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जिस नेता ने सबसे ज़्यादा जहरीली बयानबाजी की उसे ही बीजेपी के विरोध में ‘अल्पसंख्यकों का मसीहा’ बनाने में जुटे ‘वामपंथी’ मीडिया संस्थान

असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम को बिहार विधानसभा चुनावों में 5 सीटें हासिल हुई हैं। एक क्षेत्रीय राजनीतिक दल (ध्रुवीकरण में कुशल) के लिए इतनी सीटें सियासत की ज़मीन पर आह्लादित होने के लिए पर्याप्त हैं। सीमांचल में हासिल हुई इस सफलता के बाद आगामी चुनावों को लेकर चर्चाओं अटकलों और समीकरणों का बाज़ार गर्म है। चुनावी पंडित, राजनीतिक पंडित और थिंक टैंक के अतिरिक्त देश के तमाम ‘स्वघोषित प्रबुद्ध’ वामपंथी मीडिया संस्थान आगामी चुनावों में ओवैसी की पार्टी के लिए राजनीतिक आयाम तलाशना शुरू कर चुके हैं। 

इस सूची में तमाम ऐसे मीडिया संस्थान हैं जिनके अनुसार ओवैसी अल्पसंख्यक समुदाय की आवाज़ बन सकते हैं। कहाँ और कैसे बन सकते हैं? इसका जवाब है, पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करके बन सकते हैं, पूरा जवाब जानना हो तो क्विंट की यह रिपोर्ट पढ़िए जिसमें ओवैसी के हिस्से में बनने वाली हर संभावना की ढपली पीटी गई है। वो भी संभवतः सिर्फ इसलिए कि बीजेपी के विरोध का झंडा बुलंद रखना है।

भले चुनाव के बाद नतीजा ढाक के तीन पात रहे। लेकिन वामपंथी न्यूज़ प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘द क्विंट’ ही नहीं बल्कि इन भिन्न-भिन्न मीडिया संस्थानों (द वीक, इंडियन एक्सप्रेस, स्क्रॉल, द प्रिंट) की रिपोर्ट पढ़िए। एक राज्य के चुनाव में 5 विधानसभा सीटें जीतने पर शायद ही किसी राजनीतिक दल को इतनी अहमियत मिली है।

लेकिन उल्लेखनीय बातें यह भी नहीं हैं। उल्लेखनीय यह है कि जिस तथाकथित अल्पसंख्यक हितैषी नेता को अल्पसंख्यक समुदाय का मुखमंडल बनाया जाने की कवायद पूरे सामाजिक राजनीतिक सामर्थ्य से की जा रही है, उसकी मानसिकता और मानसिकता से उपजी बयानबाजी का स्वरूप कैसा है। पिछले कुछ महीनों में असदुद्दीन ओवैसी के कुछ बयानों को देखते और समझते हैं कि जिस नेता के लिए इस कदर माहौल बनाया जा रहा है उसकी विचारधारा असल मायनों में है क्या?   

हाल ही में इंडिया टुडे को बीते चुनावों को लेकर हो रही चर्चा के दौरान असदुद्दीन ओवैसी ने एक बयान दिया था। ओवैसी ने कहा था कि आज भाजपा सत्ता में है, तो इसका कारण कॉन्ग्रेस ही है। उन्होंने कॉन्ग्रेस के नेतृत्व को ‘नपुंसक’ करार दिया। उन्होंने कॉन्ग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा को संबोधित करते हुए कहा था कि आपकी पार्टी का नेतृत्व नरेंद्र मोदी से लड़ने में अक्षम है, इसीलिए भाजपा आज सत्ता में है। उन्होंने कहा कि जब तक वो ज़िंदा हैं, चुनाव लड़ते रहेंगे और सेक्युलरिज्म को ज़िंदा रखेंगे। 

यह तो भाषा की बात हुई, असदुद्दीन ओवैसी के बयानों में सांप्रदायिकता की सूरत भी बेहद मज़बूत रहती है। बिहार विधानसभा चुनाव के अंतिम चरण के प्रचार के दौरान उन्होंने बयान दिया था, “असदुद्दीन ओवैसी बिहार का तो नहीं है, मगर ये पूरा भारत असदुद्ददीन ओवैसी के बाप की मिल्कियत है। कैसे है? हमारे अब्बा, आपके अब्बा, उनके अब्बा, उनके अब्बा के अब्बा जब दुनिया में कदम रखे, तो भारत में रखे थे कदम। तो ये हमारे अब्बा की जमीन हुई और किसी माई के लाल में ताकत नहीं है कि हमको हमारी अब्बा की जमीन पर घुसपैठी करार दे। ये अब्बा की जमीन है और अब्बा की जायदाद में बेटी और बेटे का हिस्सा मिलेगा।”

हाल ही में राम मंदिर निर्माण के लिए प्रधानमंत्री ने अयोध्या में भूमि पूजन किया था। इस मुद्दे पर भी असदुद्दीन ओवैसी की सांप्रदायिकता संगत बयानबाजी जारी थी। ट्वीट करते हुए ओवैसी ने लिखा था, “बाबरी मस्जिद थी, है और रहेगी। इशांअल्लाह।” इस ट्वीट के साथ ओवैसी ने दो तस्वीरें भी शेयर की थी। एक तस्वीर में मस्जिद खड़ा नजर आ रहा है और दूसरे में उसके विध्वंस की घटना है।

इसी तरह सीएए और एनआरसी विरोध प्रदर्शन के दौरान हैदराबाद सांसद ने इतनी टिप्पणियाँ की थीं जिनकी गिनती नहीं लेकिन मजाल है किसी टिप्पणी में जहर की मात्रा से समझौता किया हो। ऐसी ही एक टिप्पणी थी, “जो मोदी-शाह के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएगा वो सही मायने में मर्द-ए-मुजाहिद कह लाएगा। मैं वतन में रहूँगा, पर कागज नहीं दिखाऊँगा। कागज अग़र दिखाने की बात होगी, तो सीना दिखाएँगे कि मार गोली। मार दिल पे गोली मार, क्योंकि दिल में भारत की मोहब्बत है।”

अब पूछिए प्रश्न, अल्पसंख्यक समाज की अगुवाई का मुकुट करना चाहिए इनके नाम? या पहले अल्पसंख्यक हित के मुखौटे के पीछे छुपे असल राजनीतिक चेहरे को परखा जाए। देश का हर नेता राजनीति के रास्ते पर चलते हुए आम नागरिकों को बहुत कुछ देता है, जब कभी ‘असदुद्दीन ओवैसी ने क्या दिया’ इस पर चर्चा होगी, तब इनके बारे में क्या कहा जाएगा। भले एक नेता हर विमर्श में अल्पसंख्यकों के विमर्श को आगे रख देता है लेकिन उसकी कीमत क्या है? अगले साल पश्चिम बंगाल में भी विधानसभा चुनाव हैं, उस पर भी नज़र बनाए रखियेगा। ऐसे बयान शायद ही थमेंगे।            

कॉमेडियन भारती सिंह और उनके पति को NCB ने हिरासत में लिया, छापे में घर से ड्रग्स मिलने का दावा

नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने कॉमेडियन भारती सिंह के मुंबई स्थित तीन घरों पर छापेमारी की है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार भारती और उनके पति हर्ष पर ड्रग्स लेने का आरोप है। छापेमारी के दौरान गांजा बरामद होने का दावा भी किया जा रहा है। दोनों को हिरासत में लेकर एनसीबी पूछताछ कर रही है।

मुंबई के जोनल डायरेक्टर ऑफिसर समीर वानखेड़े ने बताया, ‘भारती और उनके हसबैंड दोनों को नशीले पदार्थ रखने के मामले में सवाल जवाब के लिए हिरासत में ले लिया गया है।’

जानकारी के मुताबिक, एक ड्रग्स पैडलर की निशानदेही पर भारती सिंह और हर्ष लिंबाचिया के घर पर छापेमारी की गई। भारती सिंह टीवी की पहली पॉपुलर एक्ट्रेस हैं, जिनके घर एनसीबी ने छापेमारी की है। इससे पहले एनसीबी ने एक्टर और मॉडल अर्जुन रामपाल और उनकी गर्लफ्रेंड गेब्रिएला के घर पर छापा मारा था। बता दें कि 9 नवंबर को अर्जुन रामपाल के घर छापेमारी के दौरान जाँच एजेंसी ने लैपटॉप, मोबाइल फोन और टैबलेट जैसे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट जब्त किया था और अर्जुन के ड्राइवर से भी पूछताछ की थी। 

अर्जुन रामपाल के घर पर छापे से एक दिन पहले, एनसीबी ने बॉलीवुड निर्माता फिरोज नाडियाडवाला की पत्नी शबाना सईद को उपनगरीय जुहू में उनके आवास पर कथित तौर पर गांजा पाए जाने के बाद गिरफ्तार किया था। फिल्म निर्माता फिरोज नाडियाडवाला भी पूछताछ के लिए NCB ऑफिस पहुँचे थे।

इससे पहले गैब्रिएला के भाई एगीसलोस डेमेट्रिडेस के अपार्टमेंट में ड्रग्स मिलने के बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया था। अधिकारी ने बताया कि पिछले महीने, एनसीबी ने गैब्रिएला के भाई एगीसलोस डेमेट्रिडेस को एक ड्रग्स मामले में पास के पुणे जिले के लोनावाला स्थित एक रिजॉर्ट से गिरफ्तार किया था। सुशांत सिंह राजपूत से जुड़े ड्रग्स मामले में एनसीबी की तरफ से की गई यह 23वीं गिरफ्तारी थी। इसके पहले क्षितिज प्रसाद और जय मधोक के रूप में 21वीं और 22वीं गिरफ्तारी हुई थी।

एनसीबी ने दीपिका पादुकोण की मैनेजर करिश्मा प्रकाश को भी समन भेज कर 27 अक्टूबर को पेश होने के लिए कहा था, लेकिन वो नहीं आईं। सोमवार (नवंबर 2, 2020) को अधिकारियों ने जानकारी दी है कि करिश्मा प्रकाश ‘अनट्रेसेबल’ हैं। करिश्मा प्रकाश के ठिकानों से NCB ने छापेमारी के दौरान पिछले महीने 1.7 ग्राम चरस और एक बोतल ‘CBD ऑइल’ जब्त किया था। ‘क्वान टैलेंट मैनेजमेंट कम्पनी’ के अन्य कर्मचारियों को भी समन भेजा गया है।

बता दें कि बॉलिवु़ड में ड्रग्स की जाँच के लपेटे में अब तक कई सेलिब्रिटीज के नाम सामने आ चुके हैं। सुशांत की गर्लफ्रेंड रहीं रिया चक्रवर्ती से इसकी शुरुआत हुई और इसके बाद दीपिका पादुकोण, सारा अली खान, रकुल प्रीत सिंह, अर्जुन रामपाल की पार्टनर गैब्रिएला डेमेट्रिएड्स जैसे कई नामों के सामने आने का सिलसिला जारी है।

14 जून 2020 को सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद एनसीबी ने ड्रग्स से जुड़े व्हाट्सएप चैट के आधार पर बॉलिवुड में कथित नशीली दवाओं के इस्तेमाल के संबंध में जाँच शुरू की। एनसीबी ने इससे पहले सुशांत की गर्लफ्रेंड रहीं रिया चक्रवर्ती, उसके भाई शौविक, दिवंगत फिल्म स्टार के कुछ कर्मचारियों और कुछ अन्य लोगों को एनडीपीएस कानून की धाराओं के तहत गिरफ्तार किया था। रिया चक्रवर्ती और कुछ अन्य आरोपित फिलहाल जमानत पर बाहर हैं।

हिन्दू एकता के लिए कपिल मिश्रा की पहल से घबराया वामपंथी मीडिया, Scroll ने लव जिहाद और मिशनरियों का किया बचाव

कपिल मिश्रा ने हिन्दुओं को एक करने के प्रयास क्या शुरू किए, लिबरल गिरोह को मिर्ची लग गई। वामपंथी मीडिया बेचैन हो उठा और उसने हिंदुत्व को खतरनाक बताने से लेकर ‘लव जिहाद’ को हिन्दुओं का मनगढंत मुद्दा तक बताने लगे। इसी क्रम में ‘Scroll’ ने भी एक लेख में कपिल मिश्रा द्वारा हिन्दू इकोसिस्टम बनाने की घोषणा को खतरनाक तक करार दिया। साथ ही इसके लिए उनका मजाक भी बनाने की कोशिश की।

‘Scroll’ ने मसखरी के अंदाज़ में इस लेख को शुरू किया है और पूछा है कि अगर आपके पास कुछ खाली समय है तो क्यों न आप अपनी खास रुचियों को धार देने के लिए किसी क्लब या सोसायटी में शामिल हो जाएँ? साथ ही बताया है कि इन दिनों काफी विकल्प हैं और समाजिक सेवाओं के लिए रोटरी क्लब या लायंस क्लब हैं। फिटनेस के साथ कुछ अलग करने के लिए लाफ्टर योग क्लब हैं। पाठकों के लिए कई किताबों वाले क्लब्स हैं।

इसके बाद ‘Scroll’ लिखता है कि आप हिन्दू इकोसिस्टम भी ज्वाइन कर सकते हैं, जिसके लिए आपको बस एक फॉर्म भरना है और इसके लिए कोई एप्लीकेशन फी नहीं है। साथ ही इस लेख में कपिल मिश्रा को ‘दिल्ली दंगों से पहले भड़काऊ बयान देने के लिए जाना जाने वाला’ बताया है। भले ही ये सामने आ चुका है ताहिर हुसैन और उमर खालिद सहित कई इस्लामी कट्टरपंथियों ने दंगे किए और कपिल मिश्रा के भाषण से पहले ही ये शुरू हो गया था, ये मीडिया संस्थान एक झूठ को हजार बार बोल कर इसे सच साबित करना चाहते हैं।

कपिल मिश्रा दिल्ली सरकार में मंत्री थे। करावल नगर से उन्हें 1 लाख से भी अधिक वोट्स मिले थे, यानी कुल वोट्स के 60% के करीब। क्या वो इन सबके लिए नहीं जाने जाते, जो ‘स्क्रॉल’ उन्हें 5 मिनट के किसी भाषण को ही उनकी प्रसिद्धि का एकमात्र कारण बता कर उसे नकारात्मक रूप में पेश कर रहा है? उन्होंने तब भी संस्कृत में शपथ ली थी। दिल्ली के बाद भी कई इलाकों में CAA विरोधी दंगे हुए। उन सब में तो कपिल मिश्रा कहीं नहीं थे।

‘Scroll’ को इस बात की चिंता खाए जा रही है कि आखिर ये हिन्दू इकोसिस्टम करेगा क्या? कपिल मिश्रा पहले ही साफ़ कर चुके हैं कि ये जमीन पर और सोशल मीडिया पर, कोर्ट में, धर्म के लिए और एक-दूसरे के लिए काम करेगा। इसका सीधा अर्थ है कि इसकी सारी प्रक्रियाएँ वैध होंगी और क़ानूनी दायरे में होंगी। ये आपस में सहयोग का इकोसिस्टम है तो इसकी सराहना करने की बजाए वामपंथी मीडिया इसके खिलाफ क्यों है?

कपिल मिश्रा को लेकर ‘स्क्रॉल’ ने फैलाया प्रपंच

इसके फॉर्म में विकल्प है कि आप ऑनलाइन, जमीन पर, या फिर दोनों के लिए इसका हिस्सा बन सकते हैं। वामपंथी मीडिया को ‘घर वापसी’ ‘हिन्दू एकता’, ‘गौरक्षा’ और ‘लव जिहाद का विरोध’ – इन सभी चीजों से दिक्कत है, जबकि भारत के क़ानून में इनमें से किसी को भी अवैध नहीं माना गया है। ये सब तो समाजसेवा, महिला अधिकार और पशु अधिकार के अंतर्गत आते हैं। इन्हीं चीजों के लिए लड़ने वाले वामपंथी इससे चिढ़ क्यों रहे हैं?

‘Scroll’ का कहना है कि RSS रहस्यमयी तरीके से काम करता है, क्योंकि इसके सदस्य मीडिया में नहीं आते और एक बड़े सभ्यता के लक्ष्य पर काम कर रहे हैं। अर्थात, अगर कोई संगठन बाढ़, अकाल, महामारी और अन्य आपदा की स्थिति में निःस्वार्थ भाव से बिना सरकारी सहायता के लोगों की सेवा कर रहा है तो इन वामपंथियों को उससे भी परेशानी है। चूँकि वो RSS है, समाजसेवा कर सोशल मीडिया पर उसका प्रचार नहीं करता, इसलिए वामपंथियों को ये स्वीकार्य नहीं।

वहीं इसी वामपंथी मीडिया को कपिल मिश्रा के नए हिन्दू इकोसिस्टम से इसलिए दिक्कत है, क्योंकि उसका मानना है कि इससे सोशल मीडिया पब्लिसिटी होगी और टीम के सदस्यों की संख्या की बातें होंगी। यानी, अगर कोई शांति से काम कर रहा है तो भी परेशानी और किसी ने सोशल मीडिया को एकता का माध्यम बनाया तो भी परेशानी। ये सब इसीलिए, क्योंकि हिन्दुओं को एक होते हुए ये लोग नहीं देख सकते।

हिन्दू इकोसिस्टम के लिए कपिल मिश्रा का आह्वान

अब ‘स्क्रॉल’ वापस ‘लव जिहाद’ पर आता है और इसे एक कंस्पिरेसी थ्योरी करार देते हुए लिखता है कि इसका हिंदुत्व से तो कोई लेना-देना ही नहीं है। अर्थात, हिन्दू महिलाओं के लिए उसके मन में कोई इज्जत नहीं है, भले ही कोई उन्हें धोखा दे, पहचान छिपाकर कर उनसे साजिशन शादी कर ले, बाद में प्रताड़ित करे या फिर हत्या कर दे। महिलाओं की मदद के लिए अगर कोई संगठन आगे आ रहा है तो इससे ‘स्क्रॉल’ को दिक्कत क्या है?

‘लव जिहाद’ की रोज एक के बाद एक घटनाएँ सामने आ रही हैं। केरल में ईसाइयों के साथ जो हुआ था, उसके बाद उन्होंने इस शब्दावली का प्रयोग किया था। अगर यहाँ हिन्दुओं की बातें छोड़ भी दें तो क्या ईसाई इस वामपंथी मीडिया के लिए अल्पसंख्यक नहीं हैं और संख्या में उनसे कई गुना ज्यादा मुस्लिम भारत में उनके लिए अल्पसंख्यक हैं? हिन्दू व ईसाई महिलाओं की प्रताड़ना को रोकने का प्रयास करना तो सराहनीय है, इसकी प्रशंसा होनी चाहिए। केरल के चर्च तक ने कहा है कि ‘लव जिहाद’ वास्तविक है।

साथ ही इसने ‘इस्लामी आक्रमण’ और ‘ईसाई मिशनरी’ को तथाकथित लिखा है। इसका अर्थ है कि वो ये नहीं मानते कि इस्लामी कट्टरता नाम की कोई चीज है भी। ‘अल्लाहु अकबर’ बोल कर चिल्लाते हुए हत्या की वारदातों और बहला-फुसला कर धर्मांतरण की ईसाई मिशनरियों की करतूतों से जुड़ी कई ख़बरों के बावजूद मीडिया का ये वर्ग चाहता है कि हिन्दू, जो इस दोनों मामलों में पीड़ित है, आँख मूँद कर ये सब सहता रहे।

अगर कोई मुस्लिम अपना मजहब छिपा कर किसी लड़की से शादी कर ले और उसे धोखा दे तो इस पर कोई क्यों न विरोध करे? अगर इस्लाम के नाम पर जम्मू-कश्मीर में सौ आतंकी संगठन खड़े हो जाएँ और दुनिया भर में ‘अल्लाहु अकबर’ चिल्लाते हुए लोगों को मारा जाए, तो कोई क्यों आँख-कान बंद कर ले? आदिवासी और पिछड़े इलाकों में हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान कर, लालच दे कर और झूठे चमत्कार दिखा कर ईसाई मिशनरी गरीबों को ठगे और धर्मान्तरण कराएँ तो क्यों न कोई इसके खिलाफ आवाज़ उठाए?

‘लव जिहाद’ को दक्षिणपंथी शब्दावली बताने वाला ‘स्क्रॉल’ क्या ये मानेगा कि ईसाई भी दक्षिणपंथी हो गए हैं और वो हिन्दुओं के साथ मिल गए हैं, क्योंकि उन्होंने केरल में इसका प्रयोग किया? अभी जिस संगठन ने कुछ किया ही नहीं, उसका कोई कामकाज सामने आया ही नहीं, उस पर मुस्लिम घृणा का आरोप कैसे कोई लगा सकता है? उसे कैसे कोई नकार सकता है। इस लेख का सीधा मकसद है – हिन्दू एकता का मजाक बनाना और उसे घृणावादी साबित करना।

हिन्दू इकोसिस्टम पर Scroll का प्रोपेगंडा: क्या कहते हैं कपिल मिश्रा?

हमने इन आरोपों के सम्बन्ध में कपिल मिश्रा से भी बातचीत की, जिन्होंने हमें बताया कि वामपंथी तीस्ता सीतलवाड़ भी इसके खिलाफ अभियान चला रही हैं। उन्होंने हस्ताक्षर अभियान से लेकर इसके खिलाफ पत्र लिखने तक, सब किया है। ठीक इसी तरह, अब ‘Scroll’ इसके विरोध कर रहा है और शेखर गुप्ता ने भी ‘द प्रिंट’ की पूरी टीम को इसके पीछे लगा दिया है। कपिल मिश्रा कहते हैं कि विरोध की एक ही वजह है और वो है ‘हिन्दू’ शब्द।

हिन्दू इकोसिस्टम में ‘हिन्दू’ शब्द होने से ही वो सभी चिढ़े हुए हैं और इसे नकारात्मक रूप में पेश कर रहे हैं। दिल्ली के पूर्व मंत्री ने बताया कि ये एक छोटी सी शुरुआत है, जो लोगों को एक प्लेटफॉर्म पर आने और एक-दूसरे की मदद और सेवा करने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। उन्होंने कहा कि अगर किसी भी चीज में ‘हिन्दू’ आ जाए, तो ये चिढ़ जाते हैं। उन्होंने पूछा कि अभी इसकी कोई एक्टिविटी भी नहीं हुई है, सिर्फ सदस्य बने हैं, तभी इतना हंगामा किया जा रहा है।

उन्होंने याद दिलाया कि Scroll या फिर तीस्ता सीतलवाड़ जैसे लोग इस तरह का रिएक्शन तो आतंकी संगठनों के खिलाफ भी नहीं देते, जैसा वो हिन्दू इकोसिस्टम का विरोध करते हुए दे रहे हैं। उन्होंने पूछा कि जब इन्हें पता ही नहीं है कि ये संगठन करेगा क्या, फिर ये विरोध क्यों कर रहे हैं? सिर्फ ‘हिन्दू’ शब्द की वजह से? उन्होंने बताया कि इसका मुख्य उद्देश्य होगा सेवा, ऑफलाइन या ऑनलाइन सनातनियों को जोड़ना।

कपिल मिश्रा ने ऑपइंडिया से कहा कि ये एक नेटवर्क बनाया जा रहा है, जिसमें लोग एक-दूसरे की मदद करेंगे। उन्होंने कहा कि हर क्षेत्र में देश में हजारों संगठन चल रहे हैं, जिला-प्रखंड-ग्राम स्तर तक पर अलग-अलग संगठन चल रहे हैं, ऐसे में इसकी RSS से तुलना करना गलत होगा। उन्होंने कहा कि RSS के काम करने का स्तर, उनका इतिहास और उनकी कार्यप्रणाली- सब अलग हैं।

कपिल मिश्रा ने समझाया कि हिन्दू इकोसिस्टम को एक टीम की तरह लिया जा सकता है, इसे एक शुरुआत की तरह ले सकते हैं। जिस तरह से हर जिले-राज्य में टीमें होती हैं, उसी तरह से ये भी है। उन्होंने कहा कि RSS से इसकी तुलना बेमानी है और ऐसा होना ही नहीं चाहिए। साथ ही कहा कि इस टीम की पूरी सक्रियता के बारे में धीरे-धीरे पता चल जाएगा, अभी तो बस सदस्यों के फॉर्म ही भरे गए हैं।

पाकिस्तान में मिला 1300 साल पुराना भगवान विष्णु का मंदिर, पर क्या बचा रहेगा?

पाकिस्तान और इटली के पुरातत्व विशेषज्ञों (Archaeological Experts) को खुदाई के दौरान उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान के स्वात शहर स्थित पहाड़ों के नज़दीक लगभग 1300 साल पुराना हिन्दू मंदिर मिला है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ पुरातत्वविदों को उत्तर-पश्चिमी पाकिस्तान के बारिकोट घुंडई में खुदाई के दौरान यह मंदिर मिला। खैबर पख्तूनखवा, पुरातात्विक विभाग के फज़ल खालिक ने बताया कि यह मंदिर भगवान विष्णु का है।

पुरातत्व विशेषज्ञों ने बताया कि संभावित तौर पर इस मंदिर का निर्माण ‘हिन्दू-शाही’ काल के दौरान लगभग 1300 साल पहले कराया गया था। हिन्दू-शाही साम्राज्य ने काबुल घाटी (पूर्वी अफगानिस्तान) और गंधार (आज का पाकिस्तान) तथा वर्तमान के उत्तर पश्चिमी भारत पर शासन किया था। अनुमानित तौर पर इन्होंने ही 850 से 1026 CE के बीच हिन्दू मंदिर का निर्माण कराया था। 

खुदाई के दौरान पुरातत्वविदों को मंदिर के नज़दीक छावनी और पहरा देने वाले स्तंभ (वॉच टावर) के भी अवशेष मिले। इसके अलावा उन्हें खुदाई के स्थान से जलाशय (water tank) भी मिला, जिसका उपयोग हिन्दू समुदाय के लोग मंदिर जाने से पहले नहाने के लिए करते थे। खालिक ने यह भी बताया कि स्वात शहर हज़ारों साल पुराना पुरातात्विक स्थल है और इतने समय में पहली बार हिन्दू-शाही शासन काल के निशान मिले हैं। स्वात में अनेक बौद्ध मंदिर और पूजा के तमाम स्थल भी मौजूद हैं। इटालियन पुरातात्विक अभियान के मुखिया डॉक्टर लूका ने कहा कि स्वात शहर में गंधार सभ्यता के दौर का यह पहला मंदिर है। 

हाल ही में खोजी गई बुद्ध प्रतिमा को कट्टरपंथियों ने तोड़ दिया था

जुलाई 2020 में ही खोजी गई बुद्ध की प्रतिमा को स्थानीय श्रमिकों और मौलवी ने तोड़ कर टुकड़े-टुकड़े कर दिए थे। पश्तून बाहुल्य खैबर पख्तूनखवा प्रांत के मर्दान शहर में एक घर की नींव की खुदाई के दौरान प्रतिमा के अवशेष बरामद हुए थे। इस घटना का वीडियो भी सामने आया था जिसमें मौलवी और श्रमिक बुद्ध की प्रतिमा को हथौड़े से खंडित करते हुए नज़र आ रहे थे। बौद्ध धर्म (जिसे वह इस्लाम विरोधी भी मानते हैं) के विरुद्ध अपना रोष जताते हुए मौके पर मौजूद सभी लोग बुद्ध की विशालकाय प्रतिमा को नष्ट करते हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार स्थानीय मौलवी की तरफ से दिए गए आदेश के बाद बुद्ध की प्रतिमा के साथ तोड़फोड़ की गई थी और उसने प्रतिमा को इस्लाम विरोधी भी बताया था। मौलवी ने इस घटना के ठीक पहले कहा था, “अगर यह प्रतिमा नष्ट नहीं की जाती है तो तुम्हारे निकाह का वजूद समाप्त हो जाएगा और तुम अपने मज़हब के प्रति आस्तिक नहीं रह जाओगे।” इसके बाद ही लोगों ने बुद्ध की मूर्ति के साथ तोड़फोड़ की थी जो कि मिलने के वक्त अच्छी स्थिति में थी। 

जुलाई 2020 में ही इस तरह की एक और घटना हुई थी, जिसमें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के गिलगित बाल्टिस्तान स्थित चिलास क्षेत्र में बौद्ध शिला बरामद की गई थी। इस शिला को भी कट्टरपंथी इस्लामियों ने नष्ट करने का पूरा प्रयास किया था, उस पर पाकिस्तान का झंडा बना दिया था और नारे तक लिख दिए थे। मीडिया रिपोर्ट के के मुताबिक़ यह मामला सुर्ख़ियों में तब आया जब वहाँ के स्थानीय लोगों ने सोशल मीडिया पर इस घटना की तस्वीरें साझा की। जिस शिला पर कट्टरपंथियों ने इस्लामी नारे लिखे थे, लगभग 800 AD की थी।        

‘तुम सभी मारे जाओगे.. अल्लाहु अकबर’: फ्रांस के जिस स्कूल में पढ़ाते थे सैमुअल पैटी, उसे धमकी

फ्रांस में शिक्षक सैमुअल पैटी की हत्या को लगभग एक महीने हो चुके हैं और वहाँ हुए विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला भी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। इसी बीच उस स्कूल को फिर से धमकी मिली है, जहाँ सैमुअल पैटी पढ़ाया करते थे। ‘Sainte-Anne’ स्कूल के शिक्षकों को को फिर से धमकी दी गई है। इस्लामी कट्टरवादियों ने फिर से धमकाया है और उन सभी को जान से मार डालने की धमकी दी है।

फ्रांस के बौर्डिओक्स के पास बॉस्केट में स्थित इस स्कूल में एक बार फिर से भय का वातावरण व्याप्त हो गया है। रविवार (नवंबर 15, 2020) को स्कूल में लिखा हुआ मिला, “तुम सभी मारे जाओगे। स.. सैमुअल पैटी.. अल्लाहु अकबर”। इतना ही नहीं, दो अन्य स्कूलों में भी दीवारों पर इस तरह की धमकियाँ दी गई हैं। इस मामले में अभी किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया है, लेकिन पुलिस जाँच में आतंक समर्थकों के खिलाफ कार्रवाई कर रही है।

हाल ही में फ्रांस के ‘Savigny-le-Temple (Seine-et-Marne)’ क्षेत्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी से जुड़े एक कोर्स की पढ़ाई के दौरान एक छात्र भड़क गया और उसने शिक्षक को धमकी दे डाली कि वो उसका वही हाल कर देगा, जो सैमुअल पैटी का हुआ था। सैमुअल की एक छात्र ने सिर्फ इसीलिए हत्या कर दी थी, क्योंकि उन्होंने कक्षा में पैगम्बर मुहम्मद का कार्टून दिखाया था, जो फ्रेंच पत्रिका ‘शार्ली हेब्दो’ में प्रकाशित हुआ था।

फ्रांस में शिक्षक पैटी की हत्या के बाद से ही सरकार इस्लामी कट्टरवाद के खिलाफ एक्शन में है। राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने भी कहा था कि आज इस्लाम के नाम पर हिंसा और हत्याओं को बढ़ावा दिया जा रहा है और ऐसे लोग हैं, जो इस्लाम के नाम पर हिंसक अभियान चलाते हुए हत्याओं और नरसंहार को जायज ठहरा रहे हैं। उन्होंने कहा था कि आतंकवाद इस्लाम की भी समस्या है, क्योंकि इसके 80% पीड़ित मुस्लिम ही हैं और वो इसके पहले पीड़ित हैं। उन्होंने विश्वास दिलाया था कि इस्लामी कट्टरवाद के खिलाफ जंग जारी रहेगी।

सेक्युलर भारत से लेकर सांप्रदायिक सद्भाव के प्रतीक तक: टीना डाबी और अतहर की शादी पर कुछ यूँ कूदा था लिबरल गिरोह

UPSC 2015 बैच की टॉपर टीना डाबी और उनके पति IAS अतहर खान ने तलाक के लिए याचिका दायर की है। आज कई लोग इस पर टिप्पणी से ये कहते हुए मना कर रहे कि ये तो उनका व्यक्तिगत मामला है। लेकिन, इन्हीं लोगों ने इस शादी के मुद्दों को सार्वजनिक बनाया था और ज्ञान की बरसात कर दी थी। 2018 में ये शादी हुई थी। अतहर खान भी 2015 में UPSC परीक्षा में द्वितीय रहे थे।

कहा जाता है कि ट्रेनिंग के दौरान ही दोनों के बीच नजदीकियाँ बढ़ीं और बाद में उन्होंने शादी कर ली। कई राजनेताओं और पत्रकारों ने इस शादी को लेकर खूब डंका बजाय और इसे ‘सेक्युलर इंडिया की पहचान’ से लेकर सांप्रदायिक एकता तक का प्रतीक भी बता दिया। हालाँकि, टीना द्वारा अपने नाम से खान सरनेम हटाना और अतहर द्वारा उन्हें इंस्टाग्राम पर अनफॉलो करने के बाद से ही पता चल गया था कि दोनों के बीच काफी कुछ सही नहीं चल रहा।

दोनों की शादी को 2018 में कई नेताओं और पत्रकारों सहित लिबरल गिरोह के लोगों ने सेलिब्रेट किया था। सोशल मीडिया पर उन्होंने इसे एक उदाहरण बताते हुए ख़ुशी जताई थी। किसी की शादी का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए, लेकिन इन लोगों ने इसे ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ की मिसाल के रूप में प्रस्तुत कर अपने एजेंडे के लिए इस मौके का इस्तेमाल किया। इसमें कॉन्ग्रेस अध्यक्ष रहे राहुल गाँधी सबसे आगे थे।

राहुल गाँधी ने दोनों को बधाई देते हुए यहाँ तक कामना की थी कि ‘असहिष्णुता और सांप्रदायिक घृणा के इस बढ़ते दौर में’ इन दोनों का प्यार और परवान चढ़े और सभी भारतीयों के लिए प्रेरणा बने। पत्रकार बरखा दत्त भी ज्ञान बाँचने में पीछे नहीं रहीं और उन्होंने दावा किया कि इन दोनों से आशाएँ मिलती हैं, दोनों का प्यार और उनकी उपलब्धियाँ भारत की पहचान हैं। वामपंथी कविता कृष्णन ने कई स्क्रीनशॉट्स शेयर कर उन लोगों की आलोचना की, जो इस शादी का विरोध कर रहे थे।

कविता कृष्णन ने लिखा था कि इन दोनों की शादी को लेकर घृणा फैलाई जा रही है और इसे ‘लव जिहाद’ बताया जा रहा है। उन्होंने तपन घोष को इस शादी का विरोध करने के लिए फासिस्ट बताया और कहा कि वो भी कल को ‘अजय सिंह बिष्ट’ (योगी आदित्यनाथ) की तरह मुख्यमंत्री बन सकते हैं क्योंकि भाजपा राज में ‘घृणा फैलती है’। ‘इंडिया टुडे’ जैसे मीडिया संस्थानों ने भी इस शादी के महिमामंडन में कोई कसर नहीं छोड़ी।

‘जनता का रिपोर्टर’ ने तो एक के बाद एक लेख शेयर कर के टीना डाबी और अतहर की शादी का महिमामंडन किया। साथ ही ताजमहल के पास इन दोनों की तस्वीर को शेयर करते हुए बताया कि ये कैसे एक-दूसरे से अपने प्यार का इजहार कर रहे हैं। साथ ही एक अन्य तस्वीर में इसे ‘सीरियस कपल गोल्स’ बताया। शादी और तलाक व्यक्तिगत मामले हैं, लेकिन एक विशेष एजेंडे के तहत इन दोनों की शादी को लेकर लिबरल गिरोह ने ज्ञान बाँटा।

अभी कुछ दिन पहले टीना के फैंस ने नोटिस किया कि उन्होंने अपने अकाउंट से न केवल ‘कश्मीरी बहू’ का टैग हटाया है, बल्कि उसके साथ-साथ अपने पति को भी ट्विटर पर अनफॉलो कर दिया है। इंस्टास्टोरी पर भी जय श्रीराम लिखते हुए हनुमान चालीसा की चौपाई- “सब सुख लहै तुम्हारी सरना, तुम रक्षक काहु को डरना। जय श्रीराम” लिखी थी। तलाक की अर्जी डालने की खबर सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर कुछ लोगों ने इसे ‘लव जिहाद’ से जोड़ा और यह कदम उठाने के लिए टीना की सराहना की। 

बोले गिरिराज- बिहार लव जिहाद पर बनाए सख्त कानून, ईसाई लड़कियों पर भी हो रहा अत्याचार

देश की कई भाजपा शासित राज्य सरकारों ने लव जिहाद के विरुद्ध सख्त क़ानून बनाने का ऐलान किया है। इसी कड़ी में केंद्रीय मंत्री और फायरब्रांड भाजपा नेता गिरिराज सिंह ने लव जिहाद के मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने बिहार में लव जिहाद के मुद्दे पर क़ानून बनाने की बात का समर्थन किया है। उनका कहना है कि पिछले कुछ समय से यह मुद्दा देश के कई प्रदेशों में बड़ी समस्या बन कर उभरा है। 

शुक्रवार (20 नवंबर 2020) को बिहार की राजधानी पटना में मीडियाकर्मियों ने बात करते हुए गिरिराज सिंह लव जिहाद पर क़ानून बनाए जाने को लेकर बयान दिया। केंद्रीय मंत्री ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से अनुरोध किया कि सरकार के लिए समझना अनिवार्य हो चुका है, लव जिहाद और जनसंख्या नियंत्रण इन दोनों विषयों का साम्प्रदायिकता से कोई सरोकार नहीं है। 

उन्होंने मीडियाकर्मियों से बात करते हुए कहा, “लव जिहाद देश के सभी राज्यों में केवल हिंदुओं के लिए ही नहीं, बल्कि अन्य गैर मुस्लिम समुदायों में भी परेशानी के रूप में देखा जाना चाहिए। केरल में ईसाइयों की आबादी अधिक है और वहाँ भी लोगों ने लव जिहाद के मुद्दे को लेकर चिंता जताई है।” 

दरअसल इस साल के जनवरी महीने में केरल की साइरो-मालाबार चर्च ने दावा किया था कि पिछले 3 सालों में 12 ईसाई महिलाओं को लव जिहाद में फँसाया गया और इसके बाद उनसे इस्लाम कबूल करवा लिया गया। इतना ही नहीं उन महिलाओं को सीरिया भी भेज दिया गया था। चर्च ने इस पूरे घटनाक्रम को इस्लामिक स्टेट (IS) का बड़ा षड्यंत्र बताया था, जिसके तहत वह केरल का धार्मिक और सामजिक सौहार्द बिगाड़ना चाह रहे थे। 

गिरिराज सिंह ने इस घटना के दौरान लगाए गए आरोपों का उल्लेख करते हुए कहा कि लव जिहाद के नाम पर ईसाई लड़कियों के साथ अत्याचार किया जा रहा है और उन्हें जान से मारा जा रहा है। अंत में भाजपा नेता ने कहा कि बिहार में लव जिहाद के विरुद्ध क़ानून बनाने से ही हालात बेहतर होंगे, तभी इस समस्या को जड़ से समाप्त किया जा सकता है। राज्य सरकार को यह समझना होगा कि लव जिहाद को रोकने के लिए क़ानून निर्माण का सीधा सरोकार सामाजिक समरसता से है, न कि साम्प्रदायिकता से। 

दरअसल हाल फ़िलहाल में देश के कई भाजपा शासित राज्यों ने लव जिहाद को रोकने के लिए सख्त क़ानून बनाने का ऐलान किया है। इसमें उत्तर प्रदेश, हरियाणा और मध्य प्रदेश की राज्य सरकारें शामिल हैं।      

अंतरधार्मिक, अंतरजातीय विवाह पर उत्तराखंड में मिलेंगे ₹50000, ‘लव जिहाद’ को बढ़ावा देने के आरोप के बाद सरकार ने दी सफाई

उत्तराखंड सरकार के एक आदेश पर विवाद पैदा हो गया है। टिहरी गढ़वाल के जिला समाज कल्याण पदाधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित एक आदेश में कहा गया है कि राष्ट्रीय एकता की भावना को जीवित रखने और सामाजिक एकता को बनाए रखने के लिए अंतरजातीय तथा अंतरधार्मिक विवाह काफी सहायक सिद्ध हो सकते हैं। इससे भिन्न-भिन्न परिवारों में एकता की भावना सुदृढ़ होने की बात भी कही गई है। लोगों ने इसे ‘लव जिहाद’ को बढ़ावा देना करार दिया है।

समाज कल्याण विभाग ने ऐलान किया कि इस प्रकार के विवाह को बढ़ावा देने के लिए सरकार की तरफ से उत्तराखंड के अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाहित दम्पति को प्रोत्साहन स्वरूप 50,000 रुपए प्रदान किए जाते हैं। अंतरधार्मिक विवाह के बारे में बताया गया है कि ये संघ या ब्यूरो द्वारा मान्यता प्राप्त मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर या अन्य देवस्थान में संपन्न हुआ हो। इसके लिए आवेदन-पत्र भी निःशुल्क मिलता है।

ऐसे विवाह के रजिस्ट्रेशन के बाद अगले एक वर्ष तक आवेदन किया जा सकता है। इस पर ‘सुदर्शन न्यूज़ टीवी’ के मुख्य संपादक सुरेश चव्हाणके ने पूछा कि ‘लव जिहाद’ करने वाले को सजा की जगह 50,000 का सरकारी इनाम दिया जा रहा है? उन्होंने पूछा कि देवभूमि उत्तराखंड में ये उल्टी गंगा क्यों बह रही है? उन्होंने मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से पूछा कि जब सारे राज्य ‘लव जिहाद’ के विरुद्ध कानून बना रहे तो उत्तराखंड में इसे बढ़ावा क्यों?

उन्होंने आशंका जताई कि कोई ‘UPSC जिहाद’ वाला अधिकारी ही ऐसा करा रहा है। बता दें कि उनके शो ‘UPSC जिहाद’ को लेकर काफी विवाद हुआ और अभी भी यह मामला कोर्ट से लेकर सरकारी दफ्तर तक लटका पड़ा है। इस आदेश के बाद एक व्यक्ति ने उत्तराखंड सरकार के विभिन्न हैंडलों को ट्विटर पर टैग कर के पूछा कि क्या ये सच है? साथ ही ऐसा आदेश जारी करने वाले अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई की भी माँग की।

इस पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के आर्थिक सलाहकार आलोक भट्ट ने बताया कि सम्बंधित विभाग के डायरेक्टर का कहना है कि ये आदेश 1976 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार के एक नोटिफिकेशन के आधार पर जारी किया गया है। बता दें कि तब उत्तराखंड भी उत्तर प्रदेश का ही भाग था और अलग राज्य नहीं बना था। भट्ट ने बताया कि इस मामले में अधिकारियों को सूचित कर दिया गया है और सही कार्रवाई की जा रही है।

वहीं, एक खबर के अनुसार, अंतर्जातीय विवाह करने वाले उत्तराखंड सरकार को इस विषय में जानकारी ही नहीं देते हैं। मई 2019 की खबर में बताया गया था कि तब तक मात्र 83 लोगों ने ही इस योजना का लाभ उठाया था। इस मामले में दम्पति का सत्यापन विधायक या सांसद भी कर सकता है। बताया गया था कि विभाग को आवेदन भी कम ही मिल रहे हैं। इस योजना के तहत दम्पति को ढाई लाख रुपए मिलते हैं, जिनमें से 50 हजार राज्य सरकार देती है। जबकि लोगों का कहना है कि उत्तराखंड के प्रशासन का ये आदेश ‘लव जिहाद’ को बढ़ावा देता है।

इधर उत्तर प्रदेश में लव जिहाद के मामलों से निपटने के लिए जल्द ही सख्त कानून आ सकता है। वैसे भी इस तरह के मामलों को लेकर प्रदेश की योगी सरकार का रूख हमेश से कड़ा रहा है। अब सख्त कानून बनाने के लिए उप्र के गृह विभाग ने न्याय व विधि विभाग को प्रस्ताव भेजा है। विधि विभाग प्रस्ताव की समीक्षा कर रहा है। इसमें 7 साल तक की सजा का प्रावधान हो सकता है। इस बात की जाँच की जाएगी कि शादी धोखे से तो नहीं हुई है।

‘डरे हुए’ हामिद अंसारी ने राष्ट्रवाद को बताया बीमारी, कहा- कोरोना से पहले ही देश ‘दो महामारी’ का हो चुका है शिकार


उपराष्ट्रपति पद से विदा होने के बाद से हामिद अंसारी ‘बेहद डरे हुए’ हैं। वे पहले ही कह चुके हैं कि भारत के गणतंत्र की संस्थाएँ बहुत खतरे में हैं। एक बार फिर उनका यह ‘डर’ सामने आया है। अब उन्होंने राष्ट्रवाद के साथ आक्रामकता को जोड़ा है और इसे बीमारी बताया है। वे पूर्व में राष्ट्रवाद को ‘जहर’ भी बता चुके हैं।

शुक्रवार (20 नवंबर 2020) को अंसारी ने कहा कि देश कोरोना से पहले ही दो महामारी का शिकार हो चुका है। ये हैं- धार्मिक कट्टरता और आक्रामक राष्ट्रवाद। बकौल अंसारी, इनके मुकाबले देशप्रेम अधिक सकारात्मक अवधारणा है, क्योंकि यह सैन्य और सांस्कृतिक रूप से रक्षात्मक है।

वे कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर की किताब ‘The Battle of Belonging’ के आभासी विमोचन के मौके पर बोल रहे थे। उन्होंने देश के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य पर टिप्पणी करते हुए कहा कि देश ऐसे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष विचारधाराओं की वजह से ख़तरे में नज़र आ रहा है जो उसे ‘हम और वह’ की श्रेणी में विभाजित करने का प्रयास कर रही हैं। 

महामारी को केंद्र में रखते हुए पूर्व उपराष्ट्रपति ने कहा, “कोरोना से पहले ही हमारा देश दो बड़ी महामारियों को झेल चुका है, धार्मिक कट्टरता और आक्रामक राष्ट्रवाद। धार्मिक कट्टरता और आक्रामक राष्ट्रवाद की तुलना में देशभक्ति कहीं अधिक सकारात्मक अवधारणा है। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि यह सांस्कृतिक और सैन्य दृष्टिकोण से रक्षात्मक है।” 

अंसारी ने कहा, “4 वर्षों की छोटी अवधि में भारत ने उदार राष्ट्रवाद के बुनियादी दृष्टिकोण से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की राजनीतिक छवि निर्मित करने तक एक लंबी यात्रा तय की है, जो सार्वजनिक क्षेत्र में पूर्णतः स्थापित हो चुकी है।” उन्होंने कहा कि अभी तक हमारे व्यावहारिक मूल्य एक बहुआयामी समाज की अस्तित्वगत वास्तविकता, लोकतांत्रिक राजनीति और धर्मनिरपेक्ष राज्य की तरह प्रस्तुत किए जाते थे। इन सारी बातों को स्वतंत्रता आंदोलन तक स्वीकार किया जाता था, यह बातें संविधान के समानांतर थीं और संविधान की प्रस्तावना (Preamble) में निहित थीं। भारतीय समाज का बहुआयामी पहलू इसमें मौजूद 4635 समुदायों से ही स्पष्ट होता है। 

महामारी को उल्लेख करते हुए हामिद अंसारी ने कहा, “कोविड 19 एक भयावह महामारी है लेकिन इसके पहले हमारा समाज दो महामारियों का शिकार हो चुका है, धार्मिक कट्टरता और आक्रामक राष्ट्रवाद। धार्मिक अवधारणा को धर्म के आधार पर किए जाने वाले ढोंग के रूप में परिभाषित किया जा रहा है और आक्रामक राष्ट्रवाद के बारे में पहले ही बहुत कुछ लिखा जा चुका है। यह विचारधारा के लिहाज़ से जहर जैसा है जो किसी संकोच के बिना लोगों के व्यक्तिगत अधिकारों पर अतिक्रमण करता है और अधिकारों को क्षीण करता है।”

पूर्व उपराष्ट्रपति ने कहा कि रिकॉर्ड्स बताते हैं कि यह कई बार नफ़रत का रूप ले लेता है और एक ऐसी घुट्टी के रूप में काम करता है जो प्रतिशोध के लिए उकसाता है। तमाम लोगों ने इसके उदाहरण कहीं और नहीं बल्कि अपनी ही ज़मीन पर देखे होंगे। देशभक्ति स्वभाव के लिहाज़ से बेहद सकारात्मक अवधारणा है चाहे वह सांस्कृतिक रूप में हो या सैन्य रूप में। यह आम लोगों की भावनाओं को सही दिशा देती है।

आज कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता घर से भी नहीं निकल सकते: कपिल सिब्बल ने नेतृत्व पर फिर उठाए सवाल

पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने एक बार फिर से कॉन्ग्रेस पार्टी और उसके नेतृत्व पर सवाल खड़े किए हैं। कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता ने कहा कि पार्टी में अपनी आवाज़ उठाने के लिए कोई मंच ही नहीं है, क्योंकि वो कॉन्ग्रेस वर्किंग कमिटी (CWC) के सदस्य नहीं हैं। उन्होंने अपने उस बयान से सहमति जताई, जिसमें उनका कहना था कि देश में कॉन्ग्रेस अब भाजपा के सामने एक प्रभावशाली विपक्ष नहीं है।

‘इंडिया टुडे’ के राजदीप सरदेसाई के साथ इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि आप एक प्रभावशाली विकल्प कैसे बन सकते हैं, जब आपके पास पिछले 18 महीनों से कोई पूर्णकालिक अध्यक्ष तक नहीं है और पार्टी में इसे लेकर कोई विचार-विमर्श ही नहीं हुआ है कि चुनाव में हार क्यों हो रही है। उन्होंने साफ़ किया कि वो गाँधी परिवार के खिलाफ बगावत नहीं कर रहे हैं। उन्होंने अधीर रंजन चौधरी की भी आलोचना की, जिन्होंने उन्हें नसीहत दी थी।

उन्होंने लोकसभा में कॉन्ग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी को सलाह दी कि पश्चिम बंगाल में चुनाव आ रहे हैं और उन्हें ये साबित करने के लिए मेहनत करना चाहिए कि राज्य में कॉन्ग्रेस एक ताकत है। उन्होंने आरोप लगाया कि स्टार प्रचारकों की सूची में भी उन्हें शामिल नहीं किया गया है। उन्होंने कहा कि आज कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता घर से भी नहीं निकल सकते, क्योंकि उनसे पूछा जाता है कि आपकी पार्टी को क्या हो रहा है?

उन्होंने पूछा कि आम कार्यकर्ताओं की भावनाओं का क्या? उन्होंने कहा कि उनकी भावनाओं को तो ठेस पहुँची ही है, साथ में कॉन्ग्रेस के लाखों कार्यकर्ताओं के साथ भी यही हुआ है। उन्होंने कहा कि वो जानते हैं कि एक दिन में बदलाव नहीं हो सकता, लेकिन हम 2014 हारे और 2019 भी हारे। उन्होंने दावा किया कि वो किसी को चुनौती नहीं दे रहे, लेकिन हमें बाहर निकल कर जनता को कॉन्ग्रेस की विचारधारा के बारे में बताना होगा।

जब उनसे पूछा गया कि क्या वो कॉन्ग्रेस के नेतृत्व में बदलाव की माँग कर रहे हैं, तो उन्होंने जवाब दिया कि जब राहुल गाँधी ही कह रहे हैं कि वो पार्टी का अध्यक्ष नहीं बने रहना चाहते, तो फिर नेतृत्व में बदलाव की माँग करने के आरोप उन पर कैसे लगाए जा सकते हैं? उन्होंने कहा कि लोग अभी भी राहुल गाँधी की ओर देख रहे हैं, क्योंकि ये सिर्फ पार्टी ही नहीं, बल्कि देश को भी ‘चंद लोगों से’ बचाना है, लोकतंत्र को बचाना है।

कपिल सिब्बल ने कॉन्ग्रेस नेतृत्व पर फिर खड़े किए सवाल (वीडियो साभार: इंडिया टुडे)

पूर्व केंद्रीय मंत्री ने कहा कि उनकी वफादारी किसी खास व्यक्ति के प्रति नहीं, बल्कि देश के लिए है। उन्होंने ऐलान किया कि वो तब तक सवाल उठाना बंद नहीं करेंगे, जब तक विचार-विमर्श और संवाद शुरू नहीं हो जाता। उन्होंने अधीर रंजन चौधरी को सलाह दी कि वो उनकी चिंता छोड़ कर पश्चिम बंगाल की चिंता करें। उन्होंने अशोक गहलोत को भी सलाह दी कि वो कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं की भावनाओं की चिंता करें।

उधर पार्टी के एक अन्य वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने भी कहा कि कॉन्ग्रेस के नीतिगत ढाँचे की आलोचना करते हुए कहा कि पार्टी के प्रदर्शन में पिछले कुछ समय से लगातार गिरावट ही आई है। उन्होंने सलाह दी कि कॉन्ग्रेस को इतना साहसी बनना होगा कि गिरावट के उन कारणों को पहचाने और उन पर काम करे। चिदंबरम ने कहा कि उपचुनाव इस बात प्रमाण हैं कि कॉन्ग्रेस की संगठनात्मक दृष्टिकोण से कोई पकड़ नहीं रह गई है। इतना ही नहीं जिन राज्यों में उपचुनाव हुए हैं, उनमें कॉन्ग्रेस कमज़ोर ही हुई है।