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कश्मीरी पंडितों के लिए पोर्टल लॉन्च, कश्‍मीर घाटी में अपनी संपत्ति से संबंधित शिकायत-समाधान के लिए जाएँ यहाँ

जम्‍मू-कश्‍मीर में सरकार ने उन लोगों की संपत्ति से अतिक्रमण हटाने की दिशा में कदम उठाने शुरू कर दिए हैं, जो घाटी में आतंकी घटनाओं के कारण कभी अपना सब कुछ छोड़ कर वहाँ से पलायन कर गए थे। इस बाबत जम्मू-कश्मीर सरकार ने कश्मीरी प्रवासियों के लिए कश्मीर में उनकी संपत्तियों से संबंधित शिकायतों को दर्ज कराने के लिए एक ऑनलाइन सेवा शुरू की है। 

यदि आपके साथ इससे संबंधित कोई शिकायत है तो आप www.jkmigrantrelief.nic.in/ पर अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। इसके लिए आपको एक ऑनलाइन प्रपत्र भरना होगा। यह सेवा प्रशासनिक सुधार एवं लोक शिकायत विभाग अपने लोक शिकायत पोर्टल के द्वारा प्रदान कर रहा है। आप जिस केन्द्रीय सरकारी मंत्रालय/ विभाग या राज्य सरकार विभाग में अपनी शिकायत दर्ज करना चाहते हो, आपको उसका चयन करना होगा एवं अपना नाम, पता, मोबाइल नंबर, शिकायत के प्रारूप इत्यादि का भी विवरण देना होगा। आप इससे संबंधित आलेख पीडीएफ प्रारूप में संलग्न कर सकते हैं।

गौरतलब है कि 13 अगस्त को जम्मू-कश्मीर प्रशासन के राजस्व विभाग ने आपदा प्रबंधन राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण (DMRRR) विभाग को कश्‍मीर घाटी में प्रवासियों की अचल संपत्ति की मौजूदा स्थिति को लेकर ऑनलाइन पोर्टल विकसित करने को कहा था, ताकि अतिक्रमण हटाया जा सके। इसके जरिए रिकॉर्ड या सीमांकन में सुधार, धोखाधड़ी या प्रलोभन के जरिए अतिक्रमण हटाने के संबंध में आवेदन दाखिल किए जा सकेंगे।

प्रशासन ने चेताया था कि जम्मू-कश्मीर प्रवासी अचल संपत्ति कानून के किसी भी उल्लंघन के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी, जिनमें संपत्तियों से कब्जा हटाने, उल्लंघन करने वालों को हिरासत में लेने जैसे कदम शामिल हैं। प्रवासियों की संपत्तियों के संरक्षण के लिए जारी दिशा-निर्देशों में कहा गया था कि पोर्टल पर दिए गए आवेदन का लोक सेवा गारंटी कानून, 2011 के तहत राजस्व अधिकारी निश्चित समय सीमा के भीतर निपटारा करेंगे।

इस संबंध में जारी आदेश में स्‍पष्‍ट कहा गया था कि सक्षम प्राधिकारी (जिला मजिस्ट्रेट) प्रवासी संपत्तियों का सर्वेक्षण या जमीनी सत्यापन करेंगे और 15 दिनों के भीतर सभी रजिस्टर को अपडेट करेंगे तथा कश्‍मीर के संभागीय आयुक्त को अनुपालन रिपोर्ट सौंपेंगे। धार्मिक संपत्तियों के संबंध में जम्मू-कश्मीर प्रवासी अचल संपत्ति (संरक्षण) कानून, 1997 के किसी भी उल्लंघन, बेदखली पर कार्रवाई के लिए जिला मजिस्ट्रेट संज्ञान लेंगे।

‘काफिर राज्य’ की हार के इंतजार में था हुमायूँ, नहीं की थी रानी कर्णावती की मदद: रक्षाबंधन की फर्जी कहानी और चित्तौड़ का वो जौहर

हम बचपन से पढ़ते आ रहे हैं कि युद्ध की विपत्ति के दौरान मेवाड़ की रानी कर्णावती ने मुग़ल शासक हुमायूँ को पत्र और राखी भेजी थी, जिसके बाद वो तुरंत उनकी मदद के लिए निकल पड़ा था। हालाँकि, मुगलों को महान बनाने के लिए जिस तरह की तिकड़मों का जाल बुना गया है, उसमें इस कहानी पर विश्वास होना मुश्किल है। क्या आपको पता है कि उस समय के इतिहास में ऐसी किसी घटना का जिक्र नहीं मिलता?

सबसे पहले बात करते हैं कि प्रचलित कहानी क्या है और कहाँ से आई। कहानी कुछ यूँ है कि गुजरात पर शासन कर रहे कुतुबुद्दीन बहादुर शाह ने मेवाड़ पर आक्रमण किया। इसी दौरान महारानी कर्णावती ने मुग़ल शासक हुमायूँ को पत्र भेजा। साथ में उन्होंने एक राखी भी भेजी और मदद के लिए गुहार लगाई। इसके बाद हुमायूँ तुरंत उनकी मदद के लिए निकल पड़ा था। इस घटना को रक्षाबंधन से भी जोड़ दिया गया।

अब आपको बताते हैं कि ये कहानी आई कहाँ से? दरअसल, 19वीं शताब्दी में मेवाड़ की अदालत में कर्नल जेम्स टॉड नाम का एक अंग्रेज था। उसने ही ‘Annals and Antiquities of Rajast’han’ नाम की एक पुस्तक लिखी थी। इसी पुस्तक में इस कहानी का जिक्र था। ‘ईस्ट इंडिया कंपनी’ के जेम्स टॉड ने ही सन् 1535 की इस घटना का जिक्र करते हुए लिखा था कि राखी पाकर हुमायूँ तुरंत मदद के लिए निकल पड़ा था।

टॉड लिखते हैं कि जब बहुत ज्यादा ज़रूरत हो या फिर खतरा हो, तभी राखी भेजी जाती थी। इसके बाद राखी प्राप्त करने वाला ‘राखीबंद भाई’ बन जाता था। उन्होंने लिखा था, “अपनी उस बहन के लिए वो राखीबंद भाई अपने जीवन को भी खतरे में डाल सकता है। बदले में उसकी अपनी ‘बहन’ की मुस्कराहट मिल सकती है, जिसकी उसने रक्षा की हो।” टॉड लिखते हैं कि ब्रेसलेट पाकर हुमायूँ काफी खुश हुआ था।

उन्होंने लिखा है कि हुमायूँ ने खुद को एक ‘सच्चा शूरवीर’ साबित किया और पश्चिम बंगाल में अपने आक्रमण को छोड़ कर चित्तौर को बचाने के लिए निकल पड़ा, राणा सांगा की विधवा और बच्चों की रक्षा के लिए निकल पड़ा। हालाँकि, हुमायूँ के पहुँचने से पहले ही चित्तौर पर बहादुर शाह का कब्ज़ा हो चुका था और रानी ने कई महिलाओं समेत जौहर कर लिया था। टॉड लिखते हैं कि इसके बावजूद आक्रांता को भगा कर हुमायूँ ने वादा पूरा किया।

अब इसी कहानी को इतिहास की नजरिए से समझते हैं। सबसे पहले तो बता दें कि महारानी कर्णावती, राणा सांगा की पत्नी थीं। महाराणा संग्राम सिंह उर्फ़ राणा सांगा ने राजपूतों को एकजुट कर मुग़ल शासक बाबर के खिलाफ एक मोर्चा बनाया और सन् 1527 में खानवा (राजस्थान के भरतपुर में) के युद्ध में बाबर से भिड़े। हालाँकि, बाबर की तोपों, फौज में जिहाद की भूख भरना और नई तकनीकों का इस्तेमाल मुगलों के काम आया।

राणा सांगा बुरी तरह घायल हो गए और कुछ दिनों बाद उनकी मौत हो गई। इसके बाद बड़े बेटे विक्रमादित्य को सिंहासन पर बिठा कर महारानी कर्णावती ने शासन शुरू किया। उनका एक छोटा बेटा भी था, जिसका नाम था – राणा उदय सिंह। वही राणा उदय सिंह, जिन्होंने 30 वर्ष से भी अधिक समय तक मेवाड़ पर राज किया और उदयपुर शहर की स्थापना की। उनके ही बेटे महाराणा प्रताप थे, जिन्होंने अकबर की नाक में दम किया था।

इधर बाबर की मौत के बाद 1530 में हुमायूँ गद्दी पर बैठा। उस समय गुजरात पर वहाँ की सल्तनत के बहादुर शाह का राज़ था। बहादुर शाह ने अपने राज्य के विस्तार के लिए कई युद्ध लड़े। हुमायूँ के आक्रमण के बाद ही उसके राज़ का अंत हुआ था। बाद में समुद्र में पुर्तगालियों के साथ एक बैठक के दौरान बात बिगड़ गई और वो मारा गया। ये वही बहादुर शाह था, जो कभी अपने अब्बा शमशुद्दीन मुजफ्फर शाह II और भाई सिकंदर शाह के डर से चित्तौर में छिपा था।

बाद में बहादुर शाह ने मालवा को जीता और फिर उसने चित्तौर पर ही धावा बोल दिया। ये तो था इन किरदारों का परिचय। इतिहासकार सतीश चंद्रा अपनी पुस्तक ‘History Of Medieval India‘ में लिखते हैं कि किसी भी तत्कालीन लेखक ने कर्णावती द्वारा हुमायूँ को राखी भेजने की घटना का जिक्र नहीं किया है और ये झूठ हो सकती है। तो फिर सच्चाई क्या थी? असल में हुआ क्या था, जो हमसे छिपाया गया?

पुस्तक ‘The History of India for Children (Vol. 2): FROM THE MUGHALS TO THE PRESENT’ में अर्चना गरोदिया गुप्ता और और श्रुति गरोदिया लिखती हैं कि हुमायूँ तो चित्तौर पर सुल्तान बहादुर शाह के कब्जे के कुछ महीनों बाद चित्तौर पहुँचा था। वो तो इंतजार कर रहा था कि कब मेवाड़ का साम्राज्य ध्वस्त हो। इस दौरान बहादुर शाह भी खुलेआम चित्तौर में मारकाट और लूटपाट मचाता रहा।

उसके मंत्रियों ने उसे कह रखा था कि वो एक काफिर से लड़ रहा है, इसीलिए मुस्लिम होने के नाते हुमायूँ उसे नुकसान नहीं पहुँचाएगा। लेकिन, हुमायूँ ने चित्तौर के उसके कब्जे में जाने का इंतजार किया और फिर हमला बोला। शुरू में तो उसकी हार हो रही थी, लेकिन अंत में किसी तरह उसने गुजरात और मालवा पर कब्ज़ा जमा लिया। इस तरह बहादुर शाह के सल्तनत का अंत हो गया। बहादुर शाह की सेना भी विशाल थी और उसके पास बड़े संसाधन थे।

चित्तौर हमले के दौरान हुमायूँ और बहादुर शाह के बीच पत्राचार भी हुआ था, जिसका जिक्र SK बनर्जी ने अपनी पुस्तक ‘हुमायूँ बादशाह‘ में किया है। बहादुर शाह ने पत्र लिख कर हुमायूँ को बताया था कि वो ‘काफिरों’ को मार रहा है। बदले में हुमायूँ ने भी लिखा था कि उसके दिल का दर्द ये सोच कर खून में बदल गया है कि एक होने के बावजूद हम दो हैं। और इस कहानी को एक हिन्दू त्यौहार से जोड़ कर रक्षाबंधन को बर्बाद करने की कोशिश की गई।

रानी कर्णावती का क्या हुआ? चित्तौर में जो तीन जौहर हुए थे, उनमें से एक ये भी था। जहाँ पुरुषों को केसरिया वस्त्र पहन कर युद्ध के लिए निकलना पड़ा, अंदर किले में रानियों ने अन्य महिलाओं के साथ जौहर किया। 8 मार्च, 1934 को इन महिलाओं ने इस्लामी शासकों के हाथों में जाने के बदले मृत्यु का वरन किया। राजकुमारों को एक सुरक्षित जगह पर रखा गया था, इसीलिए वो बच गए। इस्लामी फ़ौज ने कई बच्चों की भी हत्या की थी।

कर्णावती के राखी भेजने पर हुमायूँ द्वारा मदद करने की खबर उतनी ही फर्जी है, जितनी जोधा-अकबर की। आज तक कई फ़िल्में और सीरियल बन चुके, लेकिन किसी ने भी जोधा-अकबर की प्रमाणिकता के विश्व में रिसर्च करने की कोशिश नहीं की। जेम्स टॉड ने ही जोधा के नाम का भी जिक्र किया था। उससे पहले कहीं नहीं लिखा है कि अकबर की किसी पत्नी का नाम जोधा था। ये भी एक बनावटी कहानी भर है।

जिस सहेली तबस्सुम खातून के साथ खेली, उसी ने करवाया रेप: 10वीं की छात्रा से बलात्कार में मो अरशद और अरशद अली की तलाश

बिहार में महिलाओं के साथ अपराध थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। आए दिन कोई ना कोई महिला छेड़खानी और रेप की शिकार हो रही है। इसी क्रम में एक बार फिर से मानवता को शर्मसार करने वाली खबर पूर्वी चंपारण के मोतिहारी जिले से सामने आ रही है। यहाँ 10वीं की छात्रा को अपराधियों ने अगवा कर लिया और इसके बाद उसके साथ रेप की घटना को अंजाम दिया। यह घटना जिले के चकिया थाना क्षेत्र की है।

इस घटना के बारे में बताया जा रहा है कि मंगलवार (अगस्त 17, 2021) की रात को ही अपराधियों ने छात्रा को अगवा कर लिया था। इसके बाद अपराधी जबरन पीड़िता को बाँसवारी ले गया और फिर उसके साथ रेप की घटना को अंजाम दिया। मामले में पीड़िता की माँ ने शेखी चकिया गाँव के मोहम्मद अरशद और तबस्सुम खातून के अलावा कोटवा थाना क्षेत्र के छोटका खजुरिया गाँव के अरशद अली को आरोपित बताते हुए उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाई है।

पीड़िता की माँ ने बताया कि उनकी 15 वर्षीय लड़की अपने घर में सोई थी। रात के करीब 11 बजे दो लड़के उसे उठाकर बाँसवारी में ले गए, जहाँ मुँह बाँध कर बारी-बारी से उसके साथ दुष्कर्म किया गया। जब पीड़िता की माँ और उनके पति अपने लड़की को खोजते हुए बाँसवारी की तरफ गए तो आरोपित भाग निकले। उन्होंने बताया कि आरोपित के इस कुकृत्य में पीड़िता की सहेली तबस्सुम खातून ने साथ दिया। उसी ने पीड़िता को दोनों आरोपितों के हवाले किया।

खुद पीड़िता ने भी इस बात की पुष्टि की। यह पूछे जाने पर कि वह रात को वहाँ कैसे पहुँची, पीड़िता ने बताया कि उसकी सहेली तबस्सुम खातून उसे बुलाने के लिए आई थी। पहले तबस्सुम उसके घर में आई और फिर दोनों लड़कों को लेकर आ गई। वो उसे उठा कर बाँसबाड़ी ले गए, जहाँ पर उसके साथ दुष्कर्म की घटना को अंजाम दिया गया। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक आरोपितों द्वारा कई बार उन्हें धमकी भी दी गई थी कि लड़की को उठा कर ले जाएँगे।

पीड़िता की माँ द्वारा दिए गए आवेदन के आधार पर प्राथमिकी दर्ज की गई है। इसके बाद छात्रा का मेडिकल जाँच व न्यायालय में 164 का बयान दर्ज करा लिया गया है। फिलहाल, पुलिस अपराधियों की गिरफ्तारी के लिए छानबीन में जुट गई है।

‘हम एक-दूसरे से प्यार करते हैं’: महिला और चिम्पैंजी के ‘अफेयर’ पर सख्त हुआ Zoo प्रशासन, मुलाकात पर लगाया प्रतिबंध

बेल्जियम में एक महिला को एक चिड़ियाघर के भीतर एक चिम्पैंजी को देखने जाने से प्रतिबंधित कर दिया गया है। ज़ू प्रशासन को शक है कि इन दोनों का अफेयर था। आपने अब तक एक से बढ़ कर एक प्रेम कहानियाँ सुनी होंगी, लेकिन ये वाकया अजीब है। उक्त महिला ने खुद चिम्पैंजी के साथ अफेयर होने की बात कही है। एडी टिमरमैन्स नाम की महिला बेल्जियम के ऐंटवर्प चिड़ियाघर में जाया करती थी।

वहाँ वो एक 38 साल के एक चिम्पैंजी से मिलती थीं। वो पिछले 4 साल से लगातार उक्त चिम्पैंजी से मिलती रही हैं। महिला ने बताया था कि उनके और चिम्पैंजी के बीच एक मजबूत बॉन्ड बन गया है और वो दोनों एक-दूसरे से प्यार करते हैं। ज़ू के अधिकारियों का कहना है की चिटा नाम के उक्त चिम्पैजी से अब उस महिला को नहीं मिलने दिया जाएगा। साथ ही उक्त चिम्पैंजी को बाकी चिम्पैंजियों से अलग रखा गया है।

महिला ने इसका विरोध करते हुए कहा कि वो उस जानवर से प्यार करती हैं और वो जानवर उनसे। उन्होंने कहा कि उनके बीच कुछ और नहीं है, ऐसे में क्यों उनसे ये चीज छीनी जा रही है? महिला ने कहा कि मान लीजिए हम दोनों का अफेयर भी है, तो क्या हुआ? उन्होंने कहा कि जब बाकी के लोगों को कॉन्टैक्ट बनाने की इजाजत मिल सकती है तो उन्हें क्यों नहीं? ज़ू के अधिकारियों का कहना है कि पशु के हित में उन्होंने ये कदम उठाया है।

एक अधिकारी ने बताया कि मनुष्य के साथ ज्यादा नजदीकी बढ़ाने वाले पशु को उसके साथी पशु नज़रअंदाज़ करते हैं, इसीलिए हम चाहते हैं कि चिम्पैंजी एक चिम्पैंजी ही बन कर रहे। ज़ू में पर्यटन दिन के वक्त ही आते हैं, बाकी के 15 घंटे उसे अपने साथी जानवरों के साथ ही बिताना है। वो अकेला बैठा रहता था। अधिकारियों ने कहा कि लोगों से जानवरों की नजदीकी से वो खुश हैं, लेकिन यहाँ पशु हित पहले आता है।

मुहर्रम पर उत्पाती-हमलावर-पाकिस्तान जिंदाबाद वाली भीड़ – OK है… तो सुअरिया मेला में हिंदुओं पर क्यों बरसी पुलिस की लाठी?

देश के विभिन्न हिस्सों से मुहर्रम पर निकाले गए जुलूस के दौरान हंगामे और झड़प की खबरें सामने आईं। कहीं पुलिस पर पथराव किया गया तो कहीं ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाए गए। हैरानी की बात यह है कि इनमें से कुछ घटनाओं की जानकारी तो पदाधिकारी को भी नहीं है, तो कही पर कार्रवाई करने की बात कही जा रही है।

गुरुवार (अगस्त 19, 2021) को मध्य प्रदेश के उज्जैन में मुहर्रम के अवसर पर देश विरोधी नारे लगाने का मामला सामने आया। वहाँ भीड़ में कुछ युवकों ने देश विरोधी नारे लगाए और फिर पाकिस्तान जिंदाबाद चिल्लाने लगे। बताया गया कि भारी भीड़ के बीच गीता कॉलोनी में मुहर्रम का ताजिया उठ रहा था। इसी बीच देश विरोधी नारे लगे और युवक पाकिस्तान जिंदाबाद चिल्लाने लगे।

वहीं बिहार के समस्तीपुर में मुहर्रम का जुलूस निकालने के दौरान हुए हिंसक झड़प में लाठी चली, पत्थरबाजी की गई और साथ ही फायरिंग भी हुई। हैरत की बात यह है कि मौके पर कोई पुलिस बल तैनात नहीं थी और पुलिस अधिकारी को अभी तक इसकी कोई सूचना नहीं है।

बिहार के ही कटिहार जिले से भी दिल दहला देने वाली तस्वीर सामने आई है। पूर्णिया से इलाज कराकर लौट रहे परिवार पर मुहर्रम के जुलूस में शामिल कुछ लफंगों ने हमला कर दिया। मामला जिले के कोढ़ा थाना के मूसापुर चौक का है। NH-31 पर 20 अगस्त को प्रतिबंध के बावजूद मुहर्रम का जुलूस निकाला गया। 

इसी दौरान, पूर्णिया से लौट रहा परिवार इस जुलूस में फँस गया। इस बीच कुछ लफंगों ने गाड़ी पर हमला बोला दिया। लाठी-डंडों से गाड़ी और गाड़ी सवार लोगों को निशाना बनाया गया। गाड़ी में महिलाएँ और बच्चे भी थे लेकिन भीड़ ने कुछ नहीं देखा। लोग लाठी-डंडों से वाहन पर वार करते रहे।

इस हमले में गाड़ी का ड्राइवर बुरी तरह से जख्मी हो गया। वहीं, परिवार के चार सदस्यों को गहरी चोटें आईं। गाड़ी में सवार लोगों से नकद और मोबाइल भी लूट लिया गया। पीड़ित परिवार जैसे-तैसे जान बचाकर वहाँ से निकल गया। स्थानीय लोगों ने बताया कि मुहर्रम के जुलूस पर रोक के बावजूद जुलूस निकाला गया और भारी संख्या में लोग शामिल हुए। यह पुलिस प्रशासन की लापरवाही को दर्शाता है। बिहार के ही गोपीलगंज में भी प्रतिबंध के बावजूद जुलूस निकाला गया।

इसके अलावा नेपाल की ओर से अररिया जिले के जोगबनी के मटियरवा के रास्ते तजिया जुलूस के साथ नेपाली लोगों का झुंड भारतीय क्षेत्र में प्रवेश कर गया। हैरानी यह कि पुलिस को इसकी भनक भी नहीं लगी। सूचना मिलने पर मौके पर पहुँची पुलिस ने उसे रोकना चाहा तो जुलूस में शामिल लोगों ने सुरक्षाकर्मियों और पुलिस बलों पर पथराव कर दिया। इसमें कई पुलिसकर्मियों के चोटिल होने की बात कही जा रही है। 

प्रतिबंध के बावजूद नेपाल की ओर से जुलूस के भारत में प्रवेश कर जाने पर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं और इसका उठना लाजिमी  भी है। सवाल यह है कि जब कोरोना को लेकर भारतीय क्षेत्रों में मुहर्रम पर तजिया जुलूस पर प्रतिबंध था तो फिर भारतीय क्षेत्र में नेपाल से होकर जुलूस कैसे प्रवेश किया। सीमा पर तैनात एसएसबी के अधिकारी कहाँ थे और घटना के बाद भी क्यों मूकदर्शक बने रहे। घटना के समय और बाद में अधिकारियों के पहुँचने के समय प्रतिनियुक्त मजिस्ट्रेट मौके पर क्यों नहीं मौजूद थे।

दिलचस्प बात यह है कि सीमा पार से तजिया लेकर जुलूस देश में घुस जाता है, वहाँ पर पुलिस की नियुक्ति नहीं होती है, लेकिन मुजफ्फरपुर के देवरिया थाना क्षेत्र में सुअरिया मेला के आयोजन में पुलिस तैनात रहती है। सिर्फ तैनात ही नहीं रहती, वहाँ पर हिंदुओं के साथ ज्यादती भी की जाती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यहाँ पर मुहर्रम पर ताजिया जुलूस व सुअरिया मेला के आयोजन को लेकर दो पक्षों में तनाव उत्पन्न हो गया। दोनों तरफ से सैकड़ों लोग वहाँ पर जमा हो गए। दोनों पक्ष के लोगों ने पुलिस पर एकतरफा कार्रवाई करने का आरोप ​लगाया। 

स्थानीय लोगों ने पुलिस पर आरोप लगाया कि इन्होंने बलि के लिए सुअर लेकर जा रहे ग्रामीण के हाथों से सुअर को छीनकर भगा दिया। इसकी वजह से हिन्दू ग्रामीण आक्रोशित हो गए और पुलिस पर लाठी-डंडों से हमला कर दिया। ग्रामीणों ने पुलिस को वहाँ से भगाने के लिए उन पर पथराव करना शुरू कर दिया। इसके बाद पुलिस ने आक्रोशित ग्रामीणों को तितर-बितर करने के लिए लाठीचार्ज किया, जिसमें एक दर्जन ग्रामीण घायल हो गए हैं। स्थानीय लोगों की मानें तो पुलिस की तरफ से भीड़ को नियंत्रित करने के लिए चार राउंड हवाई फायरिंग भी की गई। 

हिंदुओं के त्योहार में पुलिस की ज्यादती की यह पहली घटना नहीं है। पिछले साल बिहार के मुंगेर में दुर्गा पूजा के बाद माता की प्रतिमा के विसर्जन के दौरान पुलिस बर्बरता की घटना सामने आई थी, बर्बरता के वीडियो सामने आए थे। ये वीडियो मुंगेर के दुर्गा पूजा समिति के कार्यकर्ताओं और भक्तों द्वारा झेले गए अत्याचार की गवाही दे रहे थे। माँ दुर्गा सहित अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ किस तरह श्रद्धालुओं से विहीन, निर्जन सड़क पर अकेली पड़ी थीं – ये दृश्य किसी भी हिन्दू के कलेजे पर वार करने वाला था, इस सच्चाई से हर हिंदू को रूबरू होना चाहिए।

26 अक्टूबर 2020 की रात माँ दुर्गा की प्रतिमा विसर्जन यात्रा पर मुंगेर पुलिस के लाठीचार्ज का वीडियो वायरल होने के बाद जिला प्रशासन की खासी आलोचना भी हुई थी। इस घटना पर एसपी लिपि सिंह ने दावा किया था कि प्रतिमा विसर्जन के दौरान असामाजिक तत्वों ने पुलिस पर पथराव किया और गोलीबारी की, जिसके बाद अपने बचाव में पुलिस ने कार्रवाई की। हालाँकि घटनास्थल पर मौजूद सीआइएसएफ़ (CISF) ने बड़ा खुलासा करते हुए बताया था कि घटना में पुलिस की तरफ से बड़ी गलती हुई थी। इसके अलावा रिपोर्ट में यह बात भी कही गई थी कि 26 अक्टूबर को गोली पुलिस द्वारा ही चलाई गई थी। 

इस घटना ने पुलिसिया क्रूरता की एक अलग ही तस्वीर दिखाई थी। जब यह घटना हुई थी, उस समय लिपि सिं​ह मुंगेर की एसपी हुआ करती थीं। इस घटना के बाद उन्हें चुनाव आयोग ने हटा दिया था। उसके बाद से लिपि सिंह पर कार्रवाई को लेकर लगातार माँग भी उठती रही। जिसके बाद खबर आई कि बिहार सरकार ने पोस्टिंग की प्रतीक्षा में रही लिपि सिंह को सहरसा का एसपी बना दिया। वैसे अधिकारियों के तबादले या उन्हें जिले की कमान दिया जाना असामान्य बात नहीं है। लेकिन, इस मामले में जिस तरह पुलिसिया बर्बरता सामने आई थी, वैसे में सरकार उन अधिकारियों को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी देने से बच सकती थी, जिनकी भूमिका पर सीधे सवाल हैं। 

हमारे देश में अमूमन हिंदुओं के त्योहारों, मान्यताओं पर ही निशाना साधा जाता है। फिर वह चाहे होली हो, दिवाली हो, गणेश चतुर्थी हो या फिर रामनवमी। रामनवमी जुलूस और सावन में काँवड़ यात्रा के दौरान पुलिस काफी सक्रिय हो जाती है, वहीं मुहर्रम या बकरीद जैसे पर्व के दौरान तो आपको पुलिस की ‘कार्रवाई’ देखने को मिल ही जाती है।

क्या हिंदुओं के त्योहार इसीलिए बनाए गए हैं कि उनका इस कदर अपमान किया जाए? और यदि आप इस पर सवाल उठाते हैं तो आप ही कट्टर हिंदू हो जाएँगे और आप ही असहिष्णु भी। आखिर कब तक हम सहते रहें अपने देवी-देवताओं का मजाक? कब तक अपने ही त्योहारों पर हम इस तरह की उपेक्षा और बर्बरता को झेलते रहें और क्यों? जवाब है तो दीजिए नहीं तो चुप ही रहिए और ऐसे ही ‘सहिष्णु’ बने रहिए। 

ये प्रश्न सिर्फ हमारे-आपके त्योहारों तक सीमित नहीं है बल्कि यह प्रश्न है हमारी-आपकी सोच पर। अपनी संस्कृती को खोकर कोई भी समाज या राष्ट्र अपना सम्पूर्ण विकास नहीं कर सकता। इसलिए हिंदू-घृणा से सने लोगों ने, “अगर किसी राष्ट्र को या समाज को तोड़ना है, उसे बाँटना है तो उसकी जड़ पर यानी उसकी बरसों पुरानी संस्कृती, रीती-रिवाजों पर वार करना होता है” – वाली नीति अपनाई। दही-हांडी से लेकर जलीकट्टू तक… कोर्ट के फैसलों को भी समझिए। यह सोच हमारी-आपकी संस्कृति पर आघात करने के मकसद से है, इसे पहचानिए।

‘खराब खाना’ बनाने पर महिला को जला डाला, लड़कियों को ताबूत में भर कर सेक्स स्लेव बना रहा तालिबान: महिला वकील का खुलासा

तालिबान ने भले ही आश्वासन दिया हो कि वो महिलाओं के साथ अच्छा व्यवहार करेगा, लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ और ही है। तालिबान ने महिलाओं को ‘इस्लाम के हिसाब से शिक्षा का अधिकार’ देने व उनका सम्मान करने की बात कही है। लेकिन, अफगानिस्तान की ही एक पूर्व महिला जज ने तालिबान की करतूतों का खुलासा करते हुए बताया कि मुल्क के महिलाओं की तालिबानियों द्वारा हत्या की जा रही है।

कुछ अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों ने अफगानिस्तान की महिलाओं से बात कर के जाना है कि उनके साथ वहाँ किस तरह का व्यवहार किया जा रहा है। अफगानिस्तान की एक महिला वकील ने बताया कि उत्तरी अफगानिस्तान में एक महिला को सिर्फ इसीलिए आग में जला डाला गया क्योंकि तालिबानियों को उसका बनाया भोजन पसंद नहीं आया था। उस पर खराब खाना पकाने का आरोप लगा कर ये ‘सज़ा’ दी गई।

तालिबानी स्थानीय परिवारों पर दबाव बना रहे हैं कि वो उनके लिए स्वादिष्ट भोजन पकाएँ और खिलाएँ। साथ ही ताबूतों में भर कर कई युवतियों को पड़ोसी मुल्कों में भेजा गया है, ताकि उनका इस्तेमाल सेक्स स्लेव के रूप में किया जा सके। साथ ही परिवारों पर अपने घर की युवतियों और बच्चियों तक की शादी तालिबानियों से करने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। महिला वकील ने कहा कि तालिबान ने जो दुनिया को आश्वासन दिया है, वो जमीन पर कहीं मिल नहीं रहा।

उक्त वकील ने अफगानिस्तान छोड़ दिया है, क्योंकि महिला अधिकार की बातें करने पर उनकी जान पर खतरा बन आया था और अब भी तालिबानी उन्हें खोज रहे हैं। उन्होंने बताया कि काबुल पर तालिबान के कब्जे से एक दिन पहले तक वो एक ‘शक्तिशाली स्थिति’ में थीं, लेकिन उसके बाद वो समाज में कुछ भी नहीं रह गईं। किराने की दुकान पर भी जाने के लिए उन्हें अपने पड़ोसी के एक 4 साल के बच्चे को साथ लेना पड़ता था, क्योंकि यही शरिया का नियम है।

कुछ ही दिनों पहले अफगानिस्तान के सरकारी टीवी चैनल की एंकर खादिजा अमीन को उनके महिला होने के कारण बर्खास्त कर दिया गया था और उनकी जगह पुरुष तालिबानी एंकर को बैठने को कहा गया था। 28 साल की खादिजा अमीन ने बताया था, “मैं एक पत्रकार हूँ और मुझे काम करने की अनुमति नहीं दी जा रही है। अब मैं आगे क्‍या करूँगी। अगली पीढ़ी के लिए कुछ भी नहीं है। हमने पिछले 20 साल में जो कुछ भी हासिल किया है, वह सब खत्‍म हो गया। तालिबान तालिबान हैं, उनके अंदर कोई बदलाव नहीं आया है।”

‘बुरे वक़्त में हमारी मदद के लिए PM मोदी का धन्यवाद’: अफगान सिख सांसद सहित 87 को लेकर भारत पहुँचा विमान

अफगानिस्तान से भारतीय नागरिकों को बचा कर भारत लाए जाने की मुहिम शुरू है। काबुल पर तालिबान के कब्जे के बाद अफगानिस्तान में शरिया कानून के तहत इस्लामी शासन चलेगा। इस कारण वहाँ के हिन्दुओं व सिखों में भय व्याप्त है। भारत के भी कई सिख नेताओं ने केंद्रीय विदेश मंत्रालय से इसके लिए गुहार लगाई थी। अब वहाँ से सिखों को बचा कर लाए जाने पर अफगान सांसद नरेंदर सिंह खालसा ने पीएम मोदी को धन्यवाद दिया है।

उन्होंने अफगानिस्तान से उन्हें व सिख समुदाय के अन्य लोगों को बचा कर भारत लाए जाने पर भारतीय वायुसेना और केंद्र सरकार को भी धन्यवाद दिया है। बता दें किनरेंदर के पिता अवतार गिल 2018 में जलालाबाद में हुए एक आतंकी हमले में मारे गए थे। खालसा ने कहा कि अफगानिस्तान से अल्पसंख्यकों को इस बुरे वक़्त में निकाला जाना ज़रूरी था, ऐसे समय में साथ खड़े रहने के लिए भारत सरकार का धन्यवाद।

वहीं रविवार (22 अगस्त, 2021) के दिन सुबह ही अफगानिस्तान से 87 लोगों को लेकर एयर इंडिया का एक विशेष विमान दिल्ली पहुँचा। इन लोगों को सबसे पहले काबुल से तजकिस्तान की राजधानी दुशांबे ले जाया गया, जहाँ से विमान ने दिल्ली के लिए उड़ान भरी। इससे पहले 168 लोगों को वहाँ से निकाला गया था। इस 168 में से 107 भारतीय थे। इनमें अधिकतर सिख ही थे। साथ ही दो नेपाली नागरिकों को भी बचाया गया है।

उधर अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के बाद तालिबानी शासन ने पहला फतवा जारी कर दिया है। तालिबान ने देश के सरकारी और निजी विश्वविद्यालयों और दूसरे शिक्षण संस्थानों में लड़के-लड़कियों के साथ पढ़ने पर रोक लगा दी है। सरकारी और निजी संस्थानों के साथ तीन घंटे की बैठक करने के बाद तालिबान ने कहा है कि इन सब का कोई मतलब है। को एड एजुकेशन को बंद किया जा रहा है।

वेदगिरीश्वर मंदिर: जहाँ पुजारी से प्रसाद लेने सदियों तक आए 2 शुद्ध शाकाहारी गिद्ध

तमिलनाडु, देश का एक ऐसा राज्य है जहाँ कई प्राचीन और भव्य मंदिर हैं। सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए अत्यधिक महत्व रखने वाले तमिलनाडु के हजारों मंदिरों में से एक है, चेंगलपट्टू जिले के तिरुकलुकुन्द्रम में स्थित वेदगिरीश्वर मंदिर। भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है वेदगिरीश्वर मंदिर। इस मंदिर को पक्षी तीर्थम भी कहा जाता है क्योंकि यहाँ सदियों से रोजाना दो ऐसे शाकाहारी गिद्ध आया करते थे जो चावल, गेहूँ, घी और शक्कर से बना प्रसाद मंदिर के पुजारी के हाथों से ग्रहण करते थे।

मंदिर का इतिहास

यह पूरा क्षेत्र एक पौराणिक क्षेत्र माना जाता है। भारद्वाज ऋषि ने भगवान शिव से लंबी आयु के लिए प्रार्थना की ताकि वो सभी वेदों को सीख सकें। इस पर भगवान शिव ने उनकी इच्छा पूर्ति की लेकिन उन्होंने चार वेदों (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद) को प्रदर्शित करते हुए चार पर्वत बनाए और एक मुट्ठी मिट्टी लेते हुए भारद्वाज ऋषि से कहा कि इन चार पर्वतों के आगे जितनी एक मुट्ठी मिट्टी है, वो (भारद्वाज ऋषि) उतना ही सीख पाएँगे।

यही वेद रूपी चार पर्वत जहाँ स्थित हैं, वहाँ भगवान शिव को समर्पित एक मंदिर का निर्माण किया गया, जिन्हें वेदगिरीश्वर कहा गया। इसका तात्पर्य है, वेदों के पर्वत के स्वामी। वेदगिरीश्वर मंदिर का निर्माण द्रविड़ वास्तुकला में पल्लव वंश के शासकों द्वारा कराया गया।

भगवान शिव और माता पार्वती के दो अलग मंदिर

तमिलनाडु के वेदगिरीश्वर मंदिर या पक्षी तीर्थम परिसर में दो मंदिर हैं, जिनमें से एक मंदिर पहाड़ी के ऊपर जबकि दूसरा मंदिर पहाड़ी के नीचे तलहटी में स्थित है। तलहटी में स्थित मंदिर को ‘ताझा कोइल’ के नाम से जाना जाता है। यहाँ माता पार्वती, माता त्रिपुरसुन्दरी के रूप में विराजमान हैं। साथ ही इस मंदिर में माता के साथ भक्तवचलेश्वर भी स्थित हैं।

पहाड़ी के ऊपर स्थित मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। 4 गोपुरम वाला यह मंदिर ‘मलइ कोइल’ कहलाता है। इस मंदिर में भगवान शिव वेदगिरीश्वर के रूप में मौजूद हैं, उनके साथ माता सोक्का नायगी भी विराजमान हैं। मंदिर को दक्षिण भारत के कैलाश और ‘कझुगु कोइल’ के नाम से भी जाना जाता है।

सदियों से आने वाले शाकाहारी गिद्ध

भगवान शिव से 8 ऋषियों को गिद्ध में बदल जाने का श्राप मिला लेकिन महादेव ने उपाय स्वरूप यह बताया कि हर युग में दो ऋषि मोक्ष को प्राप्त करेंगे और इस संसार को छोड़ जाएँगे। 6 ऋषि तो सतयुग, त्रेतायुग और द्वापरयुग में मुक्त हो गए लेकिन गिद्ध रूपी दो ऋषि कलियुग (वर्तमान) में मंदिर में आते रहे। माना जाता था कि उन्हें देखने वाले श्रद्धालुओं में अगर कोई पापी है तो वो नहीं आते थे।

इन गिद्धों के बारे में मान्यता है कि ये गिद्ध वाराणसी से गंगा स्नान करके तिरुकलुकुन्द्रम पहुँचते, जहाँ वेदगिरीश्वर मंदिर के पुजारी इन्हें चावल, गेहूँ, घी और शक्कर से बना प्रसाद ग्रहण कराते। उसके बाद दोनों गिद्ध रामेश्वरम मंदिर जाते और रात्रि विश्राम चिदंबरम मंदिर में करते। उसके बाद गिद्ध फिर से वाराणसी चले जाते, जहाँ गंगा स्नान करके पुनः उसी क्रम में यात्रा के लिए निकल पड़ते। सदियों से मंदिर आने वाले दोनों गिद्ध सन् 1998 तक दिखाई दिए लेकिन उसके बाद इन गिद्धों का दिखाई देना बंद हो गया। माना जाता है कि या तो उन्हें मोक्ष प्राप्त हो गया या अब ऐसा कोई व्यक्ति बचा ही नहीं, जिसने पाप न किया हो।

गिद्धों को प्रसाद खिलाते मंदिर के पुजारी (फोटो : Edgar Thurston)

वैसे तो गिद्ध शुद्ध माँसाहारी होते हैं और मरे हुए जानवरों के अवशेषों पर निर्भर करते हैं लेकिन ये दोनों गिद्ध शुद्ध शाकाहारी थे। अगर गूगल मैप के हिसाब से एक सामान्य गणना करें तो इन दोनों गिद्धों द्वारा रोजाना लगभग 4,870 किमी की दूरी तय की जाती थी।

कैसे पहुँचें?

तमिलनाडु के चेंगलपट्टू में स्थित वेदगिरीश्वर मंदिर का नजदीकी हवाईअड्डा चेन्नई में स्थित है जो यहाँ से लगभग 55 किलोमीटर (किमी) की दूरी पर है। चेंगलपट्टू रेलवे स्टेशन वेदगिरीश्वर मंदिर से लगभग 12 किमी दूर है, जो दक्षिण भारत के प्रमुख शहरों से रेलमार्ग के द्वारा जुड़ा हुआ है। इसके अलावा मंदिर से चेन्नई जंक्शन की दूरी लगभग 74 किमी है। चेन्नई और तमिलनाडु के प्रमुख शहरों से चेंगलपट्टू के लिए आसानी से बस सेवा उपलब्ध है ऐसे में सड़क मार्ग से भी मंदिर पहुँचना काफी आसान है।

कल्याण सिंह के निधन पर ‘हाहा’ रिएक्शंस की बाढ़: जश्न मनाने वालों का नाम पढ़िए, समझिए उनकी कट्टर मानसिकता

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का शनिवार (21 अगस्त, 2021) को निधन हो गया। भाजपा के दिग्गज नेता रहे कल्याण सिंह राजस्थान के राज्यपाल भी रहे हैं। बाबरी विध्वंस के बाद उन्होंने जिस तरह से अपनी सरकार व मुख्यमंत्री का पद कुर्बान कर दिया था, उसकी मिसाल आज भी दी जाती है। जहाँ लोग उनके निधन से शोक में हैं, वहीं मुस्लिमों ने उनके निधन वाली खबर पर ‘हाहा’ का रिएक्शन देकर जश्न मनाया।

कल्याण सिंह के निधन पर जश्न मनाने वालों के नाम पर एक नज़र डालिए – शबाज़ अली नेपाली, ताबिश हुसैन, आकिब बाबर चौधरी, ज़ीशान, जुनैद अहमद, आदिल खानजादा, मुजीब आलम, अज़ीज़ सैफी, वसीम जहीर, नदीम, सैयद यासिर शाह, सद्दाम खान, मोहम्मद ताबिश रजा, फ़ुजैरुल रहमान, निजामुद्दीन अंसारी, ज़ाहिर हुसैनी, ज़ीशान कादरी, नूर आलम सिद्दीकी, सलीम अंसारी, आरिफ निसार, इफ़्तेख़ार आलम, शाहरुख बिन राइस, ताहिर, मोहम्मद सलमान इत्यादि।

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी कल्याण सिंह के निधन पर शोक जताया और शोकाकुल परिवार के लिए प्रार्थना की। लेकिन, उनकी पोस्ट पर भी 100 से अधिक लोगों ने ‘हाहा’ का रिएक्शन दिया, जिनमें अधिकतर मुस्लिम थे। इसका स्क्रीनशॉट हम नीचे संलग्न कर रहे:

अखिलेश यादव के पोस्ट पर ‘हाहा’ रिएक्शंस

इसी तरह ‘जी न्यूज़’ ने भी बाकी मीडिया संस्थानों की तरह कल्याण सिंह के निधन की खबर प्रकाशित की। फेसबुक पर इस खबर पर भी 9 लोगों ने ‘हाहा’ का रिएक्शन दिया। ये सारे के सारे मुस्लिम नाम वाले लोग ही थे। ये ‘हाहा’ का रिएक्शन देने वाले कवि कुमार विश्वास के पोस्ट पर भी आ धमके, जिसमें उन्होंने कल्याण सिंह को भाजपा का शिल्पकार बताते हुए उनके निधन पर शोक जताया था।

डॉक्टर कुमार विश्वास की पोस्ट पर ‘हाहा’ रिएक्शंस

बीबीसी ने कल्याण सिंह के निधन पर जो खबर प्रकाशित की, उस पर तो 400 से भी अधिक लोगों ने ‘हाहा’ के रिएक्शंस दिए। इनमें से अधिकांश किस मजहब के थे, ये आप खुद ही देख कर अंदाज़ा लगा लीजिए। इसी तरह कई अन्य मीडिया संस्थानों ने जो खबरें प्रकाशित की, उनमें कल्याण सिंह का जिक्र आने पर ‘हाहा’ रिएक्शन देने वालों में अधिकतर ‘समुदाय विशेष’ के ही लोग निकले।

बीबीसी की खबर पर ‘हाहा’ रिएक्शंस की बाढ़

बाबरी विध्वंस के दौरान कारसेवकों पर गोली न चलवाने के फैसले के लिए जाने जाने वाले कल्याण सिंह कल्याण सिंह ने कहा था कि राम मंदिर बनाने की खातिर एक क्या 10 बार सरकार कुर्बान करनी पड़ेगी तो हम तैयार हैं। उसी कल्याण सिंह ने ये भी कहा था कि बाबरी विध्वंस को लेकर मन में न कोई पछतावा है, न कोई शोक है, न कोई खेद है और न ही कोई पश्चाताप का भाव है। उन्होंने बार-बार इसे गर्व का विषय बताया और दोहराया कि कारसेवकों पर गोली नहीं चलाऊँगा।

कल्याण सिंह एक प्रयोग हैं, प्रयोग मरते नहीं: वह फॉर्मूला जिसके दम पर BJP आज अपराजेय है, जिसने हिंदुओं को जोड़ा

जब इतिहास लिखा जाएगा तो उसमें 15 अगस्त, 26 जनवरी की तरह 5 अगस्त 2020 की तारीख भी अमिट हो जाएगी। इस दिन राम मंदिर के लिए भूमिपूजन हुआ। उसी पन्ने में ये भी लिखा जाएगा कि 6 दिसंबर को ढाँचा चला गया था। ढाँचे के साथ सरकार भी चली गई थी। मेरे जीवन की आकांक्षा थी कि राम मंदिर बने। मंदिर बनते ही मैं बहुत चैन के साथ दुनिया से विदा हो जाऊँगा।

कल्याण सिंह ने अगस्त 2020 में एक टीवी इंटरव्यू में यह बात कही थी। उसी कल्याण सिंह ने जो शनिवार (21 अगस्त 2021) की रात राम में विलीन हो गए। उसी कल्याण सिंह ने जिसने कहा था कि राम मंदिर बनाने की खातिर एक क्या 10 बार सरकार कुर्बान करनी पड़ेगी तो हम तैयार हैं। उसी कल्याण सिंह ने जिसने कहा कि बाबरी विध्वंस को लेकर मन में न कोई पछतावा है, न कोई शोक है, न कोई खेद है और न ही कोई पश्चाताप का भाव है। जिसने बार-बार इसे गर्व का विषय कहा। जिसने बार-बार दोहराया कि कारसेवकों पर गोली नहीं चलवाऊँगा।

ऐसे वक्त में जब राष्ट्रीय राजनीति में राष्ट्रवादी विचारधारा का बोलबाला है और उसके पराभव के दूर-दूर तक निशान नहीं दिखते हैं। जब अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण हो रहा है और बात मथुरा-काशी के अपने मंदिरों को वापस लेने की हो रही है, तो संभव है कि कल्याण सिंह का ये अंदाज आपको हैरान न करे। पर याद रखिएगा कि कल्याण सिंह के पहले इसी उत्तर प्रदेश के एक मुख्यमंत्री ने अयोध्या को कारसेवकों के खून से रंग दिया था। उसने सत्ता की सनक में दावा किया था कि अयोध्या में परिंदा भी पर नहीं मार सकता है। वह अपने नाम के आगे ‘मुल्ला’ जुटने से आह्लादित था। तब किसने 6 दिसंबर 1992 की कल्पना की होगी? तब किसने सोचा होगा एक दिन कारसेवक बाबर के बर्बर निशान को दफन कर देंगे? किसने सोचा होगा जब यह सब हो रहा होगा तो एक मुख्यमंत्री अपने सरकारी आवास में धूप सेंक रहा होगा और सूचना मिलने पर गोली चलाने का आदेश देने से स्पष्ट शब्दों में इनकार कर देगा? उसका आदेश होगा- बिना गोली चलवाए परिसर खाली करवाया जाए। किसने सोचा होगा कि कारसेवकों की सुरक्षा सुनिश्चित कर वह इस्तीफा ले मुख्यमंत्री की कुर्सी को लात मारने निकल जाएगा?

जिस देश में सियासी फायदे के लिए मजहब का इस्तेमाल होता हो। जिस देश में राजनीतिक रसूख हासिल करने के लिए नेता सार्वजनिक जीवन में धर्म को त्याज्य समझते हों। उस देश में धर्म के लिए सत्ता को ठुकराने की ऐसी बानगी शायद ही कोई और मिले। शायद यही कारण है कि हिंदू हृदय सम्राट की छवि कल्याण सिंह के साथ सदा-सदा के लिए अंकित हो गई और जब उन्होंने इस संसार से विदाई ली तो उन्हें लोग इन्हीं संस्मरणों के साथ नमन कर रहे हैं।

पर राम के काज आने वाले कल्याण सिंह एक ‘प्रयोग’ भी थे। ऐसा प्रयोग जो सफल नहीं होता तो शायद बीजेपी आज यहाँ नहीं होती। जो मोदी-शाह वाली भाजपा की ताकत देख रहे हैं और जिन्होंने अटल-आडवाणी वाली भाजपा के बारे में पढ़ा-सुना हो, उन्हें यह अतिशयोक्ति लग सकती है। पर राजनीति का अटल सत्य यही है कि वीपी सिंह ने जिस मंडल से हिंदुओं को खंड-खंड करने की राजनीति शुरू की थी, उसे बीजेपी ने सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले से ही रोका और हिंदुओं को जोड़ा। इसके केंद्र में हिंदुत्व की राजनीति के साथ-साथ ओबीसी चेहरे को आगे बढ़ाना था। इसी प्रयोग की उपज थे कल्याण सिंह। इस प्रयोग ने देश के सबसे बड़े प्रदेश में बीजेपी के लिए सत्ता का दरवाजा खोला। इसी प्रयोग ने बीजेपी को विस्तार दिया। वो मजबूती दी जिसकी वजह से वह आज अपराजेय दिखती है। सबका साथ-सबका विकास उसी प्रयोग से निकला है। वह फॉर्मूला आज भी हिट है और उसके ही सहारे बीजेपी लगातार आगे बढ़ती जा रही है।

कल्याण सिंह ने एक बार कहा था,

संघ और भारतीय जनता पार्टी के संस्कार मेरे रक्त के बूँद-बूँद में समाए हुए हैं। इसलिए मेरी इच्छा है कि जीवन भर भाजपा में रहूँ। जीवन का जब अंत होने को हो तो मेरा शव भी भारतीय जनता पार्टी के झंडे में लिपटकर जाए।

हालाँकि बीच में एक वक्त ऐसा भी आया था जब कल्याण सिंह को बीजेपी छोड़नी पड़ी थी। वे मंच पर मुलायम सिंह यादव तक के साथ भी दिखे। जिस अतरौली से वे 8 बार विधायक बने, वहाँ उनकी बहू की जमानत तक जब्त हो गई। लेकिन, राम मंदिर को लेकर गर्व का भाव उनके जीवन में हमेशा बना रहा। 6 दिसंबर को लेकर कभी कोई गम, कोई पाश्चाताप नहीं दिखा। बाद में वे उसी गर्व के साथ बीजेपी में लौटे भी और भारतीय जनता पार्टी के झंडे में लिपटकर जाने का उनका स्वप्न भी पूरा हुआ।

तो प्रयोग कभी मरते नहीं। वे केवल नई यात्रा पर निकलते हैं। राम काज की शपथ लेने वाले कल्याण सिंह अब राम में विलीन होने की यात्रा पर हैं। जब-जब कोई हिन्दुओं को बाँटने की सियासत करेगा, उसके जवाब में अपने दौर का कल्याण सिंह हिंदुओं को जोड़ने के लिए खड़ा होगा। जब-जब राम की बात होगी, राजनीति और धर्म की बात होगी, तब-तब धर्म के लिए, राम के लिए सत्ता को ठुकरा देने वाले कल्याण सिंह की बात होगी और हर दौर में उनकी प्रेरणा से कल्याण सिंह खड़ा होगा।

सुंदरकाण्ड में तुलसीदास ने लिखा है;

हनुमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ विश्राम

त्रेता में यदि हनुमान राम काज के लिए थे तो कलियुग में कल्याण थे। हनुमान ने रावण की लंका का दहन किया तो कल्याण सिंह ने लिबरलों/कट्टरपंथियों/वामपंथियों/तुष्टिकरण की राजनीति की लंका का। राम मनोहर लोहिया ने लिखा है- राम, कृष्ण और शिव भारत की पूर्णता के तीन महान स्वप्न हैं। कल्याण ने राम का स्वप्न पूरा किया। अब कृष्ण और शिव के स्वप्नों को पूरा करने की बारी हमारी और आपकी है।