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3 अन्य संदिग्ध आतंकियों शकील, मो मुस्तकीम और मुईद को यूपी ATS ने किया गिरफ्तार: पूछताछ में कबूल किया गुनाह

उत्तर प्रदेश के आतंक निरोधी दस्ते (एटीएस) ने बुधवार (जुलाई 14, 2021) को अलकायदा से जुड़े तीन और संदिग्ध आतंकियों को गिरफ्तार कर लिया है। तीनों लखनऊ निवासी हैं। इनकी पहचान शकील, मो मुस्तकीम और मुईद के तौर पर हुई है। इससे पहले पुलिस ने अलकायदा से जुड़े मिनहाज और मसीरुद्दीन को अपनी हिरासत में लिया था। इनसे पूछताछ के बाद से पुलिस को शकील की तलाश थी।

प्रेस रिलीज

हालिया कार्रवाई में एटीएस टीम ने बुधवार सुबह वजीरगंज के जनता नगर निवासी शकील को बुद्धा पार्क के पास पकड़ा। बीते तीन दिनों से शकील की तलाश की जा रही थी। बुधवार को जब उसके होने की जानकारी वजीरगंज में मिली तो टीम ने मौके पर पहुँच कर बुद्धा पार्क के पास उसको दबोच लिया। इसके बाद उसे सीधे मुख्यालय लेकर गए। उसके अलावा मुस्तकीम और मुईद को भी पुलिस ने पकड़ा। एक रिपोर्ट में किसी आफाक नाम के शख्स को हिरासत में लेने की बात है। कहा जा रहा है चारों के पास से असलहा, बारूद बरामद हुए हैं और सबने अपनी संलिप्ता कबूली है। पुलिस का कहना है कि अब आगे उन्हें कोर्ट में पेश करके विधिक कार्यवाही की जाएगी।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट में शकील को यूपी में अलकायदा का कमांडर कहा गया है, जिसकी गिरफ्तारी के बाद उसके परिजनों ने खूब हल्ला मचाया। मामले में रिपोर्ट करने पहुँचे मीडियाकर्मियों से भी बदसलूकी रिपोर्ट की गई। शकील के भाई ने बताया कि भाई शकील ई-रिक्शा चलाकर परिवार का पेट पालता है। अगर आतंकी होते तो पैसा होता तो अंबानी और अडानी जैसी लैविश लाइफ जी रहा होता।

शकील की छोटी बहन ने अपने भाई के आतंकी होने का सबूत माँगा। उसका कहना है कि अगर एक भी ऐसी संदिग्ध चीज मिली तो वह मान लेंगे कि शकील आतंकी है। शकील की बहन ने ऐसी कार्रवाई के पीछे मुसलमान होने को कारण बताया। वहीं मोहल्ले के निवासी मुन्ना कुरैशी ने दावा किया कि उनके मोहल्ले में कही भी कोई आपराधिक रिकॉर्ड वाला नहीं है। अगर मिल जाए तो पुलिस उन्हें फाँसी पर चढ़ा दे। शकील जिसे पुलिस ने पकड़ा है वह बस ई रिक्शा चलाता था। लेकिन कोरोना में सब चौपट हो गया। अब सरकार की बेवजह परेशान कर रही हैं।

एटीएस की कार्रवाई में 11 जुलाई को पकड़े गए थे अलकायदा के दो आतंकी

उल्लेखनीय है कि जहाँ शकील के घरवाले उसके आतंकी होने की बात नकार रहे हैं। वहीं उत्तर प्रदेश एटीएस का कहना है कि ये सब अंसार गजवत उल हिंद से जुड़े हुए हैं। इनका नाम 11 जुलाई को गिरफ्तार हुए दो आतंकियों से पूछताछ के बाद सामने आया जो मात्र 3 हजार में प्रेशर कुकर बम तैयार करने में लगे थे और 15 अगस्त से पहले किसी आतंकी गतिविधि को अंजाम देने वाले थे।

बता दें कि मिनहाज और मसीरुद्दीन के पकड़े जाने के बाद एटीएस इनके अन्य कनेक्शन खोजने में लगी है। इनसे की गई पूछताछ में एटीएस को पता चला था वह कि बारूद के साथ माचिस की तीली में लगे ज्वलनशील मसाला का विस्फोटक में इस्तेमाल करने जा रहे थे। आतंकी मिनहाज के घर से माचिस की तीली से निकाला हुआ भारी मात्रा में मसाला और बारूद भी बरामद हुआ था।

सेना को सब्जी सप्लाई की आड़ में ISI के लिए जासूसी कर रहा था हबीब खान, राजस्थान से दिल्ली पुलिस ने दबोचा

दिल्ली पुलिस ने राजस्थान से हबीब खान को हिरासत में लिया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार उस पर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के लिए जासूसी करने का आरोप है। वह सेना को सब्जी सप्लाई करने की आड़ में गोपनीय दस्तावेज भेजता था।

रिपोर्ट्स के मुताबिक मूलरूप से बीकानेर का रहने वाला हबीब खान भारतीय सेना से कई वर्षों से कॉन्ट्रेक्ट से जुड़ा था। वह सेना के लिए सब्जियाँ सप्लाई का काम करता था। उसे पोखरण से पकड़ा गया। अब जाँच एजेंसियाँ उसके नेटवर्क का पता लगाने में जुटी हैं।

हबीब की गिरफ्तारी के बाद दिल्ली पुलिस अब आगरा के एक शख्स पर शिकंजा कसने की तैयारी कर रही है। रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच पिछले कुछ समय से हबीब खान पर नजर रखे हुए थी। मंगलवार (13 जुलाई 2021) को उसे हिरासत में लेने के बाद बुधवार को दिल्ली लाया गया। फिलहाल दिल्ली पुलिस, आईबी समेत कई एजेंसियाँ उससे पूछताछ करने में जुटी हुई हैं।

गौरतलब है कि इसी महीने की शुरुआत में पंजाब पुलिस ने ISI के लिए जासूसी करने वाले सेना के 2 जवानों को गिरफ्तार किया था। इनके पास से अहम दस्तावेज बरामद हुए थे। पंजाब पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) दिनकर गुप्ता ने बताया था, “पाकिस्तान की ISI के लिए जासूसी और उन्हें जानकारी लीक करने के आरोप में पंजाब पुलिस ने सेना के 2 जवानों को गिरफ्तार किया है। भारतीय सेना के कामकाज और तैनाती से संबंधित गोपनीय दस्तावेज उनके पास से बरामद किए गए हैं। आरोपितों ने आईएसआई के साथ 900 गोपनीय दस्तावेज साझा किए थे।”

इससे पहले कर्नाटक पुलिस और सैन्य खुफिया की दक्षिणी कमान ने पाकिस्तान के लिए जासूसी करने वाले एक अवैध नेटवर्क का खुलासा किया था। नेटवर्क से जुड़े लोग छह टेलीफोन एक्सचेंज की मदद से सैन्य प्रतिष्ठानों की सूचनाओं और सेना की गतिविधियों को अपने पाकिस्तानी आकाओं तक पहुँचाते थे।

‘अब तो बच्चे एक ही अच्छे’: राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री ने किया जनसंख्या नियंत्रण कानून का समर्थन, भड़का दारुल उलूम देवबंद

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार के जनसंख्या नियंत्रण कानून ड्राफ्ट के बाद अब कॉन्ग्रेसी राज्य राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री डॉ रघु शर्मा ने भी जनसंख्या नियंत्रण कानून का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि ‘हम दो हमारे दो’ के दिन गुजर गए हैं। अब तो ‘एक ही बच्चे अच्छे’ हैं। शर्मा ने यह कहा है कि जनसंख्या नियंत्रण के लिए अगर भारत सरकार कानून बनाएगी तो हम उसका साथ देंगे।

हालाँकि, इस मुद्दे पर राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने अब तक किसी प्रकार की कोई टिप्पणी नहीं की है। माना जा रहा है कि शर्मा द्वारा वन चाइल्ड का मुद्दा आगे चलकर गर्मा सकता है।

इस बीच इस्लामिक सुन्नी मदरसा दारुल उलूम देवबंद ने उत्तर प्रदेश सरकार के जनसंख्या नियंत्रण कानून का विरोध किया है। दारुल उलुम ने मंगलवार (13 जुलाई 2021) को दावा किया कि इस बिल से समाज के सभी वर्गों को नुकसान होगा।

मदरसे के कुलपति कासिम नोमानी ने इसे मानवाधिकारों का उल्लंघन बताते हुए कहा है कि योगी सरकार के इस बिल से दो से अधिक बच्चों वाले परिवारों को बुनियादी सुविधाओं का फायदा नहीं मिल सकेगा। जिन लोगों के दो से अधिक बच्चे होंगे वो स्थानीय स्तर पर चुनाव नहीं लड़ पाएँगे। न ही सरकारी नौकरियों में प्रमोशन मिलेगा और न तो कोई सब्सिडी मिलेगी।

दारुल उलूम देवबंद के प्रवक्ता अशरफ उस्मानी ने योगी सरकार के फैसले का विरोध करते हुए कहा है कि सोचिए जिन लोगों के तीन बच्चे होंगे तो उन बच्चों का क्या दोष है।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा जनसंख्या नियंत्रण ड्राफ्ट लाए जाने के बाद अब मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, कर्नाटक औऱ असम में भी इसको लेकर चर्चा शुरू हो गई है। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा भी इसको लेकर अपनी प्रतिबद्धता जता चुके हैं। वहीं मध्य प्रदेश में विधायक डॉ रमेश्वर शर्मा ने इसको लेकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखा है।

‘…मुझे सड़क पर न फेंके’: क्रिश्चियन कॉन्वेंट की मनमानी पर सिस्टर लूसी ने हाईकोर्ट से लगाई गुहार

रेप आरोपित बिशप फ्रैंको मुलक्कल के ख़िलाफ़ आवाज बुलंद करके चर्चा में आई सिस्टर लूसी कल्लापुरा इस समय केरल हाईकोर्ट में चल रही एक सुनवाई के कारण सुर्खियों में हैं। उन्हें हाल में उनकी मंडली फ्रांसिस्कन क्राइस्ट कॉन्ग्रेगेशन (FCC) से निष्काषित किया गया था, जिसके बाद वेटिकन कैथोलिक चर्च ने भी उनकी सुनवाई करने से मना कर दिया और उन पर कॉन्वेंट छोड़ने का दबाव बनाया जाने लगा।

सिस्टर लूसी ने अपनी आवाज केरल हाईकोर्ट में उठाई। जहाँ मामले में सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति राजाविजयराघवन ने अपना आदेश रिजर्व रखा। साथ ही उनको कॉन्वेंट छोड़ने की सलाह देते हुए कहा कि ये उनकी सुरक्षा के लिए उचित है। अगर वो ऐसा करती हैं तो उन्हें पुलिस प्रोटेक्शन भी दी जा सकती हैं। लेकिन अगर वह कॉन्वेंट में रहेंगी तो शायद उन्हें पुलिस सुरक्षा न दी जाए।

लाइव लॉ के अनुसार, कल्लापुरा ने अपना मामला लड़ने के लिए कई वकीलों को संपर्क किया लेकिन सबने उनकी अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद वह खुद आगे आईं। कोर्ट में उन्होंने कहा,

“मैं पहली बार अदालत के समक्ष पेश हुई हूँ। मैंने एक साल पहले पुलिस सुरक्षा के लिए आवेदन किया था। उसी के लिए सुनवाई हाल ही में हुई थी, और मुझे अदालत ने सुरक्षा प्रदान की थी। वर्तमान में मुझे कॉन्वेंट से बेदखल करने की कार्यवाही चल रही है। मैं इसे चुनौती दे रही हूँ क्योंकि यह अनुचित है। इस संबंध में, मैंने 2019 में दीवानी अदालत के समक्ष एक शिकायत दायर की है और मेरे पक्ष में निषेधाज्ञा (वह आज्ञा, जो कोर्ट कोई होता हुआ काम रोकने के लिए देता है।) आदेश है।”

उन्होंने कोर्ट के सामने पेश होते हुए बताया कि कॉन्वेंट को छोड़ने के बाद उनके पास कहीं जाने के लिए कोई जगह नहीं है। वह कहती हैं, “मैं महिला हूँ, न्याय के लिए लड़ने वाली नन हूँ। मेरे ननशिप के लिए जरूरी है कि मैं कॉन्वेंट में रहूँ। मैंने इसे 39 साल दिए हैं। कृपया मुझे सड़क पर न फेंके। मेरे पास कहीं और जाने की जगह नहीं है।”

सिस्टर लूसी ने कहा, “मैंने कुछ भी गलत नहीं किया है। मैंने चर्च के मूल्यों के खिलाफ जीवन नहीं जिया है। वे मुझे बाहर नहीं निकाल सकते। मुझे न्यायिक प्रणाली में विश्वास है, इसलिए मैंने व्यक्तिगत रूप से अपने मामले पर बहस करने का फैसला किया।”

सुनवाई में नन ने स्वीकार किया कि उन्हें कानूनी शब्दावली की समझ नहीं है, लेकिन वह संबंधित न्यायाधीश को अपने तर्कों को संप्रेषित करने के लिए अपनी पूरी कोशिश करेंगी। बता दें कि इसी साल जून में, वेटिकन ने FCC से सिस्टर लूसी के निष्कासन को चुनौती देने वाली तीसरी याचिका को खारिज कर दिया था। कलाप्पुरा ने कहा था कि उन्हें अपने निष्कासन के संबंध में वेटिकन से एक ताजा विज्ञप्ति मिली है। विज्ञप्ति जारी होने के बाद, एफसीसी की मदर सुपीरियर ने कलाप्पुरा को एक नोटिस भेजा था, जिसमें उन्हें कॉन्वेंट में अपना कमरा खाली करने का निर्देश दिया गया था।

श्रीराम मिथक, नक्सली हिंसा के लिए जवान जिम्मेदार… नहीं चाहिए ऐसा कहने वाले कुलपति: छात्रों का राष्ट्रपति को पत्र

आपने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से लेकर कई भाजपा समर्थकों तक को ये कहते सुना होगा कि कॉन्ग्रेस पार्टी और वामपंथियों ने पिछले 7 दशकों में ऐसे-ऐसे लोगों को भारत के अकादमिक जगत में भर दिया जो राष्ट्र विरोधी नैरेटिव को हवा देते रहे। ताज़ा मामला पहले से ही विवादित रहे मोतिहारी के महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय का है, जहाँ बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी (BHU) के प्रोफेसर तेज प्रताप सिंह (Professor TP Singh) के कुलपति की रेस में होने का विरोध शुरू हो गया है।

मोतिहारी सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी के वर्तमान कुलपति (Vice Chancellor) संजीव कुमार शर्मा की जगह कौन आएगा, इसके लिए केंद्रीय मानव संसाधन मंत्रालय ने प्रक्रिया शुरू कर दी है। पहले आवेदन मँगाए गए, जिनमें से 5 प्रमुख नाम उभर कर सामने आए। उनमें से प्रयागराज स्थित गोविंद वल्लभ (GB) पंत सोशल साइंस इंस्टिट्यूट के प्रोफेसर बद्री नारायण तिवारी का नाम भी सामने आया था।

‘हिंदुत्व का मोहिनी मंत्र’ जैसे पुस्तक लिख चुके बद्री नारायण तिवारी को हिंदुत्व की परिभाषा तक मालूम नहीं थी और छात्रों का कहना है कि उन्हें हिन्दू धर्म का अपमान करने वाला प्रोफेसर नहीं चाहिए। अब नया नाम BHU के प्रोफेसर तेज प्रताप सिंह का सामने आया है। वो राजनीतिक विज्ञान विभाग में कार्यरत हैं। साथ ही उन्हें ‘Centre for Study of Social Exclusion
& Inclusive Policy (CSSEIP)’ के संयोजक का पद भी दिया गया है।

जहाँ एक तरफ ‘The Wire’ जैसे पोर्टलों पर बैठ कर हिन्दू धर्म व दलितों को अलग-अलग कर के देखने वाले प्रोफेसर बद्री नारायण तिवारी हैं, वहीं दूसरी तरफ नक्सलवाद और दंतेवाड़ा पर रिसर्च कर चुके प्रोफेसर टीपी सिंह। लेकिन, छात्रों को समस्या उनकी रिसर्च से नहीं है, उसके कंटेंट से है। छात्रों का आरोप है कि नक्सलवाद की समस्या के लिए उन्होंने भारत के सुरक्षा बलों को भी जिम्मेदार ठहराया है।

‘चम्पारण छात्र संघ’ ने इन नियुक्तियों की संभावनाओं का विरोध करते हुए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र लिखा है। इस पत्र में राष्ट्रपति के उत्तम स्वास्थ्य की कामना करते हुए ध्यान आकृष्ट कराया गया है कि जहाँ प्रोफेसर बद्री नारायण तिवारी अपने लेखन और सार्वजनिक वक्तव्यों के जरिए बहुसंख्यक समाज नागरिकों की आस्था के केंद्र भगवान श्रीराम, मेवाड़ के महाराणा प्रताप और बहराइच में गाज़ी मियाँ का वध करने वाले राजा सुहेलदेव को मिथक की संज्ञा देते हुए उनकी तुलना फासिस्टों से की है।

पत्र के अनुसार, वहीं दूसरी तरफ लगातार अपनी शोध परियोजनाओं नक्सली हमलों एवं बर्बरता को विरोध की संज्ञा देते हुए नक्सलियों के प्रति सहानुभूति जताने वाले और बलिदानी जवानों का अपमान करने वाले प्रोफेसर तेज प्रताप सिंह हैं। निवेदन किया गया है कि जब इस विश्वविद्यालय का बुनियादी ढाँचा ही अब तक विकसित नहीं हुआ है और अधिकतर कक्षाएँ अस्थायी इमारतों में चल रही हैं, बहुसंख्यकों का अपमान करने वाले और नक्सलियों का महिमामंडन करने वाले प्रोफेसरों को कुलपति बना कर न भेजा जाए।

हमने ‘चम्पारण छात्र संघ’ से संपर्क किया तो संगठन ने कहा कि तेज प्रताप सिंह उर्फ टीपी सिंह को जानने वाले प्रत्येक व्यक्ति को पता है कि उनकी पृष्ठभूमि वामपंथी है। संगठन का कहना है कि 2014 से पहले इसे वे छिपाते भी नहीं थे लेकिन केंद्र में भाजपा की सरकार बनते हीं वे राष्ट्रवादी बन गए। आरोप है कि उन्होंने दंतेवाड़ा एवं बस्तर के नक्सलवाद, जो उनका प्रिय विषय है, पर एक प्रोजेक्ट किया है जो यूपीए सरकार के समय UGC द्वारा वित्त पोषित है।

ये भी आरोप है कि उन्होंने केंद्र सरकार, राज्य सरकार, सेना, पुलिस और अर्धसैनिक बलों की कार्रवाई को नक्सलवाद में वृद्धि का कारण बताया है। असल में महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय (MGCUB) के छात्रों को पिछले दोनों कुलपतियों के कार्यकाल में खासी परेशानी हुई है, इसीलिए अब वो किसी योग्य और राष्ट्रनिष्ठ व्यक्ति को ही इस पद पर चाहते हैं। जहाँ पहले कुलपति को विवादों के कारण इस्तीफा देना पड़ा था, अभी वाले पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं।

संघ के संयोजक विकाश जी ने कहा कि विश्वविद्यालय के सर्वांगीण विकास के लिए कुलपति के रूप में एक योग्य प्रशासक, अकादमिक अनुभव से परिपूर्ण, दूरदर्शी एवं भारतीय संस्कृति व संविधान में आस्था रखने वाले, विश्वविद्यालय के सर्वांगीण विकास एवं उत्तम शैक्षिक वातावरण के निर्माण के लिए दृढ़ संकल्पित एक कर्मयोगी शिक्षाविद की नियुक्ति की जाए। कुछ ही दिनों में नए कुलपति की घोषणा होनी है।

प्रोफेसर तेज प्रताप सिंह ने ‘द हिन्दू’ में एक लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने माओवादियों की हिंसा को ‘माओवादी आंदोलन’ बताते हुए लिखा था कि वो ‘सत्ता के खिलाफ हथियारबंद संघर्ष’ कर रहे हैं। मार्च 2013 में लिखे इस लेख में उन्होंने बार-बार माओवादी हिंसा को ‘मूवमेंट’ कहा है और दावा किया है कि भारतीय सुरक्षा बलों के जवानों की लाशों को क्षत-विक्षत न कर के वो UN के ‘जेनेवा कन्वेंशन’ का पालन करते आ रहे हैं।

उनका दावा था कि ‘जमींदारों से गरीबों को बचाने और किसानों की मदद के लिए’ ‘माओवादी आंदोलन’ का जन्म हुआ। उन्हें 2013 में नजर आया था कि ‘माओवादी आंदोलन का अपराधीकरण’ हो रहा है। जबकि सच्चाई ये है कि इस क्रूरता का भुक्तभोगी बिहार-झारखंड का समाज 90 के दशक से ही रहा है। वो माओवादी हिंसा को ‘राजनीतिक समस्या’ कहते हैं। अक्टूबर 2012 में लिखे एक लेख में उन्होंने कहा था कि माओवादी अलगाववादी नहीं हैं।

प्रोफेसर टीपी सिंह के अंतर्गत शोध कर चुके अम्बिकेश त्रिपाठी का नाम भी सामने आया है, जो MGCUB के अध्ययन विभाग में सहायक प्राध्यापक और गांधीवादी शोध केंद्र का निदेशक हैं। अपने एक फेसबुक पोस्ट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मजाक बनाते हुए उन्होंने लिखा था, “एक जगह बोर्ड लगा था PM बनने का तरीका सीखें मात्र 100 रुपए में। मई अंदर गया तो देखा कि वो चाय बनाना सीखा रहे थे।”

प्रोफेसर टीपी सिंह के अंतर्गत शोध कर चुके अम्बिकेश त्रिपाठी का फेसबुक पोस्ट

अब देखना ये है कि छात्रों, बुद्धिजीवियों और युवाओं के विरोध को देखते हुए क्या भगवान श्रीराम, महाराणा प्रताप और सुहेलदेव को मिथक बताने वाले प्रोफेसर बद्री नारायण तिवारी या फिर नक्सलियों की हिंसा पर पर्दा डालने वाले प्रोफेसर तेज प्रताप सिंह को मोतिहारी के ‘महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय (MGCUB)’ का कुलपति बनाया जाता है या नहीं। अकादमिक जगत में वामपंथियों के बोलबाला से छात्र नाखुश हैं, ये स्पष्ट है।

कृष्ण मंदिर तोड़ने वाले 350 दंगाइयों पर नहीं चलेगा केस: पाकिस्तानी हुकूमत का फैसला, कहा- हिंदुओं ने ‘माफ’ किया

पाकिस्तान खैबर पख्तूनख्वा क्षेत्र के कराक जिले में सात महीने पहले कट्टरपंथी इस्लामिस्टों ने कृष्ण द्वार मंदिर जला दिया था। घटना के इतने महीने बीतने के बाद अब पाकिस्तान की खैबर पख्तूनख्वा सरकार ने सभी 350 आरोपितों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने का फैसला किया है।

पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, खैबर पख्तूनख्वा सरकार ने दावा किया है कि हिंदू समुदाय ने पिछले साल सदियों पुराने मंदिर को जलाने के मामले में माफी दे दी थी। इसके बाद इन मामलों को वापस लिया गया है।

पिछले साल 30 दिसंबर 2020 को कराक जिले की टेरी यूनियन काउंसिल स्थित कृष्ण द्वार मंदिर पर सैकड़ों की संख्या में कट्टरपंथियों ने हमला कर दिया था। उन्मादी मुस्लिम भीड़ ने पहले मंदिर में आग लगा दी औऱ फिर उसे हथौड़ों से तोड़ डाला। उस दौरान इस कृत्य में शामिल करीब 109 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया था। साथ ही उस दौरान ड्यूटी पर मौजूद पुलिस अधीक्षक और पुलिस उपाधीक्षक सहित 92 पुलिस अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया था।

इसी साल मार्च, 2021 में ऐसी खबरें सामने आई थीं कि पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा क्षेत्र में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय ने कृष्ण द्वार मंदिर तोड़ने में शामिल रहे सैकड़ों कट्टरपंथी इस्लामवादियों को कथित तौर माफ करने का फैसला किया था। खैबर पख्तूनख्वा सरकार ने दावा किया था कि वहाँ के हिंदू समुदाय के लोगों ने मुस्लिम मौलवियों और स्थानीय नेताओं के साथ बैठक करने के बाद कोर्ट से इतर होकर इस मुद्दे को सुलझा लिया था। इसके तहत उन्होंने उस उन्मादी भीड़ को माफ करने का निर्णय लिया।

इसके बदले में कथित तौर पर मुस्लिम मौलवियों ने भी हिंदुओं को किसी भी तरह की अप्रिय घटना से बचाने औऱ उनके संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने का वादा किया था। मंदिर को ध्वस्त करने वाले आऱोपितों ने कथित तौर पर हिंदुओं से माफी भी माँगी थी।

आपस में ही मामले को सुलझाने के बाद बीते 13 मार्च 2021 को हिंदू और मुस्लिम दोनों पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय को एक पत्र भेजकर मामले के सभी आरोपितों को रिहा करने का अनुरोध करने को लेकर सहमत हुए थे। अब खैबर पख्तूनख्वा सरकार ने 350 से अधिक आरोपितों पर दर्ज सभी केसों को वापस लेने का फैसला लिया है।

पाकिस्तान के गृह मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से पीटीआई ने कहा कि हिंदुओं के जिरगा में जाने और सभी आरोपितों को माफ करने के फैसले के बाद हिंदू और मुस्लिम समुदाय के बीच विवाद के सभी मुद्दों को सुलझा लिया गया है। आंतरिक विभाग ने इस पर विचार किया। इसी मामले पर विचार करने के बाद पाकिस्तान के गृह मंत्रालय ने आतंकवाद विरोधी न्यायालय को एक पत्र भेजा है। इसी के आधार पर सरकार ने सभी मामले वापस वापस लेने का फैसला किया है।

हिंदू समुदाय फैसले से निराश

खैबर पख्तूनख्वा सरकार द्वारा आरोपितों के खिलाफ दर्ज सभी केसों को वापस लेने के फैसले के बीच वहाँ रह रहे हिंदू समुदाय ने नाराजगी जाहिर की है। पाकिस्तान के हिंदुओं का कहना है कि सरकार द्वारा मंदिर के पुनर्निर्माण को लेकर आश्वासन देने के बावजूद इसमें देरी की जा रही है। अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय से आने वाले धार्मिक विद्वान और खैबर पख्तूनख्वा के मानवाधिकार कार्यकर्ता हारून सरब दियाल ने कहा है कि वो शांति और अंतरधार्मिक सद्भाव के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन सरकार ने जिरगा संस्कृति के खिलाफ जाकर इन मामलों को वापस लिया है।

निराशा जाहिर करते हुए दियाल ने कहा है कि पाकिस्तान की तहरीक-ए-इंसाफ नेशनल असेंबली के सदस्य और पाकिस्तान हिंदू काउंसिल के अध्यक्ष डॉ रमेश के वंकवानी को छोड़कर किसी भी स्थानीय हिंदू समुदाय को विश्वास में नहीं लिया गया है।

इस्लामवादियों ने पाकिस्तान में हिंदू मंदिर तोड़ा

30 दिसंबर, 2020 को सैकड़ों की संख्या में कट्टरपंथी इस्लामिस्टों ने की टेरी यूनियन काउंसिल स्थित कृष्ण द्वार मंदिर पर हमला करके उसे जला दिया था। इस वारदात को अंजाम एक स्थानीय मौलवी और जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम पार्टी (फ़ज़ल उर रहमान समूह) के नेतृत्व में दिया गया था। कट्टरपंथियों ने पहले इमारत को जलाया और उसके बाद उसे हथौड़ों से तोड़ दिया।

इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गय़ा था, जिसमें यह दिखाया गया था कि किस तरह से दंगाइयों की भीड़ ने मंदिर को घेर लिया और तोड़फोड़ की। खास बात यह है कि जिस दौरान कट्टरपंथियों ने इस वारदात को अंजाम दिया उस दौरान कथित तौर पर वहाँ जिला प्रशासन के अधिकारी भी उपस्थित थे।

बताया जाता है कि इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1919 में गुरु श्री परमहंस दयाल को दफनाने के बाद किया गया था। हालाँकि, वर्ष 1947 में देश आजाद होने के बाद मुस्लिमों ने इस मंदिर को बंद कर दिया था। कृष्ण द्वार मंदिर साल 2015 में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने इसे खोलने का आदेश दिया था। हालाँकि, कट्टरपंथियों ने इसे फिर से गिरा दिया।

पाकिस्तान में हिंदू अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों के खिलाफ दुर्भाग्यपूर्ण कार्य का पाकिस्तान समेत दुनिया के तमाम मानवाधिकार कार्यकर्ताओं ने कड़ी आलोचना की थी। भारत ने भी कट्टरपंथी इस्लामियों की घृणित कृत्य का कड़ा विरोध किया था। कूटनीतिक माध्यमों के जरिए पाकिस्तान के सामने इसको लेकर चिंता भी व्यक्त की गई थी।

इतना ही नहीं भारत ने भी संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की सरकार को भी आड़े हाथों लेते हुए कहा था कि जब एक ऐतिहासिक हिंदू मंदिर पर हमला हुआ तो देश की कानूनी एजेंसियाँ हाथ पर हाथ धरे बैठी रहीं।

‘नादान परिंदे घर आ जा’: गोवा में फ्री की बिजली बॉंट रहे केजरीवाल, दिल्ली हुई पानी-पानी

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इस समय चुनावी राज्यों के दौरे कर मुफ्त की रेवड़ी बाँटने की राजनीति में व्यस्त हैं। इसी कड़ी में पंजाब, उत्तराखंड के बाद अब उन्होंने गोवा में आम आदमी पार्टी (AAP) की सरकार बनने पर 300 यूनिट फ्री बिजली देने का वादा किया है। दूसरी तरफ मॉनसून की झमाझम बारिश की वजह से दिल्ली का हाल बेहाल है। सड़कों पर जलजमाव की वजह से लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

इसको लेकर पूर्व क्रिकेटर और पूर्वी दिल्ली से बीजेपी सांसद गौतम गंभीर ने केजरीवाल पर अपरोक्ष रूप से कटाक्ष किया है। उन्होंने जलजमाव के बीच गुजरते वाहनों की तस्वीर ट्वीट कर हैशटैग गोवा के साथ लिखा है, “नादान परिंदे घर आ जा!”

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार भारी बारिश की वजह से जगह-जगह दिल्ली में जलजमाव है। इसके कारण सड़क से गुजरना मुश्किल हो गया है। कई जगहों पर लंबे ट्रैफिक जाम की खबरें हैं। दूसरी ओर इन सबसे दूर केजरीवाल गोवा में हैं। राज्य में 2022 में विधानसभा चुनाव होने हैं। उन्होंने बीजेपी और कॉन्ग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा, “गोवा सुंदर है। लेकिन यहाँ राजनीति खराब है। बीजेपी और कॉन्ग्रेस ने मिलकर गोवा की जनता को धोखा दिया है।” उन्होंने कहा, “आप की सरकार बनी तो हर महीने 300 यूनिट तक बिजली फ्री दी जाएगी। पुराने बिजली बिल माफ किए जाएँगे। 24 घंटे की बिजली आपूर्ति मिलेगी और किसानों को खेती के लिए मुफ्त बिजली मिलेगी।”

पिछले दिनों केजरीवाल जब उत्तराखंड के दौरे पर थे तो वहाँ भी इसी तरह राज्य में आप की सरकार बनने पर 300 यूनिट तक फ्री बिजली का वादा किया था। साथ ही पंजाब में भी वे इस तरह के वादे कर चुके हैं। इन दोनों राज्यों में भी अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं।

‘आदिवासियों के धर्मांतरण को लेकर लगातार काम कर रहे ईसाई मिशनरी’: सुकमा के SP ने किया अलर्ट

छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में पुलिस अधीक्षक (एसपी) ने सभी थाना प्रभारियों को आदिवासी इलाकों में ईसाई मिशनरियों और धर्मांतरित आदिवासियों की गतिविधियों पर नजर रखने के सख्त निर्देश दिए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, ईसाई मिशनरियों द्वारा नियमित रूप से आदिवासी इलाकों में जाकर लोगों को धर्मांतरण का लालच दिया जा रहा है। इसको लेकर सुकमा के पुलिस अधीक्षक ने जिले के सभी पुलिस थाना अधिकारियों को मिशनरियों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए हाई अलर्ट पर रखा है।

सुकमा के एसपी सुनील शर्मा ने सर्कुलर में कहा है, “ईसाई मिशनरी आदिवासी को धर्म परिवर्तन के लिए राजी करने के लिए जिले के कई क्षेत्रों में नियमित रूप से कार्य कर रहे हैं। इसके चलते स्थानीय आदिवासियों और धर्मांतरित ईसाइयों के बीच संघर्ष की स्थिति से इनकार नहीं किया जा सकता है।”

गौरतलब है कि कई आदिवासी इलाकों में मिशनरियों और आदिवासियों के बीच संघर्ष एक बड़ा मुद्दा है। साथ ही दूरदराज के इलाकों में नौकरी, पैसा, भोजन और अन्य तरह का लालच देकर आदिवासियों को ईसाई धर्म के प्रति लुभाने की खबरें अक्सर आती रहती हैं।

न्यू इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, एसपी ने जिला अधिकारियों को खुफिया तंत्र को अलर्ट पर रखने का निर्देश जारी किया है। सर्कुलर में कहा गया है, “जिले में रहने वाले ईसाई मिशनरियों और धर्मांतरित आदिवासियों की गतिविधियों पर लगातार नजर रखें और अगर उनका कोई भी कार्य संदिग्ध लगे तो तत्काल इसकी रिपोर्ट करें।”

मीडिया से बात करते हुए पुलिस अधिकारी ने कहा कि आसपास के कुछ जिलों से हमें धर्म परिवर्तन के कारण संघर्ष की सूचना मिली थी। इइसे देखते हुए खुफिया तंत्र को अलर्ट कर किया गया है ताकि सुकमा में ऐसी स्थिति उत्पन्न न हो और सामाजिक सद्भाव कायम रहे। शर्मा ने अपने अधीनस्थ पुलिस अधिकारियों को खुफिया तंत्र के माध्यम से धर्म परिवर्तन की गतिविधियों पर नजर रखने और जानकारी जुटाने का निर्देश दिया है। उन्होंने कहा कि सभी को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार है।

हालाँकि, सुकमा एसपी के ताजा आदेश ने ने ईसाई संगठनों को नाराज कर दिया है। छत्तीसगढ़ क्रिश्चियन फोरम के अरुण पन्नालाल ने कहा है, “जिले के अधिकारियों से नागरिकों के संवैधिानिक अधिकारों की रक्षा की उम्मीद की जाती है न कि उसे दरकिनार करने की। बिना किसी जाँच के IPS अधिकारी कैसे निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि ईसाई मिशनरी धर्म परिवर्तन में शामिल हैं? हर भारतीय को किसी भी स्थान पर जाने और अपनी आस्था का पालन करने का अधिकार है।”

पन्नालाल ने पूछा है कि अधिकारी के पास अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए कोई आँकड़े हैं? क्या वे बता सकते हैं पिछले दो दशक में मिशनरियों ने कितने आदिवासियों का धर्मांतरण करवाया है या उन्हें इसके लिए लालच दी है? उन्होंने इसे नफरत फैलाने का एक प्रयास करार दिया। ईसाई संगठनों का यह भी आरोप है कि आदिवासी बहुल बस्तर में उनके समुदाय के लोगों को बार-बार प्रताड़ित किया जाता है।

नौकरी सरकार की, चाकरी आतंकियों की: हिजबुल सरगना सलाहुद्दीन के दोनों बेटे कर रहे थे फंडिंग, हटाने पर बिफरीं महबूबा

भारत में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने में लगा हिजबुल मुजाहिदीन का सरगना मोहम्मद यूसुफ शाह उर्फ सैयद सलाहुद्दीन फ़िलहाल पाकिस्तान में छिप कर बैठा हुआ है। वहीं सरकारी नौकरी में उसके दोनों बेटे जम्मू कश्मीर में हवाला के जरिए वित्त जुटा कर गिरोह का भरण-पोषण करने में लगे थे। बिना हथियार उठाए उन्होंने कई कश्मीरी युवकों से बंदूक उठवा दिया और आतंकी हमलों के लिए वित्त भी मुहैया कराया।

ये दोनों लगातार अपने अब्बा और आतंकी संगठन के एजेंडों को आगे बढ़ाने में लगे थे। सलाहुद्दीन के दोनों बेटों सैयद अहमद शकील व शाहिद यूसुफ उन 11 कर्मचारियों में शामिल हैं, जिन्हें राष्ट्रद्रोह का आरोप लगा कर नौकरी से बाहर का रास्ता दिखाया गया है। सलाउद्दीन NIA की मोस्ट वॉन्टेड लिस्ट में शामिल तो है ही, अमेरिका ने भी उसे ग्लोबल आतंकी घोषित कर रखा है। वो 1990 में ही पाकिस्तान भागा था।

ऐसा नहीं है कि सुरक्षा व ख़ुफ़िया एजेंसियों में उसके दोनों बेटों की हरकतों की जानकारी नहीं थी, बल्कि जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद-370 हटने से पहले जिन राजनीतिक दलों का राज था, उनका उन्हें संरक्षण प्राप्त था। उसके खिलाफ सबूत भी थे, लेकिन कार्रवाई के लिए भेजी गई फाइलों को दबाया जाता रहा। सैयद अहमद शकील शेरे कश्मीर आयुर्विज्ञान संस्थान (सौरा) में 1990 के दौरान चोर दरवाजे से बतौर लैब टेक्नीशियन तैनात किया गया था। 

उसने 6 आतंकियों का वित्तीय पोषण किया। वहीं सलाहुद्दीन का दूसरा बेटा शाहिद यूसुफ भी चोर दरवाजे से ही वर्ष 2007 में कृषि विभाग में नियुक्त हुआ था। उसने 9 बार हवाला से रुपए जुटाए। शाहिद युसूफ अपने अब्बा का गलत नाम लिख कर दुबई भी गया था। वो उत्तर कश्मीर के आतंकी नजीर अहमद कुरैशी से भी दुबई मिला था। टेरर फंडिंग मामले में जाँच के बाद सुरक्षा एजेंसियों को पता चला।

शाहिद को एजाज अहमद बट्ट से भी रुपए मिल रहे थे। एजाज बट्ट उसके अब्बा सलाहुद्दीन का करीबी है। शाहिद उससे फंड्स प्राप्त करने के लिए विभिन्न पहचान पत्रों का इस्तेमाल कर रहा था। एजाज भी 1990 में पाकिस्तान भागा था और वहीं से आतंकियों की फंडिंग करता है। इन दोनों पर सरकारी सेवा में रहते राष्ट्र के खिलाफ युद्ध की साजिश का आरोप है। चूँकि ये सरकारी कर्मचारी थे, ये आसानी से ये सब कर रहे थे।

इन दोनों को बरखास्त किए जाने के विरोध में जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने भी बयान दिया है। उनका कहना है कि पिता के गुनाहों की सज़ा बेटों को कैसे दी जा सकती है, जब कोई जाँच ही नहीं हुई। सच्चाई ये है कि दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल से लेकर NIA तक की जाँच में उनकी करतूतें पता चल गई थीं। साथ ही उन्होंने 11 कर्मचारियों को निकाले जाने के फैसले को भी ‘आपराधिक’ करार दिया। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति को बंधक बनाया जा सकता है, पर विचारों को नहीं।

बिजनेस स्टैंडर्ड ने लद्दाख में भारत-चीन के बीच फिर से करवा दी झड़प, सेना ने खोली झूठ की पोल

भारतीय सेना ने बुधवार (जुलाई 14, 2021) को बयान जारी कर बिजनेस स्टैंडर्ड (Business Standard) की एक रिपोर्ट को निराधार बताया। इस रिपोर्ट में कहा गया था कि पूर्वी लद्दाख में एक बार फिर भारतीय सेना और चीनी फौजियों के बीच झड़प हुई है।

उक्त मीडिया रिपोर्ट को फर्जी बताते हुए सेना ने कहा, “गलवान या किसी इलाके में दोनों ओर से कोई झड़प नहीं हुई है।” बयान में रिपोर्ट लिखने वाले पत्रकार की मंशा को दुर्भावनापूर्ण करार देते हुए कहा गया कि खबर का तथ्यों से कोई वास्ता नहीं है। बयान में कहा गया है, “आर्टिकल गलतियों और फर्जी जानकारी से भरा हुआ है। रिपोर्ट में लिखी गई ये बात कि चीन के साथ समझौता तोड़ा गया, बिलकुल गलत और फर्जी है।”

बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित रिपोर्ट

भारतीय सेना के बयान में कहा गया है कि इस साल फरवरी में जिन इलाकों से सेना को हटाया गया था, उस पर कब्जा करने के लिए किसी भी पक्ष की ओर से कोई प्रयास नहीं किया गया। बयान में बताया गया कि दोनों पक्षों की ओर से शेष मुद्दों को हल करने के लिए बातचीत की जा रही हैऔर संबंधित क्षेत्रों में नियमित गश्त जारी है। जमीन पर स्थिति अभी भी शांत बनी हुई है। भारतीय सेना लगातार पीएलए की गतिविधि पर नजर बनाए हुए हैं। सेना के मुताबिक प्रकाशित लेख अपुष्ट तथ्यों पर आधारित है और इसका वह कड़ा खंडन करते हैं।

उल्लेखनीय है बिजनेस स्टैंडर्ड में छपी अजय शुक्ला की रिपोर्ट में लिखा गया था कि पूर्वी लद्दाख में सीमा पर दोबारा झड़प हुई। उन्होंने सूत्रों के हवाले से कहा था कि दोनों पक्षों में कम से कम एक बार झड़प हुई है। लेख का दावा था कि इस बार भी झड़प की जगह वही है जहाँ पिछले साल दोनों पक्ष आमने-सामने आए थे।

लेख में सैन्य स्रोतों का हवाला देते हुए दावा किया गया था कि चीन ने कम से कम एक या संभवत: 2 एस-400 एयर डिफेंस मिसाइल के रेजीमेंट को तैनात किया है जो वायुशक्ति में भारत की श्रेष्ठ हवाई ताकत को नष्ट कर देगा।

राहुला गाँधी ने शेयर की थी

भारतीय सेना द्वारा पूरी तरह से खारिज कर दिए गए इस लेख को कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने भी साझा किया था। गाँधी ने एक ट्वीट में बिजनेस स्टैंडर्ड में प्रकाशित लेख की तस्वीर साझा की और कहा कि भारत सरकार की विदेश और रक्षा नीति ने देश को कमजोर किया है।

हैरानी की बात ये है कि भारतीय सेना द्वारा लेख में किए गए दावों का कड़ा खंडन करने के बाद भी, गाँधी ने लेख को अपनी वॉल पर सजे रहने दिया है। हालाँकि, यह पहली बार नहीं है जब राहुल गाँधी ने बिना तथ्यों को जाने झूठ फैलाने में अपना योगदान दिया। इससे पहले राहुल गाँधी राफेल सौदे में भारत सरकार पर बेबुनियाद आरोप लगा चुके हैं, वो भी तब जब सुप्रीम कोर्ट इस मामले में क्लीनचिट दे चुकी है।