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तलवार, चाकू, बम लेकर हुआ जब मराड का हिंदू नरसंहार: कट्टरपंथी-वामपंथी मिलीभगत का एक नमूना, मस्जिदों में मिले थे हथियार

हिंदुओं के नरसंहारों की अंतहीन सूची में, एक कत्लेआम की बर्बर दास्तां 2 मई की तारीख में भी दर्ज है। 19 साल पहले आज ही केरल के मराड में 8 निर्दोष हिंदू मछुआरों को पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) व इंडियन मुस्लिम लीग (IUML) के इस्लामी कट्टरपंथियों और सीपीआई (एम) जैसे वामपंथी संगठनों की मिलीभगत ने मौत के घाट उतारा था।

2003 में मराड का हिंदू नरसंहार

बताया जाता है कि 2 मई 2003 को मराड में उस घटना को अंजाम देने के लिए तलवार, चाकू, देसी बम पहले से मस्जिद में छिपाए गए थे। इन सब हथियारों का इस्तेमाल बाद में कट्टरपंथियों द्वारा हिंदुओं को मारने के लिए किया गया। हमले में 8 हिंदुओं की निर्मम मौत हुई थी जबकि 2 महिला समेत 16 हिंदू गंभीर रूप से घायल हुए थे।

शुक्रवार के दिन घटना को अंजाम उस समय दिया गया जब एक ओर हिंदू मछुआरे आने वाले खतरे से अनभिज्ञ मराड बीच के किनारे बैठ शांति से बात कर रहे थे और दूसरी ओर पास के मंदिर में पूजा पाठ करके श्रद्धालु घर लौट रहे थे। माहौल शांत था इसलिए किसी को कोई शक भी नहीं हुआ। मगर इसी बीच अचानक कट्टरपंथियों की भीड़ ने सामने से आकर उस शांत माहौल में दहशत फैला दी।

कट्टरपंथियों की इस भीड़ के हाथ में तलवार, चाकू, लाठी, डंडे सब थे। हिंदू कुछ समझ पाते कि तब तक ये भीड़ पागलों की तरह हर दिशा में फैल गई। देखते ही देखते हिंदुओं को धारदार हथियारों से मारना शुरू कर दिया गया। भीड़ के शोर और पीड़ितों की चीख धीरे-धीरे बढ़ती गई कि तभी हमलावरों में से किसी एक ने बम फेंक कर अपना डर कायम करना चाहा। शुक्र बस इतना था कि वो बम मौके पर फटा नहीं। वरना न जाने कितने हिंदुओं की जान उसमें चली जाती।

मस्जिद लौट गए हमलावर, औरतों ने बनाई ह्यूमन चेन

हिंदुओं को बर्बरता से मौत के घाट उतारने के बाद तमाम हमलावर वापस जुमा मस्जिद चले गए। वहाँ उन्होंने दोबारा अपने खून से सने कपड़े और हथियारों को छिपाया। इस पूरे प्रकरण दौरान मुस्लिम महिलाओं की भूमिका भी कुछ कम नहीं थी। जिस समय सारे आरोपित मस्जिद के भीतर सबूत मिटा रहे थे तब स्थानीय मुस्लिम औरतों ने ह्यूमन चेन बना ली थी और पुलिस को मस्जिदों में घुसने से रोका था। किसी तरह पुलिस ने इस चेन को तोड़कर एंट्री की तो पाया कि मस्जिद के अंदर 90 देसी बम और 40 चाकू थे।

मराड नरसंहार- एक पूर्वनियोजित साजिश

2003 का ये हिंदू नरसंहार कोई अचानक घटित घटना नहीं थी। ये एक पूर्व नियोजित साजिश थी। जिसे पीएफआई, पीडीपी, मुस्लिम लीग के कट्टरपंथियों ने रचा था। घटना के बाद इसकी जाँच के लिए एक आयोग गठित हुआ और घटना की जाँच हुई। पड़ताल के दौरान हैरान करने वाले तथ्य सामने आए और पता चल पाया कि इस हमले को अंजाम देने की फिराक में तो कट्टरपंथी 1 साल पहले से थे। वो 2002 से कुछ मुस्लिमों की मौतों का बदला लेना चाहते थे जिनकी जान एक पानी विवाद के कारण दो पक्षों के बीच हुई झड़प में गई थी। इसी घटना का बदला लेने के लिए इन्होंने मस्जिद में बम, पेट्रोल बम, तलवार, चाकू, लोहे की रॉड, डंडे आदि छिपाए थे और 2 मई की शाम अचानक मराड बीच पर बैठे हिंदुओं पर हमला किया था।

वामपंथी-कट्टरपंथी की मिलीभगत और हिंदू नरसंहार

इस जाँच में मुस्लिम लीग के लोगों को भी समन भेजा गया जिन्होंने स्वीकार किया था कि ये हमला उन मुस्लिमों की मौत का बदला लेने के नीयत से हुआ जो हिंदुओं के साथ झड़प में मारे गए थे। अपना पल्ला झाड़ने के लिए मुस्लिम लीग ने  सारा इल्जाम भाजपा और आरएसएस पर डालना चाहा। हालाँकि हमलावरों को पकड़कर जब पूछताछ हुईं तो ये सामने आया कि ये घटना एक साजिश के तहत अंजाम दी गई। इसे रचने वाले मुस्लिम संगठन के अलावा कॉन्ग्रेस और एनडीएफ संगठन के भी थे।

इसके अलावा केरल की वामपंथी सरकार पर इस घटना के बाद आरोप लगा कि उनके दबाव के कारण पुलिस इस घटना को रोकने की जगह मूक दर्शक बनी रही जबकि उन्हें पहले से आने वाले खतरे की सूचना थी। रिपोर्ट दावा करती हैं कि पुलिस की मौजदूगी में उस दिन हिंदुओं के घरों को, मछुआरों की नावों को आगे के हवाले किया गया था, तब भी कोई चूँ नहीं निकली। स्थानीयों को भी शक रहा कि इतनी बड़ी हिंसा बिन प्रशासन और पुलिस की मिलीभगत के कैसे अंजाम दे दी गई। लोग आरोप लगाते हैं कि ये पूरी घटना पाकिस्तान से फंड पाकर वामपंथियों-कट्टरपंथियों ने प्लॉन की थी ताकि मराड को हिंदूविहीन किया जा रहे थे।

मालूम हो कि मराड के नरसंहार को आज 19 साल हो गए हैं। साल 2009 में हिंसा को अंजाम देने वाले 148 आरोपितों में 62 को उम्र कैद की सजा गई और 1 पर भीड़ को उकसाने का आरोप लगाकर 5 साल की सजा सुनाई गई। कुछ समय बाद केरल के हाई कोर्ट ने 24 अन्य और आरोपितों को आजीवन जेल की सजा मुकर्रर की और सुनवाई के दौरान पाया कि ये हिंसा हिंदुओं के विरुद्ध एक गहरी साजिश थी। 2021 में इसी मामले में 2 और लोग दोषी बनाए गए जो 2010-11 के बाद से फरार थे।

बंगाल में मुस्लिमों का पॉलिटिकल वीटो… कौन राज करेगा, कैसे राज करेगा – वही तय करते हैं: स्वपन दासगुप्ता

पश्चिम बंगाल। साल 2021, तारीख 2 मई। कुछ जीत रहे थे सत्ता की कुर्सी। कई हार रहे थे जिंदगी की जंग। कहीं उड़ रहा था हरा गुलाल। कइयों का बह रहा था लहू। जीत के साथ कुछ कहला रहे थे माननीय। बहुतों की लूटी जा रही थी इज्जत-आबरू।

2 मई 2021 – यह दिन कइयों के लिए थम सा गया है। ये कई लोग पश्चिम बंगाल नाम के राज्य से हैं। यह राज्य विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में ही है। यह वो राज्य है, जिनके लोगों को जान बचा कर दूसरे राज्य भागना पड़ा। उस दिन जब लोकतंत्र के सत्ताधारी जीत रहे थे… खुद लोकतंत्र हार रहा था। लोकतंत्र के असली सिपाहियों को रौंदा जा रहा था।

आपातकाल में क्या स्थिति थी – नागरिकों की, नेताओं की, सत्ता-प्रशासन की? 40 साल से कम उम्र वाले लोग इसकी कथा-कहानियाँ सिर्फ सुन-पढ़ सकते हैं। लेकिन पश्चिम बंगाल में 2 मई 2021 को जो किया गया, वो 21वीं सदी के भारत का आपातकाल ही था। ममता बनर्जी की सरकार इसे लेकर लाख सफाई दे, उस दिन हुआ हर एक दमन, हत्या, ज्यादती, लूट… सब कुछ दर्ज है। ममता बनर्जी को यह आसानी से भूलने नहीं दिया जाएगा।

राज्यसभा सांसद स्वपन दासगुप्ता से इसी मुद्दे को लेकर बंगाल की राजनीति, समाज आदि पर ऑपइंडिया की लंबी बातचीत हुई।

सवाल: बीजेपी ने बंगाल के कार्यकर्ताओं के लिए कुछ नहीं किया या जितना करना चाहिए था, उतना नहीं किया – यह आरोप बीजेपी के ही चाहने वाले लगाते हैं, ट्विटर-फेसबुक पर लिखते हैं। इस पर आप की प्रतिक्रिया।

जवाब: यह सच है। यह हिंसा अप्रत्याशित थी। किसी ने उम्मीद नहीं की थी। चुनाव में किसी की हार और जीत होती है लेकिन काउंटिंग की जगह से ही जिस तरह हिंसा की शुरुआत हुई, ऐसा कभी देखा नहीं गया। आज तक भारत में किसी भी जगह ऐसा देखा नहीं गया। इस स्तर की हिंसा के लिए बीजेपी का कार्यकर्ता या संगठन तैयार नहीं था – यह आरोप बिल्कुल सही है।

हमारे कार्यकर्ताओं के ऊपर हमले हुए हैं। 50000 हजार के करीब कार्यकर्ताओं को घर से बेघर होना पड़ा। 20 के आप-पास लोगों का हत्या कर दी गई। इन सब के बावजूद हमारा संगठन अपने कार्यकर्ताओं की थोड़ी-बहुत भी मदद नहीं कर पाया। बहुत कोशिश करने के बाद भी अभी तक बहुत जगह 5-10 हजार रुपया भी अपने कार्यकर्ताओं तक हम नहीं पहुँचा पाए हैं। राजनीतिक रूप से हम इस आधार पर फेल रहे हैं – इस बात को मैं स्वीकारता हूँ।

सवाल: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद हिंसा – इसका राजनीतिक अर्थ या मैसेज आप क्या समझते हैं?

जवाब: 2 मई 2021 की दोपहर के बाद जो हिंसा शुरू हुई, उसका एक ही उद्देश्य था – बीजेपी का जो संगठन है, उसकी रीढ़ तोड़ दी जाए। 38% वोट बीजेपी को मिला। बहुसंख्यक हिंदू का वोट बीजेपी के पक्ष में रहा। मतलब एक निर्णायक वोट का समर्थन हमारे साथ था। इसलिए उनका उद्देश्य था कि हिंसा से ऐसा माहौल पैदा किया जाए, जिससे भविष्य में बीजेपी के समर्थकों को खत्म कर दिया जाए, संगठन की रीढ़ तोड़ दी जाए। खौफ ऐसा हो कि बीजेपी का समर्थक घर से ही नहीं निकले और यही हुआ भी।

पश्चिम बंगाल में 2021 विधानसभा चुनाव के बाद जो उपचुनाव हुए, जो नगरपालिका चुनाव हुए, इनमें आप वो खौफ देख सकते हैं। इन चुनावों में कई जगह बीजेपी के लोग नामांकन तक कराने नहीं गए। इसे आप एक उदाहरण से समझ सकते हैं। बोलपुर एक छोटा सा शहर है। शांतिनिकेतन से सटा हुआ। विधानसभा चुनाव में यहाँ के नगरपालिका वाले एरिया में बीजेपी को बहुमत था। अब इस बार जब नगरपालिका का चुनाव हुआ तो हमारे किसी उम्मीदवार ने नामांकन तक नहीं भरा।

यह सब छोटे-छोटे उदाहरण हैं। लेकिन हकीकत यह है कि बहुत सारे जगहों में जहाँ बीजेपी को जीत मिली थी, वहाँ अब बूथ मैनेज करने की स्थिति भी नहीं है संगठन के पास। बीजेपी के कार्यकर्ताओं का मनोबल बहुत नीचे है। इनमें से बहुत यह भी कहते हैं कि केंद्र सरकार क्या कर रही है, हमारी तो केंद्र में सरकार भी है। लेकिन कानून-व्यवस्था राज्य को देखना होता है, इसमें केंद्र सरकार चाह कर भी कुछ नहीं कर सकती। अगर हाई कोर्ट ने संज्ञान नहीं लिया होता तो कुछ भी नहीं होता, कोई एक्शन नहीं लिया जाता।

पश्चिम बंगाल में संगठन के तौर पर बीजेपी पर बड़ा प्रभाव पड़ा है। लेकिन यह भी सच है कि आज हिंसा का जो माहौल बनाया गया है, इसकी प्रतिक्रिया तय है। बीजेपी को अभी से धीरे-धीरे संगठन के तौर पर काम करना होगा। कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाना सबसे बड़ा काम होगा बीजेपी के लिए। इस समय उनका मनोबल टूटा हुआ है। इन कार्यकर्ताओं को एक सक्षम नेता और राजनैतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है।

सवाल: देश की राजधानी और व्यापार वाला बंगाल… साहित्य और क्रांति वाले बंगाल से लेकर अब तक का बंगाल – इस बहुआयामी पतन को कितना राजनीतिक, कितना सामाजिक मानते हैं आप?

जवाब: यह पतन राजनीतिक भी है, सामाजिक भी है। इस पतन की शुरुआत होती है 60 के दशक से। नक्सल आंदोलन, सीपीएम वाली राजनाति… 50-60 साल में जो-जो हुआ, वही सब मिल कर अब वापस रूप दिखा रहा है। इसके असर साफ दिख रहे हैं। बंगाल से हो रहा आर्थिक पलायन स्पष्ट है। बंगाल पहले उद्योग-व्यवसाय का लीडर हुआ करता था। तब बॉम्बे के समान था कलकत्ता। अब कहाँ से कहाँ पहुँच गया। दुर्गा पूजा, छुट्टी, त्योहार… बंगाल के हर शहर को आप ‘सिटी ऑफ फेस्टिवल’ कह सकते हैं लेकिन ‘सिटी ऑफ प्रोडक्शन’ नहीं कह सकते यहाँ के किसी भी शहर को।

बंगाल में उद्योग का जो ह्रास हो रहा है, उससे वहाँ की संस्कृति पर असर पड़ेगा, लोगों की सृजन क्षमता प्रभावित होगी इसके कारण। ऐसा नहीं है कि बंगाल में रहने वालों की सृजन क्षमता बिल्कुल खत्म हो गई है। लेकिन यह भी सच है कि अपनी क्षमता का 50% भी ऐसे वातावरण में वहाँ की जनता उपयोग में नहीं ला पाती है। राज्य में जब शांति का माहौल होता है, तभी कला-संस्कृति का विकास-विस्तार संभव होता है। और प्रशासन की इन्हीं सब अच्छी चीजों का बंगाल में अभाव है।

पश्चिम बंगाल में 60 के दशक से जो शुरुआत राजनीतिक स्तर पर हुई थी, अब उसका पूरा असर यहाँ के सामाजिक जीवन पर पड़ा है। दुखद यह है कि अगर इसी तरह की राजनीति कुछ और दिन चली तो समाज का बचा-खुचा ढाँचा भी खत्म हो जाएगा।

सवाल: बंगाल में डेमोग्राफी चेंज के कारण हिंदू-मुस्लिम समीकरण या कुछ इलाकों में हिंदुओं से घृणा वाली बात को आप कैसे देखते हैं?

जवाब: इससे इनकार नहीं किया जा सकता। बंगाल में ये हो रहा है। वहाँ की कुल आबादी का 30% मुस्लिम (कोई 23 बोलता है, कोई 25%… लेकिन वोटिंग वाला आँकड़ा मानें तो 30%) हैं। बांग्लादेश से लगे बॉर्डर जिलों में जैसे – नदिया का बड़ा भाग, दिनाजपुर, मुर्शिदाबाद, मालदा, दक्षिण 24 परगना का बड़ा हिस्सा… ये सब पूरा मुस्लिम बहुल हो चुका है।

इसके पीछे 2 कारण हैं: पहला कारण – सीपीएम की राजनीति के कारण 1990 और 2000 के दशक में बांग्लादेश से अच्छी-खासी संख्या में अवैध घुसपैठ। दूसरा कारण – बहुत सारे बंगाली अच्छे काम, अच्छी सुविधा जैसी चीजों की खोज में पश्चिम बंगाल को छोड़ कर दूसरे राज्यों में पलायन कर गए। आज बैंगलोर में 12 लाख बंगाली हैं। दिल्ली में भी बंगाली भरे हुए हैं। यह एक छोटा सा उदाहरण है। आखिर इसका कारण क्या है? क्या वजह है कि ज्यादातर बंगाली हिंदुओं ने ही पश्चिम बंगाल से पलायन किया है?

इन 2 कारणों के अलावा एक तीसरी समस्या भी है – रोहिंग्या। बड़ी तादाद में रोहिंग्या घुसपैठिए भी यहाँ आकर बस रहे हैं। इन सब को मिला कर पश्चिम बंगाल की डेमोग्राफी बहुत हद तक बदल चुकी है, बिगड़ चुकी है।

पश्चिम बंगाल क्यों बना? पहले यूनाइटेड बंगाल था। फिर विभाजन क्यों हुआ? ये सोचिए। जो ईस्ट बंगाल था, वहाँ हिंदुओं की जनसंख्या 30% थी, आज वहाँ हम 10% भी नहीं हैं। तो ये 20% हिंदू आबादी कहाँ गई? ज्यादातर तो पश्चिम बंगाल में ही आए। क्यों आए? क्योंकि उन लोगों को लगा कि यह उनकी मातृभूमि है। बंगाली हिंदुओं को रहने के लिए जमीन मिले, यही वह वजह थी कि बंगाल विभाजन के लिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने माँग रखी। इसी सोच के आधार पर ही पश्चिम बंगाल तैयार हुआ। लेकिन अफसोस ‘पश्चिम बंगाल बंगाली हिंदुओं का घर’ आज यह मौलिक सोच ही नष्ट हो रही है। डेमोग्राफी चेंज के कारण ही यह हो रहा है। डेमोग्राफी चेंज कितनी बड़ी समस्या है, इसको असम से भी समझ सकते हैं। 80-90 के दशक में वहाँ इसको लेकर इतना बड़ा आंदोलन भी हुआ।

पश्चिम बंगाल में डेमोग्राफी चेंज के राजनीतिक पहलू को देखें तो आज वहाँ मुस्लिम समुदाय का पॉलिटिकल वीटो है। इसका मतलब हुआ कि मुस्लिम समुदाय ही यह निर्णय करता है कि कौन राज करेगा… और कैसे राज करेगा। इसका मतलब यह भी हुआ कि सत्ता के ऊपर में नाम ममता बनर्जी का हो सकता है, 10 और बंगाली हिंदू नेता-मंत्री हो सकते हैं लेकिन पीछे जो इनको हाँक रहा होगा, वो मुस्लिम समुदाय ही होगा। इसको एक छोटे से उदाहरण से ऐसे समझिए कि कोलकाता में आप मुस्लिम लड़कों को बिना हेलमेट लगाए बाइक चलाते देख सकते हैं, पुलिस हाथ बाँधे खड़ी रहती है। इस राजनीति ने पश्चिम बंगाल में ऐसा ही परिवेश तैयार किया है।

सवाल: आप खुद मीडिया से जुड़े रहे हैं। ऐसे में रेप-हत्या जैसी घटनाओं को कम कर दिखाना या एकदम से छिपाने वाले मीडिया संस्थानों को लेकर सरकारी पहल क्या होनी चाहिए? बंगाल हिंसा के दौरान कुछ मीडिया हाउस ने जिस तरह की कवरेज की, टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट पर कलकत्ता हाई कोर्ट के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने तो मीडिया हाउस से माफी माँगने को भी कहा। इन मीडिया/पत्रकारों पर आपकी प्रतिक्रिया।

जवाब: बंगाल में आज जो मीडिया है, यह फ्री मीडिया नहीं है। वहाँ की मीडिया पर कोई बंदूक ताने खड़ा नहीं रहता है। बंदूक के खौफ से ये लोग सच या खबर को नहीं छुपाते बल्कि छुपाते हैं पैसों के कारण। सरकार पैसे देती है, सरकार के अनुसार खबरों की रिपोर्टिंग होती है। लेकिन इसके दूरगामी परिणाम होते हैं। मान लीजिए कि बंगाल हिंसा को लेकर भविष्य में कोई इतिहासकार जानकारी जुटा रहा होगा तो क्या पाएगा? वो जब अभी की खबरों-अखबारों को पलटेगा तो ‘कुछ भी नहीं हुआ, छोटी-मोटी घटना हुई’ सोचकर बैठ जाएगा।

बंगाल की मीडिया में आज आप पाएँगे कि ममता बनर्जी को लेकर एक कंपीटिशन है – कौन कितनी बार उनकी फोटो फ्रंट पेज पर छाप रहा है। इससे भी बड़ा एक उदाहरण देखिए। इंडिया गेट के सामने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति लगाने का निर्णय हुआ। यह बंगालियों की भावना के लिए एक बड़ी बात है। लेकिन पश्चिम बंगाल के सबसे बड़े अंग्रेजी अखबार के फ्रंट पेज तो छोड़िए, अंदर के 10वें पेज पर भी इस खबर को जगह नहीं मिली। ऐसा इसलिए क्योंकि यह मोदी सरकार का निर्णय था। यह वहाँ की मीडिया की मानसिक अवस्था है। यह फ्री प्रेस नहीं है। यह मीडिया भी नहीं है। ये ज्यादा से ज्यादा टाइपिस्ट भर हैं।

सवाल: मीडिया, सच, इतिहास, लेखन आदि से जुड़ा है यह सवाल। विक्रम संपथ पर जब लिबरल लॉबी टूट पड़ी थी तो आपने टाइम्स ऑफ इंडिया में एक आर्टिकल लिखा। बंगाल हिंसा का जब इतिहास लिखा जाएगा, क्या तब तक इतिहासकारों की राष्ट्रवादी फौज तैयार रहेगी या इक्के-दूक्के होने के कारण तब भी ये वोक लोगों के हमले झेलते रहेंगे?

जवाब: राजनीतिक चश्मे से देखें तो राष्ट्रवादी शक्ति आज बहुत आगे बढ़ चुकी है। सच लेकिन यह भी है कि राष्ट्रवादी सोच से प्रेरित बौद्धिक चेतना या प्रभाव में अभी भी कमी है। यह चिंता का विषय है और हमें सोचना चाहिए कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? तथाकथित बुद्धिजीवी संस्थानों पर आज भी लिबरल/वामपंथी/वोक आदि लोगों का कंट्रोल है। ऐसे में हमारा कर्तव्य बनता है कि हम लोग अपनी कमियों को पहचानें, अपने लोगों को तैयार करें।

विक्रम संपथ पर लिबरलों का अटैक क्यों हुआ? इसलिए हुआ क्योंकि उसने राष्ट्रवादी एंगल से ऐसा इतिहास लिख डाला, जिसे खारिज नहीं किया जा सकता है। लिबरलों/वामपंथियों की जबकि सोच यह है कि ये तो राष्ट्रवादी है, दक्षिणपंथी है… ये क्या लिखेगा! लेकिन विक्रम संपथ ने ऐसा बेजोड़ लिखा, तभी लिबरल-लॉबी का अटैक भी बहुत तेज और देर तक रहा। अगर घटिया लिखा गया होता तो निश्चित ही वो ज्यादा ध्यान नहीं देते और खिल्ली भी उड़ाते।

राष्ट्रवादी सोच और इससे जुड़े लोगों को लेकर लिबरलों/वामपंथियों की मानसिकता यही है। विक्रम संपथ ने उनकी इसी मानसिकता पर चोट की। कैसे? उसने शानदार लिखा, परिष्कृत लिखा, ऐसा लिखा जो अकाट्य था… इसलिए उस पर इन तथाकथित बुद्धिजीवियों (लिबरलों/वामपंथियों) ने हमले किए।

इस प्रकरण से हमें सीख लेनी चाहिए। अगर हमें सच में लिबरलों/वामपंथियों के सबसे मजबूत हिस्से पर चोट करनी है तो हमें खुद को बौद्धिक स्तर पर मजबूत बनाना होगा, तथाकथित बुद्धिजीवी संस्थानों पर अपना कंट्रोल करना होगा।

सवाल: पश्चिम बंगाल में हिंसा की राजनीति और उससे उपजे माहौल को लेकर प्रतिक्रिया की बात आपने कही। बंगाल के लोग बदलाव चाहते हैं, यह RSS के एक प्रतिनिधि से भी सुनने को मिला। बीजेपी नेता या एक सासंद के तौर पर इस बदलाव का रोडमैप क्या होगा, बीजेपी सत्ता में कैसे आएगी?

जवाब: सबसे पहले यह जान लीजिए कि बीजेपी बंगाल में एक नई पार्टी है। पूरे भारत भर में बीजेपी की यात्रा को आप जनसंघ तक देख सकते हैं। लेकिन बंगाल में यह 3-4 साल भी पुरानी पार्टी नहीं कही जा सकती। सही मायने में एक पार्टी के स्तर पर जो प्रभाव होना चाहिए, जो नेतृत्व दिखना चाहिए, बंगाल में बीजेपी अभी उस स्तर तक नहीं पहुँची है। हमें बंगाल में नेतृत्व का सृजन करना होगा।

2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी को ग्रामीणों इलाकों में शानदार समर्थन मिला। लेकिन शहरी क्षेत्रों में, जिसको बंगाली भद्रलोक कहते हैं, वहाँ इस समर्थन का अभाव रहा… एकदम जीरो। कोलकाता और आस-पास के जो एरिया हैं, जैसे – कोलकाता, हावड़ा आदि… वहाँ 109 सीट है, पुराना प्रेसिडेंसी डिविजन जिसे कहते थे। यहाँ बीजेपी को 1-2 सीट ही मिल पाया। इसका मतलब हुआ कि हमारा तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग पर प्रभाव या ऐसे लोगों पर प्रभाव जो ऑपिनियन मेकर हैं, नहीं के बराबर है। कुल मिलाकर प्रभावशाली बंगालियों को अपने प्रभाव में नहीं ले पाई है बीजेपी।

पश्चिम बंगाल में बीजेपी के लिए यह एक बड़ा प्रोजेक्ट है। सांगठनिक स्तर की बात करें तो ओबीसी बंगाली, अनुसूचित जाति-जनजाति आदि लोगों के बीच हमें बहुत समर्थन है। लेकिन शहरी क्षेत्र में यह नदारद है। पश्चिम बंगाल में मुस्लिम 30% वोटिंग वीटो के साथ शुरुआत करते हैं, ऐसे में बीजेपी को सबको साथ लेकर चलना होगा। इसलिए बंगाल के शहरी क्षेत्र, प्रभावशाली बंगाली, तथाकथित बुद्धिजीवी वर्गों को अपने साथ जोड़ने वाला प्रोजेक्ट बीजेपी के लिए सबसे अहम है।

जेल में ही गिर पड़े नवाब मलिक, गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती- वकील ने कोर्ट में बताया: ED ने जमानत याचिका का किया विरोध

अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के गुर्गों और सम्बन्धियों से जमीन खरीदने से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में गिरफ्तार महाराष्ट्र के मंत्री और राकांपा नेता नवाब मलिक ने अपने खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए विशेष पीएमएलए कोर्ट में जमानत याचिका दायर की थी। जिसका ईडी ने विरोध किया है। नवाब मलिक के वकील ने कोर्ट को बताया कि मुंबई के जेजे अस्पताल में उनके मुवक्किल को भर्ती कराया गया है, उनकी हालत गंभीर है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, दाऊद की बहन हसीना पारकर से जमीन खरीदने के आरोप में नवाब मलिक को 23 फरवरी, 2022 को गिरफ्तार किया गया था। वहीं आज नवाब मलिक को एक मेडिकल इमरजेंसी का हवाला देते हुए मुंबई के जेजे अस्पताल में भर्ती करवाया गया और उनकी ओर से दावा किया गया है कि उनकी हालत गंभीर है।

मुंबई की पीएमएलए कोर्ट ने जेजे अस्पताल से नवाब मलिक के स्वास्थ्य पर रिपोर्ट माँगी है और 5 मई को सुनवाई की अगली तारीख तय कर दी है। वहीं नवाब मलिक के वकील के अनुरोध के बाद अदालत ने मलिक की बेटी नीलोफर और दामाद समीर खान को अस्पताल में उनसे मिलने की अनुमति दे दी है।

बता दें कि इससे पहले शुक्रवार (29 अप्रैल, 2022) को सुप्रीम कोर्ट ने नवाब मलिक की याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया तो वहीं पीएमएलए कोर्ट ने उनकी न्यायिक हिरासत को 6 मई तक बढ़ा दिया था। मलिक ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसके तहत हाईकोर्ट ने उनके तत्काल रिहाई के अंतरिम याचिका को खारिज कर दिया था।

गौरतलब है कि ED ने भगोड़े अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में नवाब मलिक के खिलाफ बृहस्पतिवार (28 अप्रैल, 2022 ) को 5,000 से अधिक पन्नों का आरोपपत्र दाखिल किया था। यह मामला नवाब मलिक के अंडरवर्ल्ड कनेक्शन और उससे जुड़ी संपत्तियों की खरीद में पैसों की हेराफेरी से जुड़ा है।

शाहीन बाग़ और जामिया में मिले ड्रग्स का पाकिस्तान कनेक्शन, नार्को टेरर से घुसपैठ की कोशिश: दुबई जाता है हवाला का पैसा

नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) ने अंतरराष्ट्रीय ड्रग्स रैकेट का पर्दाफाश किया है। एनसीबी ने सीएनएन-न्यूज 18 को बताया, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रावलपिंडी से भारत में नार्को टेरर और ड्रग्स का कारोबार किया जा रहा है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) ने 29 अप्रैल, 2022 (शुक्रवार) को भोगल से दो अफगानी और रविवार को हवाला संचालक शमीम अहमद को गिरफ्तार किया था। शाहीन बाग से गिरफ्तार किए गए शख्स से पूछताछ के बाद दिल्ली में तीन गिरफ्तारियाँ हुईं।

एनसीबी ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए 28 अप्रैल को दिल्ली के शाहीन बाग और जामिया इलाके से 350 करोड़ की 50 किलो हेरोइन जब्त की थी। NCB और सुरक्षा एजेंसियों के सूत्रों के मुताबिक, तालिबान नार्को टेरर और ड्रग्स कारोबार के जरिए भारत में घुसपैठ की बड़ी साजिश रच रहा है।

एजेंसी के मुताबिक, गिरफ्तार किए गए दोनों अफगानी नागरिकों ने पूछताछ में कबूला है कि यह पूरा ऑपरेशन अफगानिस्तान से नियंत्रित है, जहाँ अफीम उगाई जाती है। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले हफ्ते भारत में ड्रग्स स्मगलिंग स्लीपर सेल और पाकिस्तान-अफगानिस्तान के लिंक का खुलासा किया गया था। उन्होंने (NCB) बताया था कि कैसे पाकिस्तान ड्रग्स के कारोबार के लिए अपनी भौगोलिक स्थिति का लाभ उठा रहा था। अफगानिस्तान के साथ इसकी सीमा जुड़ी हुई है, ऐसे में ड्रग्स के लिए यह प्रमुख कॉरिडोर के रूप में काम करता है।

मालूम हो कि शाहीन बाग के अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कैराना और मुज्जफरनगर से भी अफगानिस्तान, तालिबान, पाकिस्तान और दुबई ड्रग्स नेक्सस के तार जुड़े हुए हैं। शाहीन बाग से गिरफ्तार किए गए शख्स ने एनसीबी को बताया कि वह ड्रग्स को प्रोसेस करने के बाद उसे भारत के अलग-अलग हिस्सों में बेचता था। डिस्पैच के बाद, उसने बहुत पैसे जमा किए, जिसमें दो से तीन महीने का समय लगा था। यह पैसा हवाला के जरिए दुबई भेजा गया था। उन्होंने एनसीबी के अधिकारियों को यह भी बताया कि अब तक उन्होंने 10 करोड़ रुपए इकट्ठे कर लिए हैं, जो उन्हें अभी भी मिलना बाकी है। मूल रूप से कैराना के रहने वाले हवाला संचालक शमीम अहमद ने जाँच करने वाले अधिकारियों को बताया कि दुबई में कारोबार संभालने वाला व्यक्ति भी कैराना का ही है।

बता दें कि बीते दिनों उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर से करीब 1300 करोड़ रुपए मूल्य की हेरोइन बरामद की गई थी। इसके तार भी शाहीन बाग में पकड़े गए ड्रग्स रैकेट से जुड़ रहे हैं। इस ठिकाने की जानकारी एनसीबी को यूपी के कैराना निवासी अहमद से पूछताछ के आधार पर मिली थी। अहमद को दो अफगानी नागरिकों के साथ शाहीन बाग से भारी मात्रा में ड्रग्स के साथ पकड़ा गया था। शाहीन बाग में एनसीबी ने 27 अप्रैल 2022 को छापेमारी की थी।

उस्मानिया यूनिवर्सिटी ने राहुल गाँधी को कैम्पस में आने की नहीं दी इजाजत, नाराज़ कॉन्ग्रेस ने TRS पर फोड़ा ठीकरा

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी को उस्मानिया यूनिवर्सिटी ने अपने कैंपस में आने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है। कॉन्ग्रेस सांसद राहुल गाँधी 6 और 7 मई को तेलंगाना के दौरे पर रहेंगे। इस दौरान राहुल गाँधी 7 मई को हैदराबाद के उस्मानिया यूनिवर्सिटी का भी दौरा करने वाले थे, जो अलग राज्य के आंदोलन का केंद्र रहा है। इसे एक गैर-राजनीतिक दौरा बताया जा रहा था।

इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक, यूनिवर्सिटी ने लिखित रूप से दौरा रद्द करने की जानकारी नहीं दी है, लेकिन उस्मानिया यूनिवर्सिटी की आधिकारिक परिषद ने कथित रूप से इनकार किया है। इसके बाद से कॉन्ग्रेस और टीआरएस आमने-सामने हैं।

इस मामले को लेकर कॉन्ग्रेस ने तेलंगाना राष्ट्र समिति के नेतृत्व वाली सरकार पर आरोप लगाया है कि टीआरएस ने राहुल गाँधी के दौरे को रोकने के लिए यूनिवर्सिटी पर दबाव बनाया है। कॉन्ग्रेस विधायक जग्गा रेड्डी ने कहा है कि राज्य सरकार ने राहुल गाँधी की उस्मानिया यूनिवर्सिटी में विजिट को लेकर संस्थान पर दबाव बनाया है।

उन्होंने कहा कि उस्मानिया यूनिवर्सिटी हमेशा तेलंगाना आंदोलन समेत छात्र आंदोलनों के लिए जानी जाती है। हालाँकि, उन्होंने साफ कहा था कि ये दौरा गैर राजनीतिक होगा लेकिन फिर भी उन्होंने इसे कैंसिल कर दिया। 23 अप्रैल को इस कार्यक्रम के लिए आवेदन किया गया था। जिसमें कहा गया था कि ये दौरा गैर-राजनीतिक होगा। इसके अलावा इसी मामले को लेकर कुछ छात्रों ने हाईकोर्ट का रुख किया है। वो तेलंगाना हाईकोर्ट चले गए और कहा कि उनके कैंपस में राहुल गाँधी के दौरे की अनुमति दी जाए। उधर, तेलंगाना कॉन्ग्रेस वारंगल में करीब 5 लाख समर्थकों के साथ राहुल गाँधी की एक भव्य बैठक की तैयारी कर रही है।

2017 से संस्थान में गैर-शैक्षणिक गतिविधियों पर लगी है रोक

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक एक अधिकारी ने बताया कि साल 2017 में कार्यकारी परिषद ने एक प्रस्ताव रखा था जिसमें राजनीति के साथ-साथ गैर-शैक्षणिक गतिविधियों पर कैंपस में रोक लगा दी थी। ऐसा प्रस्ताव जून 2017 में रखा गया था और अपना लिया गया था। इसके एक साल पहले हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को यूनिवर्सिटी कैंपस में राजनीतिक और सार्वजनिक बैठकों की अनुमति नहीं देने के आदेश दिए थे। उस दौरान रानीतिक गतिविधियों को लेकर हो रही परेशानी को लेकर कोर्ट में एक याचिका डाली गई थी।

‘बच्चा हो रहा हो, फिर भी शौहर के दिल की आग बुझाने जाना ही पड़ेगा’: मौलवी की औरतों को सलाह, ईद से पहले वीडियो वायरल

ईद से पहले सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें मुस्लिम औरतों को अपने शौहर के जिस्म की आग बुझाने की बात कही जा रही है। हालाँकि, थोड़ी सी पड़ताल के बाद हमने पाया कि यह वीडियो पुराना है। यह वीडियो सोशल मीडिया पर कहीं-कहीं सितम्बर 2021 में भी अपलोड किया गया है। वक्ता के रूप में मजलिस को सम्बोधित करने वाला कोई और नहीं बल्कि मौलाना जरजिस अंसारी है। जिसके इससे पहले भी कई विवादास्पद वीडियो वायरल हो चुके हैं।

अभी के वायरल वीडियो में जिसे किसी प्रोफेसर साहब नाम के यूजर ने ट्वीट किया है। इस वीडियो में मौलाना जरजिस को कहते सुना जा सकता है, “यदि बीवी को बच्चा हो रहा हो और ऊँटनी पर भी बैठी हो तो भी जचगी के वक्त, बच्चे की पैदाइश का वक्त करीब हो, तो भी अल्लाह के नबी ने फ़रमाया है कि उस वक़्त भी यदि तुम्हारा शौहर हमबिस्तरी को बुलाए, तुम्हारा फायदा उठाना चाहे तो उस वक़्त भी अपने शौहर के पास जाना पड़ेगा। इसलिए कि उसके दिल में लगी आग को तेरे अलावा कोई बुझा नहीं सकती।”

मौलाना ने इसी वायरल वीडियो में आगे कहा, “यदि उसके आग को तूने नहीं बुझाया तो तेरा शौहर गलत काम में पड़ सकता है। इधर-उधर जा सकता है, उसके चिलमन में आग लग सकती है। वो गलत राह पर जा सकता है। फ़रमाया कि औरत को इस हाल में भी अपने शौहर के पास आना होगा। और इस पोज़िशन में भी वह अपने शौहर को जिस्म का फायदा उठाने से नहीं रोक सकती। उसके अरमान को पूरा करोगी, उसके मकसद को पूरा करोगी इसमें ना-नू नहीं होना चाहिए।”

हालाँकि, यह वीडियो 2021 का बताया जा रहा है, क्योंकि फेसबुक के कई इस्लामिक पेजों पर इसे सितम्बर 2021 में अपलोड किया गया था। यहाँ वो पूरा वीडियो भी देख सकते हैं। जिसका एक हिस्सा एक बार फिर अब 2022 में ईद के मौके पर वायरल हो रहा है।

बता दें कि यह पहली बार नहीं जब मौलाना जरजिस का कोई वीडियो या फ़तवा वायरल हुआ है। इससे पहले भी कई विवादित वीडियो वायरल हो चुके हैं। जहाँ साल 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को लेकर भी मौलाना ने विवादित बयान दिया था। वहीं मार्च 2021 के वायरल वीडियो में मौलाना लिपस्टिक लगाने वाली व कार्यक्रमों में चुस्त कपड़े पहनने वाली महिलाओं पर अपना गुस्सा उतार रहा है। वह लड़कियों के बेपर्दा घूमने पर पूरी कौम को मरा हुआ और आईसीयू में पड़ा बता रहा है।

मौलाना जरजिस का यह वीडियो यूट्यूब पर राजधानी चैनल पर 24 मार्च 2021 को अपलोड हुई थी। इस वीडियो में वह लड़कियों पर अपना गुस्सा उतार रहा था। मौलाना कहता है कि जलसों में लड़कियाँ ऐसे सज के आती हैं, जैसे इनकी शादी हो और लड़के इसलिए आते हैं कि पसंद कर सकें किससे शादी करेंगे। मौलाना के मुताबिक ये सब देख उसे ऐसा लगता है, जैसे एक कु%$ के पीछे दस दस कु%& लगे हों।

वीडियो में मौलाना कहता है, “जलसों में लिपस्टिक लगाकर आने का क्या मामला है। बताइए किसको दिखा रही हो। चिपके हुए कपड़े और चिपकी हुई लैगी… पैरों से चिपकी हुई लैगी किसके लिए? हमारी बहनें हैं, हमारी बेटियाँ और हमारी बीवीयाँ हैं… कितनी बार बताया जाए कि जिसकी बेटी, जिसकी बहन जिसकी माँ बेपर्दा घूमती है वह भड़** है। नहीं बोलूँगा दय्यूस। भड़** बोलूँगा क्या कर लेंगे आप? जिसकी बहन बेपर्दा घूम रही है वो भाई भड़** है। जिसकी बेटी बेपर्दा घूम रही है वो बाप भड़** है। जिसकी बीवी बेपर्दा घूम रही है उसका शौहर भड़** है। दय्यूस। अगर योगी हमसे पूछें कि दय्यूस क्या होता है तो बताना पड़ेगा कि दय्यूस भड़** होता है। उन्हें क्या पता। कल मोदी जी पूछेंगे कि दय्यूस किसको कहते हैं तो बताना पड़ेगा। दय्यूस को भड़** कहते हैं। ”

गौरतलब है कि इससे पहले मौलाना जरजिस ने साल 2019 में कहा था, “अगर मोदी या शाह उन्हें देश से बाहर फेंकने की कोशिश कर रहे हैं तो वह भारत के कोने-कोने में ‘जिहाद’ करेंगे।” वीडियो में मौलाना को यह कहते हुए सुना गया था, “इनके बाप के बाप के बाप की भी ताक़त नहीं हैं कि हमें बाहर निकाल दें। हमें निकाल के तो दिखा मोदी, हम भी जिहाद करने से पीछे नहीं हटेंगे।”

शौहर ने 3 बार दिया ट्रिपल तलाक, देवर ने 2 बार किया हलाला, अब बहनोई से हलाला का दबाव: महिला ने दर्ज कराई FIR, जान से मारने की धमकी

UP के रायबरेली जिले से ट्रिपल तलाक और हलाला का अजीब मामला सामने आया है। यहाँ एक महिला ने खुद को 3 बार 3 तलाक दिए जाने की पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है। महिला का आरोप यह भी है कि 2 बार उसका हलाला भी हुआ है। दोनों बार हलाला उसके देवर ने किया। पुलिस 30 अप्रैल, 2022 (शनिवार) को बताया कि इस मामले में FIR दर्ज कर के जाँच शुरू कर दी गई है।

पीड़िता के मुताबिक, “मेरा निकाह 2015 में मोहम्मद आरिफ के साथ हुआ था। उसके बाद मेरे शौहर ने मुझे ट्रिपल तलाक दिया। फिर मेरा निकाह और हलाला उन्होंने अपने भाई मोहम्मद जाहिद के साथ करवाया। जाहिद ने मुझे तलाक दिया और मेरा निकाह 3 महीने 13 दिन बाद फिर मोहम्मद आरिफ से हुआ। यही घटना एक बार फिर दोहराई गई। अब मेरे शौहर मुझ पर अपने बहनोई के साथ हलाला का दबाव बना रहे हैं। मैं इसके लिए तैयार नहीं हूँ। जब मैंने ऐसा करने से मना किया तब मुझे मारने की धमकी दी गई है।”

एक अन्य वीडियो में महिला को कहते सुना गया, “मेरे शौहर ने मुझे 3 बार और देवर ने 2 बार तीन तलाक दिया है। मुझे कुल 5 बार तीन तलाक मिल चुका है। तब मैंने पुलिस का सहारा लिया है। मेरी कोई सुनवाई नहीं हुई। मैं थाने, SP और CO साहब के यहाँ गई। CO (DSP) साहब के यहाँ दोनों को बुलवाया गया। लेकिन वो (विपक्षी) नहीं आए।”

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पीड़िता मिल एरिया थानाक्षेत्र की रहने वाली है। DSP वंदना सिंह के आदेश पर पीड़िता की शिकायत दर्ज हुई है। DSP वंदना सिंह के मुताबिक, “एक महिला ने शौहर द्वारा 2 बार तीन तलाक और देवर द्वारा हलाला की शिकायत दर्ज करवाई थी। इस मामले में FIR दर्ज कर के जाँच की जा रही है। अभी तक किसी की गिरफ्तारी नहीं की गई है।”

150 वृद्धाश्रमों की मदद, Apollo की चेयरमैन भी: जानिए कौन हैं राम चरण की पत्नी उपासना, सामाजिक कार्यों के कारण होती है तारीफ़

साउथ के सुपरस्टार राम चरण के बारे में तो आप जानते ही होंगे। एक्टर की प्रोफेशनल लाइफ से आप वाकिफ होंगे ही। पर क्या आप राम चरण की पत्नी उपासना कामिनेनी के बारे में जानते हैं? राम चरण की तरह उनकी पत्नी उपासना भी एक सफल बिजनेसवुमन हैं। उन्हें उपासना कोनिडेला के नाम से भी जाना जाता है। उनकी सुंदरता के चर्चे तो होते ही हैं, लेकिन इसके साथ ही वह समाज सेवा करने में भी काफी सक्रिय रहती हैं।

वह अपोलो डिपार्टमेंट की चेयरमैन होने के साथ ही अपोलो लाइफ इंश्योरेंस की मैनेजिंग डायरेक्टर हैं। उपासना ने एक बार फिर से अपने सोशल वर्क से लोगों का दिल जीत लिया है। जानकारी के मुताबिक, रामचरण की पत्नी उपासना कोनिडेला पूरे भारत में बिलियन हार्ट्स बीटिंग फाउंडेशन के माध्यम से 150 से अधिक वृद्धाश्रमों की मदद करती हैं। एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री ट्रैकर रमेश बाला ने ट्वीट कर इसकी जानकारी देते हुए कहा कि इस नेक कार्य के जरिए उपासना कोनिडेला ने एक बार फिर अपना सुनहरा दिल दिखाया है।

बता दें कि वह अपोलो की चेयरमैन होने के साथ ही भारत सरकार (वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड इंडिया) द्वारा नियुक्त WWF इंडिया की “फॉरेस्ट फ्रंटलाइन हीरोज की राजदूत” हैं। इसके अलावा वह बी पॉजिटिव मैगजीन की एडिटर इन चीफ और ऑनर हैं। यह मैगजीन स्वास्थ्य और लोक कल्याण से मुद्दों पर केंद्रित है। उपासना ने लंदन की Regent यूनिवर्सिटी से इंटरनेशनल बिजनेस मार्केटिंग एंड मैनेजमेंट की डिग्री ली है।

11 दिसंबर, 2011 को राम चरण-उपासना की सगाई हुई। साल 12 जून 2012 को कपल सात फेरों के बंधन में बँधा। शादी के इतने साल बाद भी राम चरण और उपासना में न्यूली मैरिड जैसा प्यार है। दोनों की पर्सनैलिटी एक दूसरे से काफी अलग है। दोनों के बीच बहुत गहरी बॉन्डिंग देखी जाती है। राम चरण जब 2020 में कोविड पॉजिटिव हो गए थे, तब उस वक्त पत्नी उपासना के साथ अपने घर पर ही वक्त बिताया था, जिसकी एक फोटो उन्होंने शेयर कर लिखा था “ये वक्त भी गुजर जाएगा। बेहतर 2021 की उम्मीद है।”

बाद में उपासना ने बताया था जल्द ही वो ठीक होकर ‘बैक इन एक्शन’ मोड में आ गए थे और अपने काम पर लौटकर शूटिंग में लग गए थे। बता दें कि राम चरण साउथ के मेगास्टार चिरंजीवी के बेटे हैं।

किसी ने मोबाइल पर लगाई फोटो, किसी ने बच्ची का रखा नाम: कराची में खुद को बम से उड़ाने वाली बलूच महिला बनी ‘Legend’ , Pak में ट्रेंड हुआ नाम

पाकिस्तान के कराची यूनिवर्सिटी के बाहर आत्मघाती हमला करने वाली शारी बलूच पाकिस्तान में ट्रेंड हो रही है। इस ट्रेंड में शारी को लीजेंड बताया जा रहा है। तमाम लोग उसकी वीडियो शेयर करके उसकी तारीफ कर रहे हैं। कोई उसे शहीद बता रहा है तो कोई उसे प्रेरणा कह रहा है। इससे पहले शारी की तारीफ बलूचिस्तान के स्थानीय लोगों द्वारा घटना को अंजाम देने के बाद होनी शुरू हुई थी

ट्विटर पर ShariTheLegend हैशटैग ट्रेंड होने के साथ देख सकते हैं कि किसी ने शारी को सम्मान देते हुए उसकी तस्वीर अपने डिस्प्ले स्क्रीन पर लगाई है और किसी ने अपनी बेटी का नाम ही शारी रख दिया है।

एक ट्विटर यूजर ने शारी की फोटो मोबाइल स्क्रीन पर सेट करके स्क्रीनशॉट शेयर किया और लिखा, “मैंने अपने मोबाइल की लॉक स्क्रीन पर शारी की फोटो लगाई है। ये एक छोटा सी श्रद्धांजलि है शारी बलूच को। सिंध से शारी और अपने बलूचियों के लिए प्यार, जो अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे हैं।”

इसी तरह एक नवजात बच्ची की तस्वीर सोशल मीडिया पर शेयर हो रही है। जिसके सामने केक है और उस पर लिखा है- ‘वेलकम शारी बलूच।’

कई यूजर्स शारी बलूच को कुर्बानी का सबसे बड़ा उदाहरण मान रहे हैं। समझाया जा रहा है कि शारी सिर्फ बलूचवासियों के लिए ही नहीं बल्कि अन्य देशों के लिए भी प्रेरणा हैं।

गौरतलब है कि कराची यूनिवर्टी के बाहर 26 अप्रैल को चीनी नागरिकों को निशाना बनाने वाली शारी बलूच की हाल में बलूच लिबरेशन आर्मी ने वीडियो शेयर की थी। इस वीडियो में शारी कह रही थी कि उसने इतना बड़ा कदम बलूचिस्तान की आजादी के लिए और वहाँ के लोगों को दी जा रही यातनाओं के खिलाफ उठाया। वीडियो में शारी ने बताया कि कैसे पाकिस्तान के प्रति नफरत ने उन्हें इस निर्णय को लेने में मदद की।

शारी ने वीडियो में कहा, “जब महिला राजनीति कर सकती है, प्रदर्शन कर सकती है, शिक्षा ले सकती है और अपनों के लिए सड़कों पर बैठ हो सकती है तो हम आजादी की जंग का हिस्सा भी बन सकते हैं।” वीडियो में आत्मघाती हमलावर ने सभी बलूच औरतों से एक साथ आने को कहा ताकि आजादी के लिए लड़ रहे बलूच पुरुषों को साथ मिले। वीडियो में वो याद करती है कि कैसे उसे जीवन में सब मिला और जिंदगी में कोई कमी नहीं थी लेकिन फिर भी उसने ये निर्णय लिया और इसका उसे कोई गम नहीं है। उसने मजीद ब्रिगेड को शुक्रिया अदा किया कि उन लोगों ने उसे बलूच की पहली महिला फिदायीन हमलावर बनने का मौका दिया।

आमिर खान की ‘दंगल’ का रिकॉर्ड तोड़ने की ओर ‘KGF 2’, दर्शकों को नहीं जमी ‘रनवे 34’ और ‘हीरोपंती 2’: देखें किसकी कितनी कमाई

कन्नड़ सुपरस्टार यश (Yash) की फिल्म ‘केजीएफ: चैप्टर 2’ (KGF 2 Chapter 2) का जलवा तीसरे हफ्ते में भी बरकरार है। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर ताबड़तोड़ कमाई कर रही है। सिनेमाघरों में बॉलीवुड के दो बड़े सितारों अजय देवगन और टाइगर श्रॉफ की फिल्म रिलीज होने के बावजूद ‘केजीएफ: चैप्टर 2’ दर्शकों की पहली पसंद बनी हुई है। यश की फिल्म को तीसरे हफ्ते भी दर्शकों का प्यार मिल रहा है। यही कारण है कि हाल ही में रिलीज हुई अजय देवगन अभिनीत ‘रनवे 34’ और टाइगर श्रॉफ की ‘हीरोपंती 2’ कोई खास कमाल नहीं कर पा रही हैं।

ट्रेंड एनालिस्ट तरण आदर्श के मुताबिक, प्रशांत नील के डायरेक्शन में बनने वाली फिल्म केजीएफ चैप्टर 2 (हिंदी) तीसरे हफ्ते भी शानदार कमाई कर रही है। शनिवार के फिल्म ने 7.25 करोड़ और 18वें दिन यानी तीसरे रविवार को 9 से 11 करोड़ का बिजनेस किया। कुल मिलकार केवल हिंदी में केजीएफ चैप्टर 2 ने 369.31 करोड़ रुपए कमा लिए हैं। इसके साथ ही तरण ने लिखा, “यश की फिल्म इस ईद पर आमिर खान की फिल्म ‘दंगल’ का रिकॉर्ड भी तोड़ ​देगी।”

दरअसल, फिल्म के बेहतरीन प्रदर्शन को देखते हुए उम्मीद लगाई जा रही है कि ईद की छुट्टी पर ‘केजीएफ 2’ की (हिंदी) कमाई में इजाफा हो सकता है। ईद पर यह फिल्म आमिर खान की सुपरहिट फिल्म ‘दंगल’ का रिकॉर्ड तोड़ सकती है। यानी ईद के मौके पर यश की ‘केजीएफ 2’ की कमाई 400 करोड़ के करीब पहुँच सकती है।

गौरतलब है कि दो दिन पहले ही ‘केजीएफ: चैप्टर 2’ (KGF Chapter 2) ने वर्ल्डवाइड 1000 करोड़ का आँकड़ा पार किया है। ट्रेंड एनालिस्ट रमेश बाला के अनुसार, डायरेक्टर प्रशांत नील की फिल्म ने वर्ल्डवाइड 16 वें दिन 1000 करोड़ रुपए की कमाई की है। दंगल, बाहुबली 2 और RRR के बाद इतने कम समय में 1000 करोड़ का कलेक्शन करने वाली ‘केजीएफ: चैप्टर 2’ चौथी भारतीय फिल्म है। फिल्म की सक्सेस को देखते हुए हाल ही में KGF-2 सुपरस्टार यश ने पान मसाला और इलायची ब्रांड के लिए करोड़ों का एंडोर्समेंट ऑफर भी ठुकरा दिया।