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‘कॉलेज की लड़कियों को लुभा रहे कट्टरपंथी’: ‘लव जिहाद’ को नकारने वाली CPI(M) ने पार्टी नोट में माना – केरल में तालिबान का समर्थन

केरल में धार्मिक कट्टरता, उग्रवाद व लव जिहाद की घटनाएँ तेजी से बढ़ी हैं और इसको लेकर राज्य में बहस भी काफी हो रही है। इसी क्रम में सत्तारूढ़ वामपंथी सरकार ने सांप्रदायिकता व आतंकवाद के जाल में प्रोफेशनल कॉलेजों में पढ़ने वाली लड़कियों को फंसाए जाने की आशंका जाहिर करते हुए चेतावनी जारी की है।

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, जो हमेशा से लव जिहाद जैसी घटनाओं को नकारती रही है, उसने अपने कार्यकर्ताओं को सतर्क रहने की हिदायत दी है। इसे लेकर पार्टी ने एक इंटर्नल नोट जारी किया है। ‘अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता’ के शीर्षक वाले इस नोट में सख्त हिदायत देते हुए कहा गया है कि इन बातों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए कि प्रदेश में तालिबान जैसे आतंकवादी संगठनों का समर्थन करने वाली बातें हो रही हैं।

पार्टी ने कहा है, “सांप्रदायिकता और चरमपंथी विचारधाराओं वाले युवाओं को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। प्रोफेशनल कॉलेजों में शिक्षित युवतियों की सोच को उस तरीके से करने की कोशिश की जा रही है। मार्क्सवादी छात्र संघ और युवा संगठन दोनों को इस मामले पर विशेष रूप ध्यान देना चाहिए।”

माकपा के नोट में राज्य में ईसाई कट्टरता के बढ़ने की बात की गई है। इसमें कहा गया है कि वैसे तो ईसाई आम तौर पर सांप्रदायिक विचारधाराओं में शामिल नहीं होते हैं, लेकिन हाल के दिनों में इस समुदाय में भी कट्टरता बढ़ी है और इस मुद्दे को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। इसके साथ ही माकपा ने ये भी आरोप लगाया है कि जानबूझकर एक साजिश के तहत राज्य में ईसाइयों को मुस्लिमों के खिलाफ किया जा रहा है। इससे राज्य में बहुसंख्यक सांप्रदायिकता को फलने-फूलने में मदद मिलेगी।

माकपा के इस आरोप पर केरल की मुख्य विपक्षी पार्टी कॉन्ग्रेस ने माकपा से इसका सबूत माँग लिया। कॉन्ग्रेस नेता वीडी सतीसन ने कहा, “माकपा नेतृत्व को यह बताना चाहिए कि क्या इस संबंध में कोई मामला दर्ज किया गया था? क्या उनके पास अपने आरोपों को साबित करने के लिए कोई डेटा है। पार्टी और उसकी सरकार की नैतिक जिम्मेदारी है कि वे उन्हें सामने रखें।”

इस मामले पर माकपा पर निशाना साधते हुए भाजपा के दिग्गज नेता कुम्मनम राजशेखरन कहा कि वामपंथी सरकार दक्षिणी राज्य को कथित तौर पर चरमपंथी ताकतों के लिए को बढ़ावा दे रही है। उन्होने कहा, “चरमपंथी ताकतों ने राज्य में पैर नहीं जमाया होता अगर उन्होंने उनके खिलाफ कड़ी प्रतिक्रिया दी होती। अब उन्हें कितनी ईमानदारी से कहना है कि आतंकवाद के खिलाफ चौकसी बढ़ानी चाहिए?”

इसके साथ ही वामपंथी पार्टी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) पर अल्पसंख्यक समुदाय में असुरक्षा की भावना को पैदा करने का आरोप भी लगाया है।

गौरतलब है कि बीते दिनों केरल के ही थमारसेरी सूबा के कैटेसिस विभाग और चर्च ने राज्य में इस्लामी संगठनों द्वारा किए जा रहे ‘लव जिहाद’ के खिलाफ ईसाई समुदाय को चेतावनी देते हुए एक पुस्तिका जारी की थी। इसमें ईसाई लड़कियों को इस्लामी ‘लव जिहाद’ से बचाने के लिए 9 स्टेप्स का जिक्र किया गया था कि किस तरीके से ‘लव जिहाद’ की प्रक्रिया को अंजाम दिया जाता है।

PM मोदी के जन्मदिन पर टूटा रिकॉर्ड: 2.5 करोड़+ लोगों को लगा कोरोना वैक्सीन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर आज (17 सितंबर) देश ने एक नया रिकॉर्ड कायम कर दिया है। ये रिकॉर्ड 1 दिन में 2.5 करोड़ से ज्यादा लोगों को कोरोना वैक्सीन देने का है। स्वास्थ्य मंत्रालय की साइट के अनुसार वैक्सीनेशन का कुल आँकड़ा 2,50,10,390 लोगों तक पहुँच गया।

मालूम हो कि PM मोदी के जन्मदिन के अवसर पर वैक्सीनेशन अभियान को रफ्तार देने के लिए विशेष रणनीति तैयार हुई थी। इस क्रम में 1.09 लाख से ज्यादा केंद्रों पर वैक्सीनेशन प्रोग्राम चलाया गया। साइट के मुताबिक इनमें से 1 ,06,327 सरकारी हैं जबकि 3,359 प्राइवेट टीकाकरण केंद्र हैं।

बता दें कि प्रधानमंत्री के जन्मदिवस के मौके पर स्वास्थ्य मंत्रालय ने लक्ष्य रखा था कि वो दोपहर तक 1 करोड़ लोगों को वैक्सीन देंगे और शाम होते-होते दो करोड़ लोगों को वैक्सीन दी जाएगी। इस प्रक्रिया में पारदर्शिता रहे इसके लिए को-विन पोर्टल पर काउंटर भी चलाया गया, जहाँ पल पल अपडेट बढ़ रहा है। वहीं MyGovIndia के ट्विटर पर बताया गया है कि मात्र 9 घंटे में 2 करोड़ का लक्ष्य प्राप्त कर लिया गया।

अमर उजाला की रिपोर्ट बताती है कि आज कोरोना वैक्सीनेशन इतनी रफ्तार में था कि करीबन हर सेकेंड में 617 वैक्सीन लग रही थी, वहीं हर मिनट 37 हजार लोगों को वैक्सीन खुराक दी गई।

उल्लेखनीय है कि इसी उपलब्धि के साथ-साथ अब उम्मीद की जा रही है कि जल्द से जल्द वैक्सीनेशन का आँकड़ा 100 करोड़ पार करेगा और इसी रफ्तार से अगर वैक्सीन लगे तो ये गिनती संभवत: अक्टूबर मध्य तक देश में 100 करोड़ को छू लेगी।

लोकतंत्र का प्रहरी: 9 घंटे तक पूछताछ सहने वाले नरेंद्र मोदी Vs चुनावी जीत पर मौत का तांडव करने वाले मुख्यमंत्री?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अक्सर उनके विरोधियों द्वारा ‘फासीवादी’ कहा जाता है। हालाँकि, मैं इस शब्द (विरोधियों) को जरा हल्के ढंग से प्रयोग करती हूँ। नरेंद्र मोदी को लोकतंत्र और देश के संविधान-कानून का बिल्कुल भी सम्मान नहीं करने वाले के रूप में दिखाया जाता है।

मैंने अपने जीवन का बड़ा समय गुजरात के अहमदाबाद में बिताया है। बल्कि यूँ कहूँ कि मोदी के गुजरात में। मैं ऐसा इसलिए कह रही हूँ क्योंकि एक बड़ी राजनीतिक घटना के साथ मेरा पहला साक्षात्कार उस वक्त हुआ, जब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल ने भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच इस्तीफा दे दिया था और नरेंद्र मोदी को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया था। मुझे वो बात अच्छी तरह से याद है कि जब गुजरात में अयोध्या से लौट रही ट्रेन में उन्मादी भीड़ ने आग लगी दी थी और उसी के बाद दंगे हुए। भीड़ द्वारा महिलाओं और बच्चों सहित लगभग 60 लोगों को जिंदा जला दिया गया था, जिसे केवल आतंक कहा जा सकता है।

गुजरात में साम्प्रदायिक दंगों का अपना एक इतिहास रहा है। 80 के दशक में गुजरात में कॉन्ग्रेस के माधव सिंह सोलंकी की सरकार के समय तो वहाँ सबसे खराब साम्प्रदायिक दंगे देखे गए थे। सोलंकी ने अपने ‘KHAM’ (क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी, मुस्लिम) वोट बैंक के अनुसार वोटों को विभाजित करने के तरीके का इस्तेमाल किया था। उन्हीं की छत्रछाया में गुजरात में डॉन लतीफ फला-फूला। शायद आप जानते हों कि लतीफ ने 1986-87 में अहमदाबाद के स्थानीय निकाय चुनावों में पाँच नगरपालिका वार्डों में जीत दर्ज की थी। खास बात ये कि उस दौरान वह जेल में था। यह जिस वक्त की घटना है, उस दौरान कॉन्ग्रेस के अमरसिंह चौधरी गुजरात के मुख्यमंत्री थे।

2002 से पहले गुजरात में बात-बात पर साम्प्रदायिक दंगे (इसे मेन स्ट्रीम मीडिया झड़प कहती है।) होते थे, जैसे कि उत्तरायण में पतंग के धागे काटने से लेकर रथयात्रा जुलूस तक की बातों पर। ये दंगे साम्प्रदायिक तौर पर सेंसिटिव इलाकों में होते थे, जैसे पुराने अहमदाबाद में। साबरमती नदी के पश्चिम में अहमदाबाद आमतौर पर शांतिपूर्ण रहता था। जब किसी ने मुझे 27 फरवरी 2002 को बताया कि पुराने शहर में ‘दंगे’ शुरू हो गए हैं, तो मेरा रिएक्शन नॉर्मल था। लेकिन जब मैंने अपने घर (मैं साबरमती के पश्चिम में रहती हूँ) की छत से धुआँ उठता देखा तब मुझे लगा कि यह ‘कोई सामान्य दंगा’ नहीं था।

मेरे घर से करीब एक किलोमीटर दूर एक मंदिर के ठीक बाहर सिटी ट्रांसपोर्ट की एक बस में आग लगा दी गई। मैं फिर से दोहराना चाहती हूँ, यह पहली बार था जब मैंने दंगे देखे थे ना कि मैंने इसे केवल अखबारों में पढ़ा था। नरेंद्र मोदी को पसंद नहीं करने वाले गुजराती अखबार जले हुए शवों से भरे पन्ने प्रकाशित करते थे। अखबारों के इन कार्यों से साम्प्रदायिक तनाव को और अधिक बढ़ावा मिला। हालाँकि, उस दौरान किसी ने मीडिया को जिम्मेदार नहीं ठहराया, वैसा ही अब भी कोई नहीं करता है।

2002 के दंगों के सबसे प्रमुख मामलों में से एक कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व सांसद एहसान जाफरी की मौत थी। वह अहमदाबाद के चमनपुरा स्थित गुलबर्गा सोसायटी में रहते थे। 28 फरवरी 2002 को दंगाई भीड़ ने उस सोसायटी में आग लगा दी, जिसमें जाफरी समेत लगभग 35 लोगों की मौत हो गई थी। कॉन्ग्रेस नेता की पत्नी जकिया जाफरी ने पुलिस समेत गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री तक सभी को उनकी मौत का आरोपित बताया था।

9 घंटे तक नरेंद्र मोदी से हुई थी पूछताछ

इन्हीं मामलों और आरोपों की जाँच के लिए सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एसआईटी का गठन किया गया था और मार्च 2010 में राज्य के मौजूदा मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी से एसआईटी ने घंटों पूछताछ की थी।

वकील कार्तिकेय तन्ना के मुताबिक, उस विशेष मामले में एक आरोपित के तौर पर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी एसआईटी कार्यालय गए और 9 घंटे तक बैठे रहे और उनसे पूछे गए हर सवाल का जवाब दिया। उस दौरान उनके साथ कोई भी वकील नहीं था। एसआईटी के दफ्तर में जाते वक्त वह अपने साथ केवल अपनी पानी की बोतल लेकर गए थे। यहाँ तक ​​कि उन्होंने चाय लेने से भी इनकार कर दिया था।

इसकी तुलना में अगर देखा जाए तो पश्चिम बंगाल में चुनाव बाद हुई हिंसा के मामले में बड़े पैमाने पर आरोप लगे हैं। बंगाल में विभिन्न समितियों समेत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन पाया है। कई लोगों ने सत्ताधारी पार्टी टीएमसी के कार्यकर्ताओं पर लूटपाट, बलात्कार और हत्या के आरोप लगाए । बहुत से लोगों को केवल इस बात के लिए बुरी तरह से प्रताड़ित किया गया, क्योंकि उन्होंने भाजपा का समर्थन किया था।

यह बड़ा ही सोचनीय है कि जिस राज्य की पार्टी के कार्यकर्ताओं पर बड़े पैमाने पर राजनीतिक हिंसा करने के आरोप हैं, उस राज्य के मुख्यमंत्री को इसके लिए जवाबदेह नहीं बनाया गया। उससे कोई सवाल नहीं पूछा गया। वास्तव में उत्पीड़न के डर से राज्य छोड़ने वाले लोगों को मीडिया के एक वर्ग ने जीत की तरह मनाया, इसे राजनीतिक सफाई तक की संज्ञा दी गई।

20 साल के इस अंतराल में हम दो राज्यों के मुख्यमंत्री के कार्यकाल को देख सकते हैं, इससे पता चलता है कि लोकतंत्र का सम्मान कौन करता है।

अब्बाजान से बना पिताश्री, अम्मीजान से माताश्री: ‘मुगलों ने सिखाया सब कुछ’ से अब ‘उर्दू के एहसान का प्रोपेगंडा’ – जानिए सच्चाई

अक्सर भारत और हिन्दू धर्म को नीचा दिखाने के लिए ऐसा प्रदर्शित किया जाता है जैसे हमारे पास जो कुछ भी है, उसके लिए हमें विदेशियों का एहसानमंद होना चाहिए। हमें आक्रांता मुगलों के प्रति आभार जताने के लिए पल-पल मजबूर करने की कोशिश होती है, जिन्होंने देश को लूटा व हिन्दुओं का नरसंहार किया। सोशल मीडिया पर अभी अब्बाजान (#AbbaJaan) भी खूब ट्रेंड करवाया गया। शायद आपको पता न हो, लेकिन समोसा-जलेबी-मिठाई लेकर आने वाले मुगलों (और उसके पहले के इस्लामी आक्रांताओं) की कहानियों के अलावा यह तक गढ़ने की कोशिश की गई कि ‘माताश्री’ और ‘पिताश्री’ जैसे शब्द भी उर्दू की देन हैं। मतलब हमारा अपना कुछ नहीं। इसके लिए लेख तक लिखे गए।

दिसंबर 2017 में आए ‘स्क्रॉल’ के एक लेख का कहना था कि 1988 में आई बीआर चोपड़ा की ‘महाभारत’ के डायलॉग्स के जरिए लेखक राही मासूम रजा ने ‘माताश्री’ और ‘पिताश्री’ जैसे शब्द गढ़े, जो उर्दू के अब्बाजान और अम्मीजान जैसे शब्दों से प्रेरित हैं। इसी तरह भ्राताश्री, भाईजान से बना। ‘स्क्रॉल’ का कहना है कि एक उर्दू लेखक ने उर्दू शब्दों से प्रेरित होकर ऐसे शब्द गढ़े, वरना हिंदी में तो ऐसे शब्द कभी थे ही नहीं। क्या ऐसा सच में है? या यह सिर्फ प्रोपेगेंडा है? समझते हैं।

अगर आप रामायण देखेंगे तो उसमें मेघनाद अपने पिता रावण को ‘पिताश्री’ कह कर सम्बोधित करता है, तो क्या राही मासूम रजा ने इन शब्दों को ईजाद किया, ऐसा उर्दू के पैरोकार कैसे कह सकते हैं? रामानंद सागर ने रामायण के संवाद ख़ुद लिखे थे, ऐसे में इन शब्दों को गढ़ना तो नहीं लेकिन लोकप्रिय बनाने का श्रेय उन्हें क्यों नहीं मिलना चाहिए? ‘रामायण’ 1987 में ही आई थी, ‘महाभारत’ से भी पहले।

अब कुछ ऐसे पुस्तकों की बात करते हैं, जिनका प्रकाशन 1988 से पहले हुआ और उनमें ‘माताश्री’ व ‘पिताश्री’ जैसे शब्द मिलते हैं। तो क्या ऐसा माना जाना चाहिए कि उन्होंने ‘टाइम मशीन’ में आगे आकर देख लिया था कि राही मासूम रजा ऐसे शब्द गढ़ने वाले हैं, इसीलिए उन्होंने इसका प्रयोग किया? नीचे वाले स्क्रीनशॉट में आप ‘ज्ञानोदय’ नामक पुस्तक के स्क्रीनशॉट्स देख सकते हैं, जिसका प्रकाशन 50 के दशक में हुआ था।

‘महाभारत’ सीरियल से दशकों पुरानी पुस्तक में कई बार ‘पिताश्री’ शब्द का जिक्र

जैसा कि आप देख सकते हैं, इस पुस्तक में कई बार ‘पिताश्री’ शब्द का जिक्र है, जो ये बताता है कि ये शब्द पहले से ही हिंदी काव्य/साहित्य में मौजूद था और इसके उपयोग होता रहा था। इसी तरह लोकप्रिय लेखक मनोहर श्याम जोशी द्वारा 1983 में लिखित पुस्तक ‘बातों-बातों में’ में कई बार ‘पिताश्री’ शब्द का जिक्र है। यहाँ देखिए, जहाँ एक ही पन्ने में तीन बार ‘पिताश्री’ का सम्बोधन दिया गया है:

1983 की पुस्तक में ‘पिताश्री’ शब्द का कई बार प्रयोग

अब उर्दू भाषा ही संस्कृत के बाद आई है, अतः भारतीय उप-महाद्वीप की अन्य भाषाओं की तरह ये भी उसी मूल से निकली है। इसीलिए, ये कहना बेमानी है कि फलाँ शब्द हिंदी में था ही नहीं, उर्दू से लाया गया है। मुंशी प्रेमचंद ने भी अपने उपन्यासों में इन शब्दों का प्रयोग किया था, जो हिंदी के महान लेखक थे। उनका समय ब्रिटिश काल का है। इसीलिए, इसके श्रेय राही मासूम रजा को देना प्रोपेगेंडा के अलावा और कुछ नहीं है।

ये भी जानने लायक बाद है कि पंडित नरेंद्र शर्मा ने क़दम-क़दम पर राही मासूम रजा की महाभारत के संवाद लिखने में मदद की थी। चाहे पटकथा हो या संवाद, दोनों ही लेखकों की भूमिका अहम थी। ख़ुद राही मासूम रजा कहते थे कि वो महाभारत की भूल-भुलैया वाली गलियों में पंडित जी की ऊँगली पकड़ कर आगे बढ़ते थे। राही जो भी लिखा करते थे, उसे नरेंद्र शर्मा की सहमति के बाद ही आगे भेजा जाता था।

‘न्यूजीलैंड वालो… तुम मर्द नहीं हो’: क्रिकेट सीरीज रद्द होने पर रो रहे पाकिस्तानी, BCCI को बताया मेन ‘खिलाड़ी’

न्यूजीलैंड की क्रिकेट टीम ने पाकिस्तान का दौरा सुरक्षा कारणों से कैंसिल किया और ठीकरा फोड़ा जा रहा है BCCI पर। मीडिया में जब से खबर आई है कि न्यूजीलैंड की टीम पाकिस्तान में असुरक्षित महसूस करने के कारण वहाँ से निकल रही है, तभी से कुछ पाकिस्तानी व उनके समर्थक अपना गुस्सा निकाल रहे हैं।

कुछ पाकिस्तानी तो कह रहे हैं कि फौरन पाकिस्तान को फैसला लेना चाहिए कि वो कभी न्यूजीलैंड के साथ कोई मैच नहीं खेलेंगे। वहीं ब्लू टिक वाले पत्रकार फरवा मुनीर समेत कई लोग इसके पीछे भारत और बीसीसीआई को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं।

फरवा मुनीर पाकिस्तान क्रिकेट के ट्वीट के नीचे लिखते हैं, “इसके पीछे भारत का हाथ है।”

कैटी सिमॉन लिखती हैं, “हद्द है! पाकिस्तान पूरी तरह से सुरक्षित देश है। पीसीबी को भविष्य में न्यूजीलैंड के साथ खेले जाने वाला हर मैच को कैंसिल कर देना चाहिए। कोई सुरक्षा कारण नहीं थे बस बीसीसीआई का दबाव था। शर्म आनी चाहिए न्यूजीलैंड क्रिकेट को जो राजनीति के आधार पर खेल खेलते हैं।”

सोहेल लिखते हैं, “आखिरी मिनट पर मैच कैंसिल करना शर्मनाक बर्ताव है। कोई सुरक्षा वजह नहीं थी। सब सुनिश्चित किया गया था। मैच से कुछ घंटे पहले दौरा कैंसिल करना सिर्फ राजनीति हैं। क्या न्यूजीनैंड बीसीसीआई के प्रेशर में आ गई। उन्होंने पाकिस्तान क्रिकेट को बर्बाद करने के लिए राजनीतिक कदम उठाया। ये अनप्रोफेशनल बर्ताव की हद्द है। पाकिस्तान को उन्हें आसानी से नहीं जाने देना चाहिए और अपना सारा खर्चा वसूलना चाहिए। 1 करोड़ तो कम से कम लेना चाहिए।”

पत्रकार फजल अब्बास कहते हैं, “न्यूजीलैंड क्रिकेट बीसीसीआई की कठपुतली है। क्रिकेट को उनका बहिष्कार करना चाहिए। न्यूजीलैंड शर्मनाक। शर्मनाक तुम्हारा बर्ताव। घरों में रहो। तुम मर्द नहीं हो।”

शिफा हसन हिन्दू लड़के से करेगी शादी, ‘घर-वापसी’ भी: इलाहाबाद HC ने कहा – ‘दोनों बालिग़, किसी को हस्तक्षेप का अधिकार नहीं’

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि दो बालिग़ लोगों को स्वेच्छा से शादी करने का अधिकार है, भले ही वो किसी भी मजहब से हों। साथ ही एक इंटरफेथ जोड़े को सुरक्षा भी दी। जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता और जस्टिस दीपक वर्मा की अदालत ने ये फैसला सुनाया। उन्होंने कहा कि यहाँ तक कि इन दोनों के माता-पिता को भी इसमें हस्तक्षेप का अधिकार नहीं है, अगर दोनों बालिग एक-दूसरे से शादी करना चाहते हैं।

इलाहाबाद उच्च-न्यायालय ने कहा, “दो बालिगों को स्वेच्छा से एक-दूसरे को शादी के लिए अपना पार्टनर चुनने का अधिकार है, भले ही दोनों किसी भी मजहब का पालन करते हों। इस चीज को कोई चुनौती नहीं दे सकता है। मौजूदा याचिका दो बालिगों ने दाखिल की है, जो एक-दूसरे के प्यार में होने का दावा कर रहे हैं। इसलिए, कोई भी, यहाँ तक कि उनके अभिभावकगण भी, इसमें हस्तक्षेप नहीं कर सकते हैं।”

साथ ही उच्च-न्यायालय ने पुलिस-प्रशासन को ये सुनिश्चित करने का आदेश दिया कि इस जोड़े को किसी के द्वारा प्रताड़ित न किया जाए। शिफा हसन नाम की महिला ने इस याचिका को दायर किया था। वो और उसके पार्टनर ने कहा था कि दोनों एक-दूसरे के साथ जीवन गुजारना चाहते हैं। हसन मुस्लिम हैं, वहीं उनके पार्टनर हिन्दू हैं। शिफा हसन ने हिन्दू धर्म में ‘घर-वापसी’ के लिए भी एप्लिकेशन दिया हुआ है।

इस मामले में सम्बंधित डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ने स्थानीय पुलिस थाने से रिपोर्ट माँगी थी। जहाँ लड़के के पिता इस शादी के लिए राजी नहीं है, उसकी माँ को इस रिश्ते से कोई ऐतराज नहीं है। वहीं शिफा हसन के तो माता-पिता, दोनों ही इस रिश्ते के खिलाफ हैं। इसलिए, अपने जीवन को खतरे के मद्देनजर इस जोड़े ने हाईकोर्ट का रुख किया। दोनों की उम्र 19 व 24 साल है। हाईकोर्ट ने कहा कि अभी शुरुआती तथ्यों पर ही फैसला सुनाया गया है, इसीलिए इसे अंतिम न माना जाए।

न्यूजीलैंड क्रिकेट टीम ने रद्द किया PAK का दौरा, टॉस से कुछ देर पहले मैदान में जाने से खिलाड़ियों का इनकार

न्यूजीलैंड की क्रिकेट टीम ने पाकिस्तान के साथ वन डे मैच शुरू होने से पहले खत्म कर दिया। जानकारी के मुताबिक, न्यूजीलैंड ने सुरक्षा के लिहाज से ये फैसला लिया। बताया जा रहा है कि न्यूजीलैंड की टीम ने टॉस से कुछ देर पहले मैदान में जाने से मना किया और फिर खबर आई कि ये दौरा रद्द हो रहा है।

न्यूजीलैंड टीम ने शुक्रवार (17 सितंबर) को पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड को इसकी सूचना दी कि उनको पाकिस्तान में खतरा है। इसके बाद पीएम इमरान खान और पीसीबी के अधिकारियों ने न्यूजीलैंड क्रिकेट बोर्ड और खिलाड़ियों को मनाना शुरू किया। लेकिन टीम नहीं मानी और अब वह अपने देश लौटने को तैयार हैं।

टॉस से कुछ देर पहले मैदान में जाने से न्यूजीलैंड के खिलाड़ियों का इनकार (साभार ESPN)

NZC चीफ एग्जिक्यूटिव डेविड व्हाइट ने कहा, “मैं समझ सकता हूँ कि ऐसा करना पीसीबी के लिए झटका होगा, जो कि बहुत अच्छा मेजबान साबित हुआ, लेकिन खिलाड़ियों की सुरक्षा सर्वोच्च है और हमें लगता है कि यही सही विकल्प है।”

पाकिस्तान की एक बार फिर वैश्विक स्तर पर बेईज्जती हुई है। इससे पहले साल 2002 में कराची में होटल के बाहर हुए बम विस्फोट के बाद न्यूजीलैंड ने अपना पाकिस्तान दौरा छोड़ दिया था। वहीं 2003 में उन्होंने 5 वनडे मैच खेले था और वही पाकिस्तान में उनका आखिरी दौरा था।

बता दें कि पाकिस्तान में सिर्फ न्यूजीलैंड की टीम को ही असुरक्षित महसूस नहीं होता बल्कि 2 साल पहले श्रीलंका के भी 11 खिलाड़ियों ने पाकिस्तान आने से मना कर दिया था। उनके अंदर भी साल 2009 वाला ही भय था जब पाकिस्तान दौरे पर गई श्रीलंकाई टीम की बस पर लाहौर में आतंकियों ने हमला कर दिया था।

उद्धव सरकार में 10 DCPs के ट्रांसफर के लिए ₹40 Cr की वसूली, अनिल देशमुख की ट्रस्ट को गए बार मालिकों के पैसे: वाजे का खुलासा

मुंबई पुलिस के पूर्व एपीआई सचिन वाजे ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) को दिए अपने बयान में महाराष्ट्र के पूर्व गृह मंत्री अनिल देशमुख पर गंभीर आरोप लगाए हैं। वाजे ने कहा है कि उसने देशमुख के कहने पर वसूली की। वाजे ने बयान में खुलासा किया है कि देशमुख ने उन्हें बार और होटल मालिकों से पैसे वसूलने के लिए कहा था।

उसने यह भी आरोप लगाया कि पूर्व मंत्री हाई-प्रोफाइल जाँच में निर्देश देते थे। इसके अलावा, परिवहन मंत्री अनिल परब का नाम लेते हुए, वाज़े ने दो मंत्रियों पर पूर्व सीपी परमबीर सिंह द्वारा उनके ट्रांसफर के आदेशों की अनुमति देने के लिए दस पुलिस उपायुक्तों (डीसीपी) से 40 करोड़ रुपए इकट्ठा करने का आरोप लगाया।

सचिन वाजे ने ईडी के सामने अपने बयान में साल 2020 में मुंबई में हुए 10 डीसीपी के ट्रांसफ़र पर खुलासा करते हुए कहा कि उस समय महाराष्ट्र के दो मंत्रियों ने 40 करोड़ रुपए पोस्टिंग के लिए लिए थी। ईडी ने सचिन वाजे से पूछा की क्या उन्हें मुंबई में होने वाले ट्रांसफ़र पोस्टिंग के बारे में जानते हैं क्या?

इस पर सचिन वाजे ने बताया कि, जुलाई 2020 में इस समय के मुंबई पुलिस कमिश्नर परमबीर सिंह ने 10 डीसीपी के ट्रांसफ़र पोस्टिंग को लेकर ऑर्डर दिया था। जिसको लेकर उस समय के महाराष्ट्र के गृह मंत्री अनिल देशमुख और कैबिनेट मंत्री अनिल परब ख़ुश नहीं थे और उन लोगों ने इस ऑर्डर को वापस लेने के लिए कहा।

वाजे के मुताबिक़ इसके 3 से 4 दिन के बाद उसे पता चला की कुछ पैसों की लेन देन के बाद दूसरा ऑर्डर जारी किया गया। वाजे ने आगे कहा, “मुझे पता चला की उन पुलिस अधिकारियों से 40 करोड़ रुपए लिए गए थे जिसके से 20 करोड़ अनिल देशमुख ने उनके पर्सनल सेक्रेटरी संजीव पलांडे के माध्यम से और 20 करोड़ अनिल परब ने आरटीओ अधिकारी बजरंग खरमाटे के हाथों लिए थे।”

वाजे ने बताया कि वह 16 जून 2020 को अनिल देशमुख से सह्याद्रि गेस्ट हाउस पर मिले। जहाँ पूर्व गृह मंत्री ने उनसे कहा था कि वे एक साथ अच्छे-अच्छे केस पर काम करेंगे। इसके बाद अनिल देशमुख वाजे से कई मामलों की जानकारी लिया करते थे।

वाजे ने अपने बयान में तीन ‘अच्छे’ मामलों के बारे में बताया है, जिसके लिए उन्हें अनिल देशमुख से निर्देश मिले थे। पहला मामला टीआरपी हेरफेर वाला था। उसे देशमुख से टीआरपी धांधली मामले पर निर्देश मिले थे, जिसमें कुछ टीवी चैनलों पर दर्शकों की संख्या बढ़ाने के लिए टीआरपी में हेरफेर करने का आरोप लगाया गया था।

दूसरा मामला आर्किटेक्ट अन्वय नाइक की मौत के संबंध में आत्महत्या के लिए उकसाने का था, जिसमें पत्रकार अर्नब गोस्वामी को गिरफ्तार किया गया था। वहीं तीसरा मामला वसूली को लेकर था। वाजे ने आरोप लगाया कि अक्टूबर, 2020 में देशमुख के आवास “दिनेश्वरी” में हुई एक बैठक में एनसीपी नेता ने उसे 1750 बार और रेस्तरां की एक सूची दी और उसे इन प्रतिष्ठानों से विभिन्न सहायता के लिए 3 लाख रुपए वसूलने के लिए कहा।

आरोप पत्र में देशमुख या उनके परिवार के सदस्यों को आरोपित के रूप में नामित नहीं किया गया है, लेकिन इसमें कहा गया है कि वाजे ने देशमुख के कहने और निर्देश देने पर बार और रेस्तरां से पैसे वसूले और राशि देशमुख के सहयोगी पलांडे और शिंदे को सौंप दी गई।

वाजे ने अपनी पोस्टिंग को लेकर भी अपने बयान में बताया कि उनसे अनिल देशमुख ने एनसीपी प्रमुख शरद पवार को मनाने के लिए 2 करोड़ की माँग की थी। वाजे ने आरोप लगाया कि 5 जून 2020 को डिपर्टमेंटल रिव्यू कमेटी की मीटिंग हुई थी जिसने परमबीर सिंह, जोईंट कमिश्नर ऐड्मिन नवल बजाज, एडिशन्सल कमिश्नर एस जय कुमार और एक डीसीपी मौजूद थे इस मीटिंग में कई अधिकारियों को पुलिस विभाग में वापस लेने का निर्णय लिया गया।

ईडी की चार्जशीट में आरोप लगाया गया है कि देशमुख को ऑर्केस्ट्रा बार मालिकों से लगभग 4.70 करोड़ रुपए मिले और यह पैसा देशमुख परिवार द्वारा प्रबंधित ‘श्री साईं शिक्षण संस्था’ ट्रस्ट को दान के रूप में दिया गया। बता दें कि ईडी ने सीबीआई द्वारा एफआईआर दर्ज करने के बाद देशमुख और उनके सहयोगियों के खिलाफ जाँच शुरू की। सीबीआई ने परम बीर सिंह द्वारा लगाए आरोपों के बाद मामला दर्ज किया था।

नीरज का भाला, लवलीना के दस्ताने, रानी की हॉकी स्टिक…: PM मोदी को मिले 1200 गिफ्ट्स की नीलामी, सँवरेगी माँ गंगा की सूरत

टोक्यो ओलंपिक में शामिल होने के बाद स्वदेश लौट भारतीय ओलंपियनों और पैरालिंपियनों के सम्मान में हाल ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दो कार्यक्रम आयोजित किए गए थे। कार्यक्रम के दौरान खिलाड़ियों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेंट स्वरूप कई चीजें दी थी, जिसकी नीलामी की जा रही है। शुक्रवार (17 सितंबर 2021) को हो रही इस नीलामी में शुरुआती तौर पर नीरज चोपड़ा के भाले की कीमत सबसे ज्यादा है। इसकी बेस प्राइस 1 करोड़ रुपए से अधिक रखी गई है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एथिलीटों द्वारा भेंट की गई 15 से अधिक वस्तुओं की नीलामी का कार्य संस्कृति मंत्रालय कर रहा है। इससे सरकार को 10 करोड़ रुपए मिलने की उम्मीद है। प्रधानमंत्री को मिले करीब 1200 उपहारों की नालामी की जा रही है। लेकिन, इस लिस्ट में सबसे महंगे वो उपहार हैं, जिन्हें ओलंपियनों और पैरालंपियनों ने पीएम को दिया था। इसकी बेस प्राइस करीब 10 करोड़ रुपए है। इससे मिलने वाली राशि को सरकार ‘नमामि गंगे मिशन’ पर खर्च करेगी।

रिपोर्ट के मुताबिक, “ओलंपिक और पैरालंपिक टुकड़ियों के प्रदर्शन से देशभर में उत्साह का माहौल है। ऐसे में उम्मीद है कि लोग इन सामानों की बोली बढ़ा-चढ़ाकर लगाएँगे।”

कौन-कौन से आइटम की लग रही बोली

नीरच चोपड़ा द्वारा पीएम मोदी को भेंट किए गए भाला के अलावा उन्होंने उन्हें दो स्टॉल भी भेंट की थी, जिसकी बेस प्राइस 90 लाख रुपए रखी गई है। इसमें एक एक ऑटोग्राफ वाला अंगवस्त्र प्रधानमंत्री को नाश्ते के दौरान दिया गया था और दूसरा ओलंपियनों द्वारा उनके हस्ताक्षरों के साथ प्रस्तुत किया गया था। दूसरे नंबर पर भारतीय महिला हॉकी कप्तान रानी रामपाल की हॉकी स्टिक का भी बेस प्राइस 90 लाख रुपए है। नीले रंग की हॉकी स्टिक में सफेद रंग में लिखा हुआ रक्षक नाम का लोगो शामिल है और मॉडल संख्या रानी 28 है, जो सीधे भारतीय महिला हॉकी टीम की कप्तान रानी रामपाल की ओर इशारा करती है। क्योंकि रानी की जर्सी 28 नंबर की है। हॉकी स्टिक पर पूरी भारतीय हॉकी टीम के हस्ताक्षर हॉकी स्टिक के शरीर पर चलते हैं।”

साभार: PM momentos

इसके अलावा बैडमिंटन खिलाड़ी और कांस्य पदक विजेता पीवी सिंधु का बैग 90 लाख रुपए के बेस प्राइस पर नीलाम हो सकता है। बैंडमिंटन के रैकेट पर पीवी सिंधू के हस्ताक्षर हैं। जबकि पुरुष टीम की हॉकी स्टिक 80 लाख रुपए की बेस प्राइस की है, इसमें भी टीम के सभी सदस्यों के हस्ताक्षर हैं। वहीं पैरालिंपिक में स्वर्ण पदक विजेता प्रमोद भगत द्वारा ऑटोग्राफ किए गए बैडमिंटन रैकेट का भी आधार मूल्य 90 लाख रुपए है। भगत ने इस रैकेट का इस्तेमाल अपना गोल्ड मेडल मैच जीतने के लिए किया था।

ओलंपिक की सिल्वर मेडलिस्ट लवलीना बोरगोहेन के मुक्केबाजी दस्ताने का आधार मूल्य 80 लाख रुपए है। उस पर उनके हस्ताक्षर हैं। तलवारबाज भवानी की तलवार की बेस प्राइस 60 लाख रुपए है। पैरालंपिक खेलों में बैडमिंटन रजत पदक विजेता सुहास लालिनकेरे यतिराज द्वारा ऑटोग्राफ किया गया बैडमिंटन रैकेट 50 लाख रुपए में बिकने के लिए तैयार है।

पैरालंपिक खेलों में टेबल टेनिस में सिल्वर मेडल जीतने वाली विजेता भावना के पटेल ऑटोग्राफ किए गए टेबल टेनिस रैकेट का बेस प्राइस 25 लाख रुपए रखा गया है। जबकि पैरालंपियन सिल्वर मेडलिस्ट योगेश खातुनिया के ऑटोग्राफ किए गए डिस्कस का आधार मूल्य भी 25 लाख रुपए। पैरालंपिक खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाले मनीष नरवाल ने शार्प-शूटिंग वाले जो चश्में पहने थे, उसका बेस प्राइस 20 लाख रुपए रखा गया है। जबकि भावना पटेल द्वारा पैरालंपिक खेलों में सिल्वर मेडल जीतने के वक्त पहनी गई टीशर्ट की बेस प्राइस 15 लाख रुपए है।

पैरालंपिक खेलों में कांस्य पदक विजेता हरविंदर सिंह के ऑटोग्राफ वाले तीरंदाजी उपकरण की बोली 15 लाख रुपए रखी गई है। 10 मीटर एयर राइफल स्टैंडिंग में गोल्ड जीतने वाली अवनी लेखारा की टी शर्ट, पैरालंपिक खेलों वाली राइफल 15 लाख रुपए में बिकने को तैयार है। बता दें कि ये बोली ‘https://pmmementos.gov.in/#/‘ पर की जा रही है और सामानों की कीमत लगातार बदल रही है।

गधा.. बेकार.. उसे पार्टी से निकाल बाहर करो: कॉन्ग्रेस प्रदेश अध्यक्ष ने शशि थरूर के बारे में कहा – ‘उसे सिर्फ़ अंग्रेज़ी के कुछ शब्द आते हैं’

तेलंगाना कॉन्ग्रेस के प्रमुख रेवंत रेड्डी ने गुरुवार (16 सितंबर, 2021) को पार्टी के केरल के तिरुवंतपुरम से सांसद शशि थरूर को गधा कह दिया। उनके द्वारा थरूर की ‘गधे’ से तुलना करने के बाद विवाद खड़ा हो गया है। इसका ऑडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है।

सोशल मीडिया पर वायरल हुए ऑडियो क्लिप में रेड्डी ने टिप्पणी की थी, “शशि थरूर! गधे (गधा) को पता होना चाहिए कि यहाँ क्या हो रहा है। अंग्रेजी में कुछ शब्द जानता है। उसे भाषा का ज्ञान नहीं है, अंग्रेजी केवल संचार कौशल है। अंग्रेजी में कुछ शब्द बोलने से कुछ नहीं बदलेगा… मैं उसे गधा समझता हूँ। दोनों का नजरिया एक जैसा है। वो बेकार है, पार्टी से बाहर कर देना चाहिए।” यह विवादित ऑडियो क्लिप टीआरएस (तेलंगाना राष्ट्र समिति) के नेता कृष्णक माने ने ट्विटर पर साझा किया था।

शशि थरूर के बचाव में उतरी कॉन्ग्रेस, टीआरएस

प्रदेश कॉन्ग्रेस प्रमुख के बयान पर टीआरएस के कार्यकारी अध्यक्ष केटी रामा राव ने बताया कि शशि थरूर ने हाल ही में उनकी और केसीआर के नेतृत्व वाली तेलंगाना सरकार के काम की प्रशंसा की थी, जिससे तेलंगाना कॉन्ग्रेस के प्रमुख नाराज हो गए हैं। उन्होंने कहा, “आईटी स्थायी समिति के अध्यक्ष के रूप में शशि थरूर जी ने हाल ही में तेलंगाना सरकार के प्रयासों के लिए उसकी सराहना की थी। संसद में उनके सहयोगी और पीसीसी चीफ उन्हें गधा कहते हैं !! ऐसी स्थितियाँ तभी समक्ष आती हैं जब आपके पास पार्टी का नेतृत्व करने वाले थर्ड ग्रेड के अपराधी / ठग होते हैं।”

के टी रामा राव के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

इस बीच कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता मनीष तिवारी ने रेवंत रेड्डी से सार्वजनिक रूप से माफी माँगने को कहा। तिवारी ने शशि थरूर को एक ‘मूल्यवान सहयोगी’ बताते हुए कहा, “अगर आपको उनके कथित बयाने को लेकर कुछ गलत फहमी है तो बेहतर होता कि आप उनसे बात करते। हमारी माँग है कि आप अपने शब्दों को वापस ले लें।”

मनीष तिवारी के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

तेलंगाना कॉन्ग्रेस प्रमुख ने माँगी माफी

थरूर को गधा कहने पर खड़े हुए बखेड़े के बाद तेलंगाना कॉन्ग्रेस प्रमुख ने तिरुवनंतपुरम के सांसद के बारे में अपनी आपत्तिजनक टिप्पणियों पर खेद व्यक्त किया। उन्होंने इसको लेकर ट्वीट किया, “मैंने शशि थरूर से यह बताने के लिए बात की कि मैं अपनी टिप्पणी वापस लेता हूँ और दोहराता हूँ कि मैं अपने वरिष्ठ सहयोगी को सर्वोच्च सम्मान देता हूँ। मेरे शब्दों से उन्हें हुई किसी भी चोट के लिए मुझे खेद है। हम कॉन्ग्रेस पार्टी के मूल्यों और नीतियों में अपना विश्वास साझा करते हैं।”

रेवंत रेड्डी के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

उन्होंने यह भी कहा कि उनका लक्ष्य और शशि थरूर एक ही लक्ष्य है कि कॉन्ग्रेस तेलंगाना में सरकार बनाए।

रेवंत रेड्डी के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

शशि थरूर ने भी बताया कि अपनी टिप्पणियों के लिए माफी माँगने के लिए रेवंत रेड्डी ने उन्हें फोन किया था। थरूर ने कहा, “मैं उनके खेद की अभिव्यक्ति को स्वीकार करता हूँ और इस दुर्भाग्यपूर्ण प्रकरण को पीछे कर रखकर खुश हूँ। हमें तेलंगाना और देश भर में कॉन्ग्रेस को मजबूत करने के लिए मिलकर काम करना चाहिए।”

शशि थरूर के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

गौरतलब है कि थरूर ने हाल ही में पिछले सप्ताह हैदराबाद की अपनी यात्रा के दौरान सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) क्षेत्र में काम के लिए तेलंगाना सरकार की प्रशंसा की थी। उन्होंने कहा था, “मैं हैदराबाद में सूचना प्रौद्योगिकी पर संसदीय समिति का नेतृत्व कर रहा था और मेरी टिप्पणियाँ सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में सरकार के काम की सराहना करने तक ही सीमित थीं।”