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‘शांति की रक्षा के लिए सामर्थ्य भी जरूरी’: PM मोदी ने कोलकाता में नौसेना को सौंपे 3 ‘मेड इन इंडिया’ युद्धपोत, पढ़ें- कैसे गेमचेंजर होंगे ‘INS अग्रय, दूनागिरी और संशोधक’

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार (21 जून 2026)  को कोलकाता में आयोजित एक विशेष समारोह में भारतीय नौसेना को तीन अत्याधुनिक स्वदेशी जंगी जहाज INS दुनागिरी, INS अग्रय और INS संशोधक समर्पित किए हैं। ये तीनों पोत पूरी तरह भारत में डिजाइन और निर्मित किए गए हैं और इन्हें नौसेना के बेड़े में शामिल किया जाना ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान की एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।

इन जंगी जहाजों की खास बात यह है कि तीनों अलग-अलग भूमिकाओं के लिए तैयार किए गए हैं। एक समुद्री युद्ध के लिए, दूसरा पनडुब्बियों से मुकाबले के लिए और तीसरा समुद्र की गहराई तथा समुद्री क्षेत्रों के सर्वेक्षण के लिए बनाया गया है। ऐसे में इनका एक साथ नौसेना में शामिल होना भारतीय नौसेना की ऑपरेशनल क्षमता को कई गुना बढ़ाने वाला कदम माना जा रहा है।

पीएम मोदी ने क्या कहा?

कार्यक्रम के दौरान PM मोदी ने कहा, “दुनिया गवाह है कि मैरीटाइम क्षमता के बिना कोई भी राष्ट्र बड़ी शक्ति नहीं बन सकता। समुद्र से विकास जुड़ा है, सुरक्षा जुड़ी है, समृद्धि जुड़ी है।” साथ ही उन्होंने कहा कि आने वाले समय में, क्रिटिकल मिनरल्स, डीप-सी रिसोर्सेज और नई ऊर्जा के स्रोत भी समुद्र से ही जुड़ेंगे।

उन्होंने कहा, “जिस देश का समुद्री सामर्थ्य मजबूत होगा, उसका आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव भी उतना ही मजबूत होगा। और भारत इस वास्तविकता को अच्छी तरह से समझता है। भारत इसके लिए स्वयं को तैयार कर रहा है।”

पीएम मोदी ने कहा, “आज INS अग्रय, INS दूनागिरी और INS संशोधक उसी यात्रा को नई गति दे रहे हैं। ये तीनों पोत, भारत के तीन महत्वपूर्ण संकल्पों के भी प्रतीक हैं। इनका निर्माण भारत में हुआ है। इनकी डिजाइन भारत में तैयार हुई है। इनके निर्माण में भारतीय उद्योगों की प्रतिभा लगी है। भारतीय इंजीनियरों का कौशल लगा है। भारतीय श्रमिकों का परिश्रम लगा है। और यही नए भारत की सबसे बड़ी ताकत है।”

उन्होंने कहा, “भारत निर्माता बनना चाहता है और जिस दिन निर्माता होंगे ना, उस दिन हम निर्णायक भी होंगे। बीते वर्षों में 40 से अधिक ‘मेड इन इंडिया’ युद्धपोत और पनडुब्बियाँ नौसेना में शामिल हुई हैं। यानी लगभग हर कुछ सप्ताह में भारतीय नौसेना को एक नई शक्ति मिली है। वर्तमान में भी 45 बड़े नौसैनिक प्लेटफॉर्म निर्माणाधीन हैं। यह केवल संख्या नहीं है।”

साथ ही उन्होंने कहा, “अब समय आ गया है कि भारत समुद्री शक्ति के अगले चरण में प्रवेश करे। इसलिए भारत ने शिपबिल्डिंग के क्षेत्र के लिए एक नई दृष्टि के साथ आगे बढ़ना शुरू किया है। हाल के वर्षों में अनेक पॉलिसी रिफॉर्म्स किए गए हैं। घरेलू निर्माण क्षमता बढ़ाने के लिए विशेष कदम उठाए गए हैं। शिपिंग सेक्टर के लिए 70 हजार करोड़ रुपए का प्रोत्साहन पैकेज घोषित किया गया है।”

PM मोदी ने कहा, “भारत ने हमेशा से समुद्र को सहयोग का माध्यम माना है। लेकिन भारत ये भी जानता है कि शांति की रक्षा के लिए सामर्थ्य भी उतना ही आवश्यक है। समृद्धि की रक्षा के लिए सुरक्षा आवश्यक है। और भविष्य के निर्माण के लिए आत्मनिर्भरता अनिवार्य है।”

उन्होंने कहा, “आज INS अग्रय, INS दूनागिरी और INS संशोधक इसी भावना के प्रतीक बनकर भारतीय नौसेना में शामिल हुए हैं। ये उस भारत के प्रतीक हैं जो 21वीं सदी में अपने सामर्थ्य को पहचान रहा है, जो अपनी क्षमताओं पर विश्वास कर रहा है, और जो दुनिया के सामने नए आत्मविश्वास के साथ तेज गति से ऊर्जा से भरे हुए संकल्प के साथ निरंतर आगे बढ़ रहा है।”

क्या है इस कमीशनिंग समारोह का महत्व?

कार्यक्रम का आयोजन कोलकाता के श्यामा प्रसाद मुखर्जी पोर्ट पर किया गया। भारतीय नौसेना के अनुसार यह केवल तीन जहाजों की कमीशनिंग नहीं, बल्कि भारत के बढ़ते स्वदेशी रक्षा निर्माण और नौ सैनिक आधुनिकीकरण का प्रतीक है।

इन जहाजों को भारतीय नौसेना के वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो ने डिजाइन किया है, जबकि इनका निर्माण गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (GRSE), कोलकाता ने किया है। तीनों पोतों में 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी मटेरियल का इस्तेमाल किया गया है, जिससे भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता का प्रदर्शन भी होता है।

INS दुनागिरी: दुश्मन को चकमा देने वाला स्टील्थ जंगी जहाज

INS दुनागिरी प्रोजेक्ट-17A के तहत तैयार किया गया पाँचवाँ स्टील्थ फ्रिगेट है। स्टील्थ तकनीक के कारण इसे दुश्मन के रडार पर पहचानना बेहद मुश्किल होता है। यही वजह है कि इसे भारतीय नौसेना के सबसे आधुनिक जंगी जहाजों में गिना जा रहा है।

इस जंगी जहाज में कई उन्नत हथियार और सेंसर लगाए गए हैं। इसकी सबसे बड़ी ताकत ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल है, जो दुनिया की सबसे तेज ऑपरेशनल मिसाइलों में शामिल है। इसके अलावा इसमें मध्यम दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली भी लगी है।

दुनागिरी सतही युद्ध, वायु रक्षा और पनडुब्बी रोधी अभियानों को एक साथ अंजाम देने में सक्षम है। नौसेना को उम्मीद है कि इसके शामिल होने से समुद्र में भारत की मारक क्षमता और रणनीतिक बढ़त और मजबूत होगी।

INS अग्रय: पनडुब्बियों का काल बनेगा यह जंगी जहाज

INS अग्रय अर्नाला श्रेणी का एंटी-सबमरीन वॉरफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट है। इसका मुख्य उद्देश्य दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाना, उनकी निगरानी करना और जरूरत पड़ने पर उन्हें नष्ट करना है।

आज के दौर में पनडुब्बियाँ किसी भी देश की नौसेना के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक मानी जाती हैं। ऐसे में अग्रय भारतीय तटीय सुरक्षा को नई मजबूती देगा।

इस जंगी जहाज में हल्के टॉरपीडो, स्वदेशी रॉकेट लॉन्चर और आधुनिक सोनार प्रणाली लगाई गई है। सोनार तकनीक समुद्र के भीतर छिपी पनडुब्बियों का पता लगाने में मदद करती है। उथले (shallow) समुद्री इलाकों में यह जहाज विशेष रूप से प्रभावी माना जाता है।

भारतीय नौसेना के लिए यह जहाज इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह तटीय क्षेत्रों, बंदरगाहों और रणनीतिक समुद्री मार्गों को सुरक्षित रखने में बड़ी भूमिका निभाएगा।

INS संशोधक: समुद्र की गहराइयों का वैज्ञानिक प्रहरी

INS संशोधक एक बड़ा सर्वेक्षण पोत है, जिसे समुद्र की गहराई, समुद्री मार्गों और समुद्र के नीचे की भौगोलिक संरचना का अध्ययन करने के लिए बनाया गया है।

यह जहाज तटीय क्षेत्रों के साथ-साथ गहरे समुद्र में भी सर्वेक्षण करने में सक्षम है। नौसेना के लिए ऐसे सर्वेक्षण बेहद महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि इनके आधार पर समुद्री नक्शे तैयार किए जाते हैं और नौसैनिक अभियानों की योजना बनाई जाती है।

संशोधक में ऑटोनॉमस अंडरवाटर व्हीकल (AUV) और रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल (ROV) जैसी आधुनिक तकनीकें मौजूद हैं। इनकी मदद से समुद्र के भीतर जाकर विस्तृत जानकारी जुटाई जा सकती है।

यह जहाज केवल रक्षा क्षेत्र ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक अनुसंधान, बंदरगाह विकास और नागरिक परियोजनाओं में भी महत्वपूर्ण योगदान देगा।

तीनों जहाज क्यों हैं भारत के लिए खास?

INS दुनागिरी, अग्रय और संशोधक तीन अलग-अलग जरूरतों को पूरा करते हैं। दुनागिरी युद्धक क्षमता बढ़ाएगा, अग्रय पनडुब्बी खतरों से सुरक्षा देगा और संशोधक समुद्री जानकारी जुटाने का काम करेगा। यानी एक ही दिन भारतीय नौसेना को युद्ध, सुरक्षा और सर्वेक्षण तीनों क्षेत्रों में नई ताकत मिलने जा रही है। यही कारण है कि इसे भारतीय नौसेना के आधुनिकीकरण का बड़ा कदम मान रहे हैं।

200 से ज्यादा MSME ने निभाई भूमिका

INS दुनागिरी, अग्रय और संशोधक के निर्माण में देशभर के 200 से अधिक छोटे से छोटे और मध्यम उद्यमों (MSME) ने योगदान दिया है। इससे हजारों लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिला।

रक्षा उत्पादन में निजी कंपनियों और छोटे उद्योगों की भागीदारी बढ़ने से भारत का रक्षा क्षेत्र पहले की तुलना में अधिक आत्मनिर्भर बन रहा है। यही वजह है कि इन जंगी जहाजों को केवल सैन्य उपलब्धि नहीं बल्कि औद्योगिक सफलता के रूप में भी देखा जा रहा है।

हिंद महासागर में और मजबूत होगी भारत की मौजूदगी

पिछले कुछ सालों में भारत लगातार अपनी समुद्री शक्ति बढ़ाने पर जोर दे रहा है। हिंद महासागर क्षेत्र में बढ़ती रणनीतिक चुनौतियों और जियोपॉलिटिकल कॉम्पिटिशन को देखते हुए नौसेना आधुनिक जहाजों और हथियार प्रणालियों को तेजी से अपने बेड़े में शामिल कर रही है।

INS दुनागिरी, INS अग्रय और INS संशोधक की कमीशनिंग इसी रणनीति का हिस्सा है। इनके शामिल होने से भारतीय नौसेना की ऑपरेशनल क्षमता बढ़ेगी, समुद्री निगरानी बेहतर होगी और तटीय सुरक्षा को नई मजबूती मिलेगी।

आत्मनिर्भर भारत की बड़ी सफलता

इन तीनों युद्धपोतों का नौसेना में शामिल होना ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान की एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री, भारतीय डिजाइन और भारतीय शिपयार्ड में निर्माण यह साबित करता है कि भारत अब रक्षा क्षेत्र में केवल खरीदार नहीं बल्कि निर्माता के रूप में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है।

नौसेना, सरकार, सार्वजनिक क्षेत्र के शिपयार्ड, निजी उद्योग और MSME के संयुक्त प्रयासों से तैयार ये तीनों जंगी जहाज भारत की बढ़ती तकनीकी क्षमता और समुद्री शक्ति का प्रतीक बन चुके हैं। आने वाले सालों में ये जहाज भारतीय नौसेना को और अधिक सक्षम, आधुनिक और आत्मनिर्भर बनाने में अहम भूमिका निभाएँगे।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 2026: केवल आसन नहीं, आधुनिक जीवन की बिखरती कड़ियों को जोड़ने का भारतीय सूत्र है योग

दिनचर्या के स्तर पर आए बदलाव, भोजन में परिवर्तन, शारीरिक गतिविधियों में बदलाव और जीवन में स्क्रीन टाइम का बढ़ता प्रभाव, ये कुछ ऐसे परिवर्तन हैं, जो पिछले एक दशक में बहुत तेजी से सामने आए हैं। इससे जहाँ मनुष्य को अनेक क्षेत्रों में लाभ हुआ है, वहीं जीवन में अनेक विकृतियाँ भी उत्पन्न हुई हैं।

एक तरफ तकनीकी प्रगति हुई है, आर्थिक अवसरों में वृद्धि हुई है, कौशल विकास, वैश्विक संपर्क, उद्यमिता और अनेक क्षेत्रों में विकास हुआ है। वहीं दूसरी ओर शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव, सामाजिक संबंधों में दूरी, कार्य और जीवन के संतुलन का बिगड़ना, कई बार पहचान का संकट, मोटापा (Obesity), एंग्जायटी (Anxiety) और डिप्रेशन (Depression) जैसी समस्याएँ भी तेजी से बढ़ी हैं। आज ये सब लगभग सामान्य बातें बनती जा रही हैं।

एक तरफ सब कुछ प्राप्त करने की दौड़ है, तो दूसरी तरफ उसी दौड़ में शामिल होने के दुष्परिणाम भी हैं। ऐसे युग में कुछ तो ऐसा चाहिए, जहाँ मनुष्य अपने मूल से जुड़ा रहे, अपनी जड़ों से स्वयं को जोड़े रखे। ऐसा संतुलन चाहिए, जिससे जीवन में ऊर्जा और समय का सुंदर समन्वय बना रहे।

ऐसी खोज में जब हम निकलते हैं, तो हमें इसका उत्तर अपनी ही परंपरा में मिलता है। वर्षों पहले हमारे ही हिंदू संतों, ऋषियों और मुनियों ने हमें योग का अमूल्य उपहार दिया। यही योग हर प्रश्न का उत्तर है और यही योग हर समस्या का समाधान है।

योग, जिसकी परंपरा वैदिक काल, सिंधु सभ्यता के प्रोटो-शिव (सिंधु सभ्यता की पशुपति मुहर), श्रीमद्भगवद्गीता, बौद्ध एवं जैन परंपराओं से होती हुई महर्षि पतंजलि तथा अनेक योग परंपराओं और पद्धतियों तक विकसित हुई, आज भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ मानव जीवन का मार्गदर्शन कर रहा है। 

जहाँ एक ओर स्वामी विवेकानन्द ने 19वीं शताब्दी में इस परंपरा का विश्व से परिचय कराया, वहीं 21वीं शताब्दी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का प्रस्ताव रखकर योग को विश्व के हर कोने तक पहुँचाने का प्रयास किया। आज 21 जून मात्र एक साधारण तिथि नहीं रह गई है, बल्कि वह दिन बन गया है जब सनातन धर्म रूपी वटवृक्ष से निकले अद्भुत फल योग को सम्पूर्ण विश्व हर्षोल्लास के साथ अपनाता और मनाता है।

इस वर्ष विश्व 12वाँ अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाएगा। भारत ने इस वर्ष की थीम “Yoga for Healthy Ageing” रखी है। वैसे भी योग प्रत्येक आयु वर्ग के लिए समान रूप से लाभदायक है। इस वर्ष का मुख्य कार्यक्रम भी कोलकाता शहर में आयोजित होगा। लंबे समय तक सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का केंद्र रहे बंगाल की धरती से योग का यह शंखनाद भारत के साथ-साथ सम्पूर्ण विश्व में भारतीयता की इस महान परंपरा का संदेश देगा।

श्री रामकृष्ण परमहंस, माँ शारदा, स्वामी विवेकानन्द, महर्षि अरविन्द, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस तथा अनेक योगियों, संतों, क्रांतिकारियों और महर्षियों की यह पावन भूमि इस ऐतिहासिक अवसर की साक्षी बनेगी।

स्वामी विवेकानन्द का वह उद्घोष, “उठो भारत! अपनी आध्यात्मिकता के बल पर सम्पूर्ण विश्व को जीत लो।”,आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है। 

विवेकानन्द केन्द्र, कन्याकुमारी ने भी योग को एक नवीन आयाम से देखते हुए उसके मूल अर्थ ‘जोड़ने’ पर विशेष बल दिया है, जहाँ व्यक्ति को समाज से जोड़ने की बात कही जाती है। आज के समय में इसकी प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। एक ओर भागदौड़ भरी जीवनशैली, शहरीकरण, गाँवों और छोटे शहरों से महानगरों की ओर पलायन, संकरे फ्लैटों का जीवन और अनजान वातावरण, इन सबने व्यक्ति को भीड़ के बीच भी अकेला कर दिया है। लोग लाखों की संख्या में साथ रहते हैं, फिर भी अपनापन कहीं खो रहा है।

ऐसे वातावरण में व्यक्ति मानसिक शांति, आत्मीय संबंधों और अपनेपन की तलाश में जुटा है। ऐसे समय में व्यक्ति को समाज से जोड़ने का प्रयास अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। योग के माध्यम से जहाँ आसन, प्राणायाम, सूर्यनमस्कार और विभिन्न क्रियाओं से शारीरिक एवं मानसिक लाभ प्राप्त होते हैं, वहीं उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि व्यक्ति समाज से जुड़ता है। योग से जुड़ना केवल अपने शरीर या स्वास्थ्य से जुड़ना नहीं है, बल्कि अपने आप से, अपने परिवार से, अपने समाज से, अपने राष्ट्र से और अंततः सम्पूर्ण विश्व के कल्याण से जुड़ना है। यही वह संदेश है, जिसे भारत सदियों से सम्पूर्ण विश्व को देता आया है।

गौ सेवा से वन संरक्षण तक: भारतीय ज्ञान परंपरा के मूल्यों को कानून के सहारे समझने की कोशिश

भारत में कानूनों को लेकर अक्सर यह धारणा रही है कि वे लोगों पर नियंत्रण और दंड के लिए बनाए जाते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में शासन में एक नया दृष्टिकोण उभरा है जिसमें कानून का मकसद केवल अपराधियों को सजा देना नहीं बल्कि आम नागरिकों के जीवन को अधिक आसान, न्यायपूर्ण और गरिमामय बनाना भी है।

इसी सोच का एक उदाहरण जन विश्वास (प्रावधानों का संशोधन) अधिनियम है, जिसे 2023 में लागू किया गया था। उस समय इस कानून को मुख्य रूप से व्यापार और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल बनाने वाले सुधार के रूप में देखा गया था लेकिन इसके प्रभावों को देखने पर साफ नजर आता है कि यह केवल आर्थिक सुधार तक सीमित नहीं था। इसने शासन और न्याय की उस सोच को भी बदलने का प्रयास किया है।

जन विश्वास (प्रावधानों का संशोधन) विधेयक, 42 केंद्रीय अधिनियमों के 183 प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से बाहर करके भारत की विधिक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण और सकारात्मक बदलाव प्रदर्शित करता है। यह कानून में महज तकनीकी संशोधन भर नहीं बल्कि शासन व्यवस्था को अधिक मानवीय और व्यवहारिक बनाने की दिशा में उठाया गया एक सार्थक कदम भी था। इन संशोधनों में विशेष रूप से भारतीय वन अधिनियम, 1927 की धारा 26(1)(D) से जुड़ा परिवर्तन उल्लेखनीय है, जो वन भूमि में पशुओं को चराने से संबंधित है।

यह सुधार इस बात का उदाहरण है कि आधुनिक कानून किस प्रकार समाज की वास्तविक परिस्थितियों को समझते हुए निर्मित किए जा सकते हैं। यह उन प्राचीन भारतीय मूल्यों और सिद्धांतों की भी झलक देता है, जो भारतीय शास्त्रों में वर्णित हैं और जिनमें प्रकृति, पशु और मानव के बीच संतुलित संबंध पर बल दिया गया है।

अपराधीकरण के बजाय करुणा मूलक दृष्टिकोण 

जन विश्वास अधिनियम के तहत वन भूमि में अनजाने में पशु चराने वाले आदिवासियों और ग्रामीणों के लिए पहले से मौजूद जेल की सजा के प्रावधान को हटा दिया गया है और उसकी जगह ₹500 का एक साधारण जुर्माना रखा गया है। यह बदलाव इस समझ पर आधारित है कि ऐसे मामले अधिकतर जानबूझकर नहीं होते, बल्कि लोगों की पारंपरिक आजीविका और रोजमर्रा की जीवन-शैली से जुड़े होते हैं, जिनमें आपराधिक मंशा नहीं होती।

यह विधायी परिवर्तन एक मानवीय दृष्टिकोण को भी दर्शाता है। इसमें यह माना गया है कि समाज के हाशिए पर रहने वाले समुदायों, विशेषकर आदिवासियों और ग्रामीण परिवारों को छोटे और अनजाने में हुए कार्यों के लिए जेल भेजना उचित नहीं है। ऐसे मामलों में कठोर सजा देने के बजाय परिस्थिति को समझते हुए संतुलित और न्यायसंगत दंड देना ही अधिक न्यायपूर्ण और संवेदनशील व्यवस्था का संकेत है।

भारतीय संस्कृति का मूल: गौ सेवा और अहिंसा

यह सुधार भारतीय ज्ञान परंपरा में उद्धृत उन मूल्यों के साथ स्वाभाविक रूप से जुड़ा हुआ दिखाई देता है, जो मनुष्य, पशु और प्रकृति के बीच संतुलन और करुणा पर बल देते हैं। भगवद्गीता (18.44) में गौ-रक्षा (गो-रक्ष्य) और कृषि को वैश्य वर्ण का स्वाभाविक कर्तव्य बताया गया है। इसका आशय यह है कि समाज में पशुओं, विशेषकर गौ की देखभाल और पृथ्वी के साथ संतुलित जीवन को एक महत्वपूर्ण दायित्व माना गया है।

ऋग्वेद (6.28.1–8) में गौ को समृद्धि, पोषण और ईश्वरीय कृपा का प्रतीक बताया गया है, और उन्हें अघ्न्या अर्थात् ‘जिन्हें हानि नहीं पहुँचानी चाहिए’ कहा गया है। ऋग्वेद के अनुसार, ‘गौ का नाम पृथ्वी के समानार्थी है, क्योंकि वह दूर-दूर तक फैली हुई है और असंख्य जीव उस पर विचरण करते हैं।’ ऋग्वेद (1.154.6) यह विचार इस बात को भी स्पष्ट करता है कि गौ की रक्षा केवल एक पशु की रक्षा नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण प्रकृति और जीवन-व्यवस्था की रक्षा के समान मानी गई है।

जब पशुओं को चराने जैसे कार्य, जो अनेक जनजातीय और ग्रामीण परिवारों की आजीविका का मुख्य आधार है, को अपराध की श्रेणी से बाहर किया जाता है, तो यह सिर्फ कानून मे बदलाव मात्र न होकर करुणा और अहिंसा की भावना को व्यवहार में उतारने जैसा व्यावहारिक कदम है। जन विश्वास अधिनियम इस अर्थ में अहिंसा के सिद्धांत को केवल पशुओं तक सीमित नहीं रखता बल्कि मनुष्यों के प्रति भी लागू करता है। यह उन लोगों को अनावश्यक जेल जैसी कठोर सजा से बचाता है, जो पीढ़ियों से प्रकृति के साथ तालमेल रखते हुए अपनी पारंपरिक पशुपालन आधारित जीवन शैली का पालन करते आए हैं।

वन संरक्षण: हमारी पवित्र प्राकृतिक विरासत

भारतीय ज्ञान परंपरा में वनों को केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि अरण्यानी अर्थात् पवित्र और जीवनदायी स्थल के रूप में देखा गया है। तैत्तिरीय आरण्यक में वनों को ऋषियों और तपस्वियों का निवास स्थान बताया गया है, जहाँ लोग प्रकृति के बीच रहकर साधना करते थे और धर्म का पालन अपने सबसे शुद्ध रूप में करते थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतीय परंपरा में वन केवल उपयोग की वस्तु नहीं, बल्कि सम्मान और संरक्षण के योग्य धरोहर हैं। इसी प्रकार अथर्ववेद (12.1.11–12) पृथ्वी को माता के रूप में वर्णित करता है और यह संदेश देता है कि उसके वनों और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना मनुष्य का कर्तव्य है। यह दृष्टिकोण हमें प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी और संवेदनशीलता का भाव भी सिखाता है।

जन विश्वास संशोधन वन संरक्षण को कमजोर नहीं करता बल्कि उसे अधिक संतुलित और व्यवहारिक बनाता है। इसमें कठोर आपराधिक सजा के स्थान पर अनुपातिक दंड (उचित जुर्माना) की व्यवस्था की गई है, जिससे नियमों का पालन सुनिश्चित होता है, लेकिन छोटी और अनजानी गलतियों के लिए जेल जैसी कठोर सजा से बचा जा सकता है। यह दृष्टिकोण धर्म में वर्णित ‘दंड’ की उस अवधारणा से मेल खाता है, जिसमें सजा अपराध के अनुरूप और न्यायसंगत होनी चाहिए। इसी विचार को अर्थशास्त्र (3.1.39–40) में भी रेखांकित किया गया है, जहाँ कहा गया है कि दंड का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि व्यक्ति को सुधार की दिशा में ले जाना होना चाहिए।

धर्म सम्मत मूल्यों के साथ सरल और गरिमामय जीवन 

इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य ‘जीवन की सहजता’ (Ease of Living) और ‘व्यवसाय करने में सुगमता’ (Ease of Doing Business) को बढ़ावा देना है। इसका भाव उस वैदिक आदर्श सर्वलोक – हित से जुड़ा हुआ है, जिसका अर्थ है – सभी प्राणियों का कल्याण। जब छोटे और प्रक्रियात्मक उल्लंघनों के लिए जेल की सजा हटा दी जाती है, तो इससे न केवल न्याय प्रणाली पर बोझ कम होता है, बल्कि आम नागरिकों, विशेषकर कमजोर और ग्रामीण वर्गों, को बिना भय के जीवन जीने का अवसर भी मिलता है।

ईशोपनिषद के प्रथम मंत्र में ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा’ का संदेश दिया गया है, जिसका अर्थ है- ‘जो उपलब्ध है, उसका संयम और संतोष के साथ उपयोग करो।’ यह शिक्षा हमें संतुलित और संपोष्य जीवन जीने की प्रेरणा देती है, जहाँ प्रकृति के संसाधनों का उपयोग जिम्मेदारी के साथ किया जाता है। यह अधिनियम एक ऐसी व्यवस्था निर्मित करता है जो परंपरा, आजीविका और पर्यावरण संरक्षण – इन तीनों के मध्य एक संतुलित और व्यावहारिक दृष्टि स्थापति करती है।

निष्कर्ष: आधुनिक कानून में भारतीय मूल्यों की पुनर्प्रतिष्ठा 

जन विश्वास अधिनियम का संशोधन यह दर्शाता है कि आधुनिक शासन केवल नियम बनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वह समाज की परंपराओं, मूल्यों और वास्तविक जरूरतों को समझते हुए भी आगे बढ़ सकता है। अनजाने में होने वाले पशुपालन से जुड़े छोटे उल्लंघनों को अपराध की श्रेणी से बाहर करना, और साथ ही पर्यावरण की सुरक्षा को बनाए रखना, इस बात का संकेत है कि कानून संवेदनशील और संतुलित दोनों हो सकता है। यह परिवर्तन गौ सेवा, अहिंसा और न्याय जैसे भारतीय परंपरा के मूल सिद्धांतों के प्रति सम्मान को भी प्रकट करता है।

यह महज कानून की भाषा में बदलाव नहीं, बल्कि उन जनजातीय और ग्रामीण समुदायों के सम्मान और गरिमा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिनका जीवन प्रकृति और पशुपालन से गहराई से जुड़ा रहा है। प्राचीन भारतीय मूल्यों और आज की आवश्यकताओं के बीच यह संतुलन ही वास्तविक अर्थों में ‘जन विश्वास’ को मजबूत करता है। एक ऐसी व्यवस्था जो परंपरा का सम्मान करते हुए प्रगति की दिशा में आगे बढ़ती है, वही भारत के विकास की वास्तविक मार्गदर्शिका हो सकती है।  

तुमसे ना हो पाएगा दिपके… तुम्हारे ‘लक्षण’ बिलकुल ठीक नहीं लग रहे ‘तिलचट्टों’

कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के तिलचट्टों ने शनिवार (20 जून 2026) को राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक बार फिर धरना दिया। इस प्रदर्शन को लेकर CJP की तरफ से खूब माहौल बनाया गया था, पर सब बेअसर रहा। धरना स्थल पर जितने तिलचट्टे जुटे उससे ज्यादा तो पत्रकार और सुरक्षाकर्मी मौजूद थे। यानी CJP के फाउंडर अभिजीत दिपके, प्रदर्शन के नाम पर जो पटाखा फोड़ना चाहते थे, वो दूसरी बार भी फुस्स ही रहा।

अब भई, मरता क्या ना करता, तो अभिजीत दिपके भाई धमकी देने पर उतर आए हैं, लोगों को भड़काने पर उतर आएँ हैं। जिस दिल्ली पुलिस को शायद इस प्रदर्शन में शामिल लोगों की संख्या से अब फर्क भी ना पड़ रहा हो उसके नाम पर दिपके माहौल बनाने की कोशिश कर रहे हैं। बाकायदा वीडियो जारी कर रहे हैं कि दिल्ली पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने वाली है।

दिपके यहीं नहीं रुके, खुद को बड़का क्रांतिकारी समझ रहे दिपके लोगों से बोले की जेल भरो। अब भई तुम कोई गाँधी-जयप्रकाश-लोहिया थोड़े हो जो लोग तुम्हारी बात पर जेल भर देंगे। जो युवा तुम्हारे कहने पर घर से जंतर-मंतर तक नहीं आ रहे, तुम्हें लगता है कि वो तुम्हारे कहने पर जेल भर देंगे।

दिपके ने कहा, “मैं अभी जंतर-मंतर पर हूँ। पुलिस मुझे गिरफ्तार करने आ रही है। जितने भी इस देश के युवा इस वीडियो को देख रहे हैं। वो अपने-अपने जिलों में जेल भरो आंदोलन शुरू कर दीजिए। चाहे कुछ भी हो जाए, हमारा आंदोलन रुकना नहीं चाहिए। वो भी प्रदर्शन करेगा, वो शांतिपूर्ण तरीके से करेगा। मेरी आपसे गुजारिश हैं कि आप अब इस आंदोलन को आगे बढ़ाइए और शांतिपूर्ण तरीके से आगे बढ़ाइए।”

दो बार में प्रदर्शन में यह साफ नजर आ गया है कि अभिजीत दिपके का यह सारा आंदोलन बस सोशल मीडिया के उस 22 मिलियन नंबर तक ही सीमित है, जो केवल एक तुक्का लगता है। पहली बार के प्रदर्शन में कुछ लोग मजमा समझकर आ गए थे कि भई देखें क्या हो रहा है। लेकिन उनके हाथ भी कुछ नहीं आया, हाँ बस कुछ लोगों को सोशल मीडिया का कॉन्टेंट मिल गया।

शुरुआत खराब होने के बाद, दूसरी बार तुम्हें लगा होगा कि अब शायद कुछ हो जाए लेकिन इस बार तो लोगों ने पूरी तरह ही साफ कर दिया कि भाई तुम जाओ वापस अमेरिका। वहीं, अपनी धंधा-पानी कुछ हो तो देखो। यहाँ नेता गिरी के चक्कर में पड़ोगे तो कुछ समय बाद यही गाते मिलोगे कि ‘न खुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम न इधर के हुए न उधर के हुए‘।

जितना तुम लोगों को भड़का रहे तो ये ध्यान रखना कि तुम्हारे आंदोलन की अर्थी को कंधा देने के लिए बेशक 4 लोग लगें लेकिन तुम्हें टाँगकर ले जाने के लिए दिल्ली पुलिस का एक जवान ही काफी होगा। और हाँ, अब जिन लोगों के दम पर तुम कूद रहे हो ना, वो तब केवल रीलबाजी ही करते रहेंगे और तुम अपना जीवन उनके चक्कर में बर्बाद कर लोगे।

अब दिपके भाई को शायद कोई यह भी बता दे कि सोशल मीडिया पर वायरल होना और जमीन पर राजनीतिक आंदोलन खड़ा करना दो बिल्कुल अलग चीजें हैं। मोबाइल स्क्रीन पर लाइक, शेयर और कमेंट जुटाना आसान है लेकिन तपती धूप में घंटों खड़े होकर किसी आंदोलन का हिस्सा बनना उतना आसान नहीं होता।

यही वजह है कि जिन लाखों-करोड़ों लोगों का समर्थन सोशल मीडिया पर दिखाई देता है, उनमें से मुट्ठीभर लोग भी जंतर-मंतर तक नहीं पहुँच पाए। यह अगर ऐसा ही चलता रहा है कि वो दिन दूर नहीं जब 2-4 लोग ढूँढे से ही तुम्हारे इस कथित आंदोलन के लिए नहीं मिलेंगे।

7 लोगों को उम्रकैद, लेकिन क्या सच में ‘गोरक्षा’ ही था मकसद? अदालत ने कहा- उद्देश्य नहीं हुआ साबित, मीडिया ने बनाई मनगढ़ंत कहानियाँ

मध्य प्रदेश की एक अतिरिक्त जिला एवं सत्र अदालत ने अगस्त 2022 में मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम जिले में हुई दंगा और हत्या की एक घटना में 7 लोगों को दोषी ठहराया। इस घटना में नजीर अहमद नाम के एक व्यक्ति की मौत हो गई थी जबकि कई अन्य लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।

12 जून 2026 को दिए गए फैसले में अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश तबस्सुम खान ने 7 आरोपितों दीपक उर्फ बाबा केवट, अजय उर्फ अज्जू राठौर, प्रकाश कौशल, पवन बठाव, अमर उर्फ भोला बठाव, कन्हैया बठाव और बल्लू उर्फ अनुज रघुवंशी को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302, 307, 148 सहपठित 149 के तहत दोषी ठहराया। कोर्ट ने सभी दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई।

हालाँकि, दोषियों को हत्या, हत्या के प्रयास और दंगा करने से जुड़े प्रावधानों के तहत सजा दी गई, लेकिन कुछ मीडिया संस्थानों ने केवल इसलिए इस मामले को ‘गौ-रक्षक हिंसा’ या ‘काउ विजिलेंटिज्म’ से जोड़कर पेश करना शुरू कर दिया क्योंकि घटना में शामिल ट्रक मवेशियों को लेकर जा रहा था।

कई मीडिया रिपोर्टों में दोषियों को ‘गौ रक्षक’ बताया गया जबकि कोर्ट के फैसले में कहीं भी इस शब्द का इस्तेमाल नहीं किया गया है।

कुछ मीडिया रिपोर्टों में यह भी गलत दावा किया गया कि कोर्ट ने 14 लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई जबकि सत्र अदालत ने 7 लोगों को दोषी ठहराकर सजा दी थी।

कोर्ट की टिप्पणियों और फैसले पर आगे बढ़ने से पहले उस घटना को समझना जरूरी है, जिसके आधार पर यह मामला दर्ज किया गया था। फैसले में दर्ज जानकारी के अनुसार, यह घटना 3 अगस्त 2022 की आधी रात के आसपास मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम जिले के सिवनी मालवा थाना क्षेत्र के बराखड़ गाँव स्थित नंदरवाड़ा रोड पर हुई थी।

शिकायतकर्ता शेख लाला (ट्रक चालक) अपने साथियों नजीर अहमद और शेख मुश्ताक के साथ एक ट्रक में मवेशियों को लेकर यात्रा कर रहा था। यह ट्रक नंदरवाड़ा से निकलकर महाराष्ट्र के अमरावती की ओर जा रहा था।

घटना वाले दिन आधी रात के समय जब ट्रक बराखड़ गाँव के पास पहुँचा, तब उसमें सवार लोगों पर लाठियाँ लेकर आए 10 से 12 ग्रामीणों ने हमला कर दिया। हमलावरों ने शेख लाला, नजीर अहमद और शेख मुश्ताक की पिटाई की।

पुलिस मौके पर पहुँची और घायलों को सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) सिवनी मालवा पहुँचाया। शेख लाला और शेख मुश्ताक गंभीर रूप से घायल थे जबकि नजीर अहमद की अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई।

इसके बाद सिवनी मालवा थाने में 10-12 लोगों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 147, 148, 341, 307 और 302 के तहत FIR दर्ज की गई। बाद में 7 आरोपितों पर मुकदमा चला और उन्हें FIR में दर्ज कुछ अपराधों में दोषी ठहराया गया।

FIR में लगाए गए आरोपों के आधार पर कोर्ट ने अपराध तय करने के लिए कुल सात मुद्दे निर्धारित किए। इन सात मुद्दों में तीसरा मुद्दा खास था, जिसमें यह तय करना था कि क्या आरोपित ने हमला करने से पहले जानबूझकर पीड़ितों के ट्रक को रोका था। यह इस बात को समझने के लिए महत्वपूर्ण था कि क्या आरोपितों के पीछे कोई विशेष उद्देश्य या मकसद था।

फैसले का स्क्रीनशॉट

कोर्ट द्वारा तय किया गया प्रश्न था, “क्या उक्त दिनांक, समय और स्थान पर आरोपितों ने ट्रक नंबर MH-40-CD-8751 में यात्रा कर रहे शिकायतकर्ता शेख लाला, नजीर अहमद और शेख मुश्ताक का रास्ता रोककर उन्हें गलत तरीके से रोका था?”

दोनों पक्षों के तर्कों और प्रस्तुत साक्ष्यों की जाँच के बाद कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुँची कि आरोपितों के खिलाफ गलत तरीके से रास्ता रोकने का आरोप साबित नहीं किया जा सका।

दूसरे शब्दों में, कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि आरोपितों ने हमला करने से पहले जानबूझकर पीड़ितों के ट्रक को रोका था। ऐसे में किसी विशेष मकसद के अभाव में कुछ मीडिया संस्थानों द्वारा इस घटना को गौ-रक्षक हिंसा से जोड़कर पेश करने के दावे कोर्ट के निष्कर्षों से मेल नहीं खाते।

फैसले का स्क्रीनशॉट

फैसले के पैरा नंबर 96 में कोर्ट ने कहा कि आरोपितों के खिलाफ घायल व्यक्तियों और मृतक का रास्ता रोकने का आरोप सिद्ध नहीं हुआ। कोर्ट ने कहा कि प्रत्यक्षदर्शी शेख लाला और सैयद मुश्ताक ने कोर्ट में ऐसा कोई बयान नहीं दिया कि भीड़ में शामिल किसी व्यक्ति ने उनके सामने वाहन खड़ा कर रास्ता रोका था।

कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस को दिए गए उनके बयानों में भी ट्रक का रास्ता रोके जाने का कोई जिक्र नहीं था। इसके अलावा कोर्ट के सामने ऐसा कोई अन्य साक्ष्य भी पेश नहीं किया गया जिससे यह साबित हो सके कि आरोपित ने ट्रक का रास्ता रोका था।

फैसले को सामान्य रूप से पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि कुछ मीडिया संस्थानों द्वारा इस मामले को गौ-रक्षक हिंसा बताने का दावा कोर्ट के निष्कर्षों से समर्थित नहीं है। अदालत के निष्कर्षों के अनुसार यह मामला हत्या, हत्या के प्रयास और दंगा से जुड़ा था, न कि गौ-रक्षक हिंसा से।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

फिंगरप्रिंट से लेकर DNA मैचिंग तक, अब अपराधियों की खैर नहीं… शाह ने लॉन्च किया ‘NCRB-अभिज्ञान’ ऐप: जानिए FIR से सजा तक कैसे बदल जाएगी पुलिसिंग

केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने नई दिल्ली में ’26वें अखिल भारतीय फिंगरप्रिंट सम्मेलन 2026′ का उद्घाटन किया। यह सम्मेलन भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में एक बड़े डिजिटल बदलाव का गवाह बना। गृह मंत्री ने ‘NCRB-अभिज्ञान’ के 4 अत्याधुनिक मोबाइल ऐप्स और प्लेटफॉर्म लॉन्च किए हैं। ये ऐप्स पुलिसिंग को ‘स्मार्ट’ और जाँच को पूरी तरह ‘वैज्ञानिक’ बनाएँगे। इस बदलाव का मुख्य उद्देश्य अपराधियों को सजा दिलाना और समयबद्ध न्याय सुनिश्चित करना है।

क्या हैं ये 4 जादुई ऐप्स?

गृह मंत्री ने 4 नई डिजिटल सुविधाएँ लॉन्च की हैं। ‘NCRB-अभिज्ञान’ एक मोबाइल एप्लिकेशन है। यह पुलिस को कहीं भी और कभी भी फिंगरप्रिंट स्कैन करने की ताकत देता है। पुलिसकर्मी मौके पर ही संदिग्धों के फिंगरप्रिंट नेशनल डेटाबेस से मिला सकते हैं। दूसरा है ‘CrPI’ एप्लीकेशन। इसमें चेहरा, आँखों की पुतली और DNA मैचिंग का मिलन है। यह रिपीट ऑफेंडर्स को पकड़ने के लिए सबसे सटीक टूल है।

तीसरा है ‘ई-फ़ॉरेंसिक्स 2.0’। यह लैब और जाँच एजेंसियों को डिजिटल रूप से जोड़ता है। इसमें नमूनों के पंजीकरण से लेकर रिपोर्ट तक सब कुछ ऑनलाइन ट्रैक होगा। चौथा है ‘ई-प्रॉसिक्यूशन 2.0’। यह पुलिस, वकीलों और अदालतों को जोड़ता है। इससे केस की फाइलिंग से लेकर सजा तक का सफर तेज होगा। ये चारों ऐप्स मिलकर एक ‘इंटीग्रेटेड क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम’ (ICJS) बनाते हैं।

FIR से सजा तक: 3 साल में न्याय का लक्ष्य

मोदी सरकार का लक्ष्य बहुत साफ है। FIR से कन्विक्शन तक का सफर 3 साल के भीतर पूरा होना चाहिए। गृह मंत्रालय इसके लिए सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के साथ मिलकर काम कर रहा है। लंबित (पेंडिंग) मामलों को कम करने के लिए एक ठोस ब्लूप्रिंट तैयार किया जा रहा है। गृह मंत्री ने कहा कि अपराधी कितना भी चतुर हो, वह विज्ञान और कानून की शक्ति से नहीं बच सकता।

पुलिसिंग अब ‘रिकॉर्ड-कीपिंग’ नहीं, ‘इंटेलिजेंस-ड्रिवन’ होगी

अब तक NCRB जैसी संस्थाएँ सिर्फ रिकॉर्ड रखने का काम करती थीं। अब यह ‘इंटेलिजेंस-ड्रिवन’ संस्था में बदल रही है। गृह मंत्री ने साफ किया कि सिर्फ अपराधी को पकड़ना काफी नहीं है। अपराध को होने से पहले ही रोकना असली सफलता है। पुलिस अब ‘प्रेडिक्टिव पुलिसिंग’ की तरफ बढ़ रही है। यानी अपराध होने के बाद कार्रवाई करने से आगे बढ़कर, अब अपराध को होने से पहले ही रोकने की तैयारी है।

डेटा बना ‘हथियार’: AI और मशीन लर्निंग का कमाल

गृह मंत्री ने बताया कि डेटा का अंबार किसी काम का नहीं है। अगर डेटा का विश्लेषण न हो, तो वह एक अलमारी में रखे बोझ जैसा है। अब इस डेटा को ‘एक्शन योग्य इंटेलिजेंस’ में बदला जा रहा है। सरकार के पास 1 करोड़ 29 लाख फिंगरप्रिंट रिकॉर्ड मौजूद हैं। इसके अलावा 9 लाख 91 हजार नार्को अपराधियों का डेटा है। साथ ही 3 लाख 65 हजार मानव तस्करी के मामलों का रिकॉर्ड भी उपलब्ध है।

अब AI और मशीन लर्निंग का उपयोग करके इन डेटाबेस को जोड़ा जा रहा है। इससे अपराध के पैटर्न को समझा जाएगा। रिपीट ऑफेंडर्स और अंतरराज्यीय अपराधी नेटवर्क को पहले ही पहचाना जा सकेगा। राज्यों को विशेष टीमें बनाने को कहा गया है। ये टीमें AI की मदद से अपराधियों की प्रोफाइलिंग करेंगी।

CCTNS का विस्तार और डेटा का विशाल नेटवर्क

आज देश का हर कोना तकनीक से जुड़ चुका है। देश के 17,840 पुलिस थानों में CCTNS की पहुँच शत-प्रतिशत हो गई है। आज पुलिस के पास 37 करोड़ 68 लाख ऑनलाइन रिकॉर्ड उपलब्ध हैं। इनमें पुरानी FIR का डेटा भी शामिल है। वहीं, 22,000 अदालतें ई-कोर्ट से जुड़ चुकी हैं। ई-प्रिजन में 2 करोड़ 29 लाख कैदियों का डेटा सुरक्षित है। ई-फॉरेंसिक में 34 लाख 48 हजार केसों का फॉरेंसिक डेटा है। 43 लाख 16 हजार का अलर्ट डेटा भी सिस्टम में मौजूद है। ये सारे आँकड़े अब मिलकर एक शक्तिशाली डिजिटल सुरक्षा कवच बना रहे हैं।

राज्यों को गृह मंत्री की दो-टूक नसीहत

गृह मंत्री अमित शाह ने सभी राज्यों के पुलिस प्रमुखों को कड़ा संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि डेटा की सुरक्षा और गुणवत्ता राज्यों की जिम्मेदारी है। डेटा के कपबोर्ड में रखे रहने से किसी का भला नहीं होता। उन्होंने पुलिस अधिकारियों से हर हफ्ते कम से कम एक दिन ट्रेनिंग के लिए निकालने को कहा। यह ट्रेनिंग कम से कम एक साल तक चलनी चाहिए।

चार्जशीट को छोटा रखने और केवल उपयोगी साक्ष्यों को शामिल करने की कला सिखाई जानी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि NAFIS का उपयोग केवल पुराने केस सुलझाने के लिए न करें। हर अपराध स्थल से फिंगरप्रिंट लेकर डेटाबेस को लगातार समृद्ध करें। यह एक दो-तरफा रास्ता है। डेटा जितना बढ़ेगा, अपराधी के बचने के चांस उतने ही कम होंगे।

क्यों महत्वपूर्ण है यह बदलाव?

पुराने समय में पुलिसिंग सिर्फ फोर्स के भरोसे होती थी। अब वैज्ञानिक साक्ष्य सबसे बड़ा हथियार है। नए आपराधिक कानूनों के तहत 90 दिनों के अंदर उम्र कैद की सजा दिलाने के मामले सामने आए हैं। गृह मंत्री का मानना है कि जब समाज में यह संदेश जाएगा कि अपराध करने के बाद दंड निश्चित है, तो लोग अपराध करने से डरेंगे।

इस सम्मेलन और नई टेक्नोलॉजी के लॉन्च से देश की आपराधिक न्याय व्यवस्था में बड़ा बदलाव आएगा। यह व्यवस्था अब अधिक पारदर्शी, सटीक और समयबद्ध हो गई है। पुलिस, अभियोजन, फॉरेंसिक और न्यायपालिका अब एक ही डिजिटल कड़ी में जुड़ गए हैं। अपराधियों के लिए अब छिपने की जगह नहीं बची है। विज्ञान और तकनीक की इस नई लहर से भारत में अपराध नियंत्रण का एक नया अध्याय लिखा जा रहा है।

UP में नासिर ने आनंद को तलवार से काटा… नई नहीं दलितों पर इस्लामी कट्टरपंथियों की बर्बरता, आँकड़े देते हैं अत्याचार की गवाही: ऐसी हर घटना के बाद ‘भीम-मीम’ वाले साध लेते हैं चुप्पी

उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर में गुरुवार को नासिर अली नामक शख्स ने बीच बाजार एक दलित युवक आनंद की तलवार से गला काटकर बेरहमी से हत्या कर दी। दलित-मुस्लिम एकता और भीम-मीम के नारे लगाने वालों को इस हत्या के बाद साँप सूँघ गया है। दलितों के नाम पर वोट माँगने वाले दल खामोश हैं क्योंकि मारने वाला मुस्लिम है। यह मामला इस्लामी कट्टरता के साथ-साथ यह भी दिखाता है कि दलितों के नाम पर की जाने वाली राजनीति किस हद तक सुविधाजनक हो गई है।

क्या है आनंद की हत्या का पूरा मामला?

जिस आनंद को सरे राह काटा गया उस बेचारे का ‘कसूर’ उस जिहादी की नजर में ये था कि आनंद ने अपनी भांजी के साथ छेड़छाड़ को लेकर नासिर को थप्पड़ जड़ दिया था। यह थप्पड़ नासिर को इतना नागवार गुजरा कि देर रात आनंद के बाजार से लौटते समय नासिर ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर उन्हें घेर लिया और धारदार हथियार से गला रेत दिया। यह पूरा कत्लेआम इतनी भयावहता के साथ हुआ कि आनंद ने मौके पर ही दम तोड़ दिया।

इसके बाद गुस्साए ग्रामीणों ने सड़क जमकर दिया और नासिर के गिरफ्तारी और एनकाउंटर की माँग पर अड़ गए।मामले के बाद संत कबीर नगर में एडीजी, डीआईजी, एसपी समेत पूरा पुलिस महकमा तैनात है और नासिर और उसके साथियों की तलाश की जा रही है।

आनंद की हत्या कोई पहली घटना नहीं है। इस तरह की कई घटनाएँ बीते महीनों में सामने आ चुकी हैं जिसमें दलितों का उत्पीड़न और उनकी हत्या करने में आरोपित मुस्लिम रहे हैं।

मुस्लिमों से सर्वाधिक पीड़ित हैं दलित

मीडिया रिपोर्ट्स को मानें तो जनवरी से अप्रैल 2026 के बीच में एससी/एसटी एक्ट के आँकड़ों में पता चला कि दलितों के उत्पीड़न पर मुस्लिमों के खिलाफ 1,983 मामले दर्ज हो चुके हैं। यह आँकड़े राज्य के सभी जिलों और जून से मिली पुलिस रिपोर्ट, FIR और जाँच रिपोर्ट के आधार पर तैयार किए गए हैं।

इन आँकड़ों के सामने आने के बाद से सियासी महकमे में हलचल तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी लगातार PDA नैरेटिव पर लोगों को बरगलाने की कोशिश कर रही है लेकिन NCRB के आँकड़े और रुझान कहते हैं कि मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की सरकारों के दौरान दलितों पर अत्याचार के मामले काफी बढ़े थे।

एनसीआरबी और अन्य रिपोर्ट्स के अनुसार, 2012 से 2017 के बीच में यूपी में दलितों पर अपराधों के 15000 से भी अधिक मामले दर्ज हुए। सपा सरकार में ही 2014 में बदायूं में दो दलित बहनों के साथ हुई बर्बरता ने भी देश को तो झकझोरा ही, पर यह भी बता दिया कि सपा राज में कानून व्यवस्था दलितों के लिए अराजक हो चुकी है।

2012-13 में उत्तर प्रदेश में दलितों पर दर्ज अपराध की संख्या 2800 से 3000 के बीच रही। इसके बाद 2014-15 में ये संख्या 3200 से 3400 हो गई। इनमें बलात्कार, हत्या और सामाजिक बहिष्कार के मामलों में बढ़ोतरी देखी गई।

वहीं अखिलेश के आखिरी वर्षों 2016-17 में एनसीआरबी के रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश दलितों के अपराध के मामले में पहले नंबर पर रहा। इस वर्ष में उत्तर प्रदेश में दलितों पर दर्ज अपराधों की संख्या 3500 से 3700 तक पहुँच गई। कुल मिलाकर अखिलेश के कार्यकाल में 15130 मामले दर्ज हुए जो देश में सबसे अधिक थे।

मुलायम की सत्ता में भी दलितों का हुआ शोषण

1993 से 1995 और 2003 से 2007 के बीच रही मुलायम सिंह यादव की सरकार की बात की जाए तो दलितों पर अत्याचार की स्थिति ऐसी थी कि उन्हें विपक्षी मतदाता मानकर उनकी लगातार उपेक्षा की जाती थी, थानों में न्याय नहीं मिलता था और ग्रामीण क्षेत्रों में हिंसा हद से अधिक देखने को मिलती थी।

आम जनता को तो छोड़ दीजिए, 1995 का कुख्यात गेस्ट हाउस कांड भी मुलायम सरकार के दौरान ही हुआ जिसने दलितों के प्रति समाजवादी पार्टी का चेहरा और विचार सबके सामने रख दिया। इस घटना ने बताया कि सपा दलित समाज की आवाज को दबाने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है।

अपने परिवार के सत्ता में रहने के दौरान दिलों के रुख को जानने के बावजूद समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव पीड़ित, दलित और अल्पसंख्यक (PDA) का नारा देकर सत्ता की रोटियाँ सेंकने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं।

यह तो योगी सरकार है जिसकी वजह से न केवल कानून व्यवस्था सुदृढ़ हुई पर साथ ही दलितों पर अत्याचार और उनके उत्पीड़न में भी काफी उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि यदि 2027 के चुनाव में अखिलेश यादव सत्ता संभालते हैं तो दलितों के लिए उनका शासन काल किसी डरावने सपने से भी बदतर हो जाएगा।

भीम-मीम राजनीति की भी पोल खोलते हैं ऐसे मामले

सपा जैसे दल ‘भीम-मीम’ राजनीति के सबसे बड़े स्वघोषित मसीहा हैं। ‘भीम-मीम’ के नारे के सहारे दलितों और मुस्लिमों की सामाजिक-राजनीतिक एकता बताने वाले अखिलेश यादव जैसे लोगों का दिल असल में दलितों के नाम पर कम ही पसीजता है। यह कोई इस घटना की बात नहीं है, घटना दर घटना आपको इसके प्रमाण नजर आएँगे। इन दलों द्वारा इस राजनीति में दलितों के मुद्दों से ज्यादा महत्व केवल वोटों की गणित को दिया जाता रहा है। दलित उत्पीड़न के मुद्दों पर सबसे अधिक मुखर होने का दावा करने वाले ये लोग मुस्लिम आरोपित होने पर मुँह बंद कर लेते हैं।

भीम-मीम के नाम पर राजनीति करने वाले लोग सिद्धांत की नही बल्कि सुविधा की राजनीति करते हैं। दलितों पर अत्याचार किसी विशेष राजनीतिक नैरेटिव में फिट बैठता है तो उस पर प्रेस कॉन्फ्रेंस होती है, धरना होता है, सोशल मीडिया अभियान चलाया जाता है लेकिन यदि आरोपित मुस्लिम समुदाय से हो तो वही राजनीतिक ऊर्जा अचानक गायब हो जाती है।

फीफा विश्व कप 2026: कनाडा की पहली जीत से अमेरिका की अग्निपरीक्षा तक

एक दफा फिर सूर्य उदय हुआ। यह एक और नया दिन था। आज मेक्सिको, अमेरिका व कनाडा की भूमि में फीफा विश्व कप के ग्रुप स्टेज के कई मैच खेले जाने थे।

सर्वप्रथम, चेक रिपब्लिक का सामना दक्षिण अफ्रीका से होने जा रहा था। इस मैच में कुछ भी हो सकता था। मैच शुरू होते ही छठे मिनट में चेक रिपब्लिक के लिए 27 वर्षीय मिडफील्डर मिखाल सादिलेक गोल कर टीम को बढ़त दिला देते हैं। खैर, खेल आगे बढ़ता है। पहले हाफ की समाप्ति पर स्कोर 1-0 ही रहता है। दोनों टीमें गोल करने के प्रयास में लगी रहती हैं, परंतु धीरे-धीरे समय बीतता जाता है। अचानक, मैच के 82वें मिनट में अपने ही गोलपोस्ट के समीप एक फाउल कर चेक रिपब्लिक की टीम दक्षिण अफ्रीका को पेनाल्टी का सुनहरा अवसर दे देती है। इस मौके को भुनाने में मोकोएना कोई गलती नहीं करते और पेनाल्टी को सफलतापूर्वक गोल में तब्दील कर अंतिम क्षणों में दक्षिण अफ्रीका की मैच में वापसी करा देते हैं। गौरतलब है कि उम्मीदों के विपरीत इस मैच में 61 प्रतिशत समय गेंद दक्षिण अफ्रीका के पास रही। साथ ही उन्होंने विरोधी गोलपोस्ट पर 17 दफा हमले किए। परंतु मैच 1-1 की बराबरी पर समाप्त हो जाता है। एक दफा फिर इस टूर्नामेंट में एक और मैच ड्रॉ रहता है।

आगे, लॉस एंजेलिस स्टेडियम में स्विट्जरलैंड का मुकाबला बोस्निया एवं हर्ज़ेगोविना की टीम से था। बोस्निया की टीम उम्रदराज एडिन जेको के नेतृत्व में इस टूर्नामेंट में उतरी है। वहीं, कोबेल, अकांजी, झाका व एम्बोलो जैसे खिलाड़ियों से लैस स्विस खेमा जीत के लिए भूखा नजर आ रहा था। मैच के पहले हाफ में दोनों टीमें कोई गोल करने में नाकाम रहती हैं।

दोनों टीमें, खासकर स्विट्जरलैंड, प्रयास तो कर रही थीं, परंतु स्कोर अब भी 0-0 ही था। फिर, स्विस कोच मैच के 71वें मिनट में एक साथ तीन बदलाव करते हैं। यह देखकर कि बोस्निया के खिलाड़ी थक चुके हैं, वे 20 वर्षीय मनजाम्बी को भी मैदान में भेजते हैं। उनका यह फैसला मैच को बदलकर रख देता है। 74वें मिनट में ही मनजाम्बी विरोधी गोलपोस्ट से लगभग 15 मीटर की दूरी से पोस्ट की दाईं ओर निशाना लगाते हैं। वे गोल करने में सफल हो जाते हैं और इस गोल के साथ स्विट्जरलैंड को 1-0 की अहम बढ़त दिला देते हैं। थोड़ी देर बाद बोस्निया के मुहारेमोविक को फाउल करने पर रेफरी रेड कार्ड दिखा देते हैं। इसका लाभ स्विट्जरलैंड को मिलता है। एक अन्य स्थानापन्न खिलाड़ी वारगास, साथी खिलाड़ी एम्बोलो से असिस्ट पाकर, अपनी टीम के लिए गोल करने में सफल हो जाते हैं। स्कोर 2-0 हो जाता है।

फिर, 90वें मिनट में इस बार वारगास गेंद को गोलपोस्ट के समीप मनजाम्बी के लिए परोसते हैं, जो गोल करने में कोई गलती नहीं करते। स्कोर 3-0 हो जाता है। स्विस टीम अंतिम क्षणों में भी गोलों की बौछार कर रही थी। इसके बाद बोस्निया के कोच अरमिन माहमिक को मैदान में भेजते हैं, जो मैदान में उतरते ही बोस्निया के लिए एक गोल कर देते हैं। स्कोर 3-1 हो जाता है। मैच के 90+6वें मिनट में स्विस स्थानापन्न खिलाड़ी जिब्रिल सौ को विरोधी गोलपोस्ट के पास फाउल कर दिया जाता है। टीम को पेनाल्टी मिलती है, जिसे अनुभवी कप्तान ग्रानित झाका गोल में तब्दील कर स्कोर 4-1 कर देते हैं। मैच इसी स्कोरलाइन पर समाप्त हो जाता है।

फिर, कनाडा के खिलाड़ी अपने घरेलू दर्शकों के सामने वैंकूवर में कतर की टीम से मुकाबला करते नजर आए। इस मैच में अपनी टीम को खेलते देखने के लिए लगभग साढ़े बावन हजार दर्शक स्टेडियम में मौजूद थे। यह मैच शुरुआत से ही एकतरफा रहा। कनाडा के खिलाड़ियों ने मैच की शुरुआत से ही कतर को संभलने का मौका नहीं दिया। अपने स्टार स्ट्राइकर जोनाथन डेविड की हैट्रिक की बदौलत कनाडा यह मैच 6-0 से जीतकर अपने ग्रुप में शीर्ष स्थान पर रहने की मजबूत दावेदारी पेश कर चुका है।

यह मात्र तीसरी बार है जब कनाडा फीफा विश्व कप का हिस्सा है और यह विश्व कप में उसकी पहली जीत भी है। अब लगभग निश्चित है कि पहली बार कनाडा ग्रुप स्टेज से आगे का सफर तय करेगा। यह निश्चित ही जश्न का समय होना चाहिए था। हालांकि, ऐसा हुआ नहीं।

24 वर्षीय स्टार कनाडाई मिडफील्डर इस्माइल कोने को दूसरे हाफ की शुरुआत में विपक्षी खिलाड़ी के फाउल के चलते गंभीर चोट लग जाती है। उनकी टांग में मल्टिपल फ्रैक्चर हो जाते हैं। वे दर्द से कराह रहे थे।

रेफरी तुरंत खेल रोककर मेडिकल टीम को बुलाते हैं। टीम के इस अहम खिलाड़ी पर हुए गंभीर फाउल के चलते दोनों टीमों के खिलाड़ियों के बीच झड़प हो जाती है। कोने को स्ट्रेचर पर मैदान से बाहर ले जाया जाता है। यह चोट इतनी गंभीर है कि अब उनका विश्व कप अभियान समाप्त हो गया है। दर्द से कराहते हुए भी इस्माइल कोने स्ट्रेचर से ही हाथ हिलाकर दर्शकों का अभिवादन स्वीकार करते हैं और जाते-जाते सभी को सांत्वना भी देते हैं। यह दृश्य सभी दर्शकों को भावुक कर देता है। नाथन सलीबा घायल इस्माइल कोने की जगह मैदान में आते हैं। और जैसे ही नाथन सलीबा मैच के 64वें मिनट में गोल दागकर घायल साथी खिलाड़ी इस्माइल कोने की जर्सी हाथों में लेकर हवा में लहराते हैं, कोच जेसी मार्श की आंखें भीग जाती हैं। यही तो इस खेल का जादू है, जिसकी हम अक्सर बात करते हैं। कहते हैं, फुटबॉल कमजोर दिल वालों के लिए नहीं है। यह एक पल आपको हंसाता है और अगले ही पल आपको रोने पर मजबूर कर देता है।

आगे, आज सुबह साढ़े छह बजे मेक्सिको की टीम अपने ही घर में दक्षिण कोरिया से दो-दो हाथ करती नजर आई। अपने घरेलू दर्शकों के अपार समर्थन के चलते मेक्सिको यह मैच 1-0 से जीतने में सफल रही और इस जीत के साथ ही वह ग्रुप ए की विजेता के तौर पर टूर्नामेंट के अगले दौर में जगह बनाने वाली पहली टीम बन गई है। क्योंकि दक्षिण कोरिया अपना पिछला मैच जीत चुकी थी, इसलिए उसके पास अभी भी अगले दौर में जगह बनाने का मौका है।

अब आगे, भारतीय समयानुसार आज रात साढ़े बारह बजे सिएटल स्टेडियम में घरेलू समर्थकों की सेना के साथ क्रिश्चियन पुलिसिक की अमेरिकी टीम का सामना होगा ऑस्ट्रेलिया से, जिसने इस टूर्नामेंट का एक बड़ा उलटफेर किया है। ऑस्ट्रेलिया अपने पिछले मैच में तुर्की की अनुभवी टीम को 2-0 से हरा चुकी है। वहीं, अमेरिका ने पैराग्वे को 4-1 से परास्त किया था। ऐसे में एक जोरदार मुकाबले की पूरी संभावना है।

वहीं, बोस्टन स्टेडियम में ग्रुप सी के मुकाबले में स्कॉटलैंड को मजबूत इरादों वाली मोरक्को की टीम से भिड़ना होगा। यह मैच आप दोनों टीमों के जज्बे और जिद के लिए देख सकते हैं।

और कल सुबह, भारतीय समयानुसार साढ़े छह बजे, फिलाडेल्फिया में ब्राजील अपेक्षाकृत कमजोर हैती की टीम के खिलाफ मैदान में उतरेगी। अगले दौर में जगह बनाने के लिए उसे यह मैच अच्छे अंतर से जीतना ही होगा। जहां तक खबर है, चोटिल नेमार एक बार फिर टीम का हिस्सा नहीं होंगे। एक दफा फिर ब्राजील को जिताने की जिम्मेदारी विनीसियस जूनियर के कंधों पर होगी। कोच कार्लो एंसेलोटी के विश्व कप दल में मेहनती युवा सेंटर फॉरवर्ड जाओ पेड्रो के स्थान पर चोटिल नेमार को तरजीह देने के फैसले की चारों ओर आलोचना हो रही है, क्योंकि पिछले मैच में हमने देखा कि इगोर थियागो पूरी तरह असफल रहे थे। इस मैच से पहले आज की रात निश्चित ही कोच कार्लो के लिए एक बड़ी रात होगी।

फिर, कल सुबह साढ़े आठ बजे, अपना पिछला मैच हार चुकी ग्रुप डी की दो टीमें, तुर्की और पैराग्वे, सांता क्लारा के सैन फ्रांसिस्को स्टेडियम में आमने-सामने होंगी। दोनों ही जीत के लिए लालायित रहेंगी। तुर्की के लिए युवा अर्दा गुलेर अहम भूमिका निभाएंगे।

आगे, जापान के विरुद्ध अपना पिछला मैच ड्रॉ खेलने वाली रोनाल्ड कोमान की नीदरलैंड्स का सामना होगा ट्यूनीशिया को 5-1 से रौंद चुकी स्वीडन की आक्रामक टीम से। एक दफा फिर ग्योकेरेस, इसाक और अयारी जैसे अटैकर्स से लैस स्वीडन मैच जीतकर अगले दौर में जगह बनाना चाहेगी। पिछला मैच ड्रॉ रहने के चलते नीदरलैंड्स पर निश्चित रूप से अतिरिक्त दबाव रहेगा। यह भी एक बेहतरीन मुकाबला होगा।

यूं ही कई महत्वपूर्ण मैच हमारा इंतजार कर रहे हैं। कई खूबसूरत कहानियां सदैव के लिए अमर होने का इंतजार कर रही हैं। बने रहिए साथ। फुटबॉल का सिलसिला जारी रहेगा। 

जानिए दुबई के उस ‘Botim’ ऐप की कहानी, जिसके जरिए कनेक्टेड थे राँची में RSS दफ्तर पर बम फेंकने वाले पाकिस्तानी एजेंट

झारखंड की राजधानी रांची में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के दफ्तर पर हुए हालिया पेट्रोल बम हमले ने भारत की सुरक्षा एजेंसियों के कान खड़े कर दिए हैं। इस गंभीर मामले की जाँच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे इसमें चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं। इस हमले के तार सीधे तौर पर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) और दुबई से जुड़े हुए पाए गए हैं।

इस पूरी आतंकी साजिश को रचने, स्थानीय स्तर पर लड़कों को तैयार करने और विदेशों में बैठे आकाओं से खुफिया बातचीत करने के लिए एक खास डिजिटल प्लेटफॉर्म का सहारा लिया गया था। इस प्लेटफॉर्म का नाम ‘Botim’ (बोटिम) ऐप है। इस नए और बेहद चालाक तरीके ने सुरक्षा व्यवस्था के सामने एक बिल्कुल नई चुनौती खड़ी कर दी है। आइए इस पूरे मामले का एक-एक पहलू बहुत ही आसान भाषा में समझते हैं।

क्या हुआ था रांची के संघ कार्यालय में

यह घटना 16 जून की आधी रात के वक्त की है। रांची के निवारणपुर (चुटिया थाना क्षेत्र) में स्थित संघ कार्यालय में करीब बीस लोग अंदर मौजूद थे। इसी दौरान दो युवक पैदल चलकर दफ्तर के बाहर पहुँचते हैं। उनके हाथों में पेट्रोल से भरी शीशे की बोतलें थीं। एक युवक लाइटर से बोतल के मुँह पर बंधी पट्टी में आग लगाता है और उसे संघ कार्यालय की तरफ फेंक देता है। हमलावरों ने कुल दो पेट्रोल बम फेंके थे, जिनमें से एक मुख्य गेट के बाहर गिरा और दूसरा इमारत की छत पर जा गिरा।

गनीमत यह रही कि इस हमले में किसी को चोट नहीं आई, वरना बहुत बड़ा हादसा हो सकता था। बम फेंकने के तुरंत बाद आरोपित वहाँ से भाग निकले। वारदात को अंजाम देकर ये लोग ट्रेन से दिल्ली भागने की फिराक में थे। हालाँकि, रांची पुलिस ने मुस्तैदी दिखाई और अलर्ट जारी करके आरोपितों को बिहार के गया रेलवे स्टेशन से धर दबोचा। इस मामले में पुलिस ने मुख्य हमलावरों सहित कुल 4 आरोपितों को गिरफ्तार किया है, जिनमें सैफ अली अंसारी उर्फ रोहित, अमन अंसारी और सायम सुजान शामिल हैं।

क्या है यह ‘Botim’ ऐप और इसका पूरा सच

‘Botim‘ (बोटिम) मुख्य रूप से संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE का एक बहुत ही बड़ा और लोकप्रिय डिजिटल संचार प्लेटफॉर्म है। इसकी शुरुआत काफी समय पहले हुई थी और शुरुआत में यह केवल सुरक्षित Voice और Video कॉलिंग करने के लिए बनाया गया था। आज के समय में दुनिया भर में इसके 15 करोड़ से भी ज्यादा एक्टिव यूजर्स हो चुके हैं। वक्त बदलने के साथ यह ऐप अब सिर्फ बातचीत करने का माध्यम नहीं रहा है, बल्कि यह एक ‘सुपर ऐप’ बन चुका है।

इसके जरिए लोग अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक देश से दूसरे देश में पैसे भेजते हैं, अपने रोजमर्रा के बिलों का भुगतान करते हैं और घरेलू पेमेंट ट्रांसफर भी करते हैं। इस पूरे डिजिटल सिस्टम को एस्ट्रा टेक नाम की कंपनी संचालित करती है। दुबई और खाड़ी देशों में यह ऐप वहाँ के लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का एक बेहद अहम हिस्सा माना जाता है।

दुबई कनेक्शन और कैसे भारत आया इसका नेटवर्क

इस खतरनाक नेटवर्क के भारत आने की कहानी काफी पेचीदा और चौंकाने वाली है। दुबई और पूरे UAE में सरकार के बहुत कड़े कानून और नियम लागू हैं। वहाँ पर सुरक्षा कारणों से व्हाट्सएप कॉलिंग पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा हुआ है। इस वजह से भारत, पाकिस्तान या दुनिया के किसी भी देश से जो लोग दुबई कमाने या घूमने जाते हैं, वे अपने घर पर Video या वॉयस कॉल करने के लिए अनिवार्य रूप से बोटिम ऐप का ही इस्तेमाल करते हैं।

रांची हमले के दो मुख्य आरोपित सैफ अंसारी और अमन अंसारी भी कुछ समय पहले रोजगार की तलाश में दुबई गए थे। वहाँ रहते हुए उन्होंने अपनों से बात करने के लिए इस ऐप को अपने मोबाइल में डाउनलोड किया था। इसी दौरान दुबई में वे शाहबाज राणा उर्फ भट्टी नाम के एक पाकिस्तानी नागरिक के संपर्क में आए। शाहबाज राणा ही इस पूरी साजिश का मुख्य मास्टरमाइंड है, जो ISI के इशारे पर भारत विरोधी नेटवर्क चला रहा है।

पाकिस्तानी आकाओं ने कैसे किया इस ऐप का इस्तेमाल

दुबई में व्हाट्सएप कॉलिंग बंद होने के कारण मास्टरमाइंड शाहबाज राणा ने इन दोनों भारतीय लड़कों से संपर्क बनाए रखने के लिए बोटिम ऐप का ही इस्तेमाल करना शुरू किया। उसने इन युवाओं की आर्थिक लाचारी का फायदा उठाया और धीरे-धीरे इनका ब्रेनवॉश कर दिया। उसने इन्हें पाकिस्तान समर्थित आतंकी संगठन ‘तहरीक-ए-तालिबान हिंदुस्तान’ (TTH) के लिए काम करने के लिए पूरी तरह राजी कर लिया।

जब सैफ और अमन भारत वापस लौटे, तो वे अपने मोबाइल में इस ऐप के जरिए पाकिस्तानी आका के सीधे संपर्क में थे। शाहबाज राणा ने बोटिम ऐप के जरिए ही इन्हें रांची में RSS दफ्तर की रेकी करने, टारगेट चुनने और हमला करने के निर्देश दिए थे। यहाँ तक कि हमले के लिए पेट्रोल बम कैसे बनाया जाता है, इसके वीडियो ट्यूटोरियल भी सोशल मीडिया और इसी ऐप के जरिए इन तक पहुँचाए गए थे।

हमला करके हैंडलर को सबूत भेजने का खेल

इस पूरी आतंकी घटना में सबसे हैरान करने वाली बात CCTV फुटेज और जाँच में सामने आई है। जब एक आरोपित दफ्तर पर पेट्रोल बम फेंक रहा था, तब उसका दूसरा साथी अपने मोबाइल फोन से इस पूरी घटना का लाइव वीडियो रिकॉर्ड कर रहा था। आरोपियों ने दफ्तर को पूरी तरह से आग के हवाले करने की नियत से यह कदम उठाया था। बम फेंकने की वारदात को अंजाम देने के तुरंत बाद, उन्होंने भागते हुए इस पूरी घटना का वीडियो बोटिम ऐप के जरिए दुबई में बैठे अपने पाकिस्तानी हैंडलर शाहबाज राणा को भेज दिया।

यह वीडियो इसलिए भेजा गया था ताकि वे अपने आका को यह सबूत दे सकें कि उन्होंने दिए गए टास्क को पूरी तरह पूरा कर दिया है। यह इस बात का साफ सबूत है कि यह कोई मामूली तोड़फोड़ नहीं थी, बल्कि विदेशों से संचालित होने वाला एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा था।

सुरक्षा एजेंसियों के सामने खड़ी हुई नई चुनौतियां

बोटिम ऐप का इस तरह आतंकी घटना में इस्तेमाल होना भारत की सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बहुत बड़ा सिरदर्द बन गया है। यह ऐप खुद को पूरी तरह से एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड और सुरक्षित होने का दावा करता है, जिससे इसकी चैट और कॉल्स को आसानी से ट्रैक करना मुश्किल होता है। सबसे बड़ी चिंता इस ऐप के फाइनेंशियल टूल्स को लेकर है। चूंकि इस ऐप के जरिए विदेशों से सीधे पैसे ट्रांसफर किए जा सकते हैं।

इसलिए जाँच एजेंसियाँ अब इस बात की गहराई से छानबीन कर रही हैं कि कहीं इन आतंकियों को हमले के लिए इसी रास्ते से फंडिंग तो नहीं की गई थी। पाकिस्तानी एजेंसियाँ अब बहुत ही कम खर्च में स्थानीय युवाओं को सोशल मीडिया और ऐसे ऐप्स के जरिए बहकाकर छोटे-छोटे आतंकी मॉड्यूल तैयार कर रही हैं, जिन्हें ट्रैक करना बेहद कठिन होता जा रहा है।

सख्त कानूनी कार्रवाई और एनआईए की तैयारी

रांची पुलिस ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया है। गिरफ्तारी के बाद जब मुख्य आरोपित सैफ अंसारी ने कोतवाली थाने के पास से पुलिसकर्मियों पर हमला करके भागने की कोशिश की, तो पुलिस ने पीछा करके मंडला टोल प्लाजा के पास मुठभेड़ में उसके पैर में गोली मार दी। फिलहाल उसका इलाज चल रहा है। पुलिस ने पकड़े गए सभी आरोपितों पर भारतीय न्याय संहिता के साथ-साथ विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और देश का सबसे कड़ा आतंकवाद विरोधी कानून यूएपीए (UAPA) लगा दिया है।

यूएपीए की धाराएँ लगने के बाद अब इन आरोपितों को आसानी से जमानत नहीं मिल पाएगी। मामले की गहराई और इसके अंतरराष्ट्रीय तथा पाकिस्तानी कनेक्शन को देखते हुए राज्य सरकार ने एसआईटी का गठन किया है, और बहुत जल्द इस पूरे नेटवर्क की जाँच NIA को सौंपी जा सकती है ताकि देश के भीतर छिपे इसके अन्य मददगारों को भी बेनकाब किया जा सके।

आरफा जी, बेवकूफ तो आपने उन सेकुलर हिंदुओं को बनाया है जिन्होंने आपको ‘पत्रकार’ समझा

कुंठा और पूर्वाग्रह ऐसी चीजें हैं जो इंसान के दिमाग को खोखला कर देती हैं। जब यह बीमारी किसी के जेहन में घर कर जाए, तो उसे हर सकारात्मक चीज में भी सिर्फ नकारात्मकता ही नजर आती है। इस्लामी पत्रकारिता के लिए कुख्यात आरफा खानम शेरवानी इसी बीमारी से पीड़ित हैं।

आज जब पूरी दुनिया देख रही है कि वैश्विक महाशक्तियों के बीच भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कद और लोकप्रियता किस स्तर पर बढ़ी है- उस समय आरफा खानम शेरवानी खोज-खोजकर सिर्फ अपने देश के प्रधानमंत्री की बुराई करने में जुटी हैं।

उनकी कुंठा देख साफ पता चलता है कि चाहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सरेआम मीडिया के सामने मोदी की सराहना करें, फ्रांस के राष्ट्रपति खुद वीडियो संदेशों के जरिए अपना प्रेम जाहिर करें, या फिर इजरायल के प्रधानमंत्री गर्मजोशी से गले मिलकर भारत के साथ दोस्ती की गहराई को दिखाएँ, लेकिन आरफा को इन दृश्यों से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। वो अपने स्तर पर प्रधानमंत्री की छवि धूमिल करने के प्रयास जी-जान से करेंगी।

इस बार भी आरफा ने यही किया है। जी-7 समिट के दौरान सामने आई तस्वीरों को देख पूरा देश प्रधानमंत्री की तारीफ में जुटा था, लेकिन आरफा खानम ने एक पर्ची को देखकर पूरी वीडियो बना दी और ये समझाया कि अब तक कहा जाता था कि नरेंद्र मोदी बहुत अच्छे वक्ता हैं, मगर अब मान लिया जाना चाहिए कि वो पर्ची वाले PM हैं, उन्होंने देश के लोगों को बेवकूफ बनाया है।

अपने इंट्रो में आरफा ने कहा, “15 साल पहले जिस व्यक्ति ने भारत के लोगों को ये कहकर बेवकूफ बनाया कि वो देश के मान-सम्मान-सरहदों की रक्षा करेगा। भारत की जनता ने जिसे तीन बार प्रधानमंत्री बनाया… अब वो सबूत मिल रहे हैं जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी भारत के इतिहास के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री हैं।”

अपनी वीडियो में वो जर्नलिज्म के छात्रों को पीएम मोदी और ट्रंप की मुलाकात पर रिसर्च करने को कहती हैं कि वो पीएम मोदी के बैठने से लेकर हँसने तक को नोट करने को कहती हैं। इतना ही नहीं आरफा ये भी समझाने का प्रयास करती हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने देश को विदेशी नेता के आगे झुका दिया है।

आरफा की समस्या ये है कि आखिर राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रधानमंत्री की तारीफ क्यों की, क्यों उन्हें सुंदर, अच्छा डील करने वाला बताया और क्यों ये बोला कि जब तक पीएम मोदी प्रधानमंत्री हैं अमेरिका हमेशा भारत का साथ देगा। ऑपरेशन सिंदूर के समय पर पाकिस्तान के साथ बैठकर सब सुलह करने की पैरवी करने वाली आरफा खानम यहाँ अपनी दोगलई दिखाते हुए ये भी कहती हैं कि क्या हमारे ऐसे दिन आ गए हैं कि दूसरे देश हमारे मामलों में हस्तक्षेप करेंगे!

आगे वीडियो में आरफा खानम को समस्या इस बात से होती है कि प्रधानमंत्री के हाथ में पर्ची कैसे दिख गई। वो इस चीज को अपनी वीडियो में ऐसे हाईलाइट कर रही हैं जैसे दुनिया के पत्रकार की नजर नहीं पड़ी थी और उन्होंने ही प्रधानमंत्री को एक्सपोज किया हो।

अब जरा खुद सोचिए क्या प्रधानमंत्री मोदी को ट्रंप के सामने बैठते हुए ये नहीं पता था कि कैमरे में वो दिख रहे हैं और उनके हाथ में रखा कागज भी… उन्हें भी मालूम है कि उनकी हरकतों पर विदेशी कैमरों से ज्यादा देश में बैठे गिद्धों की नजर है जो मौका मिलते ही झपट्टा मारेंगे। लेकिन फिर भी अगर उन्होंने अपने हाथ में कोई कागज रखा तो ये ऐसा मुद्दा नहीं है कि उनकी वाकशैली पर सवाल खड़े किए जाएँ। ये सिर्फ कुतर्क है।

अब इस कुतर्क की हकीकत को समझिए कि दुनिया का बड़े से बड़ा नेता, चाहे वह अमेरिकी राष्ट्रपति हो या कोई महान विचारक, जब किसी औपचारिक मंच पर देश या विदेश नीति, आँकड़ों और गंभीर विषयों पर बात करता है, तो वह पॉइंटर्स को अपने साथ रखता है।

यह एक जिम्मेदार नेतृत्व की पहचान है ताकि देश को लेकर कोई भी बिंदु गलती से भी गलत न पेश हो। इसे देश को मूर्ख बनाना कहना नहीं, बल्कि जिम्मेदारी समझना भी कहा जाता है। आरफा भी जब टीवी के सामने कैमरे के लिए कभी बोलती होंगी तो टेलीप्राम्पटर उनके सामने रहता होगा ताकि खबर का कोई पहलू न छूटे… है न?

जब बड़े-बड़े पत्रकार किसी मुद्दे पर अपने पाठकों को बिना टेलीप्रॉम्पटर पर देखे खबर पढ़कर नहीं सुना सकते, तो प्रधानमंत्री के हाथ में दिखी एक पर्ची से उनके वाककौशल पर सवाल नहीं उठाना चाहिए उठाइए… क्योंकि इससे मजाक उन्हीं पत्रकारों का बनेगा।

क्या है आरफा खानम की प्रासंगिकता?

हास्यास्पद बात ये है कि प्रधानमंत्री की विश्वसनीयता पर सवाल करने का प्रयास आरफा जैसे वो लोग कर रहे हैं जिनकी खुद की प्रासंगिकता सिर्फ इस्लामी रिपोर्टिंग तक सीमित रह गई है। आज सरकार विवरण दे सकती है कि प्रधानमंत्री ने देश की जनता के लिए क्या किया। उनके पास अपने कामों को सिद्ध करने के लिए जमीन पर दिख रहा विकास और डेटा होगा। मगर, आरफा खानम के पास खुद को ‘निष्पक्ष’ साबित करने के लिए न लेख होगा, न निजी विचार होंगे, न सोशल मीडिया पोस्ट होगा और न ही कोई वीडियो होगी।

वो भले चिल्ला-चिल्लाकर खुद को न्यूट्रल कहें, हाशिए समाज पर बैठे लोगों की आवाज बनने का दावा करें किंतु उनके किए काम और उनकी टाइमलाइन साफ बताती है कि उनकी चिंताओं में देश के हिंदू के मुद्दे हैं ही नहीं। उनकी स्थिति यहाँ पहुँच चुकी है कि अगर आज वह अपने में परिवर्तन करके हिंदुओं की बात करना और मोदी सरकार के कार्यों की सराहना करना शुरू भी कर दें तो उनके अपने दर्शक ही उनको स्क्रीन से दफा कर देंगे।

असल में बेवकूफ बनाने की की जाए तो असली बेवकूफ तो आपने सेकुलर हिंदुओं का बनाया है, जिन्होंने विश्वास किया कि आप निष्पक्ष पत्रकार के तौर पर उन्हें सूचनाएँ देंगी, हिंदुओं के पीड़ित होने पर उनके मुद्दे को भी प्राथमकिता देंगी, लेकिन आपने मंच पाकर कभी अपनी कट्टरपंथी खाल को नहीं बदला। देश के पक्ष में उस समय तक बोला आपको लगा कि आपका फायदा है, मोदी सरकार आते ही आपके सुर बदले और आपकी इस्लामी खाल खाल से आपके सेकुलर हिंदू फॉलोवर्स भी परिचित हुए कि आप सिर्फ उन्हें ठगने के लिए बैठी हैं।

हम केवल बीते दिनों की ही बात करें तो देश-दुनिया में बहुत कुछ हुआ है, लेकिन आपने सूचनाओं को किस तरह प्रसारित किया इसका उदाहरण आपकी वीडियोज के थंबनेल देखकर ही पता चलता है। आइए आरफा खानम के कुछ थंबनेल में लिखे टेक्स्ट पर नजर डालें…

  • ट्रंप के सामने मोदी की बेबसी, दुनिया चौंकी
  • ईरान वसूलेगा अमेरिका से 400 बिलियन? PM Modi को Iran से क्या सीखना चाहिए?
  • आयुष की तरह जब आदित्य ने अपनाया इस्लाम, हिंदुत्ववादियों ने जीना कैसे हराम कर दिया?
  • सकते में Israel, Iran सबसे बड़ा Winner, Pakistan को ज़बरदस्त Diplomatic Success
  • PM Modi के गले मिलने से विदेश नीति नहीं चलती, क्या यही है सबूत?
  • अन्ना आंदोलन का समर्थन बड़ी भूल थी? मोदी सरकार में देश बदतर?
  • “तानाशाह को खटकते हैं मेरे जैसे पत्रकार” पंजाब की मिट्टी से Arfa Khanum Sherwani
  • Deal क़रीब, Shehbaz Sharif ने चौंकाया, गोदी मीडिया की Iran पर डबल बेशर्मी
फोटो साभार: आरफा खानम शेरवानी का यूट्यूब

आप इन थंबनेल और शीर्षक को देखिए। क्या आपको कहीं से भी लगता है कि एक पत्रकार द्वारा दी गई ये रिपोर्ट हो सकती हैं। शीर्षक ही अपने आप में ये बताने के लिए काफी हैं कि आरफा को पीएम मोदी बेबस दिखें तो उनके लिए अच्छा कंटेंट हैं, लेकिन अगर वो गले मिलें तो ये बताया जाएगा कि गले मिलने से विदेश नीति नहीं चलती।

इसके अलावा ईरान से जुड़ी अगर कोई खबर आए तो उसपर आरफा का कैसा रुख होगा और पाकिस्तान की छवि का निर्माण करना हो तो कैसे हेडलाइन में उसकी दलाली को डिप्लोमैटिक सक्सेस बताएँगे।

वहीं देश भर के हिंदुओं को आहत करने वाला आयुष मलिक का मुद्दा अगर चर्चा में आ जाए तो ये देख सकते हैं कि उनकी रिपोर्टिंग उस पर कैसे होगी। वो ऐसी घटना में इस्लामी कट्टरपंथ को उजागर करने की बजाय हिंदूवादियों को बर्बर दिखाने का प्रयास करेंगी।

आरफा खानम के सोशल मीडिया पोस्ट

इसी प्रकार से उनका सोशल मीडिया हैंडल पर पोस्ट भी हैं। मोदी सरकार को देश से उखाड़ने का सपना देखने वाली आरफा एक तरफ राहुल गाँधी की कोटा स्पीच को जरूरी बताती हैं और दूसरी ओर ट्रंप के साथ बैठे प्रधानमंत्री का मखौल उड़ाने से पीछे नहीं हटतीं। उन्हें ईरान की जीत का जश्न इसलिए मनाना है क्योंकि वहाँ एक मजहब के लोगों की बहुलता है, लेकिन भारत के आयुष मलिक को इसलिए दोषी दिखाना है क्योंकि उसके केस पर देश के हिंदुओं में नाराजगी है।

क्या आपको कहीं कोई पोस्ट या वीडियो थंबनेल देखकर ये लगा कि आरफा ने कभी हिंदुओं का मुद्दा उठाया है, लव जिहाद के लिए मारी गई किसी हिंदू लड़की के लिए अपना शोक व्यक्त किया है? वैश्विक संकट के बीच देश की प्रशंसा की है? नहीं, क्योंकि वास्तविकता यही है कि खुद को निष्पक्ष पत्रकार बताने वाली, सत्ता का कॉलर पकड़कर सवाल पूछने का सपना देखने वाली आरफा के लिए हिंदुओं के मुद्दे जरूरी हैं ही नहीं। उन्होंने अपने पत्रकार होने का अस्तित्व सिर्फ इस्लामी कट्टरपंथियों के मुद्दे उठाकर ही बचा रखा है। मोदी सरकार के रहने से उन्हें यही डर कि एक दिन ये अस्तित्व मिट जाएगा। उन्हें लोग पत्रकार की जगह इस्लामी प्रवक्ता कहने लगेंगे।