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शुक्र है PM मोदी हैं! पब्लिक की होगी फ्री वैक्सीनेशन, प्रोपेगेंडा के नए टीके की तलाश में विपक्ष

पिछले करीब एक वर्ष में कोरोना के खिलाफ देश की लड़ाई में वैक्सीन और वैक्सीनेशन एक ऐसा विषय रहा जिस पर बहस, विमर्श और दुष्प्रचार आवश्यकता से अधिक हुआ। जिस पर राष्ट्र के संघीय ढाँचे से सम्बंधित राजनीति, शासन प्रणाली, नेतृत्व क्षमता, अनावश्यक प्रश्न और प्रोपेगेंडा ने लगभग पूरे देश को उलझाए रखा। विशेषज्ञों के क्षेत्रों में गैर विशेषज्ञों के अति ज्ञान से लेकर बेवकूफी तक के दर्शन हुए। वैज्ञानिकों की बातों को तमाम लोग अवैज्ञानिक तरीके से काटते नजर आए।

विशेषज्ञों द्वारा लिए गए चिकित्सा और स्वास्थ्य सम्बन्धी निर्णयों पर गैर विशेषज्ञ से लेकर पढ़े-लिखे बेवकूफ प्रश्न करते बरामद हुए। सरकार द्वारा गठित समितियों के निर्णयों को किसी एक व्यक्ति पर थोपने की कोशिश की गई। तमाम विषयों पर राज्य सरकारों के नेतृत्व पेंडुलम की तरह झूलते नज़र आए। महामारी काल में भी विपक्ष की राजनीति को बिना किसी हिचक के विरोध की राजनीति में बदलते देखा गया। प्रोपेगेंडा के अलग स्तर दिखाई दिए। 

‘सरकार वैक्सीन को इतनी जल्दी क्यों लाना चाहती है’ या ‘हम वैक्सीन को लेकर इतने जल्दी में क्यों हैं’, जैसे प्रश्न से शुरू होकर ‘सरकार ने हमारे बच्चों की वैक्सीन विदेशों को क्यों बेंच दी’, तक की दूरी तय करने में कुछ व्यक्तियों, संस्थाओं, बुद्धिजीवियों, मीडियाकर्मियों और राजनेताओं को छह महीने भी नहीं लगे। ‘हम देश में बनी वैक्सीन नहीं लगवाएँगे’ से शुरू होकर ‘मोदी जी हमें वैक्सीन नहीं दे रहे हैं’ तक की दूरी बमुश्किल पाँच महीने में तय कर ली गई।

‘मोदी जी वैक्सीन बनाने वाले अपने कैपिटलिस्ट मित्रों को फायदा पहुँचाने के लिए देश की गरीब जनता के साथ धोखा कर रहे हैं’ से लेकर ‘मोदी जी ने हमारी वैक्सीन पहले देशवासियों को क्यों नहीं दी’, तक पहुँचने में नेताओं को ढाई महीने भी नहीं लगे। ‘विदेशी वैक्सीन निर्माताओं से राज्य सरकारें खुद वैक्सीन खरीदेंगी’ कहने से लेकर ‘हमारे राज्य विदेशी वैक्सीन निर्माताओं के सामने वैक्सीन के लिए लड़ रहे हैं, ये क्या अच्छा लगता है?’ कहने में डेढ़ महीने नहीं लगे। ‘राज्य सरकारों को अपने निर्णय लेने का अधिकार मिले’ से ‘केंद्र सरकार सब कुछ वापस अपने हाथ में ले’ कहने में विपक्षी मुख्यमंत्रियों को एक महीना भी नहीं लगा। 

आवश्यकता थी प्रधानमंत्री के बोलने की इसलिए वे बोले। आवश्यकता इसलिए थी कि राज्य सरकारें केंद्र के वैक्सीनेशन प्रोग्राम के विरोध में सुप्रीम कोर्ट तक जाने से लेकर वैक्सीन की कमी के लिए केंद्र सरकार को दोषी बताने तक, सब कुछ आजमा चुकी पर वैक्सीनेशन को लेकर उनकी अपनी जिम्मेदारियों की बात कहीं नहीं हो रही थी। जब केंद्र सरकार ने इस विषय में राज्य सरकारों को वैक्सीन खरीदने और वैक्सीनेशन प्रोग्राम खुद लागू करने का अधिकार दिया तब इन्होने उसे सहर्ष स्वीकार किया था। भारतीय वैक्सीन निर्माताओं द्वारा राज्य सरकारों को वैक्सीन की कोट की गई कीमत को लेकर भी प्रश्न उठाए गए। प्रश्न यह था कि ये वैक्सीन निर्माता केंद्र सरकार से जो दाम ले रहे हैं उसी दाम में वैक्सीन राज्य सरकारों को क्यों नहीं मिलनी चाहिए? यह बात और है कि दिल्ली में अधिकतर वैक्सीन निजी अस्पतालों में लगाईं गई, जहाँ ऐसी कीमतें वसूल की गई जो खरीद मूल्य से बहुत अधिक थी। पंजाब सरकार ने तो बाकायदा नियम बनाकर वैक्सीन निजी अस्पतालों को मुनाफे में बेंची और इसके विरुद्ध शोर मचाए जाने पर अस्पतालों से वैक्सीन वापस ले ली।

विपक्षी नेताओं, केंद्र सरकार विरोधी मीडिया, इकोसिस्टम और कार्टूनों तक ने वैक्सीन के विरुद्ध एक माहौल बनाया। उसी का असर है कि तमाम ग्रामीण और शहरी इलाकों में वैक्सीन के प्रति आज भी एक तरह का डर है। छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री, समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव और कई कॉन्ग्रेसी नेता वैक्सीन के प्रति भ्रम फैलाते नज़र आए। साथ ही एक इकोसिस्टम ने विदेशी वैक्सीन की एंट्री को मँजूरी के लिए माहौल तैयार करने की कोशिश की, बिना यह सोचे कि केंद्र सरकार पहले से ही विदेशी निर्माताओं और उनके भारतीय सहभागियों के संपर्क में थी। जब सरकार ने विदेशी वैक्सीन के आयात की इजाजत दी तो एक तरह से राज्य सरकारों और इस इकोसिस्टम की बाँछें खिल गई।

राज्य सरकारों ने शायद यह अनुमान लगाया था कि दुनिया भर के वैक्सीन निर्माता बहुत बड़े स्टॉक लेकर बैठे हैं और ये ग्लोबल टेंडर फ्लोट करके उनसे बिड मँगवा कर वैक्सीन खरीद लेंगे। पर बीस दिन में ही निर्णयों को लेकर स्वतंत्रता की उनकी यह माँग जब उन पर भारी पड़ने लगी तब यह कसमसाहट भी शुरू हो गई कि कैसे केंद्र को सब कुछ वापस अपने हाथ में लेने के लिए माहौल बनाया जाए। इन सरकारों की सोच दर्शाती है कि विषय को लेकर उनकी समझ और तैयारी किस स्तर की थी।

अब जबकि केंद्र सरकार ने वैक्सीन की खरीद और राज्य सरकारों को मुहैया कराने की जिम्मेदारी खुद ले ली है, वैक्सीनेशन प्रोग्राम के सुचारु रूप से वापस पटरी पर आने की संभावना है। राज्य सरकारें अपनी भूमिका वैसे ही निभाएँगी जैसा उन्हें निभाना चाहिए? क्या अब राज्य सरकारों को या विपक्ष को केंद्र सरकार, उसके स्वास्थ्य मंत्रालय या प्रधानमंत्री से शिकायत नहीं रहेगी? इस प्रश्न का उत्तर समय देगा।

केंद्र सरकार के इस निर्णय को लेकर जिस तरह से क्रेडिट लेने और देने की होड़ मची हुई है, वह दर्शाता है कि ऐसे निर्णयों को या ऐसी घोषणा का विपक्ष या मोदी विरोधियों के लिए क्या महत्व है। वैसे भी, अभी तो घोषणा को चौबीस घंटे भी नहीं हुए हैं। ऐसे में विपक्ष की असली प्रतिक्रियाएँ जानने के लिए उसे थोड़ा और समय देना आवश्यक है। अभी तो विरोध के नए तरीके खोजे जा रहे होंगे। नया स्क्रीनप्ले लिखा जा रहा होगा। उसके क्रियान्वन को लेकर ब्रेन स्टॉर्मिंग की जाएगी और फिर पता चलेगा कि देशवासियों के हितों के लिए चिंतित लोग उन हितों की रक्षा में क्या करते हैं।

वैसे जाते-जाते मेरा भी एक प्रश्न है; ये अदार पूनावाला को धमकी किसने दी थी?

क्रैश हुए Amazon सहित दुनिया भर के कई बड़े वेबसाइट्स: NYT और BBC जैसे न्यूज़ पोर्टल्स भी नहीं हो रहे ओपन

कुछ अंतरराष्ट्रीय न्यूज़ पोर्टल्स सहित कई अंतरराष्ट्रीय वेबसाइट्स भारत सहित दुनिया भर में नहीं खुल रहे हैं। VPN से भी ये साइट्स नहीं खुल रहे। क्लाउड वेबसाइट में समस्या को इसका कारण बताया जा रहा है। ताज़ा सूचना मिलने तक ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’, ‘द गार्डियन’ और BBC जैसे इंटरनेशनल वेबसाइट्स भारत में ओपन नहीं हो पा रहे हैं। असल में दुनिया भर में कई बड़े वेबसाइट नहीं खुल रहे हैं।

साथ ही ‘स्टैक ओवरफ्लो’ जैसे वेबसाइट्स भी नहीं खुल रहे हैं, जिनका छात्र उपयोग करते हैं। पता चला है कि पूरी दुनिया में कई अंतरराष्ट्रीय वेबसाइट्स क्रैश हो गए हैं, जिनमें यूके सरकार की वेबसाइट से लेकर Amazon और Reddit भी क्रैश हो गए। इसे इंफ्रास्ट्रक्चर की समस्या बताई जा रही है। माना जा रहा है कि क्लाउड कम्प्यूटिंग सर्विस Fastly के डाउन होने से ये समस्या आई है।

हमने जब ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ वेबसाइट खोली तो उस पर ‘Fastly error: unknown domain: www.nytimes.com. Details: cache-del21741-DEL’ लिखा आया।

NYT खोलने पर आ रहा ये मैसेज

इसी तरह BBC की वेबसाइट खोलने पर Error 503 Service Unavailable Service Unavailable Guru Mediation:Details: cache-bom4744-BOM 1623147144 898530852 Varnish cache server’ लिखा आ रहा है। सिर्फ न्यूज़ पोर्टल्स ही नहीं, कई अंतरराष्ट्रीय वेबसाइटें भी नहीं खुल रही हैं।

बंगाल ने नहीं दी कोरोना से अनाथ हुए बच्चों की जानकारी: SC ने ममता सरकार को फटकारा, पूछा – ‘सिर्फ आपको ही कन्फ्यूजन क्यों?’

सुप्रीम कोर्ट में कोरोना से अनाथ हुए बच्चों की देखभाल और चिल्ड्रन शेल्टर होम्स को कोरोना संक्रमण से बचाने के लिए व्यवस्था करने की दिशा में आगे बढ़ने के मुद्दे पर सुनवाई हो रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्वतः संज्ञान लेकर इस मुद्दे को उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों को आदेश दिया था कि कोरोना के कारण अनाथ हुए बच्चों के विवरण जुटा कर NCPCR (राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग) के पोर्टल पर अपलोड करें। पश्चिम बंगाल सरकार ने अब तक ऐसा नहीं किया है।

सुप्रीम कोर्ट ने तृणमूल कॉन्ग्रेस की सरकार से कहा कि वो उसके पिछले आदेश का पालन करते हुए इस कार्यवाही को पूरी करे, ताकि जिन बच्चों को सुरक्षा और केयर की ज़रूरत है, उन्हें सुविधा उपलब्ध कराई जा सके। पश्चिम बंगाल के वकील को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वो अपने अधिकारियों से अनाथ बच्चों की जानकारी जुटाने के लिए कहे और उन्हें त्वरित रूप से NCPCR के पोर्टल पर अपलोड करे।

मार्च 2020 के बाद अनाथ हुए बच्चों के सम्बन्ध में ये फैसला सुनाया गया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सभी राज्यों ने उसके आदेश को मानते हुए व्यवस्थित रूप से सूचनाओं को अपलोड किया है, लेकिन एक पश्चिम बंगाल सरकार ही है जिसे ये आदेश अब तक समझ में ही नहीं आया। साथ ही फटकार लगाते हुए कहा कि सरकार कन्फ्यूजन वाला बहाना न बनाए क्योंकि जब सारे राज्यों ने आदेश का पालन किया है, केवल बंगाल के लिए कन्फ्यूजन कैसे हो सकता है?

साथ ही ये भी आदेश दिया कि पश्चिम बंगाल सरकार न सिर्फ सूचनाओं को अपलोड करे, बल्कि अनाथ बच्चों के लिए चल रही योजनाओं का लाभ उन तक पहुँचाए और अगले आदेश के बिना ही ये सब हो जाना चाहिए। इन सूचनाओं को कुल 6 स्टेज में NCPCR को सौंपना है, जिनमें से दो चरण तत्काल में पूरे किए जाएँगे। शीर्षतम अदालत ने माना कि बाकी की प्रक्रिया में समय लग सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु को भी विशेष निर्देश दिए।

उसने राज्य से कहा कि वहाँ फ़िलहाल कोरोना पॉजिटिविटी रेट बहुत ज्यादा है, ऐसे में वहाँ विभिन्न संस्थाओं को इस काम में लगा कर डेटा जुटाए जाने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सलाह लेने के लिए Amicus Curiae वकील भी नियुक्त किया, जिन्होंने राय दी कि ऐसे बच्चों की परवरिश व शिक्षा के लिए वित्तीय मदद के अलावा अन्य पहलू भी ध्यान में रखे जाने चाहिए। उन्होंने सलाह दी कि RTE (शिक्षा का अधिकार) एक्ट के तहत इन बच्चों की शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था सरकारी/प्राइवेट स्कूलों में कराई जानी चाहिए।

बताते चलें कि इस विषय को लेकर केंद्र सरकार भी गंभीर है। कोरोना महामारी में माता-पिता गँवाने वाले बच्चों की ‘पीएम केयर्स फॉर चिल्ड्रेन’ योजना के तहत मदद की जाएगी। इसके तहत अनाथ बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जाएगी और उनका 5 लाख रुपए का स्वास्थ्य बीमा भी किया जाएगा। ऐसे बच्चों को 18 साल की उम्र से मासिक भत्ता (स्टाइपेंड) और 23 साल की उम्र में पीएम केयर्स से 10 लाख रुपए का फंड मिलेगा। सरकार ऐसे बच्चों के लिए निशुल्क शिक्षा सुनिश्चित करेगी।

सेंट्रल विस्टा परियोजना से हर साल होगी ₹1000 करोड़ की बचत: रिपोर्ट्स

केंद्र सरकार की सेंट्रल विस्टा परियोजना को लेकर चल रहे विवाद के बीच आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय के एक अधिकारी ने बताया है कि इस परियोजना से हर साल 1000 करोड़ रुपए की बचत होगी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, केंद्र सरकार दिल्ली में विभिन्न मंत्रालयों के दफ्तरों के किराए पर सालाना करीब ₹1000 करोड़ खर्च करती है। ऐसे में सेंट्रल विस्टा परियोजना के तहत न केवल आधुनिक तकनीक से लैस, भूकंपरोधी, तीन गुना बड़ा और खूबसूरत भवन मिलेगा, बल्कि एक ही परिसर से केंद्र सरकार के सभी 51 मंत्रालय संचालित होंगे।

उन्होंने कहा, “केंद्र सरकार के कई कार्यालय अलग-अलग जगहों पर हैं और कई किराए के भवनों में हैं, जिनके लिए बड़ी रकम की आवश्यकता होती है। सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद सभी ऑफिस एक जगह पर आ जाएँगे। इससे न केवल किराए की बचत होगी, बल्कि बेहतर कार्यस्थल के साथ अच्छा कोर्डिनेशन होगा।”

सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत कुल 10 नए भवनों का निर्माण किया जाएगा, जबकि राजपथ के दोनों ओर मौजूदा ढाँचे को तोड़ा जाएगा। एक नया संसद भवन, एमपी कार्यालय, प्रधानमंत्री और भारत के उपराष्ट्रपति के लिए नए आवासों का निर्माण किया जाएगा। राजपथ में केंद्रीय विस्टा एवेन्यू को फिर से तैयार किया जाएगा। परियोजना की कुल लागत लगभग 20000 करोड़ रुपए होने का अनुमान है, जिसके 2026 तक पूरा होने की संभावना है। मौजूदा विरासत भवनों में से किसी को भी परियोजना के तहत तोड़ा नहीं जाएगा। वर्तमान में केवल नया संसद भवन और सेंट्रल विस्टा एवेन्यू बनाया जा रहा है।

दिल्ली हाईकोर्ट ने रोक से कर दिया था इनकार

पिछले महीने दिल्ली हाईकोर्ट ने सेंट्रल विस्टा परियोजना पर रोक लगाने की माँग वाली याचिका को खारिज कर दी थी।  हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता पर 1 लाख रुपए का जुर्माना लगाते हुए कहा कि ये ‘राष्ट्रीय महत्व का एक अत्यावश्यक परियोजना है।’ याचिका में कोरोना महामारी के मद्देनजर इस प्रोजेक्ट को रोकने की अपील की गई थी।

याचिका में दावा किया गया था कि सेन्ट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को सिर्फ इसीलिए ‘ज़रूरी सेवाओं’ के कैटेगरी में डालने के पीछे कोई तर्क नहीं है क्योंकि कोई ठेका सम्बन्धी किसी अनिवार्य समयसीमा में इसे पूरा करना है। वहीं केंद्र सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए स्पष्ट किया था कि राजपथ और इंडिया गेट पर जो निर्माण कार्य चल रहा है, वह संसद भवन या केंद्र सरकार के अधिकारियों/नेताओं के दफ्तरों से जुड़ा कार्य नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश डीएन पटेल और जस्टिस ज्योति सिंह की पीठ ने कहा था कि ये एक राष्ट्रीय महत्व का प्रोजेक्ट है जिसे पृथक कर नहीं देखा जाना चाहिए, क्योंकि इससे जनता का हित होना है। साथ ही हाईकोर्ट ने इस याचिका को एक वास्तविक जनहित याचिका (PIL) न मानते हुए ‘मोटिवेटेड’ याचिका करार दिया था।

इससे पहले कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष ने सेन्ट्रल विस्टा को रुपयों की ‘आपराधिक बर्बादी’ करार दिया था। उन्होंने ऐसा दिखाने का प्रयास किया था जैसे ये प्रोजेक्ट पीएम मोदी का कोई निजी प्रोजेक्ट हो। वहीं दूसरी तरफ महाराष्ट्र और राजस्थान की सरकार विधायकों के लिए हॉस्टल बनवा रही है, जिस पर वो चुप्पी साधे हुए हैं।

निकाह का खर्च जुटाने के लिए जावेद ने 10 साल के बच्चे को अगवा किया, फिर पत्थर से कुचल दिया सिर

बेंगलुरु के हेब्बागोड़ी में एक सीसीटीवी मैकेनिक ने निकाह का खर्च जुटाने के लिए 10 साल के एक बच्चे को अगवा कर उसकी हत्या कर दी। इस मैकेनिक का नाम है मोहम्मद जावेद शेख। जावेद के दो साथियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है और उसकी तलाश मे दबिश दी जा रही है।

पुलिस की पड़ताल में पता चला है कि जावेद ने इस घटना से पहले एक दूसरे लड़के को भी किडनैप किया था। लड़के के विरोध के बाद उसे छोड़ दिया था। द न्यू इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, 10 साल का मोहम्मद आसिफ 4 जून को अपने घर के बाहर खेल रहा था। तभी आरोपित ने घटना को अंजाम दिया। बच्चे की किडनैपिंग के बाद माता-पिता को रात के करीब 10 बजे फिरौती के लिए फोन आया। 25 लाख रुपयों की माँग करते हुए चेतावनी दी गई कि यदि उन्होंने पुलिस से संपर्क किया तो बेटे को मार डालेंगे।

आसिफ के पिता एमडी अब्बास जो मजदूर हैं, फोन कॉल से घबरा गए। फौरन थाने जाकर अपहरण की शिकायत लिखवाई। पुलिस एक्शन में आई और पता लगाया कि कॉल छत्तीसगढ़ के रायपुर से आया था। पुलिस की टीम फौरन रायपुर के लिए रवाना हो गई। फिर वहाँ से मोहम्मद नौशाद और सिराज को गिरफ्तार कर लिया। ये दोनों मोहम्मद जावेद शेख के रिश्तेदार हैं।

पुलिस ने बताया है कि जावेद शेख बिहार का रहने वाला है। लगभग तीन वर्ष पहले वह बेंगलुरु आया था। यहाँ वह मैकेनिक के तौर पर काम करता था। वह उसी बिल्डिंग में रहता था जहाँ आसिफ का घर था। घटना वाले दिन जब अब्बास पुलिस के पास शिकायत करने गए तो जावेद ने अंजान बनकर बच्चे को खोजने का नाटक किया ताकि उस पर संदेह न जाए। लेकिन, जब अब्बास ने पुलिस को सूचित कर दिया तो शेख घबरा गया और बच्चे की हत्या कर फरार हो गया।

हत्या का मामला पूरा शनिवार को तब प्रकाश में आया जब बिल्डिंग मालिक के बेटे ने अपने पिता को जानकारी दी कि उसे भी किडनैप करने की कोशिश हुई थी। अपहरण करने वाला कोई अन्य नहीं बल्कि जावेद शेख ही था। लड़के ने बताया कि शेख ने उसे शुक्रवार की दोपहर बाइक से किडनैप करने की कोशिश की थी।

लड़के के अनुसार, शेख ने उसे लालच दिया था कि वह वीडियो गेम खेलना सिखाएगा, मगर वह उसे एक सुनसान जगह ले गया। वहाँ चाकू की नोक पर उसे धमकाया गया। इसे देख लड़का उसका विरोध करने लगा। शेख ने उससे कहा कि यदि वो इस अपहरण के बारे में किसी को नहीं बताएगा तभी वह उसे छोड़ेगा। लड़का मान गया और उसने वापस लौटकर ये बात किसी को नहीं बताई।

आलम की खोजबीन में उसी लड़के की बदौलत पुलिस उस जगह पहुँची जहाँ बच्चे को किडनैप करके ले जाया गया था। मामले में बेंगलुरु ग्रामीण जिले के एडिशनल एसपी लक्ष्मी गणेश कहते हैं, “जब तक हम वहाँ पहुँचे तब तक आलम की पीट पीटकर हत्या कर दी गई थी। आरोपित उसका सिर पत्थर से कुचलकर वहाँ से भाग गया था। हमारे पास उसके ठिकाने के बारे में निश्चित सुराग है। उसे जल्द ही पकड़ा जाएगा।” पुलिस ने जाँच में पाया कि शेख का निकाह उसकी प्रेमिका से जल्द होने वाला था। इसलिए उसे पैसों की जरूरत थी। निकाह के बाद उसका मुंबई जाने का प्लान था।

महाराष्ट्र में कोरोना से पहले की तरह धूमधाम से मने बकरीद: SP नेता रईस शेख ने अनुमति के लिए लिखा उद्धव ठाकरे को पत्र

महाराष्ट्र में कोरोना के अभी भी लाखों मामले हैं। करीब 1,74,000 से अधिक सक्रिय कोविड-19 केसों से जूझ रहे महाराष्ट्र में धूमधाम से बकरीद मनाने की तैयारी नजर आ रही है। इसके लिए समाजवादी पार्टी के नेता रईस शेख ने राज्य के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को पत्र लिखकर इस साल ईद-उल-अज़हा (बकरी ईद) का त्योहार धूमधाम से पहले की तरह मनाने की अनुमति माँगी है।

शेख ने पत्र में अपनी माँग को उचित ठहराते हुए कहा कि राज्य में कोविड-19 मामलों की संख्या में गिरावट आ रही है और अनलॉक की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

पत्र को सोशल मीडिया पर साझा करते हुए, अपने ट्वीट में शेख ने लिखा है, “हर मुस्लिम के लिए ईद-उल-फितर और ईद-उल-अज़हा (बकरा ईद) बहुत शुभ अवसर हैं। पिछले 2 वर्षों में, COVID-19 के कारण ठीक से ईद नहीं मनाई जा सकी। ईद-उल-अज़हा जुलाई में आ रहा है और मैं @CMOMaharashtra से समुदाय को इस पवित्र दिन को मनाने की अनुमति देने का आग्रह करता हूँ।”

उन्होंने उसी पत्र में आगे कहा, “शहर एक अनलॉक प्रक्रिया के दौर से गुजर रहा है और समारोह सुरक्षित और जिम्मेदारी से राज्य द्वारा बताए गए दिशा-निर्देशों के साथ आयोजित किए जाएँगे। समुदाय की ओर से, मैं @OfficeofUT से अनुरोध करता हूँ कि ईद-उल-अज़हा के शुभ अवसर के दौरान सभी गतिविधियों की अनुमति दें।”

पत्र में भिवंडी के एक विधायक रईस शेख ने यह भी बताया कि बकरियों की खरीद और त्योहार से संबंधित अन्य खरीद की तैयारी त्योहार से पहले शुरू हो जाती है। यह दावा करते हुए कि महामारी के कारण त्योहार को धूमधाम से नहीं मना पाने के लिए मुस्लिम समुदाय में निराशा है, उन्होंने मुख्यमंत्री से समुदाय को इस साल कोरोना से पहले वाले समय की तरह त्योहार मनाने की अनुमति देने का आग्रह किया है।

बता दें महाराष्ट्र सरकार ने क्षेत्रों की सकारात्मकता दर के आधार पर राज्य के लिए 5-स्तरीय अनलॉक रणनीति की घोषणा की है।

राज्य के एक आदेश के अनुसार, सार्वजनिक स्वास्थ्य विभाग को प्रत्येक गुरुवार को प्रत्येक जिले के लिए सकारात्मकता दर और ऑक्सीजन बिस्तरों का प्रतिशत घोषित करना होता है।

जिला प्रबंधन प्राधिकरण, इन्हीं मापदंडों के आधार पर तय करेंगे कि उनकी प्रशासनिक इकाइयों में किस स्तर के प्रतिबंध लगाए जाने चाहिए।

केंद्र की वैक्सीन पॉलिसी: चिदंबरम ने वापस लिया बयान, अपनी ही पिछली ट्वीट तक नहीं गई राजदीप की ‘गिद्धदृष्टि’

कॉन्ग्रेस नेता पी चिदंबरम ने जहाँ कोरोना वैक्सीन को लेकर भ्रम फैलाया, वहीं ‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने भी अपने पुराने बयान से यू-टर्न लेते हुए केंद्र सरकार के फैसले का श्रेय विपक्षी नेताओं को दे डाला। विपक्षी नेताओं ने सोशल मीडिया पर हंगामा करने में देर नहीं मचाई और दावा किया कि वैक्सीन नीति की प्रक्रिया ‘सेंट्रलाइज्ड’ हो, ये उनकी शुरू से माँग थी। पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम ने भी यही किया।

उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘राष्ट्र के नाम सम्बोधन’ का संदेश यही है कि केंद्र सरकार ने अपनी पिछली गलतियों से सीख ली है और उसने जो दो प्रमुख गलतियाँ की थीं, उसे सुधारने का प्रयास किया है। लेकिन, साथ ही उन्होंने पीएम मोदी पर झाँसा देने का आरोप लगाते ये भी कहा कि उन्होंने अपनी गलतियों के लिए विपक्ष को जिम्मेदार ठहरा दिया। उन्होंने दावा किया कि किसी ने भी ऐसा नहीं कहा था कि केंद्र को वैक्सीन की खरीद नहीं करनी चाहिए।

तमिलनाडु के कॉन्ग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि अब पीएम मोदी कह रहे हैं कि राज्यों ने वैक्सीन की खरीद के लिए इच्छा प्रकट की थी, इसीलिए उन्हें ये सुविधा दी गई थी। उन्होंने सवाल दागा था कि किस राज्य के किस मुख्यमंत्री ने किस समय वैक्सीन की खरीद के लिए इच्छा प्रकट की थी या ऐसी माँग की थी? इसके बाद लोगों ने उनके सामने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का पत्र पेश किया, जिसमें उन्होंने यही माँग रखी थी।

फिर पी चिदंबरम ने अपने बयान को गलत बताते हुए कहा कि सोशल मीडिया एक्टिविस्ट्स ने सीएम ममता का पत्र शेयर किया है, जिसके बाद वो अपने बयान में भूल-सुधार करते हैं। चिदंबरम ने ये बयान ANI को दिया था। दरअसल, फरवरी 24, 2021 के उस पत्र में ममता बनर्जी ने माँग की थी कि राज्य सरकारों को प्राथमिकता के आधार पर राज्यों को बड़ी संख्या में वैक्सीन की खरीद की अनुमति देनी चाहिए।

इस दौरान पी चिदंबरम अपनी ही पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी का वो पत्र भी भूल गए, जो उन्होंने अप्रैल 8, 2021 को लिखा था। राहुल गाँधी ने तब माँग की थी कि वैक्सीन की खरीद में राज्य सरकारों की ज्यादा भूमिका होनी चाहिए। तब उन्होंने ‘सेंट्रलाइज्ड प्रोपेगंडा’ को गलत करार दिया था। खुद पी चिदंबरम ने NDTV को वैक्सीन की प्रक्रिया डिसेंट्रलाइज करने को कहा था। शेखर गुप्ता ने भी एक ट्वीट में लिखा था कि कई राज्यों ने ऐसी माँग की है।

ज्ञात हो कि टीकाकरण की रणनीति पर पुनर्विचार करने और 1 मई से पहले की व्यवस्था को वापस लाते हुए प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि राज्यों के जिम्मे जो 25 प्रतिशत टीकाकरण था, उसे अब भारत सरकार द्वारा करने का निर्णय लिया गया है। इस निर्णय को दो सप्ताह में अमल में ला दिया जाएगा। दो सप्ताह में केन्द्र और राज्य नए दिशानिर्देशों के मुताबिक जरूरी तैयारियाँ करेंगे। आगामी 21 जून से, भारत सरकार 18 वर्ष से अधिक आयु के सभी भारतीय नागरिकों को मुफ्त कोरोना वैक्सीन प्रदान करेगी।

वहीं राजदीप सरदेसाई ने राज्योंको वैक्सीन को वैक्सीन की खरीद का अधिकार दिए जाने के समय मनमोहन सिंह को श्रेय देते हुए उनकी तारीफों के पुल बाँधे थे, लेकिन अब वो इस प्रक्रिया के वापस लिए जाने के बाद विपक्षी नेताओं को श्रेय देते नहीं अघा रहे। उन्होंने दावा किया कि मोदी सरकार ने राज्यों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह मान ऐसा किया है। लेकिन, तब राजदीप ने कहा था कि मनमोहन की सलाह पर राज्यों को ये अधिकार मिला है।

भिंडरावाले को ‘टेररिस्ट’ बताने पर ट्विटर ने अकाउंट लॉक किया, हरभजन सिंह पर भड़का खालिस्तान समर्थक खालसा एड का फाउंडर

नए आईटी नियमों पर टालमटोल कर रहे ट्विटर ने फिर से अपना वामपंथी और हिंदू विरोधी रवैया दिखाया है। एक यूजर का अकाउंट सिर्फ इसलिए बंद कर दिया है, क्योंकि उसने खालिस्तानी दहशतगर्द जरनैल सिंह भिंडरावाले को ‘आतंकवादी’ बताया। वहीं पूर्व टेस्ट क्रिकेटर हरभजन सिंह​ से खालिस्तान समर्थक संगठन ‘खालसा एड’ का संस्थापक रविंदर सिंह उखड़ गया है।

Shivam_h9 नामक हैंडल से किए गए ट्वीट में कहा गया था, “एसजीपीसी और स्वर्ण मंदिर की शीर्ष धार्मिक ईकाई हमेशा से हिंदू विरोधी आतंकवादी (TERROR!ST) भिंडरावाला के समर्थन में खड़ी रही है। बीते चार दशक में खालिस्तानियों ने 80 हजार से ज्यादा हिंदुओं की हत्या की है। हिंदुओं को इस पर गौर करना चाहिए और इन कृतघ्नों से एकतरफा प्रेम बंद करना चाहिए।”

ट्विटर की प्रतिक्रिया का स्क्रीनशॉट

ट्विटर ने तत्काल इस अकाउंट को बंद कर दिया। जब इसे बहाल करने की अपील की गई तो घृणास्पद व्यवहार का हवाला देकर ऐसा करने से इनकार कर दिया गया। यह ट्वीट अकाल तख्त के कार्यवाहक जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह के बयान के जवाब में किया गया था। कार्यवाहक जत्थेदार ने ऑपरेशन ब्लूस्टार की 37वीं बरसी पर स्वर्ण मंदिर में भिंडरावाले के पोस्टर और खालिस्तान के समर्थन में नारेबाजी का बचाव किया था।

ज्ञानी हरप्रीत सिंह ने कहा था, “यह सिखों पर गहरा घाव है, जो साल भर दर्द देता है। बरसी पर हम ‘खालिस्तान जिंदाबाद’ का नारा लगाकर इस दर्द को कम करते हैं। इसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। यह हमेशा के लिए हमारी स्मृति का हिस्सा रहेगा।” उन्होंने 1984 के ऑपरेशन को लेकर कहा कि भारतीय सेना ने अकाल तख्त पर ऐसे हमला किया जैसे चीन या पाकिस्तान पर युद्ध के दौरान करते हैं।

गौरतलब है कि भिंडरावाले को आतंकवादी कहने से उखड़ा ट्विटर एक खास विचारधारा के लोगों के घृणास्पद ट्वीटों पर आँखें मूँदे रहता है। यहाँ तक कि जब जनवरी में केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रोद्यौगिकी मंत्रालय (MET) ने उसे ऐसे 250 ​अकाउंट्स बंद करने को कहे थे तो उन्हें कार्रवाई के कुछ घंटों के भीतर ही दोबारा बहाल कर दिया गया था।

दूसरी तरफ हरभजन सिंह​ ने भिंडरावाले का महिमामंडन करने को लेकर जो माफी माँगी थी उस पर सवाल उठाते हुए ‘खालसा एड’ के संस्थापक रविंदर सिंह ने ट्वीट कर कहा है, “डियर हरभजन सिंह! जरा इन ट्रोलों से पूछो कि इन्होंने भारतीय संसद में अपराधियों को लेकर कितनी बार सवाल किया है। अपने इतिहास के लिए माफी मत माँगो। पहले ये तुम पर हमला करेंगे, फिर तुम्हें चुप कराना चाहेंगे।” रविंदर ने इसके साथ 2019 में सांसद चुने गए लोगों पर आपराधिक मामलों से जुड़ी एक रिपोर्ट भी शेयर की है।

खालसा एड के संस्थापक रविंदर सिंह का ट्वीट, साभार: ट्विटर

हरभजन सिंह ने भिंडरावाले को दी श्रद्धांजलि को व्हाट्सएप फॉरवर्ड बताते हुए कहा है कि हड़बड़ी में बिना समझे शेयर कर दिया था। खुद को देश के लिए लड़ने वाला सिख बताते हुए देशवासियों की भावनाएँ आहत करने के लिए बिना शर्त माफी माँगी थी। हरभजन ने भिंडरावाले को ‘शहीद’ बताते हुए इंस्टाग्राम स्टोरी में उसकी एक तस्वीर साझा कर, ‘प्रणाम शहीदा नू’ लिखा था। इस पर विवाद के बाद उन्होंने ट्विटर के जरिए माफी माँगी और कहा कि वे भारत विरोधी या अपने देशवासियों के खिलाफ किसी भी चीज का समर्थन नहीं करते हैं।

‘नासमझ बच्चे की तरह न करें’: फ्री वैक्सीन में खोट निकाल रहे राहुल गाँधी को असम के CM हिमंत बिस्वा सरमा का टका सा जवाब

कोरोना टीकाकरण पर केंद्र सरकार के ताज़ा फैसले से बिफरे राहुल गाँधी को जब प्रधानमंत्री के राष्ट्र को सम्बोधन में से कुछ खोट निकालने लायक नहीं मिला तो उन्होंने ट्विटर पर एक जबरदस्ती का सवाल दाग दिया, जिसका करारा जवाब उन्हें असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा से मिला। बता दें कि पीएम मोदी ने सोमवार (जून 7, 2021) को राष्ट्र के नाम सम्बोधन में केंद्र सरकार की तरफ से मुफ्त वैक्सीन राज्यों को देने की घोषणा की।

टीकाकरण की रणनीति पर पुनर्विचार करने और 1 मई से पहले की व्यवस्था को वापस लाते हुए प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि राज्यों के जिम्मे जो 25 प्रतिशत टीकाकरण था, उसे अब भारत सरकार द्वारा करने का निर्णय लिया गया है। इस निर्णय को दो सप्ताह में अमल में ला दिया जाएगा। दो सप्ताह में केन्द्र और राज्य नए दिशानिर्देशों के मुताबिक जरूरी तैयारियाँ करेंगे। आगामी 21 जून से, भारत सरकार 18 वर्ष से अधिक आयु के सभी भारतीय नागरिकों को मुफ्त कोरोना वैक्सीन प्रदान करेगी।

इस पर राहुल गाँधी ने कहा कि उनके पास सिर्फ एक ‘सीधा सा सवाल’ है, “अगर वैक्सीन मुफ्त में दी जा रही है कि प्राइवेट अस्पताल इसके लिए क्यों चार्ज लेंगे?” साथ ही उन्होंने ‘फ्री वैक्सीन फॉर ऑल’ का टैग भी लगाया। दअरसल, प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के नाम सम्बोधन में घोषणा की है कि निजी अस्पतालों द्वारा 25 प्रतिशत टीकों की सीधी खरीद की व्यवस्था जारी रहेगी। राहुल गाँधी की नाराजगी इसी से जुड़े फैसले से थी।

प्रधानमंत्री की घोषणा के अनुसार, राज्य सरकारें इस बात की निगरानी करेंगी कि निजी अस्पतालों द्वारा टीकों की निर्धारित कीमत पर केवल 150 रुपए का ही सर्विस चार्ज लिया जाए। राहुल गाँधी का सवाल इसी पर था। कभी उनकी ही पार्टी में रहे हिमंत बिस्वा सरमा ने राहुल गाँधी के ‘एक सीधा सा सवाल’ का ‘एक सीधा सा जवाब’ दिया है। साथ ही सलाह दी कि वो बच्चों की तरह जबरदस्ती सब कुछ में गलतियाँ न निकालें।

असम के मुख्यमंत्री ने जवाब देते हुए कहा, “सरकारी अस्पतालों में 18 से अधिक की उम्र वाले हर एक भारतीय नागरिक को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा मुफ्त में कोरोना वैक्सीन दी जाएगी। जिन्हें रुपए देकर वैक्सीन लेनी है, उनके लिए प्राइवेट अस्पतालों का रुख करने की व्यवस्था है।” असल में हिमंत बिस्वा सरमा ने राहुल को समझाया कि मुफ्त में वैक्सीन के लिए प्राइवेट अस्पताल में वैक्सीन लेने की ज़रूरत ही नहीं है, सरकार ने इसकी व्यवस्था पहले ही कर रखी है।

राहुल गाँधी अक्सर हिमंत बिस्वा सरमा के निशाने पर रहते हैं। हाल ही में उन्होंने अपने कॉन्ग्रेस के अंतिम दिनों का एक किस्सा सुनाया था, जब वो राहुल गाँधी की एक बैठक में गए थे। उन्होंने बताया था कि उन्होंने देखा कि तरुण गोगोई और सीपी जोशी जैसे वरिष्ठ नेता उसी प्लेट से बिस्किट उठा कर खा रहे हैं, जिसे राहुल गाँधी के कुत्ते ‘पीडी’ ने जूठा कर दिया था। इस अपमान के बाद सरमा ने कॉन्ग्रेस छोड़ भाजपा का रुख किया था।

‘बाबा का ढाबा’ लौट के उसी जगह आया जहाँ से हुआ था मशहूर, तामझाम के साथ खुला रेस्टोरेंट चंद महीनों में ही बंद

साल 2020। अक्टूबर का महीना। अचानक एक दिन हर ओर ‘बाबा का ढाबा’ छा गया। सोशल मीडिया पर दिल्ली के मालवीय नगर में चलने वाले इस ढाबे की ही बात हो रही थी। बात हो रही थी इसे चलाने वाले बुजुर्ग दंपति कांता प्रसाद और बादामी देवी की। इनका दर्द देख मदद में हाथ उठे और ‘बाबा का ढाबा’ जल्द ही एक रेस्टोरेंट में शिफ्ट हो गया। अब खबर है कि ‘बाबा का ढाबा’ फिर से उसी जगह पहुँच गया है, जहाँ से यह सुर्खियों में आया था।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार ग्राहकों की कमी के कारण प्रसाद ने रेस्टोरेंट बंद कर दिया है। बताया जाता है कि ढाबा फरवरी में ही बंद हो गया था। यूट्यूब पर बुजुर्ग दंपति का वीडियो वायरल होने के बाद बिक्री में 10 गुना का उछाल आया था, जिसमें कुछ ही महीनों बाद भारी गिरावट आ गई। प्रसाद ने हिंदुस्तान टाइम्स को बताया, “कोरोना लॉकडाउन की वजह से हमारा कारोबार गिर गया। रोजाना बिक्री 3500 रुपए से घटकर 1000 रुपए हो गई। आठ लोगों के परिवार को चलाने के लिए कमाई काफी नहीं थी।”

प्रसाद ने बताया कि उन्होंने रेस्टारेंट में करीब ₹5 लाख का निवेश किया। तीन लोगों को काम पर रखा। मासिक खर्च लगभग 1 लाख रुपया था। ₹35,000 किराए के लिए, ₹36,000 तीन कर्मचारियों के वेतन के लिए और ₹15,000 बिजली-पानी के बिल तथा खाद्य सामग्री की खरीद के लिए। लेकिन औसत मासिक बिक्री कभी 40,000 रुपए से अधिक नहीं हुई। इसकी वजह से उन्हें नुकसान उठाना पड़ा और आखिर में वे इस नतीजे पर पहुँचे कि रेस्टोरेंट खोलना गलत फैसला था।

गौरतलब है कि बीते साल दिसंबर में बड़े धूमधाम से इस रेस्टोरेंट की शुरुआत हुई थी। इसे उस जगह के नजदीक ही शुरू किया गया था जहाँ प्रसाद का ढाबा पहले से चल रहा था। उम्दा फर्नीचर, सीसीटीवी कैमरे, स्टाफ सहित कई तरह की सुविधाओं के साथ इसकी शुरुआत हुई थी। उस समय 80 वर्षीय प्रसाद ने कहा था, “हम बहुत खुश हैं, भगवान ने हमें आशीर्वाद दिया है। मैं मदद के लिए लोगों को धन्यवाद देना चाहता हूँ, मैं उनसे मेरे रेस्टोरेंट में आने की अपील करता हूँ। हम यहाँ भारतीय और चाइनीज फूड बनाएँगे।”

लेकिन चंद महीनों में ही यह उपक्रम असफल साबित हो गया। प्रसाद ने इसके लिए तुशांत अदलखा नाम के एक सामाजिक कार्यकर्ता को को दोषी ठहराते हुए कहा है, “कुल 5 लाख रुपए के निवेश में से रेस्टोरेंट बंद होने के बाद हम कुर्सियों, बर्तनों और खाना पकाने की मशीनों की बिक्री से केवल 36,000 रुपए ही वसूल पाए।” हालाँकि अदलखा ने आरोपों को खारिज करते हुए इसके लिए प्रसाद और उनके बेटों को जिम्मेदार बताया है। उनका कहना है, “रेस्टोरेंट शुरू करने से लेकर ग्राहकों को लाने और भोजन की होम डिलीवरी के लिए ऑर्डर तक, हमने सब कुछ किया। इसके अलावा और क्या कर सकते थे? प्रसाद के दो बेटों ने रेस्टोरेंट को सँभाल रखा था, लेकिन वे शायद ही कभी काउंटर पर रहते। होम डिलीवरी के जो ऑर्डर थे उसे पूरा करने में दोनों नाकाम रहे।”

उल्लेखनीय है कि जिस यूट्यूबर गौरव वासन के वीडियो ने इस ढाबे को मशहूर किया था उसके साथ भी बाद में प्रसाद का विवाद हो गया था।