Home Blog Page 2905

राजस्थान में लव जिहाद: फतेह मोहम्मद ने पहचान छिपाकर हिंदू नाबालिग लड़की से की दोस्ती, फिर अकेला देख घर में घुस कर किया रेप

राजस्थान (Rajasthan) के सवाई माधोपुर जिले से लव जिहाद का मामला सामने आया है, जहाँ 20 साल के फतेह मोहम्मद ने अपने जाल में फँसाकर एक नाबालिग हिंदू युवती का रेप कर दिया। मामले का खुलासा होने के बाद पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर लिया। बताया जा रहा है कि आरोपित ने अपनी पहचान छिपाते हुए गलत नाम बताकर पीड़िता को जाल में फँसाया था।

रिपोर्ट के मुताबिक, मामला सवाई माधोपुर जिले के कोतवाली थाना क्षेत्र का है। वहीं, आरोपित अंसारी मोहल्ला का रहने वाला है। 20 साल के फतेह मोहम्मद ने युवती को गलत नाम बताकर उसे फँसाया और दोस्ती कर ली। जब आरोपित को लगा कि पीड़िता उसके जाल में फँस गई है तो उसने 7 मार्च 2022 को नाबालिग के घर गया और उसके साथ रेप की वारदात को अंजाम दिया।

इसके बाद पीड़िता के परिजनों ने 8 मार्च को महिला थाने जाकर केस दर्ज कराया। बाद में पुलिस ने मामले में कार्रवाई करते हुए 26 घंटे में ही आरोपित को गिरफ्तार कर लिया। इस मामले में सवाई माधोपुर जिले के पुलिस अधीक्षक सुनील विश्नोई ने बताया कि पीड़िता के परिजनों ने पुलिस को बताया कि एक युवक ने कॉल कर उनकी नाबालिग बेटी को अपने जाल में फँसाया था। इसके बाद कई दिनों तक दोनों में बातचीत होती रही। बाद में उसे अकेला देखकर आरोपित ने घटना को अंजाम दिया।

गौरतलब है कि लव जिहाद के बढ़ते मामलों के बीच राजस्थान में लंबे समय से इसके खिलाफ कानून बनाने की माँग हो रही है। हालाँकि, कॉन्ग्रेस इसका विरोधी रही है और राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने पिछले साल लव जिहाद पर भाजपा सरकारों द्वारा बनाए गए कानून का भी विरोध किया था।

गोपाल साह के घर में घुस कर मारा इमरान और साथियों ने… हमले में पूर्व डिप्टी मेयर बाबुल खान के परिवार की औरतें भी शामिल

बिहार के भागलपुर जिले (Bhagalpur Bihar) में एक हिन्दू परिवार पर उन्मादी भीड़ द्वारा हमला करने का मामला सामने आया है। इस हमले में कई लोगों को चोटें आई हैं। घटना का मुख्य आरोपित भागलपुर का पूर्व डिप्टी मेयर मुहम्मद इकबाल उर्फ बाबुल खान बताया जा रहा है। पुलिस को पीड़ितों की तरफ से दी गई तहरीर में आरोपित की पत्नी और बेटे का भी नाम है। घटना 11 मार्च (शुक्रवार) की बताई जा रही है। फिलहाल इस मामले में दोनों पक्षों द्वारा समझौता कर लिया गया है। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

वायरल वीडियो में एक भीड़ एक घर में घुसकर पूरे परिवार पर हमला करते दिखाई दे रही है। भीड़ में महिलाएँ, युवा और बुजुर्ग भी दिखाई दे रहे हैं। हमलावर घर में घुस कर लोगों को अंदर से घसीटकर बाहर ला रहे हैं और पीड़ित परिवार कुछ समय तक एक-दूसरे को बचाने का प्रयास करते दिख रहे हैं। इस वीडियो को एक शख्स ने अपने घर की छत से बनाया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, घटना भागलपुर के तातारपुर थाना क्षेत्र की है। पुलिस ने बताया कि इस घटना की शुरुआत फब्तियाँ कसने से हुई। यहाँ के उर्दू बाजार इलाके में शहर के पूर्व डिप्टी मेयर बाबुल खान का परिवार रहता है। उनका बेटा इमरान पर नशे की हालत में एक युवती से छेड़खानी करने लगा, जिसको लेकर विवाद हो गया और इमरान को चोटें आईं। घायल इमरान जब घर पहुँचा तो उसके साथ के दर्जनों लोग आक्रोशित हो गए। उन्होंने एकजुट होकर मुहल्ले के ही गोपाल साह के परिवार पर हमला बोल दिया। गोपाल साह के मुताबिक हमले में लात-घूँसों के अलावा लोहे की रॉड का भी इस्तेमाल किया गया है। इस लोगों ने इस झगड़े की वजह रास्ते को लेकर विवाद भी बताया है।

इस घटना के विरोध में हिन्दू संगठन के लोग घटनास्थल पर जमा हो गए और विरोध प्रदर्शन करते हुए आरोपितों पर तत्काल कार्रवाई की माँग की। हिन्दू संगठनों ने पूरी गली को जाम कर दिया। प्रदर्शनकरियों ने पैदल आने-जाने तक पर रोक लगा दी। उन्होंने हमलावरों की गिरफ्तारी होती तक जाम न हटाने की घोषणा की। पुलिस ने हालत को काबू में रखने के लिए कई थानों से फ़ोर्स बुला ली थी।

ऑपइंडिया ने इस मामले में पीड़ित गोपाल साह से बात की। उन्होंने हमले की वीडियो की पुष्टि करते हुए उसको सही बताया और अपना साथ देने वाले हिन्दू संगठनों का आभार जताया। उन्होंने बताया, “हमको बेवजह मारा गया। बाबुल खान के पक्ष में आई भीड़ किसी और को ही पीट रही थी। हम तो उसे बचाने गए थे। फिर हमें भी मारा जाने लगा। इस घटना की मुख्य जड़ में बाबुल खान है। वो पूर्व में डिप्टी मेयर था। हमला करने वालों में इसका बेटा इमरान और परिवार की महिलाएँ भी शामिल हैं।”

दोनों पक्षों के बीच हुआ समझौता

समझौते को लेकर गोपाल साह ने बताया, “केस दर्ज करके 3-4 लोगों को हिरासत में लिया गया था। मैं इस समय थाने में ही बैठा हूँ। कल से मुझे समझौते के लिए तमाम लोगों ने कहा। प्रशासन भी आने वाली होली और शब्बे रात की बात बता रही है। जिन्होंने हमारे ऊपर हमला किया है वो भी बार-बार माफी माँग रहे हैं। यहाँ तक कि कल रात हमारे समर्थन में इस घटना में जाम लगाने वाले भी अब इस मामले को यहीं खत्म करना चाहते हैं। हमने आपस में समझौता करने का निर्णय लिया है। अब ये आगे से कुछ भी करेंगे तो कठोर कार्रवाई इनके खिलाफ होगी।”

पति के खून से सना चावल खिलाया, रेप के बाद 2 हिस्सों में काटा… बॉलीवुड डायरेक्टर की बीवी ने फिर भी उड़ाया कश्मीर फाइल्स का मजाक

हाल ही में मैं 6 मार्च, 2022 को मेरे पति (जो कि किसी भी तरह से राजनीतिक नहीं हैं) और मैं विवेक अग्निहोत्री की फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ की विशेष स्क्रीनिंग के लिए गए थे। मैं झूठ नहीं बता रही, रास्ते में मैं यूँ ही अपने पति से इस बात पर चर्चा करने लगी कि कहीं इस फिल्म में भी कश्मीरी हिन्दुओं पर हुई क्रूरता को कमतर कर के तो नहीं दिखाया जाएगा? ठीक वैसे है, जैसा अन्य फिल्मों में किया जाता है।। मेरे मन में ये सवाल था कि क्या वे इस्लामी नारों ‘रालिव, त्सालिव, गैलिव (इस्लाम अपनाओ, भाग जाओ या मरने के लिए तैयार रहो) को दिखाएँगे?

मेरे मन में सवाल थे कि क्या वो मुस्लिम बहुल कश्मीर में काफिरों के खिलाफ नारेबाजी को दिखाएँगे? क्या महिलाओं भारतीय तिरंगे को फाड़ने वाले, हिन्दू महिलाओं का बलात्कार करने वाले और बच्चों की हत्या करने वाले इस्लामी कट्टरपंथियों की सच्ची को इस फिल्म में दिखाया जाएगा? क्या वो इस तथ्य को अपनी फिल्म में दिखाएँगे कि क्रूर इस्लामी कट्टरवादी कश्मीर को हिंदू मुक्त करना चाहते थे। लेकिन, वो चाहते थे कि हिन्दू महिलाएँ वही रह जाएँ, ताकि वो उन्हें अपना गुलाम बना सकें।

मेरा दिमाग इन सब चीजों को लेकर घूम ही रहा था कि हम सिनेमाघर में पहुँच गए। दरअसल, बंगाल छोड़ने के बाद मैं दिल्ली में नई हूँ। पिछले साल 2021 में वहाँ हुए विधानसभा चुनावों के राज्य में राजनीतिक हिंसा के बीच ममता बनर्जी ने सीआईडी के मामले में मुझे फँसाने की कोशिश की थी। इसके बाद ही मैं दिल्ली आ गई थी। इसलिए अभी भी मुझे इस शहर के यातायात के बारे में बहुत अधिक पता नहीं है। सिनेमा में हम आगे की सीट पर बैठे थे। मैंने फिल्म में कश्मीर की आजादी पर बात करते हुए बेहद अभिनेत्री एक्ट्रेस पल्लवी जोशी को देखा, जो अपने किरदार में बिल्कुल अरुंधती रॉय की तरह प्रतीत हो रही थीं।

‘द कश्मीर फाइल्स’ में एक्टर दर्शन कुमार एक युवा कश्मीरी छात्र की भूमिका निभा रहे होते हैं। वो इस फिल्म में एक वामपंथी प्रोफेसर (जिसका किरदार पल्लवी जोशी ने निभाया है) की प्रोपेगंडा भरी बातों से प्रभावित होते हैं, लेकिन अंततः उन्हें अपने लोगों के नरसंहार के इतिहास का पता चलता है।

सच कहूँ तो जब मैंने ऑपइंडिया ज्वाइन किया था, तब मेरा काम लिखना था और आज हम जो भी कर रहे हैं, वो हमारे कार्यों का ही परिणाम है, जिसके बारे में हमने सोचा भी नहीं था। जीवन को बनाए रखने के लिए हल्के मानसिक उन्माद के साथ-साथ थोड़ा क्रोध भी आवश्यक होता है। झूठ फैलाए जाने पर गुस्सा आता है। हिंदुओं के शवों पर किसी का ध्यान ही नहीं जाता है। कट्टरपंथी इस्लामवादियों की हिंसा के सामने देश घुटने टेकने लगा है। वो लोग सड़कों पर उतरकर चिल्लाते हैं कि ‘गुस्ताख ए रसूल की एक ही सजा, सर तन से जुदा’। हाँ, इसके लिए अंग्रेजी का ज्ञान, सच को जानने की भूख और जुनून होना चाहिए। इन सबसे बढ़कर गुस्सा होना चाहिए। ये वो गुस्सा है, जो हिन्दू धर्म और देश के प्रति आपके प्यार से निकला है और इस कार्य में आगे बढ़ने की प्रेरणा देते रहता है।

अगर इन कामों को करने में अगले कुछ सालों में मुझे लगे कि मेरा गुस्सा कम हो रहा है तो ‘द कश्मीर फाइल्स’ इस गुस्से के लिए टॉप-अप का काम करेगा, जो कि इस आग को अगले कुछ और सालों तक जलाएगा। ऐसा सिर्फ मेरे साथ ही नहीं है, बल्कि वकालत करने वाले मेरे एक मित्र का भी यही विचार था। असल में ‘द कश्मीर फाइल्स’ देखने के कुछ दिनों बाद जब हम मिले तो वास्तव में इसने हमारे जुनून को ‘क्रोध का टॉप-अप’ किया।

फिल्मों की समीक्षा बहुत ही कठिन कार्य होती है। आप अपने पाठकों को इसके बारे में बताना तो चाहते हैं, लेकिन उन्हें सब कुछ नहीं बताते हैं। ‘द कश्मीर फाइल्स’ की कहानी बहुत ही आसान है। इसमें कश्मीरी हिंदुओं की उस व्यथा को बताया गया है, जो कि उन्हें इस्लामी आतंकियों ने दिया था। यही उनका सच है। इसमें कश्मीरी हिंदुओं की खून से लथपथ कहानियों को कैम्पस की राजनीति से जोड़कर दिखाया गया है, जो आज हम देखते हैं। फिल्म में हिंदुओं के साथ हुई बर्बरता को काल्पनिक तौर पर चित्रित किया गया है। फिल्म में इस बात को बड़े ही जीवंत तरीके से दिखाया गया है कि किस तरह की चालाकी और धूर्तता के साथ युवा पुरुषों और महिलाओं ब्रेनवॉश कर उन्हें यह विश्वास दिलाया जाता है कि कश्मीर में किसी भी तरह का नरसंहार हुआ ही नहीं था। ऐसे ही बिना किसी कारण के हिंदू ये जगह छोड़कर चले गए। बीते 30 सालों से इसी कहानी को राजनेताओं के द्वारा दोहराया जा रहा है।

कश्मीरियों के साथ हुई बर्बरता की कहानी को फ्लैशबैक में समझाया गया है। जब आप सिनेमा में ‘द कश्मीर फाइल्स’ को देखेंगे तो आपको ऐसा महसूस होगा कि आप हिंदुओं के साथ हुए नरसंहार के साक्षी हैं। विवेक अग्निहोत्री ने एक दृश्य जम्मू-कश्मीर में पुलवामा जिले के शोपियाँ के पास नदीमर्ग गाँव का दिखाया गया है, जहाँ कट्टरपंथी इस्लामी आतंकी हिंदुओं को एक-एक कर प्वाइंट-ब्लैंक रेंज से गोली मार देते हैं। उस सीन के दौरान थिएटर में पिन-ड्रॉप साइलेंस होता है, एक-एक गोली चलने पर मैं अपनी सीट पर सिहर जाती थी। साल 2003 की वो कयामत की रात थी जब सेना की वर्दी में आए आतंकियों ने 24 हिंदुओं की बेरहमी से हत्या कर दी थी। एक आतंकी कहता है, ‘ये कर्णवुं चुप’ (बच्चे को चुप कराओ) और शिशु को गोली मार दी। ऐसे में मेरी बेटी की तस्वीर सहज ही मेरी आँखों के सामने आ गई और मैं फूट-फूट कर रोने लगी।

फिल्म में ऐसे ही एक और विजुअल्स आता है, जिसमें एक महिला को जबरदस्ती उसके पति के खून में सना चावल खाने को मजबूर किया जाता है। यह घटना साल 1990 की है, आतंकी बीके गंजू को तलाश करते हुए आए, लेकिन वो चावल की बोरी में छिप गए। इस्लामिक आतंकियों ने उन्हें कई गोलियाँ मारी और खून से सने उस चावल को उनकी पत्नी को खाने पर मजबूर किया। इसी तरह से गिरिजा टिक्कू की दिल दहला देने वाली कहानी को भी चित्रित किया गया है, जहाँ उनकी हत्या करने पहले बर्बर आतंकवादी कई दिनों तक गिरिजा टिक्कू का गैंगरेप करते हैं, उन्हें निर्वस्त्र करते हुए दिखाया जाता है।

फिल्म समाप्त हो गई, लेकिन करीब तीन मिनट तक हर व्यक्ति जैसे के तैसे बैठे रहे, वहाँ पर एकदम शांति छाई हुई थी। ऐसा इसलिए नहीं कि लोग टेक्नीशियन को उनके नामों को पढ़ने का सम्मान दे रहे थे। यह इसलिए हुआ क्योंकि इतने भयावह हालात देखने के बाद सभी को संभलने के लिए कम से कम 3 मिनट का समय चाहिए था और इन लोगों में से एक मैं भी थी।

इसके बाद जैसे ही दर्शक बाहर निकलने लगे तो हड़कंप मच गया। किसी को आश्चर्य हुआ होगा कि आखिर फिल्म क्रिटिक अनुपमा चोपड़ा ऐसी किस चीज से प्रेरित हुईं कि उन्होंने इसकी इतनी नीरस समीक्षा की। उन्होंने 1990 में हुए नरसंहार को भी नकार दिया।

अनुपमा चोपड़ा द्वारा की गई कश्मीर फाइल्स की समीक्षा

अपनी समीक्षा के दौरान अनुपमा चोपड़ा द्वारा फिल्म कश्मीर फाइल्स की 6 पैराग्राफ में समीक्षा रिपोर्ट को प्रकाशित किया, लेकिन उन्होंने इस बात को नकार दिया कि कश्मीर में कभी हिंदुओं का नरसंहार हुआ भी था। हिंदुओ के नरसंहार को सिरे से खारिज करते हुए अनुपमा फिल्म को प्रोपेगेंडा या इससे भी बदतर ‘संशोधित ड्रामा’ करार दिया। इसमें कहा गया, “फिल्म में बड़े पैमाने पर नरसंहार और पलायन को दिखाया गया है, जहाँ हर हिंदू एक दुःखी यहूदी है और हर मुस्लिम एक हत्यारा नाजी है।’ इसमें कहा गया है कि उत्पीड़न और प्रताड़ना की कहानी का नाटकीकरण करना कोई बड़ी समस्या नहीं है। इसे उकसाने और आज की असुरक्षा को देखते हुए डिजाइन करना बड़ी समस्या है। इसमें शिक्षा कम है और एक डिफेंसिव राजनीतिक बयान व फिल्म के तौर पर कमरे के अंदर की जाने वाली बहस अधिक है।”

फिल्म की समीक्षा में आगे लिखा गया है, “अगर मैं फिल्म के बारे में कही जा रही बातों को मान भी लूँ तो भी फिल्म निर्माण के दौरान वर्तमान माहौल से लाभ उठाने वाला कारनामा तो किया ही गया है – विस्थापित पीड़ितों के साथ सहानुभूति के बजाय हिंदू राष्ट्रवाद की वर्तमान लहर के साथ इसे जोड़ा गया है। वास्तविक जगह की समझ या जिज्ञासा को त्याग कर इस सिनेमा का लेखन केवल दो चरम तरीके से किया गया – शब्दों का जाल बुन कर और टॉर्चर पॉर्न (जहाँ घोर यातना ही कहानी का मूल हो) के जरिए।”

अनुमपा अपनी समीक्षा में कहती हैं कि उन्हें इस बात का यकीन ही नहीं होता है कि इस फिल्म से मुस्लिमों (जिन्हें खलनायक बनाया गया) को अधिक नाराज होना चाहिए या फिर हिंदुओं को जो ‘सांस्कृतिक शवों के रूप में खत्म हो गए’। फिल्म समीक्षक दावा करते हैं कि यह फिल्म निर्माता की ‘कलात्मक थ्योरी’ पर आधारित है।

समीक्षा को देखने से यह भी पता चलता है कि अनुपमा बड़ी ही चालाकी से इस्लामिक आतंकियों को विद्रोही साबित करना चाहती हैं। लेकिन मजबूरी में वो उन्हें आतंकी कहती हैं, ताकि उन्हें खारिज न किया जाय।

कश्मीर में हिंदुओं के अतीत के वैभव पर भाषण देकर जेएनयू के छात्रों का दिल जीतने वाले कैरेक्टर कृष्णा के बारे में लिखते हुए लेखिका लिखती हैं कि यह सच नहीं था, क्योंकि जेएनयू के छात्रों को 6 मिनट में हिंदुओं के नरसंहार के बारे में अहसास ही नहीं हो सकता था। औसत बुद्धिमता वाले जेएनयू छात्र के प्रवेश की लंबी प्रक्रिया है, लेकिन इस पर हम बाद में बात करेंगे।

अनुपमा चोपड़ा की कचरा समीक्षा को खारिज किया

समीक्षक ने इस बात का खुलासा किया है कि उनका उद्देश्य ये नहीं है कि 6 मिनट में जेएनयू के छात्र अपने विचारों को बदल दें। लेकिन इसका तथ्य यह है कि फिल्म में विवेक अग्निहोत्री ने 1990 में हुए केवल नरसंहार को ही नहीं, बल्कि पलायन को भी दिखाया है।

इतने घटिया तरीके से फिल्म की समीक्षा करने वाले एंटरटेनमेंट पत्रकारों के उज्वल भविष्य की कामना नहीं कर सकती। लेकिन शायद लेखक संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, लेखक को नरसंहार की परिभाषा को देखना चाहिए था।

नरसंहार को अनुच्छे 2 में परिभाषित किया गया है

जब कोई कार्य किसी राष्ट्रीय, जातीय, नस्लीय या धार्मिक समूह को पूरी तरह या आँशिक रूप से खत्म करने के इरादे से किया गया हो तो वो नरसंहार होता है। जैसे:

A: किसी समूह के सदस्यों की हत्या

B : समूह के सदस्यों को गंभीर शारीरिक या मानसिक क्षति पहुँचाना

C : जीवन की सामूहिक स्थितियों पर जानबूझकर थोपना, जो इसके पूर्ण या आंशिक रूप से भौतिक विनाश लाने के लिए गणना की गई है

D : समूह के भीतर जन्म को रोकने के उद्देश्य से उपाय करना

E : समूह के बच्चों को जबरन दूसरे समूह में स्थानांतरित करना।

अब सवाल है कि क्या यह लेखक का तर्क है यह था कि कश्मीरी आतंकवादी धार्मिक समूह के तौर पर कश्मीरी हिंदुओं को नष्ट करना चाहते थे?

यहाँ हम कुछ उन नारों के बारे में बताते हैं, जो कि 1990 में हिंदुओं की हत्या करते वक्त इस्लामिक आतंकियों ने लगाए थे:

  • ‘ज़ालिमो, ओ काफिरों, हमारा कश्मीर छोड़ दो।’
  • ‘कश्मीर में रहना है, अल्लाह-हो-अकबर कहना होगा।’
  • ‘ला शर्किया ला घरबिया, इस्लामिया! इस्लामिया!’ (पूर्व से पश्चिम तक सिर्फ इस्लाम रहेगा)
  • ‘कश्मीर बनेगा पाकिस्तान’
  • ‘पाकिस्तान से क्या रिश्ता? ला इलाहा-इल्लिल्लाह।’ (इस्लाम पाकिस्तान के साथ हमारे संबंधों को परिभाषित करता है)
  • ‘कश्मीर बनावों पाकिस्तान, बटाव वारे, बटनेव सान।’
  • (हम कश्मीरी पंडित महिलाओं के साथ कश्मीर को पाकिस्तान बना देंगे, लेकिन उनके पुरुषों नहीं)

अब सवाल ये है क्या लेखक अपने अंत:करण से यह कह सकती हैं कि ये मजहबी नारे कश्मीर के धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ नहीं थे? हिन्दू महिलाओं का रेप नरसंहार का हिस्सा नहीं है? एक पत्नी को उसके पति के खून से लथपथ चावल खिलाना उतना भयावह नहीं है? ये सब नरसंहार की श्रेणी में नहीं आता?

तैमूर के ‘गंदे डायपर पारखी’ के हिसाब से नरसंहार के लिए कोई खास बेंचमार्क है क्या? शायद उन नकली घृणा अपराधों में से एक जहाँ मुस्लिमों पुरुषों को ‘जय श्री राम’ कहने के लिए मजबूर किया गया? हम यह कभी नहीं जान पाएँगे।

अनुपमा, विधु विनोद चोपड़ा की पत्नी हैं औऱ खुद भी एक कश्मीरी हिंदू हैं। संभवतया चोपड़ा इस बात से नाराज हों कि कश्मीरी हिंदुओं पर आधारित उनके पति की प्रोपेगेंडा फिल्म ‘शिकारा’ बुरी तरह पिट गई, जिसमें इस्लामिक आतंकवाद और हिंदुओं के नरसंहार को व्हाइटवॉश करने की कोशिश की गई थी। विवेक अग्निहोत्री की फिल्म 30 साल पहले कश्मीर में हिंदू समुदाय के खिलाफ बर्बर इस्लामियों द्वारा की गई नग्न क्रूरता को दिखाती है। लेखक को लगता है कि यह मुस्लिम समुदाय को खलनायक मानता है, वह इस कदर घिसा-पिटा है कि वह शायद प्रतिक्रिया के लायक भी नहीं है।

‘द कश्मीर फाइल्स’ की इतनी घटिया समीक्षा करके अनुपमा चोपड़ा ने इस्लामिक आतंकवादियों के द्वारा हिंदुओं के बहाए गए खून आनंद लेना चुना है।

कश्मीर फाइल्स को देखने से यह पता चलता है कि स्वतंत्र फिल्म निर्माताओं के लिए यह बहुत ही बड़ा कदम है कि भले ही व्यवस्था आपके खिलाफ हो, लेकिन आप ऐसी फिल्में बना सकते हैं, जो मायने रखती हैं। खास बात यह है कि शायद यह मुख्यधारा की पहली कोशिश है, जिसमें कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार के साथ हुई बर्बरता के बारे में ईमानदारी से बताया है। यह फिल्म निर्माताओं को हिंदुओं के खिलाफ हुई बर्बरता को उजागर करने की हिम्मत प्रदान करेगा। मानव पीड़ा, नरसंहार या यातना और धर्मांतरण की अंतहीन कहानियों को फिल्मों के जरिए बताना चाहिए, क्योंकि लिखित शब्द दृश्य संकेतों से मेल नहीं खाता है। द कश्मीर फाइल्स एक ऐसा कदम है जो हमारी यादों में सदा के अंकित हो गया है। फिल्मी स्टार्स के बेबी के डायपर और अभिनेत्रियों के जिम फोटो की सैंपलिंग करने वालों से कुछ नहीं होता।

‘मोदी जी का बेटा लौटा है… मेरा नहीं’ : यूक्रेन से भारत लौटा ध्रुव, कश्मीरी पंडित पिता ने रो रोकर कहा- भारत जिंदाबाद

यूक्रेन में फँसे भारतीयों को लाने का सिलसिला जो फरवरी माह से शुरू हुआ था वो इतने दिन बीतने के बाद भी बरकरार है। पूरी प्रतिबद्धता के साथ भारत सरकार इन कोशिशों में लगी है कि वो अपने सभी नागरिकों को सकुशल लेकर आए। इसी क्रम में हाल में सूमी में फँसे लोग भी भारत लाए गए हैं जिनमें एक ध्रुव भी शामिल है। ध्रुव एक कश्मीरी हैं जिनके पिता संजय पंडिता की एक वीडियो सामने आई है।

वीडियो में संजय पंडिता काफी भावुक दिखते हैं। वह समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए कहते हैं, “ये मेरा बेटा नहीं आया ये मोदी जी का बेटा आया है। उम्मीद नहीं थी हमें इन बच्चों की। हमने ये उम्मीद छोड़ रखी थी। हमारे लिए कोई उम्मीद नहीं बची थी, जो सूमी में उन लोगों ने हालात किए थे। उन हालातों में उनका जीवन नामुमकिन हो रहा था कि मैं भारत सरकार का धन्यवादी हूँ कि उन्होंने मुझे मेरा बेटा लौटाया। भारत के लिए जिंदाबाद।”

उन्होंने अपने बेटे के हालातों के बारे में बताया, “बेटा जब लौटा तो एक भाई ने उनसे पूछा कि उसे खाने के लिए क्या चाहिए। उसने कहा कि उसे कुछ नहीं चाहिए बस पानी पिला देना। वो लोग वहाँ पानी के लिए तड़पे। उन्होंने बर्फ पिघला कर पिया है। वह उस पानी के लिए तड़प रहा था। हम पानी लेकर आए हैं।”

संजय ने बताया कि वो कश्मीर से हैं और उनका बेटा यूक्रेन सूमी से लौटा है। वह लोग आभारी हैं भारत सरकार, पीएम मोदी के। वहीं ध्रुव ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि उनके लिए सूमी में जिंदा रहना बहुत मुश्किल हो रहा था। उन्हें भारत आकर राहत मिली है। ध्रुव ने भारत सरकार द्वारा चलाए जा रहे ऑपरेशन गंगा को धन्यवाद दिया।

बता दें कि नॉर्थ ईस्ट यूक्रेन के शहर सूमी से 674 भारतीयों को लेकर तीन उड़ानें भरी गई थीं जो 11 मार्च को दिल्ली में उतरीं। भारत पहुँचे बच्चों ने अपने माता-पिता को वहाँ के हालात के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि उन लोगों को सूमी में पानी पीना भी मुश्किल हो गया था, वह लोग बर्फ पिघलाकर पानी पी रहे थे।

‘पोनीटेल में लड़कियों को देख लड़के हो जाते हैं उत्तेजित’: जापान में स्कूली लड़कियों के अंडरवियर से लेकर बाल का रंग तक निर्धारित

जापान (Japan) में अजीबोगरीब अजीबो गरीब प्रतिबंध लागू हैं। वहाँ के कुछ स्कूलों में लड़कियों को सिंगल चोटी या पोनीटेल बनाकर स्कूल जाने पर पाबंदी है। लड़कियों को अपने बाल रंगने की भी इजाजत नहीं है। इसके पीछे वजह बताई जा रही है कि इससे लड़के उत्तेजित नहीं होंगे।

इस नियम को लेकर साल 2020 में एक सर्वे किया गया। इस सर्वे में फुकुओका इलाके के कई स्कूलों शामिल किया गया था। इसमें यह बात निकलकर आई कि पोनीटेल रखने के कारण लड़कियों की गर्दन दिखती है और इसे देखकर लड़के उत्तेजना महसूस करते हैं। यही कारण है कि स्कूलों ने लड़कियों के पोनीटेल रखने पर पाबंदी लगा दी है।

यही नहीं जापान में लड़कियों की चड्ढी का रंग निर्धारित किया गया है। वहाँ के कुछ स्कूलों में सिर्फ लड़कियों को ही चड्ढी पहनने की इजाजत है और वो सिर्फ सफेद रंग की। लड़के चड्ढी नहीं पहन सकते। इसके साथ ही लड़कियाँ अपने बालों को रंग नहीं सकती। अगर किसी के बाल का रंग काला से अलग है तो उसे साबित करना होगा कि वह उसका प्राकृतिक रंग है। वहाँ स्कर्ट और मोजे की लंबाई से लेकर भौंहे के आकार तक लेकर कई तरह के नियम बनाए गए हैं।

वहाँ के एक मिडिल स्कूल के पूर्व शिक्षक मोतोकी सुगियामा ने वाइस को बताया कि स्कूलों के प्रबंधन ने उनसे कहा कि लड़कियों को पोनीटेल नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि इससे उनकी गर्दन के पिछले हिस्से दिखते हैं और लड़के यौन रूप से उत्तेजित महसूस करे हैं।

सर्वे में यह बात सामने आई कि फुकुओमा के 10 में से एक स्कूल में यह नियम लागू है। सुगियामा का कहना है कि वह पिछले 11 सालों में वह 90 मील के दायरे में पाँच अलग-अलग स्कूलों में पढ़ा चुके हैं और हर जगह पोनीटेल पर पाबंदी है।

बुराकू कोसोकू नाम से पहचाने जाने वाले इस कानून को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर बहस होने के बाद वहाँ के सरकार ने शिक्षा बोर्ड को इस कानून को बदलने के लिए कहा था। कुछ संस्थानों ने इसे बदल दिया, लेकिन कुछ स्कूलों में यह पाबंदी आज भी जारी है।

बुराकू कोसोकू 1870 में तब लागू किया गया था, जब जापानी सरकार ने शिक्षा का अपना पहला व्यवस्थित नियमन लागू किया था। 1970 और 80 के दशक में स्कूलों में छेड़छाड़ और हिंसा को कम करने के प्रयास के तहत इसे सख्ती से लागू किया गया। यह प्रथा आज भी जारी है।

‘मुझे PM बनाना है तो…’ : जब 2012 में जीत के बाद सपाइयों ने फूँके थे दलितों के घर, बच्चे से लेकर बसपा नेता समेत 3+ की हुई थी मौत

साल 2022 के विधानसभा चुनाव होने के बाद उत्तर प्रदेश में जो खुशी का माहौल देखने को मिल रहा है वो योगी सरकार की वापसी के कारण है। लोग खुश हैं कि एक बार फिर प्रदेश योगी सरकार के नेतृत्व में आगे बढ़ेगा। लेकिन इस खुशी में वो किसी को नुकसान नहीं पहुँचा रहे। वरना एक समय ऐसा भी था जब समाजवादी पार्टी सत्ता में आई थी और इसका खामियाजा आम जन को भुगतना पड़ा था।

वो साल 2012 के विधानसभा चुनाव थे जब सपा ने प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी को हराकर जीत हासिल की थी। इस जीत का नशा सपा कार्यकर्ताओं पर ऐसा चढ़ा कि उन्होंने प्रदेश में हंगामा करना शुरू कर दिया। मात्र जीत के 36 घंटों में कई दलितों के घरों को फूँक दिया गया और तीन लोग मौत के घाट उतार दिए गए। हालात ऐसे हो गए कि मुलायम सिंह यादव ने आकर अपने कार्यकर्ताओं से अपील की कि अगर वे लोग अनुशासन नहीं बरतेंगे तो उनको प्रधानमंत्री नहीं बना पाएँगे और पार्टी की छवि भी बिगड़ेगी।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, मुलायम सिंह यादव ने सैफई में कहा था, “अगर आप लोग अनुशासन में नहीं रहेंगे तो आप मुझे प्रधानमंत्री नहीं बनवा पाएँगे। हमने बहुत मेहनत से विधानसभा चुनाव जीते हैं तो ऐसी कोई हरकत न करें जिससे पार्टी की छवि बिगड़े।” वहीं समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव ने इन सबके पीछे बहुजन समाज पार्टी को जिम्मेदार ठहराया था। उन्होंने कहा था कि ये उन लोगों की साजिश है जिन्हें उनकी पार्टी ने चुनाव में हराया और इसमें शामिल कुछ अधिकारी हैं जो बसपा के प्रति वफादार थे।

अखिलेश यादव ने कहा था, “समाजवादी पार्टी का कोई भी शख्स इसमें शामिल नहीं है। आप इस बारे में अपने सूत्रों से भी पता कर सकते हैं। अगर कोई भी शख्स इसमें शामिल पाया गया तो उसके विरुद्ध त्वरित और कड़ी कार्रवाई होगी।” इतना ही नहीं 10 साल पहले जिस दिन सपा ने जीत दर्ज की थी उस दिन सपा कार्यकर्ताओं ने पत्रकारों को झांसी में पीटा था और उनके उपकरणों की भी तोड़फोड़ की थी। फिर यादव और बिंद समुदाय के लोगों ने मकदुमपुर गाँव में नटों के घरों में आग लगा दी थी। खुशबू नाम की महिला ने बताया था, “मुझपर हमला हुआ और घर को आग लगा दी गई क्योंकि मैंने सपा को वोट नहीं दिया।”

इनके अलावा सीतापुर जिला के भंभिया गाँव में भी दर्जन भर दलितों के घरों को जलाया गया था। स्थानीयों ने दावा किया था सपा वाले अपनी जीत का जश्न मना रहे थे तभी उनके घरों में आग लगाई गई। सपा और बसपा के कार्यकर्ताओं में भिड़ंत के बाद अंबेडकर नगर के सम्मानपुर में भी पूर्व मंत्री राम अचल राजभर की चावल की मिल को फूँका गया था। इलाहाबाद के नैनी इलाके में दो लोगों की हत्या हुई थी जबकि आगरा के मनसुखपुर में बसपा के मुन्ना लाल को मार दिया गया था। ग्रामीणों ने दावा किया था कि सारे कुकर्म सपा वालों के हैं। चुनावी जीत के बाद संभल में भी एक बच्चे की मौत हुई थी, वारदात तब घटी थी जब सपाई अपनी पार्टी के जीत के जश्न में फायरिंग कर रहे थे। फिरोजाबाद में एक युवा बुलेट लगने से मरा था, ये घटना भी सपा और पुलिसकर्मियों के बीच भिड़ंत के समय घटी थी।

2012 में सत्ता में आई थी सपा

उल्लेखनीय है कि साल 2012 के विधानसबा चुनावों में समाजवादी पार्टी ने 401 सीटों पर चुनाव लड़ा था। उस समय उन्हें 224 सीटों पर विजय हासिल हुई थी और राज्य में सपा ने अपनी सरकार बनाई थी। ये पहली दफा था जब प्रदेश में सपा की बहुमत से सरकार बनी थी। इसके बाद साल 2017 में सपा ने कॉन्ग्रेस के साथ चुनाव लड़ा लेकिन फिर भी उन्हें कोई फायदा नहीं हुआ। 311 सीटों पर उम्मीदवार खड़े करने के बावजूद उन्हें 47 सीट मिली और इस तरह सपा को सत्ता से हटाया गया। इस बार सपा को भारी प्रचार के बाद 111 सीटों पर विजय मिली।

वली ही है यूक्रेन वाला वो ‘भूत’, जो हर दिन मार देता है 40 लोगों को? – 3.5 km रिकॉर्ड वाला दुनिया का सर्वश्रेष्ठ स्नाइपर कनाडा से कैसे पहुँचा वहाँ

युद्ध केवल रणभूमि में ही नहीं लड़े जाते। हमारे समय की तकनीकी रूप से उन्नत दुनिया में सावधानीपूर्वक गढ़ी गई कथाओं एवं मिथकों के माध्यम से गढ़ा गया नैरेटिव मनोवैज्ञानिक युद्ध में बड़ा लाभ देता है। रूस-यूक्रेन युद्ध (Russia-Ukraine War) में एक बार फिर वही प्रयास दिखाई दे रहे हैं।

रूस-यूक्रेन युद्ध में इसी तरह का ‘घोस्ट ऑफ कीव’ (कीव का भूत) का मिथक सामने आया। एक ऐसा रहस्यमयी मिग-29 लड़ाकू पायलट, जो रूसी हवाई हमलों से यूक्रेन के आसमान की रक्षा के लिए कीव में आया था, दुनिया भर में खूब फैलाया गया। जब यह दुनिया का ध्यान अपनी ओर खिंचने में नाकाम रहा तो ऐसा ही एक और किरदार दुनिया के सामने आया।

इस बार यह लड़ाकू विमान का पायलट नहीं, बल्कि एक रॉयल कनाडाई स्नाइपर है, जिसका उपनाम ‘वली’ है। कहा जा रहा है कि वली रूसियों के खिलाफ लड़ने के लिए यूक्रेन पहुँचे हैं। वली के बारे में तरह-तरह बातें सामने आ रही हैं। कहा जा रहा है कि वह प्रतिदिन 40 लोगों को मारते हैं।

कौन हैं वली?

अफवाहों के अनुसार, वाली दुनिया के सर्वश्रेष्ठ स्निपर्स में से एक है। वह रॉयल कैनेडियन 22वीं रेजीमेंट के दिग्गज वली इस सप्ताह की शुरुआत में रूसी सेना से लड़ने के लिए युद्धग्रस्त यूक्रेन पहुँचे हैं। यूक्रेन पहुँचने के बाद वली ने युद्ध में भाग लेने की इच्छा व्यक्त की है। वली ने खुलासा किया कि जब यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने रूस के खिलाफ लड़ने के लिए विदेशियों को आमंत्रित किया तो वे अपने अंदर आग जैसा महसूस किया और वे आ गए।

यूक्रेन में आते ही उन्होंने दो दिनों के भीतर छह रूसी सैनिकों को मार गिराया। हाल ही में एक इंटरव्यू में इस स्नाइपर ने कहा, “बहुत सिंपल है, मैं उनकी मदद करना चाहता हूँ। मुझे मदद करनी है, क्योंकि यहाँ लोगों पर सिर्फ इसलिए बमबारी की जा रही है, क्योंकि वे यूरोपीय बनना चाहते हैं, रूसी नहीं।”

Visegrade 24 न्यूज ने एक ट्वीट कर बताया कि वली ने अफगानिस्तान, सीरिया और इराक में खूब नाम कमाया है। उन्होंने उसी कनाडाई इकाई में स्नाइपर के रूप में लड़ते हुए उन्होंने दुनिया की सबसे दूर हत्या (3.5 किमी) की थी।

वली प्रतिदिन 40 लोगों को मारते हैं

वली की कहानी किसी परियों की कहानी से कम नहीं है। उन्हें दुनिया के सर्वश्रेष्ठ स्निपर्स में से एक माना जाता है, क्योंकि वह एक दिन में 40 लोगों को मारते हैं। एक स्नाइपर को अच्छा माना जाने के लिए औसतन प्रतिदिन 5-6 लोगों को मारने की आवश्यकता होती है और एक दिग्गज स्पाइनपर प्रतिदिन 7-10 लोगों को मारता है।

40 वर्षीय फ्रांसीसी-कनाडाई कंप्यूटर वैज्ञानिक वली ने 2009 और 2011 के बीच अफगानिस्तान युद्ध में कथित तौर पर दो बार सेवा दी है। अनाम कनाडाई सैनिक को अफगानिस्तान में अपने कार्यकाल के दौरान ‘वली’ नाम दिया गया था, जिसका अर्थ अरबी में रक्षक है।

वली के पास पास 3.5 किलोमीटर दूर दुनिया की सबसे लंबी दूरी से हत्या करने का रिकॉर्ड है। साल 2015 में वली ने ISIS के खिलाफ लड़ने के लिए इराक गए थे। कनाडा में वली का परिवार रहता है। कहा जा रहा है कि वहाँ उनकी पत्नी और एक बच्चा है, जो अगले सप्ताह एक महीने का हो जाएगा।

सीबीसी न्यूज से बात करते हुए वली ने कहा कि कनाडा के तीन अन्य पूर्व सैनिकों ने भी उनके साथ यूक्रेन की यात्रा की है। हजारों यूक्रेनी शरणार्थियों से मिलने के बाद वे पोलैंड के रास्ते यूक्रेन पहुँचे। इस बीच वली और अन्य दिग्गजों ने यूक्रेनी अधिकारियों के साथ जुड़ने से पहले एक खाली घर में शरण ली है।

दिलचस्प बात यह है कि इस कथित स्नाइपर सिपाही को अभी तक किसी ने नहीं देखा है। नेटिज़न्स ने अनुमान लगाया कि ‘वली’ कहानी पश्चिम समर्थित यूक्रेन सरकार एक और प्रोपेगेंडा हो सकता है, जो यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि रूसियों के खिलाफ युद्ध में वे अभी जीत रहे हैं। अभी तक ‘वली’ के अस्तित्व को ‘कीव के भूत’ के रूप में साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं है।

‘सुलेमान मस्जिद पर रूस की जबरदस्त बमबारी, 80 लोग छिपे हुए थे’: यूक्रेन का दावा; रूस ने चेताया – गिर जाएगा 500 टन का स्पेस स्टेशन!

यूक्रेन ने दावा किया है कि रूस ने उसके एक मस्जिद को उड़ा दिया है, जिसमें 80 शरणार्थी छिपे हुए थे। रूस ने चेताया है कि उस पर लगे प्रतिबंधों के बाद ‘इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन’ भी तबाह हो सकता है। रूस ने शनिवार (12 मार्च, 2022) को चेताया कि ISS को सेवाएँ देने वाले रूसी उपकरणों को रोका जा सकता है, जिसके बाद ये तबाह भी हो सकता है। बता दें कि स्टेशन का रूसी हिस्सा इसके ऑर्बिट को सही रखने में मदद करता है।

उधर यूक्रेन ने जिस मस्जिद पर बमबारी कर के उड़ाने का आरोप लगाया है, वो मारियुपोल के रोकोसोलाना में स्थित है। इसे ‘सुल्तान सुलेमान मस्जिद’ के नाम से जाना जाता है। यूक्रेन के विदेश मंत्रालय ने बताया है कि इसमें कई तुर्किश शरणार्थी भी थे। साथ ही महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे। इस मस्जिद को ऑटोमोन साम्राज्य के सुल्तान सुलेमान और उनकी पत्नी हुर्रम सुल्तान/रोक्सोलाना के नाम से जाना जाता है। मारियुपोल में लगातार बमबारी के कारण लोग यहाँ छिपे हुए थे।

वहीं ISS की बात करें तो इसे NASA के साथ-साथ Roscosmos, JAXA, ESA और CSA जैसी अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष संस्थाएँ मिल कर चलाती हैं। कई सरकारों के बीच करार से इसके स्वामित्व और संचालन का फैसला होता है। इस बहुराष्ट्रीय परियोजना को पृथ्वी के लो ऑर्बिट में स्थापित किया गया है। इससे पहले भी रूस ने चेताया था कि अमेरिका का यही रवैया रहा तो ISS ऑर्बिट से गिर जाएगा। 500 टन की ये संरचना के भारत-चीन के हिस्सों में गिरने की भी आशंका बन सकती है।

वहीं यूक्रेन की राजधानी कीव के वासिल्कीव में भी एक एयरफील्ड को रूस ने तबाह कर दिया है। यूक्रेन के शरणार्थियों को मानव तस्कर भी निशाना बना रहे हैं। वहीं एक रूसी अरबपति के सुपर याच को इटली ने जब्त किया है। रूस ने अब तक यूक्रेनी सेना के 3491 ठिकानों को तबाह किए जाने का ऐलान किया है। वहीं अमेरिका में अब रूस को इंटरपोल से हटाने की माँग की जा रही है। यूके का कहना है कि कीव से 25 किलोमीटर की दूरी पर रूस की सेना खड़ी है।

‘CM योगी फिर से जीते तो दिल्ली में अंडे-ऑमलेट की रेहड़ी लगाऊँगा’: अभिसार शर्मा का ‘ट्वीट’ हो रहा वायरल, जानिए सच

सोशल मीडिया पर YouTube पत्रकार अभिसार शर्मा के नाम से एक ट्वीट वायरल हो रहा है, जिसमें उनके हवाले से दावा किया जा रहा है कि योगी आदित्यनाथ के दोबारा मुख्यमंत्री बनने पर वो पकौड़े की दुकान खोल लेंगे। इस ट्वीट में लिखा है, “अगर 2022 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ फिर जीते तो मैं नोएडा के शेखसराय से शिफ्ट होकर दिल्ली के शेखसराय आ जाऊँगा और वहाँ अंडे-ऑमलेट की रेहड़ी लगाऊँगा। लिख कर ले लो।”

कई लोग अब इस ट्वीट के वायरल होने के बाद अभिसार शर्मा को उनके ‘वादे’ की याद दिला रहे हैं। भाजपा महिला मोर्चा की राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी और दिल्ली भाजपा महिला मोर्चा की प्रवक्ता नीतू सिंह ने पूछा, “तो फिर कब से अभिसार शर्मा जी आमलेट की रेड़ी लगा रहे हैं?”

कई अन्य यूजरों ने भी यही सवाल किया:

एक ने तो दिल्ली के भाजपा कार्यकर्ताओं और ‘हिन्दू युवा वाहिनी’ के कार्यकर्ताओं से आग्रह कर दिया कि वो अंडा-ऑमलेट की रेहड़ी लगाने में अभिसार शर्मा की सहायता करें।

साथ ही इससे जुड़े मीम भी शेयर किए गए:

अब हम आपको बताते हैं कि सच्चाई क्या है। असल में 4 फरवरी, 2022 को 11:42 का दिख रहा ते ट्वीट फर्जी है और उस वक्त अभिसार शर्मा ने राहुल गाँधी के एक समर्थक को जन्मदिन की बधाई देते हुए ट्वीट किया था। इसी ट्वीट को एडिट कर के पुराने शब्द हटाए गए और नए शब्द जोड़े गए। अभिसार शर्मा का कहना है कि ये फर्जी है और वो इसे चुनाव नतीजों के बाद से ही देख रहे हैं। उन्होंने दावा किया कि वो ऐसी चीजों को तवज्जो नहीं देते।

इसी तरह कुछ दिनों पहले एक अन्य यूट्यूब पत्रकार अजीत अंजुम के नाम से वायरल हो रहे ट्वीट में लिखा था, “अगर 2022 के चुनाव में उत्तर प्रदेश में योगी फिर से जीत गए तो मैं पत्रकारिता छोड़ कर दिल्ली की बिल्लिमरान में चिकन पकौड़े की दुकान खोल लूँगा।” इस पर सफाई देते हुए अजीत अंजुम ने बताया कि ये उनके बारे में दुष्प्रचार का नया फोटोशॉप है। उन्होंने कहा कि उनके नाम से कुछ भी लिखकर वायरल किया जा रहा है।

टैटू बनाते समय यौन शोषण… अब स्पेन से महिला ने सुजीश के खिलाफ पुलिस को भेजी शिकायत… पहले से ही दर्ज हैं 5 केस

टैटू शॉप की आड़ में लड़कियों का यौन शोषण करने वाले केरल में कोच्चि के सुजीश पर अब एक और आरोप लगा है। यह आरोप स्पेन की एक महिला ने लगाया है। महिला ने अपनी शिकायत कोच्चि पुलिस को ई मेल भेजकर की है। शिकायत के मुताबिक, यह घटना उसके कोच्चि दौरे के समय की है। पुलिस ने और अधिक जानकारी के लिए आरोप लगाने वाली महिला से सम्पर्क करने का प्रयास किया है।

बताया जा रहा है कि आरोप लगाने वाली महिला ने सुजीश के खिलाफ चल रहे MeToo अभियान को देखकर अपनी शिकायत दर्ज करवाई है। शिकायत में उसने सुजीश के स्टूडियो में बिताए गए समय को भयावह बताया और यौन शोषण की बता कही है। सुजीश पर पहले से ही 5 केस दर्ज हैं। उनकी गिरफ्तारी लगभग एक हफ्ते पहले हो जा चुकी है।

गौरतलब है कि सुजीश के टैटू स्टूडियो का नाम इंकफेक्टेड (Inkfected) है। इस टैटू आर्टिस्ट की क्लाइंट सूची में मलयालम फिल्मों की बड़ी-बड़ी हस्तियाँ शामिल हैं। सुजीश पर रेप और यौन शोषण का सबसे पहला आरोप योनि का टैटू बनवाने गई 18 वर्षीया लड़की ने लगाया था। इन आरोपों के बाद अब स्वयं को पीड़िता बता रहीं 7 अन्य लड़कियाँ भी सामने आई हैं। इन सबने भी अपने साथ सुजीश द्वारा यौन शोषण किए जाने की बात कबूल की है।

सभी पीड़ित लड़कियों/महिलाओं ने मिलकर सुजीश के खिलाफ पुलिस में शिकायत करने का फैसला किया था। सुजीश पर IPC की धारा 354 और 376 के तहत कार्रवाई की गई है। इसके अलावा कुछ अन्य महिलाओं ने भी सुजीश द्वारा अपने साथ किए गए यौन शोषण की चर्चा सोशल मीडिया में की है। हालाँकि, कुछ ही पीड़िताओं ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है।