Friday, March 5, 2021
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‘हिटलर दीदी’ के वो सब कारनामे जो बताते हैं कि लोकतंत्र की हत्या बंगाल में कब और कहाँ-कहाँ हुई

यह सब ममता बनर्जी के बंगाल से वो किस्से हैं, जो मीडिया के द्वारा किसी ना किसी रूप में सामने आते रहे हैं। आश्चर्यजनक बात यह है कि इसके बाद भी वह निरंतर केंद्र सरकार पर ही लोकतंत्र की हत्या करने से जैसे जुमलों का प्रयोग करती आई हैं।

पश्चिम बंगाल को ‘अपना इलाका’ साबित करने के लिए वहाँ की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हमेशा की तरह ही तानाशाही तरीका अपनाया है। बात चाहे COVID-19 वायरस के दौरान जारी देशव्यापी बंद में केंद्र की दक्षिणपंथी सरकार की नीतियों पर अमल करने की हो या फिर हिन्दुओं के साथ होने वाले अत्याचारों पर चुप्पी साधने की हो, ममता बनर्जी ने हमेशा मुस्लिम तुष्टिकरण के जरिए सिर्फ अपनी व्यक्तिगत राजनीति को ही ध्येय बनाकर कार्य किया है।

ममता बनर्जी 2011 से लगातार पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री के पद पर बनी हुई हैं, लेकिन 2014 से उन्हें पश्चिम बंगाल पर शासन करने में खासा समस्याएँ हुई हैं। कभी वह अपने किसी अधिकारी के लिए धरने पर बैठ जाती हैं तो कभी आम जनता के ‘जय श्री राम’ कहने भर से नाराज होकर उन पर कार्रवाई कर बैठती हैं।

हर दूसरी बात पर संविधान बचाने के नारे देने वाली यह वही ममता बनर्जी हैं, जिन्होंने वर्ष 1975 में इंदिरा गाँधी के साथ खड़े होकर जय प्रकाश नारायण की गाड़ी का घेराव कर लिया था और गाड़ी के बोनट पर चढ़कर उनका कलकत्ता पहुँचने पर कॉन्ग्रेस के अन्य कार्यकर्ताओं के साथ ज़बरदस्त विरोध किया था।

वर्ष 2019 में बंगाल में इस तरह की हत्याएँ सर्वाधिक देखीं गईं, लेकिन ममता बनर्जी ने इसे कभी भी चिन्ता का विषय नहीं माना। ममता बनर्जी के तानाशाही रवैए के कुछ बड़े कांडों पर एक नजर:

1- बंगाल में हिन्दू कार्यकर्ताओं की हत्या

समय के साथ पश्चिम बंगाल में हिन्दू कार्यकर्ताओं और भाजपा नेताओं की हत्या बेहद आम बात होती जा रही हैं। TMC के गुंडों का यह आतंकी अभियान गत वर्ष आम चुनाव से पहले अपने चरम पर देखा गया। लेकिन ममता बनर्जी ने इस मामले पर एक भी शब्द बोलना कभी स्वीकार नहीं किया।

बंगाल में हिन्दू कार्यकर्ताओं की हत्या से लेकर भाजपा नेताओं तक को टीएमसी की गुंडागिर्दी का शिकार होना पड़ा है, ऐसे में जब भी केंद्र ने हस्तक्षेप की कोशिश की तो ममता बनर्जी ने उन पर फैसलों को थोपने का आरोप लगाकर पल्ला झाड़ा है। ऐसी ही कई अन्य हत्याएँ बंगाल में निरंतर होती रहीं जिन्हें मीडिया द्वारा राजनीतिक हत्या की संज्ञा देकर भुला दिया गया। अक्टूबर 2019 में बंगाल के नदिया जिले में 50 वर्षीय भाजपा नेता हरलाल देबनाथ की गोली मारकर हत्या कर दी गई।

2- जय श्री राम बोलने वालों की हत्या और गिरफ्तारी

ममता बनर्जी ने ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने वालों को अपना सबसे बड़ा दुश्मन देखा है। उनकी यह बौखलाहट 2019 के आम चुनाव में भाजपा की भारी जीत के बाद सर्वाधिक देखी गई। मई 30, 2019 को ममता बनर्जी के काफिले के सामने ‘जय श्री राम’ का नारा देने वाले लोगों पर न केवल ममता बनर्जी भड़की थी, बल्कि गाड़ी रोक कर उन पर गाली-गलौज देने का आरोप लगाते हुए उन्हें गिरफ्तार भी करवा दिया गया था।

इसके बाद एक अन्य घटना में अक्टूबर 2019 को एक भाजपा कार्यकर्ता को TMC के गुंडों ने सिर्फ इस कारण गोली मार दी क्योंकि वह केंद्र सरकार की उपलब्धियों का जिक्र करता रहा था और ‘जय श्रीराम’ भी कह रहा था। ये बात टीएमसी कार्यकर्ताओं को पसंद नहीं थी।

3- CBI-शारदा चिट फंड घोटाला और ममता बनर्जी का धरना

सीबीआई बनाम कोलकाता पुलिस ममता बनर्जी सरकार का सबसे नाटकीय घटनाक्रमों में से एक अध्याय है। सीबीआई के कई अधिकारी सारदा चिटफंड घोटाले से संबंधित पूछताछ के लिए राजीव कुमार के घर पहुँचे थे, लेकिन जब पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार के पास सीबीआई पहुँची तो ममता बनर्जी धरने पर बैठ गईं। इस पर बीजेपी ने सवाल भी उठाए कि आखिर राजीव कुमार के पास ऐसे कौन से राज हैं, जिन पर पर्दा डालने के लिए ममता बनर्जी सड़क पर उतर आई? लेकिन जवाब की जगह पर ममता बनर्जी ने धरने को जारी रखा।

ममता बनर्जी की भूली-बिसरी यादें

इसके बाद सीबीआई और कोलकाता पुलिस आमने-सामने हो गई और फिर बीच सड़क पर हाथापाई के बाद पुलिस ने सीबीआई अफसरों को कुछ देर के लिए हिरासत में भी ले लिया। इसके तुरंत बाद ममता बनर्जी ने राजीव कुमार के घर जाकर धरने का ऐलान कर दिया। ममता बनर्जी ने धरना स्थल पर ही अपनी कैबिनेट की बैठक की और वहाँ पुलिस वीरता पुरस्कार भी बाँटे और लगे हाथ केंद्र सरकार पर लोकतंत्र की हत्या का आरोप लगाया।

4- आईपीएस ऑफिसर की आत्महत्या

पश्चिम बंगाल कैडर के एक सेवानिवृत्त भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारी ने आत्महत्या कर ली थी, उन्होंने सुसाइड नोट में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर उकसाए जाने का आरोप लगाया और आत्महत्या के लिए ममता बनर्जी को ज़िम्मेदार ठहराया। आईपीएस अधिकारी गौरव ने अपने सुसाइड नोट में लिखा कि उनके सुसाइड करने के पीछे पश्चिम बंगाल की वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ज़िम्मेदार हैं।

5- नागरिकता कानून (CAA) को लेकर बंगाल में TMC का आतंक

तृणमूल कॉन्ग्रेस के ब्लॉक प्रमुख ताहिरुद्दीन शेख का काफिला वहाँ पहुँचा और उसमें शामिल लोगों ने प्रदर्शनकारियों पर गोली चला दी। इस गोलीबारी में 2 लोग मारे गए और 3 घायल हुए।

6- CAA विरोध में विज्ञापन

ममता बनर्जी ने टीवी चैनलों पर नागरिकता कानून और NRC नहीं लागू करने का विज्ञापन दिया था। ममता बनर्जी खुद यह कहते हुए दिखीं कि बंगाल के लोगों को चिंता नहीं करनी चाहिए क्योंकि राज्य में NRC और नागरिकता संशोधन कानून लागू नहीं होगा।

7- नीति आयोग की बैठक से दीदी गायब

2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजों ने ममता बनर्जी को खासा मानसिक कष्ट दिया। जून 2019 को ममता बनर्जी ने नीति आयोग की बैठक में शामिल होने से यह कहकर मना कर दिया कि नीति आयोग के पास कोई वित्तीय अधिकार नहीं है और ऐसे में इन बैठकों में भाग लेने से कोई फायदा नहीं है। बताना आवश्यक है कि मोदी सरकार के पिछले कार्य काल में भी ममता ऐसे बैठकों से दूर रहती थी। इस बार वह चुनाव जीतने के बाद पीएम मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में भी नहीं गई।

8- कोरोना महामारी के दौरान राज्यपाल से झड़प

ममता बनर्जी ने देशव्यापी लॉकडाउन के बावजूद भी सिर्फ केंद्र सरकार से टकराव और मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए ममता बनर्जी ने निरंतर नियमों की अवहेलना की और इसके लिए मुस्लिमों को उकसाया भी। सोशल डिस्टेंस के नाम पर मस्जिदों को खुला रखा जा रहा है और कुछ विशेष बाजारों, जहाँ पर मुस्लिम बहुलता है, उन्हें खुला रखा गया।

आखिरकार गृह मंत्रालय को पश्चिम बंगाल को पत्र लिखकर इस पर कार्रवाई करने की बात कहनी पड़ी। हालाँकि, उसके बावजूद भी कुछ ख़ास असर नजर नहीं आया। इसके बाद कोरोना वायरस से लड़ाई को भी ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार से जंग में तब्दील कर दिया है और अब ममता बनर्जी एक तानाशाही तरीकों का शिकार बंगाल के राज्यपाल को बनाया जा रहा है।

ममता बनर्जी को लोकतंत्र और संविधान की कितनी परवाह है, इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ममता बनर्जी ने उस हर मौके पर राज्यपाल का विरोध किया है, जब उन्हें लगा कि वे सरकार के कामकाज में अनावश्यक हस्तक्षेप कर रहे हैं। बात चाहे एम के नारायणन की हो, केशरीनाथ त्रिपाठी की, या अब जगदीप धनकर की। जब भी उन्हें लगा कि उनके ‘अधिकारों’ पर हमले हो रहे हैं, उन्होंने राज्यपालों को उनकी सीमाओं में रहने की नसीहत दी है।

ममता बनर्जी आजकल अपने इस कर्तव्य का निर्वाह कोरोना वायरस को जरिया बनाकर कर रही हैं। राज्यपाल ने उन्हें कोरोना वायरस की महामारी के दौरान मुस्लिम तुष्टिकरण को छोड़कर आवश्यक फैसले लेने की सलाह देने पर ममता बनर्जी ने राज्यपाल को सात पन्ने का एक पत्र लिखा। जिसमें बेहद बदसलूकी के साथ कहा गया है कि राज्यपाल धनखड़ भूल गए हैं कि वह (ममता) एक गौरवशाली भारतीय राज्य की निर्वाचित मुख्यमंत्री हैं, जबकि वह नियुक्त किए गए हैं।

यह सब ममता बनर्जी के बंगाल से वो किस्से हैं, जो मीडिया के द्वारा किसी ना किसी रूप में सामने आते रहे हैं। आश्चर्यजनक बात यह है कि इसके बाद भी वह निरंतर केंद्र सरकार पर ही लोकतंत्र की हत्या करने से जैसे जुमलों का प्रयोग करती आई हैं।

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आशीष नौटियाल
पहाड़ी By Birth, PUN-डित By choice

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