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फगुआ, दोल जात्रा, होला मोहल्ला, भगोरिया… हर राज्य में उल्लास का अलग है रंग: भारत की विविधता, संस्कृति, लोक कला, साहित्य को समेटती होली

विविधताओं के देश भारत में होली का त्यौहार भी अलग-अलग प्रदेशों में भिन्न-भिन्न तरीकों से मनाया जाता है। जहाँ ब्रज और बनारस की होली आज भी पूरे देश में आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। वहीं बरसाने की लट्ठमार होली भी उतनी ही प्रसिद्ध है। इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएँ उन्हें लाठियों से पीटती हैं। फूलों की होली में तो राधा-कृष्ण भक्ति सहित आध्यात्मिकता की छटा भी है।

मथुरा और वृंदावन में 15 दिनों तक होली का पर्व मनाया जाता है तो राधा के गाँव में 40 दिन तक चलती है होली। वहीं काशी में रंगभरी एकादशी से होली शुरू होकर बुढ़वा मंगल तक चलता है। कुमाऊँ की गीत बैठकी में शास्त्रीय संगीत की गोष्ठियाँ होती हैं। यह सब होली के कई दिनों पहले से ही शुरू हो जाता है।

धर्म ग्रन्थ और धार्मिक साहित्य में होली

होली का वर्णन अनेक पुरातन धार्मिक पुस्तकों में मिलता है। इनमें प्रमुख हैं, जैमिनी के पूर्व मीमांसा-सूत्र और कथा गार्ह्य-सूत्र, नारद पुराण और भविष्य पुराण जैसे पुराणों की प्राचीन हस्तलिपियों और ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख मिलता है।

विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ स्थान पर स्थित ईसा से 300 वर्ष पुराने एक अभिलेख में भी इसका उल्लेख किया गया है। संस्कृत साहित्य में वसन्त ऋतु और वसन्तोत्सव अनेक कवियों के प्रिय विषय रहे हैं।

राधा संग होली खेलते माधव की पेंटिंग (साभार-dolls.com)

प्राचीन काल के संस्कृत साहित्य में भी होली के अनेक रूपों का विस्तृत वर्णन है। श्रीमद्भागवत महापुराण में रसों के समूह रास का वर्णन है। अन्य रचनाओं में ‘रंग’ नामक उत्सव का वर्णन है जिनमें हर्ष की प्रियदर्शिका व रत्नावली तथा कालिदास की कुमारसंभवम् तथा मालविकाग्निमित्रम् शामिल हैं। कालिदास रचित ‘ऋतुसंहार’ में पूरा एक सर्ग ही ‘वसन्तोत्सव’ को अर्पित है।

भारवि, माघ और अन्य कई संस्कृत कवियों ने वसन्त की खूब चर्चा की है। चंद बरदाई द्वारा रचित हिंदी के पहले महाकाव्य ‘पृथ्वीराज रासो’ में होली का वर्णन है। भक्तिकाल और रीतिकाल के हिन्दी साहित्य में भी होली और फाल्गुन माह का विशिष्ट महत्व रहा है।

आदिकालीन कवि विद्यापति से लेकर भक्तिकालीन सूरदास, रहीम, रसखान, पद्माकर, जायसी, मीराबाई, कबीर और रीतिकालीन बिहारी, केशव, घनानंद आदि अनेक कवियों को यह विषय प्रिय रहा है। महाकवि सूरदास ने वसन्त एवं होली पर 78 पद लिखे हैं। पद्माकर ने भी होली विषयक प्रचूर रचनाएँ की हैं।

इस विषय के माध्यम से कवियों ने जहाँ एक ओर नितान्त लौकिक नायक नायिका के बीच खेली गई अनुराग और प्रीति की होली का वर्णन किया है, वहीं राधा-कृष्ण के बीच खेली गई प्रेम और छेड़छाड़ से भरी होली के माध्यम से सगुण साकार भक्तिमय प्रेम और निर्गुण निराकार भक्तिमय प्रेम का निष्पादन कर डाला है।

मुस्लिम शासकों, सूफियों पर भी चढ़ा होली का रंग

सूफ़ी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया, अमीर खुसरो और बहादुर शाह ज़फ़र जैसे मुस्लिम संप्रदाय का पालन करने वाले कवियों ने भी होली पर सुंदर रचनाएँ लिखी हैं जो आज भी जन सामान्य में लोकप्रिय हैं। दूसरे शब्दों में कहूँ तो होली का रंग जो भी भारत में आया उस पर चढ़ता रहा है। वह कोई भी समुदाय, संप्रदाय, मजहब का रहा हो लेकिन होली के रंगों से अछूता नहीं रहा।

मुगलकालीन होली (artist Nidhamal, Lucknow, 1760-5. British Library)

आधुनिक हिंदी साहित्य में होली

आधुनिक हिंदी कहानियों में प्रेमचंद की ‘राजा हरदोल’, प्रभु जोशी की ‘अलग-अलग तीलियाँ’, तेजेंद्र शर्मा की ‘एक बार फिर होली’, ओम प्रकाश अवस्थी की ‘होली मंगलमय हो’ तथा स्वदेश राणा की ‘होली’ में होली के अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं।

बॉलीवुड फिल्मों में होली

भारतीय फ़िल्मों में भी होली के दृश्यों और गीतों को सुंदरता के साथ चित्रित किया गया है। इस दृष्टि से शशि कपूर की उत्सव, यश चोपड़ा की सिलसिला, वी शांताराम की झनक-झनक पायल बाजे और नवरंग इत्यादि उल्लेखनीय हैं। हालिया कई फिल्मों में भी होली का दृश्य टर्निंग पॉइंट बना है जैसे या जवानी है दीवानी और बागवान, रंग दे बसंती, राँझना।

भारतीय संगीत और सुरों में घुले हैं होली के रंग

भारतीय शास्त्रीय, उपशास्त्रीय, लोक तथा फ़िल्मी संगीत की परम्पराओं में होली का विशेष महत्व है। शास्त्रीय संगीत में धमार का होली से गहरा संबंध है, हालाँकि ध्रुपद, धमार, छोटे व बड़े ख्याल और ठुमरी में भी होली के गीतों का सौंदर्य देखते ही बनता है।

कथक नृत्य के साथ होली, धमार और ठुमरी पर प्रस्तुत की जाने वाली अनेक सुंदर बंदिशें जैसे “चलो गुंइयाँ आज खेलें होरी कन्हैया घर” आज भी अत्यंत लोकप्रिय हैं। ध्रुपद में गाए जाने वाली एक लोकप्रिय बंदिश है “खेलत हरी संग सकल, रंग भरी होरी सखी” भारतीय शास्त्रीय संगीत में कुछ राग ऐसे हैं जिनमें होली के गीत विशेष रूप से गाए जाते हैं। बसंत, बहार, हिंडोल और काफ़ी ऐसे ही राग हैं।

होली पर गाने-बजाने का अपने आप वातावरण बन जाता है और जन-जन पर इसका रंग छाने लगता है। उपशास्त्रीय संगीत में चैती, दादरा और ठुमरी में अनेक प्रसिद्ध होलियाँ हैं। होली के अवसर पर संगीत की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि संगीत की एक विशेष शैली का नाम ही होली है, जिसमें अलग-अलग प्रांतों में होली के विभिन्न वर्णन सुनने को मिलते है जिसमें उस स्थान का इतिहास और धार्मिक महत्व छुपा होता है।

बरसाने की लट्ठमार होली

जहाँ ब्रजधाम में राधा और कृष्ण के होली खेलने के वर्णन मिलते हैं वहीं अवध में राम और सीता के जैसे होली खेलें रघुवीरा अवध में। इसी प्रकार महादेव शिव से संबंधित एक होली में “दिगंबर खेले मसाने में होली” कह कर शिव द्वारा श्मशान में चिताभस्म की होली खेलने का वर्णन मिलता है।

भारतीय फिल्मों में भी अलग-अलग रागों पर आधारित होली के गीत प्रस्तुत किए गए हैं जो काफी लोकप्रिय हुए हैं। ‘सिलसिला’ के गीत रंग बरसे भीगे चुनर वाली, रंग बरसे और ‘नवरंग’ के आया होली का त्योहार, उड़े रंगों की बौछार, को आज भी लोग भूल नहीं पाए हैं।

भारत के राज्यों में भी होली का अलग है अंदाज

हरियाणा की धुलंडी में भाभी-देवर के बीच छेड़ने-पिटाने की प्रथा है। हालाँकि, यह छेड़-छाड़ हँसी-ठिठोली के रूप में प्रतीकात्मक तौर पर होती है, न कि इसकी सामान्य परिभाषा के हिसाब से। बंगाल की दोल जात्रा चैतन्य महाप्रभु के जन्मदिन के रूप में मनाई जाती है। जुलूस निकलते हैं और गाना-बजाना भी साथ रहता है।

दोल जात्रा (शांतिनिकेतन में होली)

इसके अतिरिक्त महाराष्ट्र की रंग पंचमी में सूखा गुलाल खेलने, गोवा के शिमगो में जुलूस निकालने के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन तथा पंजाब के होला मोहल्ला में सिखों द्वारा शक्ति प्रदर्शन की परंपरा है।

तमिलनाडु की कमन पोडिगई मुख्य रूप से कामदेव की कथा पर आधारित वसंतोत्सव है जबकि मणिपुर के याओसांग में योंगसांग उस नन्हीं झोंपड़ी का नाम है जो पूर्णिमा के दिन प्रत्येक नगर-ग्राम में नदी अथवा सरोवर के तट पर बनाई जाती है।

मणिपुर की होली (साभार-अरूणाचल 24)

दक्षिण गुजरात के आदिवासियों के लिए होली सबसे बड़ा पर्व है। छत्तीसगढ़ की होरी में लोक गीतों की अद्भुत परंपरा है और मध्यप्रदेश के मालवा अंचल के आदिवासी इलाकों में बेहद धूमधाम से मनाया जाता है भगोरिया, जो होली का ही एक रूप है। बिहार का फगुआ जम कर मौज मस्ती करने का पर्व है और नेपाल की होली में इस पर धार्मिक व सांस्कृतिक रंग भी दिखाई देता है।

इसी प्रकार विभिन्न देशों में बसे प्रवासियों तथा धार्मिक संस्थाओं जैसे इस्कॉन या वृंदावन के बाँके बिहारी मंदिर में अलग-अलग प्रकार से होली के श्रृंगार व उत्सव मनाने की परंपरा है जिसमें अनेक समानताएँ और भिन्नताएँ हैं।

पाकिस्तान में बैठक के लिए अलगाववादी हुर्रियत कॉन्फ्रेंस को OIC का निमंत्रण, भारत ने लगाई फटकार, बताया- देश की सम्प्रभुता पर हमला

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अगले सप्ताह इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) की बैठक होने जा रही है, लेकिन उससे पहले पाकिस्तान ने अपने एजेंडे के तहत इसमें अलगाववादी संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस को भी आमंत्रित किया है। पाकिस्तान की हरकत का कड़ा विरोध करते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय (MEA) ने गुरुवार (17 फरवरी 2022) को कड़े शब्दों में कहा कि हम OIC से उम्मीद करते हैं कि वो एंटी इंडिया मूवमेंट और आतंकी गतिविधियों में शामिल संगठनों को प्रोत्साहित नहीं करेगा।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने हुर्रियत कॉन्फ्रेंस को बुलाए जाने के सवाल पर बताया कि हम इस तरह की गतिविधियों को बहुत ही गंभीरता से लेते हैं। ये देश की संप्रभुता पर हमला करने की कोशिश है। इसके साथ ही बागची ने ओआईसी के चरित्र पर शक जाहिर करते हुए कहा कि ये बहुत ही दुर्भाग्य की बात है कि ओआईसी विकास के अहम मुद्दों पर ध्यान देने की बजाय अपने एक सहयोगी के राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ा रहा है।

विदेश मंत्रालय ने कड़े शब्दों में कहा कि हमने बार-बार ओआईसी को यह कहा है कि वो भारत के आतंरिक मामलों में हस्तक्षेप करने के लिए निहित स्वार्थी तत्वों को अपना प्लेटफॉर्म न दे। गौरतलब है कि ओआईसी ने 22 और 23 मार्च 2022 में इस्लामाबाद में होने वाली बैठक में शामिल होने के लिए जम्मू-कश्मीर के अलगाववादी नेता मीरवाइज उमर फारुक को निंमत्रण दिया है।

सर्वदलीय हुर्रियत सम्मेलन (APHC) का गठन 1992 में मीरवाइज उमर फारूक के पहले अध्यक्ष के रूप में किया गया था। इसका संविधान हुर्रियत को कश्मीर विवाद के समाधान के लिए संघर्ष छेड़ने के लिए कहता है।

पिछले साल नवंबर 2021 में खबर सामने आई थी कि केंद्र सरकार हुर्रियत की सभी शाखाओं को केंद्र सरकार UAPA एक्ट के तहत बैन कर सकती है। इस पर घाटी में आतंकियों को फंडिंग करने का आरोप लगा था।

महाराष्ट्र में अंकुश को लोहे की रॉड से मार डाला: इब्राहिम, अदनान, शफीक, अजहर सहित 9 गिरफ्तार

महाराष्ट्र के जालना (Maharashtra) के जालना के अंबड़ गाँव में 15 मुस्लिमों ने एक हिंदू लड़़के की लोहे की रॉड और क्रिकेट बैट से पीट-पीटकर हत्या कर दी। 12 मार्च की शाम को अंबड़ के पठान टोले में घटना को अंजाम देने के बाद सभी आरोपित फरार हो गए। अगले दिन अस्पताल में ईलाज के दरौन पीड़ित की मौत हो गई।

मृतक का नाम रामेश्वर अंकुश खरात है। उनकी उम्र कहीं 14 साल बताई जा रही है तो कहीं 20 साल। हालाँकि, यह बात स्पष्ट रूप से बताई जा रही है कि अंकुश हिंदू धार्मिक गतिविधियों से जुड़े सेवा कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। इसके चलते वह जिहाद सोच रखने वाले मुस्लिमों की नजरों में चढ़े हुए थे। एक छोटी सी घटना को मुद्दा बनाकर उनकी हत्या कर दी गई।

अंकुश खरात 12 तारीख को दोपहर करीब 1 बजे स्वयंभू महादेव मंदिर रोड स्थित फुलारे के कुएं पर प्रसाद प्रह्लाद खरात के साथ तैरने गए थे। इस पर एक युवक के साथ तैरने को लेकर विवाद हो गया। अंकुश ने अपने चचेरे भाई गणेश खरात को फोन पर बताया कि उन्हें धमकी दी गई कि अगर इलाके में दिखे तो जान से मार दी जाएगी।

अंकुश खरात शाम करीब 5 बजे होल्करनगर से पठान मोहल्ला होते हुए खेत की ओर जा रहे थे, तभी उन्हें खलील मौलाना की दुकान के सामने भीड़ ने रोक लिया। इस दौरान उनके साथ गाली-गलौज भी की गई। इसी दौरान शोएब सुलानी और शफीक सुलानी ने लोहे की रॉड से अंकुश पर वार कर दिया, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए। इस दौरान अन्य आरोपित उन पर तरह से हमले करते रहे।

अंकुश गंभीर रूप से घायल होने के बाद बेहोश हो गए। उसी दौरान सुनील दिवाते और बालू दत्ता खरात मोटरसाइकिल पर सवार होकर आए और इलाज के लिए अंबाद के सेवा अस्पताल ले गए, जहाँ से जालना के एक निजी अस्पताल में भेज दिया गया। उसके बाद अगले दिन शाम 6 बजे के करीब उनकी मौत हो गई।

हत्या की खबर मिलते ही इलाके के हिंदूवादी संगठनों से जुड़े लोगों ने थाने पर जमकर प्रदर्शन किया। इसके बाद पुलिस अधीक्षक विनायक देशमुख ने कार्रवाई का आश्वासन देखकर मामले को शांत कराने की कोशिश की। हत्या के विरोध में विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, व्यापारी संघ, धनगर समाज सहित तमाम संगठनों ने 14 मार्च को शांति मार्च निकाला।

बढ़ते दबाव को देखते हुए पुलिस ने इस मामले में 9 आरोपितों को हिरासत में लिया है, जबकि 6 अभी तक पुलिस की गिरफ्त से बाहर हैं। हत्या में शामिल आरोपितों के नाम- इब्राहिम सिराज शेख, अदनान सुलानी, शफीक सुलानी, शोहैब सुलानी, अजहर एजाज अली शेख, फैजान अहमद पठान, अरबाज शाह मोहम्मद पठान, मुरादी मेहरा शेख, आवेज सिराज शेख, शोहैल शाह, मोहम्मद पठान, अनिस गफ्फार शेख, वाजिद इस्माइल शेख, अमीर चांद पठान, अरशद खुर्शीद जिलानी बताए जा रहे हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, अंकुश के सिर पर पिता का साया नहीं है। उनके घर में उनकी माँ और एक बड़ा भाई है। परिवार बेहद गरीबी में जीवन-यापन कर रहा है। हालाँकि, महाराष्ट्र सरकार की ओर से अभी तक किसी तरह की सहायता या मुआवजा देने की घोषणा नहीं की गई है।

‘एक एक्टर का कारगिल मास्टर माइंड से क्या काम, ड्रग्स, दारू, गन और दाऊद इब्राहिम से प्यार’: परवेज मुशर्रफ से मिले संजय दत्त, तस्वीरें सामने आने से उठे सवाल

देश को कारगिल की जंग का दंश देने वाले पाकिस्तान के पूर्व सैन्य जनरल औऱ पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के साथ बॉलीवुड के संजू बाबा यानि कि संजय दत्त की तस्वीरें सामने आई हैं। इन तस्वीरों के सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद अब कई तरह के सवाल खड़े हो गए हैं।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है इन तस्वीर को लेकर जमकर हंगामा मचा हुआ है। बताया जा रहा है कि बॉलीवुड एक्टर औऱ परवेज मुशर्रफ की मुलाकात दुबई में हुई। वायरल हो रही तस्वीर में देखा जा सकता है कि संजय दत्त वहाँ खड़े हुए कुछ कह रहे हैं। जबकि, परवेज मुशर्रफ वहीं पर व्हीलचेयर पर बैठे हैं। कई लोग इस पर कह रहे हैं कि दुबई में दोनों की मुलाकात जिम में हुई थी। वहीं कुछ का कहना है कि दोनों की एक्सीडेंटली मुलाकात हुई थी।

हालाँकि, सोशल मीडिया पर इसको लेकर संजय दत्त की आलोचना की जा रही है। रमन मलिक नाम के ट्विटर यूजर ने कहा, “एक बॉलीवुड एक्टर का #MASTERMINDofKARGIL से क्या लेना-देना है.. संजय दत्त को ड्रग्स, दारू, गन्स और दाऊद इब्राहिम से प्यार है। दुबई में मुशर्रफ के साथ संजय दत्त। इसलिए मैं कहता हूँ कि बॉलीवुड के #LeLI #KHANdan की मुक्ति जरूरी है और #TheKashmirFiles इसकी शुरुआत है।”

इसके साथ ही उन्होंने कश्मीर में 1990 में इस्लामिक जिहाद की शिकार हुईं कश्मीरी पंडित गिरिजा टिक्कू की भी तस्वीर लगाई है। उल्लेखनीय है कि विवेक अग्निहोत्री ने अपनी फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ में कश्मीरी हिंदुओं के दर्द को दिखाया है। इसमें गिरिजा टिक्कू को लेकर भी दिखाया गया है।

इसी तरह से गौतम अग्रवाल नाम के यूजर ने भी संजय दत्त पर निशाना साधा कि कारगिल युद्ध के लिए जिम्मेदार पाकिस्तानी आर्मी के पूर्व जनरल परवेज मुशर्रफ से संजय दत्त ने दुबई में मुलाकात की। आश्चर्य है कि क्या सुरक्षा एजेंसियों को पता है कि पूरी बैठक क्या थी। अगर अरुणाचल प्रदेश सरकार ने अभी तक उन्हें राज्य के ब्रांड एंबेसडर के पद नहीं हटाया है तो उन्हें जल्द हटाएँ।

‘शौहर ने कराया गैंगरेप, न्याय नहीं मिला तो फाँसी लगा लूँगी’: कॉन्ग्रेस उम्मीदवार रहीं यास्मीन राव ने पति अरशद राणा समेत 4 के खिलाफ किया केस

उत्तर प्रदेश के चुनाव में कॉन्ग्रेस उम्मीदवार रहीं डॉ यास्मीन राव ने अपने शौहर अरशद राणा समेत चार लोगों पर उन्हें बंधक बनाकर उनका गैंगरेप करने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि जब 10 मार्च को वोटों की गिनती हो रही थी तो वो उन्हें अपने साथ नहीं लेकर गए, बल्कि उन्हें एक कमरे में बंद कर दिया गया।

कॉन्ग्रेस नेता यास्मीन राव का आरोप है कि उनके शौहर अरशद राणा ने उनका सामूहिक बलात्कार कराय़ा। वो उन्हें पीटते और परेशान करते थे। कॉन्ग्रेस नेता बताती हैं कि उन्हें कमरे के अंदर बंद कर दिया गया था। बाद में उन्होंने सिविल लाइन पुलिस स्टेशन में फोन किया तो महिला कॉन्स्टेबल ने उन्हें रेस्क्यू किया। अब यास्मीन कह रही हैं कि अगर उन्हें न्याय नहीं मिला तो वो फाँसी लगाकर आत्महत्या कर लेंगी।

यास्मीन ने अपने ही शौहर पर आरोप लगाया, “अरशद राणा ने उल्टी-सीधी वीडियो बनाकर उसे अधिकारियों को दिखाया, जिस पर अधिकारी हंस रहे हैं। मुझे शर्म आ रही है। ऐसा लगता है कि डूब कर मर जाऊँ। मैं किसी को भी मुँह दिखाने लायक नहीं रही। मैंने अरशद राणा के मामा, ड्रायवर और अपने पति के खिलाफ शिकायत की है।”

मुजफ्फरनगर के सीओ सिटी कुलदीप कुमार के मुताबिक, यास्मीन ने बलात्कार औऱ मारपीट का केस दर्ज कराया है। इसमें अरशद राणा, उसके मामा शहजाद ड्राइवर समीर मलिक और जहाँगीर के खिलाफ आईपीसी की धारा 376D, 313, 342, 452, 506 और 323 के तहत केस दर्ज किया गया है।

शौहर राणा ने यास्मीन पर ही मारपीट का लगाया आरोप

अरशद राणा ने भी जिले के एसएसपी से मिलकर अपनी पत्नी के खिलाफ शिकायत की है। अरशद राणा का कहना है कि कॉन्ग्रेस ने उन्हें ही विधानसभा का टिकट दिया था, लेकिन उन्होंने अपनी जगह अपनी बीवी को लड़ाया। पत्नी ने मारपीट की तो मैं अपने गनर के साथ बाइक पर बैठकर भाग गया।

राजस्थान में दलित महिला को निर्वस्त्र कर पति-बच्चों के सामने गैंगरेप: कॉन्ग्रेस शासन में बंदूक के बल पर दबंगों ने दिया अंजाम

राजस्थान के धौलपुर (Dholpur, Rajasthan) जिले में एक दलित महिला को उसके पति और बच्चों के सामने निर्वस्त्र कर गैंगरेप करने की घटना सामने आई है। घटना को अंजाम देने के बाद लगभग आधा दर्जन आरोपितों ने पीड़ितों के साथ मारपीट की और वहाँ से फरार हो गए। इस मामले में पुलिस ने गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया है, लेकिन अभी तक किसी आरोपित की गिरफ्तारी नहीं हुई है।

घटना धौलपुर जिले के कंचनपुर थाना क्षेत्र का है। 26 वर्षीया पीड़िता ने पुलिस को दी गई अपनी शिकायत में बताया कि मंगलवार (15 मार्च) की शाम को वह पति और बच्चों के साथ फसल काटकर खेत से घर लौट रही थी। इसी दौरान रास्ते में गाँव के करीब आधा दर्जन लोगों ने उसका रास्ता रोक लिया और हथियार दिखाकर मारपीट करने लगे।

पीड़िता का कहना है कि आरोपितों ने उसके पति के साथ मारपीट की। इस दौरान उसके पति के सिर पर कट्टे के बट से वार किया। उसके बाद आरोपितों ने उसके साथ मारपीट की और कट्टे का भय दिखाकर उसे निर्वस्त्र किया और बच्चों के सामने ही गैंगरेप किया। इस दौरान उसके बच्चे ये सब देख चीखते-चिल्लाते रहे, लेकिन आरोपितों पर इसका प्रभाव नहीं पड़ा। आरोपी वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपितों ने पीड़ित परिवार के लोगों के साथ मारपीट भी की और फिर फरार हो गए।

मामले की जाँच कर रहे सैपऊ के पुलिस उपाधीक्षक विजय सिंह ने बताया कि पीड़िता की ओर से दी गई रिपोर्ट पर नामजद आरोपियों के खिलाफ गैंगरेप और संगीन धाराओं में के दर्ज किया गया है। उन्होंने कहा कि पीड़िता का पर्चा बयान लेकर मेडिकल कराया जाएगा। आरोपितों की तलाश जारी है।

‘भारत की मिट्टी बुलेट ट्रेन के लिए सही नहीं’: नुसरत जहाँ के बयान पर रेल मंत्री ने की खिंचाई, लोगों ने TMC सांसद की वैज्ञानिक समझ पर उठाए सवाल

बुधवार का दिन था। संसद सत्र चल रही थी। अपनी बारी आने पर टीएमसी की सांसद और अभिनेत्री नुसरत जहाँ बोलने के लिए खड़ी हुईं। उन्होंने भारत के हाई स्पीड रेल परियोजना पर बड़ा ही अजीबोगरीब और हास्यास्पद बयान दिया। उन्होंने भारत में बुलेट ट्रेन परियोजना को छलावा करार दिया और दावा किया कि इस देश की मिट्टी हाई स्पीड ट्रेनों के ट्रैक के लिए सही नहीं है।

पश्चिम बंगाल के बशीरहाट से लोकसभा सांसद नुसरत ने लोकसभा में दावा किया कि भारत की मिट्टी बुलेट ट्रेन तकनीक को चलाने के लिए आवश्यक किसी भी तरह का बुनियादी ढाँचा स्थापित करने के लिए उपयुक्त नहीं है। टीएमसी सांसद ने बुलेट ट्रेन परियोजना पर शक जताते हुए दावा किया कि भारत के पास जापान की तरह हाई स्पीड ट्रेन चलाने की क्षमता ही नहीं है। उन्होंने बुलेट ट्रेन परियोजना की सफलता पर संदेह व्यक्त करते हुए दावा किया कि जापान के विपरीत भारत में हाई-स्पीड ट्रेन चलाने की क्षमता नहीं है।

उन्होंने ट्वीट किया, “भारत में जापान की तरह बुलेट ट्रेन चलाने का सपना देश के साथ धोखा है। भारत की धरती इस तरह की रेल पटरियों को जमीन पर स्थापित करने में सक्षम नहीं है। यह विज्ञान है। इसे नुक्कड़ सभा के एक भाषण के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए।”

नुसरत जहाँ के द्वारा दिया गया अजीब भाषण न केवल उनकी वैज्ञानिक समझ को दर्शाता है, बल्कि इससे भारतीय वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की क्षमताओं पर सवाल खड़ा किया गया है। उनके इस भाषण पर संसद ही नहीं, बाहर भी लोगों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उनके इस वायरल वीडियो पर लोग उनका ही मजाक उड़ा रहे हैं।

रेल मंत्री ने भी की खिंचाई

नुसरत के बचकाने बयान पर रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने उन पर भारतीय वैज्ञानिकों की क्षमताओं पर सवाल उठाने का आरोप लगाया। नुसरत के बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट पर संदेह व्यक्त करने को रेल मंत्री ने शर्मनाक करार दिया। उन्होंने कहा, “जो माँ-माटी-मानुष” (माँ, मातृभूमि और लोग) की बात करते हैं, वे माँ (मिट्टी) और मातृभूमि का अनादर कर रहे हैं।”

उन्होंने कहा, “कोई कैसे कह सकता है कि हम भारत की धरती पर बुलेट ट्रेन नहीं चला सकते?” रेल मंत्री ने तृणमूल कॉन्ग्रेस की सांसद देश के वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की क्षमता पर सवाल उठाकर उनका अपमान कर रही हैं।

इसके साथ ही रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने भी बुलेट ट्रेन परियोजना की कार्यों को लेकर जानकारी दी। उन्होंने बताया कि सभी प्रमुख नदियों पर खंभों और पुलों के निर्माण के साथ ही 8 किलोमीटर प्रति माह की गति से कार्य किया जा रहा है। उन्होंने ये भी बताया कि आगामी वक्त में सरकार इसकी रफ्तार 10 किमी प्रति माह करने की योजना पर काम कर रही है।

गौरतलब है कि देश की मिट्टी पर पहले से ही बिना किसी कठिनाई के सेमी-हाई-स्पीड ट्रेनें चलाई जा रही हैं। टीएमसी सांसद के बयानों का समर्थन करने जैसा कोई वैज्ञानिक तथ्य उपलब्ध नहीं है। खास बात ये है कि बुलेट ट्रेन परियोजना के लिए ट्रैक को ऊँचाई पर बनाया जाएगा। इसकी पटरियाँ जमीन पर नहीं होंगी।

‘Pok में ट्रेनिंग, घाटी में 1989 के नरसंहार में शामिल’: पूर्व आतंकी फारूक ने खोली अलगाववादी नेताओं और ISI की पोल

दुनिया जानती है पाकिस्तान (Palistan) और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई (ISI) आतंकियों को पोसते-पालते हैं और उनका इस्तेमाल अपने स्वार्थ के लिए करते हैं, भले ही पूरी की पूरी पीढ़ी बर्बाद ही क्यों ना हो जाए। कश्मीर में भी आजादी के नाम पर पाकिस्तान ने वहाँ के युवाओं को ऐसे ही बरगलाया। जिन्हें पाकिस्तान की गंदी नियत की जानकारी हो गई, उन्होंने आतंकवाद को छोड़ दिया।

जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी गतिविधियों में शामिल रहे और बाद में इससे तौबा करने वाले श्रीनगर के निवासी मोहम्मद फारूक खान उर्फ सैफुल्लाह फारूक कहते हैं कि पाकिस्तान कश्मीरी युवाओं को आतंकी गतिविधियों की ट्रेनिंग देता है और फिर अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करता है।

दैनिक भास्कर के साथ एक इंटरव्यू में फारूक ने बताया कि जब वह किशोरावस्था में थे, तब कश्मीरी घाटी में इस्लामिक आतंकवाद अपने चरम पर था। वह 1989 का वक्त था। उस समय युवाओं को कश्मीर की आजादी के नाम पर भड़काया जाता और आतंकी संगठनों में भर्ती किया जाता। वह भी अन्य लड़कों की तरह आतंकी गतिविधियों में शामिल हो गए और नियंत्रण रेखा (LOC) के पार पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (POK) में AK-47 सहित अन्य हथियारों को चलाने की ट्रेनिंग ली।

उन्होंने बताया कि साल 1986 में कश्मीर में चुनाव हुआ था और उसमें यूनाइटेज जिहाद काउंसिल का प्रमुख और पाकिस्तान में रह रहा आतंकी सरगना सैयद सलाहुद्दीन भी चुनाव लड़ा था। उस चुनाव में सलाहुद्दीन हार गया और धांधली का आरोप लगाते हुए आतंकवाद का रास्ता अपना लिया। इस दौरान कई कश्मीरी युवा आतंकवाद के रास्ते पर चल पड़े।

फारूक बताते हैं कि पाकिस्तान से ट्रेनिंग लेने के बाद वह कश्मीर आ गए और आतंकी गतिविधियों में शामिल हो गए। इसी दौरान घाटी में एक विश्वविद्यालय के कुलपति मुशीर उल हक की हत्या आतंकियों ने कर दी। उन्होंने अपने साथी आतंकियों से पूछा कि कश्मीर में यह लड़ाई आजादी की है तो निर्दोष लोगों की हत्या क्यों की जा रही है, लेकिन किसी इसका उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने आतंकवाद का रास्ता छोड़ने का निर्णय लिया और साल 1991 में आत्मसमर्पण कर दिया।

फारूक ने बताया कि आत्मसमर्पण के बाद वह 8 साल जेल में रहे और इस दौरान तिहाड़ जेल में आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मौलाना मसूद अजहर से मिले। जेल से रिहा होने के बाद वह आत्मसमर्पण करने वाले आतंकियों के पुनर्वास के लिए काम करने लगे। इसके लिए उन्होंने एक संस्था भी बनाई, जिसे पुलिस ने भरपूर मदद की। उनका कहना है कि भारत ही उनकी मातृभूमि है।

‘पेड़ पर लटकाया, अंग काटे, आँखें निकालकर चश्मा पहना दिया’: कश्मीरी हिंदू सरला ने सुनाया खौफनाक मंजर, कहा- ‘बहन के बेटे का सिर काटकर घर के सामने फेंक दिया’

फिल्म निर्माता विवेक अग्निहोत्री की ‘द कश्मीर फाइल्स‘ जब से रिलीज हुई है तब से कश्मीरी पंडित एक-एक कर अपने साथ हुई बर्बरता को दुनिया के सामने रखने के लिए सामने आने लगे हैं। इससे पहले तक वर्षों से कश्मीरी पंडितों के दर्द को अनदेखा किया गया, लेकिन अब कश्मीरी हिंदू पीड़ितों के कई परिवार अपने प्रियजनों के दर्द, पीड़ा और उनके संघर्ष को बता रहे हैं, जो उन्होंने 1990 के दशक में घाटी में इस्लामी आतंक के दौरान झेला था।

इसी तरह से 14 मार्च को इंडिया टीवी पर इन कश्मीरी पंडितों को लेकर एक शो किया गया, जिसकी क्लिप आशीष (@KashmiriRefuge) नाम के एक यूजर ने शेयर की, जिसमें एक कश्मीरी पंडित महिला अपना दर्द बयाँ करती हैं।

शो में ‘द कश्मीर फाइल्स’ की टीम भी मौजूद रही। इस दौरान सरला नाम की कश्मीरी हिंदू महिला ने 1990 के उस भयावह मंजर को साझा किया। उन्होंने बताया कि किस तरह से इस्लामिक आतंकियों ने उनके रिश्तेदारों के साथ क्रूरता की।

सरला ने बताया कि उनका परिवार जान बचाने के लिए पहले अप्रैल को ही कश्मीर छोड़कर चला गया था। घाटी के घर में ही उन्होंने अपना सारा सामान छोड़ दिया। उन्होंने कहा कि 10 दिन के बाद 10 अप्रैल को वो अपने पति के साथ अपना सामान लाने के लिए कश्मीर गईं, जो उनके जीवन की सबसे भयानक रात थी। वो कहती हैं कि एक बार जब वो कश्मीर पहुँचीं तो उन्हें कई तरह की धमकियाँ दी गईं।

वो लोग भी उन लोगों से भिड़ गए, जो निर्दोष कश्मीरी हिंदुओं की जान लेना चाहते थे। इस बीच उन्हें ये समझ आया कि वहाँ रुकना उनके लिए खतरे से खाली नहीं है। ऐसे में एक परिचित की मदद से वो वहाँ से भाग निकले। सरला ने सिसकते हुए बताया, “हमारे पैरों में चप्पल नहीं थी, हमने कुछ भी नहीं खाया था और हम किसी तरह वहाँ से निकल गए… मैं जब तक मैं जिंदा हूँ उस रात को कभी नहीं भूलूँगी।”

सिसकते हुए उन्होंने आगे कहा, “10 दिन बाद हमें न्यूज से पता चला कि मेरे मामा जिंदलाल कौल और चचेरी बहन के पति जगन्नाथ की हत्या कर दी गई है। उन्होंने उन्हें इतनी भयानक मौत दी थी कि आज भी उस घटना को याद करते हैं तो हमारी रीढ़ तक खौफ से सिकुड़ जाती है। उन लोगों ने उन्हें पहले एक पेड़ से लटकाया और फिर शरीर के कुछ हिस्सों को काट दिया। फिर उनकी दोनों आँखें निकाल ली। उसके बाद उसके ऊपर चश्मा पहना दिया। वे 75 वर्ष के थे। वो ऐसा व्यक्ति था हमेशा दूसरों की मदद करता था।”

वो अपने दूसरे रिश्तेदारों के कत्ल के बारे में भी आपबीती साझा करती हैं। रोते हुए सरला आगे बताती हैं कि उनकी एक और चचेरी बहन थी, वो दोनों पति-पत्नी लेक्चरर थे। वो दोनों संदिग्ध परिस्थिति में कहाँ गायब हो गए, उनका आज तक पता नहीं चला। सरला ने ये भी बताया कि उनकी दूसरी बहन के बेटे का सिर काटकर उनके घर से सामने फेंक दिया गया था।

700 कश्मीरी हिंदुओं का लिया इंटरव्यू

सरला के दर्द को सुनने के बाद द कश्मीर फाइल्स के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने बताया कि इस फिल्म के लिए रिसर्च करते वक्त उन्होंने 700 से अधिक कश्मीरी हिंदुओं का इंटरव्यू लिया, जिनमें से सभी की कहानियाँ एक ही तरह की थीं। उन्होंने कहा, “मेरा मानना ​​​​है कि लोगों के लिए अपना दर्द और उनके चोट को बताने का समय बीत चुका है। अगर इस दर्द को दबा दिया जाए तो कोई इलाज नहीं होगा।”

गिरिजा टिक्कू के साथ हुई क्रूरता का जिक्र करते हुए कहा कि यह फिल्म देश और दुनिया के हर बच्चे को दिखाई जानी चाहिए। यह घटना पूरी मानवता के लिए कलंक है। विवेक अग्निहोत्री ने कहा कि अब समय आ गया है कि लोग खुद को दोषी महसूस करें, लोग इस मुद्दे पर चर्चा करें और बहस करें ताकि भविष्य में भारत में एक और कश्मीर न बनें। इंडिया टीवी के पूरे एपिसोड को यहाँ देखा जा सकता है।

गौरतलब है कि फिल्म द कश्मीर फाइल्स जम्मू कश्मीर के उन लाखों कश्मीरी पंडितों पर आधारित है, जिन्हें 1989 में घाटी में इस्लामिक जिहाद के कारण अधिकांश हिंदुओं को घाटी छोड़ने के लिए भागना पड़ा। एक अनुमान के मुताबिक, फरवरी और मार्च 1990 के बीच कश्मीर के कुल 140,000 कश्मीरी पंडितों में से करीब 100,000 ने पलायन किया। उसके बाद भी पलायन जारी रहा। 2011 तक घाटी में करीब 3,000 परिवार ही रह गए।

गुजरात के स्कूलों में गूँजेंगे ‘यदा यदा हि धर्मस्य’ श्लोक… क्लास 6 से 12 के पाठ्यक्रम में शामिल हुई श्रीमदभागवत गीता

गुजरात (Gujrat) के स्कूलों में अब श्रीमदभागवत गीता के श्लोक गूँजेंगे। गुजरात सरकार की नई शिक्षा नीति में क्लास 6 से क्लास 12 तक ‘गीता’ को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाए जाने की मंजूरी मिल गई है। यह आदेश गुजरात के सभी स्कूलों में लागू होगा। गुजरात के शिक्षा मंत्री जीतू वाघानी ने 17 मार्च (गुरुवार) को इसकी घोषणा की।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार ने ये आदेश बच्चों को श्रीमदभागवत गीता के मूल्यों और सिद्धांतों से परिचित करवाने के लिए दिया है। इसी के साथ स्कूलों में गीता पर श्लोक गान और आपसी बातचीत के कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएँगे।

शिक्षा मंत्री जीतू वाघानी ने इसकी घोषणा करते हुए कहा, “क्लास 6 से 8 तक की कक्षाओं में श्रीमदभागवत गीता कहानी और श्लोकों रूप में होगी। वहीं क्लास 9 से 12 तक ये कहानी और श्लोकों के रूप में पहली भाषा पुस्तक में होगी। साल 2022-23 में भारत की संस्कृति और ज्ञान प्रणाली से परिचित करवाने के लिए प्रथम चरण में गीता के मूल्यों और सिद्धांतों को क्लास 6 से 12 तक पढ़ाया जाएगा। यह कदम छात्रों के हितों को ध्यान में रख कर उठाया जा रहा है। बच्चों को गीता के श्लोक ऑडियो और वीडियो रूपों के साथ प्रिंटेड रूप में भी दिए जाएँगे।”

गौरतलब है कि गुजरात में इसी साल नवम्बर या दिसम्बर तक विधानसभा चुनाव होने की संभावना है। यहाँ कुल 182 विधानसभा सीटें हैं। यहाँ बहुमत का आँकड़ा 92 है। राज्य में भाजपा के नेतृत्व का लम्बे समय से शासन है। इस सरकार का कार्यकाल 18 फरवरी 2023 को समाप्त हो रहा है।