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ईरान-अमेरिका-इजरायल जंग के बीच विदेशी सैन्य ठिकानों की चर्चा: जानें- भारत ने किन देशों में बनाए मिलिट्री बेस, क्या है इनकी रणनीतिक अहमियत

ताजिकिस्तान स्थित फरखोर एयरबेस भारत का पहला विदेशी सैन्य अड्डा माना जाता है। इसकी स्थापना का उद्देश्य सिर्फ सैन्य विस्तार नहीं, बल्कि अफगानिस्तान और मध्य एशिया में उभर रहे आतंकवादी खतरों पर नजर रखना था।

मिडिल ईस्ट इस समय इतिहास के सबसे खतरनाक तनावपूर्ण दौर से गुजर रहा है। अमेरिका और इजरायल लगातार ईरान पर हवाई हमले कर रहे हैं, वहीं ईरान भी पूरी ताकत से जवाबी कार्रवाई कर रहा है। इस टकराव का असर सिर्फ इन तीन देशों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि खाड़ी क्षेत्र के कई देश भी इसकी चपेट में आ चुके हैं।

दरअसल अमेरिका के दुनिया के कई देशों में सैन्य ठिकाने मौजूद हैं, जिनका इस्तेमाल वह अपने सैन्य अभियानों के लिए करता है। यही वजह है कि ईरान ने जवाबी हमलों में खाड़ी क्षेत्र के 8 देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाया।

बहरीन, कतर, कुवैत, UAE, सऊदी अरब, जॉर्डन, इराक और ओमान जैसे देशों में हुए इन हमलों से साफ है कि आधुनिक युद्ध अब सिर्फ दो देशों के बीच सीमित नहीं रह गए हैं, बल्कि पूरे क्षेत्र और कई देशों को प्रभावित करते हैं।

ठीक इसी तरह भारत के भी कई देशों में सैन्य ठिकाने, मॉनिटरिंग सेंटर और रणनीतिक सैन्य सुविधाएँ मौजूद हैं। हालाँकि भारत इन ठिकानों का इस्तेमाल आक्रामक युद्ध के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, समुद्री निगरानी, आतंकवाद विरोधी अभियानों और रणनीतिक संतुलन बनाए रखने के लिए करता है।

ऐसे में यह समझना बेहद जरूरी हो जाता है कि भारत किन-किन देशों में सैन्य मौजूदगी रखता है, वहाँ उसकी क्या भूमिका है और ये ठिकाने भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं।

बदलते युद्धों में विदेशी सैन्य ठिकानों की अहमियत

आज के दौर में युद्ध की परिभाषा पूरी तरह बदल चुकी है। अब लड़ाई सिर्फ सीमाओं पर नहीं लड़ी जाती, बल्कि हजारों किलोमीटर दूर बैठकर भी सैन्य ताकत का प्रदर्शन किया जाता है। इसी कारण दुनिया की लगभग हर बड़ी सैन्य शक्ति अमेरिका, चीन, रूस और अब भारत विदेशों में अपने सैन्य अड्डे, रडार स्टेशन, लिसनिंग पोस्ट और लॉजिस्टिक हब बना रही है।

इन ठिकानों की मदद से किसी भी देश को तेजी से सैन्य कार्रवाई करने, दुश्मन पर नजर रखने, समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और संकट के समय तुरंत प्रतिक्रिया देने की क्षमता मिलती है। यही कारण है कि हिंद महासागर क्षेत्र, मध्य एशिया और इंडो-पैसिफिक में सैन्य ठिकानों की होड़ तेज होती जा रही है।

भारत की रणनीति भी इसी वैश्विक समीकरण का हिस्सा है। एक ओर जहाँ चीन हिंद महासागर और अफ्रीका तक अपने सैन्य कदम बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान लगातार भारत के लिए सुरक्षा चुनौती बना हुआ है। ऐसे में भारत ने अपनी सुरक्षा रणनीति को देश की सीमाओं से बाहर तक विस्तार किया है।

भारत की रणनीतिक सोच: क्यों जरूरी हुए विदेशी सैन्य ठिकाने?

भारत की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि वह हिंद महासागर के केंद्र में स्थित है। दुनिया का करीब 60 प्रतिशत समुद्री व्यापार इसी महासागर से होकर गुजरता है। भारत की ऊर्जा आपूर्ति, व्यापारिक मार्ग और समुद्री सुरक्षा सीधे तौर पर इस क्षेत्र से जुड़ी हुई है।

इसी कारण भारत की सुरक्षा रणनीति अब केवल थल सीमाओं तक सीमित नहीं रही। समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद पर नजर, ड्रग्स और हथियारों की तस्करी रोकना, समुद्री डकैती से निपटना और रणनीतिक संतुलन बनाए रखना ये सभी कारण भारत को विदेशों में सैन्य उपस्थिति दर्ज कराने के लिए प्रेरित करते हैं।

भारत की यह मौजूदगी दो रूपों में सामने आती है। एक जहाँ भारत ने खुद अपने सैन्य ठिकाने विकसित किए हैं और दूसरा, जहाँ भारत ने मित्र देशों के साथ रणनीतिक समझौतों के जरिए उनके सैन्य अड्डों तक पहुँच बनाई है।

मध्य एशिया में भारत की पहली सैन्य दस्तक: ताजिकिस्तान का फरखोर एयरबेस

ताजिकिस्तान स्थित फरखोर एयरबेस भारत का पहला विदेशी सैन्य अड्डा माना जाता है। इसकी स्थापना का उद्देश्य सिर्फ सैन्य विस्तार नहीं, बल्कि अफगानिस्तान और मध्य एशिया में उभर रहे आतंकवादी खतरों पर नजर रखना था।

यह एयरबेस अफगान सीमा के बेहद करीब है। 1990 के दशक के अंत में जब अफगानिस्तान में तालिबान का प्रभाव बढ़ रहा था, तब भारत ने इस बेस का इस्तेमाल नॉर्दर्न अलायंस को समर्थन देने, खुफिया सूचनाएँ जुटाने और रणनीतिक निगरानी के लिए किया। इस ठिकाने ने भारत को पाकिस्तान और अफगानिस्तान की गतिविधियों पर सीधी नजर रखने की क्षमता दी।

इस बेस की वजह से पाकिस्तान को यह डर सताने लगा था कि भारत अब उसकी पश्चिमी सीमा के बेहद करीब पहुँच चुका है। यही कारण था कि फरखोर एयरबेस को भारत की सबसे संवेदनशील रणनीतिक उपलब्धियों में गिना जाता है।

हिंद महासागर में भारत का मजबूत सुरक्षा घेरा

भारत की विदेश नीति का सबसे बड़ा फोकस हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) है। यह इलाका न सिर्फ भारत की सुरक्षा, बल्कि वैश्विक व्यापार के लिए भी जीवन रेखा माना जाता है। यही वजह है कि भारत ने इस पूरे क्षेत्र में रडार स्टेशनों, नौसैनिक सुविधाओं और निगरानी केंद्रों का जाल बिछाया है।

मॉरीशस के अगालेगा द्वीप पर भारत एक अत्याधुनिक सैन्य सुविधा विकसित कर रहा है, जिसमें लंबा रनवे, रडार सिस्टम और नौसैनिक समर्थन केंद्र शामिल हैं। इससे भारत पूरे पश्चिमी हिंद महासागर पर कड़ी नजर रख सकता है।

सेशेल्स के असम्पशन आइलैंड पर बनी संयुक्त सैन्य सुविधा समुद्री डकैती, अवैध मछली पकड़ने और संदिग्ध जहाजों की निगरानी के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यह ठिकाना चीन की बढ़ती गतिविधियों पर नजर रखने में भी भारत की मदद करता है।

मालदीव में भारत द्वारा लगाए गए कोस्टल सर्विलांस रडार सिस्टम और हेलिकॉप्टर यूनिट्स पूरे द्वीपीय क्षेत्र की सुरक्षा को मजबूत बनाते हैं। इससे समुद्री आतंकवाद और ड्रग्स तस्करी पर नियंत्रण रखने में मदद मिलती है।

श्रीलंका में स्थापित रडार स्टेशन और कोलंबो पोर्ट में भारत की रणनीतिक मौजूदगी चीन के हम्बनटोटा पोर्ट का संतुलन बनाने के लिए अहम मानी जाती है।

खाड़ी क्षेत्र में भारत की रणनीतिक पकड़: ओमान से लेकर मेडागास्कर तक

ओमान में स्थित रास अल हद्द का लिसनिंग पोस्ट भारत को फारस की खाड़ी में होने वाली हर गतिविधि पर नजर रखने की ताकत देता है। मस्कट में भारतीय नौसेना को बर्थिंग सुविधा मिलती है, जबकि दुक्म पोर्ट भारत के लिए लॉजिस्टिक हब बनता जा रहा है।

मेडागास्कर में भारत का इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस स्टेशन दक्षिण-पश्चिम हिंद महासागर में जहाजों की आवाजाही और समुद्री गतिविधियों की निगरानी करता है। यह भारत का पहला विदेशी लिसनिंग पोस्ट माना जाता है। इन ठिकानों की मदद से भारत अफ्रीका से लेकर मिडिल ईस्ट तक समुद्री मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है।

भारत भूटान में IMTRAT नाम की सैन्य प्रशिक्षण टीम चलाता है। यह टीम हा द्ज़ोंग में स्थित है। यहाँ भारतीय सेना, रॉयल भूटान आर्मी और रॉयल बॉडीगार्ड को प्रशिक्षण देती है। इसका उद्देश्य भूटान की रक्षा क्षमता मजबूत करना और दोनों देशों के मजबूत संबंधों को बनाए रखना है।

ईरान का चाबहार पोर्ट भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण बंदरगाह है। यह कोई सैन्य बेस नहीं है, लेकिन भारत को सामान भेजने और जहाज चलाने में मदद करता है। इस पोर्ट के जरिए भारत पाकिस्तान से गुजरने बिना अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक माल भेज सकता है। भारत पोर्ट के कुछ हिस्सों को बनाने और संभालने में मदद करता है।

रणनीतिक साझेदारी: अमेरिका, जापान और सिंगापुर से भारत को क्या मिला?

भारत ने सिर्फ अपने ठिकाने ही नहीं बनाए, बल्कि रणनीतिक साझेदारियों के जरिए दुनिया के सबसे शक्तिशाली सैन्य नेटवर्क तक पहुँच भी बनाई है। अमेरिका के साथ हुआ LEMOA समझौता भारत को 85 से ज्यादा देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डों तक लॉजिस्टिक पहुँचा देता है।

इससे भारत को जरूरत पड़ने पर ईंधन, मरम्मत और सप्लाई में जबरदस्त मदद मिलती है। जापान के साथ हुए समझौते से भारत को जिबूटी स्थित जापानी सैन्य बेस तक पहुँच मिली, जो सीधे तौर पर चीन के जिबूती बेस को संतुलित करता है। सिंगापुर का चांगी नेवल बेस भारत को मलक्का जलडमरूमध्य के पास मजबूत मौजूदगी देता है, जो दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री मार्गों में से एक है।

भारत की रणनीति बनाम चीन और पाकिस्तान

भारत की यह पूरी सैन्य रणनीति सीधे तौर पर चीन और पाकिस्तान से मिलने वाली चुनौतियों से जुड़ी है। चीन जहाँ हिंद महासागर में मोती की माला (String of Pearls) रणनीति के तहत बंदरगाह और सैन्य ठिकाने बना रहा है, वहीं पाकिस्तान चीन के सहयोग से अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहा है।

ऐसे में भारत का यह विदेशी सैन्य नेटवर्क रणनीतिक संतुलन बनाए रखने, दुश्मनों की घेराबंदी रोकने और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने का मजबूत हथियार बन चुका है। आज जब ईरान-अमेरिका-इजरायल संघर्ष ने पूरी दुनिया को यह दिखा दिया है कि विदेशी सैन्य ठिकाने किसी भी युद्ध में सीधे निशाना बन सकते हैं, तब भारत की रणनीति और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

भारत इन ठिकानों का इस्तेमाल आक्रामकता के लिए नहीं, बल्कि सुरक्षा, निगरानी, संतुलन और स्थिरता के लिए करता है। यही वजह है कि भारत की यह रणनीतिक सैन्य मौजूदगी उसे आने वाले समय में एक जिम्मेदार वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करेगी।

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विवेकानंद मिश्र
विवेकानंद मिश्र
एक पत्रकार और कंटेंट क्रिएटर। राजनीति, संस्कृति, समाज से जुड़ी अनसुनी कहानियाँ सामने लाने के लिए प्रतिबद्ध।

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