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‘हाइड्रोजन बम’ फोड़ने के लिए जिस बबीता को लेकर आए राहुल गाँधी, ऑपइंडिया की पड़ताल में उससे जुड़े दावे निकले झूठे: 2 जगह वोटर, काटने के लिए खुद दिया आवेदन

राहुल गाँधी ने चुनाव आयोग के खिलाफ ‘हाइड्रोजन बम’ फोड़ने की बात कही थी। राहुल ने कर्नाटक के आलंद विधानसभा क्षेत्र में वोटर लिस्ट से लोगों नाम कटने के गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने एक महिला वोटर बबीता का नाम लिया और दावा किया कि उसका नाम गलत तरीके से हटा दिया गया। लेकिन चुनाव आयोग ने इन आरोपों को पूरी तरह बेबुनियाद बताते हुए खंडन किया है। ऑपइंडिया ने इस मामले की तहकीकात की, जिसमें राहुल गाँधी के दावों की हवा निकलती दिख रही है।

राहुल गाँधी ने बबीता का नाम वोटर लिस्ट से हटाने का दावा किया था लेकिन उस बबीता का नाम वोटर लिस्ट में अभी भी मौजूद है। आलंद विधानसभा सीट के सरसंबा बूथ पर बबीता चौधरी का नाम हमें वोटर लिस्ट में मिला।

BLO यानी बूथ लेवल ऑफिसर ने OpIndia को फोन पर बताया कि बबीता का नाम दो जगह दर्ज है – एक कर्नाटक के गुलबर्ग में और दूसरी आलंद में। गुलबर्ग वाले पते पर जाँच की गई तो पता चला कि बबीता ने खुद ही नाम कटवाने का फॉर्म भरा था।

चुनाव आयोग ने साफ कहा कि ऑनलाइन किसी का वोट हटाना नामुमकिन है। हर वोटर को नाम हटाने से पहले सुनवाई का मौका दिया जाता है। 2023 में आलंद में वोट कटाने की कुछ कोशिशें हुईं थीं, लेकिन वो असफल रहीं। आयोग ने खुद ही इस पर FIR दर्ज कराई और जाँच चल रही है।

आयोग ने करीब 5700 नंबर्स का डेटा कर्नाटक CID को दे दिया था। इनमें से 9 नंबर्स ट्रेस हो चुके हैं, जो महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश से जुड़े हैं।

राहुल गाँधी ने 2022 में 6000 वोट कटने का दावा किया, लेकिन हकीकत ये है कि 2018 में उसी सीट पर BJP सिर्फ 700 वोटों से जीती थी। 2023 में कॉन्ग्रेस 9000 वोटों से धमाकेदार जीत हासिल की। अगर राहुल का दावा सही होता तो कॉन्ग्रेस को 6700 वोटों से हारना पड़ता, लेकिन 30 साल बाद वो सीट जीत ली। ये आँकड़े ही राहुल के दावों की हवा निकाल देते हैं।

वोट लिस्ट से कैसे कटता है नाम?

फॉर्म 7 के माध्यम से किसी का नाम हटाने की अपील की जाती है। बाकायदा फॉर्म में जानकारी भरी होती है। उसकी जाँच आखिर में बीएलओ के पास जाती है। जिसमें बीएलओ इसकी जाँच करता है। इसके बाद एसडीओ के पास मामला जाएगा। इसकी सुनवाई होगी। दस्तावेज जमा किए जाएँगे, इसकी जाँच की जाएगी। व्यक्ति से कारण पूछा जाएगा, इसके बाद नाम काटा जाएगा।

राहुल गाँधी ने जो फॉर्म दिखाए, उसमें बीएलओ का हिस्सा ही नहीं है। बीएलओ की जाँच के बाद ही मामला एसडीओ के पास जाता है, ऐसे में राहुल गाँधी ने सिर्फ फॉर्म भरे हुए ही दिखाए, एक्शन क्या हुआ, ये बताया ही नहीं।

चूँकि चुनाव आयोग ने साफ कहा है कि 2023 में आलंद में 6,018 फॉर्म-7 आवेदनों में से सिर्फ 24 वैध थे, बाकी 5,994 फर्जी थे। इनकी जाँच के बाद फरवरी 2023 में ही FIR दर्ज हुई और 6 सितंबर 2023 को कलबुर्गी पुलिस को ऑब्जेक्टर का नाम, मोबाइल नंबर, आईपी एड्रेस और फॉर्म डिटेल्स सौंप दी गईं।

इस मामले को वीडियो के इस जरिए समझ सकते हैं।

आयोग ने ये भी कहा कि चुनाव नतीजों पर आपत्ति हो तो 45 दिनों में हाईकोर्ट में याचिका डाल सकते हैं, लेकिन किसी विपक्षी नेता ने ऐसा नहीं किया। कॉन्ग्रेस ने ज्यादातर मामलों में औपचारिक शिकायत तक नहीं की। ये सब राजनीतिक रणनीति लगती है, जिसका मकसद लोगों को भड़काना और आयोग पर दबाव डालना है।

राहुल ऐसे लोगों को आगे ला रहे हैं जिनके नाम कटाने की कोशिश हुई, लेकिन नाम नहीं कटा। इससे साफ है कि ये अर्धसत्य हैं, पूरी सच्चाई नहीं। आयोग हर बार तथ्यों और रिकॉर्ड के साथ जवाब दे रहा है। 18 पत्र लिखे गए, 18 महीने बीत चुके, लेकिन कॉन्ग्रेस चुप। कुल मिलाकर राहुल का ‘हाइड्रोजन बॉम्ब’ दावा फुस्स साबित हो गया।

क्या राहुल गाँधी के हडसन सेमिनार के पीछे था कतर राजदूत का हाथ: जानें 2023 के दौरे पर 2 साल बाद क्यों उठे सवाल, हिंदू विरोधी सुनीता विश्वनाथ भी हुई थी शामिल

हाल ही में एक वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हुई है। यह बातचीत प्रोफेसर मुक्तेदार खान और डॉ कमर चीमा के बीच हुई थी। मुक्तेदार खान एक भारतीय-अमेरिकी प्रोफेसर हैं। वह इस्लाम और अंतरराष्ट्रीय मामलों पर अपनी समझ के लिए जाने जाते हैं। वहीं, कमर चीमा पाकिस्तान के एक रणनीतिक विश्लेषक हैं। इस बातचीत में राहुल गाँधी की 2023 की अमेरिका यात्रा का जिक्र हुआ। इसमें कुछ ऐसी बातें सामने आईं जो अब तक कम ही लोगों को पता थीं। इस क्लिप ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति और राजनयिक संबंधों पर नई बहस छेड़ दी है।

सोशल मीडिया पर एक वीडियो बहुत वायरल हो रहा है। इसमें दो लोग आपस में बात कर रहे हैं। यह वीडियो भारतीय अधिकारियों के लिए चिंता का विषय है। इसमें प्रोफेसर मुक़्तदर खान ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। मुक़्तदर खान ने बताया कि राहुल गाँधी की 2023 की अमेरिका यात्रा के दौरान एक खास कार्यक्रम हुआ था। यह कार्यक्रम वाशिंगटन डीसी के हडसन इंस्टीट्यूट में हुआ। इसे कतर के राजदूत ने आयोजित किया था। उनका नाम शेख मेशाल बिन हमद अल-थानी है।

मुक़्तदर खान ने यह बात पाकिस्तानी कमेंटेटर कमर चीमा से कही। खान ने याद किया कि जब वे उस जगह पहुँचे तो गेट बंद मिले। इसकी वजह यह थी कि वहाँ राहुल गाँधी का एक सेमिनार चल रहा था। जब मुक़्तदर खान बाहर इंतजार कर रहे थे, तभी एक बड़ी गाड़ी आई। एक आदमी उसमें से उतरा। उसने भी अंदर जाने की कोशिश की। फिर दोनों को एक साथ अंदर जाने दिया गया।

अंदर जाकर उस आदमी ने खुद के बारे में बताया। वह अमेरिका में कतर का राजदूत था। उसका नाम शेख मेशाल बिन हमद अल-थानी था। उसने मुक़्तदर खान को एक हैरान करने वाली बात बताई। उसने कहा कि राहुल गाँधी का सेमिनार उसी ने आयोजित किया था।

जून 2023 में राहुल गाँधी 10 दिन के लिए अमेरिका गए थे। यह यात्रा प्रधानमंत्री मोदी की अमेरिका यात्रा से ठीक पहले हुई थी। गाँधी की इस यात्रा ने कई लोगों को हैरान कर दिया था। अब इस घटना के बारे में जो बातें सामने आई हैं, वे बहुत चौंकाने वाली हैं।

राहुल गाँधी और भारत-विरोधी सुनीता विश्वनाथ की एकसाथ तस्वीर

राहुल गाँधी की हडसन इंस्टीट्यूट में सुनीता विश्वनाथ के साथ एक तस्वीर सामने आई है। इस तस्वीर को X (पहले ट्विटर) पर शेयर किया गया था। इस तस्वीर ने कई लोगों को चौंका दिया है। सुनीता विश्वनाथ ‘हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स’ (HFHR) की सह-संस्थापक हैं। यह संस्था भारत-विरोधी विचारों से जुड़ी है।

सुनीता विश्वनाथ का संगठन जॉर्ज सोरोस के ‘ओपन सोसाइटी फाउंडेशन’ से पैसे लेता है। यह संगठन ‘इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल’ (IAMC) जैसे समूहों से भी जुड़ा है। IAMC के संबंध जमात-ए-इस्लामी जैसे आतंकवादी संगठनों से बताए जाते हैं। इससे यह लगता है कि यह मंच भारत की राष्ट्रवादी सोच के खिलाफ है।

सुनीता विश्वनाथ पर लगे हिंदूफोबिया के आरोप

राहुल गाँधी का सुनीता विश्वनाथ के साथ होना एक संयोग नहीं था। सुनीता हिंदू विरोधी विचारों के लिए जानी जाती हैं। वह मुस्लिम समर्थक भी मानी जाती हैं। पिछले साल, उन्होंने जन्माष्टमी पर एक लेख लिखा था। इसमें उन्होंने गाजा में फिलिस्तीनियों के दुख की तुलना महाभारत से की थी। सुनीता विश्वनाथ ने इजराइल को कंस कहा था और हमास के प्रति सहानुभूति दिखाने की कोशिश की। हमास एक आतंकवादी संगठन है। इस तरह सुनीता विश्वनाथ ने हिंदू धर्म का अपमान किया। उन्होंने अपनी बात सही साबित करने के लिए हिंदू धर्म ग्रंथों का गलत इस्तेमाल किया।

सुनीता का संगठन ‘हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स’ (HfHR) है। यह संगठन बार-बार हिंदुओं की छवि खराब करता है। फरवरी 2024 में, इस संगठन ने एक कार्यक्रम किया। इसका नाम ‘जायोनिज्म एंड हिंदू सुप्रीमेसी: पार्टनर्स अगेंस्ट प्लुरलिज्म’ था। इस कार्यक्रम में सुनीता ने हिंदू पहचान को ‘वर्चस्व’ कहा। सुनीता ने हिंदू धर्म को जायोनिज्म से जोड़ा। इस कार्यक्रम में ‘यहूदी वॉयस फॉर पीस’ के लोग भी थे। यह संगठन इजरायल के खिलाफ है।

यह सिर्फ एक घटना नहीं है। HfHR ने पहले भी कई ऐसे काम किए हैं। सुनीता ने ‘डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व’ नाम के कार्यक्रम का समर्थन किया। सुनीता ने CAA और NRC के बारे में गलत जानकारी फैलाकर 2020 के दिल्ली दंगे भड़काए थे। सुनीता ने प्रधानमंत्री मोदी की 2023 की अमेरिका यात्रा के दौरान एक ‘टूलकिट’ भी जारी की थी। इसका मकसद भारत को बदनाम करना था।

एक संगठन जिसका नाम डिसइन्फोलैब है। यह संगठन ऑनलाइन जानकारी पर रिसर्च करता है। डिसइन्फोलैब के मुताबिक, ‘हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स’ (HfHR) नाम का एक संगठन है। इसे 2019 में IAMC और OFMI नाम के समूहों ने बनाया था। ये समूह जमात-ए-इस्लामी नाम के आतंकवादी संगठन से जुड़े हैं। सुनीता विश्वनाथ ने एक और संगठन बनाया था। इसका नाम ‘वुमन फॉर अफगान वुमेन’ है। इसे जॉर्ज सोरोस के ‘ओपन सोसाइटी फाउंडेशन’ से पैसा मिलता है। भारत में, HfHR के X अकाउंट को बंद कर दिया गया है। उस पर हिंदू-विरोधी बातें फैलाने का आरोप था।

साफ शब्दों में कहें तो सुनीता विश्वनाथ ने ना सिर्फ हिंदुओं पर हमले किए, बल्कि भारत को बदनाम किया और इस्लामी समूहों, जॉर्ज सोरोस के साथ मिलकर काम किया। हडसन इंस्टीट्यूट में राहुल गाँधी का उनके साथ बैठना एक संयोग नहीं था। यह मिलीभगत थी।

क्या राहुल गाँधी के पीछे कतर और भारत-विरोधी लॉबी का हाथ है?

इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) ने भारत के खिलाफ बहुत प्रचार किया है। उन्होंने अमेरिका में भारत के खिलाफ बातें फैलाईं। उन्होंने कहा कि भारत में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार हो रहा है। ये बातें नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) पर राहुल गाँधी के बयानों से मिलती हैं।

इस मामले में कतर के राजदूत की भागीदारी हैरान करने वाली है। कतर एक छोटा खाड़ी देश है, लेकिन इसका प्रभाव बहुत ज्यादा है। कतर पर दुनियाभर में इस्लामी समूहों को पैसा देने का आरोप है। हमास का राजनीतिक कार्यालय भी यहीं है। हमास को कई देश आतंकवादी समूह मानते हैं।

राजदूत अल-थानी एक अनुभवी राजनयिक हैं। उन्होंने 2016 में वाशिंगटन में काम शुरू किया था। उस समय सऊदी अरब ने कतर का बहिष्कार किया था। इसका कारण चरमपंथ को कतर का कथित समर्थन था। फिर भी, उन्होंने भारत के एक विपक्षी नेता के लिए कार्यक्रम आयोजित किया। यह समझ से परे है कि ऐसा क्यों हुआ। पर्दे के पीछे क्या चल रहा था, यह एक बड़ा सवाल है।

राहुल गाँधी की 2023 अमेरिका यात्रा: विवादों और एजेंडे की गहरी साजिश

राहुल गाँधी की 2023 की अमेरिका यात्रा पर कई सवाल उठे थे। अब ये बातें उन सवालों को और गहरा कर रही हैं। यह यात्रा प्रवासी भारतीयों और थिंक टैंकों के बीच भाषण देने के रूप में थी, लेकिन इसके दौरान कुछ ऐसे मुद्दे उठे जिनसे विवाद की खुशबू आने लगी। राहुल गाँधी ने कई जगहों पर भाषण दिए, जिनमें नेशनल प्रेस क्लब और स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी भी शामिल हैं।

राहुल गाँधी के भाषणों में वही पुराने शब्द दोहराए गए थे, जैसे हिंदुत्व को शैतान कहना, जिन्ना की मुस्लिम लीग को ‘धर्मनिरपेक्ष’ बताकर उसे सही ठहराना और भाजपा को सांप्रदायिक बता कर कॉन्ग्रेस को शांति का प्रतीक बताना। ये बस गलती नहीं थीं, बल्कि राहुल गाँधी के मेजबानों के एजेंडे से मेल खा रही थीं। हडसन इंस्टीट्यूट में सुनीता विश्वनाथ के साथ राहुल गाँधी ने वही बातें दोहराईं, जिन्हें HfHR और IAMC कई सालों से फैला रहे थे। राहुल गाँधी ने हिंदुत्व को बदनाम किया, CAA और NRC को लेकर डर फैलाया और अडानी समूह के खिलाफ सोरोस द्वारा वित्त पोषित अभियानों से जुड़ गए।

व्हाइट हाउस की गुप्त यात्रा

द इकोनॉमिक टाइम्स में सीमा सिरोही ने एक लेख लिखा था। इस लेख से एक और राज सामने आया। इसमें बताया गया कि राहुल गाँधी ने व्हाइट हाउस की एक गुप्त यात्रा की थी। इस यात्रा के बारे में भारत के विदेश मंत्रालय और सरकारी नियमों को जानकारी नहीं दी गई थी। यह घटना चिंताजनक है क्योंकि किसी विपक्षी नेता का बिना किसी प्रचार के बाइडन प्रशासन के पास जाना सवाल खड़े करता है। इससे कई सवाल उठते हैं कि राहुल गाँधी ने वहाँ किससे मुलाकात की और क्या कोई वादा या एजेंडा तय किया गया था?

कई लोगों ने इस यात्रा पर सवाल उठाए। ‘हिंदू एक्शन’ जैसे लोगों का कहना है कि इस यात्रा में खालिस्तानी और पाकिस्तानी एजेंट भी शामिल थे। पत्रकार सुनंदा वशिष्ठ ने भी इस पर नाराजगी जताई है। सुनंदा वशिष्ठ ने कहा कि व्हाइट हाउस में राहुल गाँधी किनसे मिले, इसकी कोई जानकारी नहीं दी गई। कुछ अप्रवासी भारतीयों ने यह भी कहा कि यह सब 2024 के भारतीय चुनावों में दखल देने की कोशिश हो सकती है।

घरेलू राजनीति के लिए विदेशी दखलंदाजी: राहुल गाँधी का पुराना रिकॉर्ड

राहुल गाँधी का पुराना इतिहास भी इस मामले को और गंभीर बनाता है। पश्चिमी देशों से मदद माँगने की उनकी आदत नई नहीं है। 2023 में कैम्ब्रिज में दिए एक भाषण में, राहुल गाँधी ने यूरोप और अमेरिका से भारत में ‘लोकतंत्र बहाल’ करने की अपील में गलत जानकारी फैलाई थी। राहुल गाँधी ने भारत की मजबूत चुनाव प्रणाली को नजरअंदाज कर दिया था। 2021 में, राहुल गाँधी ने हार्वर्ड में अमेरिकी राजदूत निकोलस बर्न्स से भारत के ‘आंतरिक मामलों’ पर टिप्पणी करने को कहा था। यह सुनकर खुद राजदूत भी हैरान रह गए थे।

यह कोई अकेली घटना नहीं है। 2018 में कैलाश मानसरोवर की यात्रा के बाद राहुल गाँधी ने चीन के मंत्रियों से मुलाकात की थी। यह डोकलाम विवाद के बाद हुआ था। राहुल गाँधी ने चीनी राजदूतों से भी बात की थी। ये सब दिखाता है कि वह घरेलू राजनीति के फायदे के लिए विदेशी ताकतों की मदद लेने को तैयार रहते हैं।

कतर-सोरोस-कॉन्ग्रेस का गठजोड़: क्या यह भारत के खिलाफ एक साजिश है?

कतर एक महत्वपूर्ण अमेरिकी सहयोगी है। वहाँ अल उदीद एयर बेस है। कतर ने अफगानिस्तान में शांति वार्ता में मदद की थी। यह देश अपनी ‘सॉफ्ट पावर’ का उपयोग करता है। यह ऊर्जा और अल जजीरा जैसे मीडिया के जरिए ऐसा करता है। लेकिन कतर पर इस्लामी समूहों को पैसा देने का भी आरोप है। इनमें मुस्लिम ब्रदरहुड और हमास शामिल हैं। इसलिए, वह भारत के खाड़ी देशों के साथ संबंधों के लिए एक चुनौती है।

सवाल यह है कि कतर का राजदूत राहुल गाँधी के कार्यक्रम को क्यों बढ़ावा देगा? खासकर तब जब यह कार्यक्रम जॉर्ज सोरोस और IAMC से जुड़े समूहों के साथ हो। न्यू यॉर्क में एक और कार्यक्रम हुआ। उसके लिए कट्टरपंथी मस्जिदों और ICNA से जुड़े संगठनों ने पंजीकरण किया था। इन संगठनों का आतंकवाद से जुड़ा इतिहास रहा है। यह सब एक खास विचारधारा की ओर इशारा करता है।

यह एक समन्वित प्रयास जैसा लगता है, जहाँ कतर कूटनीतिक लाभ दे रहा है, सोरोस वित्तीय मदद कर रहा है और अमेरिकी लॉबिंग इसे बढ़ावा दे रही है। बंद दरवाजों के पीछे, चर्चाएँ मोदी की विदेश नीति को कमजोर करने पर हो सकती हैं, जैसे कश्मीर या CAA पर। राहुल गाँधी का इन सब से जुड़ना कॉन्ग्रेस के व्यापक संबंधों को दिखाता है। जॉर्ज सोरोस के संगठन से जुड़े सलिल शेट्टी भारत जोड़ो यात्रा में शामिल हुए थे। कॉन्ग्रेस ने CAA विरोधी प्रदर्शनों का भी समर्थन किया था, जो बाद में हिंसा में बदल गए थे।

राहुल गाँधी की कूटनीति अमेरिका यात्रा

जिस तरह भारत एक मजबूत देश बन रहा है, ऐसे विदेशी संबंध संदिग्ध हैं। ये हमारी संप्रभुता के लिए खतरा हो सकते हैं। X पर वायरल हो रही खान और चीमा की बातचीत इस बात को फिर से उठाती है। इससे पता चलता है कि राहुल गाँधी की अमेरिका यात्रा कोई साधारण यात्रा नहीं थी। यह कई ताकतों का एक साथ आना था, जिसमें कतर के राजदूत भी शामिल थे।

जब तक सच्चाई सामने नहीं आती, तब तक सवाल उठते रहेंगे। क्या यह सिर्फ कूटनीति थी या इसके पीछे कुछ और गहरी साजिश थी?

स्वामीनारायण संस्था पर खत्म हुई US की जाँच, सारे आरोप फर्जी निकले: BAPS ने कहा- हिंदू समुदाय को निशाना बनाकर किया गया बदनाम

अमेरिका के न्याय विभाग (DOJ) ने BAPS संस्था और उसके सहयोगी संगठनों के खिलाफ चल रही जाँच को आधिकारिक रूप से बंद कर दिया है। यह जानकारी स्वयं न्यूयॉर्क में स्थित BAPS स्वामीनारायण संस्था ने दी। संस्था ने बताया कि जाँच में BAPS या किसी भी संबंधित व्यक्ति पर कोई आरोप सिद्ध नहीं हुआ है। यह जाँच मई 2021 में न्यू जर्सी के रॉबिंसविल स्थित BAPS मंदिर में हुई छापेमारी के बाद शुरू हुई थी।

BAPS स्वामीनारायण संस्था पर लगाए गए थे कई आरोप

संस्था ने बताया, “संयुक्त राज्य अमेरिका के न्याय विभाग (Department of Justice) और न्यू जर्सी के यूनाइटेड स्टेट्स अटॉर्नी ऑफिस द्वारा BAPS और BAPS स्वामीनारायण अक्षरधाम के निर्माण को लेकर चल रही जाँच को बंद करने के फैसले का हम स्वागत करते हैं।”

संस्था ने आगे कहा, “यह फैसला हमारी बात को और भी मजबूती देता है जो हम शुरू से कहते आ रहे हैं कि BAPS स्वामीनारायण अक्षरधाम, जो शांति, सेवा और भक्ति का स्थान है, हजारों श्रद्धालुओं की निष्ठा, प्रेम और स्वेच्छा से की गई सेवा से बना है।”

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, साल 2021 में कुछ लोगों ने BAPS पर मुकदमा दायर किया था, जिसमें मानव तस्करी (Trafficking Victims Protection Act – TVPA), श्रम कानून (Fair Labor Standards Act – FLSA) और अन्य संबंधित आरोप लगाए गए थे। इसके चलते कोर्ट ने इस सिविल मुकदमे पर रोक (stay) लगा दी थी, क्योंकि DOJ की आपराधिक जाँच चल रही थी।

अब गुरुवार (18 सितम्बर 2025) को न्यू जर्सी की एक संघीय कोर्ट में दायर एक पत्र में, BAPS के वकीलों ने बताया कि 15 और 16 सितम्बर 2025 को DOJ ने आधिकारिक रूप से उन्हें सूचित किया कि जाँच समाप्त कर दी गई है और संस्था या उससे जुड़े लोगों पर कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी।

संस्था ने फैसले को को कहा हिंदू समुदाय की जीत

BAPS के एक प्रवक्ता ने कहा, “यह पिछले चार वर्षों की अनिश्चितता का अंत है। हमने हमेशा कहा था कि हमारे ऊपर लगाए गए आरोप झूठे और बेबुनियाद थे। आज का निर्णय हमारे उस विश्वास को सही ठहराता है। हम अमेरिका और दुनिया भर में अपनी आध्यात्मिक और सेवा गतिविधियों को जारी रखेंगे।”

जाँच खत्म होने के साथ ही अब सिविल मुकदमे पर लगी कोर्ट की रोक भी हट गई है। BAPS के वकील अब वादियों के वकीलों और कोर्ट के साथ मिलकर अगले कदमों पर काम करेंगे।

CasteFiles के एक प्रवक्ता ने कहा, “यह मामला ‘झूठे जातिगत सिद्धांतों’ पर आधारित था और इसका मकसद सिर्फ BAPS ही नहीं, बल्कि पूरे हिंदू समुदाय को निशाना बनाना था। उन्होंने कहा, “इस केस का समाप्त होना हमारे समुदाय के लिए एक बड़ी जीत है, जिसने अमेरिका में जातिगत भेदभाव के झूठे आरोपों को पूरी तरह खारिज कर दिया है।”

BAPS एक वैश्विक हिंदू संस्था है जो आध्यात्मिक विकास, सेवा और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए समर्पित है। अमेरिका भर में इसके अनेक मंदिर और केंद्र हैं, जहाँ यह आपदा राहत, स्वास्थ्य जागरूकता, और शिक्षा जैसी कई सामाजिक सेवाएँ प्रदान करती है।

‘PM मोदी मेरे बहुत करीब, रूसी तेल के कारण लगाना पड़ा भारत पर टैरिफ’ : राष्ट्रपति ट्रंप ने मीडिया में दोहराई फिर वही बात, टैरिफ विवाद के कारण रुकी है ट्रेड डील

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि उन्होंने रूस से तेल खरीदने की वजह से भारत पर ‘प्रतिबंध’ लगाए हैं, लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि वह भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बहुत करीबी हैं। बता दें कि ट्रंप आए दिन अपने और पीएम मोदी की दोस्ती को लेकर बयान देते दिखाई दे रहे हैं। इसी बीच उनका यह नया बयान सामने आया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब ट्रंप से पूछा गया कि क्या रूस पर दबाव बढ़ाने के लिए उन देशों पर कार्रवाई की जाएगी जो अब भी रूसी तेल खरीद रहे हैं तो ट्रंप ने जवाब में कहा कि अगर तेल की कीमतें कम हो जाएँ तो रूस युद्ध बंद कर देगा।

ट्रंप ने कहा, “जब मुझे पता चला कि यूरोपीय देश अब भी रूस से तेल खरीद रहे हैं… और जैसा कि आप जानते हैं, मैं भारत के बहुत करीब हूँ, पीएम मोदी के भी करीब हूँ। मैंने उन्हें फोन कर जन्मदिन की शुभकामनाएँ दीं। उन्होंने बहुत सुंदर जवाब दिया… लेकिन मैंने उन पर प्रतिबंध लगाए।”

ट्रंप ने आगे कहा, “रूस से तेल खरीदने के कारण मुझे यूरोपीय देशों और चीन पर भी बैन लगाना पड़ा। चीन इस समय अमेरिका पर बहुत बड़ा टैरिफ लगा रहा है। मैं और भी चीजें करने को तैयार हूँ, लेकिन तब नहीं जब मैं जिन लोगों के लिए लड़ रहा हूँ, वे रूस से तेल खरीद रहे हों।”

ट्रंप का कहना है कि अगर तेल की कीमतें नीचे जाएँगी तो रूस समझौता करने पर मजबूर होगा। गौरतलब है कि जुलाई में ट्रंप प्रशासन ने रूस से तेल खरीदने पर भारत पर 50% ‘पेनल्टी’ टैरिफ लगाने की बात कही थी, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव देखा गया था।

हालाँकि हाल ही में भारत-अमेरिका के बीच व्यापार समझौते पर बातचीत हुई और दोनों पक्षों ने इसे सकारात्मक बताया है। भारत के वाणिज्य मंत्रालय ने भी कहा कि दोनों देश जल्द से जल्द समझौता करने की कोशिश कर रहे हैं।

इससे पहले ट्रंप ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए कहा बताया था कि उन्होंने पीएम मोदी को फोन कर जन्मदिन की शुभकामनाएँ दीं और रूस-यूक्रेन युद्ध को खत्म करने में भारत के समर्थन के लिए धन्यवाद दिया।

उन्होंने लिखा, “मैंने अपने दोस्त पीएम मोदी को जन्मदिन की शुभकामनाएँ दीं। वह बेहतरीन काम कर रहे हैं। नरेंद्र, युद्ध को समाप्त करने के आपके समर्थन के लिए धन्यवाद!”

इस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जवाब देते हुए लिखा, “धन्यवाद मेरे मित्र राष्ट्रपति ट्रंप, आपके फोन कॉल और शुभकामनाओं के लिए। मैं भी भारत-अमेरिका साझेदारी को नई ऊँचाइयों तक ले जाने के लिए प्रतिबद्ध हूँ। हम रूस-यूक्रेन युद्ध के शांतिपूर्ण समाधान के आपके प्रयासों का समर्थन करते हैं।”

GenZ को भड़काने पर उतरे राहुल गाँधी, भारत का नेपाल जैसा चाहते हैं हाल? : पोस्ट देख लोगों ने पूछे सवाल, मीडिया के आगे कहा था- ‘लोकतंत्र बचाना मेरा काम नहीं’

कॉन्ग्रेस सांसद राहुल गाँधी ने गुरुवार (18 सितंबर 2025) को दिल्ली में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इसमें उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा करना उनका काम नहीं है। प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद शाम 7 बजे उन्होंने सोशल मीडिया एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा कि देश के युवा, छात्र और GenZ लोकतंत्र की रक्षा करेंगे और वोट चोरी को रोकेंगे। उन्होंने लिखा कि वे उनके साथ हैं।

प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूछा गया कि क्या वह कोर्ट या किसी बड़ी एजेंसी का दरवाजा खटखटाएँगे? इस पर नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने कहा, “सच कहूँ तो, मैं यहाँ जो कर रहा हूँ वह मेरा काम नहीं है। मेरा काम लोकतांत्रिक व्यवस्था में भाग लेना है। मेरा काम लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा करना नहीं है।”

उन्होंने कहा, “यह भारत में संस्थाओं का काम है, वे ऐसा नहीं कर रही हैं, इसलिए मुझे यह करना पड़ रहा है। हमारी प्रस्तुति के अंत तक, जिसमें 2-3 महीने लगेंगे, आपके मन में इस बारे में कोई संदेह नहीं रहेगा कि भारत में राज्य दर राज्य, लोकसभा दर लोकसभा चुनाव वोटों की चोरी हुई है।”

अपने इस तरह के बयान के बाद एक्स पर पोस्ट करते हुए राहुल गाँधी ने लिखा, “देश के युवा, देश के छात्र, देश की GenZ संविधान को बचाएँगे, लोकतंत्र की रक्षा करेंगे और वोट चोरी को रोकेंगे। मैं उनके साथ हमेशा खड़ा हूँ।”

राहुल गाँधी का पहले ये कहना कि हिंदुस्तान के लोकतंत्र को बचाने का काम उनका नहीं और वे इसकी रक्षा नहीं करेंगे। उसके बाद में ये कहना कि यह काम Gen Z का है। यह साफ दिखा रहा है कि राहुल युवाओं को अपने ही देश, अपने ही लोकतंत्र के खिलाफ भड़काने का प्रयास कर रहें हैं। उनकी इस तरह की हरकत के पीछे उनकी क्या मंशा है? यह देश के लोगों को साफ दिख रही है।

उनकी सोशल मीडिया पोस्ट के बाद लोगों ने कई तरह की प्रतिक्रियाएँ दी। एक यूजर ने लिखा कि इसके पीछे स्पष्ट और साफ संदेश है कि राहुल गाँधी देश में आग लगाना चाहते हैं और खुले शब्दों में कह रहे हैं जिसके दम हो वो आग लगाने की कोशिश करके देख ले।

वही एक अन्य यूजर ने लिखा कि राहुल नेपाल जैसा दंगा भारत में भी कराना चाहते हैं। तमाम यूजर्स का यही आरोप है कि वे देश के भविष्य, देश के युवाओं को भड़का कर नेपाल की तरह देश में अशांति और नफरत फैलाना चाहते हैं।

कॉन्ग्रेस नेता ने अपनी पोस्ट में ‘GenZ’ का जिक्र किया। यह कोई नया शब्द नहीं है, लेकिन इन दिनों यह काफी चर्चा में है। इसकी एक बड़ी वजह नेपाल में हाल ही में हुआ राजनीतिक बदलाव है। बीते दिनों नेपाल में बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन हुए, जिनकी अगुवाई GenZ यानी आज की युवा पीढ़ी ने की।

इन प्रदर्शनों में सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए गए। लोगों का गुस्सा इतना बढ़ा कि प्रधानमंत्री, मंत्री और कई सांसदों को इस्तीफा देना पड़ा। इन घटनाओं के बाद नेपाल में एक नई अंतरिम सरकार का गठन किया गया। इस पूरे बदलाव के पीछे GenZ की भूमिका बेहद अहम मानी जा रही है।

निजामुद्दीन ने रूममेट पर किया चाकू से हमला, US पुलिस ने गोली मारी: तेलंगाना में परिवार बोला- नस्लीय उत्पीड़न हुआ, सोशल मीडिया पर भी रोना

तेलंगाना के मोहम्मद निजामुद्दीन की अमेरिका में पुलिस ने गोली मारकर हत्या कर दी। हत्या की वजह यह बताई जा रही है कि निजामुद्दीन का अपने ही रूममेट से विवाद चल रहा था। इस मामले में जब पुलिस वहाँ पहुँची, तो निजामुद्दीन के हाथों में चाकू देखा और रूममेट को चोटें भी आई थी। इस कड़ी में पुलिस ने ‘सेल्फ डिफेंस’ में 30 वर्षीय मोहम्मद निजामुद्दीन को गोली मार दी।

हालाँकि, मोहम्मद निजामुद्दीन के परिवार का कहना है कि यह घटना एक मामूली झगड़े का नतीजा नहीं, बल्कि नस्लीय भेदभाव का मामला है। परिवार ने इस मामले में विदेश मंत्री एस जयशंकर से दखल की गुहार लगाई है और जाँच की माँग की है।

घटना का संदर्भ और परिवार का आरोप

जानकारी के अनुसार, मोहम्मद निजामुद्दीन ने अमेरिका में कंप्यूटर साइंस में मास्टर डिग्री हासिल की थी। मोहम्मद निजामुद्दीन का अपने रूममेट के साथ 3 सितंबर 2025 को एक झगड़ा हुआ था। इस झगड़े में अमेरिकी पुलिस मौके पर पहुँचती हैं और मोहम्मद निजामुद्दीन के हाथों में चाकू देखती है। इसके बाद पुलिस सेल्फ-डिफेंस में गोली चला देती है। पुलिस ने बताया कि विवाद में निजामुद्दीन के रूममेट को काफी चोटें आई थी।

लेकिन निजामुद्दीन के पिता मोहम्मद हसनुद्दीन का कहना है कि उनके बेटे ने ही पुलिस को फोन किया था और मदद की माँग की थी, फिर भी अमेरिकी पुलिस ने उसे ही गोली मारी। परिवार ने यह भी आरोप लगाया कि मोहम्मद निजामुद्दीन की मौत में नस्लीय भेदभाव का एंगल था।

परिवार का कहना था कि उनके बेटे मोहम्मद निजामुद्दीन को श्वेत वर्चस्व (व्हाइट सुप्रीमेसी) की मानसिकता के काफी समय से परेशान किया जा रहा था। निजामुद्दीन का परिवार इस मौत मामले में जाँच की माँग कर रहा है। उनका कहना है कि पुलिस की प्रतिक्रिया में गंभीर लापरवाही थी और उनके बेटे को न्याय मिलना चाहिए।

नस्लीय भेदभाव का मुद्दा

वहीं, मोहम्मद निजामुद्दीन ने मौत से कुछ समय पहले ही सोशल मीडिया पर नस्लीय भेदभाव को लेकर पोस्ट करना शुरू कर चुका था। निजामुद्दीन ने लिखा था कि उसे नस्लीय उत्पीड़न और नौकरी से गलत तरीके से निकाले जाने का सामना करना पड़ा था।

निजामुद्दीन ने सोशल मीडिया पर नस्लीय भेदभाव के बारे में कई पोस्ट किया।

निजामुद्दीन का कहना था, “अब और नहीं, व्हाइट सुप्रीमेसी और नस्लीय मानसिकता को समाप्त करना होगा।” क्या यह सिर्फ अमेरिकी पुलिस ने सेल्फ-डिफेंस में गोली चलाई थी या फिर यह एक श्वेत वर्चस्व की मानसिकता का परिणाम था?

निजामुद्दीन के परिवार ने भारत सरकार से मदद की अपील की है। उन्होंने विदेश मंत्री एस जयशंकर को पत्र लिखकर अपने बेटे का शव महबूबनगर लाने की गुहार लगाई है। साथ ही, उन्होंने इस मामले की गहन जाँच की भी माँग की है, ताकि यह पता चल सके कि क्या यह नस्लीय भेदभाव का मामला था और पुलिस की कार्रवाई सही थी या नहीं।

अमेरिका में भारतीयों की हत्या

अमेरिका में नस्लीय भेदभाव का इतिहास बहुत पुराना है, जो आज भी जारी है। चाहे वह अमेरिकी पुलिस द्वारा तेलंगाना के एक युवक की हत्या हो या लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में भारतीय छात्रों के साथ भेदभाव, ये घटनाएँ दर्शाती हैं कि रंग और पहचान के आधार पर होने वाला उत्पीड़न आज भी जारी है।

हाल ही में, 10 सितंबर 2025 को अमेरिका के टेक्सास में कर्नाटक के भारतीय मूल के चंद्र मौली ‘बॉब’ नागमल्लैया की बेरहमी से हत्या कर दी गई। इस घटना में, 53 वर्षीय नागमल्लैया की उनके ही सहकर्मी, योडार्निस कोबोस-मार्टिनेज ने गला काटकर हत्या कर दी। यह हत्या सिर्फ एक मामूली विवाद का नतीजा नहीं लगती, बल्कि इसके पीछे नस्लीय पूर्वाग्रहों का गहरा हाथ हो सकता है। यह बात तब और भी गंभीर हो जाती है जब नागमल्लैया के परिवार के सामने ही उनका सिर धड़ से अलग कर दिया गया और फिर उसे कूड़ेदान में डाल दिया गया। इस तरह की क्रूरता सामान्य अपराधों में कम ही देखने को मिलती है। इस घटना पर अमेरिकी मीडिया भी चुप था, क्योंकि यह नस्लीय मामला था।

इसके अलावा, अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया में हरियाणा के जींद जिले के 26 वर्षीय कपिल की गोली मारकर हत्या कर दी गई। यह घटना 6 सितंबर 2025 की रात को हुई, जब कपिल ने एक अमेरिकी मूल के व्यक्ति को खुले में पेशाब करने से रोका। इस बात पर दोनों के बीच तीखी बहस हुई, जिसके बाद अमेरिकी व्यक्ति ने अपनी पिस्तौल निकालकर कपिल पर गोलियाँ चला दीं।

इसके अलावा, लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स (LSE) में करण कटारिया के साथ भी ऐसा ही नस्लीय भेदभाव हुआ है। करण कटारिया ने बताया कि वह LSE में एक छात्र चुनाव लड़ रहे थे, लेकिन उन्हें सिर्फ़ उनके भारतीय और हिंदू होने के कारण निशाना बनाया गया। उन पर होमोफोबिक और इस्लामोफोबिक जैसे झूठे आरोप लगाकर उन्हें चुनाव से अयोग्य घोषित कर दिया गया। करण का कहना था कि उन्होंने हमेशा सामाजिक सद्भाव की बात की है, लेकिन उनके खिलाफ नफरती अभियान चलाया गया।

प्रवासी मजदूरों के खिलाफ पंचायतों के फरमान के बाद पंजाब की ‘आर्थिक रीढ़’ पर संकट, होशियारपुर में 5 साल के बच्चे की हत्या के बाद बढ़ी दिक्कत: जानें- कैसे बर्बाद हो सकती है राज्य की अर्थव्यवस्था

पंजाब के होशियारपुर में कथित तौर पर प्रवासी मजूदर ने एक 5 साल के बच्चे की हत्या की कर दी। घटना के बाद से ही प्रवासी मजदूर पर लोगों का गुस्सा फूट पड़ा है। कई पंचायतों और निगरानी समूह ने प्रवासी मजदूरों को राज्य से बाहर निकालने की माँग तेज कर दी है।

उधर, उद्योग जगत के बड़े लोगों ने मुख्यमंत्री भगवंत मान को पत्र लिखकर प्रवासी मजदूरों के समर्थन में बात की है। उनका कहना है कि प्रवासी मजदूर पंजाब की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि प्रदेश धान के मौसम में पलायन बर्दाश्त नहीं कर सकता है।

जहाँ पंजाब की 4 लाख एकड़ जमीन बाढ़ में तबाह हो चुकी है। वहाँ प्रवासी मजदूरों के लिए नकारात्मक भावना एक बार फिर उभर आई है। यह पहली बार नहीं है जब पंजाबियों ने उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रवासी मजदूरों को राज्य से बाहर निकालने की माँग की है। इससे पहले भी प्रवासी मजदूरों के किसी आपराधिक गतिविधि में शामिल होने की घटनाओं के बाद पंचायतों ने ऐसी माँगे और प्रस्ताव पारित किए हैं।

बड़ी तस्वीर- यह कहानी अब क्यों मायने रखती है

होशियारपुर में एक 5 साल के बच्चे की दर्दनाक हत्या ने पूरे पंजाब में आक्रोश फैला दिया। इसके बाद उत्तर प्रदेश और बिहार से आए प्रवासी मजदूरों के खिलाफ नाराजगी और नफरत बढ़ गई। कई गाँवों की पंचायतों ने प्रवासियों को लेकर सख्त फैसले लिए हैं, कुछ लोगों ने चेतावनी दी है और प्रवासी विरोधी बातें फैलाई जा रही हैं, जिससे पंजाब में प्रवासी मजदूरों के लिए डर का माहौल बन गया है। खासकर जब धान की खरीद का मौसम चल रहा है।

उद्योग और व्यापार से जुड़े लोग कह रहे हैं कि खेतों और फैक्ट्रियों में काम करने वाले प्रवासी मजूदरों के बगैर पंजाब की अर्थव्यवस्था नहीं चल पाएगी। अगर उन्हें दोषी ठहराकर सबको निशाना बनाया गया, तो इससे व्यापार, खेती और समाज को नुकसान होगा। उनका कहना है कि अपराध करने वाले को सजा जरूर मिलनी चाहिए लेकिन सभी प्रवासियों को एक जैसा दोषी मानना ठीक नहीं है।

होशियारपुर में अब तक क्या हुआ- घटनाक्रम

09 सितंबर 2025 को होशियारपुर के न्यू दीप नगर इलाके में 5 साल का बच्चा हरवीर उर्फ बिल्ला का उसके घर के बाहर से अपहरण कर लिया गया। परिजनों ने बच्चे को आसपास ढूँढा और कुछ पता ना लगने पर पुलिस को सूचना दी गई।

पुलिस ने इलाके के सीसीटीवी कैमरों की जाँच शुरू की। सीसीटीवी फुटेज में साफ दिखा कि एक स्कूटर सवार व्यक्ति बच्चे को लेकर जा रहा है। इसी सबूत के आधार पर पुलिस ने स्कूटर को ट्रेस किया और उसके मालिक प्रवासी मजदूर मनके यादव को गिरफ्तार कर लिया, जो उत्तर प्रदेश का निवासी है और होशियारपुर की सब्जी मंडी इलाके में रह रहा था।

अगली सुबह पुलिस ने बच्चे का शव पुर हीरान के श्मशान घाट से बरामद किया। इस मामले में मनके यादव के खिलाफ केस दर्ज कर लिया गया और पुलिस ने सख्त कार्रवाई का आश्वासन दिया है।

इस दर्दनाक घटना ने पूरे समुदाय को झकझोर कर रख दिया। शोक में डूबे परिवार की तस्वीरें सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गईं, जिससे लोगों का गुस्सा और बढ़ गया। कई नेता पीड़ित परिवार से मिलने पहुँचे और तत्काल कार्रवाई की माँग की।

पुलिस ने बताया कि आरोपित के खिलाफ पहले भी कुछ मामले दर्ज थे, जिनकी जाँच की जा रही है। इस घटना की क्रूरता ने प्रवासी मजदूरों पर निगरानी बढ़ाने की माँग को हवा दी लेकिन राज्य के मुख्यमंत्री भगवंत मान समेत कई अधिकारियों ने चेताया कि एक व्यक्ति के अपराध के आधार पर पूरे प्रवासी समुदाय को दोषी ठहराना उचित नहीं है।

दुख से लेकर निराशा तक- गाँवों की प्रतिक्रिया

इस घटना के कुछ दिन बाद ही होशियारपुर और आसपास के जिलों की 25 से अधिक पंचायतों ने प्रवासी मजदूरों के खिलाफ प्रस्ताव पारित किए। इन निर्देशों में भले ही कुछ अंतर था लेकिन एक बात समान थी- पंजाब में बिना स्थानीय दस्तावेजों के प्रवासियों का रहना प्रतिबंधित है।

कुछ गाँवों ने तो साफतौर पर आदेश दिया कि जिन प्रवासी मजदूरों के पास वैध कागजात नहीं हैं, उन्हें एक हफ्ते के भीतर राज्य छोड़ना होगा। इसके चलते कई प्रवासी मजदूरों ने घबराकर पंजाब छोड़ना शुरू कर दिया।

कुछ गाँवों ने यह फैसला लिया है कि प्रवासी मजदूर खेतों में बने ट्यूबवेल कमरों में तो रह सकते हैं लेकिन गाँव के रिहायशी इलाकों में उन्हें रहने की अनुमति नहीं दी जाएगी। कई पंचायतों ने यह भी तय किया है कि प्रवासियों को आधार कार्ड या वोटर कार्ड नहीं दिए जाएँगे, उनके लिए घर किराए पर देना प्रतिबंधित होगा और कुछ मामलों में स्थानीय और बाहरी लोगों के बीच विवाह पर भी रोक लगाने की बात कही गई।

बठिंडा जिले की गेहरी भागी पंचायतें इससे भी आगे बढ़ गईं। उन्होंने प्रवासियों को स्थानीय पते पर संपत्ति खरीदने या दस्तावेज रजिस्टर कराने से रोकने का निर्णय लिया। इसके साथ ही जिन किसानों ने प्रवासी मजदूरों को काम पर रखा है, उन्हें उनकी पूरी जिम्मेदारी लेने को कहा गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कानूनी विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस तरह के प्रस्ताव संविधान के खिलाफ हैं क्योंकि भारत के नागरिकों को देश में कहीं भी रहने और काम करने का मौलिक अधिकार प्राप्त है। बावजूद इसके पंचायतों के दबाव ने पंजाब के खेतों, मंडियों और फैक्ट्रियों में काम करने वाले हजारों प्रवासी मजदूरों के बीच चिंता और असुरक्षा का माहौल पैदा कर दिया है।

‘प्रवासी भगाओ, पंजाब बचाओ’ वीडियो और पिछले अभियान

जहाँ ये प्रस्ताव पंचायतों द्वारा औपचारिक रूप से पारित किए गए, वहीं अब लुधियाना और बठिंडा में अब खुद से कानून हाथ में लेने वाले लोगों की धमकियाँ भी सामने आ रही हैं। सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिनमें कुछ लोग प्रवासी मजदूरों को बड़ी संख्या में राज्य छोड़ने के लिए मजबूर करते दिख रहे हैं।

अन्य राज्यों से आए ठेलेवाले और छोटे दुकानदारों को खुलेआम चेतावनी दी जा रही है कि वे अपना सामान समेटें और पंजाब छोड़ दें। लुधियाना के भाई रणधीर सिंह नगर में ऐसी ही एक घटना में माहौल बिगड़ने से पहले पुलिस को हस्तक्षेप करना पड़ा।

सोशल मीडिया पर ‘प्रवासी भगाओ, पंजाब बचाओ’ जैसे नारे वाले वीडियो तेजी से वायरल हुए। ये वीडियो ज्यादातर ऐसे लोगों ने शेयर किए जो खुद को समाज का रक्षक मानते हैं। इन क्लिप्स में प्रवासी मजदूरों को गाँव छोड़ने की माँग की जा रही है और सांस्कृतिक मतभेद से लेकर कानून-व्यवस्था से जुड़ी शिकायतों को उजागर किया जा रहा है।

इसी बीच एक और विवाद ने तूल पकड़ लिया। डिजिटल कंटेंट क्रिएटर कंचन कुमारी उर्फ कमल कौर भाभी की हत्या के मुख्य आरोपित अमृतपाल सिंह मेहरों ने कथित तौर पर इस मुद्दे में दखल दिया। उसने पीड़ित के पिता से संपर्क किया।

फेसबुक पर एक वीडियो में वह पीड़ित के पिता को ‘बिना कोर्ट के न्याय’ दिलाने की पेशकश करता सुनाई देता है। हालाँकि, इस वीडियो की सत्यता की पुष्टि नहीं हो सकी है। उल्लेखनीय है कि मेहरों हत्या के बाद देश छोड़कर फरार हो गया था।

इस तरह की बयानबाजी पहले भी कई राज्यों में देखी जा चुकी है। महाराष्ट्र में ‘बाहरी लोगों’ के खिलाफ अभियान और खुद पंजाब में पिछले साल फतेहगढ़ साहिब और SAS नगर में प्रवासियों पर इसी तरह की पाबंदियाँ लगाई गई थीं।

यह एक जाना-पहचाना पैटर्न है। किसी स्थानीय घटना के बाद गुस्सा पूरे प्रवासी समुदाय पर फैल जाता है लेकिन समय के साथ आर्थिक नुकसान सामने आने लगता है और फिर इन फैसलों पर पुनर्विचार करना पड़ता है। आज जो हालात बन रहे हैं, वे उसी इतिहास को दोहराने का खतरा पैदा कर रहे हैं।

पंजाब की खेती और उद्योग पहले ही बाढ़ जैसी आपदाओं से जूझ रहे हैं और ऐसे में प्रवासी मजदूरों पर प्रतिबंध लगाने से हालात और बिगड़ सकते हैं।

क्या पंजाब की पंचायतों के प्रस्ताव वैध हैं?

होशियारपुर की घटना को लेकर लोगों का खेद और गुस्सा पूरी तरह समझा जा सकता है लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि पंचायतों के फरमानों से संविधान का उल्लंघन होता है। भारत एक संघीय गणराज्य है, जहाँ हर नागरिक को देश के किसी भी हिस्से में रहने और काम करने का अधिकार प्राप्त है। ऐसे में किसी व्यक्ति को केवल उसके राज्य या क्षेत्र के आधार पर आधार कार्ड, वोटर रजिस्ट्रेशन या रहने की सुविधा से वंचित करना कानूनन गलत है।

इस बात को पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने भी दोहराया। उन्होंने हत्या की निंदा करते हुए स्पष्ट कहा कि भेदभाव किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा, “पंजाबी रायपुर में व्यापार करता है और कोलकाता के परिवहन क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभाता है। अगर आज हम दूसरों के साथ ऐसा करेंगे तो कल हमारे लोग भी उसी तरह का बदला झेल सकते हैं। ऐसा भेदभाव किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं है।”

उद्योग जगत की चिंता- ‘अर्थव्यवस्था की रीढ़’

पंजाब के उद्योग संगठनों ने भी इस मुद्दे पर गंभीर चिंता जताई है। लुधियाना के उद्योगपति और वर्ल्ड MSME फोरम के अध्यक्ष बदीश जिंदल ने हाल ही में मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर यह स्पष्ट किया कि प्रवासी मजदूर पंजाब की फैक्ट्रियों, खेतों, दुकानों और घरों की रीढ़ हैं।

हाल ही में आम आदमी पार्टी से जुड़े जिंदल ने अपने पत्र में बताया कि पंजाब के उद्योगों में 80% असंगठित श्रमिक प्रवासी हैं। राज्य के औद्योगिक केंद्र लुधियाना में अकेले लगभग 8 लाख प्रवासी मजदूर काम करते हैं। खेती में भी बुआई और कटाई का अधिकांश काम यही मजदूर करते हैं।

जिंदल ने चेतावनी दी कि यदि प्रवासियों के खिलाफ बढ़ती दुश्मनी उन्हें राज्य छोड़ने पर मजबूर करती है तो इससे पंजाब की औद्योगिक व्यवस्था और सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा सकती है। इसका असर न केवल राज्य के व्यापार पर पड़ेगा बल्कि उन निर्यातों पर भी जो अन्य राज्यों के जरिए होते हैं।

उन्होंने इस प्रवासी विरोधी माहौल को ‘पंजाब को बर्बाद करने की साजिश’ बताया और सरकार से अपील की कि वह ऐसे भेदभावपूर्ण बयानों को नकारें और मजदूरों की सुरक्षा सुनिश्चित करे।

जमीनी स्तर पर मजदूर और व्यापारी क्या कहते हैं?

पंजाब की मंडियों और खेतों में डर का माहौल फैलने लगा है। पंजाब में पिछले 15 सालों से काम कर रहे बिहार निवासी पप्पू कुमार यादव ने एक मीडिया संस्थान से बातचीत में कहा, “यहाँ हमें अपने गाँव से चार गुना ज्यादा कमाई होती है लेकिन होशियारपुर की घटना के बाद प्रवासियों के खिलाफ नफरत फैल गई है। हम डर के साए में जी रहे हैं।”

हालाँकि हर आवाज विरोध की नहीं है। कई कमिशन एजेंट और उद्योगपति मानते हैं कि प्रवासी मजदूर पंजाब की व्यवस्था के लिए अनिवार्य हैं। खन्ना और भगतानवाला की अनाज मंडियों में व्यापारियों ने स्वीकार किया कि मजदूरों की कमी से कामकाज प्रभावित हो रहा है। कुछ मजदूर समय से पहले लौटने की सोच रहे हैं, जिससे खरीद प्रक्रिया रुक सकती है।

लुधियाना के उद्योगपति गुरमीत सिंह कुलार ने कहा कि कई प्रवासी परिवार तो पीढ़ियों से पंजाब में रह रहे हैं। वहीं उत्तर प्रदेश से 1960 के दशक में आए टीआर मिश्रा, जो अब एक फैक्ट्री चलाते हैं, ने मीडिया से कहा, “लड़ाई अपराध से होनी चाहिए, न कि किसी राज्य के लोगों से।”

पंजाब निर्माण मजदूर यूनियन के राज्य अध्यक्ष गंगा प्रसाद ने भी बयान दिया कि दोषी को सजा मिलनी चाहिए लेकिन बाकी प्रवासियों को निशाना बनाना गलत है।

राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया

इस दुखद घटना ने राजनीतिक बहस को भी तेज कर दिया है। मुख्यमंत्री भगवंत मान लगातार यह चेतावनी दे रहे हैं कि प्रवासी मजदूरों को निशाना बनाना गलत है। वहीं कॉन्ग्रेस विधायक सुखपाल सिंह खैरा ने हत्या की निंदा तो की लेकिन इसे बाहरी लोगों के ‘बिना नियंत्रण के आ रहे प्रवाह’ से जोड़ते हुए हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की तरह ऐसा कानून बनाने की माँग की, जिसमें जमीन खरीद और नौकरियों को स्थानीय लोगों तक सीमित किया जाए।

दूसरी ओर, शिरोमणि अकाली दल के नेताओं ने प्रवासियों की सख्त निगरानी की माँग की और कानून-व्यवस्था में चूक के लिए आम आदमी पार्टी की सरकार को जिम्मेदार ठहराया। अकाली दल के नेता दलजीत सिंह चीमा ने आरोपित के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की। वहीं आम आदमी पार्टी के सांसद राज कुमार चब्बेवाल ने पीड़ित परिवार से मुलाकात की। उन्हें आर्थिक सहायता और समर्थन का आश्वासन दिया।

इन राजनीतिक प्रतिक्रियाओं से साफ है कि पीड़ित को न्याय दिलाने की माँग तो सभी कर रहे हैं लेकिन प्रवासी मजदूरों के भविष्य को लेकर राय बँटी हुई है। कोई सख्ती की बात कर रहा है तो कोई समरसता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की। यह बहस अब केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रही बल्कि सामाजिक और राजनीतिक दिशा तय करने वाली बनती जा रही है।

प्रवासी मजूदर पंजाब के लिए इतने जरूरी क्यों?

पंजाब की अर्थव्यवस्था में प्रवासी मजदूरों की भागीदारी का पैमाना इतना बड़ा है कि इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। रिपोर्ट्स के अनुसार, राज्य में करीब 18 लाख प्रवासी मजदूर हैं। ये उद्योग और कृषि, दोनों क्षेत्रों में असंगठित मजदूरी का भारी बहुमत बनाते हैं। लुधियाना के औद्योगिक क्षेत्र में ही लगभग आठ लाख प्रवासी मजदूर उन फैक्ट्रियों को चलाते हैं जो वस्त्र, साइकिल और मशीन के पुर्जे बनाती हैं।

कृषि क्षेत्र में धान की रोपाई, फसल की कटाई और मंडियों के संचालन का लगभग पूरा दारोमदार उत्तर प्रदेश और बिहार से आए मजदूरों पर टिका हुआ है। कमिशन एजेंट्स का अनुमान है कि अगर प्रवासी मजदूर न हों तो कुछ ही दिनों में खरीद केंद्र ठप पड़ जाएँ। यहाँ तक कि पंजाब का घरेलू क्षेत्र भी उन पर आश्रित है। चाहे घरेलू कामकाज हो या फिर सड़क पर ठेले लगाने और छोटी-मोटी दुकानदारी का काम।

इसलिए ‘अर्थव्यवस्था की रीढ़’ का नारा सिर्फ एक नारा नहीं है बल्कि इस निर्भरता की सच्ची झलक है।

आगे क्या देखना होगा?

जैसा कि होशियारपुर मामला अभी जाँच के दायरे में है, उससे भी बड़ी चुनौती यह है कि राज्य इस पूरे असर को कैसे संभालेगा। क्या सरकार हस्तक्षेप कर पंचायतों के प्रस्तावों को रद्द करेगी और मजदूरों को भरोसा दिलाएगी? क्या उद्योग जगत की सुरक्षा की माँगें ठोस कदमों में बदलेंगी?

आने वाले हफ्तों में खासकर खरीद सीजन और बुआई के समय, यह बेहद अहम होगा कि पंजाब पीड़ित को न्याय दिलाने और अपनी अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने के बीच कैसे संतुलन बनाए। अगर प्रवासी मजदूर बड़ी संख्या में जाना शुरू कर दें तो इसके झटके तुरंत और बेहद गंभीर होंगे।

निष्कर्ष- दोषियों को सजा, आजाविका की रक्षा

पंजाब में 5 साल के बच्चे की हत्या ने स्वाभाविक रूप से लोगों में गुस्सा और पीड़ा पैदा की है। लेकिन यह गुस्सा सभी प्रवासियों के खिलाफ प्रतिक्रिया में नहीं बदलना चाहिए क्योंकि ऐसा करना त्रासदी को और गहरा करेगा और अव्यवस्था बढ़ाएगा।

उद्योग जगत, किसान और व्यापारी लगातार इस बात पर जोर दे रहे हैं कि प्रवासी कोई बाहरी नहीं बल्कि राज्य के रोजमर्रा के कामकाज के अनिवार्य सहयोगी हैं। संविधान उन्हें पंजाब में रहने और काम करने का अधिकार देता है और अधिकारियों की जिम्मेदारी है कि इस अधिकार की रक्षा हो।

दोषी को कानून का सामना करना होगा। उसे तुरंत और सख्त सजा मिलनी चाहिए। लेकिन लाखों निर्दोष मजदूर, जो पंजाब की गाड़ी को चलाते हैं, उन्हें किसी एक व्यक्ति के अपराध का शिकार नहीं बनाया जाना चाहिए। अब राज्य के सामने असली कसौटी यही है कि वह न्याय और निष्पक्षता दोनों को कैसे कायम रखता है।

मूल रूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। इस लिंक पर क्लिक कर विस्तार से पढ़ सकते है।

सेबी ने अडानी ग्रुप को हिंडनबर्ग मामले में क्लीन चिट दी, गौतम अडानी ने बताया सत्य की जीत: शेयरों में लगाया था हेरफेर का आरोप

अडानी ग्रुप को बड़ी राहत मिली है। भारतीय शेयर बाजार नियामक सेबी ने हिंडनबर्ग रिसर्च के आरोपों की गहन जाँच के बाद अडानी ग्रुप को क्लीन चिट दे दी है। ये खबर गुरुवार (18 सितंबर 2025) को सामने आई है।

आपको बता दें कि पिछले साल जनवरी 2023 में अमेरिकी कंपनी हिंडनबर्ग रिसर्च ने एक रिपोर्ट जारी की थी। इसमें अडानी ग्रुप पर गंभीर आरोप लगाए गए थे। उन्‍होंने कहा था कि अडानी समूह की कंपनियाँ शेयरों की कीमतें बढ़ाने, फंड का गलत इस्तेमाल और ऑडिट में धोखाधड़ी कर रही हैं। इसके अलावा स्टॉक मैनिपुलेशन और इनसाइडर ट्रेडिंग जैसे गंभीर इल्ज़ाम भी लगाए गए थे।

हिंडनबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया था कि अडानी ग्रुप की कुछ कंपनियों ने Adicorp Enterprises के जरिए पैसे ट्रांसफर किए। फिर Adicorp ने अडानी पावर को नियमों के खिलाफ लोन दिया। उनका कहना था कि 2020 में अडानी पोर्ट्स और अडानी पावर जैसी कंपनियों ने Adicorp को करीब 620 करोड़ रुपये उधार दिए, जो गलत था। लेकिन सेबी की जाँच में ये सारी बातें गलत साबित हुईं। सेबी ने कहा कि अडानी ग्रुप ने कोई नियम नहीं तोड़ा और न ही कोई वित्तीय गड़बड़ी हुई।

सेबी के होल-टाइम मेंबर कमलेश सी. वार्ष्णेय ने इस मामले का ऑर्डर जारी किया। उन्होंने कहा कि जाँच के बाद पता चला कि हिंडनबर्ग के आरोपों में कोई सच्चाई नहीं है। न तो मार्केट मैनिपुलेशन हुआ और न ही इनसाइडर ट्रेडिंग के सबूत मिले। इसलिए सेबी ने अडानी ग्रुप, गौतम अडानी, राजेश अडानी और कंपनियों जैसे अडानी पोर्ट्स, अडानी पावर और Adicorp Enterprises के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। इस फैसले से अडानी ग्रुप की इन कंपनियों को बड़ी राहत मिली है।

गौतम अडानी ने इस खबर पर खुशी जताई है। उन्होंने एक्स पर लिखा कि सेबी की जाँच से साफ हो गया कि हिंडनबर्ग के दावे बेबुनियाद थे। उन्होंने कहा कि पारदर्शिता और ईमानदारी हमेशा से उनकी पहचान रही है। साथ ही उन्होंने उन निवेशकों के दर्द को समझा, जिन्होंने हिंडनबर्ग की रिपोर्ट के बाद पैसे गँवाए। अडानी ने कहा कि जो लोग झूठी खबरें फैलाते हैं, उन्हें देश से माफी माँगनी चाहिए। उन्होंने अपनी भारत और देशवासियों के प्रति प्रतिबद्धता दोहराई और ‘सत्यमेव जयते’ व ‘जय हिंद’ का नारा लगाया।

हिंडनबर्ग की रिपोर्ट आने के बाद अडानी ग्रुप की कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट आई थी। इससे कई निवेशकों को नुकसान हुआ था। लेकिन अब सेबी के इस फैसले से बाजार में फिर से भरोसा लौट सकता है। सेबी ने इस केस को पूरी तरह बंद कर दिया है और कोई जुर्माना भी नहीं लगाया गया। ये फैसला अडानी ग्रुप के लिए बड़ी जीत मानी जा रही है। दूसरी ओर, कुछ लोग अभी भी इस मामले पर सवाल उठा सकते हैं, लेकिन सेबी का फैसला अब आखिरी है।

भारत-अमेरिका FTA वार्ता के बीच CEA का बयान, US टैरिफ का मामला जल्द हो जाएगा सही: रेसिप्रोकल ड्यूटी के भी 10-15% कम होने से बढ़ेगा ट्रेड

भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंधों को लेकर सकारात्मक संकेत सामने आए हैं। मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी अनंथा नागेश्वरन ने गुरुवार (18 सितम्बर 2025) को कहा कि अमेरिका भारत के आयात पर लगाए गए 25 फीसदी पीनल टैरिफ को 30 नवंबर के बाद वापस ले सकता है।

उन्होंने भरोसा जताया कि आने वाले महीनों में न सिर्फ यह दंडात्मक टैरिफ खत्म होगा बल्कि अमेरिका की ओर से लगाई गई रेसिप्रोकल ड्यूटी भी मौजूदा 25 फीसदी से घटाकर 10-15 फीसदी तक लाई जा सकती है।

मामला क्या है?

दरअसल, पिछले महीने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से भारत के बढ़ते तेल व्यापार को लेकर नाराजगी जताते हुए भारतीय आयात पर 25 फीसदी का अतिरिक्त पेनल टैरिफ लगा दिया था।

यह पहले से लागू 25 फीसदी रेसिप्रोकल टैरिफ के ऊपर था, जिससे भारत पर कुल टैरिफ 50 फीसदी तक पहुँच गया। इस डबल-लेयर्ड टैरिफ व्यवस्था ने भारतीय निर्यातकों की मुश्किलें बढ़ा दीं। टेक्सटाइल्स, इंजीनियरिंग गुड्स और फूड प्रोडक्ट्स जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ा, जिससे मार्जिन और प्रॉफिटेबिलिटी पर दबाव आ गया।

कोलकाता में मर्चेंट्स चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के कार्यक्रम में नागेश्वरन ने कहा कि हाल के हफ्तों में भारत-अमेरिका संबंधों में सकारात्मक बदलाव आया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच सोशल मीडिया और फोन कॉल पर हुई बातचीत से भी माहौल सुधरा है।

नागेश्वरन का मानना है कि जियोपॉलिटिकल परिस्थितियों के कारण लगाया गया यह पेनल टैरिफ ज्यादा दिन टिकेगा नहीं और 30 नवंबर के बाद इसे हटा लिया जाएगा।

भारत के चीफ ट्रेड नेगोशिएटर और वाणिज्य मंत्रालय के स्पेशल सेक्रेटरी राजेश अग्रवाल ने हाल ही में नई दिल्ली में अमेरिका के ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव ब्रेंडन लिंच से मुलाकात की। यह दोनों देशों के बीच टैरिफ विवाद पर पहली आमने-सामने की बातचीत थी। सूत्रों के मुताबिक इस चर्चा के बाद संभावना है कि अमेरिका न सिर्फ पेनल टैरिफ हटाए बल्कि रेसिप्रोकल ड्यूटी भी कम करे।

भारत की निर्यात स्थिति

भारत का निर्यात वर्तमान में 850 अरब अमेरिकी डॉलर(70.55 लाख करोड़ रुपए) के स्तर पर है और यह 1 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने की राह पर है, जो GDP का लगभग 25 फीसदी है। नागेश्वरन ने कहा कि यह एक स्वस्थ और खुली अर्थव्यवस्था का संकेत है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि टैरिफ घटने से भारतीय स्टील, एल्युमिनियम और अन्य इंडस्ट्रियल प्रोडक्ट्स को अमेरिका के बाजार में आसानी से जगह मिलेगी।

भारत-यूरोपीय संघ (EU) के बीच FTA समझौते के अंतिम दौर में पहुँचने के बाद अमेरिका भी व्यापार मोर्चे पर नरमी दिखा रहा है। यदि अमेरिका दंडात्मक टैरिफ वापस लेता है और रेसिप्रोकल ड्यूटी घटती है तो यह भारतीय निर्यातकों के लिए बड़ी राहत होगी और दोनों देशों के बीच व्यापारिक संबंध स्थिरता की ओर बढ़ेंगे।

BJP सरकार बनने के बाद से तरक्की की राह पर बढ़ा उत्तर प्रदेश, CM योगी ने गिनाए काम: 6 शहरों में मेट्रो-16 हवाई अड्डे, UP सबसे बड़े एक्सप्रेसवे नेटवर्क वाला राज्य

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गुरुवार (18 सितंबर 2025) को लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस दौरान मुख्यमंत्री ने बताया कि साल 2017 में उनकी सरकार बनने के बाद से यूपी में कितना विकास हुआ है। उन्होंने मेट्रो, हवाई अड्डों और एक्सप्रेसवे नेटवर्क के विस्तार जैसे बड़े बदलावों के बारे में बात की।

मेट्रो प्रोजेक्ट्स का तेजी विस्तार

सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि 2017 से पहले यूपी में एक भी शहर में मेट्रो नहीं चलती थी। लेकिन अब छह शहरों में मेट्रो चल रही है। यूपी में मेट्रो नेटवर्क 147.446 किलोमीटर का है। लखनऊ मेट्रो का दूसरा चरण (फेज-1बी) चारबाग से वसंतकुंज तक 11.165 किलोमीटर का होगा, जिसकी लागत 5,801.05 करोड़ रुपये है। इसे पूरा होने में पाँच साल लगेंगे।

लखनऊ मेट्रो 2017 में शुरू हुई थी। 2018 में लखनऊ मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन का नाम बदलकर उत्तर प्रदेश मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन किया गया, ताकि ये पूरे यूपी के मेट्रो प्रोजेक्ट्स को देख सके। कानपुर मेट्रो 2021 में शुरू हुई और सिर्फ 24 महीनों में बनकर तैयार हो गई, जो दुनिया में सबसे तेजी से बना मेट्रो प्रोजेक्ट है।

आगरा मेट्रो को प्राथमिकता कॉरिडोर में मार्च 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुरू किया। नोएडा मेट्रो भी दिल्ली एनसीआर के बड़े नेटवर्क का हिस्सा है, जिसे एक्वा लाइन कहते हैं। आगरा, गोरखपुर, वाराणसी और मेरठ में मेट्रो प्रोजेक्ट्स बन रहे हैं या प्लानिंग के आखिरी चरण में हैं। बरेली, झाँसी और प्रयागराज जैसे शहरों में भी मेट्रो का विस्तार होगा।

हवाई अड्डों की संख्या बढ़कर हुई 16

मुख्यमंत्री ने बताया कि 2017 से पहले यूपी में सिर्फ दो हवाई अड्डे थे लखनऊ और वाराणसी। अब यूपी में 16 हवाई अड्डे हैं। गौतम बुद्ध नगर में देश का सबसे बड़ा हवाई अड्डा बन रहा है, जो इस साल के अंत तक शुरू हो जाएगा। योगी ने कहा कि यूपी में अब देश का सबसे अच्छा नेशनल हाईवे नेटवर्क भी है।

एक्सप्रेसवे में यूपी सबसे आगे

सीएम योगी ने बताया कि पहले यूपी एक्सप्रेसवे के मामले में बहुत पीछे था, लेकिन अब गंगा एक्सप्रेसवे बनने के बाद यूपी के पास देश के कुल एक्सप्रेसवे नेटवर्क का सात फीसदी हिस्सा होगा। ये देश में सबसे बड़ा एक्सप्रेसवे नेटवर्क होगा।

वित्तीय अनुशासन और कल्याण योजनाएँ

सीएम योगी ने अपनी सरकार के वित्तीय प्रबंधन की तारीफ की। उन्होंने कहा कि केंद्र और राज्य सरकार की कल्याण योजनाओं से गरीबों को फायदा हो रहा है। पिछले आठ सालों में यूपी ने वित्तीय अनुशासन बनाए रखा है। भारत सरकार के FRBM नियमों के बावजूद, यूपी जैसे सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य ने तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बनने का रिकॉर्ड बनाया है।

यूपी बना देश के विकास का इंजन

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि यूपी अब देश की ग्रोथ का इंजन बन गया है। राज्य के लोग केंद्र सरकार की कल्याण योजनाओं का फायदा उठा रहे हैं और यूपी विकास की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा है।