राजस्थान के जयपुर में अनोखा मामला सामने आया है। यहाँ डॉक्टरों ने एक मरीज की ब्रेन ट्यूमर की सर्जरी की और इस दौरान वह गायत्री मंत्र का जाप करता रहा। करीब चार घंटे की सर्जरी में खास बात यह रही कि इस दौरान डॉक्टरों ने मरीज को बेहोश नहीं किया। इस ऑपरेशन को अंजाम देने के लिए डॉक्टरों ने हाई एंड माइक्रोस्कोप तकनीक की मदद ली, जिससे वो मस्तिष्क के हिस्से का बारीकी से अध्ययन कर सकें।
दरअसल, सेना के 57 वर्षीय सेवानिवृत हवलदार रिधमलराम को बार-बार मिर्गी के दौरे आते थे और जब उन्हें ये दौरा आता था तो अस्थायी तौर पर कुछ देर के लिए उनकी आवाज चली जाती थी। इसके बाद उन्होंने इसकी जाँच कराई तो पता चला कि उनके मस्तिष्क के स्पीच एरिया में लो ग्रेड ट्यूमर है। इसी कारण से उन्हें ये समस्या हो रही है।
ट्यूमर ऐसी जगह था, जहाँ जरा सी चूक से या तो उनकी बोलने की क्षमता खत्म हो जाती या फिर उनको लकवा मार जाता। इस समस्या से निजात पाने के लिए रिधमलराम जयपुर के नारायणा मल्टीस्पेशियलिटी हॉस्पिटल में गए। वहाँ न्यूरो सर्जन डॉक्टर केके बंसल के नेतृत्व में डॉक्टरों की टीम ने चार घंटे में सफल सर्जरी कर उनके ट्यूमर को बाहर निकाल दिया। सर्जरी के दौरान रिधमलराम पूरी तरह से होश में थे और वो गायत्री मंत्र का जाप करते रहे।
सर्जरी को लेकर डॉ केके बंसल ने बताया कि सामान्यतया सर्जरी के दौरान मरीज को बेहोश कर दिया जाता है। लेकिन ‘अवेक ब्रेन सर्जरी’ में मरीज होश में रहता है तो उसकी प्रतिक्रिया की निगरानी कर सकते हैं और इससे डॉक्टर सही जगह पर ऑपरेशन कर सकते हैं। इस केस में मरीज को लगातार गायत्री मंत्र का जाप करने और अपनी उंगलियाँ हिलाते रहने को कहा गया था। क्योंकि अगर गलत हिस्से को छेड़ते तो मरीज को स्पीच अरेस्ट होने का खतरा था।
Woman recites Hanuma Chalisa while undergoing brain tumor surgery at AIIMS
इससे पहले इसी साल पिछले महीने दिल्ली के एम्स में 24 साल की एक युवती के ब्रेन ट्यूमर का ऑपरेशन किया गया था। सर्जरी के दौरान वो लगातार मरीज हनुमान चालीसा का पाठ करती रहीं थीं। करीब तीन घंटे चले उस ऑपरेशन के दौरान लड़की पूरी तरह से होश में थीं। इस बात की जानकारी खुद ऑपरेशन टीम का हिस्सा रहे डॉ दीपक गुप्ता ने दी थी।
दिल्ली पुलिस ने आदर्श नगर के SHO (स्टेशन हाउस ऑफिसर) सीपी भारद्वाज को निलंबित कर दिया है। उन पर अपनी ड्यूटी में लापरवाही बरतने का आरोप है। साथ ही उनके खिलाफ विभाग को कई शिकायतें मिली थीं। हाल ही में वायरल हुए वीडियो में आदर्श नगर के SHO सीपी भारद्वाज को अवैध मजार के खिलाफ आवाज उठाने वाले हिंदू युवक को कानूनी कार्रवाई के लिए धमकाते हुए देखा गया था।
सड़क पर बनी इस मजार के कारण हमेशा ही ट्रैफिक जाम की समस्या रही। गड़ारिया ने बताया था कि उन्होंने खुद इस मजार को मात्र 10-12 साल पहले ही देखा। विजय ने यह भी कहा था कि फ्लाईओवर पर जमीन कब्जाने के बाद उस पर मजार का निर्माण कर दिया गया। एसएचओ सीपी भारद्वाज ने विजय को रोका था और कहा कि अगर उसे कोई समस्या है तो वह कानूनी रास्ता अपनाए। भारद्वाज ने कहा था कि ऐसी समस्याओं के निपटारे के लिए दिल्ली सरकार ने धार्मिक कमेटी का निर्माण किया है और उसे (विजय) को वहाँ आवेदन देना चाहिए।
Delhi | Adarsh Nagar SHO CP Bhardwaj suspended for lack of duty compliance and in view of several complaints against him: Delhi Police
विजय, एसएचओ की बात से असंतुष्ट दिखाई दिए और उनसे चाँदनी चौक में मंदिर पर की गई कार्रवाई के बारे में पूछा तब एसएचओ भारद्वाज भड़क गए और उन्होंने कानूनी एक्शन की धमकी देते हुए विजय को पकड़ा और एक अन्य पुलिसकर्मी को उन्हें थाने ले चलने के लिए कहा। साथ ही रिपोर्टर के साथ गए कैमरामैन को भी धक्का दे दिया था। इसके बाद एसएचओ को आईपीसी की कुछ धाराओं के अंतर्गत गिरफ्तार करने की बात कहते हुए सुना गया।
जयपुर की एक फैमिली कोर्ट ने UPSC के सेकेंड टॉपर रहे अतहर आमिर खान और फर्स्ट टॉपर रहीं टीना डाबी के तलाक को मंजूरी दे दी है। ये दोनों ही IAS अधिकारी हैं। दोनों ने आपसी सहमति से नवंबर 2020 में अदालत में तलाक की याचिका दायर की थी। इन दोनों का रिश्ता मसूरी ‘लाल बहादुर शास्त्री अकादमी फॉर एडमिनिस्ट्रेशन’ से शुरू हुआ था। दोनों के रिश्ते के प्यार और फिर शादी में बदलने की चर्चा पूरे देश में हुई थी।
इन दोनों की शादी में उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडू सहित कई केंद्रीय मंत्रियों ने भी शिरकत की थी। साथ ही कई राजनेताओं और मीडिया के लोगों ने इस शादी को सांप्रदायिक एकता का एक प्रतीक बताया था। टीना डाबी और अतहर आमिर खान, दोनों को ही IAS का राजस्थान कैडर मिला था। पहले तो ये दोनों एक ही शहर में थे, लेकिन टीना डाबी को बाद में श्रीगंगानगर का ‘चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर (CEO)’ के रूप में पदस्थापित किया गया था।
फ़िलहाल टीना डाबी राजस्थान सरकार में बतौर जॉइंट सेकेट्री फाइनेंस (टैक्स) कार्यरत हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के लेडी श्रीराम कॉलेज से राजनीतिक विज्ञान स्नातक उत्तीर्ण किया था। उन्होंने ‘कन्वेंट ऑफ जीसस एंड मेरी’ से अपनी स्कूलिंग पूरी की थी। वहीं अतहर ने जब 2015 में UPSC की परीक्षा दी थी, तब वो लखनऊ में ‘इंडियन रेलवे इंस्टिट्यूट ऑफ ट्रांसपोर्ट एंड मैनजमेंट’ में प्रशिक्षण भी ले रहे थे।
अतहर आमिर खान जम्मू कश्मीर के अनंतनाग के रहने वाले हैं और ‘श्रीनगर म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन लिमिटेड’ में बतौर कमिश्नर कार्यरत हैं। साथ ही वो ‘श्रीनगर स्मार्ट सिटी’ के CEO भी हैं। उन्होंने IIT मंडी से पढ़ाई की थी। ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ ने उन्हें अपने ’30 अंडर 30′ की सूची में शामिल किया था। मार्च 2018 में दोनों ने शादी की थी। भोपाल में जन्मीं टीना डाबी का परिवार जयपुर में ही रहता है।
शादी के बाद टीना ने कुछ समय बाद अपने सरनेम के आगे खान लगा लिया था। तलाक की अर्जी से कुछ समय पहले उन्होंने सोशल मीडिया अकाउंट में अपने नाम से खान सरनेम हटा दिया था। इसके बाद इंस्टाग्राम पर एक-दूसरे को अनफॉलो किए जाने की खबर आई थी। टीना के पिता जसवंत डाबी और माँ हिमानी इंजीनियर रहे हैं। पहले उनका परिवार दिल्ली में रहता था। शादी से पहले टीना डाबी ने अतहर आमिर खान के साथ रिलेशनशिप की पुष्टि सोशल मीडिया पर की थी।
बॉलीवुड अभिनेत्री करीना कपूर खान दूसरी बार माँ बनीं हैं और इस बार उनके बेटे का नाम जहाँगीर रखा गया है। इसको लेकर सोशल मीडिया पर लोग काफी आलोचना कर रहे हैं, जिसके बाद अब करीना कपूर खान की ननद सबा अली खान उनके बचाव में उतर आई हैं। उन्होंने इंस्टाग्राम पोस्ट के जरिए आलोचकों को जवाब देने की कोशिश की है।
सबा ने अपने इंस्टाग्राम पोस्ट के जरिए जियो और जीने दो का ज्ञान दिया है। सबा ने करीना कपूर खान औऱ सैफ अली खान के दूसरे बेटे जहाँगीर अली खान को लेकर लिखा, “जेह… जान… नाम में क्या रखा है? प्यार करो, जियो और जाने दो। बच्चे भगवान (God) की देन होते हैं।” इसके साथ ही सबा ने हार्ट इमोजी भी लगाई है। दरअसल, अभी तक करीना कपूर खान के दूसरे बेटे का नाम जेह बताया जा रहा था, लेकिन उनकी प्रेग्नेंसी बाइबल से इसका खुलासा हो गया है कि करीना के छोटे बेटे का जहाँगीर अली खान है।
साभार: सबा अली खान
गौरतलब है कि हाल ही में करीना कपूर खान ने इंस्टाग्राम पर एक लाइव सेशन के दौरान अपनी किताब प्रेंग्नेंसी बाइबल में इसका खुलासा किया था कि उनके दूसरे बेटे का नाम ‘जहाँगीर (Jehangir)’ रखा गया है। बता दें कि करीना कपूर खान ने इसी साल 21 फरवरी 2021 में बच्चे को जन्म दिया था। बताते चलें कि जहाँगीर एक मुग़ल आक्रांता था, जिसने सिखों के पाँचवें गुरु अर्जुन सिंह की हत्या करवाई थी।
इससे पहले करीना कपूर के पहले बेटे नाम को लेकर भी काफी हंगामा हुआ था। दरअसल करीना औऱ सैफ अली खान ने अपने पहले बेटे का नाम भी तैमूर ऱखा था, जो कि क्रूर विदेशी आक्रांता था।
तैमूर के बाद ये करीना कपूर का दूसरा बच्चा है, जबकि सैफ अली खान चौथी संतान के पिता बने हैं। करीना कपूर खान और सैफ अली खान की शादी 2012 में हुई थी और दिसंबर 2016 में तैमूर का जन्म हुआ था। सैफ अली खान की पहली बीवी अमृता सिंह हैं, जिनके दो बच्चे हैं – सारा अली खान और इब्राहिम अली खान।
करोड़ों की मालकिन हैं सबा अली खान
गौरतलब है कि नवाब मंसूर अली खान पटौदी के निधन के बाद उनकी बेटी सबा सुल्तान 25 अक्टूबर 2011 को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में औक़ाफ़-ए-शाही’ की मुतवल्ली बनाई गई थीं। दरअसल, नवाब पटौदी की अम्मी सजीदा सुल्तान भोपाल के आखिरी नवाब की बेटी थीं। औकाफ-ए-शाही-मुतावली की संपत्ति लगभग 1200 करोड़ रुपयों की है, यह भोपाल के शाही घराने के वक्फ की संपत्तियों की देखरेख करती है।
वर्ष 2016 में भी औकाफ-ए-शाही ने भोपाल रूबत के लिए मक्का मुकर्रमा में एक नया भवन खरीदा था। इसे सऊदी रियाल में 18.5 मिलियन (36,72,28,989.90 रुपए) की लागत से खरीदा गया है और यह औकाफ भोपाल के नाम पर है। मक्का मुकर्रमाह के अल नुझा इलाके में स्थित यह इमारत 7 मंजिला है और इसमें कुछ दुकानें भी हैं। यहाँ भोपाल से हज पर जाने वाले लोग ठहरते हैं।
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे अब भारत के दिवंगत प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के ‘सम्मान’ में उतर आए हैं। कुछ ही दिनों पहले केंद्र सरकार द्वारा ‘खेल रत्न’ से राजीव गाँधी का नाम हटा कर इसे हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के नाम पर कर दिया गया था। शिवसेना ने इस कदम से आपत्ति जताई थी। अब महाराष्ट्र की ‘महा विकास अघाड़ी (MVA)’ सरकार ने ‘इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (IT)’ क्षेत्र में राजीव गाँधी के नाम पर अवॉर्ड की घोषणा की।
उद्धव ठाकरे की सरकार ने मंगलवार (10 अगस्त, 2021) को राजीव गाँधी के नाम पर IT क्षेत्र के संगठनों के लिए अवॉर्ड की घोषणा करते हुए कहा कि तकनीक की मदद से समाज में योगदान देने वालों को ये सम्मान मिलेगा। महाराष्ट्र की शिवसेना-NCP-कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा जारी किए गए आदेश के मुताबिक, 1984-89 में प्रधानमंत्री रहे राजीव गाँधी ने IT सेक्टर को काफी प्रोत्साहन दिया था, इसीलिए उनके नाम पर इस अवॉर्ड की घोषणा की गई है।
हर साल 20 अगस्त को ये अवॉर्ड दिया जाएगा। इसी दिन राजीव गाँधी की जयंती भी मनाई जाती है। किस आधार पर मूल्यांकन कर के अवॉर्ड देना है, इसके लिए ‘महाराष्ट्र इन्फॉर्मेशन एंड टेक्नोलॉजी कॉर्पोरेशन’ को नोडल एजेंसी नियुक्त करते हुए इसका खाका तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है। इस साल भी ये सम्मान दिया जाएगा, लेकिन इसके लिए 20 अक्टूबर तक का समय लग सकता है।
राजीव गाँधी का जन्म 20 अगस्त, 1944 को मुंबई में हुआ था। बता दें कि महाराष्ट्र की तीन सत्ताधारी दलों में कॉन्ग्रेस भी शामिल है। महाराष्ट्र के IT मंत्री सतेज पाटिल ने ट्विटर पर इसकी घोषणा करते हुए कहा कि IT सेक्टर को बढ़ावा देने वाले राजीव गाँधी को श्रद्धांजलि के रूप में इस अवॉर्ड की घोषणा की गई है। बता दें कि सतेज पाटिल कॉन्ग्रेस के ही नेता हैं। इस दौरान कई सोशल मीडिया यूजर्स ने महाराष्ट्र सरकार की चुटकी भी ली।
किसी ने महाराष्ट्र का ही नाम बदल कर ‘राजीव प्रदेश’ करने की सलाह दे दी तो किसी ने जावा, ऑरेकल, क्लाउड सर्विसेज और माइक्रोसॉफ्ट के नाम के आगे भी ‘राजीव गाँधी’ लगा देने की सलाह दे डाली। शिवसेना मुखपत्र पहले ही ‘खेल रत्न’ का नाम बदले जाने को राजनीतिक एजेंडा बता चुका है। पार्टी सांसद संजय राउत ने कहा था कि राजीव गाँधी को अपमानित किए बिना ही मेजर ध्यानचंद को सम्मान दिया जा सकता था।
उधर कर्नाटक के नागरहोल में स्थित राजीव गाँधी राष्ट्रीय उद्यान का नाम भी बदलने की माँग तेज हो गई है। माँग की गई है कि नागरहोल राष्ट्रीय उद्यान का नाम कोडंडेरा मडप्पा करियप्पा (Kodandera Madappa Cariappa) के नाम पर रखा जाए, जो भारतीय सेना में पहले कमांडर-इन-चीफ थे। बता दें कि कोडागु के मूल निवासी करियप्पा का जन्म 28 जनवरी 1899 को मदिकेरी, कोडागु में हुआ था और उनका तीन दशकों का विशिष्ट सैन्य करियर था।
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से लगभग 60 किलोमीटर (किमी) दूर स्थित है विदिशा। यहाँ एक ऐसा ही हिन्दू धर्म स्थल है, जो लोगों के लिए पर्यटन का स्थान बन कर रह गया है लेकिन वास्तविकता में प्राचीन काल में यह भारत के विशालतम मंदिरों में से एक था। हम बात कर रहे हैं, विदिशा के विजय मंदिर की, जिसकी विशालता के कारण मुगल आक्रांता औरंगजेब ने इसे तोप से उड़वा दिया था। लेकिन अनेकों इस्लामी आक्रमणों के बाद आज भी मंदिर के अवशेष बचे हुए हैं और आश्चर्य की बात यह है कि सेन्ट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत बनने वाली नई भारतीय संसद की बनावट बिल्कुल इस मंदिर के समान ही है।
मंदिर का इतिहास
दरअसल विदिशा का विजय मंदिर सूर्य भगवान को समर्पित था। चालुक्य राजाओं ने अपनी शौर्यपूर्ण विजय को अमर बनाने के लिए विजय मंदिर का निर्माण कराया था। चूँकि चालुक्य वंशी राजा स्वयं को सूर्यवंशी मानते थे, ऐसे में उन्होंने यह विशाल मंदिर सूर्य भगवान को समर्पित किया। मंदिर के निर्माण का श्रेय चालुक्यवंशी राजा कृष्ण के प्रधानमंत्री वाचस्पति को जाता है। इसके बाद 10वीं-11वीं शताब्दी के दौरान परमार शासकों द्वारा मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया। हालाँकि मंदिर ने कई बार इस्लामी आक्रमण भी झेला, जिसके कारण मंदिर क्षतिग्रस्त भी हुआ। ऐसे में मराठा शासकों के द्वारा भी मंदिर में जीर्णोद्धार कराए जाने के प्रमाण मिलते हैं।
खजुराहो के मंदिरों से भी विशाल
विजय मंदिर के अवशेषों के अध्ययन से यह जानकारी मिलती है कि यह मंदिर खजुराहो के प्रसिद्ध मंदिरों से भी कहीं अधिक विशाल और समृद्ध था, साथ ही इस मंदिर में की गई नक्काशी भी उस दौर की सर्वश्रेष्ठ कलाकारी मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि विजय मंदिर की ऊँचाई लगभग 100 थी और यह मंदिर आधा मील इलाके में फैला हुआ था। आज भी मंदिर का जो अवशेष है, वह एक ऊँचे बेस पर स्थापित है।
मंदिर में उस दौर की सर्वश्रेष्ठ वास्तुकला की जानकारी मिलती है। मंदिर के दक्षिणी भाग की खुदाई करने पर मुख्य द्वार की विशाल चौखट प्राप्त हुई। इस पर शंख की बहुत सुन्दर कलाकृति उत्कीर्णित की गई है। इसके अलावा जिस चबूतरे पर मंदिर का निर्माण किया गया है, वहाँ पत्थरों पर अनेकों देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ निर्मित की गई हैं। मंदिरों के स्तंभों को यक्ष की आकृतियों से सुसज्जित किया गया है।
मंदिर से सम्बंधित कलाकृतियों में सबसे सुन्दर यहाँ मिला कीर्तिमुख माना जाता है, जिसका प्रदर्शन विदेशों में भी किया जा चुका है। मानव और सिंहों के मुख को उकेर कर जो कलाकृति बनाई जाती है, उसे कीर्तिमुख कहा जाता है और विदिशा के विजय मंदिर में मिलने वाला कीर्तिमुख अपने आप में अद्वितीय माना जाता है। मंदिर में प्राचीनकाल में कृष्णलीला आयोजित किए जाने के अवशेष भी मिलते हैं।
इस्लामी आक्रमण का इतिहास
विदिशा के इस विशाल विजय मंदिर ने एक बार नहीं बल्कि अनेकों बार इस्लामी आक्रमणों का सामना किया लेकिन फिर भी मुस्लिम कट्टरपंथी इस मंदिर की पहचान को नष्ट नहीं कर पाए। इतिहासकार निरंजन वर्मा के अनुसार सबसे पहले मंदिर में सन् 1233-34 के दौरान इस्लामी आक्रमण हुआ। दिल्ली के शाह मोहम्मद गौरी के गुलाम अल्तमश ने मंदिर और यहाँ स्थापित प्रतिमाओं को तोड़ दिया। लेकिन सन् 1250 के दौरान इसका पुनर्निर्माण किया गया। इसके बाद यह मंदिर सन् 1290 में अलाउद्दीन खिलजी और सन् 1459-60 के समय महमूद खिलजी के कट्टरपंथ का निशाना बना।
सन् 1532 में बहादुरशाह ने विजय मंदिर को नुकसान पहुँचाया। हालाँकि इन सब के बाद भी मंदिर को सुरक्षित रखने के प्रयास होते रहे। यही कारण था कि मुगल आक्रांता औरंगजेब के दौरान यह मंदिर अपनी विशालता के कारण प्रसिद्ध था। मंदिर का यही वैभव औरंगजेब से न देखा गया और उसने सन् 1682 में तोपों का उपयोग करके मंदिर का बड़ा हिस्सा नष्ट कर दिया। औरंगजेब के इस हमले के बाद मराठा शासकों ने मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य संपन्न कराया।
इतिहासकार वर्मा का कहना है कि सन् 1922 के समय मुस्लिमों द्वारा यहाँ नमाज पढ़नी शुरू कर दी गई और हिन्दुओं द्वारा की जाने वाली पूजा का विरोध प्रारम्भ हो गया। 1947 के बाद से हिन्दू महासभा द्वारा इसे प्राप्त करने के लिए संघर्ष किया गया, जिसके बाद विजय मंदिर को सरकारी नियंत्रण में ले लिया गया और मुस्लिमों के लिए एक नई ईदगाह बनवाई गई।
प्रस्तावित संसद भवन से समानता
ऑपइंडिया की इस मंदिर शृंखला में मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में स्थित एक ऐसे मंदिर के बारे में बताया गया था, जिसे भारत की तांत्रिक यूनिवर्सिटी कहा जाता था और इसी से प्रेरित होकर अंग्रेज वास्तुविद एडविन के लुटियंस ने 1921-27 के दौरान भारतीय संसद का निर्माण करवाया था।
देश के महत्वाकांक्षी सेन्ट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के अंतर्गत अब नई संसद का निर्माण प्रस्तावित है। लेकिन जैसे ही इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत बनाई जाने वाली भारतीय संसद का प्रारूप सबके सामने आया, उसके बाद लोगों की नजर विदिशा के विजय मंदिर की ओर गई। विजय मंदिर को ऊँचाई (एरियल व्यू) से देखने पर प्रस्तावित भारतीय संसद बिल्कुल इसी की तरह दिखाई देती है। दोनों की ही आकृति त्रिभुजाकार है और इस्लामी आक्रमण से पहले विजय मंदिर की ऊँचाई भी लगभग 100 मीटर थी, ऐसे में दोनों संरचनाओं में अद्भुत मेल है।
कैसे पहुँचें?
विदिशा, भोपाल से लगभग 60 किलोमीटर (किमी) की दूरी पर स्थित है और भोपाल का राजा भोज हवाईअड्डा यहाँ का नजदीकी हवाईअड्डा है। इसके अलावा इंदौर के देवी अहिल्याबाई हवाईअड्डे से विजय मंदिर की दूरी लगभग 250 किमी है।
विजय मंदिर से विदिशा जंक्शन की दूरी लगभग 2 किमी है। विदिशा रेलमार्ग जरिए देश के सभी बड़े शहरों से जुड़ा हुआ है। इसके अलावा सड़क मार्ग से भी विदिशा, मध्य प्रदेश के लगभग सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा है। राष्ट्रीय राजमार्ग 146 विदिशा से ही होकर गुजरता है।
तीन दिनों से लापता पत्रकार मनीष कुमार सिंह का शव बरामद होने से परिजनों समेत ग्रामीणों में दहशत का माहौल बना हुआ है। परिजनों का रो-रो कर बुरा हाल है। पत्रकार मनीष का शव बिहार के पूर्वी चंपारण स्थित हरसिद्धि थाना क्षेत्र अंतर्गत मठलोहियार गाँव के गाछी टोला चेवर में एक गड्ढे से बरामद किया गया। मृतक पत्रकार ‘सुदर्शन न्यूज़’ चैनल में अरेराज अनुमंडल संवाददाता के पद पर कार्य करते थे। वहीं मृतक के पिता संजय सिंह अरेराज दर्शन समाचार पत्र के संपादक हैं।
मृतक पहाड़पुर थाना क्षेत्र के कोटवा पंचायत स्थित बथूआहा टोला के वार्ड संख्या 15 के निवासी थे। इस वारदात के संदर्भ में मृतक के पिता संजय कुमार सिंह ने स्थानीय थाना में एक आवेदन देकर पत्रकार के दो साथी अमरेन्द्र कुमार व मोहम्मद अरशद आलम सहित 13 लोगों को नामजद करते हुए बताया कि उनके गाँव में जमीनी विवाद चल रहा था, जिसमें उन्होंने स्थानीय थाना में विगत 25 जुलाई को एक मामला दर्ज कराया था।
मनीष के पिता ने आशंका जताई है कि आरोपितों ने धोखे से उनके बेटे को बुलाया और एक साजिश के तहत अपहरण कर के हत्या कर दी। इस मामले में स्थानीय पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए अमरेन्द्र कुमार व मोहम्मद अरसद आलम को न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। इसकी पुष्टि करते हुए अरेराज डीएसपी संतोष कुमार ने बताया कि उक्त दोनों की गिरफ्तारी सीसीटीवी फुटेज के आधार पर की गई है।
सुदर्शन न्यूज़ के रिपोर्टर मनीष कुमार सिंह की हत्या
पुलिस ने आश्वासन दिया है कि मामलें की जाँच कर उचित कार्रवाई की जाएगी। स्थानीय मीडियाकर्मियों में इस घटना को लेकर भय का माहौल है और उन्होंने मनीष कुमार सिंह की हत्या पर शोक व्यक्त किया है। जहाँ से मनीष का शव बरामद हुआ, वहाँ बारिश का पानी जमा हुआ था। मनीष के पिता RTI कार्यकर्ता के रूप में भी काम करते थे। कई मामलों को उजागर करने के कारण परिवार को पहले भी धमकी मिलती रही है।
पहाड़पुर थाना क्षेत्र के निवासी पत्रकार मनीष कुमार सिंह किसी पार्टी में शामिल होने के लिए निकले थे, लेकिन उसके बाद से ही उनका फोन स्विच ऑफ आ रहा था। 3 दिन बाद उनका शव बरामद हुआ। पानी में पड़ा रहने के कारण उनके शव की पहचान मुश्किल हो रही थी। उनके पिता ने ये आशंका भी जताई है कि खबरों को उजागर करने या फिर जमीन के विवाद में उनके बेटे की हत्या की गई हो सकती है।
जम्मू कश्मीर की राजधानी श्रीनगर के लाल चौक के पास स्थित हरि सिंह हाई स्ट्रीट पर मंगलवार (10 अगस्त, 2021) को एक बम विस्फोट हुआ, जिसमें 11 लोग घायल हो गए। उसी दिन, उसी इलाके में, कुछ ही देर बाद आदिल फारूक नाम का पत्रकार ग्रेनेड के साथ धराया। जम्मू कश्मीर पुलिस ने बताया कि आदिल फ़ारूक़ भट स्थानीय ‘CNS न्यूज़ एजेंसी’ के लिए काम करता है। उसके पास से दो ग्रेनेड बरामद हुए हैं।
उसे जिस मक्का मार्केट से गिरफ्तार किया गया, वो क्षेत्र लाल चौक से लगभग आधा किलोमीटर की दूरी पर है। एक और बात जानने लायक है कि आदिल फारूक भट को फरवरी 2019 में भी गिरफ्तार किया गया था, लेकिन उसके बाद उसे छोड़ दिया गया था। आतंकियों के साथ उसके संपर्कों को लेकर पुलिस को पहले से ही शक था और उस पर नजर रखी गई थी। 2 साल पहले उसकी गिरफ़्तारी पर खूब हंगामा मचाया गया था।
तब ‘ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉन्फ्रेंस’ के अध्यक्ष और अलगाववादी नेता मीरवाइज उमर फारुख ने ‘सार्वजनिक सुरक्षा अधिनियम (PSA)’ के तहत आदिल फारूक की गिरफ़्तारी की निंदा करते हुए कहा था कि झूठे मामलों में फँसा कर सरकार छात्रों और युवाओं का करियर बर्बाद कर रही है। तब आदिल फारूक ‘सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ कश्मीर’ में पत्रकारिता का छात्र हुआ करता था। उसे जम्मू के कोट भलवाल जेल में डाला गया था।
implicating them in fake cases,we demand his immediate release.
मीरवाइज ने उसे तुरंत छोड़े जाने की माँग की थी। अब साफ़ हो गया है कि तब के ‘छात्र और युवा’ ने किस तरह का ‘करियर’ चुन लिया था। इस ‘ग्रेनेड वाली पत्रकारिता’ के बचाव के लिए जम्मू कश्मीर के नेताओं ने आवाज़ उठाई थी। गनीमत ये है कि नए जम्मू कश्मीर में मीरवाइज उमर फारूक पिछले 2 सालों से जेल में बंद है और अब वो ट्वीट कर के आतंकियों की पैरवी नहीं कर सकता। उसके कई साथी भी जेल में सड़ रहे हैं।
एक और बात जानने लायक है कि हरि सिंह हाई स्ट्रीट में ही ‘सीमा सुरक्षा बल (SSB)’ का एक बंकर है, जो आतंकियों का निशाना बना। SSB की 14वीं बटालियन के उसी बंकर को निशाना बना कर बम फेंका गया था। लेकिन, ये ग्रेनेड सड़क पर ब्लास्ट हो गया और कई नागरिक घायल हो गए। घायलों को अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराना पड़ा। इसके बाद चलाए गए तलाशी अभियान में आदिल फारूक भट दबोचा गया।
उसकी गतिविधियाँ पुलिस को संदिग्ध लगी थीं और जब उसके बैग की तलाशी ली गई तो उसमें से 2 ज़िंदा ग्रेनेड मिले। बम ब्लास्ट और ग्रेनेड बरामद होने के मामले में दो अलग-अलग FIR दर्ज की गई है। अभी और गिरफ्तारियाँ हो सकती हैं। पुलिस का कहना है कि दोनों मामले आपस में जुड़े हुए हैं। जाँच के बाद अब साफ़ हो जाएगा। आदिल फारूक दक्षिणी कश्मीर के पुलवामा स्थित पैम्पोर के ख्रेव इलाके का रहने वाला है।
आदिल फारूक भट आज अचानक आतंकी नहीं बना है, बल्कि छात्र जीवन से ही ऐसा ही करता रहा है। ये अलग बात है कि तब घाटी में अब्दुल्ला व मुफ़्ती परिवार सबसे ताकतवर हुआ करता था और ऐसे तत्वों को भरपूर संरक्षण मिलता था। फरवरी 2019 में इसी भट को आतंकियों को चीजें मुहैया कराने के आरोप में दबोचा गया था। वो ‘लश्कर-ए-तैय्यबा (LeT)’ के ओवरग्राउंड आतंकी के रूप में काम कर रहा था।
साथ ही वो LeT के ही एक सरगना मोहम्मद अयूब लोन की पूरी मदद कर रहा था और उसके सहायक के रूप में काम कर रहा था। उसने सुरक्षा बलों को धोखे में रख कर आतंकियों तक गोला-बारूद और खतरनाक हथियार पहुँचाए थे। अप्रैल 2020 में उसे छोड़ दिया गया था। सोचिए, इस दौरान उसके पहुँचाए हथियारों से कितने निर्दोषों का खून बहा होगा। लेकिन नहीं, वो तो ‘छात्र’ था, ‘युवा’ था, अब ‘पत्रकार’ है।
तब आरिफ शाह नाम के पत्रकार ने भी आदिल की गिरफ़्तारी को आधार बना कर दावा किया था कि जम्मू कश्मीर में पत्रकारों के साथ ‘सबसे बुरा व्यवहार’ हो रहा है। उसने उसे तुरंत रिहा करने और उसके करियर के साथ न खेलने की अपील की थी। अब पता चला है कि आतंकियों का नेटवर्क, सिर्फ राजनीति ही नहीं बल्कि मीडिया में भी फैला हुआ है। रंगे हाथों धराए आदिल फारूक तो इसका जीता-जागता गवाह है।
आज हम आपको भारत के एक ऐसे क्षेत्र के बारे में बताने जा रहे हैं, जो पर्यटकों की पसंदीदा जगहों में से एक है। वो – दादरा एवं नगर हवेली, जो केंद्रशासित प्रदेश ‘दादरा एवं नगर हवेली और दमन और दीव’ का हिस्सा है। पहले ‘दादरा एवं नगर हवेली’ भी केंद्र शासित प्रदेश हुआ करता था, लेकिन फिर इसे और ‘दमन व दीव’ को जोड़ दिया गया। जनवरी 2020 में ये निर्णय औपचारिक रूप से लागू किया गया। इसकी आज़ादी में RSS की बड़ी भूमिका थी।
लेकिन, क्या आपको पता है कि दादर, नगर हवेली, दमन और दीव ये चारों के चारों कभी पुर्तगाल के कब्जे में हुआ करते थे? वही पुर्तगाल, जिससे गोवा को भी आज़ाद कराया गया था। भारत में व्यापार के लिए आई यूरोपीय ताकतों ने यहाँ के अलग-अलग इलाकों में अपना अधिपत्य जमा लिया था। इसमें ब्रिटिश, फ्रेंच और पुर्तगीज प्रमुख थे। महाराष्ट्र और गुजरात के बीच स्थिति इस क्षेत्र में गुजरती और मराठी ही प्रमुख भाषा है।
आज हम आपको बताएँगे कि कैसे ‘राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS)’ ने ‘दादरा एवं नगर हवेली’ को पुर्तगाल से स्वतंत्र कराने में बड़ी भूमिका निभाई। ‘दादरा एवं नगर हवेली’ देश के उन क्षेत्रों में से था, जिसे 15 अगस्त, 1947 को स्वतंत्रता नहीं नसीब हुई थी। पुर्तगाल इस क्षेत्र पर तब तक शासन करता था, जब तक इसकी स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र विद्रोह नहीं हुआ। फिर यहाँ के सबसे बड़े शहर व मुख्यालय में 2 अगस्त, 1954 को तिरंगा लहराया।
दादरा एवं नगर हवेली का भूगोल
किसी इलाके के इतिहास को समझने से पहले वहाँ के भूगोल को समझना आवश्यक है। आज सिलवासा कई विनिर्माण कंपनियों का हब बन रहा है, जिन्होंने अपने-अपने यूनिट्स वहाँ लगाए हैं। पश्चिमी भारत में स्थित ‘दादरा एवं नगर हवेली और दमन व दीव’ कुल 4 जिलों से मिल कर बना है। ये इलाके बॉम्बे हाईकोर्ट की ज्यूरिडिक्शन में आते हैं। नक्शा देखने पर आपको ये इलाके गुजरात का ही हिस्सा प्रतीत होंगे।
भारत के पश्चिमी समुद्री तट पर स्थित ये क्षेत्र महाराष्ट्र और गुजरात की सीमा पर स्थित है। ये एक पहाड़ी इलाका है, खासकर इसके उत्तर-पूर्वी और पूर्वी क्षेत्र। मुख्य रूप से ये ग्रामीण क्षेत्र है, जहाँ 62% से भी अधिक आदिवासी निवास करते हैं। लेकिन, पर्यटकों के ठहरने के लिए होटल्स व रिसॉर्ट्स की कमी नहीं है। सह्याद्रि की सुंदर पहाड़ियाँ और दमन गंगा नंदी व इसकी तीन सहायक नदियाँ इस क्षेत्र में चार चाँद लगाती हैं।
ढोडिया, कोकणा, वारली, कोली, काठोडी, नइका और डुबला इस क्षेत्र में निवास करने वाले प्रमुख समूह हैं। 11 अगस्त, 1961 को इसे औपचारिक रूप से भारत के एक केंद्र शासित प्रदेश के रूप में अंगीकार किया गया था। इस प्रदेश का 40% हिस्सा जंगलों से घिरा हुआ है, जो इसे प्रकृति के और नजदीक लाता है। गर्मी के मौसम में यहाँ पारा उतना ज्यादा नहीं जाता, लेकिन समुद्र के किनारे होने के कारण नमी ज़रूर होती है।
अगर आपको वन्यजीव पसंद हैं और आप जंगलों में पर्यटन पसंद करते हैं तो ‘वसोना लायन सफारी’ और ‘सतमालिया हिरन अभ्यारण्य’ आपके लिए एक अच्छा चुनाव हो सकता है। साथ ही आप कौंचा के ‘हिमयवान हेल्थ रिसोर्ट’ में जाकर प्रकृति के साथ नजदीकी का लाभ उठा सकते हैं। अगर आप इतिहास प्रेमी हैं तो सिलवासा के ट्राइबल म्यूजियम एक अच्छी जगह है। नक्षत्र गार्डन और दुधानी का एक्वासीरीन टूरिस्ट कॉम्प्लेक्स भी पर्यटकों के लिए पसंदीदा जगह है।
दादरा एवं नगर हवेली की आज़ादी और उसमें RSS की भूमिका
दादरा एवं नगर हवेली में जो सशस्त्र विद्रोह हुआ, उसी आंदोलन के क्रांतिकारियों ने इसे भारत का हिस्सा बनना चुना। उन्होंने इन द्वीपों का भारत में विलय करने की चाहत जताई थी। हालाँकि, पुर्तगाल इसके बावजूद भी इसे छोड़ने से इनकार कर रहा था और मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण करने में लग गया था। इसीलिए, भारतीय गणराज्य में औपचारिक रूप से इसका विलय होने में ज़्यादा समय लग गया।
पुर्तगाल ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के दावे को ठुकरा दिया था और अपने हक़ में पैरवी की थी। गोवा और दादरा एवं नगर हवेली की स्वतंत्रता में अंतर ये है कि इसकी आज़ादी के लिए भारतीय सेना को प्रत्यक्ष हस्तक्षेप करने की ज़रूरत नहीं पड़ी। ये भी आपको जानना चाहिए कि दादरा एवं नगर हवेली में स्वतंत्रता के लिए आवाज़ उठाने वाले और क्रांति करने वाले अधिकतर RSS के ही स्वयंसेवक थे।
दादरा (479 स्क्वायर किलोमीटर) में पुर्तगालियों ने 1783 में कब्ज़ा किया था और इसके दो साल बाद ही उसने नगर हवेली (8 स्क्वायर किलोमीटर) को भी अपना गुलाम बना लिया। 42,000 की जनसंख्या वाले इस क्षेत्र में 72 गाँव थे। इनमें से अधिकतर वारली जनजाति के लोग थे। तब धरमपुर के राजा का इस क्षेत्र में शासन हुआ करता था। पुर्तगाली कब्जे के बाद दोनों पक्षों में काफी बार संघर्ष हुआ।
जब गोवा में 1930 के दशक में स्वतंत्रता आंदोलन ने जोर पकड़ी तो उसके बाद दादरा एवं नगर हवेली में भी लोगों ने आज़ादी के लिए आवाज़ उठानी शुरू कर दी। 2 अगस्त, 1954 को सिलवासा में ‘आज़ाद गोमांतक पार्टी’ ने कुछ अन्य संगठनों के साथ मिल कर तिरंगा झंडा फहराया। इसमें RSS के 200 प्रमुख सदस्य थे। हालाँकि, इनमें से अब बहुत कम ही ऐसे हैं जो आज भी जीवित हैं। लेकिन, इनका सम्मलेन होता रहता है।
RSS ले दिग्गज नेता और पत्रकार केआर मलकानी ने अपनी पुस्तक ‘The RSS Story’ में लिखा है कि किस तरह नाना काजरेकर और सुधीर फड़के के नेतृत्व में 200 RSS स्वयंसेवकों ने दादरा एवं नगर हवेली को आज़ाद कराया। इसके लिए उन्हें पुर्तगाल के 175 सैनिकों से भिड़ना पड़ा था, जो राइफल और स्टेंगनस से लैस थे। न सिर्फ दादरा एवं नगर हवेली, बल्कि गोवा की आज़ादी में भी RSS स्वयंसेवकों ने बड़ी भूमिका निभाई।
पुर्तगाल की सेना की फायरिंग में कई स्वयंसेवकों की जान चली गई थी और कई घायल भी हुए थे। पुणे में अगस्त 2011 में एक आयोजन भी हुआ था, जिसमें RSS के उन स्वयंसेवकों का सम्मान हुआ था। तब इस आंदोलन के 55 क्रांतिकारी जीवित थे। उन्हें बुला कर सम्मानित किया गया था और बलिदानियों को याद किया गया था। ‘दादरा एवं नगर हवेली मुक्ति संग्राम समिति’ ने इस कार्यक्रम का आयोजन किया था।
इतिहासकार बाबासाहब पुरंदरे भी उन क्रांतिकारियों में शामिल थे। अमित शाह ने भी 2019 में संसद की बहस के दौरान पुरंदरे के साथ-साथ सुधीर फड़के और सैनिक स्कूल के अधिकारी प्रभाकर कुलकर्णी का नाम लेते हुए कहा था कि इन्होंने दादरा एवं नगर हवेली की स्वतंत्रता में बड़ी भूमिका निभाई थी। तब तृणमूल सांसद सुगत रॉय ने इसके क्रेडिट नेहरू को देने की माँग की थी, जिस पर केन्द्रीय गृह मंत्री ने कहा कि कई हस्तियाँ इसमें शामिल थी, अकेले कोई शाह या नेहरू ने इसे आजाद नहीं कराया था।
‘दादरा एवं नगर हवेली’ और ‘दमन व दीव’ के मर्जर पर संसद में चर्चा
अंत में आपको एक रोचक तथ्य से अवगत कराते हैं। क्या आप जानते हैं कि दादरा एवं नगर हवेली का भारत में विलय के लिए एक IAS अधिकारी को एक दिन के लिए प्रधानमंत्री बनाना पड़ा था, ताकि वो विलय के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर कर सके? पुर्तगाली आक्रांताओं से इसे औपचारिक रूप से आजाद कराने के लिए यही तरीका अपनाया गया था। संविधान के दसवें संशोधन के जरिए फिर इसे भारत का केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया।
सबसे पहले तो दारद एवं नागर हेवली के गाँवों में बैठकें शुरू हुईं। जनजातीय समूहों को विदेशी आक्रांताओं से मुक्त पानी ही थी। राम मनोहर लोहिया और जयप्रकाश नारायण जैसे राजनेताओं ने इस तरह के आंदोलनों को पूरा समर्थन व संरक्षण दिया। RSS ने जनजातीय समूह के नेताओं को भी इकट्ठा किया और आजादी की लड़ाई में उन्हें साथ लिया। 1954 में लता मंगेशकर ने भी क्रांतिकारियों के लिए एक कार्यक्रम किया था।
22 जुलाई, 1954 को ‘यूनाइटेड फ्रन्ट ऑफ गोअंस (UFG)’ ने दादरा पुलिस थाने पर हमला किया। एक सब-इन्स्पेक्टर इस लड़ाई में मारा गया। इसके अगले ही दिन इसे आजाद घोषित कर दिया गया। 28 जुलाई को पुर्तगाल के पुलिसकर्मियों ने आत्म-समर्पण कर दिया। इसके बाद एक-एक कर सभी गाँव भारत के पक्ष में गोलबंद होते चले गए और 2 अगस्त को सिलवासा में भी तिरंगा लहराया। 1954 से 1961 तक ये ‘स्वतंत्र दादरा एवं नगर हेवली का वरिष्ठ पंचायत’ के रूप में अस्तित्व में रहा।
पुर्तगाल इस मामले को लेकर ‘अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ)’ में चला गया था। क्रांतिकारियों ने तब भारत से मदद माँगी और केंद्र सरकार ने IAS अधिकारी केजी बदलानी को वहाँ प्रशासक बना कर भेजा। ‘वरिष्ठ पंचायत’ पहले ही भारत में विलय को लेकर फैसला ले चुका था। उसने बदलानी को अपना प्रधानमंत्री चुना, जिसके बाद वो जवाहरलाल नेहरू के समकक्ष हो गए। फिर उन्होंने 11 अगस्त, 1961 को विलय के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए।
हालाँकि, कश्मीर में मिले धक्के के बाद जवाहरलाल नेहरू को तब तक समझ आ चुका था कि देशहित के मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र में दौड़ लगाने से कोई फायदा नहीं है, इसीलिए अनुच्छेद-370 की तरह कोई और प्रावधान अस्तित्व में आने से बच गया। इसी तरह सिक्किम भी आजादी के कई वर्षों बाद भारतीय गणराज्य में शामिल हुआ था। नेहरू की गलती के कारण जम्मू कश्मीर के कुछ हिस्से पर अभी भी पाकिस्तान का अवैध कब्जा है।
बीजेपी ने हाल ही में पार्टी में शामिल हुए बसपा के पूर्व नेता जितेंद्र सिंह बबलू को बाहर कर दिया है। बीजेपी नेता रीता बहुगुणा जोशी ने जितेंद्र सिंह बबलू के 4 अगस्त को पार्टी में शामिल होने पर खुलकर विरोध जताया था।
State President of Bharatiya Janata Party Swatantra Dev Singh has cancelled the membership of former MLA Jitendra Singh Bablu from the party
बबलू को पार्टी से निकाले जाने के बाद बीजेपी नेता रीता बहुगुणा जोशी ने समाचार एजेंसी ANI से कहा, “मैंने उनके (यूपी बीजेपी अध्यक्ष) पास अपना विरोध दर्ज कराया था। उनके द्वारा की गई कार्रवाई से मैं काफी संतुष्ट हूँ।” रिपोर्ट्स के मुताबिक, दर्जनों मुकदमे झेल रहे जितेंद्र सिंह बबलू मायावती सरकार में बीएसपी के दबंग विधायक थे। उन पर साल 2009 में रीता बहुगुणा का घर जलाने का आरोप है।
I had lodged my protest with him (UP BJP chief). I am satisfied & congratulate him for the action he took: BJP MP Rita Bahuguna Joshi on the cancellation of the BJP membership of former MLA Jitendra Singh Bablu who was allegedly involved in torching of Joshi’s house in 2009 pic.twitter.com/vqC7qqSr4z
उन्हें बसपा सुप्रीमो और तत्कालीन यूपी की सीएम मायावती का करीबी सहयोगी माना जाता था। उनके भाई को मायावती ने एमएलसी बनाया था। तत्कालीन प्रदेश कॉन्ग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा जोशी के घर को जलाने की कोशिश के बाद बबलू कई दिनों तक सुर्खियों में छाए रहे।
बबलू और उसके साथियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया था। इस मामले में उन्हें जेल भी जाना पड़ा था। रीता बहुगुणा अब बीजेपी में हैं। वह प्रयागराज से पार्टी की लोकसभा सांसद हैं। उन्होंने योगी सरकार में मंत्री के रूप में भी काम किया।
गौरतलब है कि 4 अगस्त को भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह ने लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम में जितेंद्र सिंह बबलू को पार्टी ज्वॉइन कराई थी। उस दौरान रीता बहुगुणा ने बबलू के भाजपा में शामिल होने पर आपत्ति जताई थी। जोशी ने पार्टी नेतृत्व को बबलू के संबंध में शिकायत की थी। पिछले साल भी बबलू को पार्टी में लाने की कोशिश की गई थी, लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं के कड़े विरोध के बाद फैसला टाल दिया गया था।
बता दें कि बीजेपी की वरिष्ठ नेता जोशी ने अपनी शिकायत में कहा था, ”जितेंद्र सिंह बबलू के पार्टी में आने पर मुझे काफी दुख हुआ है। शायद पार्टी अध्यक्ष को बबलू की करतूतों के बारे में पता नहीं होगा। मैं जल्द से जल्द उनसे मिलकर इससे अवगत करवाउंगी। मैं उम्मीद करुँगी कि जल्द से जल्द उसे बाहर किया जाएगा।”