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एलन मस्क करेंगे ट्विटर CEO पराग अग्रवाल की छुट्टी, ट्रंप को बैन करवाने वाली विजया की भी होगी विदाई: रिपोर्ट में दावा- रिप्लेसमेंट की तलाश जारी

टेस्ला कंपनी के मालिक व दुनिया के सबसे अमीर आदमियों की सूची में शामिल एलन मस्क के हाथ में ट्विटर के जाने के बाद अब कंपनी में होने वाले बदलावों को लेकर खबरें मीडिया में हैं। बताया जा रहा है कि ट्विटर पर मस्क का आधिकारिक तौर पर मालिकाना हक होने के बाद कंपनी के सीईओ यानी कि पराग अग्रवाल की कंपनी से छुट्टी हो सकती है। उनके अलावा ट्विटर में लॉ मामलों की देखरेख करने वाली व ट्रंप के अकॉउंट बैन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली लॉ हेड विजया गड्डे भी काम से जाएँगी।

बता दें कि इससे पहले मस्क को लेकर खबरें आई थीं कि वह ट्विटर कंपनी के शीर्ष प्रबंधन से खुश नहीं है और शायद इसमें बदलाव करें। इसके बाद कंपनी के कर्मचारियों को अपनी नौकरी जाने का डर सताने लगा। लेकिन उन्हें इस बात का आश्वासन दिया गया कि अभी कंपनी के कागजी कार्रवाई पूरी होने में 6 माह का समय है और कम से कम तब तक उनकी नौकरी सेव है।

अब इन्हीं खबरों के बीच रॉयटर्स ने रिपोर्ट की है कि एलन मस्क कंपनी के लिए नया सीईओ खोजने में जुट गए हैं जिसका मतलब है कि अग्रवाल का सीईओ पद से जाना तय है। इससे पहले अग्रवाल को लेकर बताया गया था कि अगर मस्क अपनी नई कंपनी से उसके पुराने सीईओ, जो कि पराग अग्रवाल हैं, को 12 महीने से पहले हटाते हैं तो उन्हें 43 करोड़ डॉलर (₹33,00,93,80,000) उन्हें देने पड़ेंगे।

वहीं लीगल हेड विजया गड्डे की बात करें तो उनके पद पर भी गाज गिर सकती है। न्यूयॉर्क पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार विजया गड्डे ने पिछले साल बतौर ट्विटर लीगल हेड 17 मिलियन डॉलर यानी कि 130 करोड़ रुपए की कमाई की थी। कथिततौर पर गड्डे को निकालने पर मस्क को उन्हें 12.5 मिलियन डॉलर (₹95,95,75,000) देने होंगे।

गौरतलब है कि ट्विटर में पराग अग्रवाल ने पिछले वर्ष ही जैक डॉर्सी को रिप्लेस किया था। वही विजया गड्डे इस कंपनी से 2011 से साथ जुड़ी हुई हैं। हाल में उन्हें लेकर खबर आई थी कि ट्विटर के बिकने के बाद उन्होंने एक टीम मीटिंग की थी जिसमें उन्होंने कंपनी के भविष्य को लेकर चिंता जताई थी और फूट-फूट कर रोई भी थीं। वह ट्विटर वही विवादित अधिकारी हैं जिनका नाम अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति का ट्विटर बैन करवाने और हंटर बाइडेन की स्टोरी सेंसर करवाने वालों में लिया जाता है।

CM हेमंत पर खुद को ही खनन पट्टा आवंटित करने का आरोप, चुनाव आयोग ने नोटिस भेज कर पूछा – क्यों न हो कार्रवाई?

चुनाव आयोग ने सोमवार (2 मई 2022) को झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन (Jharkhand CM Hemant Soren) को नोटिस भेजकर उनसे जवाब माँगा है। आयोग ने उनसे यह बताने के लिए कहा है कि खुद को खनन पट्टा जारी करने के लिए उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की जानी चाहिए? जो आरपी अधिनियम की धारा 9ए का उल्लंघन करती है। धारा 9ए सरकारी अनुबंधों के लिए किसी सदन से अयोग्यता से संबंधित है।

चुनाव आयोग पहले से इस मामले की जाँच कर रहा है कि क्या मुख्यमंत्री ने अपने पद का इस्तेमाल लाभ के लिए किया है? चुनाव आयोग ने बीते दिनों झारखंड के मुख्य सचिव सुखदेव सिंह को पत्र लिख कर ‘ऑफिस ऑफ प्रॉफिट’ पर जवाब माँगा था। मुख्यमंत्री सोरेन पर अपने पद का दुरूपयोग करते हुए खुद को ही खदान आवंटित करने का आरोप याचिकाकर्ता शिव शंकर वर्मा ने लगाया था।

हाईकोर्ट ने की थी टिप्पणी

शिवशंकर शर्मा नाम के एक व्यक्ति ने खनन पट्टा अपने नाम करने को लेकर सोरेन के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। उस याचिका पर हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश डॉ. रवि रंजन और न्यायाधीश सुजीत नारायण प्रसाद की खंडपीठ ने सुनवाई करते हुए कहा था कि संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को अपनी शक्तियों का दुरुपयोग नहीं करना चाहिए।

याचिका में कहा गया था कि सोरेन राज्य के मुख्यमंत्री और वन एवं पर्यावरण विभाग के विभागीय मंत्री हैं। उनके पास खनन विभाग भी है। ऐसे में उन्होंने खुद ही पर्यावरण क्लीयरेंस के आवेदन दिया और क्लीयरेंस लेकर खुद ही खनन पट्टा हासिल कर लिया। ऐसा करना पद का दुरुपयोग और जनप्रतिनिधि कानून का उल्लंघन है

क्या है मामला?

मुख्यमंत्री सोरेन पर आरोप है कि उन्होंने पद का दुरुपयोग करते हुए अपने नाम पर पत्थर खदान का पट्टा लिया। यह खदान राँची जिले के अनगड़ा मौजा, थाना नं-26, खाता नं- 187, प्लॉट नं- 482 में स्थित है। भाजपा ने आरोप लगाया था कि इस पट्टे की स्वीकृति के लिए सोरेन 2008 से ही प्रयास कर रहे थे।

मुख्यमंत्री बनने के बाद पत्रांक संख्या 615/M, दिनांक 16-06-2021 के जरिए पट्टा की स्वीकृति का आशय का पत्र (LOI) विभाग द्वारा जारी कर दिया है। यह विभाग मुख्यमंत्री के पास ही है। स्टेट लेबल इंवायरमेंट इंपेक्ट असेसमेंट अथॉरिटी (SEIAA) ने 14-18 सितम्बर 2021 को अपनी 90वीं बैठक में पर्यावरण स्वीकृति की अनुशंसा भी कर दी।

नन्हे अली ने दोस्त रोहिद अली से कराया अपनी ही बीवी का बलात्कार, विरोधियों को फँसाना चाहता था: पहले से है पेशेवर अपराधी

उत्तर प्रदेश के बदायूँ जिले से सनसनीखेज मामला सामने आया है। जिले के सहसवान क्षेत्र में विरोधियों को फँसाने के लिए शौहर नन्हे अली (अब्बा का नाम कासिम अली) ने अपने ही दोस्त रोहिद अली (अब्बा का नाम ऐशर अली) से अपनी बीवी का बलात्कार करवाया। पुलिस ने आरोपित शौहर को गिरफ्तार कर लिया है। बदायूँ पुलिस ने ट्वीट कर मामले की जानकारी दी है। उन्होंने लिखा, “इस सम्बन्ध में थाना सहसवान ने उचित धाराओं के तहत आरोपित शौहर को गिरफ्तार कर लिया गया है। मामले की जाँच जारी है।”

जानकारी के मुताबिक, रविवार (1 मई, 2022) की रात सहसवान कोतवाली क्षेत्र के एक गाँव में रहने वाली महिला ने पुलिस में अपने शौहर के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। उसने अपनी शिकायत में आरोप लगाया था कि उसका शौहर उसे खेत में घुमाने की बात कहकर बाइक से जंगल में ले गया और वहाँ फोन करके अपने दोस्त रोहिद अली को बुलाया, जिसने बाद में उसके साथ दुष्कर्म किया।

पीड़िता ने पुलिस को बताया कि दुष्कर्म के एक घंटे बाद भी जब उसके शौहर का मन नहीं भरा, तो उसने फिर अपने दोस्त को बुलाया और उसका दोबारा बलात्कार करवाया। बताया जा रहा है कि यह सब महिला के शौहर ने अपने विरोधियों को फँसाने के लिए किया था। इसके बाद उसने फोन करके पुलिस को बुलाया और अपने विरोधी दो लोगों पर उसकी बीवी के साथ दुष्कर्म करने का आरोप लगाया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, महिला की शिकायत पर पुलिस पीड़िता और उसके शौहर को कोतवाली ले आई। पूछताछ में महिला ने बताया कि उसका पति गाँव के दो अन्य लोगों को फँसाने का प्रयास कर रहा था, जबकि दुष्कर्म उसके द्वारा बुलाए गए दोस्त ने ही किया था। महिला ने यह भी बताया कि वह अपने शौहर के दोस्त को पहचान सकती है। पुलिस अधीक्षक (ग्रामीण) सिद्धार्थ वर्मा ने कहा कि पीड़िता की ​शिकायत पर शौहर व उसके दोस्त के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर आरोपित नन्हें को गिरफ्तार कर लिया गया है। उसके साथी की तलाश की जा रही है।

बता दें कि अपनी ही बीवी का रेप करवाने वाला शौहर नन्हे अली पेशेवर अपराधी है। उसके खिलाफ पुलिस में कई मामले दर्ज हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, दिसंबर 2016 में टाटा सफारी कार में इंजन चोरी करने के आरोप में पुलिस ने नन्हें अली के खिलाफ मामला दर्ज किया था।

जब दिल्ली में हुआ था दक्षिण भारतीय सिनेमा का अपमान: मेगास्टार चिरंजीवी ने याद किए वो दिन, कहा- उन्होंने हिंदी सिनेमा को ही दिखाया भारतीय सिनेमा

मेगास्टार चिरंजीवी ने अपने जीवन के एक ऐसे पल का खुलासा किया जब उन्होंने खुद को ‘अपमानित’ महसूस किया। हाल ही में एक वीडियो वायरल हुआ है, जिसमें चिरंजीवी अपने उस अपमानजनक दौर को याद करते हुए 1989 की एक घटना का जिक्र करते हैं। दिल्ली में फिल्म आचार्य के पूर्व-रिलीज़ के कार्यक्रम बोलते हुए, अभिनेता चिरंजीवी ने बताया कि उन्हें 1989 दिल्ली बुलाया गया था क्योंकि उनकी फिल्म रुद्रवीणी को नरगिस दत्त पुरस्कार से सम्मानित किया जा रहा था।

उन्होंने कहा कि पुरस्कार समारोह से एक दिन पहले, सरकार ने एक हाई टी का आयोजन किया, जिसके दौरान वह भारतीय सिनेमा के इतिहास को प्रदर्शित करने वाली एक हाल में टहल रहे थे। उन्हें याद आया कि दीवार में पृथ्वीराज कपूर से लेकर अमिताभ बच्चन तक और उनके बारे में एक संक्षिप्त विवरण के साथ चित्रित किए गए थे।

चिरंजीवी ने खुलासा किया, “मैं दक्षिण की फिल्मों पर कुछ देखने की उम्मीद में आगे बढ़ता रहा। हालाँकि, जयललिता के साथ एमजीआर और प्रेम नजीर की एक तस्वीर ही थी। उन्होंने इसे साउथ फिल्म्स का नाम दिया। यहाँ तक कि वे राज कुमार या विष्णुवर्धन या एनटी रामाराव या नागेश्वर राव या शिवाजी गणेशन या यहाँ तक ​​कि हमारे फिल्म उद्योग के दिग्गज फिल्म निर्माताओं को नहीं पहचानते थे। उस पल मैं बहुत अपमानित महसूस कर रहा था। यह अपमान जैसा था। उन्होंने हिंदी सिनेमा को भारतीय सिनेमा के रूप में चित्रित किया था। जबकि अन्य फिल्मों को ‘क्षेत्रीय फिल्मों’ के रूप में वर्गीकृत किया गया था और उन्हें सम्मान नहीं दिया गया था।”

चिरंजीवी ने कहा कि उन्होंने इसके बारे में तब बात की थी लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। हालाँकि, बाहुबली या आरआरआर के साथ, उन्हें गर्व महसूस होता है कि अब देश दक्षिण भारत के निर्देशकों, अभिनेताओं और लेखकों को पहचान रहा है। उन्होंने कहा कि फिल्मों ने क्षेत्रीय बाधाओं को तोड़ दिया है और सम्मानपूर्वक अखिल भारतीय फिल्म होने का टैग अर्जित किया है।

चिरंजीवी ने आगे कहा, “बाहुबली ने मुझे गौरवान्वित किया क्योंकि इसने क्षेत्रीय और हिंदी सिनेमा के बीच के बैरियर को तोड़ा और साबित कर दिया कि हम सभी भारतीय फिल्म उद्योग का हिस्सा हैं। इन फिल्मों ने तेलुगु दर्शकों को गौरवान्वित किया है। हमें बाहुबली और आरआरआर जैसी फिल्में देने के लिए एसएस राजामौली को सलाम। उन्हें हमेशा याद किया जाएगा।” चिरंजीवी ने उन्हें ‘भारतीय सिनेमा के देवता’ का टैग दिया।

चिरंजीवी ने यश की KGF 2 और अल्लू अर्जुन की पुष्पा की भी तारीफ की। उन्होंने कहा कि इन फिल्मों की सफलता से प्रभास सहित कई अभिनेता अखिल भारतीय अभिनेता बन गए हैं।

आगे बात बोलते हुए अभिनेता ने यह भी उल्लेख किया कि कैसे एसएस राजामौली भी एक कारण है कि आचार्य जैसी फिल्म संभव हो सकता है। बता दें कि चिरंजीवी का रोल सबसे पहले उनके बेटे को ऑफर हुआ था। उन्होंने इस बात का खुलासा भी किया कि आचार्य में उनके रोल करने की पहली पेशकश उनके बेटे राम चरण को की गई थी।

यति नरसिंहानंद ने डासना मंदिर पर हुए हमलों को गिनाया, कहा – पिछले सभी महंत मार डाले गए या भगा दिए गए, मुस्लिमों के प्रभाव में पुलिस निष्क्रिय

गाजियाबाद स्थित डासना मंदिर के महामंडलेश्वर यति नरसिंहानंद गिरी ने 1 मई, 2022 (रविवार) को UP के अलीगढ़ में हुई धर्म संसद में पुलिस और प्रशासन पर अपनी सुरक्षा में लापरवाही का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि यदि उनके साथ खड़े होने वाले हजारों लोग न होते तो अब तक उनका काफी नुकसान हो चुका होता। इस धर्म संसद के मामले में यति नरसिंहानंद ने जितेंद्र नारायण त्यागी (पूर्व में वसीम रिज़वी) के 4 महीने से जेल में होने पर निराशा जताई।

यति नरसिंहानंद को उत्तराखंड में हुई धर्म संसद मामले में गिरफ्तार भी किया गया था। इसके अलावा उनके खिलाफ देश के विभिन्न हिस्सों में केस भी दर्ज हैं। ऑपइंडिया ने यति नरसिंहानंद गिरी से मिल कर यह जानने का प्रयास किया कि जिन मामलों में वो शिकायतकर्ता है, उन केसों की क्या स्थिति है। इसी के साथ डासना क्षेत्र और मंदिर के इतिहास के बारे में भी जानने का प्रयास किया।

कभी ये इलाका था हिन्दू बहुल

यति नरसिंहानंद ने बताया, “कभी ये डासना इलाका हिन्दू बहुल हुआ करता था। लेकिन अब यहाँ हिन्दू नाममात्र के लिए बचे हैं। हिन्दुओं का पलायन हुआ। इन्होंने (मुस्लिमों) ने अपनी जनसंख्या भी तेजी से बढ़ाई। यहाँ के हिन्दू व्यापारी गाजियाबाद, पिलखुआ और नॉएडा जा कर बस गए हैं। अब यहाँ 95% लोग मुस्लिम हैं। मेरे मंदिर में आने वाली भीड़ पूरे देश के लोगों की होती है।”

मुस्लिम आक्रामकारी तोड़ चुके हैं मंदिर को

मंदिर के इतिहास के बारे में यति नरसिंहानंद ने कहा, “डासना देवी मंदिर भारत के सबसे प्राचीन शक्तिपीठों में से एक है। इतिहास में इस मंदिर को मुस्लिम आक्रमणकारी तोड़ चुके हैं जिसके बाद ये फिर से बना। इसको दुबारा बने लगभग 300 साल हो चुके हैं।”

मुझ से पहले के सभी महंत या तो मार दिए गए या भगा दिए गए

महामंडलेश्वर यति नरसिंहानंद गिरी ने कहा, “मेरी हत्या के प्रयास के साथ इस मंदिर डकैतियाँ भी डाली जा चुकी हैं। मुझ से पहले यहाँ जितने भी संत आए वो या मार डाले गए या भगा दिए गए। यहाँ पर मौनी बाबा नाम से एक बड़े प्रसिद्ध संत रहे थे जिनका नाम रामानंद गिरी था। वो जूना अखाड़े के महंत थे। उन्हें भगाने के लिए 3 बार मारपीट की गई और मंदिर में डकैती डाली गई। इस दौरान उनकी पूरी जमापूँजी को लूट लिया गया। अंतिम डकैती में उन्हें इतना मारा गया कि उनकी पसलियाँ टूट गईं और वो साल 2003 के आसपास मंदिर छोड़ कर चले गए।”

यति नरसिंहानंद के मुताबिक, “मौनी बाबा के बाद उनके शिष्य गणेश गिरी यहाँ आये पर उनके साथ भी इतनी मारपीट हुई कि वो भी मंदिर छोड़ कर चले गए। मौनी बाबा के पहले जो संन्यासी यहाँ रहते थे, उनका नाम ब्रह्मानंद था। आज तक ब्रह्मानंद का पता ही नहीं चला कि वो कहाँ गए। बस इतनी जानकारी मिली कि मंदिर में डकैती पड़ी और सामान की तोड़फोड़ हुई। तब ये भी नहीं पता चल पाया कि महंत ब्रह्मानंद का क्या हुआ? ऐसे और भी कई मामले हुए हैं।”

हमारी शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं करती पुलिस

यति नरसिंहानंद गिरी ने पुलिस पर उनकी शिकायतों को नज़रअंदाज़ करने का आरोप लगाया। उन्होंने बताया, “यहाँ मुस्लिमों की बहुत बड़ी जनसंख्या है। इसलिए, यहाँ जिला पंचायत और नगर पंचायत जैसे पदों पर मुस्लिम जीतते हैं। पुलिस उनके राजनीतिक प्रभाव में रहती है। अगस्त 2021 में बिहार से आ कर इसी मंदिर में रुके स्वामी नरेशानंद पर हमला कर के उनके पेट को फाड़ दिया गया था। लेकिन आज तक उस केस में एक भी अपराधी को नहीं पकड़ा गया है जबकि वो CCTV कैमरे में दिख रहा है। मुस्लिमों की आबादी का इतना बड़ा भय है यहाँ प्रशासन में कि सरकार किसी की भी रही हो, इस मंदिर से जुड़े विवाद में सुनवाई हमेशा मुस्लिमों की ही हुई है। कई लोगों को तो हमने खुद पकड़ कर पुलिस को दिए हैं।”

मंदिर में डकैतियों और चरमपंथी हमलों की लम्बी श्रृंखला, लेकिन गिरफ्तारी एक भी नहीं

यति नरसिंहानंद ने आगे कहा, “2007-2008 में मैं इस मंदिर का महंत बना। 10 जुलाई 2010 में इस मंदिर में भीषण डकैती पड़ी थी। यहाँ मौजूद सभी लोगों के साथ मारपीट की गई थी। उस दिन मेरी हत्या का प्रयास किया गया लेकिन मैं रात को ही मंदिर से चला गया था। हर किसी से मेरे बारे में पूछा गया। इस केस में भी आज तक किसी को नहीं पकड़ा गया और केस भी नहीं खुला। इसके बाद 23 जुलाई’ 2010 को इस मंदिर को ध्वस्त करने के लिए मुस्लिम भीड़ ने हमला किया था। इस केस में पुलिस रिपोर्ट के बाद भी एक भी हमलावर आज तक गिरफ्तार नहीं किया गया। इस हमले के बाद 17 सितंबर, 2014 को मंदिर में भीषण डकैती डाली गई। इस डकैती में गोला बारी तक हुई थी। आज तक उस डकैती का भी कोई एक आरोपित पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाने के बाद भी नहीं पकड़ा गया।”

मेरी हत्या के फतवे देने वालों पर आज तक नहीं हुई कार्रवाई

अपने ऊपर हुए हमलों और साजिशों के बारे में यति नरसिंहानंद ने बताया, “हम पर हमला करने के लिए जैश के आतंकी आए लेकिन सिर्फ एक को पकड़ कर केस बंद कर दिया गया। पता भी नहीं चला कि उसे किसने भेजा था। मेरी हत्या के लिए हर दिन मौलाना फतवे देते हैं जो गूगल और सोशल मीडिया पर देखे जा सकते हैं। इन फतवा देने वालों में से पुलिस किसी को नहीं पकड़ती। पकड़ना तो दूर, उनकी चर्चा भी नहीं होती है। 2 जून 2021 को मंदिर में हिन्दू से मुस्लिम बने जीजा – साले सर्जिकल ब्लेड ले कर मेरी हत्या करने आए थे। उनका चालान बहुत मामूली धाराओं में हुआ और अब वो जमानत पर छूट चुके हैं। कल वो फिर मेरे खिलाफ कोई प्लान बना रहे होंगे। उसके बाद बहुत बड़ा गिरोह पकड़ा गया धर्मांतरण वालों का, जिनके पास साइनाइड तक था। लेकिन, पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया और साइनाइड की कहीं चर्चा भी नहीं की। इस हमले की चर्चा खुद योगी आदित्यनाथ ने की थी पर कार्रवाई तो अधिकारियों को ही करनी होती है।”

सपा विधायक असलम चौधरी का बेटा पकड़ा गया था लड़कियाँ छेड़ते, पर छोड़ दिया गया

यति नरसिंहानंद ने आगे बताया, “पिछली बार जो यहाँ से समाजवादी पार्टी का विधायक असलम चौधरी था, उसका बेटा साल 2019-2020 में मंदिर के पास एक श्रद्धालु लड़की से बदतमीजी कर रहा था। हमने उसको पकड़ लिया और ऐसा करने से रोका। इस पर उसने खुद को विधायक असलम का बेटा बताया। इस पर हमारे मंदिर में मौजूद लड़कों ने उसकी अच्छे से पिटाई की। बाद में हमने उस लड़के को पुलिस के हवाले किया। लेकिन इस मामले में भी पुलिस ने कोई भी कार्रवाई करना तो दूर, रिपोर्ट भी दर्ज नहीं की।”

हमलावरों की जमानत के लिए काम करता है एक बड़ा गिरोह

महामंडलेश्वर यति नरसिंहानंद के मुताबिक, “हमारे यहाँ सर्जिकल ब्लेड ले कर घुसे लोगों की जमानत करवाई गई। आतंकियों का केस जमीयत उलेमा ए हिन्द लड़ती है। आप समझ सकते हैं कि इनके पीछे कौन है। इन्हें बचाने वाले बड़े-बड़े लोग हैं। आज नहीं तो कल ये मुझे मार ही देंगे। उनके प्रयास लगातार जारी हैं।”

मंदिर से नफरत की वजह इस जगह का सनातन केंद्र होना है

यति नरसिंहानंद ने कहा, “पहले भी ये मंदिर सनातन का बहुत बड़ा केंद्र रहा है। अब हमलावरों को फिर से लगने लगा है कि कहीं ये दुबारा उसी रूप में न आ जाए। इसीलिए यहाँ से उन्हें इतनी चिढ़ है। साथ ही मंदिर की जमीन आदि पर भी उनकी नजर है। मंदिर की बाउंड्री भी कई बार गिराई गई है। हम मूर्तियों को कड़ी सुरक्षा और निगरानी में रखते हैं इसलिए अभी तक वहाँ कोई नहीं पहुँच पाया है। हालाँकि, उनकी (विपक्षियों) की सबसे बड़ी समस्या धार्मिक है।”

मुझे मृत्यु का भय नहीं

यति नरसिंहानंद ने कहा, “मुझे और मेरे मंदिर को मिली सुरक्षा का मतलब ये नहीं है कि मुझे मृत्यु का भय है। मेरी मृत्यु मेरी देवी माँ ने स्वयं लिखी होगी। फिर भी हम एहतियात रखते हैं। इसी सुरक्षा को भेद कर नरेशानंद जी पर हमला हुआ है। इसी सुरक्षा को भेद कर ही सर्जिकल ब्लेड ले कर मुझे 2 लोग मारने आए थे। इसलिए मेरे खुद के साथी मेरी सुरक्षा में रहते हैं। डासना के लगभग सभी मुस्लिम मेरे खिलाफ हैं।”

मुर्तजा अब्बासी को भेजा गया था योगी आदित्यनाथ के राजनैतिक कैरियर को खत्म करने के लिए

गोरखनाथ मंदिर पर हमले वाली घटना पर यति नरसिंहानंद ने कहा, “मुर्तजा अब्बासी केमिकल इंजीनियर और IIT था। फिर भी उसने गोरखनाथ मंदिर पर हमला किया। उसे योगी आदित्यनाथ के राजनैतिक कैरियर को बर्बाद करने के लिए वहाँ भेजा गया था। उसने जानबूझ कर पुलिस पर हमला किया। यदि पुलिस पलट कर मुर्तजा को गोली मार देती तो दुनिया भर में खबर चल रही होती कि पिता वकील, बाबा जज और IIT के एक होनहार इंजीनियर को योगी की पुलिस ने गोरक्ष पीठ में मार डाला। जब वो जिन्दा बच गया तो उसको पागल घोषित किया जाने लगा। हिन्दुओं के मंदिरों पर हमला करने वालों को या नाबालिग घोषित किया जाता है या पागल। असल में ये बहुत बड़ी साजिश है। ये पागल हैं तो मंदिरों पर हमले क्यों करते हैं। इसी प्रकार से मेरे मंदिर में नाबालिग सोची समझी साजिश से भेजे जाते हैं।”

सिद्धू पर बड़ी कार्रवाई की तैयारी में कॉन्ग्रेस आलाकमान, सोनिया गाँधी तक पहुँची शिकायत: PK से दिखाई थी नजदीकी, अभी भी बगावती मूड में

चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर से नजदीकी बढ़ाकर पंजाब कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्‍यक्ष नवजाेत सिंह सिद्धू बुरे फँस गए हैं। पंजाब कॉन्ग्रेस के प्रभारी हरीश चौधरी द्वारा सिद्धू के खिलाफ कॉन्ग्रेस अनुशासन कमेटी को शिकायत भेजने की खबर है। वहीं, सिद्धू प्रशांत किशाेर को लेकर एक के बाद एक ट्वीट कर रहे हैं।

सोमवार (2 मई 2022) को उन्होंने प्रशांत किशोर द्वारा बिहार में अपनी राजन‍ीतिक पार्टी के गठन का संकेत देने के बाद बधाई दी। सिद्धू ने ट्वीट किया, “पहला कदम आधी लड़ाई होता है मेरे दोस्‍त, अच्‍छी शुरूआत हमेशा अच्‍छा अंत लेकर आती है। संविधान की भावना का सम्‍मान करने के आपके प्रयास हमेशा से सर्वश्रेष्‍ठ रहे हैं। लोगाें की शक्ति निश्चित उनके पास लौटनी चाहिए।”

इसको लेकर पंजाब कॉन्ग्रेस के प्रभारी हरीश चौधरी ने सोनिया गाँधी और पार्टी की अनुशासनात्‍मक कमेटी को सिद्धू के खिलाफ शिकायत भेजकर कॉन्ग्रेस को नुकसान पहुँचाने का आरोप लगाया है। चौधरी ने कमेटी से अनुरोध किया है कि वह सिद्धू के खिलाफ कार्रवाई करें।

बताया जा रहा है कि कुछ दिन पहले प्रशांत किशोर ने कॉन्ग्रेस को झटका दिया था, जिससे पार्टी उनसे खासा नाराज थी। लेकिन पंजाब में कॉन्ग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू ने उनसे नजदीकियाँ बढ़ानी शुरू कर दी। यही नहीं ठीक उसी दिन नवजोत सिंह सिद्धू ने उनके साथ अपनी फोटो भी शेयर की थी।

तस्वीर के साथ सिद्धू ने लिखा था, “पुराना सोना और पुराने दोस्त हमेशा बेहतर होते हैं।” सिद्धू के इस पोस्ट के बाद से ही इस बात के भी संकेत मिले थे कि उनकी बदली रणनीति के पीछे पीके हो सकते हैं। 2017 में सिद्धू को कॉन्ग्रेस में लाने में पीके ने अहम भूमिका अदा की थी।

बता दें कि हरीश चौधरी ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष को पत्र में लिखा , “पंजाब प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा ने नवजोत सिंह की पार्टी विरोधी गतिविधियों के बारे में नोट लिखा है। नवंबर से लेकर अब तक राज्य में पार्टी का इंचार्ज होने के नाते मैंने भी पाया है कि सिद्धू लगातार कॉन्ग्रेस के फैसलों पर सवाल उठा रहे हैं। इसके अलावा नवजोत सिंह पर पार्टी के खिलाफ गलत माहौल तैयार करने की बात भी कही गई है।”

इमरान खान पर दर्ज हुआ ईशनिंदा का मुकदमा, हो सकते हैं गिरफ्तार: नए वाले PM को मस्जिद में चोर और भिखारी बताने का मामला

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को कभी भी गिरफ्तार किया जा सकता है। पाकिस्तानी मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, इमरान खान के खिलाफ ईशनिंदा की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया है और उन्हें कभी भी गिरफ्तार किया जा सकता है। वहीं, इमरान खान की पार्टी ने पूर्व प्रधानमंत्री के खिलाफ दर्ज किए गए मुकदमे को गैर-कानूनी बताया है, लेकिन रिपोर्ट है कि इमरान खान के खिलाफ मौजूदा सरकार कड़ी कार्रवाई कर सकती है।

क्या है मामला

दरअसल, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के सऊदी अरब दौरे के दौरान मदीना मस्जिद में ‘चोर-चोर’ और ‘भिखारी-भिखारी’ के नारे लगाए गए, जिसको लेकर सऊदी अरब की तरफ से काफी सख्त प्रतिक्रिया दी गई है और पाक मस्जिद का इस्तेमाल राजनीति के लिए करने के आरोप में कई पाकिस्तानियों को सऊदी अरब से वापस पाकिस्तान भेज दिया गया है।

वहीं, इस्लामी मौलानाओं ने भी मदीना मस्जिद में नारेबाजी को नापाक बताया है। जिसको लेकर पाकिस्तान में इमरान खान समेत 150 से ज्यादा लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया है। शहबाज शरीफ की पार्टी पीएमएस-एन का कहना है कि इमरान खान के इशारे पर ही पाक मस्जिद में इतनी घटिया हरकत की गई है, जिससे सऊदी अरब की प्रतिष्ठा पर भी असर पड़ा है। इमरान खान के अलावा, फवाद चौधरी, नेशनल असेंबली के पूर्व डिप्टी स्पीकर कासिम सूरी समेत 150 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की गई है।

FIR में क्या हैं आरोप?

इमरान खान के खिलाफ जो आरोप लगाए गए हैं, उसमें उनपर गुंडागर्दी करने और पैगंबर का अपमान करने का आरोप लगाया गया है। ये आरोप फैसलाबाद के रहने वाले नईम भट्टी ने दर्ज करवाई है, जिसमें कहा गया है कि, इमरान खान ने शहबाज शरीफ के खिलाफ नारेबाजी कराने के लिए 100 से ज्यादा लोगों को सऊदी अरब स्थिति पवित्र मदीना मस्जिद में भेजा था, जिन्होंने मस्जिद के अंदर नापाक नारेबाजी की, जिससे मस्जिद को अपवित्र करने की कोशिश की गई और पैगंबर का अपमान किया गया है। जिसके बाद पाकिस्तान पुलिस ने इमरान खान के खिलाफ धारा 295A, 295-A, 296 और 109 के तहत मुकदमा दर्ज किया है, जो ईशनिंदा का मुकदमा है।

इमरान की पार्टी गई हाईकोर्ट

वहीं, पीटीआई नेता और पूर्व सूचना मंत्री फवाद चौधरी ने सोमवार (मई) को इस्लामाबाद उच्च न्यायालय (आईएचसी) में एक रिट याचिका दायर कर ईशनिंदा कानूनों के तहत पार्टी नेतृत्व के खिलाफ दर्ज मामलों को “अवैध” करार देने की याचिका लगाई है। पीटीआई नेताओं ने कहा कि यह घटना एक सहज प्रतिक्रिया थी और जनता के गुस्से को दर्शाती है, जबकि, सरकार का दावा है कि यह पीटीआई नेतृत्व द्वारा नियोजित और सुनियोजित थी। वहीं, उच्च न्यायालय के सहायक रजिस्ट्रार असद खान ने पुष्टि की कि याचिका मिल गई है। फवाद की ओर से पीटीआई की कानूनी टीम एडवोकेट फैसल फरीद और एडवोकेट अली बुखारी ने याचिका दायर की है।

सबक सिखाने के लिए FIR

फवाद चौधरी ने अपनी याचिका में शहबाज शरीफ सरकार पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं और याचिका में फवाद चौधरी ने कहा कि नवनियुक्त गृह मंत्री पीटीआई नेतृत्व को निशाना बना रहे हैं और उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने की ”खुली धमकी” भी दी गई है। उन्होंने कहा कि “विश्वसनीय स्रोतों” के माध्यम से उन्हें पता चला था कि, मौजूदा सरकार ने उन्हें और पीटीआई के अन्य नेताओं को “सबक सिखाने का फैसला किया है जो वो जिंदगी भर ना भूले।”

ईशनिंदा है पाकिस्तानियों का हथियार

पाकिस्तान में ईशनिंदा कानून राजनेताओं के हाथ का एक सबसे धारदार हथियार माना जाता है और जब इमरान खान खुद प्रधानमंत्री थे, तो उन्होंने इस हथियार से कई विपक्षी नेताओं को हलाल कर दिया। जबकि, पाकिस्तान सुप्रीम कोर्ट ने इमरान खान सरकार को ईशनिंदा कानून खत्म करने पर विचार करने को कहा था, लेकिन इमरान खान ने ईशनिंदा कानून को खत्म करने के बजाए इसे और धारदार बना दिया। लेकिन, अब इसी कानून के जरिए इमरान खान के पर भी कतरने की कोशिश की जा रही है।

फिर टली रवि और नवनीत राणा की जमानत याचिका पर सुनवाई, तबीयत खराब होने के बावजूद सांसद को नहीं ले जाया गया अस्पताल

महाराष्ट्र के अमरावती से सांसद नवनीत राणा और उनके पति रवि राणा की जमानत पर सुनवाई फिर से टल गई है। बीते एक सप्ताह से जेल में बंद राणा दंपत्ति की जमानत याचिका पर मुंबई की विशेष अदालत आज शाम 5 बजे फैसला सुनाने वाली थी, लेकिन अन्य मामलों की सुनवाई और समय के अभाव के चलते आज इसे टाल दिया गया। अब इस मामले में दो दिन बाद यानी 4 मई को अदालत अपना फैसला सुनाएगी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, राणा दंपत्ति की जमानत मामले में बचाव पक्ष और सरकारी वकील की तरफ से बहस का सिलसिला पूरा हो चुका है। अदालत के फैसले पर फिलहाल सभी की निगाहें टिकी हुई हैं कि क्या राणा दंपत्ति को जमानत मिलेगी या उन्हें कुछ और दिन सलाखों के पीछे गुजारने होंगे।

खबर है कि नवनीत राणा के वकील ने भायखला जेल के सुपरिटेंडेंट को एक पत्र लिखकर बताया है, “नवनीत राणा को स्पॉन्डिलाइटिस की समस्या है और जेल में लगातार फर्श पर बैठने और लेटने की वजह से उन्हें और भी ज्यादा दिक्कत हो रही है। इसके मद्देनजर राणा को 27 अप्रैल के दिन मुंबई के जेजे अस्पताल भी ले जाया गया था, जहाँ डॉक्टरों ने उनका सिटी स्कैन करना था। ताकि यह पता चल सके कि स्पॉन्डिलाइटिस की समस्या कितनी गंभीर है। इन सबके बावजूद अभी तक अथॉरिटी ने कोई एक्शन नहीं लिया है।”

क्या है पूरा मामला

गौरतलब है कि लाउडस्पीकर और हनुमान चालीसा पर जारी सियासत के बीच अमरावती से सांसद नवनीत राणा ने उद्धव ठाकरे के आवास मातोश्री के सामने हनुमान चालीसा का पाठ करने का ऐलान किया था, जिसके बाद 23 अप्रैल, 2022 को मुंबई की खार पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था। उन पर मुंबई पुलिस ने राजद्रोह (आईपीसी की धारा 124 A) और धार्मिक भावनाओं को भड़काने के आरोप लगाए थे। इसके अलावा उन पर आईपीसी की धारा 353 (सरकार के काम में बाधा) के तहत केस दर्ज किया गया था। इसी एफआईआर को कोर्ट ने खारिज करने से इनकार कर दिया है।

तलवार, चाकू, बम लेकर हुआ जब मराड का हिंदू नरसंहार: कट्टरपंथी-वामपंथी मिलीभगत का एक नमूना, मस्जिदों में मिले थे हथियार

हिंदुओं के नरसंहारों की अंतहीन सूची में, एक कत्लेआम की बर्बर दास्तां 2 मई की तारीख में भी दर्ज है। 19 साल पहले आज ही केरल के मराड में 8 निर्दोष हिंदू मछुआरों को पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) व इंडियन मुस्लिम लीग (IUML) के इस्लामी कट्टरपंथियों और सीपीआई (एम) जैसे वामपंथी संगठनों की मिलीभगत ने मौत के घाट उतारा था।

2003 में मराड का हिंदू नरसंहार

बताया जाता है कि 2 मई 2003 को मराड में उस घटना को अंजाम देने के लिए तलवार, चाकू, देसी बम पहले से मस्जिद में छिपाए गए थे। इन सब हथियारों का इस्तेमाल बाद में कट्टरपंथियों द्वारा हिंदुओं को मारने के लिए किया गया। हमले में 8 हिंदुओं की निर्मम मौत हुई थी जबकि 2 महिला समेत 16 हिंदू गंभीर रूप से घायल हुए थे।

शुक्रवार के दिन घटना को अंजाम उस समय दिया गया जब एक ओर हिंदू मछुआरे आने वाले खतरे से अनभिज्ञ मराड बीच के किनारे बैठ शांति से बात कर रहे थे और दूसरी ओर पास के मंदिर में पूजा पाठ करके श्रद्धालु घर लौट रहे थे। माहौल शांत था इसलिए किसी को कोई शक भी नहीं हुआ। मगर इसी बीच अचानक कट्टरपंथियों की भीड़ ने सामने से आकर उस शांत माहौल में दहशत फैला दी।

कट्टरपंथियों की इस भीड़ के हाथ में तलवार, चाकू, लाठी, डंडे सब थे। हिंदू कुछ समझ पाते कि तब तक ये भीड़ पागलों की तरह हर दिशा में फैल गई। देखते ही देखते हिंदुओं को धारदार हथियारों से मारना शुरू कर दिया गया। भीड़ के शोर और पीड़ितों की चीख धीरे-धीरे बढ़ती गई कि तभी हमलावरों में से किसी एक ने बम फेंक कर अपना डर कायम करना चाहा। शुक्र बस इतना था कि वो बम मौके पर फटा नहीं। वरना न जाने कितने हिंदुओं की जान उसमें चली जाती।

मस्जिद लौट गए हमलावर, औरतों ने बनाई ह्यूमन चेन

हिंदुओं को बर्बरता से मौत के घाट उतारने के बाद तमाम हमलावर वापस जुमा मस्जिद चले गए। वहाँ उन्होंने दोबारा अपने खून से सने कपड़े और हथियारों को छिपाया। इस पूरे प्रकरण दौरान मुस्लिम महिलाओं की भूमिका भी कुछ कम नहीं थी। जिस समय सारे आरोपित मस्जिद के भीतर सबूत मिटा रहे थे तब स्थानीय मुस्लिम औरतों ने ह्यूमन चेन बना ली थी और पुलिस को मस्जिदों में घुसने से रोका था। किसी तरह पुलिस ने इस चेन को तोड़कर एंट्री की तो पाया कि मस्जिद के अंदर 90 देसी बम और 40 चाकू थे।

मराड नरसंहार- एक पूर्वनियोजित साजिश

2003 का ये हिंदू नरसंहार कोई अचानक घटित घटना नहीं थी। ये एक पूर्व नियोजित साजिश थी। जिसे पीएफआई, पीडीपी, मुस्लिम लीग के कट्टरपंथियों ने रचा था। घटना के बाद इसकी जाँच के लिए एक आयोग गठित हुआ और घटना की जाँच हुई। पड़ताल के दौरान हैरान करने वाले तथ्य सामने आए और पता चल पाया कि इस हमले को अंजाम देने की फिराक में तो कट्टरपंथी 1 साल पहले से थे। वो 2002 से कुछ मुस्लिमों की मौतों का बदला लेना चाहते थे जिनकी जान एक पानी विवाद के कारण दो पक्षों के बीच हुई झड़प में गई थी। इसी घटना का बदला लेने के लिए इन्होंने मस्जिद में बम, पेट्रोल बम, तलवार, चाकू, लोहे की रॉड, डंडे आदि छिपाए थे और 2 मई की शाम अचानक मराड बीच पर बैठे हिंदुओं पर हमला किया था।

वामपंथी-कट्टरपंथी की मिलीभगत और हिंदू नरसंहार

इस जाँच में मुस्लिम लीग के लोगों को भी समन भेजा गया जिन्होंने स्वीकार किया था कि ये हमला उन मुस्लिमों की मौत का बदला लेने के नीयत से हुआ जो हिंदुओं के साथ झड़प में मारे गए थे। अपना पल्ला झाड़ने के लिए मुस्लिम लीग ने  सारा इल्जाम भाजपा और आरएसएस पर डालना चाहा। हालाँकि हमलावरों को पकड़कर जब पूछताछ हुईं तो ये सामने आया कि ये घटना एक साजिश के तहत अंजाम दी गई। इसे रचने वाले मुस्लिम संगठन के अलावा कॉन्ग्रेस और एनडीएफ संगठन के भी थे।

इसके अलावा केरल की वामपंथी सरकार पर इस घटना के बाद आरोप लगा कि उनके दबाव के कारण पुलिस इस घटना को रोकने की जगह मूक दर्शक बनी रही जबकि उन्हें पहले से आने वाले खतरे की सूचना थी। रिपोर्ट दावा करती हैं कि पुलिस की मौजदूगी में उस दिन हिंदुओं के घरों को, मछुआरों की नावों को आगे के हवाले किया गया था, तब भी कोई चूँ नहीं निकली। स्थानीयों को भी शक रहा कि इतनी बड़ी हिंसा बिन प्रशासन और पुलिस की मिलीभगत के कैसे अंजाम दे दी गई। लोग आरोप लगाते हैं कि ये पूरी घटना पाकिस्तान से फंड पाकर वामपंथियों-कट्टरपंथियों ने प्लॉन की थी ताकि मराड को हिंदूविहीन किया जा रहे थे।

मालूम हो कि मराड के नरसंहार को आज 19 साल हो गए हैं। साल 2009 में हिंसा को अंजाम देने वाले 148 आरोपितों में 62 को उम्र कैद की सजा गई और 1 पर भीड़ को उकसाने का आरोप लगाकर 5 साल की सजा सुनाई गई। कुछ समय बाद केरल के हाई कोर्ट ने 24 अन्य और आरोपितों को आजीवन जेल की सजा मुकर्रर की और सुनवाई के दौरान पाया कि ये हिंसा हिंदुओं के विरुद्ध एक गहरी साजिश थी। 2021 में इसी मामले में 2 और लोग दोषी बनाए गए जो 2010-11 के बाद से फरार थे।

बंगाल में मुस्लिमों का पॉलिटिकल वीटो… कौन राज करेगा, कैसे राज करेगा – वही तय करते हैं: स्वपन दासगुप्ता

पश्चिम बंगाल। साल 2021, तारीख 2 मई। कुछ जीत रहे थे सत्ता की कुर्सी। कई हार रहे थे जिंदगी की जंग। कहीं उड़ रहा था हरा गुलाल। कइयों का बह रहा था लहू। जीत के साथ कुछ कहला रहे थे माननीय। बहुतों की लूटी जा रही थी इज्जत-आबरू।

2 मई 2021 – यह दिन कइयों के लिए थम सा गया है। ये कई लोग पश्चिम बंगाल नाम के राज्य से हैं। यह राज्य विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में ही है। यह वो राज्य है, जिनके लोगों को जान बचा कर दूसरे राज्य भागना पड़ा। उस दिन जब लोकतंत्र के सत्ताधारी जीत रहे थे… खुद लोकतंत्र हार रहा था। लोकतंत्र के असली सिपाहियों को रौंदा जा रहा था।

आपातकाल में क्या स्थिति थी – नागरिकों की, नेताओं की, सत्ता-प्रशासन की? 40 साल से कम उम्र वाले लोग इसकी कथा-कहानियाँ सिर्फ सुन-पढ़ सकते हैं। लेकिन पश्चिम बंगाल में 2 मई 2021 को जो किया गया, वो 21वीं सदी के भारत का आपातकाल ही था। ममता बनर्जी की सरकार इसे लेकर लाख सफाई दे, उस दिन हुआ हर एक दमन, हत्या, ज्यादती, लूट… सब कुछ दर्ज है। ममता बनर्जी को यह आसानी से भूलने नहीं दिया जाएगा।

राज्यसभा सांसद स्वपन दासगुप्ता से इसी मुद्दे को लेकर बंगाल की राजनीति, समाज आदि पर ऑपइंडिया की लंबी बातचीत हुई।

सवाल: बीजेपी ने बंगाल के कार्यकर्ताओं के लिए कुछ नहीं किया या जितना करना चाहिए था, उतना नहीं किया – यह आरोप बीजेपी के ही चाहने वाले लगाते हैं, ट्विटर-फेसबुक पर लिखते हैं। इस पर आप की प्रतिक्रिया।

जवाब: यह सच है। यह हिंसा अप्रत्याशित थी। किसी ने उम्मीद नहीं की थी। चुनाव में किसी की हार और जीत होती है लेकिन काउंटिंग की जगह से ही जिस तरह हिंसा की शुरुआत हुई, ऐसा कभी देखा नहीं गया। आज तक भारत में किसी भी जगह ऐसा देखा नहीं गया। इस स्तर की हिंसा के लिए बीजेपी का कार्यकर्ता या संगठन तैयार नहीं था – यह आरोप बिल्कुल सही है।

हमारे कार्यकर्ताओं के ऊपर हमले हुए हैं। 50000 हजार के करीब कार्यकर्ताओं को घर से बेघर होना पड़ा। 20 के आप-पास लोगों का हत्या कर दी गई। इन सब के बावजूद हमारा संगठन अपने कार्यकर्ताओं की थोड़ी-बहुत भी मदद नहीं कर पाया। बहुत कोशिश करने के बाद भी अभी तक बहुत जगह 5-10 हजार रुपया भी अपने कार्यकर्ताओं तक हम नहीं पहुँचा पाए हैं। राजनीतिक रूप से हम इस आधार पर फेल रहे हैं – इस बात को मैं स्वीकारता हूँ।

सवाल: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद हिंसा – इसका राजनीतिक अर्थ या मैसेज आप क्या समझते हैं?

जवाब: 2 मई 2021 की दोपहर के बाद जो हिंसा शुरू हुई, उसका एक ही उद्देश्य था – बीजेपी का जो संगठन है, उसकी रीढ़ तोड़ दी जाए। 38% वोट बीजेपी को मिला। बहुसंख्यक हिंदू का वोट बीजेपी के पक्ष में रहा। मतलब एक निर्णायक वोट का समर्थन हमारे साथ था। इसलिए उनका उद्देश्य था कि हिंसा से ऐसा माहौल पैदा किया जाए, जिससे भविष्य में बीजेपी के समर्थकों को खत्म कर दिया जाए, संगठन की रीढ़ तोड़ दी जाए। खौफ ऐसा हो कि बीजेपी का समर्थक घर से ही नहीं निकले और यही हुआ भी।

पश्चिम बंगाल में 2021 विधानसभा चुनाव के बाद जो उपचुनाव हुए, जो नगरपालिका चुनाव हुए, इनमें आप वो खौफ देख सकते हैं। इन चुनावों में कई जगह बीजेपी के लोग नामांकन तक कराने नहीं गए। इसे आप एक उदाहरण से समझ सकते हैं। बोलपुर एक छोटा सा शहर है। शांतिनिकेतन से सटा हुआ। विधानसभा चुनाव में यहाँ के नगरपालिका वाले एरिया में बीजेपी को बहुमत था। अब इस बार जब नगरपालिका का चुनाव हुआ तो हमारे किसी उम्मीदवार ने नामांकन तक नहीं भरा।

यह सब छोटे-छोटे उदाहरण हैं। लेकिन हकीकत यह है कि बहुत सारे जगहों में जहाँ बीजेपी को जीत मिली थी, वहाँ अब बूथ मैनेज करने की स्थिति भी नहीं है संगठन के पास। बीजेपी के कार्यकर्ताओं का मनोबल बहुत नीचे है। इनमें से बहुत यह भी कहते हैं कि केंद्र सरकार क्या कर रही है, हमारी तो केंद्र में सरकार भी है। लेकिन कानून-व्यवस्था राज्य को देखना होता है, इसमें केंद्र सरकार चाह कर भी कुछ नहीं कर सकती। अगर हाई कोर्ट ने संज्ञान नहीं लिया होता तो कुछ भी नहीं होता, कोई एक्शन नहीं लिया जाता।

पश्चिम बंगाल में संगठन के तौर पर बीजेपी पर बड़ा प्रभाव पड़ा है। लेकिन यह भी सच है कि आज हिंसा का जो माहौल बनाया गया है, इसकी प्रतिक्रिया तय है। बीजेपी को अभी से धीरे-धीरे संगठन के तौर पर काम करना होगा। कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाना सबसे बड़ा काम होगा बीजेपी के लिए। इस समय उनका मनोबल टूटा हुआ है। इन कार्यकर्ताओं को एक सक्षम नेता और राजनैतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है।

सवाल: देश की राजधानी और व्यापार वाला बंगाल… साहित्य और क्रांति वाले बंगाल से लेकर अब तक का बंगाल – इस बहुआयामी पतन को कितना राजनीतिक, कितना सामाजिक मानते हैं आप?

जवाब: यह पतन राजनीतिक भी है, सामाजिक भी है। इस पतन की शुरुआत होती है 60 के दशक से। नक्सल आंदोलन, सीपीएम वाली राजनाति… 50-60 साल में जो-जो हुआ, वही सब मिल कर अब वापस रूप दिखा रहा है। इसके असर साफ दिख रहे हैं। बंगाल से हो रहा आर्थिक पलायन स्पष्ट है। बंगाल पहले उद्योग-व्यवसाय का लीडर हुआ करता था। तब बॉम्बे के समान था कलकत्ता। अब कहाँ से कहाँ पहुँच गया। दुर्गा पूजा, छुट्टी, त्योहार… बंगाल के हर शहर को आप ‘सिटी ऑफ फेस्टिवल’ कह सकते हैं लेकिन ‘सिटी ऑफ प्रोडक्शन’ नहीं कह सकते यहाँ के किसी भी शहर को।

बंगाल में उद्योग का जो ह्रास हो रहा है, उससे वहाँ की संस्कृति पर असर पड़ेगा, लोगों की सृजन क्षमता प्रभावित होगी इसके कारण। ऐसा नहीं है कि बंगाल में रहने वालों की सृजन क्षमता बिल्कुल खत्म हो गई है। लेकिन यह भी सच है कि अपनी क्षमता का 50% भी ऐसे वातावरण में वहाँ की जनता उपयोग में नहीं ला पाती है। राज्य में जब शांति का माहौल होता है, तभी कला-संस्कृति का विकास-विस्तार संभव होता है। और प्रशासन की इन्हीं सब अच्छी चीजों का बंगाल में अभाव है।

पश्चिम बंगाल में 60 के दशक से जो शुरुआत राजनीतिक स्तर पर हुई थी, अब उसका पूरा असर यहाँ के सामाजिक जीवन पर पड़ा है। दुखद यह है कि अगर इसी तरह की राजनीति कुछ और दिन चली तो समाज का बचा-खुचा ढाँचा भी खत्म हो जाएगा।

सवाल: बंगाल में डेमोग्राफी चेंज के कारण हिंदू-मुस्लिम समीकरण या कुछ इलाकों में हिंदुओं से घृणा वाली बात को आप कैसे देखते हैं?

जवाब: इससे इनकार नहीं किया जा सकता। बंगाल में ये हो रहा है। वहाँ की कुल आबादी का 30% मुस्लिम (कोई 23 बोलता है, कोई 25%… लेकिन वोटिंग वाला आँकड़ा मानें तो 30%) हैं। बांग्लादेश से लगे बॉर्डर जिलों में जैसे – नदिया का बड़ा भाग, दिनाजपुर, मुर्शिदाबाद, मालदा, दक्षिण 24 परगना का बड़ा हिस्सा… ये सब पूरा मुस्लिम बहुल हो चुका है।

इसके पीछे 2 कारण हैं: पहला कारण – सीपीएम की राजनीति के कारण 1990 और 2000 के दशक में बांग्लादेश से अच्छी-खासी संख्या में अवैध घुसपैठ। दूसरा कारण – बहुत सारे बंगाली अच्छे काम, अच्छी सुविधा जैसी चीजों की खोज में पश्चिम बंगाल को छोड़ कर दूसरे राज्यों में पलायन कर गए। आज बैंगलोर में 12 लाख बंगाली हैं। दिल्ली में भी बंगाली भरे हुए हैं। यह एक छोटा सा उदाहरण है। आखिर इसका कारण क्या है? क्या वजह है कि ज्यादातर बंगाली हिंदुओं ने ही पश्चिम बंगाल से पलायन किया है?

इन 2 कारणों के अलावा एक तीसरी समस्या भी है – रोहिंग्या। बड़ी तादाद में रोहिंग्या घुसपैठिए भी यहाँ आकर बस रहे हैं। इन सब को मिला कर पश्चिम बंगाल की डेमोग्राफी बहुत हद तक बदल चुकी है, बिगड़ चुकी है।

पश्चिम बंगाल क्यों बना? पहले यूनाइटेड बंगाल था। फिर विभाजन क्यों हुआ? ये सोचिए। जो ईस्ट बंगाल था, वहाँ हिंदुओं की जनसंख्या 30% थी, आज वहाँ हम 10% भी नहीं हैं। तो ये 20% हिंदू आबादी कहाँ गई? ज्यादातर तो पश्चिम बंगाल में ही आए। क्यों आए? क्योंकि उन लोगों को लगा कि यह उनकी मातृभूमि है। बंगाली हिंदुओं को रहने के लिए जमीन मिले, यही वह वजह थी कि बंगाल विभाजन के लिए श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने माँग रखी। इसी सोच के आधार पर ही पश्चिम बंगाल तैयार हुआ। लेकिन अफसोस ‘पश्चिम बंगाल बंगाली हिंदुओं का घर’ आज यह मौलिक सोच ही नष्ट हो रही है। डेमोग्राफी चेंज के कारण ही यह हो रहा है। डेमोग्राफी चेंज कितनी बड़ी समस्या है, इसको असम से भी समझ सकते हैं। 80-90 के दशक में वहाँ इसको लेकर इतना बड़ा आंदोलन भी हुआ।

पश्चिम बंगाल में डेमोग्राफी चेंज के राजनीतिक पहलू को देखें तो आज वहाँ मुस्लिम समुदाय का पॉलिटिकल वीटो है। इसका मतलब हुआ कि मुस्लिम समुदाय ही यह निर्णय करता है कि कौन राज करेगा… और कैसे राज करेगा। इसका मतलब यह भी हुआ कि सत्ता के ऊपर में नाम ममता बनर्जी का हो सकता है, 10 और बंगाली हिंदू नेता-मंत्री हो सकते हैं लेकिन पीछे जो इनको हाँक रहा होगा, वो मुस्लिम समुदाय ही होगा। इसको एक छोटे से उदाहरण से ऐसे समझिए कि कोलकाता में आप मुस्लिम लड़कों को बिना हेलमेट लगाए बाइक चलाते देख सकते हैं, पुलिस हाथ बाँधे खड़ी रहती है। इस राजनीति ने पश्चिम बंगाल में ऐसा ही परिवेश तैयार किया है।

सवाल: आप खुद मीडिया से जुड़े रहे हैं। ऐसे में रेप-हत्या जैसी घटनाओं को कम कर दिखाना या एकदम से छिपाने वाले मीडिया संस्थानों को लेकर सरकारी पहल क्या होनी चाहिए? बंगाल हिंसा के दौरान कुछ मीडिया हाउस ने जिस तरह की कवरेज की, टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट पर कलकत्ता हाई कोर्ट के एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने तो मीडिया हाउस से माफी माँगने को भी कहा। इन मीडिया/पत्रकारों पर आपकी प्रतिक्रिया।

जवाब: बंगाल में आज जो मीडिया है, यह फ्री मीडिया नहीं है। वहाँ की मीडिया पर कोई बंदूक ताने खड़ा नहीं रहता है। बंदूक के खौफ से ये लोग सच या खबर को नहीं छुपाते बल्कि छुपाते हैं पैसों के कारण। सरकार पैसे देती है, सरकार के अनुसार खबरों की रिपोर्टिंग होती है। लेकिन इसके दूरगामी परिणाम होते हैं। मान लीजिए कि बंगाल हिंसा को लेकर भविष्य में कोई इतिहासकार जानकारी जुटा रहा होगा तो क्या पाएगा? वो जब अभी की खबरों-अखबारों को पलटेगा तो ‘कुछ भी नहीं हुआ, छोटी-मोटी घटना हुई’ सोचकर बैठ जाएगा।

बंगाल की मीडिया में आज आप पाएँगे कि ममता बनर्जी को लेकर एक कंपीटिशन है – कौन कितनी बार उनकी फोटो फ्रंट पेज पर छाप रहा है। इससे भी बड़ा एक उदाहरण देखिए। इंडिया गेट के सामने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति लगाने का निर्णय हुआ। यह बंगालियों की भावना के लिए एक बड़ी बात है। लेकिन पश्चिम बंगाल के सबसे बड़े अंग्रेजी अखबार के फ्रंट पेज तो छोड़िए, अंदर के 10वें पेज पर भी इस खबर को जगह नहीं मिली। ऐसा इसलिए क्योंकि यह मोदी सरकार का निर्णय था। यह वहाँ की मीडिया की मानसिक अवस्था है। यह फ्री प्रेस नहीं है। यह मीडिया भी नहीं है। ये ज्यादा से ज्यादा टाइपिस्ट भर हैं।

सवाल: मीडिया, सच, इतिहास, लेखन आदि से जुड़ा है यह सवाल। विक्रम संपथ पर जब लिबरल लॉबी टूट पड़ी थी तो आपने टाइम्स ऑफ इंडिया में एक आर्टिकल लिखा। बंगाल हिंसा का जब इतिहास लिखा जाएगा, क्या तब तक इतिहासकारों की राष्ट्रवादी फौज तैयार रहेगी या इक्के-दूक्के होने के कारण तब भी ये वोक लोगों के हमले झेलते रहेंगे?

जवाब: राजनीतिक चश्मे से देखें तो राष्ट्रवादी शक्ति आज बहुत आगे बढ़ चुकी है। सच लेकिन यह भी है कि राष्ट्रवादी सोच से प्रेरित बौद्धिक चेतना या प्रभाव में अभी भी कमी है। यह चिंता का विषय है और हमें सोचना चाहिए कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? तथाकथित बुद्धिजीवी संस्थानों पर आज भी लिबरल/वामपंथी/वोक आदि लोगों का कंट्रोल है। ऐसे में हमारा कर्तव्य बनता है कि हम लोग अपनी कमियों को पहचानें, अपने लोगों को तैयार करें।

विक्रम संपथ पर लिबरलों का अटैक क्यों हुआ? इसलिए हुआ क्योंकि उसने राष्ट्रवादी एंगल से ऐसा इतिहास लिख डाला, जिसे खारिज नहीं किया जा सकता है। लिबरलों/वामपंथियों की जबकि सोच यह है कि ये तो राष्ट्रवादी है, दक्षिणपंथी है… ये क्या लिखेगा! लेकिन विक्रम संपथ ने ऐसा बेजोड़ लिखा, तभी लिबरल-लॉबी का अटैक भी बहुत तेज और देर तक रहा। अगर घटिया लिखा गया होता तो निश्चित ही वो ज्यादा ध्यान नहीं देते और खिल्ली भी उड़ाते।

राष्ट्रवादी सोच और इससे जुड़े लोगों को लेकर लिबरलों/वामपंथियों की मानसिकता यही है। विक्रम संपथ ने उनकी इसी मानसिकता पर चोट की। कैसे? उसने शानदार लिखा, परिष्कृत लिखा, ऐसा लिखा जो अकाट्य था… इसलिए उस पर इन तथाकथित बुद्धिजीवियों (लिबरलों/वामपंथियों) ने हमले किए।

इस प्रकरण से हमें सीख लेनी चाहिए। अगर हमें सच में लिबरलों/वामपंथियों के सबसे मजबूत हिस्से पर चोट करनी है तो हमें खुद को बौद्धिक स्तर पर मजबूत बनाना होगा, तथाकथित बुद्धिजीवी संस्थानों पर अपना कंट्रोल करना होगा।

सवाल: पश्चिम बंगाल में हिंसा की राजनीति और उससे उपजे माहौल को लेकर प्रतिक्रिया की बात आपने कही। बंगाल के लोग बदलाव चाहते हैं, यह RSS के एक प्रतिनिधि से भी सुनने को मिला। बीजेपी नेता या एक सासंद के तौर पर इस बदलाव का रोडमैप क्या होगा, बीजेपी सत्ता में कैसे आएगी?

जवाब: सबसे पहले यह जान लीजिए कि बीजेपी बंगाल में एक नई पार्टी है। पूरे भारत भर में बीजेपी की यात्रा को आप जनसंघ तक देख सकते हैं। लेकिन बंगाल में यह 3-4 साल भी पुरानी पार्टी नहीं कही जा सकती। सही मायने में एक पार्टी के स्तर पर जो प्रभाव होना चाहिए, जो नेतृत्व दिखना चाहिए, बंगाल में बीजेपी अभी उस स्तर तक नहीं पहुँची है। हमें बंगाल में नेतृत्व का सृजन करना होगा।

2021 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में बीजेपी को ग्रामीणों इलाकों में शानदार समर्थन मिला। लेकिन शहरी क्षेत्रों में, जिसको बंगाली भद्रलोक कहते हैं, वहाँ इस समर्थन का अभाव रहा… एकदम जीरो। कोलकाता और आस-पास के जो एरिया हैं, जैसे – कोलकाता, हावड़ा आदि… वहाँ 109 सीट है, पुराना प्रेसिडेंसी डिविजन जिसे कहते थे। यहाँ बीजेपी को 1-2 सीट ही मिल पाया। इसका मतलब हुआ कि हमारा तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग पर प्रभाव या ऐसे लोगों पर प्रभाव जो ऑपिनियन मेकर हैं, नहीं के बराबर है। कुल मिलाकर प्रभावशाली बंगालियों को अपने प्रभाव में नहीं ले पाई है बीजेपी।

पश्चिम बंगाल में बीजेपी के लिए यह एक बड़ा प्रोजेक्ट है। सांगठनिक स्तर की बात करें तो ओबीसी बंगाली, अनुसूचित जाति-जनजाति आदि लोगों के बीच हमें बहुत समर्थन है। लेकिन शहरी क्षेत्र में यह नदारद है। पश्चिम बंगाल में मुस्लिम 30% वोटिंग वीटो के साथ शुरुआत करते हैं, ऐसे में बीजेपी को सबको साथ लेकर चलना होगा। इसलिए बंगाल के शहरी क्षेत्र, प्रभावशाली बंगाली, तथाकथित बुद्धिजीवी वर्गों को अपने साथ जोड़ने वाला प्रोजेक्ट बीजेपी के लिए सबसे अहम है।