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भारत में 1 सप्ताह में बनाए 1 लाख ईसाई: अमेरिकी पादरी का दावा, कहा- मोदी-RSS के कारण धर्मांतरण अब आसान नहीं

एक अमेरिकी पादरी ने दावा किया है कि मात्र एक सप्ताह में भारत में मिशनरियों ने 1 लाख हिन्दुओं का इसे धर्मांतरण कराया है। YouTube पर 10 महीने पहले अपलोड किए गए उक्त वीडियो में उस पादरी को ये कहते हुए सुना जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कारण उत्तर भारत में धर्मांतरण कठिन हो गया है। क्रिस हॉजेज नाम का उक्त पादरी ‘चर्च ऑफ हाइलैंड्स’ से जुड़ा हुआ है जिसकी शाखाएँ अल्बामा और पश्चिमी जॉर्जिया में हैं।

वो अपने परिवार के साथ बर्मिंघम में रहता है। उसने वीडियो में कहा कि मिशनरीज ने बताया है कि दुनिया का वो हिस्सा जहाँ लोग सबसे ज्यादा दिग्भ्रमित हैं वो उत्तर भारत है। उसने दावा किया कि भारत का दक्षिणी हिस्सों का बड़े स्तर पर ईसाईकरण हुआ है। उसने कहा कि ईसाई धर्मांतरण के मामले में पिछले 10 वर्षों में भारत में बहुत दिक्कतें आ रही हैं। साथ ही उसने कई NGO की विदेशी फंडिंग के लाइसेंस रद्द किए जाने का रोना रोते हुए कहा कि भारत के प्रधानमंत्री ने कई मिशनरी संस्थाओं को भगा दिया है।

साथ ही उसने इससे भी नाराज़गी जताई कि भारत में पूरा का पूरा संगठन 100% लोगों को हिन्दू बनाने में लगा हुआ है। पादरी इस वीडियो में कहता है कि हमें भारत के और दुनिया भर के ईसाइयों को लेकर प्रार्थना करने की ज़रूरत है, क्योंकि उन पर अत्याचार हो रहे हैं और रोज कोई न कोई ईसाई मर रहा है। पादरी क्रिस हॉजेज इस वीडियो में कहता दिख रहा है कि RSS सिर्फ ईसाइयों को निशाना बना कर उन्हें खत्म करने में लगा हुआ है, जो दुखद है। उसने दावा किया कि मिशनरियों की 3931 टीमें 15 उत्तर भारतीय राज्यों में सक्रिय हैं।

उक्त पादरी ने इस दौरान इसका भी खुलासा कर दिया कि कैसे शैतान का डर दिखा कर इसे धर्मांतरण के लिए हथियार के रूप में इस्तेमाल में लाया जा रहा है। किसी व्यक्ति पर से शैतान को भगाने पर पूरा गाँव खुश होता है, इन तिकड़मों का भी उसने बखान किया। उसके खुलासों की मानें तो असल में ये ‘जिन व्यक्तियों पर शैतान सवार होता है’, उन्हें गाँवों में मिशनरियों द्वारा भेजा जाता है और फिर आतंकित गाँव वालों को उस से छुटकारा दिला कर पादरी ‘मसीहा’ बन जाते हैं, फिर धर्मांतरण कराते हैं।

उसने उदाहरण दिया कि एक महिला के ऊपर से ‘शैतान को हटाने’ के बाद 150 परिवार इतने खुश हुए कि उन्होंने ईसाई मजहब अपना लिया। साथ ही उसने बाइबिल का जिक्र भी किया कि गॉड अपने लोगों को मुसीबत में मदद करता है। इसी दौरान उसने भारत में 1 सप्ताह में 1,12,224 लोगों के धर्मांतरण की बात कही। बता दें कि पादरियों के कार्यक्रमों में ‘आरारारा’ और ‘मेरा येशु-येशु’ कह कर नाचते हुए लोगों के फनी वीडियोज अक्सर सामने आते हैं। एक महिला को तो इस तरह से किडनी ठीक किए जाने का दावा तक किया गया था।

याद दिलाते चलें कि बाइबिल का हर भाषा में अनुवाद करने के मिशन पर काम कर रही संस्था ‘अनफोल्डिंग वर्ल्ड’ के CEO डेविड रीव्स ने कहा था कि भारत में कोरोना महामारी के दौरान उतने चर्चों का निर्माण हुआ, जितने पिछले 25 सालों में हुआ था। रीव्स ने इसके बाद बड़ा दावा किया था कि महामारी के दौरान 1 लाख लोगों का ईसाई धर्मांतरण किया गया। उन्होंने बताया कि हर चर्च को 10 गाँवों में प्रार्थना आयोजित करने को कहा गया। उसने बताया कि इस दौरान 50,000 गाँवों तक पहुँच बनाई गई है।

मोहम्मद अकील का ढाबा, रोटियों पर थूकता कारीगर आदिल: चंडीगढ़ से सामने आया वीडियो, पुलिस ने बंद करवाया ढाबा

सोशल मीडिया पर चंडीगढ़ का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो एक ढाबे का है जहाँ खाना बना रहा एक व्यक्ति रोटियों पर थूकता जैसा नजर आ रहा है। आरोपित का नाम नाम मोहम्मद आदिल है। ऑपइंडिया से बात करते हुए ढाबा मालिक ने बताया कि जनता नाराज हो कर उनके ढाबे पर आई थी। फिलहाल ढाबे को बंद करवाया दिया गया है। वीडियो 6 माह पुराना बताया जा रहा है जो 8 जुलाई (शनिवार) से वायरल हो रहा है।

यह वीडियो पश्चिमी चंडीगढ़ के पिंड 38 क्षेत्र का है जिसे @ajaychauhan41 नाम के हैंडल ने रविवार (9 जुलाई, 2023) को शेयर किया है। कार के अंदर बैठ कर बनाए गए इस वीडियो के बोर्ड में बोर्ड में दुकान का नाम ‘दिल्ली दरबार ढाबा’ दिख रहा है। वीडियो बना रहा व्यक्ति पंजाबी भाषा में लोगों से रोटी बना रहे व्यक्ति की करतूत देखने के लिए कहता है। वायरल वीडियो में खाना बना रहे व्यक्ति ने लाल रंग की मज़हबी टोपी पहन रखी है। वह रोटियों को हाथ से आकार देने के बाद अपना मुँह उसके पास ले जाता दिख रहा है।

वीडियो बनाने वाले ने खाने के कारीगर पर रोटियों पर थूकने का आरोप लगाया है। इसे शेयर करने वाले हैंडल ने भी थूक जिहाद नाम की हेडलाइन दी है। नेटीजेंस ने इस कारीगर पर पर नाराजगी जताई है।

ढाबा मालिक अकील, कारीगर आदिल

‘दिल्ली दरबार’ नाम के इस ढाबे के मालिक का नाम मोहम्मद अकील है। ऑपइंडिया से बात करते हुए अकील ने खुद को दिल्ली का रहने वाला बताया। अकील के मुताबिक, वीडियो को किसी ने 6 माह पहले ही बना लिया था जिसे साजिशन 2 दिनों पहले वायरल किया गया है। हालाँकि ढाबा मालिक उस साजिशकर्ता का नाम नहीं बता सके। जिस व्यक्ति पर रोटियों पर थूकने का आरोप है अकील ने उसका नाम मोहम्मद आदिल और उसे मूल रूप से UP के मेरठ का रहने वाला बताया। हालाँकि, ढाबा मालिक का दावा है कि आदिल 4 माह पहले ही नौकरी छोड़ कर जा चुका है।

खाने पर थूके जाने के सवाल पर ढाबा मालिक ने इसे थूक नहीं बल्कि फूँक बताया। अकील का कहना है कि वीडियो वायरल होने के बाद नाराज लोगों की भीड़ उसके ढाबे पर आई और बंद करवा कर चली गई। अकील ने आगे बताया कि पुलिस उनसे आदिल को लाने के लिए कह रही है। उन्होंने कहा कि उनकी दुकान पर नॉनवेज खाने की तमाम वैराइटी उपलब्ध थी पर अब इस घटना के बाद उनका बंद ढाबा फिर कब चलेगा इसकी उनको कोई जानकारी नहीं है।

पुलिस ने जाँच के दौरान पाया कि ये वीडियो 6 महीने पुराना है। ऑपइंडिया से बात करते हुए मलोया पुलिस थाने के SHO जसपाल सिंह ने कहा कि मामले के सामने आने के बाद वो स्थिति को शांत करने के लिए उक्त ढाबा गए थे। ढाबा को कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए फ़िलहाल बंद कर दिया गया है। ढाबा अभी बंद है।

‘जैन मुनि के हत्यारों को बचा रही कॉन्ग्रेस’: कर्नाटक सरकार का CBI जाँच से इनकार, जैन समाज का प्रदर्शन, VHP ने कहा – हत्यारों को दी जाए फाँसी

कर्नाटक के बेलगावी जिले में दिगंबर जैन मुनि कामकुमार नंदी महाराज की हत्या कर दी गई थी। हत्या की CBI जाँच कराने की माँग हो रही है। लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार ने सीबीआई जाँच की माँग को ठुकरा दिया। इस मामले में BJP ने कॉन्ग्रेस पर तुष्टिकरण की राजनीति करने और आरोपितों को बचाने का आरोप लगाया है। वहीं, इस हत्या को लेकर VHP भी राज्य सरकार पर हमलावर है।

जैन मुनि कामकुमार नंदी महाराज की हत्या के मामले में आरोपितों की गिरफ्तारी और मामले की सीबीआई जाँच कराने के लिए जैन संत विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। दूसरी ओर भाजपा भी सीबीआई जाँच कराने की माँग कर रही है। लेकिन कॉन्ग्रेस सरकार सीबीआई जाँच कराने से इनकार कर रही है। कर्नाटक के गृह मंत्री जी परमेश्वर ने कहा है कि पुलिस ही इस मामले को सुलझा देगी। इसलिए सीबीआई जाँच की आवश्यकता नहीं है।

गृह मंत्री ने मीडिया से बात करते हुए कहा है, “जाँच प्रक्रिया में किसी भी तरह के भेदभाव का सवाल ही नहीं उठता। हमारी पुलिस इस मामले में शामिल सभी लोगों को गिरफ्तार करेगी और कानूनी कार्रवाई की जाएगी। मैं हुबली में विरोध प्रदर्शन कर रहे जैन भिक्षुओं से मिला हूँ उन्होंने मामले की सीबीआई जाँच कराने की माँग की है। मुझे नहीं लगता कि इस मामले में सीबीआई की जरूरत है। कर्नाटक पुलिस आरोपितों को गिरफ्तार करने और मामले को सुलझाने में सक्षम है।”

वहीं केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने कॉन्ग्रेस सरकार पर तुष्टिकरण की राजनीति करने और आरोपितों को बचाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा है, “जैन मुनि की हत्या बेहद निंदनीय है। इस मामले की शुरुआत में आरोपितों के नाम छुपाए गए। लोगों पर दबाव डालकर यह कहने के लिए मजबूर किया गया कि जैन मुनि पैसों के लेनदेन में शामिल थे। यह दिखाने की कोशिश की गई है कि आर्थिक कारणों से जैन मुनि की हत्या हुई है। इसमें ऐसा संदेह है कि आरोपितों को बचाने का प्रयास हो रहा है। मुझे लगता है कि यह तुष्टिकरण की राजनीति की पराकाष्ठा है। जनता और जनप्रतिनिधियों के दबाव के बाद कर्नाटक सरकार एक्टिव हुई है। इस मामले के आरोपितों को कड़ी से कड़ी सजा होनी चाहिए।”

विश्व हिंदू परिषद ने की आरोपितों को फाँसी देने की माँग

विश्व हिंदू परिषद के केंद्रीय महा मंत्री मिलिंद परांडे ने इस घटना की कड़ी निंदा करते हुए कहा है, “दुनिया को अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले पूज्य जैन आचार्य का अपहरण और उसके बाद जिहादियों द्वारा उनके पवित्र शरीर के टुकड़े-टुकड़े करना राज्य में कॉन्ग्रेस सरकार की हिंदू विरोधी नीतियों का परिणाम है। जैन मुनि पिछले 15 वर्षों से आनंद पर्वत पर रहकर स्थानीय समाज की सेवा कर रहे थे। प्रदेश की नई सरकार के मंत्री गोहत्या विरोधी और धर्मांतरण विरोधी कानून हटाने की बात कर रहे हैं। इसके बाद से ही धर्म द्रोही और राष्ट्र विरोधी ताकतों का दुस्साहस बढ़ गया है।”

उन्होंने यह भी कहा है, “समाज में कलंक बने इन आरोपितों पर अंकुश लगाकर आरोपितों और उनके साथियों को जल्द से जल्द फाँसी की सजा दी जानी चाहिए। सरकार की हिंदू विरोधी नीति के कारण राज्य में साधु और समाज के लोग सुरक्षित नहीं हैं। इस्लामिक जिहादी व कट्टरपंथी छुट्टे घूम रहे हैं। कॉन्ग्रेस सरकार को हिंदू जैन समाज से माफी माँगते हुए अपनी हिंदू द्रोही मानसिकता से बाहर आना चाहिए।”

बताा दें कि बेलगाम जिले के चिक्कोड़ी इलाके में जैन मुनि 108 कामकुमार नंदी जी महाराज नंदी पर्वत आश्रम में पिछले 15 वर्षों से रह रहे थे। गुरुवार (6 जुलाई, 2023) को नंदी महाराज अचानक लापता हो गए। उनके शिष्यों ने पहले उन्हें अपने स्तर से खोजने का प्रयास किया लेकिन वो नहीं मिले। आखिरकार आश्रम के शिष्यों ने पुलिस में नंदी महराज की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवाई। इसके बाद पुलिस की छानबीन में उनके शव में कुछ टुकड़े बरामद हुए। बाद में उनका अंतिम संस्कार जैन मठों के महास्वामी के नेतृत्व में किया गया।

पुलिस की जाँच के दौरान शक की सुई एक संदिग्ध पर गई। जब संदिग्ध को हिरासत में ले कर पूछताछ की गई तो उसने  जैन मुनि की हत्या की बात स्वीकार कर ली। आरोपित मृतक का परिचित है। बताया जा रहा है कि आरोपित ने जैन मुनि से कुछ रुपए उधार लिए थे। काफी दिनों तक न लौटा पाने के बाद जैन मुनि ने अपने पैसे वापस माँगने शुरू किए तो इसी पर आरोपित ने जैन मुनि नंदी महाराज की जान ले ली। आरोपित ने घटना में अपने साथ एक अन्य व्यक्ति के शामिल होने की जानकारी दी है। पुलिस ने हत्या में शामिल उस दूसरे व्यक्ति को भी गिरफ्तार कर लिया है।

गिरफ्तार आरोपितों की पहचान नारायण बसप्पा माडी और हसन दलायथ के रूप में हुई। दोनों ने पुलिस को बताया कि उन्होंने जैन मुनि की हत्या कर के लाश टुकड़ों में काट दी। बाद में दोनों ने उन टुकड़ों को लेकर पुलिस को गुमराह करते रहे। इसके बाद पुलिस ने शव के टुकड़े कटकभावी गाँव के एक बंद पड़े बोरवेल से बरामद किए। बड़ी संख्या में जैन समाज के लोग भी विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।

तिलक लगाने पर बच्चे को स्कूल से पीट कर भगाया, अन्य छात्रों का तिलक भी पोंछ डाला: MP के स्कूल में शिक्षिका और प्रिंसिपल की करतूत

मध्य प्रदेश के इंदौर एक प्राइवेट स्कूल में तिलक लगाने पर हिन्दू छात्र की पिटाई का मामला सामने आया है। पीड़ित छात्र का आरोप है कि प्रिंसिपल और महिला टीचर ने न सिर्फ उसे पीटा बल्कि दोबारा टीका लगा कर स्कूल में न आने की चेतावनी भी दी। घटना शनिवार (8 जुलाई, 2023) की है। आरोपित टीचर का नाम पद्मा सिसोदिया है। उन्होंने तिलक को धर्मवाद बताते हुए इसे स्कूल में बढ़ावा न देने का एलान किया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, मामला इंदौर के धार रोड का है। मामला ‘बाल विज्ञान शिशु विहार हायर सेकेंडरी स्कूल’ है जिसके प्रिंसिपल ओम प्रकाश सिंह हैं। बताया जा रहा है कि शनिवार को यहाँ 6-7 छात्र माथे पर तिलक लगा कर पढ़ने गए थे। इस दौरान महिला टीचर पद्मा सिसोदिया की नजर बच्चों पर पड़ी। उन्होंने तिलक लगाए सभी बच्चों की पिटाई कर दी। सभी बच्चों के तिलक को पोंछा गया। आगे से किसी को भी स्कूल परिसर में भी माथे पर टीका न लगाने की चेतावनी दी गई। एक बच्चे को तो टीचर पद्मा सिसोदिया ने स्कूल के बाहर भी कर दिया।

आरोप यह भी है कि टीचर ने बच्चे का नाम काटने की भी धमकी दी। जब इस मामले की जानकारी बच्चों के घर वालों को हुई तो वो स्कूल पहुँचे। उन्होंने प्रिंसिपल ओम प्रकाश सिंह से इस मामले की शिकायत की। उन्होंने कहा कि वो अपने बच्चों को स्कूल से पहले मंदिर ले जाते हैं। टीका मंदिर में लगाया जाता है। बताया जा रहा है कि इन दलीलों का प्रिंसिपल पर कोई फर्क नहीं पड़ा। उन्होंने टीचर पद्मा सिसोदिया का ही पक्ष लिया। साथ ही उन्होंने जिलाधिकारी के आदेश का हवाला देते हुए अपने स्कूल में धर्मवाद को न बढ़ावा देने का एलान किया।

मामले के सामने आने के बाद शिक्षा विभाग ने स्कूल के मैनेजमेंट को छात्रों की धार्मिक भावनाओं के सम्मान की नसीहत दी है। इंदौर के जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) मंगलेश कुमार व्यास के मुताबिक, उनसे बातचीत के दौरान स्कूल के प्रिंसिपल ने घटना पर दुःख जताया है। फ से कोई शिकायत नहीं दी गई है।

शादी, तलाक और संपत्ति में अधिकार… 67% मुस्लिम मुस्लिाएँ इनके लिए दे रहीं UCC का साथ, 78% ने कहा- निकाह की उम्र 21 होनी चाहिए

समान नागरिक संहिता को लेकर जारी बहस के बीच एक सर्वे सामने आया है। इस सर्वे में 67% मुस्लिम महिलाओं ने शादी, तलाक, गोद लेने और संपत्ति के अधिकार के लिए एक समान कानून का समर्थन किया है। इसके अलावा 78% महिलाओं ने कहा है कि पुरुष और महिला दोनों की शादी 21 वर्ष की उम्र में ही होनी चाहिए।

न्यूज 18 ने अपने इस सर्वे में देश भर के 25 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की 8035 मुस्लिम महिलाओं से बातचीत की है। इस सर्वे में 18 साल से लेकर 65 साल तक की अशिक्षित, पढ़ी लिखी और यहाँ तक कि ग्रेजुएट मुस्लिम महिलाओं को भी शामिल किया गया। 

सर्वे के दौरान मुस्लिम महिलाओं से सवाल किया गया कि क्या वे शादी, तलाक, गोद लेने और संपत्ति के अधिकार के लिए एक समान कानून का समर्थन करेंगी। इस पर 67.2% महिलाओं यानि कि 5403 महिलाओं ने समर्थन करने की बात कही है। वहीं, 25.4% महिलाओं यानि 2039 महिलाओं ने समर्थन न करने की बात कही।

इसके अलावा, 593 महिलाओं यानि सर्वे में शामिल 7.4% लोगों ने इस बारे में कोई भी उत्तर नहीं दिया। वहीं 78.7% महिलाओं ने कहा है कि पुरुष और महिला दोनों की शादी की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष होनी चाहिए। वहीं 16.6% महिलाओं ने शादी के लिए एक समान या न्यूनतम 21 वर्ष की उम्र होने का विरोध किया है।

इस सर्वे में यह बात भी सामने आई कि पढ़ी-लिखी मुस्लिम महिलाओं का बड़ा तबका एक समान कानून के समर्थन में हैं। दरअसल, ग्रेजुएट या उससे अधिक शिक्षा प्राप्त कर चुकी महिलाओं में से 68.4% यानि 2076 मुस्लिम महिलाओं ने एक समान कानून के समर्थन की बात कही। वहीं, 27% महिलाओं यानि 820 लोगों ने कहा कि वह एक समान कानून के समर्थन में नहीं है। साथ ही 4.6% यानि 137 महिलाओं ने इस बारे में कोई उत्तर नहीं दिया।

UCC को लेकर किए गए इस सर्वे में 18-24 साल के बीच की 18.8% मुस्लिम महिलाएँ शामिल थीं। इसके अलावा, 24-34 साल की 32.9% मुस्लिम महिलाएँ, व 35 से 44 साल के बीच की 26.6% महिलाएँ  व 45-54 साल के बीच की 14.4% महिलाएँ तथा 55-64 साल के बीच 5.4 % और 65 साल से ऊपर की 1.9% मुस्लिम महिलाएँ इस सर्वे का हिस्सा थीं।

सर्वे में शामिल महिलाओं की पढ़ाई के बारे में बात करें तो 10.8% पोस्ट ग्रेजुएट और 27% महिलाएँ ग्रेजुएट थीं। वहीं 12वीं या उससे ऊपर की पढ़ाई करने वाली महिलाओं की संख्या 20.8% थी। 10वीं और उससे अधिक पढ़ी महिलाएँ 13.8%, 5वीं से 10वीं पास 12.9%, 5वीं तक 4.4%, अशिक्षित 4.2%, साक्षर 4.2% और 1.9% अन्य मुस्लिम महिलाएँ रहीं। 

BJP सरकार की दो धुरी- विकास और विरासत: जिस संस्कृति को भारतीय राजनीति मानती रही अछूत, उसे PM मोदी ने बना दिया कूटनीति का हिस्सा भी

मैंने लाल किले से कहा था ये समय गुलामी की मानसिकता से मुक्त होकर, अपनी विरासत पर गर्व करने का है। आज देश विकास और विरासत दोनों को साथ लेकर चल रहा है। एक ओर भारत डिजिटल टेक्नोलॉजी में नए रिकॉर्ड बना रहा है तो साथ ही सदियों बाद काशी में विश्वनाथ धाम का दिव्य स्वरुप भी देश के सामने प्रकट हुआ है। आज हम वर्ल्ड क्लास इंफ्रास्ट्रक्चर बना रहे हैं तो साथ ही केदारनाथ और महाकाल महालोक जैसे तीर्थों की भव्यता के साक्षी भी बन रहे हैं। सदियों बाद अयोध्या में भव्य राम मंदिर का हमारा सपना पूरा होने जा रहा है…

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 7 जुलाई 2023 को गोरखपुर में गीता प्रेस के शताब्दी वर्ष समापन समारोह को संबोधित करते हुए यह बात कही। भारतीय धर्म ग्रंथों को घर-घर तक पहुँचाने वाले गीता प्रेस लिबरलों को नहीं सुहाता है। कारण आप समझ सकते हैं। लिबरल गैंग का यह दर्द पिछले दिनों तब भी प्रकट हुआ, जब गीता प्रेस को वर्ष 2021 का गाँधी शांति पुरस्कार देने की घोषणा हुई।

दरअसल भारत के प्रधानमंत्री का गीता प्रेस जाना, वहाँ के लीला मंदिर में अर्चना करना, भारतीय राजनीति की वह लकीर है जो 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने खींची है। इससे पहले भारत की राजनीति हिंदू, मंदिर, सनातन संस्कृति, भारतीय विरासत की बात करने वाले को ‘सांप्रदायिक’ और टोपी-चादर वाली इफ्तार पार्टियों में शिरकत करने वालों को ‘सेकुलर’ मानने की अभ्यस्त रही है। लेकिन मोदी सरकार का कार्यकाल विकास और गरीब कल्याण की योजनाओं के साथ-साथ सांस्कृति विरासत को बढ़ावा देने, सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करने, सांस्कृतिक कूटनीति के जरिए भारतीय विरासत का वैश्विक प्रसार करने, स्वदेशी विचारों को सम्मान और मान्यता देने, चोरी कर विदेश ले गई भारतीय कलाकृतियों को वापस लाने की गाथा का भी कार्यकाल है।

पीएम मोदी
गीता प्रेस के लीला मंदिर और वारंगल के भद्रकाली मंदिर में पूजा अर्चना करते पीएम मोदी (फोटो साभार: pib.gov.in)

जिस दिन प्रधानमंत्री गीता प्रेस गए, उसी दिन गोरखपुर से उन्होंने दो वंदे भारत एक्सप्रेस को भी हरी झंडी दिखाई। 498 करोड़ रुपए की लागत से गोरखपुर रेलवे स्टेशन के पुनर्विकास की आधारशिला रखी। कॉन्ग्रेस शासित छत्तीसगढ़ को 7 हजार करोड़ रुपए से अधिक की परियोजनाएँ देकर प्रधानमंत्री गोरखपुर आए थे। गोरखपुर के बाद वे वाराणसी गए और वहाँ ₹12,110 करोड़ की 29 परियोजनाओं का लोकार्पण/शिलान्यास किया। PM आवास योजना (ग्रामीण) के तहत लाभुकों को 4.51 लाख आवास सौंपे। अगले दिन वे तेलंगाना के वारंगल में थे। 6100 करोड़ रुपए की विकास परियोजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन किया। माँ भद्रकाली की पूजा की। यह केवल गोरखपुर, वाराणसी या वारंगल की ही बात नहीं है। मोदी सरकार के पूरे कार्यकाल में विकास और संस्कृति एक साथ देश के हर कोने में इसी तरह गतिमान रही है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री सार्वजनिक मंचों से बार-बार इस बात को दोहराते हैं कि यह समय अपनी विरासत पर गर्व करने का है।

7 जुलाई 2023 को छत्तीसगढ़ के रायपुर में पीएम मोदी (फोटो साभार: pib.gov.in)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद, घर हो या बाहर अपनी सरकार की सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने की रणनीति के ध्वजवाहक बने हुए हैं। मोटे तौर पर चार तरीकों से इस कार्य को पूर्ण किया जा रहा है।

  • भारतीय कला का वैश्विक स्तर पर प्रसार
  • चोरी हुई कलाकृतियों की घर वापसी
  • संस्कृति का संरक्षण करने वालों को सम्मान
  • बजटीय आवंटन में लगातार वृद्धि

जून 2022 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी G-7 शिखर सम्मेलन के लिए जर्मनी गए थे। यहाँ उन्होंने भारत के सांस्कृतिक हुनर को कैसे वैश्विक मंच पर स्थापित किया, इसे राष्ट्राध्यक्षों को दिए भेंट से समझिए। अर्जेंटीना के राष्ट्रपति को डोकरा कला से बनी नंदी तो दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति को इसी कला से बनी रामायण भेंट की। छत्तीसगढ़ की डोकरा कला अलौह धातु की ढलाई कला है। ऐसी धातु की ढलाई का उपयोग भारत में 4,000 से अधिक वर्षों से होता आ रहा है। जापान के पीएम को उत्तर प्रदेश के निजामाबाद के बने काली मिट्टी के बर्तन भेंट किए। कनाडा के पीएम को हाथ से बुनी गई सिल्क की चटाई भेंट की। इंडोनेशिया के राष्ट्रपति को लैक्वेरेंस कला से निर्मित राम दरबार भेंट की। सेनेगल के राष्ट्रपति को मूंज से बनी टोकरियाँ और कपास की दरियाँ भेंट की। इसका निर्माण उत्तर प्रदेश के प्रयागराज, सुल्तानपुर और अमेठी में होता है। जर्मनी की चांसलर को निकेल कोटेड पीतल का मटका भेंट किया। यह मटका यूपी की पीतल नगरी मुरादाबाद की पहचान है। इटली के पीएम को संगरमर से बना टेबल टॉप भेंट किया। यह कलाकृति आगरा की पहचान है। फ्रांस के राष्ट्रपति को जरदोजी बॉक्स में इत्र भेंट किए। अमेरिकी राष्ट्रपति को वाराणसी में बना गुलाबी मीनाकारी ब्रोच और कफलिंक सेट उपहार में दिया। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री को यूपी के बुलंदशहर में बना प्लेटिनम पेंटेड हैंड पेंटेड टी सेट गिफ्ट किया।

अब 2022 के नवंबर में हुए जी 20 देशों के सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री द्वारा दिए गए उपहारों पर गौर करिए;

  • अमेरिका के राष्ट्रपति को भगवान श्रीकृष्ण और राधा की पेंटिंग गिफ्ट की। इसे हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा के चित्रकारों ने बनाया था। कांगड़ा की पेंटिंग में श्रृंगार रस और प्राकृतिक प्रेम का चित्रण किया जाता है। इसकी खासियत ये है कि इसे बनाने में सिर्फ प्राकृतिक रंगों का ही उपयोग किया जाता है।
  • ब्रिटेन के प्रधानमंत्री को ‘माता नी पछेड़ी’ उपहार के रूप में दिया। यह गुजरात का एक हस्तनिर्मित कपड़ा है। इसमें देवी माँ का चित्र बना होता है। नवरात्रि के समय और अन्य पूजन के दौरान इसे देवी मंदिर में चढ़ाया जाता है।
  • इटली की पहली महिला प्रधानमंत्री को ‘पाटन पटोला दुपट्टा’ (स्कार्फ) गिफ्ट किया। यह स्कार्फ उत्तरी गुजरात के पाटन क्षेत्र में बनाया जाता है। इसमें आगे और पीछे का हिस्सा एक जैसा दिखता है। इसे अलग-अलग पहचानना मुश्किल है।
  • गुजरात के छोटा उदयपुर के राठवा कारीगरों द्वारा निर्मित जनजातीय लोक कला का चित्र ‘पिथौरा’ ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री को उपहार में दिया गया।
  • इंडोनेशिया के राष्ट्रपति को सूरत का चाँदी का कटोरा और हिमाचल प्रदेश की किन्नौरी शॉल उपहार में दिया।
  • स्पेन के प्रधानमंत्री को मंडी और कुल्लू का कनाल ब्रास सेट (वाद्ययंत्र) गिफ्ट किया। यह हिमाचल के आयोजनों में बजाए जाने वाला प्रमुख बाजा है, जिसका उपयोग अब सजावट के सामान के तौर पर किया जाने लगा है।

बीते जून में प्रधानमंत्री अमेरिका गए थे। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति को 10 दान के प्रतीक भेंट कर भारतीय संस्कृति में ‘दस दानम’ के महत्व को चर्चा में ला दिया। दस दानम के प्रतीक जिस विशेष बक्से में बंद थे, उसे मैसूर के चंदन की लकड़ी से जयपुर के कारीगरों ने तैयार किया था। इसमें भगवान गणेश की मूर्ति और एक दीया भी था। साथ ही राष्ट्रपति बायडेन को ’10 प्रिंसिपल्स ऑफ उपनिषद’ नामक किताब भी दी। दूसरी ओर, जब सितंबर 2021 में प्रधानमंत्री अमेरिका से लौटे थे तो 11वीं से 14वीं शताब्दी के बीच 157 मूर्तियाँ-कलाकृतियाँ साथ लेकर आए थे। इन्हें चोरी से देश के बाहर ले जाया गया था। अमेरिका द्वारा भारत को सौंपी गई इन कलाकृतियों में सांस्कृतिक पुरावशेष, हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म से संबंधित मूर्तियाँ शामिल थीं।

भारत सरकार के पोर्टल MyGov के आधिकारिक ट्विटर हैंडल के मुताबिक 2014 के बाद से 238 से अधिक ऐसी कलाकृतियाँ भारत वापस आई हैं, जो चोरी कर देश से बाहर ले जाई गईं थी। 2014 से पहले ऐसी केवल 13 कलाकृतियों को ही देश वापस लाने में सरकार सफल रही थी। स्वदेशी विचारों के सम्मान की संस्कृति भी मोदी सरकार में विकसित हुई है। चाहे वह गीता प्रेस का सम्मान हो या फिर दुनिया के एकमात्र संस्कृत के अखबर ‘सुधर्मा’ को पद्मश्री से सम्मानित करना। इसी तरह जो पद्म पुरस्कार अब तक एलीट वर्ग तक सीमित माने जाते रहे थे, वे उन लोगों तक भी पहुँच रहे हैं जो सुदूर इलाकों में लोक कलाओं को संरक्षित करने में जुटे हुए हैं।

इसके अलावा धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए ‘प्रसाद योजना’ है तो संस्कृत भाषा को प्रोत्साहित करने के लिए केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय में 200 करोड़ रुपए का निवेश किया गया है। खादी का पुनरुद्धार इसी सरकार में संभव हुआ है। अभिलेखागार और पुस्तकालयों का विकास किया जा रहा है। 2013-14 के मुकाबले 2023-24 तक संस्कृति संरक्षण के लिए बजट आवंटन में 65 फीसदी तक वृद्धि हो चुकी है।

स्वतंत्र भारत में विकास के साथ भारतीय विरासत को आगे बढ़ाने की जो प्रतिबद्धता मोदी सरकार दिखा रही है, वह इससे पहले कभी नहीं देखी गई। यह केवल हिंदुओं के धार्मिक स्थलों के विकास तक ही सीमित नहीं है। यह एक ऐसी यात्रा है, जिसमें विलुप्त हो रही भारतीय भाषाओं, लोक संस्कृतियों, परंपराओं, वाद्य यंत्रों, कलाओं को न केवल आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित किया जा रहा है, बल्कि उन्हें वैश्विक पहचान देकर इनसे जुड़े लोगों के जीवन में बदलाव लाने के भी प्रयास हो रहे हैं। अपने अब तक के कार्यकाल में मोदी सरकार ने यह भी बार-बार प्रमाणित किया है भारतीयता और भारतीय संस्कृति उसके लिए कोई चुनावी मुद्दा नहीं है।

हम राजनीति के उस दौर में जी रहे हैं जिसमें नेता चुनाव के समय मंदिरों की प्रदक्षिण करने लगते हैं। अपने जनेऊ दिखाने लगते हैं। अपना गोत्र बताने लगते हैं। वे वोटों के लिए हिंदू से लेकर किसान तक दिख रहे हैं। ऐसे दौर में संस्कृति को लेकर एक सरकार की ऐसी प्रतिबद्धता न केवल सुखद है, बल्कि सशक्त और आत्मनिर्भर भारत का रास्ता भी इससे ही निकलेगा।

शिवसेना पर कब्जे के लिए फिर से सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर उद्धव ठाकरे: कहा- शिंदे गुट का ‘धनुष-बाण’ इस्तेमाल करना अवैध, EC को नहीं फैसले का अधिकार

शिवसेना का नाम और चिन्ह को लेकर मची लड़ाई एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुँच गई है। चुनाव आयोग ने पार्टी का नाम और चिन्ह शिंदे गुट को दे दिया था। इस फैसले के खिलाफ उद्धव ठाकरे ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर सुनवाई के लिए तैयार हो गया है। सुनवाई 31 जुलाई 2023 को होगी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उद्धव ठाकरे की याचिका को देखते हुए सोमवार (10 जुलाई 2023) को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायाधीश पीएस नरसिम्हा की बेंच सुनवाई के लिए तैयार हो गई। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि यह मामला लिस्ट करते हुए 31 जुलाई को सुनवाई की जाएगी। 

इसके अलावा कोर्ट ने उद्धव ठाकरे के वकील अमित आनंद तिवारी को शिंदे गुट द्वारा दाखिल किए गए हलफनामे पर जवाब देने की भी अनुमति दे दी। ज्ञात हो कि उद्धव ठाकरे ने अपनी याचिका दाखिल करते हुए सुप्रीम कोर्ट से तत्काल सुनवाई करने की माँग की थी। उद्धव ने अपनी याचिका में शिंदे गुट पर शिवसेना का नाम और चुनाव चिन्ह अवैध रूप से उपयोग करने का आरोप लगाया है और ईसी के फैसले को भी चुनौती दी।

दरअसल, उद्धव ठाकरे गुट से अलग होने के बाद शिंदे गुट ने चुनाव आयोग जाकर पार्टी के नाम और चिन्ह पर अपना दावा ठोंका था। इसके बाद चुनाव आयोग ने 17 फरवरी 2023 को उद्धव ठाकरे गुट को बड़ा झटका देते हुए शिंदे गुट को आधिकारिक शिवसेना बताया था। साथ ही पार्टी का नाम और चिन्ह (धनुष-बाण) शिंदे गुट को दे दिया था।

आयोग ने कहा था कि साल 2018 में शिवसेना के संविधान में संशोधन कर इसकी जानकारी चुनाव आयोग को नहीं दी गई। इसके अलावा अलोकतांत्रिक तरीके से किए गए संविधान संशोधन से पार्टी जागीर बनकर रह गई थी।नचुनाव आयोग ने यह भी कहा था कि साल 2019 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शिवसेना के 55 जीते हुए प्रत्याशियों में से एकनाथ शिंदे का समर्थन करने वाले विधायकों को करीब 76 प्रतिशत वोट मिले थे। वहीं उद्धव गुट के जीते हुए प्रत्याशियों को महज 23.5 प्रतिशत वोट ही मिले थे। इसलिए पार्टी पर शिंदे गुट का अधिकार है। चुनाव आयोग के इसी फैसले के खिलाफ उद्धव ठाकरे ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। 

इससे पहले फरवरी 2023 में भी यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा था। तब चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच ने चुनाव आयोग के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था।

1857 से पहले भी हुई थी एक क्रांति: 200 अंग्रेजों को भारतीय सिपाहियों ने मार गिराया, वेल्लोर में तिलक पर प्रतिबंध से आज ही भड़की थी ज्वाला

अंग्रेजों ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम को दबाने के लिए ये नैरेटिव बना दिया था कि ये एक मामूली सा सिपाही विद्रोह था, लेकिन वीर सावकर जैसे अध्येता ने इस नैरेटिव को विफल करते हुए दुनिया को बताया कि ये हमारा प्रथम स्वतंत्रता संग्राम था। यहाँ हम जिस क्रांति की बात करने जा रहे हैं, वो इससे भी 51 साल पहले की है, जुलाई 1806 की। उस समय तमिलनाडु के वेल्लोर में सिपाहियों ने ऐसा विद्रोह किया, ऐसी क्रांति की, कि भारत में पाँव जमा रहे अंग्रेजों की हालत खराब हो गई थी।

वेल्लोर का ऐतिहासिक किला और उस प्रेसीडेंसी की स्थिति

ये भारत में सिपाहियों द्वारा ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ के खिलाफ पहला बड़ा विद्रोह था। क्रांतिकारियों ने न सिर्फ 200 अंग्रेजों को मार गिराया, बल्कि वेल्लोर के ऐतिहासिक किले को भी नियंत्रण में ले लिया। 16वीं शताब्दी के इस किले को विजयनगर साम्राज्य द्वारा बनवाया गया था और विजयनगर के अंतिम अराविदु राजवंश ने इसे अपना मुख्यालय भी बनाया। इस किले का ऐतिहासिक महत्व इसी बात से समझिए कि बीजापुर के सुल्तान, कर्नाटक के सुल्तानों और मराठों ने भी इसे अपने-अपने समय में अपने नियंत्रण में रखा।

मद्रास के 125 किलोमीटर पश्चिम में स्थित ये किला उस शहर में बनाया गया था, जो कभी टोन्डाईमंडलम का हिस्सा हुआ करता था। ये दक्षिण भारत की सैन्य आर्किटेक्चर का उम्दा उदाहरण है। इसकी दीवारें ग्रेनाइट के पत्थरों से बनी हुई हैं। इसके उत्तरी हिस्से में एक मंदिर भी बनाया गया था। उत्तर-पश्चिम में उस समय एक हिन्दू गाँव हुआ करता था। सन् 1864 में बाद में यहाँ चर्च भी बना दिया गया। वेल्लोर में जब विद्रोह हुआ, उससे पहले दक्षिण भारत की स्थिति अच्छी नहीं थी।

वहाँ लोगों को भारी सूखे का सामना करना पड़ा था, जिससे अंग्रेजों के राजस्व में भी कमी आ गई थी। बंगाल आर्मी के अधिकारियों को ज्यादा पैसे मिलने के कारण खुद दक्षिण भारत के ब्रिटिश अधिकारी असंतुष्ट थे। 19 जून 1804 को मदुरै के कलक्टर पर हमला हो चुका था। करीब 1000 की भीड़ ने उसे घेरा था। लक्ष्मण नाइगु इस विद्रोह के नायक थे। पुत्तूर नुटुम में विद्रोहियों में से कइयों को अंग्रेजों ने मार डाला। जुलाई में लक्ष्मण भी पकड़ लिए गए।

अंग्रेजों को इस सिपाही विद्रोह को कुचलने के लिए तमिलनाडु के रानीपेट स्थित आर्कोट से हथियारों और तोपों से लैस फ़ौज बुलानी पड़ी थी। अंग्रेजों ने हमारे लगभग 350 क्रांतिकारी सिपाहियों को बेरहमी से मार डाला। असल में नवंबर 1805 में सिपाहियों के ड्रेस कोड को बदलने जाने के बाद इस विद्रोह की सुगबुगाहट शुरू हुई थी। हिन्दुओं को किसी भी प्रकार के धार्मिक चिह्न रखने से प्रतिबंधित कर दिया गया था। वो न तो तिलक लगा सकते थे, न धोती पहन सकते थे।

साथ ही मुस्लिम सिपाहियों से भी कह दिया गया था कि वो अपनी दाढ़ी हटा दें, इससे वो भी आक्रोशित थे। टीपू सुल्तान की हार के बाद उसके परिवार को भी उसी किले में रखा गया था, जिसे इस विद्रोह के बाद कलकत्ता में शिफ्ट कर दिया गया। बताया जाता है कि टीपू सुल्तान के 12 बेटे और 8 बेटियाँ थीं। आर्कोट से आए कर्नल गिलेस्पी ने इस विद्रोह को कुचला था। उस समय जॉर्ज बार्लो को ब्रिटिश इंडिया का गवर्नर जनरल बना कर भेजा गया था। जॉन क्रेडॉक उस समय मद्रास उस समय मद्रास प्रेसीडेंसी का कमांडर-इन-चीफ था।

10 जुलाई, 1806: तमिलनाडु के वेल्लोर में क्या हुआ था?

इस विद्रोह का असर ऐसा हुआ था कि ब्रिटिश सरकार को अपने आदेश वापस लेने पड़े थे और मद्रास के गवर्नर विलियम बेंटिंक को वापस बुला लिया गया था। आइए, अब बात करते हैं वेल्लोर विद्रोह के पूरे घटनाक्रम की। सन् 1799 में अंग्रेजों ने श्रीरंगपट्टण के युद्ध में मैसूर के शासक और इस्लामी कट्टरपंथी टीपू सुल्तान को मार गिराया। उसके बेटे-बेटी और परिवार को वेल्लोर के किले में रखा गया। यही कारण है कि विद्रोह के बाद टीपू सुल्तान की दूसरी संतान फ़तेह हैदर को राजा घोषित कर वेल्लोर के किले पर मैसूर का झंडा लगा दिया गया था।

वेल्लोर का विद्रोह सिर्फ एक दिन ही चल पाया था, लेकिन इतिहास में इसे एक महत्वपूर्ण स्थान मिलता है। वेल्लोर में कुल 1500 भारतीय सैनिकों को ब्रिटिश आर्मी के रूप में तैनात किया गया था। वहाँ से लगभग 26 किलोमीटर की दूरी पर आर्कोट में रॉबर्ट गिलेस्पी की बटालियन तैनात थी। मद्रास का कमांडर-इन-चीफ जॉन क्रेडॉक के आदेश के बाद से ही भारतीय सिपाहियों में असंतोष की भावना पनपने लगी थी। उसने चमड़े से बनी पगड़ी को पहनना भी सिपाहियों के लिए अनिवार्य कर दिया था।

साथ ही उन्हें उन्हें भारतीय पगड़ी पहनने से भी वंचित कर दिया गया था और बदलने में हैट पहनने को कहा गया था। उसमें कॉकेड लगा होता था, जिसे उस समय इसे मजहब की निशाने समझा जाता था और सिपाहियों को लगा कि उनका धर्मांतरण कराया जा रहा है। जिन सिपाहियों ने विद्रोह किया था, उन्हें सामान्यतः किले के बाहर तैनात कर के रखा जाता था और वो झोपड़ियों में रहते थे। विरोध करने वालों पर अत्याचार किया जाने लगा। मई 1806 में इन फैसलों के विरोध करने वाले 2 सैनिकों को चेन्नई स्थित सेंट जॉर्ज किले में लाया गया।

वहाँ उन्हें 90 बार कोड़े से पीटे जाने का आदेश दिया गया। उन्हें उनकी नौकरी से भी निकाल दिया गया। 19 ऐसे सिपाही थे, जिन पर सार्वजनिक रूप से 50-50 कोड़े बरसाए गए। साथ ही उन्हें माफ़ी माँगने को भी कहा गया। इस विद्रोह में 69th कमांड के 115 अंग्रेज सैनिकों को मार गिराया गया था। किले के ऊपर से यूनियन जैक को निकाल बाहर किया गया था। जिस ब्रिटिश अधिकारी ने आर्कोट तक खबर पहुँचाई, वो मेजर कूप्स था।

9 जुलाई, 1806 को टीपू सुल्तान की 5वीं बेटी की शादी थी, उसी किले में। शादी के दौरान अतिथियों की वेशभूषा में भी कई विद्रोही अंदर घुसे थे। 10 जुलाई, 1806 को सिपाहियों ने किले को चारों तरफ से घेर लिया और गोलीबारी करने लगे। लेकिन, इस दौरान एक ब्रिटिश अधिकारी किसी तरह वहाँ से आर्कोट पहुँचने में कामयाब रहा और उसने इस विद्रोह की सूचना दी। 9 घंटों बाद ‘ब्रिटिश 19th लाइट ड्रैगून्स’ बटालियन वहाँ आ धमकी। किले के जिन दरवाजों पर विद्रोहियों ने पहरा नहीं बिठाया था, वहीं से अंग्रेजों की फ़ौज भीतर घुसी।

तड़के सुबह 3 बजे के करीब ही विद्रोह शुरू हो गया था, जब 500 के करीब हथियारबंद भारतीय सिपाहियों ने कई बंदूकों और 2 तोपों के साथ उधर का रुख किया जिधर यूरोपियन फ़ौज थी। सबसे पहले उनके बैरक के दरवाजों को उड़ाया गया। कई ब्रिटिश सैनिक उस समय सो ही रहे थे। भारतीय विद्रोही सैनिकों ने बैरक के भीतर घुस कर गोलीबारी शुरू कर दी। ब्रिटिश सैनिकों में हाहाकार मच गया। न उनके पास संख्याबल था, न हथियार ज्यादा थे। भागने के अलावा उन्हें कोई विकल्प नहीं सूझा।

भारतीय सिपाहियों के साथ अंग्रेजों की घोर क्रूरता

इस गोलीबारी में किले का कमांडर कर्नल फैनकोर्ट भी मारा गया। कुल 15 बड़े ब्रिटिश अधिकारी मार गिराए गए थे। कई यूरोपियनों के घरों को भी लूट लिया गया। इस दौरान विद्रोह में शामिल मुस्लिम सिपाहियों के नेता शेख कासिम ने टीपू सुल्तान के बेटे को राजा बनने के लिए मनाया, लेकिन परिवार डर के मारे तैयार नहीं था। जो सैनिक इस विद्रोह में शामिल नहीं थे, उन्हें खरी-खोटी सुनाई गई। इसी कन्फ्यूजन का फायदा उठा कर किले से एक अंग्रेज भागा और उसने आर्कोट में खबर कर दी।

इसके बाद वहाँ से आई हथियारबंद बटालियन ने भारतीय सिपाहियों को बंदूक में लगे चाकू घोंप-घोंप कर मारना शुरू कर दिया। बताया जाता है कि 100 ऐसे भारतीय सिपाही थे जिन्हें दीवार के सामने खड़ा करा कर उन्हें गोली मार दी गई। अंग्रेज किसी तरह से क्रूरतम बदला लेना चाहते थे। इसके बाद आनन-फानन में कोर्ट मार्शल कर के 6 भारतीय सैनिकों को खुलेआम गोली मार देने की सज़ा सुनाई गई, 5 को फायरिंग स्क्वाड ने मार डाला, 8 को फाँसी पर लटका दिया गया और 5 को जीवन भर के लिए कहीं दूर भेज दिया गया।

लेखक जे विल्सन का मानना है कि 1700 में से 879 भारतीय सिपाहियों की हत्या कर दी गई थी। ये इस पूरे विद्रोह में हुई भारतीय सैनिकों की मौतों का आँकड़ा है। इस विद्रोह के सज़ाओं भय के कारण ही 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में दक्षिण भारत में वैसी क्रांति देखने को नहीं मिली। अपने 200 सैनिकों को खोने के बाद अंग्रेजों ने कई फैसलों को वापस ले लिया और भारतीय सिपाहियों पर कोड़े बरसाए जाने की सज़ा को खत्म कर दिया। अगले साल मिंटो भारत का गवर्नर बना कर भेजा गया।

आखिर अंग्रेजों को भारतीय सिपाहियों की ज़रूरत ही क्यों पड़ी थी? एक ये सवाल आपके मन में ज़रूर उठता होगा। इसका उत्तर ये है कि दक्षिण भारत में कई यूरोपियन ताकतें सक्रिय हो गई थीं और सन् 1746-48 में ब्रिटिश को फ्रेंच से कई लड़ाइयाँ लड़नी पड़ी थीं, इसीलिए उन्होंने स्थानीय भारतीय सैनिकों की भर्ती का निर्णय लिया। चार्ल्स कार्नवलिस जब भारत का गवर्नर जनरल था, उस समय दक्षिण भारत में 70,000 ब्रिटिश सैनिकों में मात्र 13,500 ही यूरोपियन थे।

ISIS की सुमेरा ने आतंकी तारिक को दी थी लव जिहाद की ट्रेनिंग, ऑनलाइन गेम्स से बढ़ा रहे थे आतंक का नेटवर्क: UP ATS की पूछताछ में खुलासा, अरबी में लिखी सामग्री मिली

उत्तर प्रदेश पुलिस की एटीएस विंग द्वारा गोरखपुर से गिरफ्तार हुए ISIS आतंकी तारिक अतहर को लेकर कुछ नए खुलासे हुए हैं। पता चला है कि ये आतंकी गुजरात में पकड़ी गई महिला आतंकी सुमेरा से कनेक्शन में था। ये सुमेरा इसे लव जिहाद की ट्रेनिंग देती थी। जब पोरबंदर में पिछले महीने इस महिला आतंकी को गिरफ्तार किया गया तो इसके फोन से तारिक के बारे में सूचना मिली। गुजरात एटीएस ने फौरन यूपी एटीएस को अलर्ट भेजा और फिर जाकर 6 जुलाई 2023 को तारिक गिरफ्तार हुआ

गिरफ्तारी के बाद तारिक ने बताया कि कैसे उसका सपना मुजाहिद बनने का था और वो बगदादी की बंदूकें देखककर प्रभावित होता था। उसके फोन की छानबीन में एटीएस को आरोपित के मोबाइल से ISIS आतंकियों के झंडे, उनकी हथियारों के साथ तस्वीरें और अरबी भाषा में लिखे साहित्य भी बरामद हुए हैं।

इसके अलावा पड़ताल में सामने आया है कि तारिक ऑनलाइन गेम खेल खेलकर अपने साथ मोहल्ले के लड़कों को जोड़ रहा था। वो घर से ज्यादा नहीं निकलता था। ज्यादा से ज्यादा बिस्किट-दूध लेने किराने की दुकान तक जाता था। इसके बाद वो घर ही रहता था। उसके घर पर उसके अब्बा (सरकारी टीचर)-अम्मी, बड़ी बहन और भाई (दर्जी) का परिवार रहता है।

दैनिक भास्कर के मुताबिक, जब तारिक की गिरफ्तारी हुई तो कुछ लोग यकीन ही नहीं कर पाए कि तारिक आतंकी मानसिकता का था। मगर कुछ लोगों ने उसकी कट्टरपंथी सोच के बारे में माना। छानबीन में उसके टेलीग्राम वाले ग्रुप के बारे में भी पता चला। इस ग्रुप से लोगों को जोड़ने के लिए सुमेरा ने ही उसे कहा था। बताया जा रहा है कि ग्रुप का एडमिन अभी हज पर गया हुआ है। वहीं खुफिया एजेंसियों की रडार पर उसी शहर के रहने वाले दर्जन भर युवक और भी हैं। इन सबकी तारिक से बात होती थी। ये भी पता चला है कि तारिक का खूनीपुर मोहल्ला 2019 में हुई नक्खास में हुई सीएए विरोधी हिंसा में शामिल था।

उल्लेखनीय है कि आरोपित जिस सुमेरा नाम की आतंकी के साथ संपर्क में था वो मूल रूप से जम्मू कश्मीर की रहने वाली है। उसका निकाह ऑनलाइन मैट्रिमोनियल साइट के जरिए तमिलनाडु के नोफेल से हुआ था। निकाह से पहले ही सुमेरा ISIS से प्रभावित थी। गुजरात ATS से मिली इसी इनपुट पर तारिक को UP ATS ने गिरफ्तार किया था। क्रॉस चेक करने पर तारिक के मोबाइल से भी सुमेरा बानो से हुई बातचीत की डिटेल मिली। इसके बाद गुजरात ATS ने भी तारिक से पूछताछ की। तारिक ने यह भी बताया कि उसने भारत के कई हिस्सों के युवाओं का एक टेलीग्राम ग्रुप सुमेरा बानो के ही कहने पर बनाया था।

सुमेरा समुद्र मार्ग से आतंकवाद की ट्रेनिंग लेने ईरान जाना चाहती थी। वह ISIS के ईरानी हैंडलर अबू हमजा के सम्पर्क में थी। वहाँ से लौट कर सुमेरा भारत के मुस्लिम युवाओं को कट्टरंथी बना कर ISIS ज्वाइन करने के लिए तैयार करती। साथ ही उन्हें लव जिहाद की भी ट्रेनिंग देती। बताया जा रहा है कि सुमेरा से हुई पूछताछ में तारिक के नाम का खुलासा हुआ था।

‘ट्रेन नहीं चली तो जवानों ने धक्का देकर किया स्टार्ट’: झूठ फैलाने में मीडिया ने भी दिया प्रोपेगंडाबाजों का साथ, न ये ट्रेन ‘वन्दे भारत’ न दावा सच्चा

भारतीय रेलवे से जुड़ा एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। दावा किया जा रहा है कि ट्रेन स्टार्ट नहीं हो रही थी, इसलिए जवानों ने धक्का देकर स्टार्ट किया। सपा नेता ने वायरल वीडियो को ‘वन्दे भारत’ एक्सप्रेस ट्रेन का बताकर मोदी सरकार को घेरने की कोशिश की। ऑपइंडिया ने वायरल वीडियो का फैक्ट चेक किया है।

वायरल हो रहे वीडियो में सेना के जवानों, पुलिसकर्मियों और रेलवे कर्मचारियों को ट्रेन में धक्का लगाते दिख रहे हैं। इसके थोड़ी ही देर बाद ट्रेन चलती हुई दिखाई देती है। यह वीडियो सोशल मीडिया से लेकर मीडिया तक में जमकर छाया हुआ है। ‘न्यूज 24’ ने इस वीडियो को शेयर करते हुए लिखा था, “ट्रेन नहीं चली तो जवानों ने लगा दिया धक्का और कर दिया स्टार्ट, वीडियो हुआ सोशल मीडिया पर वायरल।” हालाँकि, बाद में ‘न्यूज 24’ ने इस वीडियो को डिलीट कर दिया।

समाजवादी पार्टी के नेता आईपी सिंह ने भी झूठ फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ‘न्यूज 24’ के वीडियो रीट्वीट करते हुए उन्होंने लिखा, “मोदी जी की ‘वन्दे भारत’ धक्का प्लेट हो गई है। समूचे देश को धक्का प्लेट बना दिया विगत 10 वर्षों में। काम-धाम एक नहीं सिर्फ प्रचार।”

दिनेश कुमार नामक यूजर ने ‘न्यूज 24’ के कैप्शन को कॉपी करते हुए वीडियो शेयर किया। 

‘इंडिया टीवी’ ने वीडियो शेयर कर लिखा, “ट्रेन नहीं चली तो जवानों ने लगा दिया धक्का और कर दिया स्टार्ट! वीडियो हुआ वायरल।”

कॉन्ग्रेस के सोशल मीडिया समन्वय दीपक खत्री और मोहम्मद शमीम खान ने भी झूठ फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 

‘एबीपी न्यूज’ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, “Railway Viral Video: ट्रेन नहीं चली तो जवानों ने लगा दिया धक्का और कर दिया स्टार्ट! देखें वायरल वीडियो।”

IBC24 ने वीडियो शेयर कर लिखा, “ट्रेन नहीं चली तो सेना के जवानों ने लगाया जोर, धक्का देकर ट्रेन को किया स्टार्ट, अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा वीडियो।”

वायरल वीडियो का फैक्ट चेक करते हुए ऑपइंडिया ने पाया कि वीडियो में ट्रेन इलेक्ट्रिक रूट खड़ी दिखाई दे रही है। ऐसे में यह तो स्पष्ट था कि ट्रेन इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव या डीजल-इलेक्ट्रिक लोकोमोटिव है। इन ट्रेनों के इंजन इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन मोटर्स पर आधारित होते हैं। इसलिए धक्का देने से ट्रेन के स्टार्ट होने की संभावना बिल्कुल नहीं है। वहीं वीडियो के एक हिस्से में रेलवे कर्मी के जैकेट पर SCR लिखा दिखाई दे रहा है।

इसलिए ऑपइंडिया ने SCR यानि दक्षिण मध्य रेलवे का ट्विटर अकाउंट चेक किया। वहाँ वायरल वीडियो की सच्चाई सामने आ गई।

दक्षिण मध्य रेलवे ने वायरल वीडियो को लेकर स्पष्टीकरण जारी किया है। रेलवे ने कहा है, “यह वीडियो 7 जुलाई, 2023 को ट्रेन नंबर 12703 में आग लगने की घटना से संबंधित है। वीडियो ट्रेन में लगी आग को और अधिक फैलने से रोकने के लिए रेलवे कर्मचारियों और स्थानीय पुलिस द्वारा पीछे के डिब्बों को अलग करने का है। इमरजेंसी को देखते हुए इंजन से मदद की प्रतीक्षा किए बिना ही डिब्बों को अलग करने के लिए यह प्रयास किया गया था।”

इस तरह ऑपइंडिया के फैक्ट चेक में वीडियो के साथ किया जा रहा दावा पूरी तरह फेक पाया गया। ‘ट्रेन स्टार्ट नहीं हो रही थी, इसीलिए लोगों ने धक्का लगाया’ वाली बाते एकदम झूठ है। दूसरी बात, ये पहली नजर में देखने से ही लग रहा है कि ये ‘वन्दे भारत’ एक्सप्रेस ट्रेन नहीं है। न तो ट्रेन नया दिख रहा है, न उसका डिजाइन वैसा है। ये असल में ‘फलकनुमा एक्सप्रेस’ ट्रेन है, जो हावड़ा जंक्शन से लेकर सिकंदराबाद तक चलती है।