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हिंदू लड़की को अब भी नोंच रहा होता लव जिहादी आशिक, यदि अनिरुद्धाचार्य महाराज ने न सुनी होती उस बेटी की व्यथा: जानिए कैसे हुआ देवरिया के ‘मीठा बलात्कार’ का पर्दाफाश

उत्तर प्रदेश के देवरिया का 18 साल का ‘लव जिहादी’ आशिक अंसारी कभी गिरफ्तार में नहीं आता, अगर कथावाचक अनिरुद्धाचार्य जी महाराज लोगों की समस्याएँ नहीं सुनते। ऐसे ही अपनी समस्या लेकर उनके दरबार में 16 साल की नाबालिग लड़की पहुँची और उसने अपनी पीड़ा साझा की। उसने बताया कि आशिक अंसारी ने उसको फँसाया और बलात्कार किया, यहाँ तक कि पैसे भी हड़पे। लड़की की बातचीत सोशल मीडिया पर वायरल हुई, तो क्षेत्र के BJP विधायक डॉ. शलभ मणि त्रिपाठी ने संज्ञान लिया और पुलिस अधीक्षक को कार्रवाई की माँग करते हुए पत्र लिखा। तब जाकर आशिक अंसारी को पुलिस ने पकड़ा।

ये अनिरुद्धाचार्य और नाबालिग लड़की के बीच संवाद के कुछ अंश हैं, बाकी मामले की पूरी जानकारी विस्तार में नीचे दी गई है।

लड़की: राधे राधे गुरु जी।
अनिरुद्धाचार्य: आप किससे प्यार करती हो?
लड़की: हमारी कास्ट का नहीं है, मुस्लिम है।
अनिरुद्धाचार्य: तो मुस्लिम से कब से प्यार करती हो?
लड़की: दो साल से, 16 साल की हूँ अभी।
अनिरुद्धाचार्य: कहाँ का है लड़का?
लड़की: हमारे गाँव के चौराहे का है।
अनिरुद्धाचार्य: क्या नाम है?
लड़की: आशिक अंसारी
अनिरुद्धाचार्य: आप लोग मिलते भी हो?
लड़की: हाँ, साथ में स्कूल में पढ़ते थे। पहले घूमते थे, अब सिर्फ बात करते हैं।
अनिरुद्धाचार्य: आपकी उम्र पढ़ने की है या प्यार करने की।
लड़की: पढ़ने की।
अनिरुद्धाचार्य: तो पहले पढ़-लिख लो, योग्य बन जाओ। वो लड़का कितने साल का है?
लड़की: 18 साल का है।
अनिरुद्धाचार्य: वो आपको फँसा रहा है। अपनी से छोटी उम्र की लड़कियों से लव जिहाद करने वाला है। आपकी माँ बता रही थी कि उस लड़के ने आपसे पैसे भी माँगे थे। आपने कितने पैसे दिए?
लड़की: ₹29 हजार
अनिरुद्धाचार्य: कहाँ से लाए थे?
लड़की: मम्मी से चुराए थे।
अनिरुद्धाचार्य: बताओ आप मम्मी से पैसे चुराकर दे रही हो। आज वो पैसे माँग रहा है, फिर वो लव जिहाद करेगा। आपको प्यार में फँसाकर दूसरे देश या राज्य में बेच देगा। जो आपसे अभी पैसे माँग रहा है, तो कल वो आपको बाजार में बेच देगा। फिर आपके साथ लोग वेश्याओं की तरह व्यवहार करेंगे। तो बताओ आपको लव जिहाद के चक्कर में, ऐसे प्यार के चक्कर में पड़ना चाहिए? आप पढ़ती हो?
लड़की: हाई स्कूल में फेल हो गए थे।
अनिरुद्धाचार्य: अब प्यार करोगी तो फेल ही होगी। अब उससे बात मत करना। मुस्लिम ऐसे ही हैं, हिंदू लड़की से बात करते हैं फिर शोषण करने लगते हैं। आपका शारीरिक शोषण भी किया उसने?
लड़की: हाँ
अनिरुद्धाचार्य: फिर, देखो। 18 साल का है और ये लड़की 16 साल की है। तो ये बलात्कार हुआ कि नहीं। इन लोगों पर केस होना चाहिए। बेटा आपके साथ जो हो रहा है उसे लव जिहाद कहते हैं। ऐसी कई लड़कियाँ शोषित हुई हैं। अब आप बताओं और लड़कियों को क्या कहना चाहोगी?
लड़की: गुरु जी हम ऐसे नहीं थे। अपनी सहेली के साथ रहते थे, तो वो भी मुस्लिम लड़कों से बात करती थी, तो हम भी शुरू किए।
अनिरुद्धाचार्य: सोचिए, ग्राउंड लेवल पर किस तरह लव जिहाद घुसा पड़ा है। 16-16, 15-15 साल की लड़की मासूम होती हैं, तो वहीं से ब्रेनवॉश करना शुरू कर देते हैं। 18 साल की होते ही धर्मांतरण करा देंगे। फिर इन लड़कियों को ले जाकर दुबई में, कनाडा में ₹5-10 लाख में बेच देंगे। वे आपकी जैसी 5 लड़कियों को भी बेचेंगे तो ₹40-50 लाख तो सालभर में कमा लिए उसने। सही है या गलत है। अब आपकी तीन सहेली और हैं।
लड़की: हम तीन सहेली को जानते हैं, लेकिन क्लास में सभी लड़कियाँ मुस्लिम लड़कों से ही बात करती थीं। स्कूल में ऐसी 300-400 लड़कियाँ हैं।
अनिरुद्धाचार्य: स्कूल सरकारी है या प्राइवेट?
लड़की: यादवों का स्कूल है।
अनिरुद्धाचार्य: मुस्लिम लड़कों का स्कूल में पढ़ना तो बहाना है, लव जिहाद में फँसाना है। मैं हजारों लड़कियों को समझा चुका हूँ। एक लड़की ये है। अब आप नहीं करोगी न? अब आपको हिंदू शेरनी बनना है, आपको बाकी हिंदू लड़कियों को बचाना है। आप गाँव की बाकी लड़कियों को भी जागरूक करिए। सही है या गलत? अब आपको पढ़-लिखकर डॉक्टर-इंजीनियर बनना चाहिए। ये लड़के तो चाहते हैं आपका शोषण करना, वो तो जिहादी है, वो तो चाहता ही है शोषण करना, अब इसमा आपकी गलती है या उसकी?
लड़की की माँ: कई बार बलात्कार कर चुका है वो लड़का।

अनिरुद्धाचार्य जी महाराज को लड़की ने क्या बताया?

देवरिया की रहने वाली लड़की ने अपना नाम बताते हुए अनिरुद्धाचार्य जी महाराज को आपबीती सुनाई। उसने बताया कि वह 14 साल की थी, जब स्कूल जाते हुए आशिक अंसारी नाम के मुस्लिम लड़के ने उससे बात करनी शुरू की, तब वह लड़का भी 16 साल का था। अंसारी ने धीरे-धीरे युवती से दोस्ती बढ़ाई और प्रेमजाल में फँसा लिया।

लड़की ने बताया कि उसने मुस्लिम लड़के से बात करना इसीलिए आम बात समझी क्योंकि उसकी सहेलियाँ और स्कूल की अधिकतर लड़कियाँ मुस्लिम लड़कों के संपर्क में थीं। तब उसने भी आशिक अंसारी से बात करनी शुरू की, लेकिन वह इसके पीछे रचे गए षडयंत्र से बिल्कुल अनजान थी। लड़की ने बताया कि उस लड़के ने इस कदर ब्रेनवॉश कर दिया कि वह अपने परिवार के खिलाफ जाने लगी। लड़की ने बताया कि उसके चक्कर में वह हाई स्कूल में भी फेल हो गई।

लड़की की आपबीती: ₹29 हजार ऐंठे, पैसे नहीं देती तो पीटता

लड़की ने अनिरुद्धाचार्य जी महाराज को बताया कि आशिक अंसारी उससे पैसे माँगता था। उससे ₹29 हजार ऐंठ लिए, एक ₹10 हजार का फोन और एक साइकिल भी ले ली। लड़की ने बताया कि अगर वो पैसे या उसकी कही चीज नहीं देती थी, तो वह उसके साथ मारपीट करता था।

लड़की ने बताया कि वह पैसे देने के लिए इस हद तक मजबूर करता था कि वह अपनी मम्मी से चुराकर उसे पैसे देती थी। लड़की ने कहा कि आशिक अंसारी उसके साथ मंदिर में शादी कर चुका है, उसने कहा कि उनके मजहब में मंदिर नहीं जाते, लेकिन वह सिर्फ उसके लिए आया है। लड़की ने बताया कि इन सारी बातों से उसे लड़के पर भरोसा हो जाता था।

लड़की से कई बार किया रेप, अन्य हिंदू लड़कियों को भी फँसा चुका

अनिरुद्धाचार्य से लड़की ने यह भी बताया कि आशिक अंसारी कई बार उसका शारीरिक शोषण भी कर चुका है। लड़की की माँ ने इसे बलात्कार बताया। लड़की ने कहा कि उससे पहले भी आशिक अंसारी किसी हिंदू लड़की को फँसा चुका था और अब भी किसी हिंदू लड़की के साथ ही है।

लड़की की आपबीती सुन अनिरुद्धाचार्य जी महाराज ने क्या कहा?

लड़की की आपबीती सुनकर अनिरुद्धाचार्य जी महाराज ने साफ कहा कि लड़की ने नाबालिग लड़की को लव जिहाद में फँसाया और इसके लिए स्कूल और माँ-बाप दोनों जिम्मेदार हैं। उन्होंने लड़की को आगाह करते हुए कहा कि ऐसे मुस्लिम लड़के प्रेमजाल में फँसाकर लड़कियों को बेचने का काम करते हैं। अनिरुद्धाचार्य ने लड़की को बेहतर जीवन जीने की सीख दी और लव जिहाद से बचकर रहने की सलाह दी।

कथावाचक ने इसे बड़े पैमाने में लव जिहाद बताते हुए कहा, “ग्राउंड लेवल पर जिहाद घुसा पड़ा है। 16-16, 15-15 साल की लड़कियाँ मासूम होती हैं, तो वहीं से ब्रेनवॉश करना शुरू कर देते हैं। 18 साल की होते ही धर्मांतरण करा देंगे। फिर इन लड़कियों को ले जाकर दुबई में, कनाडा या किसी और देशे में ₹5-5 लाख या ₹10-10 लाख में बेच देंगे। इनका एजेंडा है हिंदू लड़कियों को फँसाना। कोई भी मुस्लिम कभी हिंदू का सगा नहीं हो सकता। कोई कितना भी कहे कि मेरा अब्दुल ऐसा नहीं हो सकता, उससे कहो तेरा ही अब्दुल ऐसा है।”

अनिरुद्धाचार्य जी महाराज ने लड़की को सीख दी कि वह मुस्लिम लड़के से बात करना बंद कर दे और पढ़-लिखकर कामयाबी हासिल करे। उन्होंने लड़की से कहा कि अब हिंदू शेरनी बनो और अपनी जैसी बाकी हिंदू लड़कियों को बचाओ। लड़की ने भी कथावाचक से वादा किया कि अब वह कभी भी उस मुस्लिम लड़के आशिक अंसारी से बात नहीं करेगी। साथ ही कथावाचक ने लड़की को मुस्लिम लड़के के खिलाफ रेप का केस दर्ज करने की सलाह भी दी।

मामले में देवरिया के विधायक ने पत्र लिखकर पुलिस से कार्रवाई की माँग की

अनिरुद्धाचार्य जी महाराज की कथा में 16 साल की लड़की को आपबीती सुनाते यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इसके बाद देवरिया सदर से BJP विधायक डॉ. शलभ मणि त्रिपाठी ने जिला पुलिस अधीक्षक को पत्र लिखकर मामले में कार्रवाई करने की माँग की।

पत्र में विधायक त्रिपाठी ने कहा कि अनिरुद्धाचार्य जी महाराज की कथा में पिछड़े वर्ग के यदुवंशी समाज से आने वाली इस नाबालिग लड़की ने अपने साथ एक ‘जिहादी’ आशिक अंसारी द्वारा शारीरिक शोषण किए जाने की बात कही है। आशिक अंसारी ने उससे स्कूल में संपर्क किया, उसे बहला-फुसलाकर अपने झाँसे में लिया और बाद में उसके साथ मारपीट, शारीरिक और मानसिक शोषण जैसे गंभीर अपराध को अंजाम दिया।

पत्र में लड़की की अन्य हिंदू लड़कियों द्वारा मुस्लिम लड़कों के जाल में फँसने वाली बात पर भी प्रकाश डाला गया। पत्र में लड़की के साथ हुई घटना को गंभीर, चिंताजनक और कानून-व्यवस्था के तहत संवेदनशील बताया है। यह लिखते हुए विधायक ने अपने पत्र में पुलिस अधीक्षक से तुरंत FIR दर्ज करते हुए दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की। साथ ही विधायक ने इस मामले में वीडियो जारी करते हुए अपनी बात दोहराई।

पुलिस की कार्रवाई, आशिक अंसारी गिरफ्तार

उधर, 10 मई 2026 को नाबालिग लड़की की माँ ने भी बरियारपुर पुलिस थाने में आरोपित आशिक अंसारी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। इस पर तुरंत संज्ञान लेते हुए पुलिस ने आरोपित आशिक अंसारी को मंगलवार (12 मई 2026) को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में लेकर जेल भेज दिया।

थाना इंचार्ज मनोज कुमार ने बताया कि आरोपित के खिलाफ BNS की धारा 64(1) और पॉक्सो एक्ट की धारा 3 और 4 के तहत कार्रवाई की गई है।

वहीं नाबालिग लड़की के स्कूल में हिंदू लड़कियो को मुस्लिम लड़कों द्वारा फँसाने वाले आरोपों को स्कूल प्रशासन नकार दिया है।

निर्भया को इंसाफ दिलाने वाली अधिवक्ता ने UP की NCRB रिपोर्ट को बताया उपलब्धि, बोलीं- मजबूत इच्छाशक्ति से बदली तस्वीर: जानिए सीमा कुशवाहा ने क्यों की CM योगी के सुशासन की सराहना

उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ अपराधों से जुड़े मामलों में सुनवाई और दोषसिद्धि की दर को लेकर राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) 2024 की रिपोर्ट ने एक बार फिर राज्य की कानून-व्यवस्था पर राष्ट्रीय बहस को तेज कर दिया है।

इस रिपोर्ट के आंकड़ों ने न सिर्फ उत्तर प्रदेश की न्यायिक और प्रशासनिक प्रणाली को सामने रखा बल्कि यह भी दिखाया कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति साफ हो, पुलिस-प्रशासन के स्तर पर सख्ती हो और अभियोजन तंत्र सक्रिय रहे तो जटिल और बड़े राज्य में भी अपराधियों को सजा दिलाने की रफ्तार बढ़ाई जा सकती है।

इसी कड़ी में सुप्रीम कोर्ट की वकील सीमा कुशवाहा ने टाइम्स ऑफ इंडिया में एक लेख लिखा है। इसमें उन्होंने NCRB की रिपोर्ट में यूपी के आंकड़ों की सराहना की है। उन्होंने यूपी की उपलब्धि को एक ‘मॉडल’ बताकर अन्य राज्यों को भी अपनाने का सुझाव दिया है।

कौन हैं सीमा कुशवाहा

सीमा कुशवाहा का नाम राष्ट्रीय स्तर पर कोई नया नहीं है। वे निर्भया मामले में पीड़िता पक्ष की वकील रही हैं और महिलाओं के अधिकार, पीड़िता न्याय तथा सामाजिक सुधार से जुड़े मुद्दों पर मुखर रहीं हैं। बाद में उन्होंने राजनीति में भी कदम रखा।

अलग-अलग चरणों में वे बहुजन समाज पार्टी से जुड़ी रहीं और पार्टी की पहली महिला राष्ट्रीय प्रवक्ता भी बनीं। उनके बयानों को केवल कानूनी टिप्पणी नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और सामाजिक संदेश के रूप में भी देखा जाता है। ऐसे में यूपी की NCRB रिपोर्ट पर उनकी प्रतिक्रिया का महत्व और बढ़ जाता है।

NCRB रिपोर्ट क्यों है चर्चा में

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी NCRB की रिपोर्ट देश में अपराधों के पैटर्न, न्यायिक प्रक्रिया, पुलिस-तंत्र और आपराधिक मामलों की स्थिति को समझने का प्रमुख सरकारी दस्तावेज मानी जाती है।

यह रिपोर्ट केवल यह नहीं बताती कि किस राज्य में कितने अपराध दर्ज हुए, बल्कि यह भी दिखाती है कि किन मामलों में सुनवाई हुई, कितने मामलों का निस्तारण हुआ, कितनों में दोषसिद्धि हुई और न्यायिक प्रणाली किस रफ्तार से काम कर रही है।

खासकर महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामले में दोषसिद्धि की दर बहुत अहम मानी जाती है, क्योंकि इससे यह समझ आता है कि दर्ज एफआईआर सिर्फ कागजों तक सीमित हैं या वास्तव में वे न्याय तक पहुँच रही हैं।

उत्तर प्रदेश जैसी विशाल जनसंख्या और विविध सामाजिक संरचना वाले राज्य के लिए यह डेटा और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। अक्सर बड़े राज्यों में केसों की संख्या भी अधिक होती है, लंबित मामलों का बोझ भी ज्यादा होता है और पुलिस-न्याय प्रणाली पर दबाव भी अत्यधिक रहता है।

इसके बावजूद अगर किसी राज्य में conviction rate यानी दोषसिद्धि दर बढ़ता है, तो उसे केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि सिस्टम की कार्यक्षमता का संकेत माना जाता है।

यूपी के आंकड़े क्या कहते हैं

NCRB की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में UP में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के 3,52,664 मामले ट्रायल के लिए लंबित थे। इनमें से 27,639 मामलों में सुनवाई पूरी हुई और 21,169 आरोपी दोषी ठहराए गए। रिपोर्ट के अनुसार यह देश में सबसे अधिक संख्या है।

सीमा ने लिखा कि इस रिपोर्ट में शामिल है कि कुल 27,743 मामलों का निस्तारण हुआ। यानी यूपी ने बड़ी संख्या में मामलों को निपटाने में सफलता हासिल की। इसके साथ ही राज्य का conviction rate 76.6% बताया गया है, जो एक प्रभावशाली दर है।

इसका मतलब ये है कि जिन मामलों की सुनवाई पूरी हुई, उनमें से बड़ी संख्या में आरोपी दोषी पाए गए। न्याय-प्रणाली की भाषा में यह एक मजबूत संकेत है कि पुलिस जाँच, अभियोजन और अदालतों की प्रक्रिया अपेक्षाकृत बेहतर तालमेल के साथ काम कर रही है।

रिपोर्ट में अन्य बड़े राज्यों की तुलना भी की गई है। उदाहरण के तौर पर महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, केरल, पंजाब और तमिलनाडु जैसे राज्यों के मुकाबले यूपी का प्रदर्शन बेहतर बताया गया है।

खास बात यह है कि कई मामलों में यूपी ने उन राज्यों को भी पीछे छोड़ा जिनकी प्रशासनिक संरचना छोटे आकार या अपेक्षाकृत कम आबादी के कारण अधिक चुस्त मानी जाती है। यही कारण है कि इस रिपोर्ट को केवल एक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक संस्थागत उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।

सीमा कुशवाहा का लेख क्या कहता है

सीमा कुशवाहा ने इस रिपोर्ट को लेकर जो रुख अपनाया, वह स्पष्ट रूप से सकारात्मक है। उन्होंने कहा कि यह रिपोर्ट साबित करती है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति मजबूत हो, प्रशासनिक मशीनरी सक्रिय रहे और न्यायिक प्रक्रिया में सख्ती बरती जाए तो बड़े और घनी आबादी वाले राज्य में भी उत्कृष्ट न्याय दिया जा सकता है।

सीमा के अनुसार, उत्तर प्रदेश ने यह दिखाया है कि महिलाओं की सुरक्षा और अपराधियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई केवल नारे नहीं, बल्कि प्रभावी नीति और प्रशासनिक संकल्प से संभव है।

उनकी टिप्पणी में तीन बातें विशेष रूप से उभरती हैं। पहली, उन्होंने दोषसिद्धि दर को शासन की उपलब्धि बताया। दूसरी, उन्होंने इसे महिलाओं की सुरक्षा के व्यापक संदर्भ में जोड़ा। तीसरी, उन्होंने संकेत दिया कि यूपी का मॉडल दूसरे राज्यों के लिए भी उपयोगी हो सकता है।

उनका यह दृष्टिकोण बताता है कि वे NCRB रिपोर्ट को महज तकनीकी डेटा की तरह नहीं देख रही हैं, बल्कि एक राजनीतिक-सामाजिक बदलाव के प्रमाण के तौर पर प्रस्तुत कर रही हैं।

राजनीतिक पृष्ठभूमि का असर

सीमा कुशवाहा की राजनीतिक पृष्ठभूमि उनके बयान को और भी दिलचस्प बनाती है। वे केवल एक वकील नहीं हैं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा भी रही हैं।

BSP से उनकी निकटता और बाद में BJP में शामिल होने की खबरों ने उन्हें एक ऐसे सार्वजनिक व्यक्तित्व के रूप में स्थापित किया है, जिनकी बात को लोग अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोण से पढ़ते हैं। इसलिए जब वे यूपी सरकार की तारीफ करती हैं, तो इसे सिर्फ निष्पक्ष कानूनी राय के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि उसके राजनीतिक अर्थ भी निकाले जाते हैं।

यह बात भी महत्वपूर्ण है कि उनके बयान में आलोचना की तुलना में प्रशंसा का स्वर अधिक है। वे यह स्वीकार करती हैं कि लंबित मामलों, फास्ट ट्रैक कोर्टों की संख्या, अभियोजन की गुणवत्ता और साइबर अपराध जैसे क्षेत्रों में अभी काम बाकी है। लेकिन इन सीमाओं के बावजूद उनका मुख्य निष्कर्ष सकारात्मक है। यानी वे कहती हैं कि व्यवस्था में सुधार संभव है और यूपी ने उस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है।

महिलाओं की सुरक्षा पर संदेश

इस पूरे विवाद या बहस का सबसे महत्वपूर्ण पहलू महिलाओं की सुरक्षा है। NCRB की रिपोर्ट केवल दोषसिद्धि की दर नहीं बताती, बल्कि यह भी संकेत देती है कि महिला पीड़िताओं को न्याय देने की प्रक्रिया किस हद तक तेज हुई है।

जब अदालतें मामलों को समय पर निपटाती हैं और दोषियों को सजा मिलती है, तो समाज में एक निवारक प्रभाव (deterrent effect) या डर का माहौल पैदा होता है। अपराधियों को यह संदेश जाता है कि कानून केवल दर्ज होने वाली प्रक्रिया नहीं, बल्कि वास्तविक परिणाम देने वाली व्यवस्था है।

सीमा कुशवाहा ने इसी बिंदु को अपने लेख का केंद्रीय आधार बनाया है। उन्होंने कहा कि जब criminal justice system में accountability बढ़ती है, तो महिला सुरक्षा भी मजबूत होती है।

उनके मुताबिक UP ने एंटी रोमियो स्क्वाड, फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट्स, पुलिस की जवाबदेही और अभियोजन दक्षता (prosecutorial efficiency) के जरिये एक ऐसा ढाँचा तैयार किया है जो महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर असर डाल सकता है।

यह बात पूरी तरह सही हो या नहीं, इस पर बहस हो सकती है, लेकिन इतना तय है कि उनका विमर्श राज्य को सुरक्षा और न्याय के सकारात्मक उदाहरण के रूप में रखता है।

उपलब्धि के साथ चुनौतियाँ भी

हालाँकि रिपोर्ट की सकारात्मक तस्वीर के बावजूद कई चुनौतियाँ बनी हुई हैं। सबसे बड़ी समस्या लंबित मामलों की भारी संख्या है। 3,52,664 मामलों का पेंडिंग रहना यह बताता है कि न्याय प्रणाली पर अभी भी बहुत बोझ है।

इसके अलावा conviction rate अच्छा होना महत्वपूर्ण है, लेकिन अगर केस वर्षों तक लंबित रहें, तो पीड़ितों को पूरा न्याय नहीं मिल पाता। न्याय में देरी, कई बार न्याय से इनकार के बराबर मानी जाती है। इसलिए दोषसिद्धि की अच्छी दर के साथ-साथ समयबद्ध सुनवाई भी बेहद जरूरी है।

इसके अलावा साइबर अपराध, दहेज उत्पीड़न, घरेलू हिंसा, यौन अपराध, ट्रैफिकिंग और आर्थिक शोषण जैसे मामलों पर और गंभीर ध्यान देने की आवश्यकता है। आधुनिक अपराधों की प्रकृति बदल रही है, इसलिए पुलिस और अभियोजन प्रणाली को भी लगातार अपडेट होना पड़ेगा।

सीमित संसाधनों या पुराने ढाँचों से काम नहीं चलेगा। इस दिशा में डिजिटल फॉरेंसिक, महिला पुलिस कर्मियों की संख्या बढ़ाना, संवेदनशील जाँच प्रक्रिया और पीड़ित-केंद्रित न्याय प्रणाली को और मजबूत करना होगा।

क्या UP सच में ‘मॉडल’ हो सकता है

सीमा कुशवाहा ने यूपी के प्रदर्शन को एक ‘मॉडल’ के रूप में पेश किया है। यह दावा पूरी तरह राजनीतिक या प्रतीकात्मक नहीं है, क्योंकि आँकड़े सचमुच मजबूत हैं। लेकिन किसी राज्य को मॉडल कहने के लिए केवल conviction rate काफी नहीं होता।

उस राज्य में यह भी देखना होगा कि अपराध दर्ज करने की प्रक्रिया कितनी निष्पक्ष है, पीड़ितों को रिपोर्ट लिखवाने में कितनी सुविधा है, जाँच कितनी पारदर्शी है और समाज के कमजोर वर्गों और आखिरी तबके तक न्याय किस समानता के साथ पहुँच रहा है। यानी ‘मॉडल’ की परिभाषा व्यापक होनी चाहिए।

फिर भी यह मानना पड़ेगा कि यूपी जैसे बड़े राज्य में यदि महिलाओं से जुड़े मामलों में सजा दिलाने की दर ऊँची है, तो यह एक उल्लेखनीय उपलब्धि है। खासकर उस राज्य में, जिसे लंबे समय तक कानून-व्यवस्था की चुनौतियों, प्रशासनिक जटिलताओं और न्यायिक बोझ के कारण आलोचना झेलनी पड़ी।

रिपोर्ट का व्यापक राजनीतिक अर्थ

उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था पर राष्ट्रीय चर्चा हमेशा से राजनीतिक रही है। किसी सरकार के लिए आपराधिक डेटा केवल प्रशासनिक सूचकांक नहीं होता, बल्कि राजनीतिक पूँजी भी बन जाता है। अगर दोषसिद्धि दर बढ़ती है तो सरकार इसे अपनी सख्ती और व्यवस्था-निर्माण की सफलता बताती है।

कुल मिलाकर सीमा कुशवाहा का बयान यूपी की NCRB रिपोर्ट पर एक सकारात्मक, प्रशंसात्मक और समर्थन करने वाला बयान है। उन्होंने उत्तर प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामलों में बढ़ी हुई दोषसिद्धि दर को मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक सख्ती और न्यायिक दक्षता का नतीजा बताया है।

उनके मुताबिक यूपी ने यह सिद्ध किया है कि बड़ा राज्य होने के बावजूद प्रभावी न्याय संभव है। साथ ही उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि लंबित मामलों, अभियोजन तंत्र और साइबर अपराधों पर अभी और काम करने की जरूरत है।

इसलिए यदि इस खबर को निष्पक्ष रूप से देखा जाए, तो यह सिर्फ एक आंकड़ों की रिपोर्ट नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था और महिला सुरक्षा के क्षेत्र में आई एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक उपलब्धि की कहानी है।

सीमा कुशवाहा का लेख इस कहानी को और मजबूत बनाता है। उन्होंने इस उपलब्धि को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया है और यूपी को एक ऐसे राज्य के रूप में दिखाया है, जहाँ सुधार संभव ही नहीं, बल्कि दिखाई भी दे रहे हैं।

NEET पेपर लीक की पूरी पड़ताल: ₹5 लाख तक में बिके 600 नंबर वाले ‘गेस पेपर’, जानें- डॉक्टर-कोचिंग सेंटर-एन्क्रिप्टेड ऐप्स का रोल और कैसे काम करता था सिंडिकेट

नीट 2026 की परीक्षा पेपर लीक की वजह से रद्द कर दी गई। नया डेट जल्द ही NTA घोषित करेगा। ‘गेस पेपर’ के रूप में लीक हुए करीब 600 अंक से सवालों की जाँच राजस्थान, बिहार, केरल समेत कई जगहों पर की जा रही है। सवाल ये है कि वास्तव में ये गेस पेपर था या नीट 2026 के प्रश्नपत्र में बड़ा हिस्सा, जिससे रिजल्ट के वारे- न्यारे हो जाने थे।

‘गेस पेपर’ के रूप में लीक हुआ प्रश्नपत्र

गेस पेपर के रूप में प्रश्नपत्र लीक किया गया। गेस पेपर व्हाट्स एप पर तेजी से वायरल हुआ। परीक्षा से एक दिन पहले हाथ से लिखा गया ‘गेस पेपर’ छात्रों को दिया गया। इसके 140-150 सवाल हुबहू नीट के प्रश्नपत्र से मैच कर गए। जानकारी के मुताबिक बायोलॉजी के सभी 90 सवाल और रसायन विज्ञान के करीब 45 सवाल इस गेस पेपर में मौजूद थे। नीट की परीक्षा में 180 सवाल पूछे जाते हैं और एक ही पेपर होता है। ये पेपर 720 नंबर का होता है। ऐसे में ‘गेस पेपर’ से करीब 600 नंबर के सवाल एकदम एक जैसे थे। यहाँ तक कि उत्तर के विकल्प का क्रम भी समान था।

ये गेस पेपर दो दिन पहले ही राजस्थान के सीकर के छात्रों तक पहुँच गए।

राजस्थान पुलिस के स्पेशल ऑपरेशन्स ग्रुप के एडिशनल डायरेक्टर जनरल विशाल बंसल के मुताबिक, NEET के ‘गेस पेपर’ में करीब 410 सवाल हैं। इनमें से 120 सवाल परीक्षा में पूछे गए थे। बताया जा रहा है कि ये ‘गेस पेपर’ स्टूडेंट्स के बीच काफी पहले से सर्कुलेट होने लगा था। 3 मई की परीक्षा से करीब 15 दिन या महीने भर पहले छात्र-छात्राओं को ये गेस पेपर मिलना शुरू हो गया था।

इंडिया टुडे ने सूत्रों के हवाले से बताया है कि गेस पेपर परीक्षा से दो दिन पहले 5-5 लाख रुपए में बिके, लेकिन परीक्षा से एक रात पहले इसे 50-50 हजार में बेचा गया, ताकि अधिक से अधिक पैसे कमाए जा सकें। इस मामले में पुलिस ने जिन लोगों ने हिरासत में लिया, उनके मोबाइल पर ये मैसेज ‘फॉर्वडेड मेनी टाइम्स’ दिख रहा है अर्थात इस मैसेज को कई बार ‘सेंड’ किया गया।

राजस्थान पुलिस ये भी पता लगा रही है कि क्या इस गेस पेपर के आधार पर कोई चीटिंग या क्रिमिनल एक्टिविटी हुई है।

केरल से जुड़ा कनेक्शन

इंडिया टुडे के मुताबिक, गेस पेपर का लिंक राजस्थान के चूरू से गए एक छात्र से जुड़ा है, जो केरल में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहा है। उसने 1 मई को अपने दोस्त को ये गेस पेपर भेजे थे। केरल के एमबीबीएस छात्र को पुलिस ने हिरासत में ले लिया और उससे पूछताछ की जा रही है।

जानकारी के मुताबिक उसके दोस्त ने इसे पीजी संचालक को दिया और वहाँ रहने वाले छात्रों, करियर काउंसलर से होते हुए दूसरे जगहों के स्टुडेंट्स तक पहुँचा। इसको लेकर पीजी संचालक भी जाँच एजेंसियों के रडार पर है। हालाँकि परीक्षा के बाद इसी ने सीकर के उद्योग नगर पुलिस थाने में जाकर पेपर लीक की शिकायत की और NTA को भी जानकारी दी।

जाँच में सामने आया है कि उसे पेपर परीक्षा से पहले मिल चुका था और उसने स्टूडेंट्स को आगे बढ़ाया। बताया जा रहा है कि पकड़े जाने के डर से उसने पुलिस को जानकारी दी।

जाँच कर रही पुलिस की टीम ने सीकर के कई कोचिंग सेंटर्स के मालिकों से पूछताछ की है। इसमें लिंक का पता चला और जयपुर के कई कोचिंग सेंटर्स में जाँच के बाद जाँच टीम गुरुग्राम पहुँची।

एसओजी की जाँच में पता चला है कि मनचाहे रेट पर पेपर बाँटा गया। यह नासिक, सीकर- जयपुर, केरल, देहरादून, गुरुग्राम, बिहार, जम्मू कश्मीर तक पहुँचा। अब इस मामले की जाँच सीबीआई को सौंप दी गई है।

गुरुग्राम का नाम अहम ट्रांजिट पॉइंट के रूप में सामने आया है। जाँच रिपोर्ट के मुताबिक, नासिक की एक प्रिंटिंग प्रेस से पेपर की फिजिकल कॉपी लीक हुई थी, जिसे गुरुग्राम लाया गया था। ये पेपर गुरुग्राम के एक डॉक्टर को भी दी गई। इसके डुब्लीकेट कॉपी सेट तैयार किए गए।

जाँच के दौरान पुलिस ने दिल्ली के महिपालपुर से किर्गिस्तान से एमबीबीएस कर आए डॉक्टर अखलाक अहमद को गिरफ्तार किया है । उसकी भूमिका को लेकर पुलिस पूछताछ कर रही है। उसके अलावा दो अन्य लोगों को भी पुलिस ने पकड़ा है।

ये बात भी सामने आ रही है कि गेस पेपर का फैलाव सिर्फ व्हाट्स एप के जरिए ही नहीं हुआ, बल्कि एंड टू एंड एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग एप्स पर भी इसे शेयर किए गए। बताया जा रहा है कि ‘गेस पेपर’ का प्रिंट आउट निकालकर ऑफलाइन भी स्टूडेंट्स को दिया गया।

अब सवाल यह उठता है कि यह नेटवर्क कहाँ तक फैला हुआ है और इसका मास्टरमाइंड कौन है?

पेपर लीक पर बनी कमेटी की सुझाव

2024 में हुए नीट पेपर लीक को लेकर केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय ने इसरो के पूर्व अध्यक्ष के राधाकृष्णन की अध्यक्षता में 7 सदस्यीय कमेटी का गठन किया था। कमेटी में AIIMS के पूर्व निदेशक डॉ. रणदीप गुलेरिया, हैदराबाद यूनिर्वसिटी के कुलपति बीजे राव, IIT मद्रास के प्रोफेसर पंकज बंसल, IIT दिल्ली के प्रोफेसर अदित्य मित्तल और शिक्षा मंत्रालय के संयुक्त सचिव गोविन्द जैसवाल शामिल थे।

कमेटी ने 101 सिफारिशों की लिस्ट सौंपी थी। इसमें एनटीए का पुनर्गठन करने और इसकी तीन उप समितियाँ बनाने को कहा था। NTA की क्षमता बढ़ाने की सिफारिश की थी। दूसरी परीक्षाओं से दूरी बनाए रखने को कहा था।

चुनाव की तरह परीक्षा कराने को गया था। इसके लिए बायोमैट्रिक के इस्तेमाल की बात कही गई थी। पूरे प्रशासनिक तंत्र को इसमें शामिल होने की सिफारिश की गई थी। परीक्षा केन्द्रों को जिला प्रशासन और पुलिस की निगरानी में सील करने को कहा गया था।

सरकारी स्कूलों, नवोदय या केन्द्रीय विद्यालयों को नीट परीक्षा केन्द्र बनाने की सिफारिश की गई थी। स्कूलों में डिजिटल बुनियादी ढाँचा विकसित करने पर जोर दिया गया था। परीक्षा को हाईब्रिड मोड में कराने को कहा था ताकि कम्प्यूटर के साथ पेन-पेपर पर भी परीक्षा हो। जेईई की परीक्षा की तरह दो चरणों में परीक्षा कराने का भी सुझाव दिया गया था।

पेपर लीक ‘गंभीर अपराध’ की श्रेणी में शामिल

प्रश्नपत्र या उत्तर लीक होना गंभीर अपराध है। परीक्षा खत्म होने के बाद OMR शीट बदलना, नंबर बढ़ाने के लिए डेटा बदलना या उत्तर पुस्तिका से छेड़छाड़ करना भी कानून के तहत दंडनीय अपराध है। किसी के बदले पेपर देने वाला या बाहर से उत्तर उपलब्ध करानेवाला भी अपराधी माना जाएगा।

फर्जी वेबसाइट बना कर प्रश्नपत्र या उत्तर डालना, नकली परीक्षा पोर्टल बनाना या कम्प्यूटर सिस्टम हैक करना साइबर अपराध है। सिंडिकेट या गैंग बनाकर परीक्षा में धांधली करवाने को संगठित अपराध माना जाएगा। परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसी, तकनीक देने वाली कंपनी या परीक्षा केन्द्र पर धाँधली के आरोप लगने पर कार्रवाई की बात कही गई है।

पैसे के लिए किसी भी गोपनीय जानकारी लीक करना अपराध की श्रेणी में आएगा। परीक्षा केन्द्र में घुसना, अधिकारियों को धमकाना गुनाह है। सरकार के तय सुरक्षा मानकों को नहीं बदला जा सकता। इसके खिलाफ काम करने पर कार्रवाई हो सकती है।

कानून में साफ तौर पर छात्र-छात्राओं और नकल कराने वाले गिरोह या व्यक्ति के बीच अंतर किया गया है। साधारण छात्र पर अलग स्थिति हो सकती है, लेकिन पेपर लीक सिंडिकेट से जुड़े लोग कठोर दंड के दायरे में आएँगे।

दोषियों को कितनी मिलेगी सजा

अगर कोई व्यक्ति पेपर लीक, OMR छेड़छाड़ या परीक्षा में नकल करते हुए पकड़ा जाता है तो उसे 3- 5 साल तक जेल हो सकती है। साथ ही उस पर 10 लाख रुपये तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।

अगर कोई गिरोह, गैंग या सिंडिकेट परीक्षा धाँधली में शामिल पाया जाता है तो उसे 5 साल से 10 साल तक की जेल हो सकती है। साथ ही कम से कम 1 करोड़ रुपए का जुर्माना लग सकता है।

अगर परीक्षा आयोजित करने वाली कंपनी या एजेंसी दोषी है तो उसे 1 करोड़ रुपए तक का जुर्माना लग सकता है। 4 साल तक परीक्षा कराने पर रोक के साथ-साथ परीक्षा का पूरा खर्च भी वसूला जा सकता है।

अगर किसी कंपनी का निदेशक, मैनेजर या अधिकारी पेपर लीक में शामिल है, तो उसे 3 – 10 साल तक की जेल के साथ-साथ 1 करोड़ रुपये तक जुर्माना देना पड़ सकता है।

वहीं अगर संगठित अपराध साबित हो जाता है, तो आरोपियों की संपत्ति जब्त भी की जा सकती है। यह कानून देश की लगभग सभी बड़ी केंद्रीय परीक्षाओं पर लागू होता है। इनमें UPSC, SSC, रेलवे, बैंकिंग, NEET, JEE, CUET, NET समेत दूसरी परीक्षाएँ शामिल हैं।

कोई दे रहा CM शुभेंदु को दफनाने की धमकी, कोई कर रहा हिंदुओं के नरसंहार की बात… बंगाल में भगवा से सीमा पार बौखलाहट, जानिए- क्यों बाड़बंदी से डरा बांग्लादेश

पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की सरकार बनते ही पड़ोसी देश बांग्लादेश में बौखलाहट साफ नजर आ रही है। कहीं बंगाल की नई सरकार के खिलाफ सड़कों पर प्रदर्शन शुरू हो गए हैं, तो कहीं कट्टरपंथी मौलाना राज्य के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी को खुलेआम जान से मारने की धमकी दे रहे हैं। ना केवल कट्टरपंथी मौलाना बल्कि बांग्लादेश की सरकार में अहम पदों पर बैठे लोग भी इससे बौखलाहट में हैं।

इसके पीछे वजह केवल सरकार बदलना और एक पार्टी की जगह दूसरी पार्टी का आना नहीं है बल्कि उस पूरी वैचारिकी का बदलाव है जो इस सत्ता परिवर्तन से बंगाल में होने जा रहा है। भारत की खुली सीमा बांग्लादेश घुसपैठियों के लिए एक प्रवेश द्वार की तरह काम कर रही थी। ममता बनर्जी ने इसे बंद करने का विरोध कर रहीं थी लेकिन अब हालात बदल गए हैं। शुभेंदु अधिकारी ने बाड़बंदी को प्राथमिकता दी है और यही नकेल कट्टरपंथियों की बेचैनी को बढ़ाती जा रही है।

शुभेंदु सरकार का BSF को बाड़बंदी को दी जमीन, ममता सरकार ने अटकाकर रखी

बंगाल में सत्ता संभालते ही मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने अपने पहले ही कैबिनेट फैसलों में भारत-बांग्लादेश सीमा की सुरक्षा को सबसे बड़ी प्राथमिकता दी। नई सरकार ने फैसला लिया कि भारत-बांग्लादेश सीमा पर जिन इलाकों में अब तक बाड़बंदी नहीं हो सकी थी, वहाँ के लिए जरूरी जमीन 45 दिनों के भीतरBSF को सौंप दी जाएगी।

शुभेंदु अधिकारी ने साफ कहा कि उनकी सरकार सीमा सुरक्षा को लेकर कोई समझौता नहीं करेगी। राज्य सरकार के इस फैसले से सीमा पर बाड़बंदी पूरी होने के बाद डेमोग्राफी बदलने की साजिश के तहत घुसपैठ, मवेशियों की तस्करी और गैरकानूनी नेटवर्क पर रोक लगेगी।

यब जमीन ममता बनर्जी की TMC सरकार के कार्यकाल में अटका हुआ था। यह मामला कलकत्ता हाई कोर्ट तक पहुँचा था, तब हाई कोर्ट ने तत्कालीन ममता सरकार को फटकारा BSF को तय जमीन न देने के लिए फटकारा था और सरकार के अधिकारी पर ₹25 हजार का जुर्माना भी लगाया था।

बाड़बंदी के फैसले से बांग्लादेश में बेचैनी, तारिक रहमान के एडवाइजर का बयान

शुभेंदु सरकार के इस फैसले से बांग्लादेश में बेचैनी बढ़ गई। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान के विदेशी मामलों के सलाहकार (एडवाइजर) हुमायूं कबीर ने इस फैसले पर कहा कि बांग्लादेश को ‘काँटेदार तार’ से डराया नहीं जा सकता। इसके साथ ही बांग्लादेश बॉर्डर गार्ड (BGB) को अलर्ट पर रखे जाने की भी खबर सामने आई है।

यानी जिस फैसले को पश्चिम बंगाल की नई BJP सरकार सीमा सुरक्षा और राष्ट्रीय हित से जोड़कर देख रही है, उसी फैसले ने बांग्लादेश में राजनीतिक और कट्टरपंथी हलकों की बेचैनी बढ़ा दी है।

बांग्लादेश में विरोध प्रदर्शन और कट्टरपंथियों के भड़काऊ बयान

बंगाल में BJP सरकार बनने के बाद बांग्लादेश के इस्लामी कट्टरपंथियों के बीच भी खलबली मची है। ये कट्टरपंथी सड़कों पर उतरकर बंगाल की नई सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। वहीं कई मौलाना भी खुलकर बंगाल की BJP सरकार और हिंदुओं के खिलाफ जहर उगलते दिखाई दे रहे हैं।

एक वायरल वीडियो में बांग्लादेश के कट्टरपंथी संगठन ‘इंसाफ कायमकारी छात्र श्रमिक जनता’ से जुड़े मौलाना ने हिंदू घृणा में कहा, “अगर भारत के 40 करोड़ मुस्लिम गुस्से में आ गए तो हिंदू नहीं बचेंगे।” उसने पाकिस्तान की मदद से भारत पर हमला करने और ‘तीन घंटे में कब्जा’ करने जैसे बयान भी दिए। वीडियो में उसने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी का नाम लेकर धमकी दी।

शुभेंदु अधिकारी को बॉर्डर पर गाड़ने की धमकी

एक और वीडियो सामने आया, जिसमें एक मुस्लिम व्यक्ति बंगाल के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी को सीमा पर दफन करने की धमकी जारी कर रहा है। यह वीडियो ‘द इंकलाब’ नाम से फेसबुक पेज से प्रसारित किया जा रहा है। हालाँकि, पुलिस इस वीडियो की पुष्टि के लिए जाँच कर रही है।

उधर, बांग्लादेश का मौलाना इनायतुल्लाह अब्बासी कहता है कि अगर बंगाल में मुस्लिम सुरक्षित नहीं है, तो बांग्लादेश में भी हिंदुओं को सुरक्षित नहीं रहने दिया जाएगा। वह बांग्लादेश की तारिक रहमान सरकार को भारत के साथ व्यापारिक संबंध तोड़ने की चेतावनी देने के लिए भड़का रहा है।

बंगाल में ‘पोरिबर्तन’ की जमीनी हकीकत, सीमापार के गोरख धंधे होंगे अब बंद

पश्चिम बंगाल में BJP की बढ़ती राजनीतिक ताकत और चुनावी सफलता के बाद बांग्लादेश की बौखलाहट साफ दिख रही है। बंगाल की करीब 2200 किलोमीटर लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा बांग्लादेश से लगती है और इसका एक हिस्सा खुला हुआ था। वर्षों से यह इलाका अवैध घुसपैठ, पशु तस्करी, नकली नोटों के नेटवर्क तथा कट्टरपंथी गतिविधियों का हब बना हुआ था।

पश्चिम बंगाल में तुष्टिकरण की राजनीति के कारण सीमा सुरक्षा को लेकर ममता बनर्जी की सरकार में कठोर कदम नहीं उठाए गए। वोट बैंक की राजनीति के चलते अवैध घुसपैठियों को संरक्षण मिलता रहा और धीरे-धीरे कई सीमावर्ती जिलों की जनसांख्यिकी तक प्रभावित हुई। यहाँ तक बातें सामने आईं कि बांग्लादेश की और से किए अवैध कामों को तुष्टिकरण की राजनीति में डूबी सरकार की ‘ममता’ मिली हुई थी।

अब जैसे-जैसे बीजेपी का प्रभाव बढ़ रहा है तो वैसे-वैसे उन तत्वों में घबराहट दिख रही है जो सीमा पार से चलने वाले अवैध कारोबार और राजनीतिक संरक्षण पर निर्भर थे। बांग्लादेश के कट्टरपंथी संगठनों और वहाँ के मजहबी नेताओं और सरकारी अधिकारियों की प्रतिक्रियाओं को इसे से जोड़कर देखे जाने की जरूरत है। उन्हें डर है कि यदि बंगाल में सख्त प्रशासनिक व्यवस्था लागू होती है तो अब तक जिन अवैध गतिविधियों को संरक्षण मिला हुआ था उन पर अंकुश लग सकता है।

‘ये हमें थूक कर या मूत कर खिलाते हैं’: पिंकी चौधरी ने बताया भंडारा में मुस्लिम से क्यों छीनी प्लेट, जानिए इस्लाम को लेकर क्या बोले

इन दिनों सोशल मीडिया पर हिंदू रक्षा दल के अध्यक्ष पिंकी चौधरी का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में पिंकी को एक भंडारे के दौरान एक मुस्लिम व्यक्ति से खाने की प्लेट छीनते हुए देखा जा सकता है। इस वीडियो के सामने आने के बाद विवाद खड़ा हो गया है। पिंकी चौधरी द्वारा मुसलमानों के खिलाफ की गई टिप्पणियों को लेकर भी विवाद बढ़ गया है। सोशल मीडिया पर इस घटना को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ देखने को मिल रही हैं।

कुछ लोग इस व्यवहार की आलोचना करते हुए इसे समाज में नफरत फैलाने वाला बता रहे हैं तो वहीं कुछ अन्य यूजर्स इस मामले को लेकर अलग-अलग राय व्यक्त कर रहे हैं। फिलहाल इस वायरल वीडियो पर चर्चा जारी है। ऑपइंडिया ने इस वायरल वीडियो को लेकर पिंकी चौधरी से ही बात की है।

जब पिंकी चौधरी से वीडियो की सच्चाई और उसमें दिख रहे घटनाक्रम पर सवाल किया गया तो पिंकी ने कहा कि वीडियो सच है। पिंकी चौधरी ने आगे अपनी प्रतिक्रिया में कहा, “जब धर्म के आधार पर देश का बँटवारा हो गया, तो अब ये लोग यहाँ क्या कर रहे हैं? अगर ये प्यार से रहें, लव जिहाद न करें और हिंदुओं का कत्लेआम न करें तो ठीक है। लेकिन इनकी मंशा गलत है और मैं उसी का विरोध करता हूँ।”

मुस्लिम मंदिरों का प्रसाद नहीं लेता तो भंडारा क्यों?

पिंकी का मुस्लिमों के विरोध को लेकर कहना है, “हर रोज मस्जिदों और मदरसों से लव जिहाद चल रहा है। हमारी नाबालिग बहन-बेटियों को बहला-फुसलाकर निकाह किया जा रहा है। हिंदू ऐसा कभी नहीं करता।” पिंकी का कहना है कि मुस्लिम ने हिंदुओं को कभी नहीं खिलाया है। पिंकी ने कहा, “अगर खिलाया भी है, तो थूक कर या मूत कर खिलाया है और सबसे बड़ी बात किया कभी हमारे मंदिरों का प्रसाद ये (मुस्लिम) कभी लेते हैं क्या? मैं इसीलिए मुसलमानों का विरोध करता हूँ।”

पिंकी चौधरी ने कहा कि जो जिहादी कुरान को फॉलो करता है वह कभी भारत का नहीं हो सकता। पिंकी ने कहा, “हर रोज ISI से जुड़े आतंकी यहाँ पकड़े जा रहे हैं और उनके तार पाकिस्तान से पाए जा रहे हैं। ये सब आतंकी है ये लोग हमें मारना चाहते हैं कभी हमें तो कभी योगी जी को मारने की धमकी देते हैं। ये हमारी धार्मिक यात्राओं पर हमला करते हैं और हमारे मंदिरों को तोड़कर मस्जिद-मदरसे बना रहे हैं।”

पिंकी ने कहा, “कश्मीर में कलमा पढ़ाकर मारा जा रहा है। मुंबई में कलमा पढ़वाकर हमला किया गया।” जब हमने पिंकी से कहा कि सभी मामलों में कानून अपना काम कर रहा है तो इसके जवाब में पिंकी चौधरी कहते हैं कि ‘कानून अपना काम कर रहा है तो मैं अपने भाइयों को जगाने का काम कर रहा हूँ’।

इस्लाम कैंसर से भी बुरी बीमारी

अपने वीडियो को ‘जहर फैलाए जाने वाला’ बताए जाने को लेकर पिंकी ने कहा, “यह जहर पहले ही फैला देना चाहिए था। इस्लाम कैंसर से भी बुरी बीमारी है। इसे समाप्त करने के लिए हिंदू को पहले ही जागरूक हो जाना चाहिए था। हिंदू हमेशा प्यार से रहा है लेकिन इन्होंने कभी भाईचारा नहीं निभाया।” पिंकी ने कहा, “आज विश्व में मुसलमानों के 58 देश हैं। ईसाईयों के सैकड़ों देश हैं लेकिन हिंदुओं का विश्व में एक भी देश नहीं है क्योंकि हिंदुओं ने सभी को हमेशा अपने गले लगाया है।”

पिंकी ने कहा, “ये कोई टैक्स नहीं देते हैं। फ्री का खाते हैं। इनको हमारे देश में रहने का कोई अधिकार नहीं है। धर्म के आधार पर जब बँटवारा हो गया तो ये लोग अभी तक यहाँ क्या कर रहे हैं?” पिंकी को अपने बयानों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का भी डर नहीं है। पिंकी ने कहा, “हो जाए कार्रवाई मुझे कोई डर नहीं है। मैं अपनी बात पर अडिग हूँ। वह खाना मेरे पैसे का था, मेरे घर का था। जैसे एक परिवार अपने सदस्यों को खिलाता है, वैसे ही हम अपने लोगों (हिंदुओं) को खिलाएँगे।”

युद्ध के वक्त नूर खान एयरबेस का ईरान ने किया इस्तेमाल: रिपोर्ट से पाकिस्तान के ‘डबल गेम’ का खुलासा, सफाई में कहा- सीजफायर में आया था शिया मुल्क का फौजी विमान

पाकिस्तान का दोहरा चरित्र एक बार फिर दुनिया के सामने आ गया है। मीडिया रिपोर्ट में अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध के दौरान पाकिस्तान ने चुपके से ईरानी सैन्य विमानों को अपने अहम एयरबेस पर रुकने की इजाजत दी। हालाँकि पाकिस्तान ने इसे खारिज करते हुए खबर को ‘भ्रामक और सनसनीखेज’ बताया है और कहा है कि इस कहानी का मकसद क्षेत्रीय स्थिरता और शांति के प्रयासों को कमजोर करना है।

दरअसल पाकिस्तान ईरान के साथ चल रहे इजरायल-अमेरिका युद्ध में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। उसे ईरान भी शक की नजर से देख रहा है क्योंकि ईरान मानता है कि आसिम मुनीर और शहबाज खान दरअसल अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के इशारों पर काम कर रहे हैं।

अमेरिका को भी पाकिस्तान पर संदेह है, क्योंकि पाकिस्तान ने भी इस बात को दबे जुबान मान लिया था कि उसके पोर्ट पर ईरानी मिलिट्री एयरक्राफ्ट मौजूद थे। माना जा रहा है कि ऐसा करके पाकिस्तान ने उन ईरानी विमानों को अमेरिकी हमलों से बचाया। वहीं दूसरी तरफ अमेरिका से भी अपने कूटनीतिक रिश्ते बनाए रखा।

अमेरिकी सीनेटर ने उठाए पाकिस्तान पर सवाल

पाकिस्तानी सफाई के बाद भी अमेरिका के कई अधिकारी उसे शक की नजर से देख रहे हैं। इनलोगों ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को भी चेताया है। अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने मध्यस्थ के तौर पर पाकिस्तान की भूमिका की समीक्षा करने की माँग की है। उन्होंने कहा कि ईरान का समर्थन किए जाने की रिपोर्ट पाकिस्तान की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

(साभार- एक्स)

अमेरिकी सीनेटर ग्राहम ने इजरायल के संबंध में पाकिस्तानी अधिकारियों के पहले दिए गए बयानों का भी जिक्र किया। उन्होंने यहाँ तक कहा कि अगर ये रिपोर्ट सही हैं, तो इससे उन्हें हैरानी नहीं होगी।

इस मामले ने ईरान और अमेरिका के बीच चल रही बातचीत में इस्लामाबाद की भूमिका पर ‘शक’ और बढ़ा दी है। पाकिस्तान ने इन बैठकों में एक निष्पक्ष मध्यस्थ का चोला पहनने की कोशिश की, लेकिन खुद ईरानी जहाज को रुकने की इजाजत देने की स्वीकारोक्ति से फँस गया। अब अमेरिका में सवाल उठ रहे हैं कि युद्ध के दौरान क्या पाकिस्तान चुपके से ईरान का समर्थन कर रहा था।

पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय की सफाई

मंगलवार को बयान जारी कर हालाँकि पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने उन रिपोर्टों को खारिज करने की कोशिश की, जिनमें दावा किया गया था कि ईरानी सैन्य विमानों को पाकिस्तानी हवाई अड्डों का इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई थी। हालाँकि, इन आरोपों को खारिज करने के दौरान भी मंत्रालय ने कहा कि युद्ध के वक्त नहीं बल्कि सीजफायर के दौरान ईरानी विमान पाकिस्तान में खड़े थे।

पाकिस्तानी विदेश मंत्रालय के मुताबिक, “ईरानी विमान जो अभी पाकिस्तान में खड़े हैं, वे संघर्ष विराम के दौरान आए थे और उनका किसी भी सैन्य आपात स्थिति या सुरक्षा व्यवस्था से कोई लेना-देना नहीं है।”

पाकिस्तान का यह स्पष्टीकरण सीबीएस न्यूज की उस रिपोर्ट के बाद आया, जिसमें दावा किया गया था कि पाकिस्तान ने संघर्ष के दौरान चुपके से ईरानी सैन्य विमानों को अपने हवाई अड्डों का इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी थी, ताकि उन्हें संभावित अमेरिकी हमलों से बचाया जा सके।

सीबीएस न्यूज के मुताबिक, दो अमेरिकी अधिकारियों ने कहा है कि पाकिस्तान ने संघर्ष के दौरान ईरान का समर्थन किया, जबकि साथ में वह अमेरिका के साथ अच्छे संबंध बनाए रखने की भी कोशिश कर रहा था।

रिपोर्ट में आगे कहा गया कि अप्रैल की शुरुआत में जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ईरान के साथ सीजफायर की घोषणा की, उस दौरान कई ईरानी विमान पाकिस्तान के नूर खान एयर बेस पर लाए गए।

पाकिस्तान भेजे गए विमानों में कथित तौर पर ईरानी वायु सेना का एक RC-130 टोही विमान भी शामिल था, जो Lockheed C-130 Hercules का एक निगरानी और खुफिया जानकारी जुटाने वाला संस्करण है।

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इन विमानों की मौजूदगी को शांति वार्ता की प्रक्रिया से जुड़े राजनयिक और लॉजिस्टिक समन्वय का हिस्सा बताने की कोशिश की।

मंत्रालय ने कहा, “बातचीत की प्रक्रिया से जुड़े राजनयिक, सुरक्षा टीमों और प्रशासनिक कर्मचारियों की आवाजाही के लिए ईरान और अमेरिका से कई विमान पाकिस्तान आए थे। कुछ विमान और बातचीत में शामिल प्रतिनिधि अगले दौर की उम्मीद में कुछ समय के लिए पाकिस्तान में ही रुके रहे।”

हालाँकि पाकिस्तान के बयान में इस बात पर कुछ नहीं कहा गया है कि यदि यह व्यवस्था केवल प्रशासनिक थी, तो सैन्य टोही विमान वहाँ क्या कर रहे थे। वह एक अत्यधिक सुरक्षित सैन्य ठिकाने पर कैसे मौजूद था।

इससे पहले ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थता में कई कंफ्यूजन को लेकर भी कहा जा रहा था कि पाकिस्तान ने ईरान तक अमेरिकी रुख को सही तरह से पहुँचाया या नहीं। अमेरिकी अधिकारियों का मानना है कि पाकिस्तान ने ईरान के रुख को जिस तरह से अमेरिका के सामने रखा, वह जमीनी हकीकत से दूर और ईरान के पक्ष में था। अब ईरान के शांति प्रस्ताव को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने खारिज कर दिया है, इसके बाद ये सवाल और भी सजीव हो गया है कि पाकिस्तान ने आखिर क्या समझाने की कोशिश अमेरिका को की।

अब पाकिस्तान को कई तरफ से कूटनीतिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है। ईरान का अविश्वास पहले से था और अब अमेरिका भी सवाल उठा रहा है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पाकिस्तान एक निष्पक्ष मध्यस्थ बन पाया। जाहिर है नहीं।

पाकिस्तान का दोहरा चरित्र पहले भी उजागर हुआ

भारत ने पाकिस्तान के दोहरे चरित्र को कई बार उजागर किया है या यूँ कहें कि कई बार झेला है।

पहलगाम में आतंकियों ने निर्दोष पर्यटकों की जब हत्या की तो आतंकियों का सीधा कनेक्शन पाकिस्तान से जुड़ा। भारत ने ऑपरेशन सिंदूर कर पाकिस्तान को मजा चखाया। लेकिन, पाकिस्तान आज भी ‘भारत को हराने’ का दम भरता है। इसको लेकर पाकिस्तानी फौज के प्रमुख आसिम मुनीर का प्रमोशन भी कर दिया। लेकिन हकीकत दुनिया के सामने है। भारत ने पाकिस्तान में मौजूद 9 आतंकी ठिकानों को धूल में मिला था। इससे पाकिस्तान की आतंकियों को संरक्षण देने की कलई एक बार फिर खुली।

करगिल युद्ध के वक्त 1999 में तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने लाहौर बस यात्रा कर दोस्ती का हाथ बढ़ाया, लेकिन करगिल की ऊँची चोटियों पर घुसपैठियों की तरह घुस कर पाकिस्तानी फौज ने कब्जा करने की हिमाकत की, लेकिन पाकिस्तान ने इन्हें फौजी नहीं माना और कश्मीरी विद्रोही बताने का नाटक किया।

मुंबई में 26/11 हमले से पहले भारत और पाकिस्तान की वार्ता शुरू हुई थी। लेकिन बीच में ही आतंकियों को भेजकर नवंबर 2008 में मुंबई में हमला कराया। जाँच में पाकिस्तान से आए हमलावरों और उनके आईएसआई आकाओं का भी पता चला।

दरअसल भारत से अलग होने के बाद से ही पाकिस्तान का चाल चरित्र और चेहरा विवादित रहा है। कबालियों का रूपधारण कर 1948 में कश्मीर में घुसपैठ से लेकर अब तक उसका तरीका बदला है लेकिन काम आतंक फैलाना ही रहा है। ऐसा देश शांति समझौते की अहमियत को क्या समझेगा।

मुस्लिम प्रोफेसर ने मंदिर में की ‘घर वापसी’, धर्मांतरण कानून का भी किया पालन, पर हिंदू मानने को तैयार नहीं था ‘सिस्टम’: जानिए- कैसे हाईकोर्ट की रिमांड पर आए ADM

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मुस्लिम प्रोफेसर के सनातन धर्म में घर वापसी के आवेदन को खारिज करने को लेकर प्रयागराज के अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (प्रशासन) (ADM-प्रशासन) के रवैये पर कड़ी नाराजगी जताई है। अनिल पंडित (पूर्व में मोहम्मद अहसान) ने अपनी मर्जी से सनातन में घर वापसी की थी और उत्तर प्रदेश गैरकानूनी धर्म परिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम 2021 के तहत इसकी औपचारिक मान्यता के लिए आवेदन किया था।

हालाँकि, ADM ने आवेदन पर फैसला लेने से पहले बार-बार पुलिस जाँच कराई और बाद में उसकी अर्जी खारिज कर दी। सुनवाई के दौरान कोर्ट के सामने यह तथ्य भी आया कि युवक के खिलाफ उसके ससुर ने आपराधिक मामला दर्ज कराया था। फिलहाल, हाईकोर्ट की जस्टिस अजीत कुमार और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने प्रयागराज के अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (प्रशासन) के आदेश पर रोक लगा दी है।

क्या था मामला?

यह मामला मोहम्मद अहसान द्वारा घर वापसी किए जान से जुड़ा था। मोहम्मद अहसान ने 2022 में आर्य समाज मंदिर में सनातन अपना लिया था और उनका नाम अनिल पंडित रखा गया था। याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि स्कूल के दिनों से ही उनका झुकाव सनातन धर्म/हिंदू संस्कृति और परंपराओं की ओर था। उन्होंने बताया कि उनके परिवार में कभी नमाज पढ़ने की परंपरा नहीं थी।

उन्होंने कहा कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अंग्रेजी विभाग में पीएचडी करते समय उनकी मुलाकात अपर्णा बाजपेयी से हुई और दोनों के बाद में प्रेम विवाह कर लिया था। अपर्णा बाजपेयी ने अदालत को बताया कि उन्होंने अपनी इच्छा से हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार श्री अनिल पंडित से विवाह किया लेकिन उनके पिता इस विवाह के खिलाफ थे। फिलहाल वह 7 माह की गर्भवती हैं।

याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि अनिल पंडित ने 12 जनवरी 2022 को जिला मजिस्ट्रेट के सामने यह घोषणा की थी कि वह अपनी इच्छा से सनातन धर्म अपनाना चाहते हैं। इसके बाद 14 मार्च 2022 को आर्य समाज मंदिर में विधि-विधान के साथ उनका धर्म परिवर्तन कराया गया। यह प्रक्रिया पुजारी सत्य प्रकाश ने पूरी कराई और धर्म परिवर्तन के बाद उनका नया नाम ‘अनिल पंडित’ रखा गया। पुजारी ने कानून के अनुसार धर्म परिवर्तन की सूचना भी जिला मजिस्ट्रेट को दे दी थी।

अदालत को यह भी बताया गया कि ADM प्रयागराज ने मामले की जाँच के लिए पुलिस रिपोर्ट मँगाई थी। जांँच के बाद पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि याचिकाकर्ता ने बिना किसी दबाव या लालच के अपनी मर्जी से घर वापसी की है। इसके बाद अपर्णा के पिता ने अनिल के खिलाफ FIR करा दी। इसके बाद इस मामले में पुलिस ने 23 अक्टूबर 2023 को एक और रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट में कहा गया कि याचिकाकर्ता पर धर्म परिवर्तन के लिए किसी तरह का दबाव नहीं डाला गया था और न ही उसे किसी अनुचित तरीके से प्रभावित कर सनातन धर्म अपनाने के लिए मजबूर किया गया है।

कोर्ट के आदेश में 2023 की रिपोर्ट का जिक्र

2 रिपोर्ट के बाद ADM ने 11 जुलाई 2024 को एक और जाँच का आदेश दिया और पुलिस ने 23 जुलाई 2024 को नई रिपोर्ट दी। इस रिपोर्ट के आधार पर ADM ने आदेश दिया और कहा गया कि याचिकाकर्ता ने अपर्णा बाजपेयी को बहला-फुसलाकर शादी की है। अप्रैल 2021 में याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए 1 लाख रुपए को भी घर वापसी को अवैध साबित करने के लिए सबूत माना गया। हालाँकि, अपर्णा ने कोर्ट को बताया कि माँ की बीमारी के चलते एक दोस्त के रूप में उनकी मदद की गई थी। हालाँकि, ADM ने 9 अगस्त 2024 को इस आदेश को रद्द कर दिया था।

याचिकाकर्ता ने क्या कहा?

याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में कहा कि पहले की दो पुलिस रिपोर्टें विरोधाभासी नहीं थीं फिर भी ADM बार-बार नई रिपोर्ट मँगवा रही थीं। उन्होंने याचिकाकर्ता से बुलाकर पूछताछ भी नहीं की और पहले की दो रिपोर्टों को बिना उचित कारण के नजरअंदाज कर दिया गया। वकील ने कहा कि अनिल की पत्नी गर्भवती हैं और बच्चे के जन्म के बाद जन्म प्रमाण पत्र में माता-पिता की पहचान दर्ज कराने में समस्या आ सकती है। उन्होंने अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट के आदेश को रद्द करने की माँग की।

कोर्ट ने क्या कहा?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस रिपोर्ट याचिकाकर्ता के पक्ष में थी तो फिर केवल लड़की के पिता द्वारा FIR दर्ज कराने के बाद अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट बार-बार जाँच क्यों करवा रही थीं जबकि घर वापसी के समय लड़की और उसके पिता की कोई भूमिका नहीं थी। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ने धर्म परिवर्तन से 60 दिन पहले आवेदन देकर उत्तर प्रदेश धर्म परिवर्तन कानून की धारा 8(1) का पालन किया था। इसके बाद हुआ धर्म परिवर्तन कानूनी रूप से वैध माना जाएगा।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि रिपोर्ट पक्ष में होने के बाद भी ADM ने FIR को आधार बनाकर इस पर विचार किया और पुलिस ने इस मामले को ध्यान में रखते हुए रिपोर्ट माँगी। कोर्ट ने ADM के व्यवहार की आलोचना करते हुए कहा कि आपराधिक जाँच से इसका संबंध नहीं था। उन्होंने पुलिस को बार-बार रिपोर्ट देने के लिए मजबूर किया। साथ ही, हाईकोर्ट ने कहा कि ADM ने अपने अधिकारों से बाहर जाकर शक्ति का इस्तेमाल किया है। FIR में लगाए गए आरोपों से ADM का कोई लेना-देना नहीं था।

हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं मिला जिससे यह साबित हो सके कि धर्म परिवर्तन किसी दबाव, लालच या गलत मंशा से कराया गया था। कोर्ट ने माना कि ADM FIR और चार्जशीट से जरूरत से ज्यादा प्रभावित हो गईं और उसी आधार पर धर्म परिवर्तन को अवैध मान लिया। अदालत ने कहा कि दोस्तों के बीच पैसों के लेन-देन को आधार बनाकर यह नहीं माना जा सकता कि याचिकाकर्ता ने उन पर गलत प्रभाव डाला था।

कोर्ट ने कहा कि विवाह का पंजीकरण सिर्फ इसलिए रुका हुआ है क्योंकि धर्म परिवर्तन से जुड़ा मामला अभी लंबित है। कोर्ट ने माना कि ADM को शुरुआती दो जाँच रिपोर्टों के आधार पर फैसला लेना चाहिए था। अदालत ने साफ कहा कि केवल चार्जशीट दाखिल हो जाने से कोई व्यक्ति अपराधी साबित नहीं हो जाता।

कोर्ट के आदेश का एक हिस्सा

अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता इलाहाबाद विश्वविद्यालय से जुड़े एक संस्थान में सहायक प्रोफेसर हैं जबकि उनकी पत्नी बलिया के एक इंटर कॉलेज में अंग्रेजी की प्रवक्ता हैं। कोर्ट ने ADM को निर्देश दिया कि वे मामले को से दोबारा देखें और शुरुआती दो जाँच रिपोर्टों तथा कोर्ट द्वारा दोनों से हुई बातचीत को ध्यान में रखते हुए नया आदेश पारित करें। अदालत ने यह आदेश 26 मई 2026 तक देने को कहा है। तब तक 9 अगस्त 2024 का विवादित आदेश स्थगित रहेगा। अब इस मामले की अगली सुनवाई 27 मई 2026 को होगी।

हर घंटे करीब 80 kg सोना खरीदता है भारत, जानिए PM मोदी ने क्यों की 1 साल गोल्ड नहीं खरीदने की अपील: इससे व्यापार घाटा, विदेशी मुद्रा भंडार पर क्या पड़ेगा असर

प्रधानमंत्री मोदी ने देशवासियों से एक साल तक सोना न खरीदने की अपील की है। दरअसल मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध का असर भारत पर भी पड़ा है। भारत पर विदेशी मुद्रा का दबाव बढ़ रहा है। इसलिए विदेशी मुद्रा बचाने के लिए पीएम मोदी ने जनता से एक साल तक सोना नहीं खरीदने और खाने में तेल कम इस्तेमाल करने की अपील की।

क्या कहा पीएम मोदी ने

तेलंगाना के सिकंदराबाद में आयोजित एक कार्यक्रम में बोलते हुए पीएम मोदी ने लोगों से विदेशी मुद्रा बचाने की अपील की। इसके लिए उन्होंने कई रास्ते भी बताए।

पीएम मोदी ने सप्लाई चेन का हवाला देते हुए कहा कि सप्लाई चेन पर लगातार संकट बना हुआ है। इसलिए देश को सर्वोपरि रखते हुए हमें एकजुट होना होगा । देश के लिए जीना और देश के लिए अपने कर्तव्यों का पालन करना भी देशभक्ति है।

उन्होंने कहा कि सोने की खरीद में विदेशी मुद्रा काफी खर्च होता है। एक समय था जब देश पर संकट आता था, तो लोग सोना दान कर देते थे। आज दान की जरूरत नहीं है, लेकिन देशहित में इसकी खरीद को सालभर रोक सकते हैं। उन्होंने कहा कि सालभर में अगर घर में कोई कार्यक्रम हो, तो सोने के गहने नहीं खरीदें। सोना नहीं खरीदने का फैसला देशहित में है, क्योंकि हमें विदेशी मुद्रा बचानी है। यह भी एक तरह से देशभक्ति है।

दरअसल पीएम मोदी का आह्वान सिर्फ एक भावनात्मक अपील नहीं है, बल्कि आर्थिक रणनीति का अहम हिस्सा है। भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना आयात करने वाले देशों में एक है। भारत अपनी सोने की जरूरत के लिए पूरी तरह विदेश पर निर्भर है। देश का करोड़ों डॉलर विदेशों से सोना खरीदने में जाता है।

जितना ज्यादा सोना आयात होगा, उतना ज्यादा डॉलर बाहर जाएगा और इससे रुपए पर दबाव बढ़ेगा।

अभी पश्चिम एशिया में तनाव की स्थिति, महँगे कच्चे तेल और वैश्विक अनिश्चितता के कारण आयात किए जाने वाले सामानों की कीमत काफी बढ़ गई है। इससे विदेशी मुद्रा काफी तेजी से खर्च हो रहा है।

कच्चे तेल की कीमत आसमान छू रही हैं। यह 100 डॉलर प्रति बैरल को पार कर गई हैं। इससे भारत को तेल खरीदने में करीब 30 फीसदी ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च करना पड़ रहा है। ऐसे में सोने के भारी आयात से देश को अर्थव्यवस्था पर ‘दोहरी मार’ पड़ रही है।

पीएम मोदी ने इसे ही कंट्रोल करने के लिए देशवासियों से पेट्रोल-डीजल कम इस्तेमाल करने, जहाँ तक हो सके वर्क फ्रॉम होम करने, विदेश यात्रा टालने और सोना खरीदने से बचने की अपील की है।

भारत में कितना है विदेशी मुद्रा भंडार

प्रधानमंत्री की अपील का असर देश में पहले भी दिखा है। कोरोना काल में थाली बजाने से लेकर कोरोना वॉरियर्स के सम्मान में तालियाँ बजाने की बात देश ने मानी है। अब भावनात्मक रूप से खासकर महिलाओं से जुड़ा ‘सोना’ की खरीद को एक साल के लिए रोकने की अपील पीएम मोदी ने की है।

अगर लोग बड़े पैमाने पर सोना खरीदना कम कर दें, तो भारत को कई आर्थिक फायदे हो सकते हैं। सबसे पहले तो विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम होगा। भारत को हर साल सोने के लिए अरबों डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। अगर लोग कम खरीदेंगे तो डॉलर की बचत होगी।

विदेशी मुद्रा भंडार में मजबूती से देश का रुपया भी मजबूत होगा, क्योंकि कम डॉलर खर्च होने से रुपए पर दबाव कम होगा। इससे रुपया तेजी से गिरने से बच सकता है। इससे व्यापार घाटा कम हो सकता है। भारत तेल और सोना दोनों भारी मात्रा में आयात करता है यानी ये दो चीजें भारत सबसे ज्यादा विदेशों से मँगाता है।

सोने की खपत में कमी से सरकार को संकट से निपटने में मदद मिलेगी। पश्चिम एशिया में जारी संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है। कई जानकार वैश्विक मंदी की आशंका जता चुके हैं। ऐसे में अगर वैश्विक संकट और बढ़ता है, तो सरकार के पास ज्यादा फोरेक्स बफर रहेगा। इससे संकट से निपटने में आसानी होगी।

भारत में आरबीआई के आँकड़े के मुताबिक फरवरी में फॉरेक्स रिजर्व 728 बिलियन डॉलर है, वहीं ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स के आँकड़ों के मुताबिक, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 691 बिलियन डॉलर के आसपास है। दूसरी ओर आईएमएफ के मुताबिक, 2026 में भारत का चालू खाता घाटा (करंट अकाउंट डेफिसिट) बढ़कर 84.5 बिलियन डॉलर हो सकता है। यह पूरे जीडीपी का करीब 2 फीसदी है। करंट अकाउंट डेफिसिट बढ़ने का मतलब है ज्यादा डॉलर का देश से बाहर जाना।

भारत के घरों में हजारों टन सोना है

भारत दुनिया के सबसे बड़े ‘गोल्ड होल्डिंग’ देशों में माना जाता है। अनुमान के मुताबिक, भारतीय परिवारों, मंदिरों और संस्थानों के पास कुल मिला कर लगभग 25000 से 30 000 टन सोना मौजूद है। यह दुनिया के कई देशों के रिजर्व से भी ज्यादा है। दरअसल भारतीय घरों में सोना सिर्फ निवेश नहीं है, बल्कि शादी-ब्याह का अहम हिस्सा है। भारतीय परंपरा से सोना जुड़ा हुआ है और सामाजिक सुरक्षा के साथ-साथ इमरजेंसी में इस्तेमाल की जाने वाली संपत्ति है।

सोने को बाहर निकाल कर ‘काम’ पर लगाने के लिए सरकार ने कई गोल्ड प्लान भी लॉन्च किए। इनमें सेवेरॉन गोल्ड बॉन्ड, गोल्ड मॉनेटाइजेशन स्कीम से लेकर कई डिजिटल स्कीम शामिल हैं।

दरअसल सोने को आमतौर पर एक ‘सुरक्षित संपत्ति’ माना जाता है। इसलिए अनिश्चितता की स्थिति में निवेशक इसे खरीदने के लिए उमड़ पड़ते हैं। हालाँकि, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें दुनिया भर में लंबे समय तक चलने वाली महँगाई और आसमान छूती ब्याज दरों को लेकर भी चिंताएँ बढ़ा रही हैं। इसलिए यह मामला और भी ज्यादा मुश्किल हो गया है।

पश्चिम एशिया में युद्ध पूरी तरह नहीं रुका है। ईरान और अमेरिका के बीच गतिरोध बना हुआ है। ईरान ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के शांति प्रस्तावों को ठुकरा दिया है। होर्मुज स्ट्रेट में रुकावटों की चिंताएँ बढ़ने से तेल की कीमतें फिर से बढ़ गई हैं। तेल की बढ़ती कीमतों की वजह से वैश्विक महँगाई का जोखिम भी बढ़ गया है। US फेडरल रिजर्व जैसे केंद्रीय बैंकों ने लंबे समय से ब्याज दरें ऊँची बनाए रखी है। इसका सोने की कीमत पर बुरा असर पड़ा है, क्योंकि इससे कोई यील्ड या ब्याज नहीं मिलता।

भारत को एक साल में कितनी बचत होगी?

हाल के वर्षों में भारत हर साल करीब 700 से 900 टन सोने की खपत है। इसमें से करीब 90 फीसदी आयात किया जाता है। हर दिन के लिहाज से सोचें तो यह करीब 1920 किलो बैठता है यानी हर घंटे भारत में 80 किलो सोना खरीदा जाता है। इस पर देश का खर्च 50 से 70 अरब डॉलर होता है यानी 4.76 से 6.66 लाख करोड़ रुपए खर्च होता है। कच्चे तेल के बाद सोना मँगवाने में भारत सबसे ज्यादा डॉलर खर्च करता है। हर दिन भारत में

अगर देश ने पीएम मोदी की अपील को मानते हुए सोना खरीदने में कमी कर दी तो करोड़ो डॉलर का बचत होगा। पीएम मोदी की अपील पर अगर देशवासी पूरी तरह एक साल तक सोना खरीदने पर रोक लगा दे, तो 70 अरब डॉलर यानी करीब 6.84 लाख करोड़ रुपए का विदेशी मुद्रा हम बचा पाएँगे।

अगर 50 फीसदी सोने की खरीद में कमी हो जाए, और देश को 35 अरब डॉलर यानी 3.42 लाख करोड़ रुपए की बचत होगी।

पीएम मोदी की अपील पर अगर देशवासियों ने 25 फीसदी सोना खरीद में कमी कर दी, तो देश को 1.71 लाख करोड़ रुपए की बचत हो जाएगी।

पीएम मोदी की अपील में देशहित के साथ-साथ ‘आर्थिक देशभक्ति’ का संदेश भी छिपा है। उन्होंने अपनी बात पर जोर देने के लिए इसलिए कहा कि पहले युद्ध के समय लोग देश के लिए सोना दान करते थे, लेकिन अभी जरूरत सिर्फ सोने की खरीद को टालने की है अर्थात जनता विदेशी खर्च को कम करने के लिए संयम बरते। इससे घरेलू अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

1 राज्य में मिली सत्ता, पर CM ही तय नहीं कर पा रही कॉन्ग्रेस: जानिए केरल कॉन्ग्रेस में क्यों छिड़ा है संग्राम

केरल की राजनीति में एक कहावत मशहूर है कि यहाँ की जनता हर पाँच साल में ‘चाबी’ बदल देती है। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनावों में केरल की जनता ने न सिर्फ चाबी बदली, बल्कि यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) के हाथों में सत्ता का ऐसा मज़बूत संदूक थमा दिया जिसकी उम्मीद शायद खुद कॉन्ग्रेस को भी नहीं थी। 140 सीटों वाली विधानसभा में 102 सीटें जीतना किसी चमत्कार से कम नहीं है, खासकर तब जब सामने पिनाराई विजयन जैसा कद्दावर वामपंथी चेहरा हो।

लेकिन राजनीति की विडंबना देखिए। जहाँ इस प्रचंड जीत के बाद केरल की सड़कों पर जश्न का सैलाब होना चाहिए था, वहाँ तिरुवनंतपुरम से लेकर दिल्ली तक कॉन्ग्रेस के गलियारों में सन्नाटा और ‘सस्पेंस’ पसरा हुआ है। चुनाव नतीजे आए छह दिन बीत चुके हैं, लेकिन कॉन्ग्रेस अब तक यह तय नहीं कर पाई है कि इस ऐतिहासिक जीत का सेहरा किसके सिर बंधेगा। मुख्यमंत्री की कुर्सी एक है और दावेदार तीन और इसी त्रिकोणीय मुकाबले ने हाईकमान की रातों की नींद उड़ा दी है।

पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस को सिर्फ एक ही राज्य में सत्ता मिली, लेकिन वहाँ भी मुख्यमंत्री का चेहरा तय नहीं हो पाया। भारी बहुमत के बावजूद पार्टी के अंदर गुटीय कलह, खींचतान और लॉबिंग ने सारा माहौल बिगाड़ दिया है। चुनाव के छह दिन बाद भी (11 मई 2026 तक) सस्पेंस बरकरार है। यह स्थिति न सिर्फ केरल की जनता को परेशान कर रही है, बल्कि पूरे देश में कॉन्ग्रेस की छवि पर सवाल उठा रही है।

ऐतिहासिक जीत मिली लेकर असमंजस भी अभूतपूर्व

बता दें कि 10 साल के लंबे वनवास के बाद कॉन्ग्रेस गठबंधन (UDF) ने केरल में वापसी की है। 102 सीटों का आँकड़ा यह बताता है कि जनता ने वामपंथी सरकार के खिलाफ बदलाव की लहर पैदा की थी। लेकिन जीत के तुरंत बाद जो स्थिति बनी, उसने ‘ओवरकॉन्फिडेंस’ और ‘आंतरिक कलह’ की पुरानी बीमारी को फिर से उजागर कर दिया है।

इस बीच, जो विपक्षी दल इस फिराक में थे कि कॉन्ग्रेस कमजोर पड़ेगी और वे सीट बँटवारे में दबाव बनाएँगे, जनता के फैसले ने उनकी रणनीतियों पर पानी फेर दिया। अब वही लोग सोशल मीडिया पर तंज़ और बेचैनी के ज़रिए अपना दर्द बयाँ कर रहे हैं। लेकिन असली दर्द तो खुद कॉन्ग्रेस के भीतर है, जहाँ मुख्यमंत्री पद को लेकर म्यान से तलवारें निकल चुकी हैं।

मुख्यमंत्री पद की रेस में आँकड़ों का गणित और गुटीय समीकरण

केरल कॉन्ग्रेस में इस समय शक्ति प्रदर्शन का दौर चल रहा है। सूत्रों के अनुसार, विधायकों का समर्थन तीन गुटों में बँटा हुआ है। इसमें पहला गुट है केसी वेणुगोपाल का, जो अलाप्पुझा से लोकसभा सांसद होने के साथ ही कॉन्ग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव भी हैं। बताया जा रहा है कि इनके समर्थन में 43 विधायक हैं।

दूसरा गुट है वीडी सतीसन का, जो अभी तक नेता प्रतिपक्ष के पद पर थे। उनके समर्थन में 35 विधायक बताए जा रहे हैं। इसके अलावा केरल में कॉन्ग्रेस का तीसरा गुट भी है, जिसकी अगुवाई रमेश चेन्नीथला कर रहे हैं। वो 2021 तक नेता प्रतिपक्ष थे। वरिष्ठता क्रम के आधार पर वो अपना दावा ठोंक रहे हैं। उसके साथ 22 विधायक बताए जा रहे हैं।

केसी वेणुगोपाल हैं हाईकमान की पहली पसंद

केसी वेणुगोपाल फिलहाल अलाप्पुझा से सांसद हैं और राहुल गाँधी के सबसे भरोसेमंद सिपहसालारों में गिने जाते हैं। राहुल गाँधी चाहते हैं कि वेणुगोपाल केरल की कमान संभालें ताकि राज्य में संगठन और सरकार के बीच बेहतर तालमेल रहे। संगठन पर उनकी पकड़ और दिल्ली में उनके रसूख ने उन्हें रेस में सबसे आगे कर दिया है। लेकिन पेच यह है कि वे विधायक नहीं हैं, और राज्य के स्थानीय नेताओं का एक धड़ा उन्हें ‘दिल्ली का थोपा हुआ नेता’ मान रहा है।

जमीनी संघर्ष का चेहरा हैं वीडी सतीसन

वीडी सतीसन ने विपक्ष के नेता के तौर पर पिछले पाँच सालों में सदन के भीतर और बाहर सरकार को घेरा है। कार्यकर्ताओं के बीच उनकी लोकप्रियता काफी अधिक है। सतीसन का तर्क सीधा है कि जब हमने ज़मीन पर लड़ाई लड़ी, तो फल भी हमें ही मिलना चाहिए। उन्होंने वेणुगोपाल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है और उन पर ‘विधायकों को डराने’ और ‘गुटबाजी को बढ़ावा देने’ के गंभीर आरोप लगाए हैं

राजनीति के मँझे खिलाड़ी हैं रमेश चेन्नीथला

वैसे ये भी कह सकते हैं कि रमेश चेन्नीथला कॉन्ग्रेस के पुराने चावल हैं। 2021 की हार के बाद उन्हें किनारे कर दिया गया था, लेकिन इस बार उनके पास भी 22 विधायकों का समर्थन है। वे एक ‘डार्क हॉर्स’ की तरह इंतजार कर रहे हैं कि अगर वेणुगोपाल और सतीसन की लड़ाई में डेडलॉक (गतिरोध) होता है, तो समझौता उम्मीदवार के रूप में उनका नाम सामने आ जाए।

दिल्ली में बैठकों का दौर और राहुल गाँधी की चुनौती

मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर बैठकों का सिलसिला थमा नहीं है। राहुल गाँधी व्यक्तिगत रूप से इस मामले को सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं। 11 मई तक की जानकारी के मुताबिक, राहुल गाँधी ने वीडी सतीसन से सीधी बात की है। सूत्रों का कहना है कि जब सतीसन से उनके खिलाफ लगे पोस्टरों और वेणुगोपाल के विरोध पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने दो टूक शब्दों में कह दिया कि वे वेणुगोपाल के नाम पर सहमत नहीं हैं।

सतीसन का आरोप है कि वेणुगोपाल ने महासचिव पद का दुरुपयोग करते हुए विधायकों पर एक खास गुट में शामिल होने का दबाव बनाया। यह विवाद इतना बढ़ गया है कि पार्टी अब अगले दो दिनों तक कार्यकर्ताओं और असंतुष्ट विधायकों को ‘मनाने’ की रणनीति पर काम कर रही है।

दरअसल, कॉन्ग्रेस की समस्या यह है कि वह जीत को संभाल नहीं पाती। जहाँ भाजपा जैसी पार्टियाँ चुनाव नतीजे आने के 24 घंटे के भीतर मुख्यमंत्री तय कर देती हैं, वहीं कॉन्ग्रेस में लोकतंत्र के नाम पर होने वाली गुटबाजी अक्सर सरकार की शुरुआत को ही कमजोर कर देती है।

बीजेपी का तंज और ‘मजेदार’ पॉलिटिक्स

कॉन्ग्रेस की इस सिरफुटौवल पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) मज़े लेने का कोई मौका नहीं छोड़ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक रैली में तंज कसते हुए कहा, “अरे भाई, केरलम में पूर्ण बहुमत है, वहाँ तो सरकार बना लो। ये लोग नेता तय नहीं कर पा रहे। शायद ये लोग ढाई-ढाई साल के लिए सरकार चलाएँगे या एक-एक साल के लिए पाँच मुख्यमंत्री बनाएँगे।”

प्रधानमंत्री का यह बयान कॉन्ग्रेस की उस कमजोरी पर चोट करता है जहाँ राजस्थान, छत्तीसगढ़ और अब कर्नाटक जैसे राज्यों में ‘सत्ता के बँटवारे’ के फॉर्मूले ने पार्टी को नुकसान पहुँचाया है।

वहीं केरल बीजेपी अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर एक पोस्ट के जरिए चुटकी ली। उन्होंने एक व्यंग्य का जवाब देते हुए संकेत दिया कि दिल्ली की बीजेपी चाहती है कि वेणुगोपाल दिल्ली में रहें (क्योंकि वहाँ वे कोई खतरा नहीं हैं), जबकि केरल बीजेपी चाहती है कि वे केरल आ जाएँ (ताकि कॉन्ग्रेस की गुटबाजी और बढ़े)। चंद्रशेखर का ‘जिपर-माउथ’ इमोजी वाला जवाब यह बताने के लिए काफी है कि विपक्षी खेमा कॉन्ग्रेस की इस आंतरिक कलह का आनंद ले रहा है। हालाँकि बाद में उन्होंने ये ट्वीट डिलीट कर दिया।

राजीव चंद्रशेखर के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

पोस्टर वॉर और सोशल मीडिया पर जंग

केरल की सड़कों पर इस समय फ्लेक्स और पोस्टरों की बाढ़ आई हुई है। सतीसन के समर्थकों ने ऐसे पोस्टर लगाए हैं जिनमें वेणुगोपाल का मजाक उड़ाया गया है। जवाब में वेणुगोपाल के समर्थकों ने उनकी ‘दिल्ली वाली ताकत’ का प्रदर्शन किया है। सोशल मीडिया पर दोनों नेताओं की ‘आईटी सेनाएँ’ आपस में भिड़ी हुई हैं। यह स्थिति उस जनता के लिए निराशाजनक है जिसने ‘स्थिर सरकार’ की उम्मीद में कॉन्ग्रेस को वोट दिया था।

कॉन्ग्रेस के सामने अब तीन ही रास्ते बचे हैं-

  • वेणुगोपाल को कमान: राहुल गाँधी अपनी जिद पर अड़े रहें और वेणुगोपाल को सीएम बना दें, लेकिन इससे सतीसन का गुट बगावत कर सकता है।
  • सतीसन की ताजपोशी: स्थानीय भावनाओं का सम्मान करते हुए सतीसन को मुख्यमंत्री बनाया जाए, लेकिन इससे वेणुगोपाल और हाईकमान के दबदबे को ठेस पहुँचेगी।
  • रोटेशन फॉर्मूला: ढाई साल सतीसन और ढाई साल वेणुगोपाल। लेकिन इतिहास गवाह है कि यह फॉर्मूला कॉन्ग्रेस के लिए हमेशा आत्मघाती साबित हुआ है।

कॉन्ग्रेस ने खुद बनाई है ये स्थिति, उसी पर पड़ेगी भारी

केरल में कॉन्ग्रेस की यह स्थिति ‘गरीबी में आटा गीला’ जैसी नहीं, बल्कि ‘अमीरी में रास्ता भूलने’ जैसी है। 102 सीटों का प्रचंड बहुमत होने के बावजूद नेता तय न कर पाना पार्टी की संगठनात्मक कमजोरी को दर्शाता है। 11 मई 2026 की तारीख तक केरल की जनता अभी भी अपने मुख्यमंत्री का चेहरा देखने का इंतज़ार कर रही है।

यदि कॉन्ग्रेस ने अगले 48 घंटों में कोई ठोस फैसला नहीं लिया, तो यह ऐतिहासिक जीत उसके लिए गले की फाँस बन सकती है। जनता जब जवाब देती है, तो वह बड़े-बड़े राजनीतिक गणित बिगाड़ देती है। केरल की जनता ने अपना काम कर दिया है, अब बारी कॉन्ग्रेस हाईकमान की है कि वह ‘कन्फ्यूजन’ को खत्म करे या फिर ‘कलह’ को अपनी नियति मान ले।

धधकती आग, भस्म और मंत्रों के बीच श्मशान में शिव साधना कर रही रूसी महिला कौन, जानिए- पुष्कर में चल रहे ‘9 धूणी अग्नि तप’ का रहस्य

राजस्थान की भीषण गर्मी में जहाँ बाहर निकलकर कुछ मिनट खड़ा रहना भी मुश्किल हो जाता है, वहीं अजमेर जिले की तीर्थ नगरी पुष्कर में इन दिनों चारों ओर धधकती आग के बीच शिव की साधना चल रही है। नाथ परंपरा का मार्ग अपनाने वालीं रूसी मूल की योगिनी अन्नपूर्णा नाथ छोटी बस्ती स्थित श्मशान स्थल में अघोरी सीताराम बाबा के आश्रम पर नाथ संप्रदाय की प्राचीन ‘9 धूणी अग्नि तपस्या’ कर रही हैं।

शरीर पर भस्म लगाए वे रोजाना 9 धूणियों के बीच बैठकर करीब सवा तीन घंटे तक शिव साधना और गुरु बीज मंत्र का जाप कर रही हैं। उनके साथ उनके गुरु बाल योगी दीपक नाथ भी तप में लीन हैं। यह साधना 3 मई से शुरू हुई है और 25 मई तक चलेगी। अंतिम दिन पूर्णाहुति, हवन और संत भंडारे का आयोजन किया जाएगा।

पुष्कर के इस श्मशान स्थल में रोज दोपहर 11 बजे से लेकर 2 बजकर 15 मिनट तक अग्नि तपस्या का क्रम चलता है। उस समय राजस्थान की तेज धूप और धूणियों की गर्मी मिलकर ऐसा ताप पैदा करती है जिसे हम-आप जैसे आम लोग तो सहन ही ना कर पाएँ लेकिन साधक के लिए यही साधना है, वे इस भीषण ताप के बीच शांत भाव से योग मुद्रा में बैठ साधना में लीन रहते हैं।

क्या होता है ‘9 धूणी अग्नि तप’?

नाथ संप्रदाय में ‘धूणी अग्नि तपस्या’ को बहुत कठिन और विशेष साधना माना जाता है। इस तपस्या में साधक अपने चारों तरफ आग जलाकर उसके बीच बैठते हैं और भगवान शिव का ध्यान करते हुए मंत्रों का जाप करते हैं। माना जाता है कि इस साधना से मन, शरीर और आत्मा पर नियंत्रण मजबूत होता है।

‘9 धूणी तपस्या’ में साधक के चारों ओर कुल नौ धूणियाँ यानी अग्नि के स्थान बनाए जाते हैं। इन धूणियों में लगातार आग जलती रहती है और साधक बीच में बैठकर ध्यान लगाता है। धूणियों के बीच केवल 3 से 4 फीट की दूरी होती है, इसलिए गर्मी बहुत ज्यादा महसूस होती है। अन्नपूर्णा नाथ के तप में एक खास बात यह भी है कि यह तपस्या राजस्थान की तेज गर्मी और धूप में की जा रही है जिससे इसकी कठिनाई और बढ़ जाती है।

इन धूणियों को जलाने के लिए गोबर के कंडों का इस्तेमाल किया जाता है। शुरुआत में कम कंडों से आग जलाई जाती है लेकिन हर दिन उनकी संख्या बढ़ाई जाती है। इस साधना की शुरुआत 21 कंडों से हुई थी और आखिरी दिन 108 कंडों से धूणियाँ जलाई जाएँगी। अभी हर धूणी में करीब 40 कंडे डाले जा रहे हैं।

तपस्या करने वाले साधक अपने शरीर पर गाय के गोबर से बनी भस्म लगाते हैं। माना जाता है कि यह भस्म शरीर को तेज गर्मी से कुछ राहत देती है और साधना के दौरान ध्यान केंद्रित रखने में मदद करती है। आग की तेज लपटों और धुएं के बीच साधक लगातार शिव मंत्रों और गुरु बीज मंत्र का जाप करते रहते हैं।

गुरु बाल योगी दीपक नाथ के अनुसार यह साधना सिर्फ शरीर को कष्ट देने के लिए नहीं होती, बल्कि आत्मशक्ति बढ़ाने, मन को नियंत्रित करने और आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त करने का माध्यम मानी जाती है। नाथ संप्रदाय में संत और योगी सदियों से इस तरह की तपस्या करते आ रहे हैं। वो बताते हैं कि कुछ साधु 21 धूणी, कुछ 108 धूणी और कुछ तो 1100 धूणियों तक की तपस्या भी करते हैं।

उनका कहना है कि यह परंपरा यज्ञ की तरह मानी जाती है। जैसे पंडित मंत्रों के साथ यज्ञ करते हैं वैसे ही संत धूणी तपस्या के जरिए साधना करते हैं। इस तपस्या का उद्देश्य केवल अपनी सिद्धि पाना नहीं बल्कि समाज, लोगों और पूरे विश्व के कल्याण की कामना करना भी माना जाता है।

रूस से पुष्कर तक की आध्यात्मिक यात्रा: कौन हैं योगिनी अन्नपूर्णा नाथ?

इस तपस्या को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा योगिनी अन्नपूर्णा नाथ की हो रही है। उनका जन्म तत्कालीन सोवियत संघ में हुआ था और उनका पालन-पोषण कजाकिस्तान में हुआ। करीब 17 साल पहले वे भारत आई थीं। भारतीय संस्कृति, योग और सनातन परंपरा से प्रभावित होकर उन्होंने अपना जीवन पूरी तरह बदल लिया।

करीब 10 साल पहले उन्होंने नाथ संप्रदाय के योगियों से दीक्षा ली और सांसारिक जीवन त्यागकर साधना का मार्ग अपना लिया। अब उनका जीवन पूरी तरह शिव भक्ति, योग और सेवा को समर्पित है। फिलहाल उनके पास रूसी नागरिकता है और वे टूरिस्ट वीजा पर भारत में रहती हैं। वीजा अवधि पूरी होने पर वे दूसरे देश जाकर दोबारा भारत लौट आती हैं।

पहले भी कठिन तपस्या से चर्चा में रही हैं अन्नपूर्णा

योगिनी अन्नपूर्णा नाथ पहले भी अपनी कठिन साधनाओं को लेकर चर्चा में रह चुकी हैं। चैत्र नवरात्रि के दौरान उन्होंने पुष्कर के जयपुर घाट पर लगातार 9 दिनों तक खड़े रहकर ‘खड़ेश्वरी तपस्या’ की थी। उस तपस्या ने भी लोगों को हैरान कर दिया था। अब ज्येष्ठ मास की भीषण गर्मी में वे 9 धूणी अग्नि तपस्या कर रही हैं।

तब पूरे दिन मंत्र जाप, ध्यान और पूजा-पाठ में लीन रहने वाली योगिनी दिन में सिर्फ एक बार फलाहार करती थीं। लगातार चल रही इस कठिन तपस्या के कारण उनके पैरों में सूजन भी आ गई थी।

उन्होंने हाल ही में नेपाल के प्रसिद्ध पशुपति नाथ मंदिर में दर्शन भी किए थे। इसके अलावा वे इस समय 52 शक्तिपीठों की यात्रा पर हैं और अब तक 35 शक्तिपीठों के दर्शन कर चुकी हैं। हालाँकि पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका में स्थित कुछ शक्तिपीठों तक वे अभी नहीं पहुँच सकी हैं।

योगिनी अन्नपूर्णा नाथ का कहना है कि तपस्या केवल खुद के लिए नहीं होती। उनके अनुसार संतों की साधना समाज, नगर और पूरे विश्व के कल्याण के लिए भी होती है। वे मानती हैं कि सिद्धि तपस्या का परिणाम है और सच्ची साधना इंसान को भीतर से बदल देती है।