भारतीय सेना को आज जबलपुर स्थित ‘Gun Carriage Factory’ में बनी ‘धनुष’ आर्टिलरी गन्स की पहली खेप सौंप दी गई। स्वदेश निर्मित ‘धनुष’ को स्वीडन निर्मित बोफोर्स गन्स का स्वदेशी वर्जन माना जाता है। Ordnance Factory Board (OFB) द्वारा ये आर्टिलरी गन्स जीसीएफ में केन्द्र सरकार के रक्षा सचिव (उत्पादन) डॉक्टर अजय कुमार के मुख्य आतिथ्य में आयोजित कार्यक्रम में भारतीय सेना के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल पीके श्रीवास्तव को औपचारिक रूप से सौंपी गई। रक्षा मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि अब तक इन गन्स का 81% स्वदेशीकरण हो चुका है और 2019 ख़त्म होने तक ये आँकड़ा 91% तक पहुँच जाएगा।
“आज 155 मी.मी. धनुष तोप भारतीय सेना में शामिल हो गया है। आपसी तालमेल, उत्कृष्टता और आपसी विश्वास, धनुष तोप प्रोजेक्ट की सफलता के आधार रहें हैं। धनुष तोप की सफलता ने आने वाले दिनों में कई सफल परियोजनाओं का रास्ता प्रशस्त किया है”।
जबलपुर गन कैरिज फैक्ट्री में हुए इस कार्यक्रम में ऐसे 6 आर्टिलरी गन्स सेना को सौंपे गए। ऐसे 18 गन्स के साथ साल ख़त्म होने तक एक धनुष रेजिमेंट तैयार हो जाएगा। 18 फरवरी 2019 को जीसीएफ को सेना से ऐसे 114 गन्स के निर्माण के लिए बल्क प्रोडक्शन क्लीयरेंस मिला था। ‘धनुष’ 155mm का 45-calibre towed आर्टिलरी गन है, जिसका रेंज 36 किलोमीटर है। विशेष गोला-बारूद के साथ ये रेंज 38 किलोमीटर हो जाता है। अभी जो 39 calibre Bofors FH 77 बोफोर्स गन भारतीय सेना के पास है, ‘धनुष’ को इसका अपग्रेडेड वर्जन माना जा रहा है। जबलपुर में हुए कार्यक्रम के बाद नव निर्मित धनुष आर्टिलरी गन को हरी झंडी दिखाकर फैक्टरी से रवाना किया गया।
‘धनुष’ 13 सेकंड में तीन फायर कर सकती है। फायर करने के बाद गन अपनी पोजिशन चेंज कर सकती है। इस आर्टिलरी गन का वजन 13 टन है। बोफोर्स तथा धनुष के कुछ फंक्शन समान हैं। यह रात के समय भी लक्ष्य पर निशाना साध सकती है। भारतीय सेना ने ऐसे कुल 414 गन की माँग की है। 2012 में इस पर कार्य शुरू किया गया था। इसमें अपग्रेडेड कम्यूनिकेशन सिस्टम लगाया गया है। ये आर्टिलरी गन्स सेटेलाइट के जरिए न केवल दुश्मन के ठिकानों की पोजीशन हासिल कर सकती है, बल्कि खुद गोले लोड कर फायर करने में भी सक्षम है।
भारतीय सेना में आज शामिल हो रही है ‘धनुष’ तोप l इसकी ख़ासियत जानने के लिए देखें वीडियो l pic.twitter.com/vlxdoXuq3M
इन गन्स के वजन के कारण पहाड़ी व सुदूर इलाकों में इनका सुगम इस्तेमाल किया जा सकता है। पाकिस्तान व चीन से लगी सीमा पर इसकी तैनाती की जाने की उम्मीद है। जुलाई 2016 से जून 2018 के बीच पोखरण सहित अन्य क्षेत्रों में इन गन्स के कई ट्रायल किए गए। पाँच जगहों पर हुए कई परीक्षणों में इसे अलग-अलग तापमान पर परखा गया। इस से अब तक 4599 बार फायर किया जा चुका है। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत में निर्मित होने वाली लंबी रेंज की पहली आर्टिलरी गन है।
जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने फिर से कश्मीर की कथित आज़ादी का राग अलापा है। जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री ने भाजपा के घोषणापत्र पर ज़हर उगलते हुए चुनौती स्वरूप कहा कि देखते हैं, कौन धारा 370 हटाता है। इतना ही नहीं, उन्होंने कश्मीर में अपनी प्रतिद्वंद्वी महबूबा मुफ़्ती के झंडा वाले बयान को लगभग दुहराते हुए कहा कि अगर ऐसा हुआ तो कश्मीर में कोई तिरंगा झंडा नहीं उठाएगा। महबूबा मुफ़्ती ने भी कहा था कि अगर ऐसा हुआ तो न सिर्फ जम्मू कश्मीर बल्कि पूरा देश जलेगा। अब्दुल्ला ने कहा:
“बाहर से लाएँगे, बसाएँगे और सोते रहेंगे? हम इसका मुक़ाबला करेंगे। धारा 370 को कैसे ख़त्म करोगे? अल्लाह की क़सम कहता हूँ। अल्लाह को यही मंज़ूर होगा कि हम इनसे आज़ाद हो जाएँ। करें, धारा 370 हटाएँ, हम भी देखते हैं। देखते हैं फिर कौन इनका झंडा उठाने के लिए तैयार होता है।”
#WATCH F Abdullah: Bahar se laenge, basaenge,hum sote rahenge?Hum iska muqabala karenge,370 ko kaise khatam karoge?Allah ki kasam kehta hun,Allah ko yahi manzoor hoga,hum inse azad ho jayen.Karen hum bhi dekhte hain.Dekhta hun phir kon inka jhanda khada karne ke liye taiyar hoga. pic.twitter.com/hrxoh9ECOY
जिस तरह अब्दुल्ला ने भारत और भारतीयों के लिए (जिसमें जम्मू-कश्मीर भी शामिल है) ‘इन’, ‘इनका’ और ‘इन्हें’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया, उससे लगता है कि वो ख़ुद को भारत का नागरिक नहीं मानते। उन्होंने तिरंगे को भी ‘इनका झंडा’ कहा। साथ ही उन्होंने जम्मू कश्मीर से बाहर अन्य भारतीयों के लिए ‘बाहरी’ शब्द का प्रयोग कर अपने देशविरोधी रवैये का परिचय दिया। वैसे फ़ारूक़ के बेटे उमर अब्दुल्ला भी जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। कुछ दिनों पहले उन्होंने भी कश्मीर के लिए अलग प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की माँग की थी।
Mehbooba Mufti on BJP in manifesto promises abrogation of Article 370 and annulling Article 35A: Already J&K ek barood ki dher par baitha hua hai. If this happens then not only Kashmir but the country and the region will burn. So I appeal to BJP that please stop playing with fire pic.twitter.com/E0z8rmjNO5
उमर अब्दुल्ला के बयान पर पीएम मोदी ने उन्हें ललकारा था और कहा था कि मोदी के रहते कोई देश को विभाजित नहीं कर सकता। उमर अब्दुल्ला ने एक जनसभा को सम्बोधित करते हुए कहा था:
“आज हमारे ऊपर तरह-तरह के हमले हो रहे हैं। हमारे ख़िलाफ़ कई तरह की साज़िशें हो रही हैं। कई ताक़तें लगी हुई हैं जम्मू-कश्मीर की पहचान मिटाने के लिए। कल की बात है जब अमित शाह साहब ने किसी इंटरव्यू में कहा कि हम 2020 तक जम्मू-कश्मीर से 35ए को खत्म कर देंगे। जम्मू-कश्मीर बाकी रियासतों की तरह नहीं है। बाकी रियासतें बिना शर्त रखे हिंदुस्तान में मिल गईं, लेकिन हमने शर्त रखी और मुफ़्त में नहीं आए। हम बिना शर्त मुल्क़ में नहीं आए। हमने अपनी पहचान बनाए रखने के लिए आईन (संविधान) में कुछ चीजें दर्ज कराईं और कहा कि हमारा संविधान और झंडा अपना होगा। उस वक्त हमनें अपना सदर-ए-रियासत और वजीर-ए-आजम भी रखा था, अब हम उसे भी वापस ले आएँगे।”
इसी तरह जम्मू कश्मीर के एक और पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद ने भी जम्मू कश्मीर पुलिस को दुश्मन बताते हुए कहा था कि वो निहत्थे लोगों की हत्या करती है। आज़ाद ने कहा था:
“जम्मू कश्मीर पुलिस भी कम दुश्मन नहीं है। उन्होंने कोई कम ज़्यादतियाँ नहीं की हैं। मैं उन पुलिसवालों को तो सलाम करता हूँ जिन्होंने अपनी जानें दी, लेकिन उसमें भी कुछ नासूर ऐसे थे जो अपने प्रमोशन और पैसे के लिए निहत्थे लोगों का क़त्ल करते थे। क्या वजह है कि 2014 तक हालात ठीक हो गए थे? क्या वजह है कि 2014 से लेकर आज तक हालात 1990-91 वाले हो गए हैं। उसके लिए अगर कोई ज़िम्मेदार है तो वो है देश का पीएम नरेंद्र मोदी।”
भाजपा के घोषणापत्र में धारा 370 और 35A को लेकर कही गई बातें
बता दें कि हाल ही में जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने भी आर्टिकल 35A को लेकर कुछ ऐसा ही विवादित बयान दिया था। उन्होंने केंद्र सरकार को धमकी भरे अंदाज में कहा था कि अगर इस आर्टिकल से छेड़छाड़ की गई तो देश वो देखेगा जो उसने कभी नहीं देखा। साथ ही उन्होंने कहा था कि उसके बाद कश्मीर के लोग तिरंगा छोड़कर कौन सा झंडा उठाएँगे, उन्हें नहीं पता। मुफ़्ती ने कहा था:
“आग से मत खेलो, अनुच्छेद -35 A के साथ छेड़छाड़ न करें, अन्यथा आप वो देखेंगे जो आपने 1947 से अभी तक नहीं देखा है। अगर उस पर (अनुच्छेद-35 A) हमला होता है तो मुझे नहीं पता कि जम्मू-कश्मीर में तिरंगे की जगह कौन से झंडे लोग लहराने को मजबूर होंगे।” “
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर लोकसभा चुनाव का भूत इस क़दर चढ़ा हुआ है कि वो कुछ भी कहने से नहीं चूकतीं। हद तो तब पार हो जाती है जब वो अपनी भद्दी राजनीति में देश के प्रधानमंत्री मोदी तक को नहीं छोड़तीं। आए दिन उनकी ख़िलाफ़त में व्यक्तिगत हमले करती रहती हैं। किसी पर निजी हमले इंसान तब करता है जब उसके पास कहने के लिए कुछ बचे ही न। आए दिन केंद्र सरकार को आड़े हाथों लेना तो उनकी पुरानी आदत है जिसमें आरोपों का दौर कभी थमता ही नहीं।
अपने विरोधी सुरों में सुर मिलाते हुए वो कभी बीजेपी को बैलेट पेपर पर जवाब देने की धमकी दे डालती हैं तो कभी न्यूज़ चैनल द्वारा उनकी धरने देने वाली कवरेज़ पर मीडिया संस्थान को (रिपब्लिक टीवी) नोटिस थमा देती हैं। बड़ी ही विलक्षण और फ़र्ज़ी प्रतिभा की धनी हैं ममता दीदी।
अपने विरोधी स्वभाव के चलते उन्हें केवल आरोप पर आरोप ही लगाना आता है, फिर चाहे वो कवरेज को लेकर हो या चुनावी वादे के लेकर या केंद्र को घेरने के लिए हो। आरोप लगाने की उनकी कला दिनों-दिन निखरती जा रही है। अभी हाल ही में उन्होंने पीएम मोदी पर आरोप लगाया था कि उन्होंने अपनी पत्नी की देखभाल नहीं की तो जनता की देखभाल कैसे करेंगे। इस पर मेरा तो यही कहना है कि जनता की देखभाल कैसे करेंगे वो जनता ने बीते पाँच वर्षों में देख लिया, लेकिन आप फ़िलहाल ये बताइये कि आपने बंगाल में ऐसा कौन-सा विकास कर दिया जिसके चर्चे दुनिया भर में हो रहे हैं? आप तो अपने राज्य में एक फ़िल्म के प्रदर्शन तक पर तो रोक लगा देती हैं कि कहीं उस फ़िल्म का व्यंग्य आपके ऊपर सटीक न बैठ जाए। क्या यही है आपकी राजनीति?
आज फिर ममता ने पीएम मोदी पर तीखा हमला किया और कहा कि भारत में बड़े परिवारों को अलग-अलग धर्मों के लोगों को एक साथ रहते हुए देखा है, लेकिन पीएम मोदी इस बात को नहीं समझेंगे क्योंकि न तो उनका कोई परिवार है और न ही वो आप लोगों को अपना परिवार समझते हैं।
West Bengal CM Mamata Banerjee at a public rally in Cooch Behar: In India we have seen large families consisting of people from different religions staying together, but how would he(PM Modi) know? He neither has his own family nor he thinks of you people as his family pic.twitter.com/TuKfH3uKrN
इतना ही नहीं ममता तो यहाँ तक बोल गईं कि पीएम मोदी के मुँह पर टेप चिपका देनी चाहिए। अब ऐसे में अगर यह पूछ लिया जाए कि पश्चिम बंगाल उस सेवानिवृत्त भारतीय पुलिस सेवा (IPS) अधिकारी के बारे में क्या कहेंगी, जिन्होंने आत्महत्या कर ली थी। अपने सुसाइड नोट में उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर उकसाए जाने का आरोप लगाया था और आत्महत्या के लिए ममता बनर्जी को ही ज़िम्मेदार ठहराया था? इस सवाल पर ममता का बस चले तो हर शख़्स के मुँह पर टेप चिपकवा दें।
ममता को पीएम मोदी की वो छवि कभी नज़र नहीं आती जिसमें वो व्यक्तिगत स्वार्थ से हमेशा दूर खड़े नज़र आते हैं। पीएम मोदी कभी निजी स्वार्थ को तवज्जोह नहीं देते। उन्होंने हमेशा ‘सबका साथ, सबका विकास‘ का नारा दिया। इस नारे में व्यक्तिगत स्वार्थ और निजी लोगों को लाभ पहुँचाना कहीं भी शामिल नहीं है। यह बात अलग है कि ममता जैसे कुटिल राजनेता इस बात को नहीं समझ पाएँगे क्योंकि उनके क़रीबी तो घोटालों में नाम कमाते नज़र आते हैं।
चुनावी घमासान में ख़ुद को चमकाने की राजनीति में वो यह भूल जाती हैं कि उनके ख़ुद के दामन पर कितने दाग लगे हुए हैं। कभी तो वो शारदा चिट फंड मामले में पुलिस कमिश्नर के ख़िलाफ़ हो रही कार्रवाईयों पर अपना विरोध जताती हैं और रात भर धरने पर बैठ कर अपने अड़ियल रवैये का परिचय देती हैं, तो कभी घोटाले की जाँच में अड़ंगा डालती हैं, इसकी शिक़ायत ख़ुद CBI द्वारा की गई थी। बंगाली फ़िल्म प्रोड्यूसर श्रीकांत मोहता को ₹17,450 करोड़ के रोज़ वैली चिटफंड घोटाले में गिरफ़्तार किया गया था, जोकि उनके क़रीबी थे।
वहीं पीएम मोदी की बात करें तो साल 2014 में उनके भाई प्रह्लाद मोदी ने बीबीसी को बताया था कि काश वह (पीएम मोदी) हमारे परिवार की आगे की पीढ़ी के लिए मदद करते, लेकिन वो ऐसा नहीं करेंगे। बता दूँ कि बेशक इस लाइन में पीएम मोदी के भाई का दर्द झलकता हो, लेकिन दूसरी तरफ पीएम मोदी का वो चरित्र दिख रहा है कि जिसमें व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए कोई जगह नहीं है। ऐसे में ममता का यह कह देना कहाँ तक उचित है कि पीएम मोदी का तो परिवार ही नहीं है जबकि उनके लिए तो पूरा देश ही एक परिवार के समान है जिसमें सबका विकास करना उनकी प्राथमिकता रहा है, जिसके परिणाम सकारात्मक रुप से उजागर भी हुए।
भारतीय वायुसेना ने अमेरिकी मैगजीन के फर्जी दावे और पाकिस्तान के झूठ को एक बार फिर से बेनकाब कर दिया है। वायुसेना ने मैगजीन के दावे को झूठा करारा देते हुए कहा कि हमारे पास न सिर्फ इस बात का सबूत है कि पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ F-16 का इस्तेमाल किया था, बल्कि इस बात का भी पक्का सबूत है कि मिग बाइसन ने F-16 फाइटर जेट को मार गिराया था।
#WATCH: Air Vice Marshal RGK Kapoor in the radar images shows the location of the shooting down of F-16 of Pakistan Air Force (PAF) by Indian Mig piloted by Wing Commander Abhinandan pic.twitter.com/CPuf2qf0nT
भारतीय वायुसेना ने इसका सबूत देते हुए रडार के जरिए मिली उस तस्वीर को भी जारी कर दिया, जिसमें F-16 फाइटर जेट को साफ तौर पर एयरबोर्न वॉर्निंग ऐंड कंट्रोल सिस्टम ने लिया था।
Indian Air Force nails Pak lies – Electronic emissions confirm F 16 was close to Captain abhinandan plane .. Air Force issues statement pic.twitter.com/nei1HB1pl7
— Naveen Kapoor ANI (@IamNaveenKapoor) April 8, 2019
गौरतलब है कि अमेरिकी पत्रिका ‘फॉरेन पॉलिसी’ ने दावा किया था कि उसके देश द्वारा की गई गिनती में पाकिस्तान का कोई भी F-16 लड़ाकू विमान लापता नहीं पाया गया है और उनमें से किसी को भी नुकसान नहीं पहुँचा है, जो भारत के उन दावों को खारिज करती है कि वायु सेना ने 27 फरवरी को हवाई संघर्ष के दौरान एक पाकिस्तानी F-16 लड़ाकू विमान को मार गिराया था। अब अमेरिकी कुछ बोलें (खासकर देश विरोधी बातें) और हमारे देश का मीडिया गिरोह शांत रह जाए, यह संभव नहीं। गिरोह के इन लोगों ने सोशल मीडिया से आगे बढ़कर ख़बरों में भी अपनी ही सरकार से सबूत माँगना शुरू कर दिया था। आज का यह सबूत उनके मुँह पर जोरदार तमाचा है।
इस आरोप को लेकर वायु सेना के वाइस एयर मार्शल आरजीके कपूर ने कहा, “हमारे पास इसके और भी पक्के सबूत और सटीक तथ्य हैं कि पाकिस्तान ने हवाई लड़ाई में अपना F-16 विमान खो दिया है, लेकिन सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा होने की वजह से हम कुछ महत्वपूर्ण सबूतों को सार्वजनिक नहीं कर रहे हैं।”
इतना ही नहीं, पाकिस्तान के झूठ का पर्दाफाश करते हुए वायुसेना ने कहा कि इसमें कोई शक नहीं है कि 27 फरवरी को हवाई लड़ाई में 2 विमान गिरे थे, जिसमें से एक मिग 21 बाइसन और दूसरा पाकिस्तान वायुसेना का विमान F-16 था। इस विमान की पहचान इलेक्ट्रॉनिक सिग्नेचर और रेडियो पर हुई बातचीत के आधार पर सुनिश्चित हुई थी।
इससे पहले 28 फरवरी को भी भारतीय थल सेना, वायु सेना और नौसेना ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर F-16 के मार गिराने के सबूत पेश किए थे। भारत सरकार ने बालाकोट के आतंकी शिविरों पर हमले के एक दिन बाद 27 फरवरी को कहा था कि वायु सेना के पायलट अभिनंदन ने एक पाकिस्तानी F-16 को मार गिराया है, जो भारतीय सैन्य ठिकाने पर हमला करने की कोशिश कर रहा था। सेना ने F-16 में लगने वाले मिसाइल के टुकड़े भी मीडिया को दिखाए थे।
भारतीय वायु सेना के मुताबिक, पाकिस्तानी वायु सेना ने भारत के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने की कोशिश की थी। हालाँकि पाकिस्तान के प्रयासों को भारत ने असफल कर दिया था। पाकिस्तानी वायुसेना ने भारत की कई जगहों पर बमबारी की थी, लेकिन भारतीय सैन्य ठिकानों को नुकसान पहुँचाने में वे असफल रहे थे।
दुष्ट गौभक्त-ब्राह्मणवादी-पितृसत्तावादी ‘चाउविनिस्ट’ मंगल पांडे को आज भारत को क्रिकेट और अंग्रेजी की नियामतें देने वाले महान अंग्रेजों ने मौत के घाट उतार दिया था। और बिलकुल सही किया- क्योंकि अंग्रेज पहले से इस बात की आकाशवाणी सुन चुके थे कि 150 साल बाद मंगल पांडे के नाम का इस्तेमाल 2-4 हिंसक गौरक्षकों के कर लेने से भारत का लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा। इसलिए उन्होंने भारत को लोकतंत्र बाद में दिया, पर उसके लिए खतरा बन सकने वाले गौ-रक्षक को 90 साल पहले ही दण्डित कर दिया।
पर इस दुष्ट गौरक्षक को रोकने के पीछे एक नाम उस शांतिदूत का भी था, जिस बेचारे को अंग्रेजों ने इतिहास में दबा के गुमनाम कर दिया, और गौरक्षकों की आफत रोकने में उसका सब योगदान बिसर गया। पर इतिहास के पन्नों से उखाड़ कर हम इस वीर की वीरगाथा लाए हैं, जिसे पूरा पढ़ने के लिए आपको चाचा नेहरू, जिल्लेलाही अकबरे आजम और सम्राट अशोक के सेक्युलरिज्म की कसम!
न जाने कितने मार लेता मंगल पांडे, अगर शांतिदूत पल्टू न होता
जैसा कि शांतिदूत शेख पल्टू के नाम से जाहिर है, वो ‘यूनेस्को-सर्टिफाइड सबसे शांतिप्रिय मज़हब’ का शांतिप्रिय बाशिंदा था।
29 मार्च, 1857 के दिन बैरकपुर में तैनात अंग्रेज साहब लेफ्टिनेंट बॉघ को पता चला कि मंगल पांडे नाम का कोई सैनिक कारतूसों में गाय की चर्बी होने के कारण हिन्दुओं और सूअर की चर्बी के कारण समुदाय विशेष को, उनके इस्तेमाल से इंकार करने के लिए उकसा रहा है। उनके कोमल-वीर कानों में यह बात भी पड़ी कि परेड ग्राउंड में खड़े मंगल पांडे ने यह कदम यही कह कर उठाया है कि इससे आने वाले समय में मोदी नामक प्रधानमंत्री के शासन में गौरक्षकों को उसके कारनामे से बल मिलेगा, और इसलिए वह उनके लिए उदाहरण पेश कर रहा है। मंगल पांडे ने पहले गोरे (हाउ रेसिस्ट??) को देखते ही गोली मार देने की धमकी दी है, ऐसा भी उन्होंने सुना।
परेड ग्राउंड में पहुँचे सार्जेंट-मेजर ह्यूसन ने जमादार ईश्वरी प्रसाद को आगे ठेला कि वो मंगल पांडे को काबू में करे और गिरफ्तार करे। ईश्वरी प्रसाद ने हाथ खड़े कर दिए कि उसके सारे सिपाही मदद माँगने गए हैं और वह अकेले मंगल पांडे को नहीं गिरफ्तार कर सकता।
तभी लेफ्टिनेंट बॉघ हथियारों से लैस हो वहाँ घोड़ा टपाते पहुँच गया। उन्हें देखते ही दुष्ट मंगल पांडे ने उनके घोड़े पर निशाना लगाकर गोली चला दी, और लेफ्टिनेंट जी धराशायी हो गए। बॉघ जी ने मंगल पांडे पर निशाना लगाया पर चूक गए और निर्दयी मंगल पांडे ने अपनी तलवार निकाल ली। और उसने तो बेचारे लेफ्टिनेंट जी को चलता ही कर दिया होता अगर हमारे वीर सिपाही शेख पल्टू ने हस्तक्षेप न किया होता।
शेख पल्टू ने मंगल पांडे को धर लिया, और तब तक धरे रहा जब तक लेफ्टिनेंट बॉघ जी और सार्जेंट-मेजर ह्यूसन जी अंगड़ाईयाँ ले उठ खड़े नहीं हुए।
अपने ही लोगों ने साथ नहीं दिया बेचारे शेख पल्टू का
शेख पल्टू जब दुष्ट काफ़िर गौभक्त मंगल पांडे के साथ दंगल-दंगल कर रहे थे, तभी उनके साथ के सिपाही चुपचाप टीएनए मैच की तरह देख रहे थे। शेख पल्टू चिल्लाते रहे मदद के लिए, मगर किसी भी बेदर्द के दिल में उनकी ‘स्वामीभक्ति’ के लिए सम्मान नहीं जगा।
जब एक-दो बड़े साहबों के धमकियाने पर वह आगे बढ़े भी तो भी उन्होंने दुष्ट मंगल पांडे की बजाय शेख पल्टू जी पर हमला बोल दिया, उन पर जूते और पत्थर फेंके (जिसके लिए मोदी को त्यागपत्र दे सरदार पटेल की मूर्ति के ऊपर से छलांग लगा देनी चाहिए), और उन्हें गोली मार देने की धमकी दी। पर वे संत आदमी काफ़िर पांडे को धरे रहे।
Mob-lynching से हुआ शेख पल्टू जैसे जांबाज वीर का अंत: दुखद!
शेख पल्टू जी की स्वामिभक्ति जताने की निन्जा टेक्नीक से प्रभावित हो 9 अप्रैल को उन्हें हवलदार बना दिया गया, और काफ़िर मंगल पांडे को 18 अप्रैल बोल कर 8 को ही फांसी दे कर ‘एप्रिल फूल’!!
पर इस देश के लिए यह बहुत ज्यादा शर्म की बात है कि शेख पालतू पल्टू जी अपना हवलदारत्व ज्यादा दिन तक ‘एन्जॉय’ नहीं कर पाए। 34 बंगाल नेटिव इन्फैंट्री, जिसके मंगल पांडे सैनिक थे और लेफ्टिनेंट बॉघ जी अफसर – इस पूरी इन्फैंट्री को बर्खास्त कर दिया गया था। क्यों? क्योंकि वो चुपचाप इस हृदय-विदारक गौभक्त-हिंसा को देखते रहे थे, अफसरों का कहना नहीं माना था। उसी 34 बंगाल नेटिव इन्फैंट्री के कुछ दुष्ट पूर्व-सैनिकों ने (गुप्त सूत्र बताते हैं कि वे सभी सवर्ण, मनुवादी, गौभक्त हिन्दू थे) धोखे से शेख पल्टू जैसे निश्छल वीर को ‘खोपचे’ में बुलाया और इनकी mob-lynching कर दी… और इस तरह शेख पल्टू गौभक्तों के आतंक को रोकने वाले पहले वीर भी थे, और mob lynching के पहले शहीद भी!
(जिन्हें इस कहानी पर शक है, उन्हें पूरा निमंत्रण है कि निम्नलिखित किताबों को खंगालें…)
The Indian Mutiny of 1857: Colonel George Bruce Malleson
रॉबर्ट वाड्रा पूरे भारत में कॉन्ग्रेस पार्टी के लिए चुनाव प्रचार करने का ऐलान कर चुके हैं। अपनी सास सोनिया गाँधी, बीवी प्रियंका गाँधी और साले राहुल गाँधी की सफलता के लिए वाड्रा भारत भ्रमण पर निकलेंगे। वाड्रा ने कहा है कि यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गाँधी और कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के नामांकन पत्र भरने के बाद वह पूरे भारत में कॉन्ग्रेस पार्टी के लिए प्रचार करेंगे।
रॉबर्ट वाड्रा ने रविवार (अप्रैल 7, 2019) को कहा कि वह अमेठी और रायबरेली में राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी के नामांकन भरते समय उनके साथ मौजूद रहेंगे। वह इन दोनों नेताओं के लोकसभा क्षेत्रों में जाकर चुनाव प्रचार भी करेंगे। राहुल गाँधी 10 अप्रैल को अमेठी में तो सोनिया गाँधी 11 अप्रैल को रायबरेली लोकसभा सीट से नामांकन पत्र दाखिल करेंगी।
कॉन्ग्रेस के लिए रॉबर्ट वाड्रा के चुनाव प्रचार में शामिल होने की खबर पर केंद्रीय वित्त मंत्री और वरिष्ठ भाजपा नेता अरुण जेटली ने कहा, “मुझे नहीं पता यह कॉन्ग्रेस के चुनाव प्रचार के लिए फायदेमंद होगा या फिर भाजपा के चुनाव प्रचार के लिए।” वहीं, अरुण जेटली के अलावा केंद्रीय कपड़ा मंत्री स्मृति ईरानी ने भी रॉबर्ट वाड्रा के इस ऐलान पर चुटकी ली है। स्मृति ईरानी ने वाड्रा के इस बयान पर टिप्पणी करते हुए कहा, “मैं इतना ही कहना चाहूँगी कि जहाँ-जहाँ रॉबर्ट वाड्रा प्रचार करने जाना चाहते हैं, वहाँ की जनता आगाह हो जाए और अपनी जमीनें बचा ले।”
वाड्रा की चुनाव प्रचार समिति में ये नेता हो सकते हैं
हमारे गुप्त सूत्रों से पता चला है कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने वाड्रा की अध्यक्षता में एक चुनाव प्रचार समिति भी गठित कर दी है। 10 जनपथ में सेंध लगाए ऑपइंडिया के गुप्त सूत्रों ने हमें एक लिस्ट भी भेजी है जिसमे वाड्रा की चुनाव प्रचार समिति के संभावित सदस्यों के नाम हैं। आगे हम आपको बताएँगे कि इस सूची में किन नेताओं के नाम हैं और उन्हें क्या ज़िम्मेदारियाँ सौंपी जाएँगी। साथ ही, उनको क्यों चुना गया, इसपर भी हम चर्चा करेंगे। सबसे पहले देर न करते हुए उस गुप्त सूची को निकाल कर दुनिया के सामने पेश करते हैं:
मणि शंकर अय्यर: मोदी को कॉन्ग्रेस की सभा में चाय बेचने की सलाह देकर ही मणि शंकर अय्यर वाड्रा की गुड बुक्स में आ गए थे। ऊपर से पाकिस्तान में मोदी को हराने की अपील कर तो मानो उन्होंने वाड्रा का दिल ही जीत लिया। गदगद वाड्रा ने उन्हें चुनाव प्रचार समिति का उपाध्यक्ष बनाया है। गुप्त सूत्रों ने बताया कि एक साल तक जब अय्यर कॉन्ग्रेस से निलंबित थे, तब उनका दाना-पानी वाड्रा ही चला रहे थे। भगवान राम के जन्म पर संदेह करने वाले अय्यर की वफादारी पर वाड्रा को कोई संदेह नहीं है।
नवजोत सिंह सिद्धू: वाड्रा ने सिद्धू को अपनी चुनाव प्रचार समिति की विदेश विंग का प्रमुख बनाया है। उन्हें पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान से उनके अच्छे संबंधों का फ़ायदा मिला। वो जल्द ही पाकिस्तान रवाना होंगे। इस्लामाबाद और रावलपिंडी में उनकी रैली प्रस्तावित भी हो चुकी है। जब सिद्धू ने सोनिया गाँधी का चरण स्पर्श किया था, तभी से वाड्रा उनके फैन हो गए थे।
जगदीश टाइटलर: जगदीश टाइटलर को वाड्रा अपने गुरु की तरह मानते हैं। शायद इसीलिए उन्हें चुनाव प्रचार समिति में रखा गया है। अदालतों और जाँच एजेंसियों का चक्कर लगाते-लगाते टाइटलर को क़ानून से बचने के सारे तरकीबों का ज्ञान हो चुका है और वाड्रा उनसे अक्सर सीखते रहते हैं। टाइटलर की दाढ़ी उन्हें एक इलीट लुक देती है और वाड्रा को इलीट लोग पसंद हैं।
दिग्विजय सिंह: दिग्गी राजा ने जबसे दूसरी शादी की है, तभी से वाड्रा को उनमें अच्छी काबिलियत नज़र आ रही है। पुरुषों एवं महिलाओं के बीच उनकी लोकप्रियता को देखते हुए दिग्विजय को इस चुनाव प्रचार समिति का मार्गदर्शक बनाया गया है। गुप्त सूत्रों ने विशेष जानकारी देते हुए कहा कि चुनाव प्रचार के दौरान वाड्रा की सारी सुख-सुविधाओं का ख्याल रखने की जिम्मेदारी भी दिग्विजय को ही दी गई है। मीनाक्षी नटराजन को ‘टंच माल’ कह चुके दिग्गी वाड्रा की समिति में टंच एंट्री लेंगे। दिग्विजय समय-समय पर वाड्रा को रिलेशनशिप सलाह देते रहते हैं।
कपिल सिब्बल: इन्हे वाड्रा की चुनाव समिति में इसीलिए रखा गया है ताकि अगर बीच में उनके ख़िलाफ़ अदालत से कोई समन वगैरह आता है तो स्थिति को संभाला जा सके। सुबह अनिल अम्बानी को गाली देकर दोपहर में उसी अनिल अम्बानी के लिए अदालत में पेश होने वाले सिब्बल वाड्रा की चुनाव प्रचार समिति के अकेले ऐसे सदस्य होंगे जो चुनाव प्रचार नहीं करेंगे क्योंकि उन्हें देखकर आदमी तो दूर, जानवर भी भाग जाते हैं। चुनावी दौरों में इन्हे बुर्के में रखा जाएगा।
इन सबके अलावा कुछ ऐसे नेता भी हैं, जिन्होंने वाड्रा की चुनाव प्रचार समिति में शामिल होने के लिए आवेदन तो दिया था लेकिन उन्हें रिजेक्ट कर दिया गया। शशि थरूर इस समिति में आना चाहते थे लकिन वाड्रा को उनकी अंग्रेजी से आपत्ति है। वाड्रा का मानना है कि देश की अधिकतर जनता उनकी तरह ही किसान है और किसान इतनी ज्यादा अंग्रेजी नहीं जानते। नरेंद्र मोदी को अनपढ़ और गँवार कह चुके संजय निरुपम के आवेदन को वाड्रा इसीलिए रिजेक्ट कर दिया क्योंकि उनका मानना है कि मोदी भले ही जो भी हों लेकिन वो भी उनकी ही तरह काफ़ी नीचे से ऊपर आए हैं। इसलिए ऐसे कमेंट्स का वाड्रा विरोध करते हैं।
वाड्रा की चुनाव प्रचार समिति का टैगलाइन होगी ‘मोदी के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसका देंगे!!‘
ज़मीन से जुड़े, ज़मीन-प्रेमी वाड्रा ने मोदी के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसकाने की ठान ली है।
वाड्रा धरती को माता मानते हैं। वो रोहित शेट्टी की ‘ज़मीन’ (2003) की एक सीडी हमेशा अपने पास रखते हैं, जो उनकी फेवरिट फ़िल्म है। हमारे गुप्त सूत्र दिग्वजय सिंह से वाड्रा के बारे में अन्य जानकारी निकलवाने में लगे हुए हैं।
भारतीय संस्कृति विश्व की सर्वाधिक प्राचीन और समृद्ध संस्कृतियों में से एक है। भारत को विश्व की सभी संस्कृतियों की जननी माना जाता है। अब इसमें चाहे जीने की कला हो या तकनीकी क्षेत्र का विकास हो या फिर राजनीति और समाजिक विकास ही क्यों न हो, इन सभी में भारतीय संस्कृति का हमेशा से ही एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है। भारतीय संस्कृति आज भी अपने परंपरागत अस्तित्व के साथ अजर-अमर बनी हुई है। तमाम कमियों (भौतिक) के बावजूद कुछ अच्छाइयाँ या यूँ कह लें कि यहाँ का जीवन-दर्शन ऐसा है कि भारत की सीमाओं से बाहर रहने वाले लोग एक न एक बार यहाँ आने के ख़्वाहिश पाले रहते हैं। कुछ तो आकर ऐसे घुल-मिल जाते हैं जैसे उनका कुछ नाता हो यहाँ से।
विल स्मिथ की भारत-यात्रा
हाल ही में हॉलीवुड के सुपरस्टार माने जाने वाले विल स्मिथ भारत आए थे। उन्होंने हरिद्वार जाकर पूजा-पाठ भी किया। उनका कहना है कि भारत आना उनके लिए बेहद सुखद अनुभव होता है। 50 वर्षीय स्मिथ ने भारत यात्रा से जुड़ी कई तस्वीरें इंस्टाग्राम पर पोस्ट की। अपनी तस्वीर शेयर करते हुए उन्होंने एक कैप्शन भी दिया, जिसमें उन्होंने लिखा, “मेरी दादी कहती थीं कि भगवान अनुभव के माध्यम से सिखाते हैं।” वो कहते हैं कि भारत की यात्रा और रंगों से उन्हें अपनी कला और दुनिया की सच्चाई को जानने के लिए एक नई समझ मिलती है।
हरिद्वार में पूजा करते विल स्मिथ
ख़बर के अनुसार, स्मिथ जल्द ही एक वेब सीरीज़ ‘बकेट लिस्ट’ में नज़र आने वाले हैं और इस सीरीज़ में वो अपनी भारत से जुड़ी सभी ख़्वाहिशों को पूरा करते नज़र आएँगे। भारत के प्रति उनका यह लगाव पहली बार नहीं है बल्कि वो पहले भी भारत के प्रति अपना लगाव जता चुके हैं।
जूलिया रॉबर्ट के लिए हिन्दू धर्म
ऐसी ही भावनाएँ हॉलीवुड अभिनेत्री जूलिया रॉबर्ट की भी हैं, जो हिन्दू धर्म से इतना प्रभावित थीं कि उन्होंने हिन्दू धर्म ही अपना लिया। इसके पीछे उन्होंने वजह बताई थी कि हिन्दू धर्म में शांति और सुकून है। दरअसल वो अपनी एक फ़िल्म ‘ईट प्रे लव’ की शूटिंग के लिए भारत आई थीं और वो तभी से हिन्दू बन गईं। ऑस्कर पुरस्कार विजेता जूलिया ने कहा था कि अब वह अपने कैमरामैन पति डेनियल मोडर और तीन बच्चों हैजल, फिनायस और हेनरी के साथ भजन-कीर्तन तथा प्रार्थना करने के लिए मंदिरों में जाती हैं। भारत की आध्यात्मिक शक्ति ने जूलिया को भारत का दीवाना बना दिया।
योग साधना में लीन जूलिया रॉबर्ट्स
जापान की मयूमी ने जब छोड़ दी थी जॉब
राजस्थान की कला और संस्कृति से दुनिया भली-भाँति परिचित है। यहाँ के महल और हवेलियों ने विदेशी पर्यटकों को हमेशा से ही अपनी ओर आकर्षित किया है। जापान की एक महिला मयूमी मारवाड़ के कालबेलिया डांस की ऐसी दीवानी हुईं की वो पिछले कई सालों से जोधपुर में नृत्य सीखने आ रही हैं। ख़बर के अनुसार, जोधपुर की एक बेटी ने मयूमी को अपने पारम्परिक नृत्य कला सिखाई।
जापान की मयूमी अब हैं कालबेलिया डांसर
मारवाड़ के कालबेलिया डांस को सीखने के बाद मयूमी जापान के टोक्यो और सपोरो शहर में कालबेलिया डांस सिखा रही हैं। अब तक वो कम से कम 50 जापानियों को मारवाड़ का यह नृत्य सिखा चुकी हैं। मयूमी को राजस्थान का यह डांस तो भाया ही, साथ ही उन्हें राजस्थानी कल्चर भी ख़ूब भाया। बता दें कि जोधपुर की कालबेलिया डांसर आशा ने मयूमी को कड़ी मेहनत और लगन से यह डांस और गाना सिखाया। मयूमी ने अपना ये शौक अपनी जापानी जॉब छोड़कर पूरा किया था। कालबेलिया डांस सीखने के बाद उन्होंने जॉब छोड़कर जापान के दो शहरों में कालबेलिया डांस की क्लास लेना शुरू कर दिया।
जॉर्ज हैरिसन: हरे कृष्ण आंदोलन और हिन्दू धर्म
जॉर्ज हैरिसन भी एक ऐसा ही नाम है, जिन्होंने 1960 के मध्य में हिन्दू धर्म को अपनाया था। पेशे से वो बीटल संगीतकार थे। साल 2001 में जब उनका देहांत हुआ था तो उनका अंतिम संस्कार हिन्दू परम्परा के अनुसार किया गया और उनकी अस्तियों को गंगा-यमुना नदी में प्रवाहित किया गया था। ख़बरों के अनुसार हैरिसन के बारे में कहा जाता है कि हरे कृष्णा आंदोलन से जुड़ने के बाद उन्होंने हिन्दू धर्म अपनाया था।
अपने जमाने के मशहूर बीटल बैंड वाले जॉर्ज हैरिसन रामनामी चादर ओढ़े
रसेल ब्रांड की हिन्दू शादी
हिंदू धर्म अपनाने वालों में एक नाम ब्रिटिश अभिनेता रसेल ब्रांड का भी है। पहले वो ड्रग्स के शिकार थे। हिंदू धर्म अपनाने के बाद उनकी यह लत छूट गई। वो हिंदू धर्म से इतना प्रभावित थे कि उन्होंने अपनी शादी भी हिंदू रीति-रिवाज़ से की थी। 23 अक्टूबर 2010 में उन्होंने राजस्थान के रणथंभोर टाइगर रिज़र्व में मशहूर सिंगर केटी पेरी से शादी रचाई थी। रसेल का कहना है कि हिंदू धर्म इंसान की आत्मा को मुक्ति की तरफ ले जाता है, जबकि दूसरे धर्म व्यक्ति को सांसारिक रूप से ग़ुलाम बनाने की कोशिश करते हैं। वो मंदिरों में जाकर घंटों ध्यान लगाते हैं और भगवान कृष्ण का भजन गाते हैं।
भारतीय होना अपने-आप में बड़े गर्व की बात है। यहाँ हर तरह की कला-संस्कृति को फलने-फूलने का एक समान अवसर मिलता है। यह गर्व की बात और बड़ी हो जाती है जब कोई विदेशी नागरिक भारत के संदर्भ में अपने उच्च विचार साझा करता है। ऐसे बहुत से विदेशी नागरिक हैं, जो भारतीय परंपराओं को सर्वोपरि मानते हैं और उसे आत्मसात करने का पूरा प्रयास करते हैं। हमारे देश की सभ्यता का गुणगान जब दूसरे देश के लोग करते हैं तो शायद ही ऐसा कोई भारतीय होगा जिसका सिर गर्व से ऊँचा नहीं उठेगा।
भगौड़े विजय माल्या को लंदन के कोर्ट से एक बड़ा झटका मिला है। लन्दन के उच्च न्यायलय ने सोमवार (अप्रैल 8, 2019) को प्रत्यर्पण के ख़िलाफ़ दी गई माल्या की अर्जी को खारिज कर दिया है।
माल्या की ओर से इस याचिका को 5 अप्रैल को दाखिल किया गया था। लिखित अपील को कोर्ट के खारिज करने के बाद माल्या को मौखिक कार्रवाई के लिए आधा घंटे का मौका दिया जाएगा। बता दें कि विजय माल्या ने ब्रिटेन के गृह सचिव साजिद जाविद के उस निर्णय के खिलाफ याचिका दायर की थी जिसमें उन्होंने माल्या को भारत प्रत्यर्पित करने की इज़ाजत दे दी थी।
UK Court rejected on April 5 the plea of Vijay Mallya against his extradition order. (File pic) pic.twitter.com/ag2mVpM7ZX
गौरतलब है वेस्टमिंस्टर की मजिस्ट्रेट अदालत ने 9 दिसंबर 2018 को 62 वर्षीय माल्या के भारत में प्रत्यर्पण का आदेश दिया था जिसके बाद पाकिस्तान मूल के मंत्री जाविद को यह मामला भेजा गया। उन्हें मामला भेजने के दो महीने के भीतर इसपर फैसला लेना था। फरवरी में यूके के गृह मंत्रालय ने घोषणा की कि जाविद ने माल्या के प्रत्यर्पण पर हस्ताक्षर कर दिए हैं।
#BREAKING | UK court rejects Vijay Mallya’s plea against extradition order passed by Westminster court. Tune in to watch LIVE here- https://t.co/LGCyJUEBn5
ब्रिटिश कोर्ट के प्रत्यर्पण वाले आदेश के बाद माल्या भारत के बैंकों से लिए ऋण का मूल धन वापस करने की पेशकश भी कई बार कर चुके हैं। खुद को बचाने के लिए कहा है कि वो उधार ली हुई मूल राशि का 100 प्रतिशत लौटाने को तैयार हैं। माल्या द्वारा दी याचिका को खारिज करने के बाद माना जा रहा है कि उनका प्रत्यर्पण जल्दी ही भारत हो सकता है।
₹9000 करोड़ से ज्यादा का ऋण न चुकाने और मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में माल्या के प्रत्यर्पण के लिए भारतीय एजेंसियाँ काफ़ी लंबे समय समय से इंतजार कर रहीं हैं। बैंक का पैसा लेकर विदेश भागे माल्या को PMLA कोर्ट ने भगोड़ा घोषित किया था।
जैसे-जैसे चुनाव की तारीख़ नज़दीक आ रही है, ज़बानी हमले भी तेज हो रहे हैं। नेता एक दूसरे के खिलाफ जमकर ज़बानी हमले कर रहे हैं, लेकिन कभी-कभी इसको लेकर भाषाई मर्यादा का भी ख्याल नहीं रखा जाता है। कुछ राजनेता अपनी ज़बान पर संयम नहीं रख पाते हैं और विपक्षी नेता पर आपत्तिजनक बयान दे देते हैं।
तृणमूल कॉन्ग्रेस अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कूचबिहार की एक रैली में पीएम पर ज़बानी वार किए। ममता बनर्जी ने रैली में प्रधानमंत्री मोदी को सत्ता और राजनीति से बाहर निकालने की बात कही। इतना ही नहीं, उन्होंने तो यहाँ तक कह दिया कि मोदी के मुँह को चिपकने वाले सर्जिकल टेप से चिपका देना चाहिए। ममता ने कहा, “इस चुनाव में लोग उनके होठों पर ल्यूकोप्लास्ट चिपका देंगे ताकि वे झूठ ना बोल पाएँ। देश की खातिर उन्हें ना केवल कुर्सी (प्रधानमंत्री पद) बल्कि राजनीति से भी बाहर करना चाहिए।”
West Bengal CM Mamata Banerjee in Cooch Behar: Did PM even give a single penny for West Bengal? The person who makes such big claims must see what he has contributed towards Bengal.He was busy in foreign tours for five years and now he saw the need to come here pic.twitter.com/9PiM0y4Z7F
उन्होंने पीएम पर आरोप लगाते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने बंगाल को कोई मदद नहीं दी क्योंकि मोदी के पास किसानों और मध्य वर्ग की समस्याओं पर ध्यान देने का वक़्त नहीं था। वो अपने 5 साल के कार्यकाल में साढ़े चार साल दुनिया घूमने में ही व्यस्त रहे। ममता यही नहीं रुकीं, उन्होंने आगे कहा, “भारत में विभिन्न धर्मों के लोग मिल-जुलकर रहते हैं लेकिन पीएम मोदी ये कैसे जानेंगे? क्योंकि उनका परिवार ही नहीं है और ना ही वो आप लोगों को परिवार मानते हैं।” इसके साथ ही ममता ने नोटबंदी और किसानों की आत्महत्या को लेकर भी पीएम मोदी पर टिप्पणी की।
West Bengal CM Mamata Banerjee at a public rally in Cooch Behar: In India we have seen large families consisting of people from different religions staying together, but how would he(PM Modi) know? He neither has his own family nor he thinks of you people as his family pic.twitter.com/TuKfH3uKrN
गौरतलब है कि ममता बनर्जी ने कुछ दिनों पहले पीएम मोदी के वैवाहिक जीवन और पत्नी से उनके संबंध पर कटाक्ष किया था। अलीपुरदुआर संसदीय क्षेत्र के बारोबिसा में चुनावी सभा के संबोधित करते हुए ममता ने कहा था कि जो अपनी पत्नी का देखभाल नहीं कर सकता, वो देश के नागरिकों की क्या देखभाल करेगा? इससे पहले ममता बनर्जी मोदी को ‘तुगलक का दादा’ और ‘हिटलर का चाचा’ से लेकर ‘दंगाई’, ‘लुटेरा’ और ‘ख़ूनी’ तक कह चुकी हैं।
‘द ताशकंद फाइल्स’ 12 अप्रैल को रिलीज होने वाली है लेकिन ऑपइंडिया आपको 4 दिन पहले ही फ़िल्म की समीक्षा से रूबरू करा रहा है ताकि आपको फ़िल्म के बारे में सब कुछ पता चल जाए। ध्यान दें, ये कोई स्पॉइलर नहीं है, यहाँ फ़िल्म की कहानी नहीं बताई जाएगी बल्कि सिर्फ़ उसके कंटेंट के बारे में चर्चा की जाएगी। दिल्ली में हुई फ़िल्म की पहली स्क्रीनिंग के दौरान निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने वो कहानी दुहराई, जिसमें उन्होंने बताया था कि कैसे अच्छे स्कूल में पढ़ने वाले उनके बेटे को शास्त्रीजी के बारे में कभी नहीं बताया गया। विवेक अग्निहोत्री ने कहा कि इस फ़िल्म के लिए किसी प्रोड्यूसर के पास जाते, तो उन लोगों का एक ही जवाब होता- “यार, आज की जेनेरेशन में शास्त्रीजी को लेकर कौन इंटरेस्टेड है? युवा नहीं देखेगा। बोरिंग टॉपिक है।” खैर, फ़िल्म बनी और रिलीज होने को भी तैयार है।
‘द ताशकंद फाइल्स’: एक परिचय
अगर आपको नहीं पता हो तो बता दें कि ‘द ताशकंद फाइल्स’ भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के निधन/हत्या के पीछे का पर्दा उठाने की कोशिश करती है। फ़िल्म शास्त्रीजी की मृत्यु की गुत्थी सुलझाने के क्रम में भारत से लेकर रूस तक भ्रमण कराती है। फ़िल्म की शुरुआत एक डॉक्यूमेंट्री की तरह होती है, जिसे देख कर आपको सत्यजीत रे की ऐसी फ़िल्मों की याद आ जाएगी, जिसमें वो कमर्शियल एलिमेंट्स को धता बताकर अपनी फ़िल्मों में संवाद प्रयोग किया करते थे। जहाँ ज़रूरी हो वहाँ पात्र अंग्रेजी में ही बोला करते थे। अगर आपने ‘शतरंज के खिलाड़ी’ देख रखी है तो सत्यजीत रे की इस कला को आप भलीभाँति पहचानते होंगे।
विवेक अग्निहोत्री ने अंग्रेजों और रशियन पात्रों से जबरदस्ती टूटी-फूटी हिंदी नहीं बुलवाई है, सबटाइटल्स का सहारा लिया गया है। अजीब तरीके से हिंदी बोलते हुए विदेशी पात्र शायद ही आपको इस फ़िल्म में नज़र आएँ। फ़िल्म में जहाँ मिथुन चक्रवर्ती और नसीरुद्दीन शाह जैसे अनुभवी और वरिष्ठ कलाकार हैं तो पंकज त्रिपाठी के रूप में आज के दर्शकों के बीच लोकप्रिय हो रहा एक ऐसा चेहरा भी है, जो समय-समय पर एक गंभीर फ़िल्म में भी अपनी कॉमिक टाइमिंग से रोचकता बनाए रखता है। प्रकाश बेलवाड़ी और राजेश शर्मा जैसे सिनेमा के जाने-पहचाने चेहरे भी इस फिल्म में हैं। अगर आपने एयरलिफ्ट देख रखी है तो प्रकाश से अच्छी तरह परिचित होंगे। वहीं दूसरी तरफ अगर आपने ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ देखी होगी तो राजेश शर्मा के भी आप कायल हो चुके होंगे।
उपर्युक्त दोनों ही फ़िल्में सुपरहिट थी। अगर ‘द ताशकंद फाइल्स’ की बात करें तो इसमें अपना किरदार निभाने के लिए सभी अभिनेताओं ने मेहनत की है, जो कि दिखती है। अपने जमाने में एक्शन सुपरस्टार रहे मिथुन द्वारा ऐसे किरदार चुनना और उसे निभाना उन्हें तारीफ का पात्र बनाता है। इस फ़िल्म में डाक्यूमेंट्री वाली स्टाइल का सहारा लिया गया है, जैसा बीबीसी वाले अपनी सीरीजों में करते हैं। वैसे हमारा मानना है कि अगर ये फ़िल्म नेटफ्लिक्स जैसी वेब पोर्टल्स पर आए तो इसे दर्शकों के एक बड़े वर्ग तक पहुँचाया जा सकता है। आगे हम फ़िल्म का निर्देशन और स्क्रिप्ट की बात करेंगे।
निर्देशन, स्क्रिप्ट और सिनेमैटोग्राफी
विवेक अग्निहोत्री की पहले की फ़िल्मों को देखकर विश्वास नहीं होता कि ये फ़िल्म उन्होंने ही निर्देशित की है। जहाँ एक तरफ ‘चॉकलेट (2005)’ एक तेज़ सस्पेंस थ्रिलर की तरह बुनने की कोशिश की गई थी, वहीं रिवेंज ड्रामा ‘हेट स्टोरी (2012)’ में शायद कुछ ज्यादा ही ड्रामा था। 2014 में आई ‘ज़िद’ की बात ही न करें तो अच्छा है क्योंकि उसे क्यों बनाया गया था, इसे हम भी आज तक सोच रहे हैं। हाँ, ‘बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम (2014)’ से विवेक अग्निहोत्री ने बुद्धिजीवियों से लेकर युवाओं तक के बीच अपने निर्देशन का लोहा मनवाया। फ़िल्म अच्छी चली, चर्चा में आई और वास्तविक मुद्दों पर हाल के दिनों में सबसे बढ़िया फ़िल्मों में से एक है।
‘द ताशकंद फाइल्स’ में आपको दिल्ली की अच्छी-ख़ासी झलक दिखेगी। दिल्ली मेट्रो की आपाधापी और दिल्ली की सड़कों पर सुबह जॉगिंग करतीं अभिनेत्री श्वेता बासु प्रसाद, ये सभी दृश्य फ़िल्म को जीवंत बनाते हैं। फ़िल्म में अभिनेत्री श्वेता ने एक युवा पत्रकार का किरदार निभाया है और आपको बता दें कि उन्हें फ़िल्म में भी दिल्ली मेट्रो में सीट नहीं मिलती। अगर रात का समय हो तो वो सीट लेने में कामयाब हो जाती हैं। निर्देशक के तौर पर विवेक ने छोटी-मोती बातों का ध्यान रखा है। व्हीलचेयर पर बैठी पल्लवी जोशी (जो कि एक इतिहासकार का किरदार निभा रही हैं) या फिर कंठ में एक ख़ास इंस्ट्रूमेंट लगाकर बोलता बख़्शी, इन सबके पीछे विवेक की मेहनत आपको फ़िल्म देखने पर ही पता चलेगी।
फ़िल्म का नाम और थीम देखकर बहुत लोगों को ऐसा आभास हो सकता है कि ये फ़िल्म धीमी होगी, ड्रैग करेगी, स्लो स्पीड वाली होगी लेकिन इतना गंभीर मुद्दा उठाने और उसकी तह तक जाने के बावजूद फ़िल्म धीमी नहीं है। चीजें नियंत्रित तरीके से आगे बढ़ती हैं और दृश्य दर दृश्य घटनाक्रम आपको बोर नहीं करते। पत्रकारों के केबिन को कम्प्यूटर सिस्टम्स के साथ दिखाया गया है। मिथुन चक्रवर्ती जो कि एक नेता का किदार निभा रहे हैं, उनके बेढंगे बाल और बेढंगी धोती से किरदार में वास्तविकता लाने की कोशिश की गई है।
आजकल के कॉप थ्रिलर्स के कुछ मसाले भी फ़िल्म में प्रयोग किए गए हैं। हमने सिंघम में देखा था कि कैसे गुंडों द्वारा किसी को परेशान किया जाता है। उसमे सिंघम के घर की बत्ती बुझा दी जाती है, उसके घर के आसपास रात में कुछ संदिग्ध लोग दिखते हैं, इत्यादि। ‘द ताशकंद फाइल्स’ में भी ऐसे कुछ तत्वों का सहारा लिया गया है। जब फ़िल्म भारत से रूस पहुँचती है तो आपको ऐसा महसूस होगा जैसे कोई सस्पेंस थ्रिलर चल रही हो। कुछ ही पलों के लिए सही लेकिन आपको ‘चॉकलेट’ की झलक दिख ही जाती है। कुल मिलाकर स्क्रिप्ट बढ़िया है, कहानी सही तरीके से बनाई गई है और निर्देशन के पीछे मेहनत की गई है।
सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा: फ़िल्म का थीम
फर्स्ट हाफ में लाल बहादुर शास्त्री के प्रति इंटरेस्ट जगाने की कोशिश की गई है। उनकी आवाज़, उनका पार्थिव शरीर, उनके ओरिजिनल फुटेज और उनकी मृत्य के पीछे का रहस्य, इन सबके पीछे क्या है? आज के युवाओं को कुछ दिखाने के लिए पहले उसके बारे में इंटरेस्ट जगाना होता है और विवेक ने ये काम बख़ूबी किया है। शास्त्रीजी की समाधि के कुछ दृश्य हैं जो आपको अभिभूत कर देंगे। सीआईए, केजीबी, भारत सरकार, इतिहासकारों और मीडिया के बीच फँसे इस रहस्य को कैसे निकालने की कोशिश की गई है, ये आप फ़िल्म देखकर जानेंगे। सबसे बड़ी बात यह कि फ़िल्म में इतिहास है, आज की भी कहानी है जो शास्त्रीजी की प्रासंगिकता के बारे में चर्चा करती है।
ये सब तो थी तकनीकी बातें। अब आपको फ़िल्म की थीम बताते हैं, कहानी के कोई भी अंश का ख़ुलासा किए बिना। विवेक अग्निहोत्री ने अपने पुत्र को लेकर जो बातें कही, वो फ़िल्म में उन्होंने मंदिरा बेदी (सामाजिक कार्यकर्ता) के मुँह से कहवाई है। फ़िल्म की रिलीज के बाद पंकज त्रिपाठी का सेकुलरिज्म वाला डायलॉग (जिसका कुछ अंश ट्रेलर में भी दिखाया गया है) सोशल मीडिया पर वायरल होगा – यह पक्का है। लेकिन, आतंकवाद और उसके विभिन्न प्रकारों की परिभाषा सहित व्याख्या जो मिथुन चक्रवर्ती के किरदार द्वारा दी गई है, उसे हम फ़िल्म का सबसे पसंदीदा और व्यापक असर डालने वाला दृश्य रेट करेंगे। इस दृश्य में मिथुन चक्रवर्ती ने देश के करोड़ों लोगों के मन की बात एक झटके में कह डाली है। इस बारे में विशेष आप फ़िल्म देखकर ही जान पाएँगे।
कुल मिलकर देखें तो आतंकवाद और सेकुलरिज्म पर विवेक जो कहना चाहते थे, उन्होंने उसे कहने में सफलता पाई है। अगर आपको लगता है कि ये केवल राइट विंग की फ़िल्म है तो आपको उस दृश्य का इन्तजार करना चाहिए, जिसमें मिथुन चक्रवर्ती पंकज त्रिपाठी से कुछ कहते हैं। उसके बाद आपको पता चलेगा कि फ़िल्म को सिर्फ़ और सिर्फ किसी विचारधारा विशेष को प्रोमोट करने के लिए नहीं बनाया गया है। सामाजिक कार्यकर्ता मंदिरा बेदी के किरदार पर इतिहासकार पल्लवी जोशी और इमरान क़ुरैसी के किरदार द्वारा कुछ महिला-विरोधी कमेंट किए जाते हैं, जिसके बाद के दृश्यों को देखकर आपको लगेगा कि विवेक ने काफ़ी अच्छी तरह से इन समस्याओं को भी सामने रखा है।
अगर आपने 1957 की ऑस्कर जीतने वाली हॉलीवुड फ़िल्म ’12 एंग्री मेन’ देख रखी है तो फ़िल्म में बहस के दौरान आपको उसकी कुछ झलक दिखेगी। फ़िल्म के बहस वाले दृश्य ज़ोरदार हैं, तर्कसंगत हैं और तथ्यों पर बात करते हैं। सारे किरदार एक सा नहीं सोचते, वे एक-दूसरे की बात से सहमत नहीं होते बल्कि एक-दूसरे को तथ्यों व फैक्ट्स से काटते हैं। फ़िल्म एक पक्ष को नहीं रखती बल्कि सभी पक्षों को बराबर मौक़ा देती है।
एक्टिंग और किरदार
मिथुन चक्रवर्ती के जो पुराने फैंस हैं, उन्हें शायद पता होगा कि वे अपने करियर की ऊँचाई के दिनों में भी रामकृष्ण परमहंस जैसे चुनौतीपूर्ण किरदार सफलतापूर्वक निभा चुके हैं। इस फ़िल्म में आपको कुछ दृश्यों में पुराने ‘विंटेज मिथुन’ की झलक दिखेगी। एक बंगाली नेता के रूप में उन्होंने अपने हाव-भाव में थोड़ी नाटकीयता तो लाई है लेकिन उनकी संवाद अदाएगी का स्टाइल ही यही है। नसीरुद्दीन शाह और उनका कुत्ता, दोनों ने ही ठीक-ठाक एक्टिंग की है। वो अभी भी ओंकारा हैंगओवर में ही जी रहे हैं। कुटिल गृहमंत्री का उनका किरदान रटा-रटाया है, इसमें कुछ भी नया नहीं है।
पंकज त्रिपाठी, राजेश शर्मा और प्रकाश बेलवाड़ी इस फ़िल्म के बहस वाले हिस्सों में ख़ासे प्रभावी रहे हैं। उनके बिना शायद ही इस फ़िल्म में जीवंतता की कल्पना की जा सके। यहाँ पल्लवी जोशी को स्पेशल मेंशन देना पड़ेगा क्योंकि उनका व्हीलचेयर पर बैठी इतिहासकार वाला किरदार चुनौतीपूर्ण था। शायद विवेक ने जेएनयू में ऐसे किसी इतिहासकार को देखा होगा, जिन पर पल्लवी का किरदार आधारित है। एक दायरे में रहकर एक्टिंग करना आपको बाँध देता लेकिन उन्होंने अपनी संवाद-अदाएगी से प्रभावित किया है।
फ़िल्म की मुख्य अभिनेत्री श्वेता बासु प्रसाद ने दिखाया है कि वो इस जेनेरेशन की कई अभिनेत्रियों से बेहतर है और इमोशनल दृश्यों में वो ख़ासी प्रभावी रही हैं। ख़ासकर, नशे वाली हालत में और शास्त्रीजी के समाधी वाले दृश्य में, इन दोनों में ही उनकी एक्टिंग शानदार है। फ़िल्म के क्लाइमैक्स में उनका प्रदर्शन शानदार है। कई दृश्यों में वो काफ़ी सुन्दर भी लगी हैं।
‘द ताशकंत फाइल्स’: अंतिम वर्डिक्ट
‘द ताशकंद फाइल्स’ आज के युवाओं को देखनी चाहिए। फ़िल्म में सच्चाई से कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है। ज्यादा ड्रामा दिखाने के चक्कर में तथ्यों को तोड़ा-मरोड़ा नहीं गया है। ये कोई डॉक्यूमेंट्री नहीं है बल्कि फ़िल्म के कुछ दृश्य ‘इंफॉर्मेटिव डॉक्यूमेंट्रीज’ की याद दिलाते हैं। इस फ़िल्म को थिएटर में देखें, शास्त्रीजी के लिए, निर्देशक व अभिनेताओं की मेहनत के लिए, सच्चाई की खोज के लिए और उस खोज को दिखाने में ईमानदारी के लिए। यह एक बहादुरी भरा प्रयास है, जिसकी सराहना होनी चाहिए।
किसी वास्तविक मुद्दे पर बिना ज्यादा ड्रामा ठूँसे ऐसी रोचक फ़िल्म हाल के दिनों में तो नहीं ही बनी है। निर्देशक विवेक अग्निहोत्री इसके लिए बधाई के पात्र हैं। जैसा कि हमने पहले ही कहा, इसे किसी बड़े वेब पोर्टल पर भी रिलीज करनी चाहिए ताकि ये दर्शकों के एक बड़े वर्ग तक पहुँचे।