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बच्ची का मौलवी ने किया रेप: मस्जिद को ‘धार्मिक स्थल’ बता रहा मीडिया, मौलाना को ‘साधु-तांत्रिक’ लिख करते हैं खेल

उत्तर-पूर्वी दिल्ली के हर्ष विहार में एक मस्जिद में बलात्कार की घटना सामने आई। मस्जिद में पानी लेने गई 12 साल की लड़की का मौलवी इलियास ने रेप किया। मंदिरों में एक थप्पड़ की घटना को भी उछालने वाला मीडिया अब मस्जिद में रेप के मामले को छिपाने में लगा है। यहाँ तक कि ‘दैनिक जागरण’ ने भी अपनी हैडिंग में मस्जिद को ‘धार्मिक स्थल’ लिखा। इतना ही नहीं, पूरे लेख में 4 बार मस्जिद की जगह ‘धार्मिक स्थल’ लिखा गया।

‘दैनिक जागरण’ ने मस्जिद को लिखा ‘धार्मिक स्थल’

मूल रूप से राजस्थान के भरतपुर के रहने वाले मौलवी को दिल्ली पुलिस ने गाजियाबाद के लोनी से दबोचा। 48 वर्षीय आरोपित मौलवी फ़िलहाल 14 दिन की न्यायिक हिरासत में है। आक्रोशित लोगों ने मस्जिद के बाहर विरोध प्रदर्शन किया, जिसके बाद वहाँ पुलिस को तैनात करना पड़ा। जब किसी छोटे से छोटे मामले में भी मंदिर की पहचान नहीं छिपाई जाती, तो फिर मस्जिद की पहचान छिपाने का क्या उद्देश्य है?

‘अमर उजाला’ ने भी की वही हरकत

सिर्फ ‘दैनिक जागरण’ ही नहीं, ‘अमर उजाला’ और ‘दैनिक भास्कर’ ने भी ऐसा ही कारनामा किया। ‘दैनिक भास्कर’ ने लिखा – ‘धार्मिक स्थल पर हुई वारदात।’ वहीं, ‘अमर उजाला’ ने ‘धार्मिक स्थल में किशोरी के साथ हैवानियत’ नाम से हैडिंग चलाया। यहाँ ध्यान देने वाली बात ये भी है कि 12 साल की बच्ची को ‘नाबालिग’ की जगह ‘किशोरी’ भी लिखा गया। ये सब कर के मीडिया किसके जुर्म पर पर्दा डालना चाहता है?

‘दैनिक भास्कर’ ने भी हैडिंग व कटेंट में मस्जिद को ‘धार्मिक स्थल’ बताया

जहाँ बलात्कार की घटना हुई, वो जगह बच्चियों के लिए असुरक्षित है – क्या ये लोगों को नहीं पता चलना चाहिए? वैसे ये पहली बार नहीं हो रहा है। इससे पहले भी विभिन्न मीडिया संस्थान समय-समय पर ऐसा कारनामा कर चुके हैं। 2019 छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में एक महिला अपने पति के दूर जाने व पारिवारिक समस्याओं के चलते परेशान थी। फकीर आलिम ने महिला की समस्या को दूर करने के बहाने पहले उसे डरा-धमका कर शारीरिक संबंध बनाया।

‘नई दुनिया’ ने उसे ‘तांत्रिक’ बताते हुए हैडिंग चलाया। असल में इस बात से ज्यादा दिक्कत नहीं है कि ऐसे मामलों की कवरेज के समय किसी मस्जिद को ‘धार्मिक स्थल’ लिख देने या फकीर को ‘तांत्रिक’ लिख देने से उनकी मुस्लिम पहचान छिप जाती है। असली परेशानी ये है कि इससे हिन्दू बदनाम होते हैं। ऐसी ख़बरों को पहली नजर में देख कर ऐसा प्रतीत होता है जैसे किसी मंदिर में बलात्कार की घटना हुई हो, अथवा किसी हिन्दू साधु ने इस तरह की घटना को अंजाम दिया हो।

NDTV जैसे मीडिया संस्थानों का पेशा ही यही है, इसीलिए अगर वो ऐसा करता है तो समझ में आता है। इसी के सहारे उनका पूरा प्रोपेगंडा चलता है। लेकिन, ‘दैनिक जागरण’ या उसकी शाखा अख़बार ‘नई दुनिया’ को ये चीजें शोभा नहीं देतीं। दिसंबर 2019 में भोपाल के अनवर खान निकाह हलाला के नाम पर एक युवती का बलात्कार किया, पुलिस के समक्ष जुर्म भी कबूल किया। लेकिन, NDTV ने उसे ‘तांत्रिक’ और ‘बाबा’ कह कर सम्बोधित किया। आश्चर्य नहीं जब ये मीडिया अब मौलानाओं को भी ‘साधु-संत’ कह कर ऐसे मामलों में उन्हें बचाने लगे।

इसी तरह अब दिल्ली में मस्जिद में रेप की घटना को लेकर किया जा रहा है। इस घटना पर तो वो प्लाकार्ड गिरोह भी चुप है, जिन्हें कठुआ मामले के समय खुद के भारतीय होने पर शर्म आ रही थी। अब एक 12 साल की बच्ची का मस्जिद में बलात्कार होने पर उनकी चुप्पी बहुत कुछ बोलती है। राष्ट्रीय राजधानी में हुई घटना को लेकर मीडिया कवरेज की तुलना आप सुदूर कठुआ में हुए मामले से करेंगे, तो पाएँगे कि कई मीडिया संस्थानों ने तो इसे जगह देना भी गवारा नहीं समझा।

ओडिशा का लिंगराज मंदिर जहाँ शिवलिंग में मौजूद है 12 ज्योतिर्लिंगों का अंश, गैर-हिंदुओं का प्रवेश है वर्जित

ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में स्थित है लिंगराज मंदिर जो भगवान शिव को समर्पित है। भुवनेश्वर के सबसे पुराने मंदिरों में से एक लिंगराज मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में हुआ था। राक्षसों से युद्ध के बाद थकी और प्यासी माता पार्वती को जल उपलब्ध कराने के लिए इस स्थान पर भगवान शिव ने एक कूप का रूप धारण किया था और सभी नदियों को यहीं बुला लिया था।

1400 साल पुराना है मंदिर का इतिहास

180 फुट ऊँचे लिंगराज मंदिर का निर्माण सोमवंशी शासकों द्वारा कराया गया था। बाद में गंग वंश के शासकों ने भी लिंगराज मंदिर का पुनर्निर्माण कराया। हालाँकि मंदिर का वर्तमान स्वरूप सन् 1090 से सन् 1104 के दौरान हुआ लेकिन मंदिर के कुछ हिस्से 1400 वर्ष पुराने हैं। छठवीं शताब्दी के उपलब्ध लेखों से यह ज्ञात होता है कि लिंगराज मंदिर का निर्माण ललाटेंदु केशरी ने सन् 615 से सन् 657 के बीच करवाया था।

मंदिर के विषय में एक धार्मिक मान्यता है कि लिट्टी तथा वसा नाम के दो राक्षसों से माता पार्वती का भीषण युद्ध हुआ। माता पार्वती ने इन दोनों राक्षसों का वध इसी स्थान पर किया लेकिन युद्ध के कारण माता पार्वती को प्यास लगी। ऐसी स्थिति में माता पार्वती की सहायता करने के लिए भगवान शिव ने कूप का रूप धारण कर लिया और सभी नदियों को योगदान देने के लिए वहीं बुला लिया। इसके बाद से इस स्थान पर भगवान शिव कीर्तिवास के रूप में पूजे जाने लगे। बाद में भगवान शिव को हरिहर या भुवनेश्वर के रूप में जाना गया। मंदिर में भगवान शिव के अलावा भगवान विष्णु की मूर्तियाँ भी विराजित हैं।

मंदिर के गर्भगृह में स्थापित है एक महान शिवलिंग, जो स्वयंभू माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि मंदिर के गर्भगृह में स्थापित 8 फुट मोटे शिवलिंग में देश के विभिन्न कोनों में स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंगों के अंश समाहित हैं। यही कारण है कि यहाँ भगवान शिव को लिंगराज कहा जाता है।

लिंगराज मंदिर की वास्तुकला

लिंगराज मंदिर कलिंग वास्तुकला का सर्वोच्च उदाहरण है। मंदिर की नक्काशी को देखकर कोई भी यह सोच सकता है कि क्या एक व्यक्ति इतनी सुंदर और सूक्ष्म कलाकृतियाँ अपने हाथों से बना सकता है? मंदिर का निर्माण देउल शैली में किया गया है। मंदिर के चार घटक हैं, विमान (जहाँ गर्भगृह स्थित है), जगमोहन (जो कि एक असेंबली हॉल है), नटमंदिर (उत्सव मंडप) और भोग मंडप (जहाँ प्रसाद का वितरण होता है)।

55 मीटर ऊँचा यह मंदिर लगभग ढाई लाख वर्ग फुट क्षेत्र में फैला हुआ है। मंदिर पवित्र बिन्दुसागर झील के किनारे स्थित है जो हिंदुओं के लिए परम पवित्र है। सबसे पहले बिन्दुसरोवर में स्नान किया जाता है, उसके बाद क्षेत्रपति अनंत वासुदेव के दर्शन किए जाते हैं। फिर श्रद्धालु गणेश पूजा के बाद गोपालनी देवी और शिव जी के वाहन नंदी की पूजा कर लिंगराज के दर्शन के लिए मुख्य स्थान में प्रवेश करते हैं। 

ओडिशा का यह लिंगराज मंदिर, पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर की तरह ही कड़े नियमों के लिए जाना जाता है। यहाँ गैर-हिंदुओं का प्रवेश पूर्णतः वर्जित है लेकिन मंदिर के बाहर एक बड़ा चबूतरा है, जहाँ से गैर-हिन्दू मंदिर के अंदर के दिव्य वातावरण के दर्शन कर सकते हैं। यहाँ का महाप्रसादम भी भक्तों के बीच बहुत प्रसिद्ध है। उसे मिट्टी के बर्तनों में पुजारियों द्वारा तैयार किया जाता है। पहले इसका भोग भगवान को लगाया जाता है, फिर भक्तों को बाँटा जाता है।

कैसे पहुँचे?

ओडिशा की राजधानी होने के कारण भुवनेश्वर, वायुमार्ग से सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। लिंगराज मंदिर से भुवनेश्वर हवाईअड्डे की दूरी लगभग 3 किमी है। इसके अलावा भुवनेश्वर में रेलवे मार्ग से भी देश के बड़े शहरों से आसानी से पहुँचा जा सकता है। मंदिर से भुवनेश्वर रेलवे स्टेशन की दूरी लगभग 6 किमी है। सड़क मार्ग से भी भुवनेश्वर पहुँचने के मार्ग अत्यंत सुगम हैं।  

लोगो में ईसाई धर्म… बात विज्ञान की: 600 साल पहले रचा गया था प्रपंच, महामारी में WHO-IMA बढ़ा रहा उसी को आगे

दुनिया में पुनर्जागरण के बाद से ही यह स्थापित किया गया कि धर्म पर विज्ञान को तरजीह दी जानी है। चर्च और राज्य के राजनीतिक वर्चस्व की उस लड़ाई में सबसे ज्यादा नुकसान यदि किसी का हुआ तो वह थी सामाजिक व्यवस्था। कैसे?

वृहद समाज (देश) में कई तहों में छोटे-छोटे समाज हुआ करते हैं। सबकी अपनी समझ, अपनी सोच और मान्यताएँ होती हैं। एक धागा जो इन सब समाजों को एक डोर में पिरोता है, वो है धर्म। अब धर्म अपने आदर्श स्वरूप में एक बेहद चुस्त और लोकतान्त्रिक प्रक्रिया है। धर्म अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग स्वरूपों में विद्यमान है। जैसे भारत में धर्म का पुराना स्वरूप परम्पराओं के रूप में था। ये परम्पराएँ समाज के हर तबके में उन तबके की सुविधानुसार अलग-अलग थीं।

राज्य और धर्म का संघर्ष आखिर क्यों शुरू हुआ? आसान भाषा में कहा जाए तो धर्म, जिसका क्षेत्र समाज था, और राज्य जिसका क्षेत्र राजनीतिक आयाम था, दोनों एक दूसरे के आयामों में घुसने की कोशिश करने लगे। धर्म (चर्च) परम्पराओं की बजाय कानून भी बनाने लगा। यहाँ तक कि राज्य के क़ानूनों को भी चर्च से सहमति मिलने पर ही लागू किए जा सकते थे। लोगों की जीवनचर्या में धर्म का प्रभाव काफी बढ़ गया। यहाँ तक कि महामारियों के दौर में कितने दिनों का एकांतवास (क्वारंटाइन पीरियड) होना चाहिए, यह भी धर्म के रास्ते से तय किया गया।

आज भी बाइबल के पुराने वर्जन में क्वारंटाइन शब्द के इस्तेमाल को देखा जा सकता है (अंग्रेजी मीडिया की कितनी ही रिपोर्ट्स इस बारे में छप चुकी हैं)। अंततः पुनर्जागरण एक निर्णयकारी दिन साबित हुआ। इस दिन यह निर्णय हो गया कि राज्य, चर्च पर भारी है। इस एक वाक्य के कई मायने हैं; जैसे- विज्ञान की धर्म पर तरजीह, तर्क की भावना पर तरजीह और इस तरह से परत दर परत द्वैध (duality) का एक चलन शुरू हो गया। चीजों को, विषयों को स्याह और सफ़ेद में ही देखे जाने का चलन शुरू हुआ। पुराना समाज परम्पराओं के ‘ग्रे एरिया’ पर आधारित था, जहाँ आम जनमानस को स्याह अथवा सफ़ेद में से एक को ही चुनने की मजबूरी नहीं होती थी।

एक समय ऐसा भी आया, जब यह ‘एक विषय पर दूसरे को तरजीह’ देने की जगह अब दूसरे विषय को हिकारत की नज़र से देखा जाना शुरू किया गया। अब समय आया कि धर्म की बात करने वाला धार्मिक व्यक्ति ‘मूर्ख’ की श्रेणी का माना जाने लगा। धार्मिक अथवा आध्यात्मिक तर्क को तर्क मानने से ही इनकार कर दिया गया और जो चिकित्सा पद्धतियाँ धर्म के दायरे में पनपी थीं, जिनको विकसित होने में सैकड़ों वर्ष लगे थे, जो श्रुतियों पर आधारित थीं, वे सब सिरे से नकार दी गईं। इन सब में उपनिवेशवाद का भी भरपूर हाथ रहा।

जहाँ भी औपनिवेशिक शक्तियाँ पहुँची, वहाँ की मूल ज्ञान परम्पराओं का नाश हुआ। भारत को उदाहरण के तौर पर लें तो यहाँ आज भी अवशेष रूप में आयुर्वेद, होम्योपैथी और योग जैसी चिकित्सा पद्धतियाँ मौजूद हैं। पर आप सोचिए कि इन पद्धतियों के नाममात्र के मौलिक ग्रंथ ही अवशेष रूप में आज मौजूद हैं। उस ज्ञान परंपरा का संरक्षण तो दूर, उनको हिकारत की नजर से देखा गया और उन्हें नकार दिया गया।

इसी तरह से दुनिया भर की मौलिक परम्पराओं को खत्म करके अंग्रेजी दवाओं और चिकित्सा पद्धति का वर्चस्व पूरी दुनिया में कायम हुआ। इस वर्चस्व को बनाए रखने के लिए तमाम संस्थाएँ चलाई गईं। आज के दौर में भी दुनिया भर की पत्रिकाएँ, समाचार चैनल, विज्ञापन के तमाम माध्यम और लोक व्यवहार को परखने और बदलने का माद्दा रखने वाले सोशल मीडिया पर बकायदा हस्तक्षेप और नियंत्रण रखा जा रहा है।

आज के दौर में चीन के शहर वुहान से एक वायरस निकला और पूरी दुनिया में फैल गया। आज उस वायरस की तबाही से पूरी दुनिया त्रस्त है। जनजीवन अब सामान्य नहीं रहा। इस बात का भी अंदेशा है कि शायद दुबारा सब कुछ पहले जैसा कभी न हो पाए।

ऐसे समय में आप पुनर्जागरण के उस बीज को याद कीजिए, जिसकी वजह से दुनिया में सिर्फ एक ही चिकित्सा पद्धति का वर्चस्व शेष रह गया है। इस बात की सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है कि यदि दुनिया भर में चिकित्सा विज्ञान की तमाम मौलिक पद्धतियाँ जीवित होतीं तो शायद इस वायरस को सीमित करने में थोड़ी सहूलियत हो जाती। क्योंकि वर्तमान अंग्रेजी पद्धति इस बीमारी और इस वायरस के आगे नतमस्तक होती दिख रही है। बात चाहे वायरस को समझने की हो या उसका इलाज खोजने की, अंग्रेजी चिकित्सा विज्ञान हर कसौटी पर असफल हुआ है।

यह बात सच है कि शोध में समय लगता है। पर यही बात इस संकल्पना पर भी लागू होती है कि इस वायरस की उत्पत्ति के विभिन्न कारणों की पड़ताल भी ठीक से की जाए। पर नहीं, यहाँ तो इस बात की जल्दबाज़ी में घोषणा कर दी गई कि यह वायरस प्राकृतिक रूप से उत्पन्न हुआ और फैला है। और इस संकल्पना को सिरे से नकार दिया गया कि इस वायरस की उत्पत्ति प्रयोगशाला में जानबूझकर की गई है। इस मसले पर वैज्ञानिकता और तर्क दोनों को दरकिनार कर दिया गया।

यही तो पुनर्जागरण का मूलतत्व था, जिसे यहाँ जरूरी नहीं समझा गया। एक बार यह बात दुनिया भर में फैला देने के बाद जागरूकता का मिशन चलाया गया। जागरूकता के नाम पर मास्क और सैनिटाइजर के इस्तेमाल पर खूब ज़ोर दिया गया। जबकि अंग्रेजी पद्धति में शोध की महत्ता को यहाँ भी नकारा गया। नतीजा कुछ समय के बाद यह बात सामने आने लगी कि मास्क लगाने और सैनिटाइजर का इस्तेमाल करने के तमाम नुकसान भी हैं।

यहाँ बात सिर्फ मास्क और सैनिटाइजर की ही नहीं हैं। अगर ठीक से देखा जाए तो हम पाएँगे कि बीमारी की शुरुआत से जिन दवाओं और जिन तरीकों को जीवन रक्षक माना गया, कुछ समय के पश्चात ही उन पर सवाल खड़े होने लगे।

सबसे पहले कोविड की पहली लहर के समय हाईड्रॉक्सीक्लोरोक्वीन को जीवनरक्षक माना गया, दुनिया भर में इस दवा को पाने की होड़ लग गई। फिर एक दिन कहा गया कि ये दवा कारगर नहीं है। ऐसा ही प्लाज्मा थेरेपी के साथ भी हुआ, लोग जी जान से प्लाज्मा की व्यवस्था करने, जुगाड़ करने में जुट गए।

तमाम शोध हुए, रिसर्च पेपर छपे, फिर एक दिन प्लाज्मा थेरेपी को भी बेअसर तरीका बताकर उससे भी पल्ला झाड़ लिया गया। फिर स्टेरॉयड थैरेपी आई। बहुत ज़ोर-शोर से स्टेरॉयड थैरेपी पर काम शुरू हुआ। बाज़ार में स्टेरॉयड्स की माँग इतनी बढ़ गई कि कालाबाजारी तक की नौबत आ गई। लेकिन फिर वही, ढाक के तीन पात, और इस बार तो हद ही हो गई, इन स्टेरॉयड्स के प्रयोग ने ब्लैक फंगस जैसी जानलेवा बीमारी को भी जन्म दे दिया। रेमडेसिविर के साथ भी कमोबेश ऐसा ही हुआ।

ये सब दवाएँ बड़े ज़ोर शोर से बाज़ार में उतारी गईं, और फिर वापस खींच ली गईं। ये सारी अंग्रेजी दवाइयाँ थीं, शायद इसीलिए इन्हें बिना पूरे शोध के ही बाज़ार में उतार दिया गया था। अन्यथा आयुर्वेद के दायरे में बनाई गई कोरोनिल को कम से कम दवा की श्रेणी से ही बाहर कर दिए जाने का कोई तुक नहीं था।

इन तथ्यों और दवाईयों की इन घटनाओं के आलोक में एक बार फिर से पुनर्जागरण के उन मूल्यों की ओर लौटते हैं। तो पुनर्जागरण धर्म और विज्ञान को अलग-अलग करने की बात करता है। भावना और तर्क को अलग-अलग करने की बात करता है। बल्कि तर्क और विज्ञान को तरजीह देने की बात करता है।

पुनर्जागरण जिस जगह और जिस समय में हुआ वहाँ धर्म का आशय ईसाई धर्म से था। उसके बाद उपनिवेशवाद का दौर शुरू हुआ और ईसाई समाज के लोग पुनर्जागरण की मशाल लेकर दुनिया को ‘सभ्य’ बनाने के मिशन में निकल पड़े। उन्होंने दुनिया के देशों को गुलाम बनाया। वहाँ संस्थाएँ स्थापित कीं, और पहले से स्थापित परम्पराओं और संस्थाओं को नष्ट किया। उपनिवेशवाद के उस दौर में जो ये सब कुछ किया गया, उसके निहितार्थ आज क्या हैं? कोरोना महामारी के दौर में यह सवाल ज्यादा प्रासंगिक हो जाता है।

डबल्यूएचओ स्वास्थ्य के बारे में बात करने वाली दुनिया की सबसे बड़ी संस्था है। विज्ञान और तर्कों पर आधारित संस्था। आप ध्यान से डबल्यूएचओ के लोगो को देखिए। इस लोगो में आपको संयुक्त राष्ट्र के लोगो के ऊपर एक दंड दिखाई देगा। इस दंड को एक साँप ने लपेट रखा है। यह दंड और साँप वाला निशान काफी समय से चिकित्सा से संबधित विषयों को दिखाने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। पर असल में यह क्या दर्शाता है?

थोड़ा कोशिश करने पर आप पाएँगे की यह दंड ईसाई देवता अपोलो के पुत्र असलेपियस का दंड है, जिन्हें स्वास्थ्य और उपचार का देवता माना जाता है। यह निशान इस्तेमाल करना ‘धर्म को पूरी तरह नकार देने’ के मूल्य पर खरा तो नहीं उतरता और यह विषय और भी गंभीर इसलिए है क्योंकि डबल्यूएचओ केवल ईसाई धर्मावलम्बियों की संस्था नहीं, बल्कि पूरी दुनिया का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था है। ऐसे में एक ईसाई देवता का निशान यहाँ होना सिर्फ एक संयोग मात्र नहीं बल्कि धार्मिक तौर पर भी उपनिवेशवाद को फैला दिए जाने की परिणति है।

इसी तरह की धार्मिक उपनिवेशवादी मानसिकता का एक उदाहरण भारत में भी हाल ही में देखने को मिला। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन यानी आईएमए भारत में स्वास्थ्य मामलों को लेकर बनाई गई एक ऐसी संस्था है, जो भारत की आज़ादी के पहले से चल रही है। जाहिर है कि यह संस्था भी मेडिकल के नाम पर अंग्रेजी पद्धति को ही तरजीह देती है।

हाल का मामला यह है कि आईएमए के अध्यक्ष जॉन रोज़ ऑस्टिन जयलाल पर एक मुकदमा दर्ज हुआ है। इस मुकदमे में यह कहा गया है कि अध्यक्ष जी कोविड-19 महामारी का फायदा उठाते हुए महामारी से जूझ रहे लोगों को ईसाई धर्म अपनाने को विवश कर रहे थे।

क्रिश्चियनिटी टुडे को दिए गए एक इंटरव्यू में आईएमए के अध्यक्ष और पेशे से सर्जन डॉक्टर जयलाल ने कहा, “मैं मेडिकल कॉलेज में प्रोफेसर हूँ, और यह मेरे लिए एक अच्छा मौका है कि मैं ईसाई धर्म की उपचार पद्धतियों का प्रसार कर सकूँ।“ ये वही डॉक्टर हैं, जिन्होंने पिछले दिनों सरकार पर न सिर्फ आरोप लगाया बल्कि इस बात के लिए आंदोलनरत रहे कि भारत में हिन्दू पद्धति पर सरकार ज़ोर दे रही है।

2019 में सरकार नेशनल मेडिकल कमीशन बिल लेकर आई। जिसके उद्देश्यों में सरकार ने स्पष्ट किया कि, अधिसंख्य चिकित्सकों की नियुक्ति सुनिश्चित की जाए, चिकित्सा से जुड़े शोध को बढ़ावा दिया जाए, जो संस्थाएँ चिकित्सा के क्षेत्र में काम कर रही हैं, उनका समय-समय पर निरीक्षण होता रहे, और साथ ही इस बिल में एक प्रभावशाली समस्या निवारण प्रणाली हो।

इसी बिल से जयलाल जी को समस्या थी। समस्या क्यों थी, यह शोध का विषय जरूर है, लेकिन संकल्पनाएँ बना लेना कोई मुश्किल नहीं। आईएमए की तरफ से इस बिल का खूब विरोध हुआ। कारण समझना मुश्किल नहीं है। आखिर एक ऐसी संस्था जो विज्ञान और तर्क के दायरे में रहकर ईसाई धर्म के मंसूबों को पूरा कर रही है, उसे इस तरह की समानांतर संस्था से खतरा तो महसूस होगा ही। अन्यथा विज्ञान मात्र की बात होती तो शोध और संस्था का निर्माण एक सकारात्मक पहलू के तौर पर अवश्य लिया जाता।

अब पुनर्जागरण पर सवाल कीजिए। आप सोचिए कि क्या पुनर्जागरण वाकई धर्म और राज्य को अलग-अलग करता है? क्या पुनर्जागरण वाकई धर्म पर विज्ञान को तरजीह देने का नाम है? या फिर पुनर्जागरण ईसाई धर्म को दूसरे धर्मों पर तरजीह देने का एक तरीका है?

वे डफली अच्छी बजाते हैं, Placard अच्छी लिखते हैं, लेकिन मस्जिद के रेपिस्ट मौलवी पर बोलने की मनाही है

निस्तेज मिल गए। जाहिर है आपके मन में प्रश्न उठेगा कि कौन निस्तेज? 

तो सुनिए। निस्तेज हमारे लिबरल मित्र हैं। आप पूछ सकते हैं कि मित्र लिबरल कैसे हो सकते हैं? तो इस पर बहस न करते हुए मैं आपसे कहूँगा; चलें आप उन्हें लबरल मित्र कह लें। लिबरल इसलिए क्योंकि वे लबार पंथ पर चलने के विश्वासी हैं। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में पीएचडी कर रहे हैं। इसलिए अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों की कमी नहीं है। उनका विश्वास है कि जो कुछ भी हो, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हो। देश में होने वाली या न होने वाली हर घटना को अंतरराष्ट्रीय मीडिया में जगह मिले। वे बताते हैं कि यही बात भारत को एक मैच्योर्ड डेमोक्रेसी बनाएगी। 

मुझे पता है कि वे जो बताते हैं उसमें उनका विश्वास नहीं है। उनका विश्वास इस बात में है कि ऐसा होने से ही भारतीय लोकतंत्र की छीछालेदर हो सकती है। वे डफली अच्छी बजाते हैं। चंदा इकट्ठा करने और चंदे के लिए तकरीर लिखने में महारत हासिल है। प्लैक कार्ड इतना अच्छा लिखते हैं कि उनके मित्रों का यह मानना है कि वे अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों की जगह प्लैक कार्ड राइटिंग में पीएचडी करते तो भी वही सब कर रहे होते जो आज कर रहे हैं। 

दुकान से सिगरेट लेकर लौटते हुए मिल गए। बहुत गुस्से में थे। मैंने पूछा; क्या हो गया, इतने गुस्से में क्यों हो? 

मुझे देखा और गुस्से में पीयूष मिश्रा की तरह ही बोले; कुर्सी है तुम्हारी, ये जनाजा तो नहीं है, कुछ कर नहीं सकते तो उतर क्यों नहीं जाते?

मैंने कहा;  मैं तो खड़ा हूँ। मैं कौन सी कुर्सी पर बैठा हूँ? 

वे बोले; तो आपको उतरने के लिए थोड़ी न कहा मैंने।

मैंने पूछा; फिर किससे कह रहे हो? यहाँ तो केवल मैं हूँ। 

वे बोले; किससे कहेंगे? एक ही तो हैं जिसे मैं कहता हूँ। पर अजब ढीठ इंसान है कि मेरी ललकार नजरअंदाज कर देता है। 

मैंने कहा; तो जब जानते हो कि नहीं उतरेंगे तो क्यों कहते हो बार-बार? कहीं इसलिए तो नहीं कि ऐसा करने से विरोध की प्रैक्टिस बनी रहती है? वैसे एक बार ट्विटर पर टैग करके देखो। हो सकता रिजाइन कर ही दें। 

वे बोले; वो करेंगे? कभी नहीं करेगा आदमी। खैर ये सब जाने दें, ये बताएँ कि आप को अचानक क्या हो गया? 

मैंने कहा; क्या हो गया? ऐसा क्यों कह रहे हो?

वे बोले; अरे मेरा मतलब, आपको तो मैं रिज़नेबल इंसान समझता था और आप ये सांप्रदायिक लोगों के साथ कैसे लिखने-पढ़ने लग गए? और वो भी कि लिखाई में पूरा जहर उगले जा रहे हैं। 

मैंने मुस्कुराते हुए कहा; इसमें नया क्या है? तुम्हारी नज़र में तो मैं हमेशा से सांप्रदायिक ही था। अब और लोगों के साथ खड़ा दिखता हूँ तो जाहिर है कि उसमें शिकायत डबल होनी ही है। 

निस्तेज बोले; नहीं शिकायत नहीं है लेकिन यही देख लो कि आप जहाँ लिख रहे हैं उन्होंने एक रेप पर रिपोर्टिंग किस तरह की है। कह रहे हैं लिबरल ने चुप्पी साध ली। अरे रेप की रिपोर्टिंग में लिबरल की चुप्पी की बात करना कहाँ तक सही है?

मैंने कहा; चुप्पी तो साध ली। इसमें तो कोई दो राय है क्या? जैसा शोर कठुआ में हुआ और जैसे प्लैक कार्ड लेकर तस्वीरें खिंचाई गई, वैसा यहाँ क्यों नहीं दिखा?

निस्तेज कुछ क्षणों के लिए चुप रहे। शायद मुझसे ऐसे प्रश्न की आशा नहीं थी उन्हें। सोचते हुए बोले; देखिए किसी ने सपोर्ट थोड़ी किया रेपिस्ट का। 

मैंने कहा; रेपिस्ट का कोई सपोर्ट करता है क्या? और रेपिस्ट की जगह मौलाना क्यों नहीं कह रहे?

वे बोले; ये कोई बात थोड़े हुई। कानून भी कहता है कि रेप में इन्वॉल्व लोगों की पहचान छुपाई जानी चाहिए।  

मैंने कहा; गज़ब हो! यह कानून पीड़िता के लिए है। 

वे बोले; अरे तो क्या चाहते क्या हैं? 

मैंने कहा; कठुआ में एक रेप हुआ था तो पूरे भारत को तुम लोगों ने रेपिस्तान बताया था। और तुम्हें तो याद होगा ही ? तुम्हारी ही यूनिवर्सिटी के लोग बॉलीवुड वालों के साथ खुद के हिन्दू होने पर शर्मिंदा हुए थे? और हाँ, वो बॉलीवुड एक्ट्रेसेज ने जो प्लैक कार्ड लेकर फोटो खिंचवाए थे उसे भी तुमने ही लिखा था न? 

वे कुछ क्षणों के लिए सकपका गए। सँभलते हुए बोले; लेकिन रेप के लिए पूरे मुस्लिम समाज पर आरोप लगाना तो ठीक नहीं है न। 

मैंने कहा; कौन पूरे मुस्लिम समाज पर आरोप लगा रहा है? लेकिन कठुआ में जो ‘मंदिर में रेप’ वाली कहानी बताकर हिन्दू समाज को कठघरे में खड़ा किया गया वह क्या था?

वे बोले; आप तो कुछ समझते ही नहीं हैं। आप हिंदुत्व वालों को लगता है कि किसी न किसी बहाने मुसलमानों को बदनाम किया जाए। 

मैंने कहा; ऐसा बिल्कुल नहीं लगता। मेरा सवाल तुम जैसे लिबरलों से है। जवाब न देना चाहो तो कोई बात नहीं। 

वे बोले; देखिए कठुआ की बात अलग थी। वहाँ बच्ची के परिवार के लिए हमने चंदा भी इकट्ठा किया था। हमने तो बच्ची के परिवार को वकील भी दिया। आपको याद हो तो हमारी वजह से ही केस को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली।  

मैंने कहा; फिर क्या हुआ उस चंदे का? और जिन आरोपियों के खिलाफ कैंपेन चलाई गई वे तो केस में इन्वॉल्व भी नहीं थे। वकील साहिबा के बारे में बच्ची के माँ-बाप की राय…

वे बोले; देखिए वो समय और था। आज देश में महामारी फैली हुई है। आज लोगों को रेप के खिलाफ कैंपेन नहीं चाहिए, बल्कि ऑक्सीजन चाहिए, बेड चाहिए, वैक्सीन चाहिए। आज इस सरकार ने हमारे बच्चों की वैक्सीन विदेशों में भेजकर हमारे बच्चों के साथ जो अन्याय किया है वह माफी योग्य नहीं है। लोगों को वैक्सीन नहीं मिल रही है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक हज़ारों लोग रोज मर रहे हैं। आज गंगा लाशों से पट गई है। आपने बरखा दत्त की श्मशान से रिपोर्टिंग देखी? मुझसे पूछें तो असल बहस लाशों पर होनी चाहिए। आज जरूरत पड़ने पर वैक्सीन नहीं मिल रही है। सरकारी वैक्सीन प्राइवेट अस्पतालों में लगाईं जा रही है। आज देश की यह हालत है और आपको इस बात की शिकायत  कि… मैं तो कहना चाहूँगा कि; कुर्सी है तुम्हारी, ये जनाजा तो नहीं है, कुछ कर नहीं सकते तो उतर क्यों नहीं जाते?

यह कहते हुए निस्तेज चलते बने। मुझे उन एक्टिविस्ट की याद आ गई जिन्होंने कठुआ में पीड़िता बच्ची के परिवार के लिए चंदा इकट्ठा किया था। आजकल कहीं दिखाई नहीं देते। हो सकता है चंदे का अगला प्रोग्राम बनाने में व्यस्त हों।      

‘एक ही प्लेट में खा रहे थे कॉन्ग्रेस नेता और राहुल गाँधी का कुत्ता’: किस्सा उस बैठक का, जिसने 8 राज्यों से कॉन्ग्रेस को साफ़ कर दिया

असम के नए मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा कभी कॉन्ग्रेस में थे, लेकिन 2015 में उनके भाजपा में शामिल होने के साथ ही पूरे उत्तर-पूर्व की राजनीतिक तस्वीर बदल गई और कॉन्ग्रेस वहाँ के सभी राज्यों से साफ़ हो गई। अब स्थिति ये है कि असम, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, नागालैंड, मेघालय, त्रिपुरा, मिजोरम और सिक्किम – आठों राज्यों में भाजपा गठबंधन की सरकार है। अब हिमंत बिस्वा सरमा ने एक किस्सा सुनाया है कि कैसे उनका कॉन्ग्रेस से मोहभंग हुआ।

उन्होंने बताया है कि कब उन्हें एहसास हुआ कि बस अब बहुत हो गया, वो ‘इस आदमी (राहुल गाँधी)’ के साथ काम नहीं कर सकते। इसके लिए उन्होंने एक बैठक का किस्सा सुनाया। उन्होंने राहुल गाँधी को धन्यवाद देते हुए कहा कि उनके कारण ही वो कॉन्ग्रेस से निकले, इसीलिए आज वो मुख्यमंत्री हैं और उन्हें राज्य की सेवा का अवसर मिला है। उन्होंने कहा कि अगर राहुल गाँधी ने उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया होता तो शायद ये संभव नहीं था।

असम के मुख्यमंत्री ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ के कार्यक्रम ‘एक्सप्रेस अड्डा’ में उस बैठक के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि इस बैठक के बारे में बात करते हुए उनसे ज्यादा खुश व्यक्ति कोई नहीं हो सकता है। उन्होंने कहा कि वो बैठक कहीं अकेले में नहीं हुई थी, बल्कि उससे पहले सोनिया और राहुल गाँधी से उनकी कई बार बातचीत हुई थी। गुलाम नबी आज़ाद और मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे नेता भी इस बातचीत का हिस्सा रहे थे।

52 वर्षीय हिमंत बिस्वा सरमा ने बताया कि कॉन्ग्रेस के साथ मनमुटाव और बातचीत का प्रकरण करीब एक वर्ष तक चला, जिसके बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया और सोनिया गाँधी से मिलने गए। सोनिया गाँधी ने उन्हें अपने बेटे राहुल से मिलने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि राहुल गाँधी के साथ उनकी वो बैठक काफी बुरी रही थी, लेकिन उन्होंने इन चीजों को कभी सार्वजनिक नहीं किया और खुद तक ही रखा।

बकौल हिमंत बिस्वा सरमा, जब भी वो राहुल गाँधी के सामने कोई मुद्दा उठा रहे थे या अपनी बात रख रहे थे, तो वो ‘तो क्या? (So What?)’ कह कर उसका जवाब दे रहे थे। उन्होंने याद करते हुए बताया कि 20 मिनट की इस बैठक में उन्हें कम से कम 50 बार ‘So What’ सुनने को मिला। जब भी हिमंत कुछ कहना चाहते थे, यही जवाब मिलता। असम सीएम ने इसे ‘सामंती संस्कृति’ करार दिया। लेकिन, जिस बैठक की यहाँ बात हो रही है, वो ये बैठक नहीं है।

दरअसल, राजस्थान विधानसभा के स्पीकर सीपी जोशी ने हिमंत बिस्वा सरमा और कॉन्ग्रेस आलाकमान के बीच सुलह कराने के लिए एक फॉर्मूला तैयार किया और फिर समाधान के उद्देश्य से सरमा अन्य नेताओं के साथ उनसे मिलने पहुँचे। उस बैठक में असम के तत्कालीन वयोवृद्ध मुख्यमंत्री तरुण गोगोई और असम में कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अंजन दत्ता भी मौजूद थे। बताते चलें कि अब ये दोनों ही नेता दिवंगत हो चुके हैं।

उस दौरान असम के आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा को हराने पर चर्चा हुई। हिमंत बिस्वा सरमा ने बताया कि उन्होंने सकारात्मक रूप से इस बैठक की शुरुआत की थी और कॉन्ग्रेस पार्टी के हित की बातें कर रहे थे। लेकिन, उन्होंने बताया कि पूरी बातचीत के दौरान राहुल गाँधी बैठक में कोई रुचि ही नहीं दिखा रहे थे और अपने कुत्ते के साथ खेल रहे थे। हिमंत बिस्वा सरमा ने बताया कि उन्हें बाद में पता चला कि उसका नाम ‘पीडी’ है।

2016 के विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस को असम की सत्ता से उखाड़ फेंकने में बड़ी भूमिका निभाने वाले हिमंत बिस्वा सरमा ने बताया, “बैठक के दौरान वहाँ उपस्थित नेताओं के लिए चाय-कॉफी लाई गई। राहुल गाँधी के कुत्ते ने टेबल के पास जाकर उस पर रखी प्लेट से एक बिस्किट निकाल लिया और खाने लगा। फिर राहुल गाँधी मेरी तरफ देख कर मुस्कुराने लगे। मैं ये सोच रहा था कि वो भला मुझे देख कर क्यों ऐसा कर रहे हैं?”

दरअसल, हिमंत बिस्वा सरमा इस हाथ में चाय का कप लेकर इस बात का इंतजार कर रहे थे कि राहुल गाँधी कब कुत्ते द्वारा जूठी की गई उस प्लेट के बदले दूसरी प्लेट मँगवाएँगे। उन्होंने 5 मिनट तक इंतजार किया लेकिन फिर देखा कि तरुण गोगोई और सीपी जोशी जैसे वरिष्ठ नेता उसी प्लेट से बिस्किट उठा कर खा रहे हैं। सरमा ने कहा कि वो हमेशा राहुल गाँधी से मिलने तो नहीं जाते थे, लेकिन उस दिन उन्हें एहसास हुआ कि ये सामान्य है।

हिमंत बिस्वा सरमा ने सुनाया राहुल गाँधी के साथ अपनी अंतिम बैठक का किस्सा (वीडियो साभार: Indian Express)

उन्हें ऐसा भान हुआ कि राहुल गाँधी की हर बैठक में ऐसा ही होता होगा। उन्होंने कहा, “उसी दिन मुझे इसका एहसास हुआ कि अब बहुत हुआ, अब मैं इस व्यक्ति के साथ नहीं रह सकता। लेकिन, मैं उनका धन्यवाद भी करता हूँ। मैं आज इस पद पर हूँ, तो इसका श्रेय उस बैठक को भी जाता है और इस तथ्य को भी कि राहुल गाँधी को मेरा कॉन्ग्रेस में होना पसंद ही नहीं था।” बता दें कि सरमा ने कॉन्ग्रेस में 22 साल बिताए थे।

LLB और Ph.D जैसी डिग्रियाँ हासिल कर के कभी गुवाहाटी हाईकोर्ट में बतौर अधिवक्ता प्रैक्टिस करने वाले हिमत बिस्वा सरमा 2001 में पहली बार जलुकबारी से विधायक बने थे और अगले ही साल उन्हें मंत्री पद सौंपा गया। तरुण गोगोई की सरकारों में उन्होंने कई बड़े मंत्रालय संभाले। उन्होंने जुलाई 2014 में ही कॉन्ग्रेस के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया था, लेकिन एक साल तक चली बातचीत की प्रक्रिया में अपने कटु अनुभव के बाद अगस्त 2015 में भाजपा में आ गए।

’11 हजार बेघर, 40 हजार प्रभावित’: बंगाल हिंसा पर 114 SC/ST प्रोफेसरों ने राष्ट्रपति को लिखा पत्र

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद हुई हिंसा मामले में अनुसूचित जाति/जनजाति (SC/ST) वर्ग के 114 प्रोफेसरों ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को पत्र लिखा है। इस पत्र में टीएमसी पर कार्रवाई की अपील की गई है।

टाइम्स ऑफ इंडिया के पत्रकार रोहन दुआ ने यह पत्र ट्विटर पर शेयर किया है। इस पत्र के मुताबिक चुनाव के बाद राज्य में भड़की हिंसा ने 11 हजार लोगों को बेघर कर दिया है। इनमें अधिकांश अनुसूचित जाति और जनजाति वर्ग से हैं। पत्र बताता है कि, 40,000 लोग इस हिंसा से प्रभावित हुए और 1627 बर्बर हमले दर्ज किए गए।

इसमें लिखा है कि हिंसा के दौरान 5000 से अधिक घर जला दिए गए। वहीं 26 लोग मारे भी गए। इसके बाद 2000 से अधिक लोगों को जो असम, झारखंड और ओडिशा में शरण लेनी पड़ी।

पत्र के मुताबिक, तृणमूल कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं ने राज्य पुलिस के साथ मिलकर उस दौरान अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों पर न केवल जमकर अत्याचार किया बल्कि वहाँ हिंसा भड़काई, लोगों को मारा, औरतों से रेप किया और जमीन पर कब्जा कर लिया। इसलिए वह चाहते हैं कि एससी/एसटी समुदाय को बचाने के लिए मामले में हस्तक्षेप किया जाए।

साथ ही पत्र में कहा गया है कि एससी/एसटी समुदाय के जो लोग इससे प्रभावित हुए हैं उनके घर दोबारा से बनवाकर उनके पुनर्वास पर काम किया जाए। साथ ही पीड़ितों को तत्काल प्रभाव से मेडिकल व अन्य सुविधाएँ और सुरक्षा दिया जाए। 

बता दें कि सेंटर फॉर सोशल डेवलपमेंट (सीएसडी) के बैनर के तहत यह पत्र लिखा गया है। इस पर डीयू के अफ्रीकन स्टडीज विभाग के पूर्व हेड प्रोफेसर सुरेश कुमार और डीयू में ही लाइब्रेरी साइंस से जुड़े प्रोफेसर केपी सिंह के पहले पन्ने पर हस्ताक्षर हैं।

गौरतलब हो कि इससे पहले इस मुद्दे 46 सेवानिवृत्त अधिकारियों ने राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद को पत्र लिखकर मामले में SIT गठित करने की माँग की थी। साथ ही राज्य में हुई इस व्यापक राजनीतिक हिंसा के मद्देनजर 2093 महिला वकीलों ने भी भारत के मुख्य न्यायाधीश एन वी रमन्ना को पत्र लिखकर मामले में संज्ञान लेने की अपील की थी।

‘सर सलामत तो पगड़ी हजार’: स्टूडेंट्स की कॉन्फ्रेंस में PM मोदी की सरप्राइज एंट्री, ओलंपिक से लेकर शाहरुख खान तक की हुई बात

शिक्षा मंत्रालय द्वारा गुरुवार (3 जून 2021) को CBSE छात्रों और उनके अभिभावकों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग का आयोजन किया गया था। अचानक से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी इसमें शामिल हो गए। इसके बाद उन्होंने छात्रों और अभिभावकों से चर्चा की और परीक्षा रद्द होने पर उनके विचार जाने। पीएम मोदी से चर्चा के दौरान छात्र उत्साहित नजर आए और उन्होंने खुलकर पीएम मोदी से बात की।

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान पीएम मोदी ने अचानक पहुँच कर कहा कि वे आशा करता हैं कि छात्र मजे में होंगें। पीएम मोदी ने कहा, “आशा करता हूँ कि मैंने आपको डिस्टर्ब नहीं किया।” इसके बाद बेंगलुरु के मल्लेश्वरम के एक छात्र अभिराम ने परीक्षा रद्द करने पर पीएम मोदी का धन्यवाद करते हुए कहा, “सर सलामत तो पगड़ी हजार।” अभिराम ने पीएम मोदी को बताया कि वह अपने आप को फिट रखने के लिए 30 मिनट तक योग और व्यायाम करता है।

छात्रों से चर्चा के दौरान पीएम मोदी ने छात्रों से उनकी रुचि और उनकी दिनचर्या के बारे में प्रश्न किया। इसके अलावा उन्होंने छात्रों से कहा कि परीक्षा समाप्त होने के बाद वे इस समय का सदुपयोग करें और ओलंपिक में जा रहे भारतीय खिलाड़ियों के बारे में पढ़ें।

छात्रों से चर्चा के दौरान एक मजेदार वाकया भी देखने को मिला जब एक छात्र की माँ ने कहा कि शाहरुख खान से मिलने की इतनी खुशी नहीं हुई जितनी पीएम मोदी से बात करके हो रही है।

01 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई एक उच्च स्तरीय बैठक में इस साल होने वाली 12वीं की CBSE की परीक्षाओं को रद्द करने का निर्णय लिया था। यह निर्णय कोरोना वायरस संक्रमण के चलते लिया गया था। CBSE द्वारा 12वीं की परीक्षाओं को रद्द करने के बाद मध्य प्रदेश, गुजरात, हरियाणा और उत्तराखंड ने भी बोर्ड परीक्षाएँ रद्द कर दी हैं।   

पूरा वीडियो इस लिंक पर क्लिक करके देखा जा सकता है।

एक अस्पताल ऐसा भी: इलाज के दौरान किसी कोरोना मरीज की मौत नहीं, 94% का आयुर्वेदिक उपचार

कोरोना संक्रमण के दौरान दिल्ली सहित देश की कई हिस्सों से अस्पतालों में संक्रमितों की मौत के बाद लापरवाही जैसे इल्जाम सामने आए हैं। लेकिन राष्ट्रीय राजधानी में एक अस्पताल ऐसा भी जहाँ भर्ती होने के बाद सभी के सभी संक्रमित ठीक होकर अपने घर लौटे। इनमें से ज्यादातर को उपचार के दौरान एलोपैथी दवाइयों का सेवन तक नहीं करना पड़ा।

इस अस्पताल का नाम- ऑल इंडिया इंस्टिट्यूट ऑफ आयुर्वेद (AIIA) है। साल 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसका उद्घाटन किया था। यहाँ क्लिनिकल रिसर्च के लिए 200 बेड्स का रेफरल अस्पताल, 25 विशेष विभाग और आठ अंतर-अनुशासनात्मक अनुसंधान प्रयोगशालाओं के साथ 12 क्लीनिक हैं।

जानकारी के मुताबिक, कोरोना से संक्रमित करीब 600 मरीजों का यहाँ इलाज हुआ है। अच्छी बात ये है कि इनमें से अधिकांश यहाँ से ठीक होकर घर लौटे। एक मरीज को लेकर बताया जा रहा है कि उसकी तबीयत बिगड़ गई थी, इसलिए उसे दूसरे अस्पताल में रेफर कर दिया गया। वहाँ भी उसे बचाया न जा सका और उसकी मौत हो गई। 

अस्पताल ने कुल 592 माइल्ड और मॉडरेट कैटेगरी के मरीजों का इलाज किया। प्रशासन का कहना है कि इलाज के लिए जो संक्रमित वहाँ भर्ती हुआ वह ठीक होकर घर गए। इनमें से 94 फीसद मरीजों को तो प्योर आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट देकर ठीक किया गया। 6% ऐसे भी मरीज रहे जिनकी बीमारी देखते हुए उन्हें एलोपैथ का इलाज दिया गया। इसमें वह मरीज भी शामिल है, जिसे गंभीर हाल में रेफर करना पड़ा था।

AIIA की निदेशक डॉ तनुजा नेसारी ने पीटीआई से बातचीत में बताया, “संस्थान में 94 प्रतिशत से अधिक रोगियों को शुद्ध आयुर्वेदिक उपचार प्रदान किया गया था, और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के दिशा-निर्देशों के अनुसार जहाँ कहीं भी जरूरत थी एलोपैथी का उपयोग किया गया। यही हमारी सफलता का कारण है। हमने एक समग्र और एकीकृत दृष्टिकोण अपनाया है।”

उन्होंने बताया,

“600 मरीजों में से 200 मरीज कोरोना की दूसरी लहर में अस्पताल में भर्ती हुए। लेकिन सबसे अच्छा ये था कि यहाँ आयुर्वेद और एलोपैथी दोनों इलाज है। एलोपैथी या आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट लैब से आए टेस्ट देखने के बाद ही किया जाता है। यहाँ कोई भी दवाई आँख बंद कर नहीं दी जाती। हर केस मॉनिटर होता है। ये आधुनिक फैसिलिटी है। हमारे पासे पैथोलॉजी और रेडियोलॉजी लैब हैं। हम सीटी स्कैन, सीआरपी और डी-डाइमर टेस्ट लगातार करवाते हैं। इसके बाद संयुक्त रूप से निर्णय लिया जाता है कि मरीज को आयुर्वेदिक इलाज देंगे या फिर एलोपैथी। पहले हम आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट ऑक्सीजन थेरेपी के साथ देते हैं। अगर जरूरत पड़ती है तो एलोपैथी की मदद लेते हैं। इसमें ICMR दिशा-निर्देशों के मुताबिक स्टेरॉएड आदि शामिल हैं।”

इस अस्पताल में 40 आयुर्वेद और 5 एलोपैथी के डॉक्टर हैं। अस्पताल में ICU हैं और एम्स व राजीव गाँधी सुपर स्पेशलिटी अस्पताल के डॉक्टर समय-समय पर ऑनलाइन परामर्श देते हैं। उदारहरण के लिए वह डॉक्टर्स को बताते हैं कि उन्हें ऑक्सीजन स्तर गिरने पर तत्काल क्या करना है और ज्यादा गंभीर केसों पर उनके यहाँ रेफर कर देना है। 

उन्होंने कहा कि एआईआईए ने अपने एक से दो प्रतिशत रोगियों को ही ज्यादा देखभाल के लिए कहीं और रेफर किया है। यहाँ मरीज के रहने की अवधि 9 से 10 दिन है, जबकि अस्पतालों ने बताया है कि मध्यम लक्षणों वाला एक कोविड रोगी 10-14 दिनों तक भर्ती रहता है और एक गंभीर रोगी को मेडिकल ऑक्सीजन पर निर्भरता के कारण एक महीने तक का समय लग सकता है।

डॉ. नेसारी के मुताबिक उनके संस्थान में 99.99% मरीज पूरी तरह से ठीक हुए। कोरोना के मरीजों के लिए 47 बेड वाले इस अस्पताल में इलाज आयुर्वेदिक दवा, योग, हवन और प्राणायाम के दम पर किया जाता है। मरीजों को योग, प्राणायाम कराया जाता है। अस्पताल का स्टॉफ भी योग और प्राणायाम करता है। सुबह के वक्त यज्ञ और हवन किया जाता है। मरीजों को अस्पताल का स्टाफ ठीक होने के लिए प्रोत्साहित भी करता है। गिलोई, कुछ हर्ब्स, आयुष 64, आयुष काढ़ा और अश्वगंधा मरीजों के इलाज में दिया जाता है। इनके अलावा आपात स्थिति में यहाँ सुवर्णकल्प, स्वस चिंतामणि, स्वर्ण भूपति सहित आयुर्वेदिक दवाओं का उपयोग किया जाता है। साथ ही रोगियों के लिए ट्रीटमेंट शेड्यूल में प्रार्थना, योग, ध्यान, आयुर्वेद, गरारा, हल्का व्यायाम और दवाएँ दी जाती हैं।

कोरोना कोई बीमारी नहीं… अल्लाह के सामने गिड़गिड़ाकर माफी माँगने से ही खत्म होगी: SP सांसद शफीकुर्रहमान बर्क

मुरादाबाद से समाजवादी पार्टी (सपा) के सांसद एसटी हसन के बाद अब संभल के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने भी विवादित बयान दिया है। सपा सांसद बर्क का कहना है कि कोरोना कोई बीमारी नहीं है, बल्कि आजादे इलाही है जो अल्लाह के सामने गिड़गिड़ाकर माफी माँगने से ही खत्म होगी।

बर्क ने कहा कि कोरोना अगर बीमारी होती तो इसका इलाज मिल गया होता। कोरोना की यह बीमारी आजादे इलाही है जो अल्लाह के सामने गिड़गिड़ाकर माफी माँगने से ही खत्म होगी। वे यहीं नहीं रुके। सपा सांसद ने यह भी कह दिया कि मौजूदा भाजपा सरकार ने न केवल इस्लामिक कानून शरीयत के साथ खिलवाड़ किया है, बल्कि लड़कियों से रेप, मॉब लिंचिंग और कई जुल्म-ज्यादतियाँ करवाई की जिसके कारण ही कोरोना जैसी आसमानी आफत आई है।

सपा सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने कहा कि उन्होंने तो पहले ही कह दिया था कि कोरोना कोई बीमारी है ही नहीं। बर्क ने कहा कि उन्होंने पहले ही मुस्लिमों के लिए मस्जिदों और ईदगाहों में नमाज पढ़ने की माँग की थी लेकिन सरकार ने इसकी इजाजत नहीं दी और आज सरकार की इन्हीं गलतियों के कारण आसमानी आफत आई है। बर्क अक्सर अपने बयानों के कारण चर्चा में रहते हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राम मंदिर के शिलान्यास को गैर-कानूनी करार दिया था और कहा था कि सत्ता और हिन्दुत्व के बल पर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई से फैसला लिखाया गया है।

इससे पहले सपा सांसद डॉक्टर एसटी हसन ने विवादित और गैर-जिम्मेदाराना बयान दिया था। उन्होंने कोरोना वायरस संक्रमण के दौरान हुई मौतों और पिछले दिनों देश में आए दो चक्रवातों के लिए मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहराया था और कहा था कि यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि भाजपा सरकार ने शरीयत में दखल दी है।

2 बार नाकाम रही, तीसरी बार शाहिदा ने शौहर का कर दिया काम तमाम; शव के 4 टुकड़े कर किचन में दफनाया

मुंबई पुलिस ने हत्या के एक चौंकाने वाले मामले का खुलासा किया है। कई दिनों से गायब रईस का शव उसके घर के किचन से बरामद किया है। उसकी हत्या के आरोप में उसकी 28 वर्षीय बीवी शाहिदा और उसके प्रेमी अमित विश्वकर्मा को गिरफ्तार किया है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अपने नाजायज रिश्ते को छिपाने के लिए दोनों ने मिलकर रईस का बेरहमी से कत्ल कर बाद में किचन में दफन कर दिया।

दहिसर में रहने वाली इस महिला की कारस्तानी शायद कुछ दिन छिप जाती लेकिन उसकी 6 साल की बेटी ने सारा भंडाफोड़ कर दिया। मुंबई पुलिस के जोन 11 के DCP विशाल ठाकुर के ने बताया कि उत्तर प्रदेश के गोंडा निवासी रईस का निकाह साल 2012 में शाहिदा से हुआ था। निकाह के बाद दोनों मुंबई आकर दहिसर पूर्व के खान कंपाउंड में किराए के घर में रहने लगे। दोनों के 2.5 साल का बेटा तथा 6 साल की बेटी भी थी।

रईस दहिसर में ही रेलवे स्टेशन के पास एक कपड़े की दुकान में नौकरी करता था। पुलिस के अनुसार रईस की गैरमौजूदगी में अनिकेत उर्फ अमित उसके घर आता-जाता था। उसके शाहिदा के साथ नाजायज रिश्ते बन गए थे। जब इसका शक रईस को हुआ तो पति-पत्नी में झगड़ा होने लगा। रोज-रोज की झंझट से छुटकारा पाने के लिए शाहिदा ने अपने प्रेमी के साथ उसको रास्ते से हटाने का फैसला किया।

गिरफ्तारी के बाद शाहिदा ने बताया कि उसने पूर्व में भी दो बार रईस को जान से मारने की कोशिश की थी लेकिन नाकामायब रही। बीते 20 मई को जब रईस घर से बाहर निकला तो अमित उसके घर आ गया। दोनों आपत्तिजनक अवस्था में थे कि अचानक रईस घर पहुँच गया। इसके बाद उसकी शाहिदा के साथ मारपीट हुई। इसी दौरान शाहिदा ने चाकू घोंपकर उसकी हत्या कर दी। बाद में अमित के साथ मिलकर उसका गला काटा।

इस बीच रईस-शाहिदा की 6 साल की बेटी ने सबकुछ देख लिया। महिला ने बच्ची को धमकाया और कहा कि अगर उसने कुछ बताया तो उसे भी काटकर दफना देगी। दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, शाहिदा ने रईस के शव के चार टुकड़े कर किचन में दफना दिया और उसका फोन अपने पास रख लिया।

शाहिदा की बातों पर और रईस के अचानक गायब होने पर जब उसके दोस्तों को शक हुआ तो उनमें से किसी ने दहिसर थाने में मुकदमे को दायर करवाया। मामले में जाँच शुरू हुई और पुलिस ने बच्ची से अकेले में पूछताछ की। बच्ची की गवाही ने सबको हक्का-बक्का कर दिया। बच्ची के बयान के आधार पर घर की किचन खुदवाकर रईस की लाश को बरामद कर लिया गया। बाद में शाहिदा ने भी अपना जुर्म कबूल लिया और पुलिस ने उसे और उसके प्रेमी को गिरफ्तार कर लिया।