जयशंकर ने तो केवल पटेल का नाम लिया है। फेहरिस्त लंबी है जिन्हें नेहरू पसंद नहीं करते थे। कथित इतिहासकार गुहा से लेकर कॉन्ग्रेसी-वामपंथी इन ऐतिहासिक तथ्यों को झुठला नहीं सकते।
विधु विनोद चोपड़ा ने कश्मीरी पंडितों का दर्द दिखाने के नाम पर 'शिकारा' बनाई। लेकिन, फिल्म में मुस्लिमों के अत्याचार को छिपा लिया और प्रेम-कहानी पर जोर दिया। इसके खिलाफ आवाज उठाने वालों को अब गदहा बता वे झूठे आँकड़े गिना रहे हैं।
3 सालों में 450 यहाँ गर्भवती महिलाओं को भर्ती किया गया। लेकिन सिर्फ़ 170 बच्चों का ही रिकॉर्ड दर्ज है। बाकी 280 शिशुओं के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। उनका क्या हुआ?
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने फर्जी इतिहासकार रामचंद्र गुहा के इस आरोप का करारा जवाब दिया। उन्होंने कहा कि कुछ विदेश मंत्री ढेर सारी किताबें पढ़ते हैं और प्रोफेसरों के लिए भी ये अच्छी आदत हो सकती है। उन्होंने गुहा को सलाह दी कि वो नारायणी बसु द्वारा लिखित वीपी मेनन की जीवनी पढ़ें।
कोटा और बीरभूम में मुस्लिम महिलाओं को CAA विरोधी भीड़ ने पीटा क्योंकि वो सर्वे कर रही थीं। योगेंद्र यादव सरीखे बुद्धिजीवी ही इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार होते हैं, जो CAA और NRC पर मीठा बोल के लोगों को भड़का रहे हैं। योगेंद्र यादव के ताज़ा वीडियो में उनके ताबड़तोड़ झूठ की पोल-खोल।
विचारधारा के आधार पर लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। इसके कारण संपादकीय टीम में एक डर का माहौल है। जो लोग भी बीजेपी के समर्थक समझे जाते हैं उनमें से ज़्यादातर ने सोशल मीडिया पर कुछ भी लिखना बंद कर दिया है। जबकि वामपंथी, कॉन्ग्रेसी और आम आदमी पार्टी समर्थक माने जाने वालों पर ऐसी कोई पाबंदी लागू नहीं है।
शिवाजी की प्रतिमा को जेसीबी से हटाने की घटना सौंसर में मोहगाँव तिराहे की है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस घटना को लेकर कॉन्ग्रेस सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने पूछा कि क्या छत्रपति शिवाजी महाराज को अपना आदर्श मानने वाली शिवसेना ये अपमान सह पाएगी?
मोदी मैजिक पर सवार होकर आए पीके को अब तक जो एकमात्र मुश्किल मोर्चा मिला है उस पर वे बुरी तरह नाकाम रहे। सो, यह देखना दिलचस्प होगा कि वे सियासी महत्वाकांक्षाओं को पूरा कर पाएँगे या फिर ब्रांडिंग की दुनिया के रामविलास' बनकर ही रह जाएँगे।
शीर्ष नेतृत्व की मोदी घृणा ने कॉन्ग्रेस को इतना कुंठित कर दिया है कि वह राजनीति के सामान्य तकाजे से भी दूर जा चुकी है। इस नियति को उसने खुद चुना है। अतीत के अनुभवों से नहीं सीखा। न ही यह याद रख पाई कि दिल्ली की सत्ता में AAP उसे बेदखल कर आई थी न कि BJP को।
मुफ्त में चीजें देने के बल पर राजनीति हर जगह नहीं चल सकती। ये ट्रेंड दक्षिण भारत से चला लेकिन आज वहीं फेल हो रहा है। ये चुनाव विकास के मुद्दे पर नहीं लड़ा गया, ये स्पष्ट है। फिर मुद्दे क्या थे? जब चुनाव में कोई बड़ा चेहरा आता है, तो दिल्ली उस पर भरोसा जताती है।