातार संपर्क में था।

अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद, ख़ान ने एक औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आईटीआई) से इलेक्ट्रीशियन से संबंधित एक साल का डिप्लोमा कोर्स किया। एक मज़दूर का सबसे बड़ा बेटा, ख़ान फ़रवरी 2018 में सुंजवान में सेना के शिविर पर हुए आतंकवादी हमले में शामिल था, जिसमें छह कर्मियों और एक नागरिक की मौत हो गई थी।

इसके अलावा उसकी भूमिका जनवरी 2018 में CRPF शिविर पर लेथपोरा हमले में भी सामने आई थी, जिसमें CRPF के पाँच जवान वीरगति को प्राप्त हुए थे। 14 फ़रवरी के आतंकवादी हमले की जाँच में जुटी राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) ने 27 फ़रवरी को ख़ान के आवास की तलाशी ली थी।

बता देंं कि पुलवामा आतंकी हमले में एक मारुति ईको मिनीवैन का इस्तेमाल किया गया था और इसे हड़ताल से ठीक 10 दिन पहले जैश-ए-मुहम्मद के किसी अन्य संचालक ने ख़रीदा था।

सुरक्षा अधिकारियों के अनुसार, दक्षिणी कश्मीर के बिजबेहड़ा के निवासी सज्जाद भट के रूप में पहचाना जाना वाला जैश संचालक तब से नज़र बचाकर भाग रहा है और ऐसा माना जाता है कि वो अब सक्रिय रूप से आतंकवादी बन गया है।

दिव्य काशी की भव्यता बढ़ाने का एक अनूठा प्रयास विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर

सनातन धर्म और पौराणिक महत्त्व की नगरी काशी जल्द ही नए सौन्दर्य के कलेवर में नज़र आने वाली है। एक तरफ जहाँ पूरे शहर में निर्माण कार्य जारी है। वही उतनी ही तेजी से विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर पर भी काम हो रहा है। पीएम नरेंद्र मोदी का ड्रीम प्रोजेक्ट लगभग 50 फीट चौड़ी काशी विश्वनाथ कॉरिडोर 12 ज्योतिर्लिंग मंदिरों में से एक विश्वनाथ मंदिर को वाराणसी के प्रसिद्ध घाटों से जोड़ेगी।

मुख्य काशी विश्वनाथ मंदिर, जो पावन गंगा नदी के बाएँ किनारे पर स्थित है। पहले यह पूरा प्रांगण सकरी गलियों से घिरा हुआ था। ऐसा नहीं है कि काशी का ऐसा सँकरा स्वरुप प्राचीन काल से था। सर्वे और कुछ पुराने दस्तावेजों के आधार पर पता लगाने पर इसकी भव्यता और विशालता का पता चला। फिर वाराणसी के सांसद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इस परियोजना पर काम शुरू हुआ। जैसे-जैसे परिसर के बाहरी हिस्सों को ध्वस्त किया जाता रहा, काशी का पुराना स्वरुप स्पष्ट नज़र आता गया।

विश्वनाथ कॉरिडोर का निर्माण मंदिरों, साधु-सन्यासियों, फक्कड़ों और मतवालों की नगरी काशी को उसकी भव्यता वापस लौटाने का यह एक सराहनीय प्रयास है और हर बार मोदी के आगमन पर काशी की जनता अपने सांसद के प्रति उत्साह, उनके कार्यों से संतुष्टि का प्रमाण है।

ऊपर प्रधानमंत्री के ट्वीट में, इस परियोजना का विस्तृत विजुअल प्रदर्शित किया गया है। बिना काशी की पारम्परिकता से छेड़छाड़ किए हुए, मंदिर परिसर में सभी नागरिक और अत्याधुनिक सुविधाओं का खयाल रखते हुए तेजी से निर्माण कार्य जारी है।

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर परियोजना की खास बातें

  • लगभग 50 फीट के गलियारे में गंगा के किनारे स्थित मणिकर्णिका और ललिता घाट को काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग मंदिर से सीधे जोड़ा जाएगा।
  • रिवरफ्रंट, गंगा नदी पर स्थित घाटों को अपग्रेड करेगा
  • कॉरिडोर में तीर्थयात्रियों के आराम करने के लिए प्रतीक्षालय होंगे
  • रास्ते में, तीर्थयात्रियों और यात्रियों को नवनिर्मित संग्रहालय और वाराणसी के प्राचीन इतिहास और संस्कृति से परिचय कराने के लिए चित्र वीथिका का निर्माण
  • हवन और यज्ञ जैसे धार्मिक कार्यों के लिए नई यज्ञशालाओं का निर्माण
  • काशी विश्वनाथ कॉरिडोर में मंदिर के पुजारी, स्वयंसेवक और तीर्थयात्रियों के लिए आवास होंगे
  • अत्याधुनिक पूछताछ केंद्र पर्यटकों को शहर और इसके अन्य आकर्षण और सुविधाओं के स्थानों के बारे में जानकारी मुहैया कराएगा
  • काशी विश्वनाथ मंदिर से ठीक पहले, एक बड़े चौक का निर्माण, जहाँ इस गलियारे का समापन होगा
  • फूड स्ट्रीट जो पर्यटकों और तीर्थ यात्रियों को बनारसी और अवधी व्यंजनों का स्वाद चखाएँगी
  • प्रसाद के लिए एक नए विशाल भोगशाला का निर्माण
  • सभाओं, बैठकों और मंदिर के कार्यों के लिए, एक सभागार का निर्माण किया जाएगा जो इन आयोजनों की सुविधा प्रदान करेगा
  • एक भव्य मंच का भी निर्माण होगा जहाँ वृहद् स्तर पर काशी की सांस्कृतिक परम्परा से जुड़े भव्य आयोजन होंगे।  

1780 ई. के बाद काशी शहर इतने बड़े संरचनात्मक परिवर्तनों से गुज़र रहा है। उस दौर में इंदौर की मराठा रानी अहिल्याबाई होल्कर ने मंदिर और इसके आसपास के क्षेत्र का जीर्णोद्धार किया था। इसके बाद 1853 ई. में, सिख महाराजा रणजीत सिंह ने काशी विश्वनाथ मंदिर के शिखर को सोने से मढ़वाया था। और अब पीएम मोदी के नेतृत्व में, शहर का भव्यतम निर्माण कार्य काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के रूप में परिवर्तन की आधुनिक लहर से गुजर रहा है।

बता दें कि इस परियोजना की कुल लागत मीडिया रिपोर्टों के अनुसार 600 करोड़ रुपए अनुमानित की गई है। 2014 के लोकसभा चुनाव में, भाजपा ने अपने घोषणापत्र में इस प्राचीन शहर के कायाकल्प का वादा किया था। तब से, पीएम मोदी ने शहर में 19 बार वहाँ चल रहे विकास और उत्थान के कार्यों का निरीक्षण कर चुके हैं।