Sunday, September 20, 2020
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आखिर फेसबुक मुसलमान बलात्कारियों को बचाना क्यों चाहता है? क्यों डिलीट कर रहा है खबरें?

फेसबुक को अपना दोगलापन त्याग कर, दुनिया को यह बात साफ शब्दों में बताना चाहिए कि वो मुसलमान बलात्कारियों की तरफदारी क्यों कर रहा है? फेसबुक को बताना चाहिए कि क्या फेसबुक पर शरियत के हिसाब से चलते हुए खबरें शेयर होनी चाहिए? फेसबुक को खुल कर कहना चाहिए कि क्या मक्का की तरफ सर करके, हर पोस्ट लिखने से पहले नमाज भी पढ़ना ज़रूरी है?

22 सितंबर 2019 को कौशाम्बी में हुए एक बच्ची के सामूहिक बलात्कार की खबर आई। पता चला कि बच्ची दलित है, और आरोपित मुसलमान। जैसा कि आजकल के सेकुलर समाज में हो रहा है, इस खबर पर न कोई रोष प्रकट किया गया, न ही मानवता के शर्मसार होने की बात कही गई। जबकि, इसमें बच्ची दलित समाज से है, जो कि शायद किसी सवर्ण जाति के आरोपित का शिकार होती तो मीडिया कवरेज अलग होती।

ख़ैर, ऑपइंडिया ने इस खबर को उसी दिन उठाया। उसके बाद इससे जुड़ी और बातें सामने आई कि आरोपितों ने न सिर्फ ऐसा जघन्य अपराध किया बल्कि उस कुकृत्य की विडियो बनाते रहे, वो बच्ची उन्हें पहचानती थी और बार-बार विडियो में ‘भैया आप तो मुझे जानते हो, अल्लाह का वास्ता मुझे छोड़ दो’ कह कर गिड़गिड़ाती रही।

वो खबर जिस पर फेसबुक अपना रहा है दोहरा रवैया

आदिल, जो कि ‘छोटका’ और ‘आतंकवादी’ जैसे उपनामों से जाना जाता है, अपने एक साथी नाजिक और एक अज्ञात लड़के के साथ इस अपराध में शामिल था। फिर खबर आई कि आदिल को एक मजार में पुलिस ने पकड़ लिया। नाजिक पहले ही पकड़ा जा चुका था, एक अभी भी फरार है। पुलिस को इस त्वरित कार्रवाई के लिए धन्यवाद।

अब बात आती है कि ऐसी खबरों को फेसबुक ‘कम्यूनिटी गाइडलाइन्स’ का हवाला दे कर न सिर्फ डिलीट करता है, बल्कि शेयर करने वालों के अकाउंट सस्पैंड कर देता है। ऑपइंडिया ने इस खबर को पोर्टल पर लगाने के बाद फेसबुक पेज के जरिए शेयर किया, जिसका स्क्रीनशॉट आप देख सकते हैं। हेडलाइन में कोई ऐसी बात नहीं है जो बनाई गई हो, घृणा फैलाने की मंशा दिखाती हो, या पत्रकारिता की स्वनिर्धारित नीतियों के खिलाफ हो।

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इसी फेसबुक पर ‘जय श्री राम’ और ‘वह चिल्लाती रही कि भगवान के नाम पर छोड़ दो’ ऐसे हेडलाइन वाली खबरें आपको हमेशा दिख जाएँगी, फिर मुसलमान नामों या ‘अल्लाह का वास्ता’ जैसी बातों पर फेसबुक इतना संवेदनशील कैसे हो जाता है? ये तो स्पष्ट तौर पर मुसलमान अपराधियों को बचाने जैसा है।

जब हमने फेसबुक से बात करने की कोशिश की तो बताया गया कि शायद हमारी इमेज में कुछ समस्या है! जबकि आप तस्वीर को देखें तो वहाँ आरोपित का चेहरा दिख रहा है, लड़की को पूरी तरह से धुँधला किया गया है, और सिवाय इसके उसके कपड़े का रंग पीला है, आप न तो यह कह सकते हैं कि यहाँ कुछ हिंसक दृश्य है, या घृणा फैलाने की बात। जब तस्वीरों से लोग मतलब निकालते हैं, तो फिर ऐसी खबरों में कौन सी तस्वीर लगाई जाए?

क्या एक सहमी सी लड़की को कोने में बिठा कर ही ऐसे जघन्य अपराधों की प्रस्तुति की जाए? क्या इस तस्वीर को देख कर बलात्कार जैसे अपराध की जघन्यता कम हो जाती है, या ज्यादा हो जाती है? इससे घृणा कैसे फैल रही है, या ये डिस्टर्बिंग कैसे है? शायद अब से हर बलात्कार की खबर पर फेसबुक का ही लोगो लगाया जाए, तब वो न्यूट्रल होगा, किसी के खिलाफ नहीं होगा।

पंद्रह साल की बच्ची का बलात्कार कर रहे हैं दरिंदे और ये खबर फेसबुक की कम्यूनिटी गाइडलाइन्स के खिलाफ है! साथ ही, ये लोग कभी भी आपको सटीक कारण नहीं बताते। आपको ‘कम्यूनिटी गाइडलाइन’ का लिंक थमा दिया जाता है, आप खोजते रहिए कि कौन से अनुच्छेद का कौन सा सब-सेक्शन आपने तोड़ा है।

फिर भी, आप कोशिश करते हैं, अपने स्तर से समझना चाहते हैं कि किस बात पर नाराज हैं फेसबुक वाले। घूम-फिर कर, आपको सिवाय इस बात के कि त्रिशूल पर कंडोम लगा दो, हिन्दू देवी की योनि में कुछ लगा दो, हिन्दुओं के देवताओं को अश्लील तरीके से दिखाओ, आप अगर मुसलमान नाम या ‘अल्लाह’ लिख रहे हैं तो इन्हें स्थानविशेष में दर्द होने लगता है।

हिन्दू धर्म और हिन्दूविरोध धड़ल्ले से चल रहा है फेसबुक पर, गंदी गालियाँ, शिवलिंग पर पेशाब करने की बातें, मंदिरों को तोड़ने की बातें, भगवान हनुमान की तस्वीर पर जूते मारते लोगों की खबरें, ये इनके कम्यूनिटी गाइडलाइन्स के किसी अनुच्छेद, सेक्शन, सब-सेक्शन, वाक्य, शब्द, विचार, किसी चीज को किसी हिस्से को वायलेट नहीं करती।

तब आदमी सोचने लगता है कि इनकी कम्यूनिटी क्या चौदहवीं शताब्दी के इस्लामी लुटेरों की है, या उनके डीएनए लिए लोग वहाँ बैठे हैं जो ऐसी नीतियाँ बनाते हैं जहाँ हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं का मजाक बनाना, अश्लीलता से प्रदर्शित करना सही हो जाता है, लेकिन मुसलमान नाम वाले किसी पंद्रह साल की बच्ची का बलात्कार करें, विडियो बनाएँ, तो इन्हें मरोड़ें उठती हैं!

फेसबुक हो या यूट्यूब, ये लोग हमेशा कम्यूनिटी गाइडलाइन्स के कंबल तले आपस में कूची-कूची-कू करते रहते हैं। ये लोग अघोषित तौर पर चाहते हैं कि मुसलमानों के अपराधों को ‘राम (बदला हुआ नाम)’ के शाब्दिक जाल में उलझा कर लिखा जाए ताकि एक समुदाय की भावनाएँ आहत न हों। जबकि, कोई समुदाय, हिन्दू या मुसलमान, किसी बलात्कारी के नाम लिखने से आहत होता है, तो लानत है ऐसे समुदाय पर। ऐसे लोगों को हथेली पर थूक कर, नाक डुबा कर डूब मरना चाहिए।

कौन करता है ऐसे कांड: कम्प्यूटर या आदमी?

इसी से जुड़ी दूसरी बात इस शक को गहरा करती है कि सब कुछ कम्प्यूटर या एल्गोरिदम से नहीं होता, शायद कुछ लोग, कुछ संस्थानों को टार्गेट करने में व्यस्त रहते हैं। इसी खबर को हमने पेज पर शेयर किया तो थोड़ी देर में फेसबुक का संदेश आ गया कि हमने कम्यूनिटी गाइडलाइन्स को तोड़ा है। आप अपील भी नहीं कर सकते ऐसे मामलों में जबकि आम तौर पर अपील करने के लिए ‘डीटेल्स’ नाम का एक बटन होता है। वो बटन इन्होंने इस मामले में बंद कर रखा था।

जाहिर सी बात है कि इस पर आप जानना चाहेंगे कि हुआ क्या है। हमने फेसबुक से बात करने के लिए मेल किया तो बताया गया कि हमें अपील करना चाहिए, और यह भी कि हेडलाइन को ऐसे नहीं लिखना चाहिए। मैं एक एडिटर हूँ मीडिया इंडस्ट्री का और मुझे फेसबुक में काम करने वाले लोग बता रहे हैं, जिनका पत्रकारिता का अनुभव शून्य है, कि हम हेडलाइन कैसे रखें!

वो शायद चाहते हैं कि ये हेडलाइन ऐसे होती: ‘लड़की के साथ कुछ लोगों ने कुछ किया, पुलिस कुछ कर रही है’। भीतर में हम ये लिखते कि पंद्रह साल की लड़की कहीं गई थी, उसे ‘राम, श्याम और कन्हैया (तीनों नाम बदले हुए), कहीं ले गए और उसके साथ बहुत गलत किया। आप बदले हुए नाम कभी भी ‘सलीम-राशिद-परवेज’ देखे हैं? क्योंकि मुसलमान अपराधियों को मीडिया ने हमेशा ‘समुदाय विशेष’ के नाम पर ढका है, और उनके नामों को हिन्दू नामों से।

समस्या यह नहीं है कि मुसलमानों का नाम लिखना क्यों जरूरी है। समस्या यह है कि हिन्दुओं का नाम लिखना अगर प्रचलन में है, मुसलमानों के अपराध का भी बोझ जब मीडिया हिन्दू नामों पर डालती है, तो फिर मुसलमान नाम लिखने में क्या हर्ज है? क्या कोर्ट ने ऐसा करने से मना किया है?

जब पेज से पोस्ट डिलीट किया गया और कहा गया कि अब आपके पेज की पहुँच घटा दी जाएगी, तो मैंने मेल किया कि जब यही खबर पेज पर है जो कम्यूनिटी गाइडलाइन्स तोड़ती दिखती है, जो कि कोई कम्प्यूटर तय करता है, या निष्पक्ष लोग तय करते हैं, तो फिर यही खबर तीस हजार लोगों द्वारा फेसबुक पर ही पढ़ी और शेयर की गई, वो वहाँ कैसे है? डिलीट तो हर पोस्ट को करना चाहिए। तो इन्होंने आठ घंटे बाद, मेरा निजी अकाउंट सस्पैंड कर दिया क्योंकि मैंने वो पोस्ट शेयर किया था। मतलब ऑटोमेटिक तो नहीं है कुछ भी। मैंने जब खुद ही बताया कि मैंने शेयर किया है, तब मेरा अकाउंट सस्पैंड हो जाता है। शायद इतना कम नहीं था कि किसी ने ट्विटर पर भी मेरे उस ट्वीट को रिपोर्ट किया लेकिन ट्विटर ने मुझे बताया कि इसमें कोई समस्या नहीं।

वही खबर, ट्विटर के लिए सही है, फेसबुक के लिए गलत है

सवाल यह कि मुसलमानों के अपराधी होने पर फेसबुक की इतनी क्यों जलती है कि बदबू हर तरफ फैल जाती है? ऐसा क्या है मुसलमानों में कि उनके द्वारा किए गए ऐसे जघन्य अपराध किसी राम के नाम लिख दिए जाएँ? क्या फेसबुक मुसलमान बलात्कारियों का समर्थक है? क्या फेसबुक की कम्यूनिटी गाइडलाइन्स किसी खास किताब के उन हिस्सों को तो शामिल नहीं करती जहाँ काफिरों का बलात्कार जायज बताया गया हो?

अगर ऐसा है तो फिर कम्यूनिटी गाइडलाइन्स का हवाला देने की बजाय यही कह दिया जाए कि हमारी गाइडलाइन्स तो आसमान से उतरी है और जुकरबर्ग को समय-समय पर हवाई आईलैंड की गुफा में मिलती रही है। इसलिए, हम तो हिन्दुओं के देवी-देवताओं पर किए गए अश्लील कमेंट्स, पोस्ट्स, टिप्पणियाँ फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन के नाम पर जाने देंगे लेकिन मुसलमानों के बलात्कार करने पर, तथ्यात्मक खबरों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा क्योंकि वो फेसबुक की इस गाइडलाइन्स के खिलाफ जाता है।

मतलब ये प्लेटफॉर्म कमाएँ लेकिन सेेसरशिप के नाम पर आपको चूना लगाएँ

फैसला आपको करना है कि यहाँ क्या हो रहा है। यूट्यूब पर आप कुछ भी पोलिटिकल बोलिए, ‘वामपंथी’ शब्द लिख दीजिए और आपका विडियो अपलोड होने से पहले ही ‘पीला डॉलर’ चिह्न दिखाने लगता है, मतलब ये एडवर्टाइजर फ्रेंडली नहीं है। आप रिव्यू के लिए उसे डालते हैं। इसके लिए उन्हें सात दिन चाहिए। दो दिन बाद आपका विडियो अडवर्टाइजर फ्रेंडली हो जाता है, और ‘डॉलर’ फिर से हरा दिखने लगता है। लेकिन तब तक आपने दो और विडियो डाल दिया, उस प्रतिबंधित विडियो पर जो व्यू आना था, पहले दो दिन में आ गया। आपके पैसे उसमें गायब हो गए। बाद में हरा हो जाए, या लाल, आपको कोई फायदा नहीं हुआ।

फेसबुक हमारा डेटा लेता है, हमारी पसंद-नापसंद, हमारी तस्वीरों को, हमारे लेखों को, लिखने के तरीके को, हमारे कहीं आने-जाने को, हर बात को अपने डेटा सेंटर में रखता है। ये डेटा वो किसी पोलिटिकल पार्टी को बेचता है, किसी फूड चेन को, कपड़े की कम्पनी को, कॉस्मेटिक्स बनाने वाले को, बैंकों को, किसी को भी बेचता है।

इसलिए, कोई यह नहीं कह सकता कि तुम देते क्या हो? या यह कि, वो प्राइवेट कम्पनी है, वो अपनी नीतियाँ तय कर सकती है। बिलकुल तय कर सकती है, अगर वो अपने उपभोक्ताओं से डेटा लेना बंद कर दे। हम इस कम्पनी को भुगतान कर रहे हैं, और वो हमारे लिए उत्तरदायी है क्योंकि जब इसके मालिक लम्बी-लम्बी छोड़ते हैं, और दुनिया बदलने की बातें करते हैं, तब उनके लिए यही उपभोक्ता एक टूल की तरह काम करते हैं।

यही कम्पनियाँ अपनी करतूतों से किसी देश में सत्ता परिवर्तन कराने की फिराक में रहती हैं, और कहीं ‘ऑर्गेनिक ट्रेंड’ के नाम पर अपने मालिक की विचारधारा को न्यूज ट्रेंड वाले सेक्शन में सबसे ऊपर दिखाती है। वहाँ वैसी खबरों को जगह दी जाती थी जो किसी विचारधारा, पार्टी या व्यक्ति के खिलाफ हों।

इसलिए, फेसबुक को अपना दोगलापन त्याग कर, दुनिया को यह बात साफ शब्दों में बताना चाहिए कि वो मुसलमान बलात्कारियों की तरफदारी क्यों कर रहा है? फेसबुक को बताना चाहिए कि क्या फेसबुक पर शरियत के हिसाब से चलते हुए खबरें शेयर होनी चाहिए? फेसबुक को खुल कर कहना चाहिए कि क्या किसी मीडिया संस्थान को मक्का की तरफ सर करके, हर पोस्ट लिखने से पहले नमाज भी पढ़ना ज़रूरी है? फेसबुक को बताना चाहिए कि क्या अब पत्रकारिता भी ‘हलाल सर्टिफ़ाइड’ होनी चाहिए?

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अजीत भारतीhttp://www.ajeetbharti.com
सम्पादक (ऑपइंडिया) | लेखक (बकर पुराण, घर वापसी, There Will Be No Love)

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