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‘एक अच्छा वैज्ञानिक निर्णय’: कोविशील्‍ड की खुराक के बीच गैप बढ़ाने के फैसले को सीरम CEO अदार पूनावाला ने सराहा

केंद्र सरकार ने कोविशील्‍ड वैक्‍सीन के दो डोज के बीच अंतर को बढ़ाकर 12 से 16 सप्ताह कर दिया है। अब तक 6 से 8 सप्ताह के अंतर पर कोविशील्‍ड दी जा रही थी। हालाँकि देश में बनी कोवैक्सीन की डोज के अंतराल में कोई बदलाव नहीं किया गया है।

इससे पहले, केंद्र सरकार ने कोविशील्ड वैक्सीन के दो डोज के बीच का समय पहले से दो हफ्ते ज्यादा कर दिया था। शुरुआत में कोविशील्ड के दोनों डोज के बीच 4 से 6 हफ्ते, यानी 28 से 42 दिन का अंतर रखा जाता था। इसके बाद इसे बढ़ाते हुए 6 से 8 हफ्ते यानी 42 से 56 दिन कर दिया गया था।

भारत में कोविशील्‍ड बना रहे सीरम इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया (SII) के सीईओ अदार पूनावाला ने कहा था कि अगर डोज के बीच दो-तीन महीने का अंतर हो तो वैक्‍सीन 90% तक असरदार हो जाती है। वहीं अब अदार पूनावाला ने दो डोज के बीच अंतर को बढ़ाकर 12 से 16 सप्ताह करने के सरकार के फैसले की सराहना की है। उन्होंने NDTV से बात करते हुए कहा कि गैप को बढ़ाना एक अच्छा वैज्ञानिक निर्णय है।

अदार पूनावाला ने NDTV से कहा, “यह प्रभावकारिता और इम्यूनोजेनेसिटी दोनों दृष्टिकोण से फायदेमंद है। यह एक बहुत अच्छा कदम है क्योंकि यह उन आँकड़ों पर आधारित है जो सरकार ने रिसीव किए थे। इसके आधार पर उन्होंने गैप बढ़ाने का एक अच्छा वैज्ञानिक निर्णय लिया है।” पूनावाला ने पिछले दिनों कहा था कि कोविशिल्ड वैक्सीन की प्रभावशीलता 90 प्रतिशत तक बढ़ जाती है अगर दोनों शॉट्स के बीच लगभग ढाई से 3 महीने का गैप दिया जाता है।

इस साल की शुरुआत में प्रकाशित ‘द लैंसेट’ की एक स्टडी में दावा किया गया था कि ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के सपोर्ट से एस्ट्राजेनेका द्वारा बनाई गई वैक्सीन की दो डोज के बीच अगर एक महीने का गैप दिया जाता है तो कोविशील्ड वैक्सीन 70 फीसदी प्रभाव के साथ काम करती है।

पूनावाला ने कहा कि एक महीने के गैप में डोज देने पर वैक्सीन 60-70 प्रतिशत प्रभाव दिखाती है। उन्होंने बताया कि करीब एक हजार लोगों पर एक शोध किया गया, जिसमें उनको वैक्सीन की दोनों डोज दी गईं। दोनों डोज के बीच इस दौरान 2-3 महीने का गैप दिया गया। इस शोध के रिजल्ट में सामने आया अगर वैक्सीन की डोज लोगों को 2-3 महीने के अंतराल पर दी जाती है तो इसकी प्रभावशीलता 90 प्रतिशत तक बढ़ जाएगी।

…क्यूँकि ये बंगाल है: पहले लेफ्ट-अब TMC, वही किया जिसका सावरकर को दशकों पहले हो गया था एहसास

अरस्तू ने लोकतंत्र को शासन का सबसे भ्रष्ट स्वरूप माना है। इसलिए माना है क्योंकि उन्होंने ‘लोकतांत्रिक मूल्य’ जैसी अवधारणा नहीं देखी थी। जबकि अरस्तू के बाद के राजनीति विज्ञानियों ने लोकतंत्र को लोकतांत्रिक मूल्यों के मनकों से सजाकर, इसे इतना माकूल बना दिया कि आज दुनिया का हर देश लोकतांत्रिक ‘दिखना’ चाहता है। चीन जैसा देश भी लोकतांत्रिक होने का दम भरता है।

पर ये लोकतांत्रिक मूल्य असल में हैं क्या? राजनीति की किताबों में लोकतंत्र के मायने बताते हुए वामपंथी बुद्धिजीवियों ने मोटे तौर पर यही कहा है, कि जहाँ चुनाव होते हैं, जनता अपने मताधिकार का प्रयोग करती है… वहाँ लोकतंत्र है। जो नहीं लिखा, वहीं सारा खेल उलझा हुआ है।

आज पश्चिम बंगाल में खूनी खेल (खेला) हो रहा है। लोकतंत्र के मानकों पर चुनाव हुए, लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। कोरोना के बावजूद भी किया। सब दलों ने रैलियाँ की, कोरोना के बावजूद की। एक ओर रैलियों में जनता को मोह लेने वाले वायदे किए जा रहे थे, दूसरी ओर कोरोना लोगों को लीलता जा रहा था। यह सब होता रहा… लोकतंत्र को ज़िंदा रखने के लिए!

अब लोकतंत्र जिंदा है, पर बंगाल जल रहा है। कहीं तो लोकतंत्र की स्थापना में कोई मूलभूत सैद्धान्तिक चूक हुई है! स्वामी विवेकानंद ने आजादी के बारे में एक बार कहा था, ‘आजादी मिल जाना एक बात है, आजादी को सँभाल पाना दूसरी’। यही बात लोकतंत्र पर भी सटीक बैठती है। लोकतंत्र को सँभाल पाना बड़ी बात है। उसके लिए सभ्य समाज चाहिए। लोगों में कम से कम इतना धैर्य होना चाहिए कि वे अपनी हार (बंगाल में तो हार हुई भी नहीं) को स्वीकार सकें। यह बात सिर्फ बंगाल के लिए नहीं है, यही बात उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनावों को लेकर भी सही बैठती है। आखिर यहाँ भी तो बवाल हो ही रहे हैं… गोलियाँ चल ही रही हैं।

बंगाल में दंगे और वामपंथ

हाँ, एक बात और… संभवतः ये पहला ऐसा मामला है जहाँ वामपंथी भी चुनाव पश्चात हिंसा का शिकार हुए हैं। वरना ऐसा देखने- सुनने में आमतौर पर तो नहीं आता। क्योंकि जहाँ ये मजबूत हैं वहाँ खुद ही हिंसक भूमिका में होते हैं (केरल, बंगाल के पुराने दिन, और JNU इसके पुख्ता उदाहरण हैं) और जहाँ कमज़ोर हैं, वहाँ इतने कमज़ोर हैं कि हैं ही नहीं! इस बार बंगाल से इनका सूपड़ा साफ हुआ है। जनता ने इन्हें नकार दिया है। पर इनका वो कैडर तो है ही जो सालों से दमन का दम्भ भरता रहा है। पिछली पीढ़ियों के इनके कारनामे इतने क्रूर हैं कि लोग नफरत करते हैं इनसे।

इस बार इनकी खराब हालत की एक बानगी तो यही है कि चुनाव लड़ने के लिए कैंडिडेट तक नहीं मिले इन्हें। JNU से प्रोफेसर और स्टूडेंट्स को उठा-उठाकर चुनाव लड़ाया इन्होंने। उसके लिए भी इतनी जद्दोजहद कि पर्चा दाखिल करने की तारीख से दो दिन पहले बुलाकर टिकट दे दिया। ऐसे में हरना तो था ही! प्रशांत किशोर ने अपने साक्षात्कार में साफ कहा कि उन्हें यकीन था कि बंगाल में मुसलमान एकजुट होकर वोट करेंगे, पर यही बात हिंदुओं के बारे में सच नहीं है। आश्चर्य है कि ऐसी ही बात विनायक दामोदर सावरकर ने दशकों पहले कह दी थी, उन्होंने कहा था कि हिंदुओं को खतरा किसी और धर्म से नहीं, बल्कि खुद हिंदुओं से है। बंगाल में वामपंथियों के सौजन्य से यही हुआ है!

बंगाल में दंगों का इतिहास

आज जो बंगाल में हो रहा है वह बंगाल के लिए नया नहीं है। पर बीजेपी के लिए नया है। बंगाल में राजनीतिक हिंसा का पुराना इतिहास रहा है। सरकार चाहे वामपंथियों की रही हो या तृणमूल की सबने हिंसा के रास्ते से अपना वर्चस्व कायम करने की कोशिश की है। 1946 में जिन्ना के द्वारा करवाया गया ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ का नरसंहार बंगाल के लिए दुर्भाग्यशाली जरूर था पर दुर्भाग्य से… आखिरी नहीं था। बंगाल ने नंदीग्राम भी देखा है और मरीचझापी भी।

चीन के पुराने नेता रहे माओ की वह बात कि ‘सत्ता का रास्ता बंदूक नाल से होकर गुजरता है’ को यहाँ लोगो ने बहुत गंभीरता से लिया है। और लें भी क्यों न! आखिर ‘माओ’ को भगवान मानने वाले लाल गिरोह का गढ़ रहा है बंगाल। आज जब बंगाल की जनता ने लाल झंडे को नेस्तनाबूद कर जमीन में मिला दिया है तो भी लाल गिरोह ने हिंसा की जो राह पिछले दशकों में बनाई है वो इतनी जल्दी खत्म कैसे हो जाएगी?

आज जब वामपंथी दलों के पार्टी कार्यालयों को फूँका गया, जब उनके कार्यकर्ताओं को मारा गया तब उन्हें शायद इस बात का एहसास हुआ होगा कि हिंसा बुरी बात है। इन सब बातों के आलोक में देखें तो हम पाएँगे कि हिंसा यहाँ कोई नई बात नहीं थी। राजू बिस्ता जी याद करते हैं कि जब उन्हें दार्जिलिंग लोक सभा क्षेत्र का प्रत्याशी बीजेपी ने बनाया तो उनके पास बधाई देने के लिए बहुत से फोन आए। लेकिन एक बात जो हर शुभचिंतक फोन पर दुहरा रहा था वो था कि आपको बहुत होशियार रहना है। आपके पास बॉडीगार्ड रहने चाहिए… क्यूँकि ये बंगाल है! यहाँ ‘क्यूँकि ये बंगाल है’ से आगे कुछ कहने की जरूरत नहीं होती है। यह स्वतः स्पष्ट है कि हिंसा यहाँ होनी ही है।

बंगाल में दंगों का पैटर्न

बंगाल में जो हिंसा हुई उसके पैटर्न को भी देखने की जरूरत है। बंगाल में सत्ता परिवर्तन के कुछ ऐतिहासिक मोड़ रहे हैं। स्वतन्त्रता के बाद कॉन्ग्रेस तब तक बंगाल में बनी रही जब तक नेहरू का प्रभाव रहा। उसके बाद बंगाली भद्रलोक की राजनीति शुरू हुई और वामपंथ का बंगाल की राजनीति पर कब्जा हो गया। वामपंथ का शासन में आने का मतलब था वामपंथी मंसूबों को खुली छूट मिल जाना। बंगाल में वामपंथियों के संरक्षण नरसंहार के कई वाकये हुए। बात यहाँ तक पहुँची की एक ओर तो ‘भद्रलोक’ और दूसरी ओर हिंसा इस तरह बंगाल की राजनीति में घर कर गई कि चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों को शुभकामना के साथ सावधान रहने का मशविरा देना भी आम हो गया।

ममता बनर्जी भी जब राजनीति में मुखर होकर उतरीं तो उन्हें भी वामपंथ की हिंसा का सामना करना पड़ा। कॉन्ग्रेस की कार्यकर्ता रहीं ममता पर जानलेवा हमले हुए। पर ममता की किस्मत अच्छी रही और वे राजनीति के शिखर तक पहुँचीं। ममता जब कॉन्ग्रेस से अलग होकर तृणमूल कॉन्ग्रेस के माध्यम से चुनावों आईं तो उनके साथ जो लोग जुड़े वे वही लोग थे जो किसी जमाने में वामपंथी गिरोह का हिस्सा थे। उन लोगों का तृणमूल से जुड़ना ये संदेश था कि बंगाल में सत्ता परिवर्तन होना तय है। यही हुआ भी! ममता तृणमूल के रास्ते से बंगाल की सत्ता में आईं। पर उनके साथ वामपंथ का डीएनए भी सत्ता में आया। और यही कारण है कि बंगाल में सत्ता परिवर्तन तो हुआ पर बंगाल की राजनीति से हिंसा समाप्त नहीं हुई।

अब आगे क्या? अब एक बार फिर से सत्ताधारी दल का एक बड़ा खेमा बीजेपी में शामिल हुआ है। बीजेपी इस बार के चुनावों में बहुत तेज़ी से उभरी है। ये संकेत है आने वाले समय में होने वाले सत्ता परिवर्तन का। ये बंगाल में होने वाले सत्ता परिवर्तन का पैटर्न है। बंगाल में चुनाव जीतते ही हिंसा का खूनी खेला जो तृणमूल ने खेला है, उसने बंगाल के लोगो को भी यह एहसास जरूर दिला दिया होगा कि उन्होने तृणमूल को सत्ता देकर उचित निर्णय शायद नहीं लिया।

बंगाल में दंगों का स्वरूप

एक सवाल और है। बंगाल में जो दंगे हुए उनका स्वरूप क्या था? क्या वे केवल राजनीतिक दंगे थे या राजनीति के लबादे में लिपटे हुए सांप्रदायिक दंगे थे? जवाब पाने के लिए वापस से इस बार के चुनावों में ममता बनर्जी के रणनीतिकार रहे प्रशांत किशोर के बयान को ध्यान से देखें तो हम पाएँगे कि वे शुरू से ही सांप्रदायिक लामबंदी के बल पर ही इस चुनाव को लड़ रहे थे। उन्होंने मुसलमानों की लामबंदी को ही ममता की जीत का मंत्र बताया था। चुनाव के बाद उन्होने खुद यह स्वीकारी भी! मुसलमानों की लामबंदी कैसे की गई? बीजेपी को हिंदुओं मात्र की पार्टी बताकर!

इसका सीधा मतलब यह हुआ कि मुसलमानों की लामबंदी हिंदुओं के खिलाफ की गई। उनमें हिंदुओं के खिलाफ भावनाएँ, घृणा और गुस्सा भरा गया। अब जब चुनाव पश्चात वही गुस्सा हिंदुओं पर काल बनकर टूटा तो आश्चर्य कैसा? हिन्दू तो हिन्दू है, चाहे वो वामपंथी हो या बीजेपी का! यहाँ तक कि टीएमसी के खुद के हिन्दू नेताओं ने जब इस हिंसा पर बोलने की हिमाकत की तो उन्हें भी रौंदा गया। इन सब बातों के निहितार्थ क्या हैं?

निहितार्थ वही हैं जो सावरकर ने कहा था, ‘हिन्दू कभी एक साथ लामबंद नहीं हो सकते और हिन्दू ही हिन्दू के लिए खतरा है।’ निहितार्थ वह भी है जो जिन्ना ने डायरेक्ट एक्शन डे को लेकर साजिश किया था, बंगाल को मुस्लिम बहुल राज्य बनाना। आज बंगाल में बढ़ती हुई बंगलादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्या लोगों की आबादी इस दिशा में बढ़ता प्रमाण है।

एक तरफ ये सबकुछ हो रहा है। दूसरी तरफ इस देश के वामपंथी हैं, जिन्हें इस देश की व्यवस्था को कोसने का एक और मौका मिल गया है। आने वाले समय में ये वामपंथी लोकतंत्र को तरह तरह से गरियाएँगे। बिल्कुल वैसे ही जैसे ट्रम्प के समय में अमेरिका में हो रहा था। अब इन्हें लोकतांत्रिक मूल्यों को परिभाषित करने की जरूरत महसूस होगी। इन्हें लगेगा कि लोकतंत्र के शासन में ‘रूल ऑफ लॉ’ गड़बड़ा जाता है। पर ये तो खैर वामपंथी हैं, कहते रहेंगे।

(लेखक प्रशान्त शाही, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में शोध छात्र हैं)

रॉकेट हमले में मारी गई केरल की सौम्या के परिवार की देखरेख करेगा इजरायल, हमास पर दोतरफा वार की तैयारी

इजरायल और फलस्तीन के बीच जारी संघर्ष में अब तक 90 लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें भारत के केरल की सौम्या संतोष भी हैं। इजरायल ने कहा है कि वह सौम्या के परिवार का ख्याल रखेगा।

भारत में इजरायल की उप उच्चायुक्त रॉनी येदिदिया क्लेन ने न्यूज एजेंसी एएनआई को बताया कि सौम्या के परिवार को इजरायल की ओर से न सिर्फ मुआवजा दिया जाएगा, बल्कि उनका खर्च भी उठाया जाएगा। उन्होंने कहा, “परिवार का ध्यान इजरायल की ओर से रखा जाएगा और जो हुआ उसके लिए मुआवजा दिया जाएगा। हालाँकि एक माँ और पत्नी के जाने की भरपाई कोई नहीं कर सकता।”

उन्होंने कहा, “हम परिवार के संपर्क में हैं। जब यह हादसा हुआ तो वह अपने पति से बात कर रही थी और मैं यह अंदाजा लगा सकती हूँ कि उनके पति के लिए यह कितना भयानक होगा। वह जो महसूस कर रहे होंगे उसको लेकर मैं सिर्फ संवेदना ही जाहिर कर सकती हूँ।”

उन्होंने बताया कि राजदूत ने उनके परिवार से बात कर पूरे इजरायल की तरफ से संवेदना जाहिर की थी। हम परिवार और तेल अवीव में भारतीय दूतावास के संपर्क में हैं और शव लाने का इंतजाम किया जा रहा है।

गौरतलब है कि 31 साल की सौम्या संतोष की मौत फलस्तीनी आतंकी संगठन हमास के रॉकेट हमले की चपेट में आने से हुई थी। जब हमला हुआ उस वक्त वह केरल में रह रहे अपने पति संतोष से वीडियो कॉल पर बात कर रही थी।

मूल रूप से केरल के इडुकी की रहने वाली सौम्या इजरायल के अश्कलोन शहर में जिस घर में रह रही थी, वह रॉकेट की चपेट में आ गया था। संतोष के भाई साजी ने बताया था, “मेरे भाई ने वीडियो कॉल के दौरान जोरदार धमाका सुना। अचानक फोन कट गया। तब हमने तुरंत वहाँ काम कर रहे अन्य मलयाली लोगों से संपर्क किया और हमें इस घटना के बारे में जानकारी मिली।” सौम्या सात सालों से इजरायल में थी और एक बुजुर्ग महिला की देखभाल कर रही थीं। उनका एक नौ साल का बेटा भी है जो केरल में अपने पिता के साथ रहता है।

दूसरी ओर इजरायल और फलस्तीन का संघर्ष लगातार तेज होता जा रहा। हमास का युद्धविराम प्रस्ताव ठुकराने के बाद इजरायल दोतरफा हमले की तैयारी में हैं। बताया जा रहा है कि हवाई हमलों के साथ-साथ जमीन हमले की खाका तैयार कर लिया गया है। रिपोर्टों के अनुसार संघर्ष शुरू होने के बाद से इजरायल पर 1600 से ज्यादा रॉकेट दागे जा चुके हैं। जवाब में वह गाजा में 600 से अधिक ठिकानों को निशाना बना चुका है।

उत्तर प्रदेश: 45 साल से ज्यादा उम्र के 1.45 करोड़ लोगों को लग चुका है कोरोना का टीका

उत्तर प्रदेश में 45 साल से ऊपर की उम्र के 1.45 करोड़ से ज्यादा लोगों को कोरोना का टीका लग चुका है। सीएम योगी आदित्यनाथ ने बताया कि ये टीकाकरण भारत सरकार द्वारा दिए गए फ्री टीकों से किया गया है। सीएम ने कहा कि राज्य सरकार साल की उम्र के लोगों को भी फ्री में टीका लगाने के लिए प्रतिबद्ध है।

यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गुरुवार (मई 13, 2021) को अलीगढ़ में COVID-19 कमांड कंट्रोल सेंटर का निरीक्षण किया।

उत्तर प्रदेश में पहले से लागू आंशिक ‘कोरोना कर्फ्यू’ को सरकार ने 17 मई तक के लिए बढ़ा दिया गया है। राज्‍य में बुधवार (मई 12, 2021) को संक्रमण के 18,125 नए मामले सामने आए थे। अकेले लखनऊ से 916 केस आए।

वैक्सीनेशन के लिए आधार कार्ड जरूरी नहीं

यूपी में अब वैक्सीनेशन के लिए आधार कार्ड जरूरी नहीं है। योगी सरकार ने पूर्व में दिए गए फैसले को वापस ले लिया है। यूपी में स्थायी और अस्थायी रूप से निवास करने वाले परिवारों का भी टीकाकरण किया जाएगा। राज्य सरकार ने पहले यूपी के आधार कार्ड वालों को ही वैक्सीनेशन की इजाजत दी थी। लेकिन इस निर्देश के बाद सभी का वैक्सीनेशन किया जा सकेगा।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की मिशन निदेशक अपर्णा उपाध्याय ने बुधवार को इस बारे में सभी जिलाधिकारियों और मुख्य चिकित्सा अधिकारियों को निर्देश जारी कर दिया है। जारी निर्देश में कहा गया है कि प्रदेश में वर्तमान में निवास कर रहे प्रत्येक परिवार के सदस्य अपने निवास के प्रमाण-पत्र के रूप में किराया या लीज अनुबंध, बिजली का बिल, बैंक पासबुक या नियोक्ता की ओर से जारी प्रमाण -त्र आदि दिखाकर अपना टीकाकरण करा सकते हैं।

यूपी में आरआरटी टीमों की संख्या बढ़ाई गई

कानपुर देहात के सीएमओ रमेश कटियार ने कहा, “गाँव में प्रचार और प्रसार को रोकने के लिए हम कटिबद्ध हैं। आरआरटी टीमों की संख्या बढ़ाई गई है, हमारे यहाँ 60 आरआरटी टीमें हैं, ये प्रतिदिन होम आइसोलेशन के मरीजों के पास जाती हैं और उनका हाल-चाल लेती हैं।”

योगी सरकार की प्लानिंग की WHO भी मुरीद

गौरतलब है कि भारत में कोरोना संक्रमण के फैलते प्रकोप के बीच वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) ने योगी सरकार के डोर-टू-डोर कैम्पेन की तारीफ अपनी वेबसाइट पर की। 7 मई को प्रकाशित एक लेख में WHO ने बताया कि कैसे योगी सरकार ने महामारी के समय में आवश्यक कदम उठाते हुए उन्हें जमीनी स्तर पर लागू किया।

लेख में कहा गया कि योगी सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में COVID-19 के मद्देनजर हाउस टू हाउस एक्टिव केस फाइंडिंग शुरू की है। इस प्रक्रिया में उन्हें आइसोलेट किया गया जिनमें कोविड के लक्षण थे। WHO ने कहा था कि योगी सरकार ने 1,41,610 टीमों को इस काम में लगाया है। इन टीमों में राज्य स्वास्थ्य विभाग से 21,242 सुपरवाइजर थे, जिनका काम ये सुनिश्चित करना था कि अभियान में कोई ग्रामीण इलाका न छूटे।

AMU में पहली बार CM योगी आदित्यनाथ, कोरोना से 35 प्रोफेसरों की मौत के बाद हालात का लिया जायजा

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गुरुवार (13 मई 2021) को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) पहुँचे। कोरोना के कारण बीते तीन हफ्तों में यूनिवर्सिटी के 35 प्रोफेसर्स की मौत हो चुकी है। दो दिन पहले मुख्यमंत्री ने एएमयू के वीसी तारिक मंसूर से भी बात की थी। अब विश्वविद्यालय परिसर पहुँच उन्होंने वीसी समेत तमाम अधिकारियों से बातचीत की और संक्रमित कर्मचारियों के बारे में जानकारी ली।

सीएम योगी पहली बार विश्वविद्यालय परिसर में पहुँचे थे। इस विश्वविद्यालय में जाने वाले वे पहले भाजपाई सीएम हैं। इससे पहले 1988 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी एएमयू में आए थे। यह विश्वविद्यालय वर्ष 1920 में सर सैयद अहमद खान द्वारा स्थापित किया गया था।

सीएम गुरुवार को अलीगढ़, मथुरा और आगरा के दौरे पर थे। अलीगढ़ में उन्होंने कोविड कमान सेंटर का भी दौरा किया। सीएम ने एएमयू में कोरोना से संक्रमित लोगों के समुचित इलाज और हर संभव मदद के लिए प्रशासनिक अधिकारियों को निर्देश भी दिए।

प्रशासनिक अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों, एएमयू वीसी और चिकित्सकों के साथ सीएम योगी ने बैठक की। बैठक के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मीडिया को जानकारी देते हुए कहा कि अलीगढ़ मंडल में एक्टिव केस घट रहे हैं। सभी जनपद जाँच बढ़ा रहे हैं। ऑक्सीजन लगातार भेजी जा रही है। 161 वेंटिलेटर मंडल में चालू हैं। 

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गुरुवार को हेलीपैड पर उतरने के बाद सीधे कलेक्ट्रेट पहुँचे। यहाँ से सीधे कमांड एंड कंट्रोल सेंटर गए। वहाँ कोरोना संक्रमितों की टेस्टिंग ट्रेसिंग ट्रीटमेंट के बारे में डीएम चंद्र भूषण सिंह से जानकारी ली। कंट्रोल सेंटर में लगाई गई स्क्रीन पर अलीगढ़ के सरकारी और निजी अस्पतालों में चल रहे कोरोना मरीजों के इलाज के बारे में जाना। 

गौरतलब है कि AMU से जुड़े इतने लोगों के निधन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विश्विद्यालय के कुलपति से बात की थी। विश्वविद्यालय पहुँचने से पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दो बार विश्वविद्यालय के कुलपति से फोन पर वार्ता कर जीवनरक्षक दवाई तथा ऑक्सीजन मुहैया कराई।

UP में होम आइसोलेशन में भी ऑक्सीजन सिलिंडर, CM योगी का आदेश: 24 घंटों में 3471 मरीजों को फायदा

मार्च/अप्रैल में कोरोना की आई दूसरी लहर की संक्रमण दर पहले की तुलना में 30 से 50 गुना संक्रामक थी। इसी अनुपात में ऑक्सीजन (साँस) की चौतरफा माँग भी निकली। माँग में अभूतपूर्व वृद्धि के नाते ऑक्सीजन की कमी को लेकर देश के अधिकांश राज्यों को परेशान होना पड़ा। उत्तर प्रदेश में भी ऑक्सीजन की कमी को लेकर हाहाकार मचा। लोग ऑक्सीजन के सिलिंडर को पाने के लिए परेशान हुए। कोरोना संक्रमित मरीजों का इलाज करने वाले अस्पताल भी मरीजों की साँस को सहेजने के लिए सरकार से ऑक्सीजन उपलब्ध कराने की माँग करने लगे।

ऑक्सीजन रीफिलर के पास ऑक्सीजन के सिलिंडर लेने वालों की भीड़ लगने लगी तो ऑक्सीजन की इस भयावह कमी को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दूर करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने कोरोना संक्रमित हर मरीज की साँसों को सहेजने के लिए ऑक्सीजन की उपलब्धता के लिए जो योजना तैयार की, उसके चलते आज यूपी में ऑक्सीजन की कहीं कोई कमी नहीं है।

राज्य के हर जिले में मरीजों की सांसों को सहेजने के लिए पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन के सिलेंडर मौजूद हैं। ऑक्सीजन की इस उपलब्धता के चलते अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने होम आइसोलेशन में कोरोना संक्रमण का इलाज कर रहे लोगों को भी ऑक्सीजन सिलेंडर मुहैया कराए जाने का निर्देश दिया। यह काम शुरू भी हो गया और बीते 24 घंटे के दौरान होम आइसोलेशन में 3471 कोरोना संक्रमितों को 26.44 मीट्रिक टन ऑक्सीजन उपलब्ध कराई गई।

UP में योगी सरकार के किन फैसलों से बदली स्थिति

ऑक्सीजन को लेकर चंद दिनों पहले ऐसा सकारात्मक माहौल नहीं था। अभी भी प्रदेश से सटी दिल्ली में ऑक्सीजन कमी बनी हुई है। फिर उत्तर प्रदेश ने ऑक्सीजन की कमी को कैसे दूर किया? इसके लिए, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की देखरेख में चिकित्सा विशेषज्ञों की सलाह पर टीम-9 के अफसरों का टास्क फोर्स। इसके चलते आज यूपी में ना सिर्फ ऑक्सीजन की कमी खत्म हुई है बल्कि अब ऐसी व्यवस्था की जा रही है, जिसके चलते यूपी में कभी भी किसी अस्पताल को ऑक्सीजन की कमी होने ही नहीं पाएगी।

आखिर वह क्या योजना थी, जिसके चलते यूपी में ऑक्सीजन की कमी खत्म हुई। इस बारे चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि ऑक्सीजन की कमी को दूर करने के पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सबसे पहले यह जाना कि ऑक्सीजन की कमी क्यों हो रही है और इसे कैसे दूर करने के लिए क्या-क्या किया जाए? इस पर उन्हें बताया गया कि मेडिकल ऑक्सीजन विश्व स्वास्थ्य संगठन की आवश्यक दवाओं की सूची में शामिल है।

ऑक्सीजन किल्लत खत्म करने के लिए किए जा रहे उपाय

कोरोना वायरस मरीजों के फेफड़ों को क्षति पहुँचाता है, जिससे बॉडी में ऑक्सीजन लेवल गिर जाता है। तब जान बचाने के लिए पेशेंट को ऑक्सीजन देने की जरूरत पड़ती है। कोरोना की दूसरी लहर में मेडिकल ऑक्सीजन की माँग बहुत ज्यादा बढ़ी है और खपत भी। लेकिन आपूर्ति में बाधा से कई अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी सामने आ रही है। ऑक्सीजन के वितरण की व्यवस्था की कमी इसकी कमी का सबसे प्रमुख कारण है।

यह जानने के बाद मुख्यमंत्री योगी ने भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए सभी जिलों में ऑक्सीजन की उपलब्धता के लिए ऑक्सीजन प्लांट स्थापित करने का फैसला किया है। इसके लिए बजट भी सरकार ने जारी कर दिया है। इसके साथ ही भारत सरकार, राज्य सरकार और निजी क्षेत्र द्वारा प्रदेश में ऑक्सीजन प्लांट स्थापित करने की कार्यवाही भी शुरू की गई है। विभिन्न पीएसयू भी अपने स्तर पर प्लांट स्थापित करा रही हैं। इसके साथ ही गन्ना विकास एवं चीनी उद्योग और आबकारी विभाग द्वारा ऑक्सीजन जनरेशन की दिशा में विशेष प्रयास किए जा रहे हैं। यह विभाग प्रदेश के सभी 75 जिलों में ऑक्सीजन जनरेटर लगाएगा।

एमएसएमई इकाइयों की ओर से भी ऑक्सीजन की कमी को दूर करने के मामले में सहयोग मिल रहा है। इसके अलावा सरकार ने सीएचसी स्तर से लेकर बड़े अस्पतालों तक में ऑक्सीजन कंसंट्रेटर उपलब्ध कराए हैं। यह सभी क्रियाशील रहें, इसे सुनिश्चित किया गया। और जिलों की जरूरतों के अनुसार और ऑक्सीजन कंसंट्रेटर खरीदे जाने की अनुमति भी दी गई है।

इसके अलावा उन्होंने तकनीक का इस्तेमाल कर ऑक्सीजन की माँग और आपूर्ति में संतुलन बनाने का निर्देश दिया। और ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए 24 घंटे सॉफ्टवेयर आधारित कंट्रोल रूम, ऑक्सीजन टैंकरों में जीपीएस और ऑक्सीजन के वेस्टेज को रोकने के लिए सात प्रतिष्ठित संस्थाओं से ऑडिट की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा दूसरे राज्यों से ऑक्सीजन मँगाने के लिए ऑक्सीजन एक्सप्रेस और वायु सेना के जहाजों की भी सहायता ली।

क्रायोजेनिक टैंकरों को लेकर योगी सरकार का फैसला

प्रदेश में ऑक्सीजन की आपूर्ति को बेहतर करने के लिए उन्होंने टैंकरों की संख्या में इजाफा करने का भी फैसला किया। यूपी में ऑक्सीजन लाने के लिए 64 ऑक्सीजन टैंकर थे, जो अब बढ़कर 89 ऑक्सीजन टैंकर हो गए हैं। केंद्र सरकार ने भी प्रदेश को 400 मीट्रिक टन के 14 टैंकर दिए हैं। मुख्यमंत्री के प्रयासों से रिलायंस और अडानी जैसे निजी औद्योगिक समूहों की ओर से भी टैंकर उपलब्ध कराए गए हैं।

इसके बाद भी ऑक्सीजन की उपलब्धता को लेकर चिकित्सा विशेषज्ञों ने टैंकरों की संख्या बढ़ाने की सलाह दी। इस पर सरकार ने क्रायोजेनिक टैंकरों के संबंध में ग्लोबल टेंडर निकाला। जिसके चलते अब ऑक्सीजन की और बेहतर उपलब्धता के लिए देश में क्रायोजेनिक टैंकरों के लिए ग्लोबल टेंडर करने वाला पहला राज्य यूपी बन गया है। अब यूपी में ऑक्सीजन की कमी को पूरी तरह दूर कर दिया गया है।

कितना हो रहा UP में ऑक्सीजन वितरण

बीती 11 मई को 1011 मीट्रिक टन ऑक्सीजन का वितरण किया गया। इसमें रीफिलर को 632 मीट्रिक टन ऑक्सीजन और मेडिकल कॉलेजों तथा चिकित्सालयों को 301 मीट्रिक टन ऑक्सीजन दी गई। जबकि 12 मई को प्रदेश में 1014.53 मीट्रिक टन ऑक्सीजन का वितरण किया गया। जिसके तहत रीफिलर को 619.59 मीट्रिक टन ऑक्सीजन और मेडिकल कॉलेजों तथा चिकित्सालयों को 302.62 मीट्रिक टन ऑक्सीजन दी गई। और होम आइसोलेशन में इलाज कर रहे 4105 कोरोना संक्रमितों को 27.9 मीट्रिक टन ऑक्सीजन उपलब्ध कराई गई।

इसी प्रकार 13 मई को प्रदेश में 1031.43 मीट्रिक टन ऑक्सीजन का वितरण किया गया। जिसके तहत रीफिलर को 623.11 मीट्रिक टन ऑक्सीजन और मेडिकल कालेजों तथा चिकित्सालयों को 313.02 मीट्रिक टन ऑक्सीजन दी गई। और होम आइसोलेशन में इलाज कर रहे 3471 कोरोना संक्रमितों को 26.44 मीट्रिक टन ऑक्सीजन उपलब्ध कराई गई। प्राइवेट अस्पतालों को 95.29 मीट्रिक टन ऑक्सीजन दी गई है। जाहिर है कि लोगों की सांसों को संजीदगी से सहेजने को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ऑक्सीजन उपलब्धता की रणनीति कारगर साबित हो रही है।

हिरोइन है, फलस्तीन के समर्थन में नारे लगा रही थीं… इजरायली पुलिस ने टाँग में मारी गोली

इजरायल और फलस्तीन के बीच चल रहे संघर्ष में एक हिरोइन जख्मी हो गईं। उनका नाम है मैसा अब्द इलाहदी। वह इजरायल के खिलाफ हाइफा शहर में हुए प्रदर्शन में शामिल थीं। कथित तौर पर इसी दौरान फलस्तीनी हिरोइन के पैरों में इजरायली पुलिस ने गोली मार दी। इस बात की जानकारी खुद इलाहदी ने सोशल मीडिया के जरिए दी है।

इंस्टाग्राम पोस्ट में अभिनेत्री ने अपनी मदद करने वालों का आभार जताया है। उन्होंने दावा किया है कि इजरायली पुलिस ने उनके पैर में गोली मारी थी, जिससे वो तेजी से ठीक हो रही हैं।

अपना दर्द इंस्टाग्राम पर बयाँ करते हुए मैसा ने कहा कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि जिंदगी में ऐसी पोस्ट भी लिखनी पड़ेगी। इसे लिखते हुए शर्मिंदगी महसूस हो रही है, क्योंकि इससे ज्यादा दर्द और तकलीफें मेरे अपने लोग महसूस कर रहे हैं।

एक्ट्रेस ईस्ट येरुशलम से फलस्तीनी परिवारों को निकाले जाने के खिलाफ प्रदर्शन कर रही थीं। इंस्टाग्राम पोस्ट में मैसा ने लिखा कि मुझे ये नही पता था कि मैरे पैर में जो लगा वो ग्रेनेड था या कुछ और, लेकिन इतना जरूर याद है कि मैं पीड़ा के कारण चीख रही थी। पैर की हालत देखकर मैं काफी परेशान थी। इस बीच वहाँ प्रदर्शन कर रहे लोग आए और मुझे ले गए। अभिनेत्री ने बताया कि पास के पार्क में ले जाकर उनका इलाज किया गया। उनके पास पैरामेडिक था, जिससे मेरे पैर के बहते खून को रोका गया।

मैसा ने आरोप लगाया है, “इजराइली पुलिस और फोर्सेज किसी भी फलस्तीनी पर हमला करने या उन्हें गोली मारने से बिल्कुल भी नहीं हिचक रही थीं, फिर चाहे वो उनके लिए कोई खतरा पैदा करे या न करे। यह कोई पहली बार नहीं है जब पुलिस और सेना ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे लोगों पर हमला किया है। इसमें कोई दो राय नहीं कि फलस्तीनी होने के कारण मुझे धमकियाँ मिल रही थीं। अब ये स्पष्ट हो गया है कि हम युद्ध का सामना कर रहे हैं और अगर कोई चीज है जो हमें बचा सकती है तो वो है किस्मत।” अभिनेत्री ने बीते एक सप्ताह के दौरान विवादित क्षेत्र में जाने का वीडियो भी इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया है।

मुस्लिम तुष्टिकरण यह भी: एक महिला मार दी गई और CM ‘आतंकियों’ को ‘उग्रवादी’ तक नहीं कह सकता

लोकतांत्रिक देशों में पोलिटिकल करेक्टनेस की खातिर मुस्लिम समाज को लेकर कुछ कहना या न कहना अब एक मर्ज बन चुका है। यूरोपीय देश हों या अमेरिका, कनाडा हो या भारत, हर देश में केवल राजनीति ही नहीं, प्रशासन, मीडिया और न्याय-व्यवस्था तक इस मर्ज से पीड़ित है।

इन सबके ऊपर यह कि मर्ज बढ़ता जा रहा है और फिलहाल कोई इलाज नहीं सूझ रहा। पोलिटिकल करेक्टनेस की रक्षा में इलाज खोजने की कोशिश बंद कर देना एकमात्र इलाज दिखाई दे रहा है। जैसे सब उसी समाज से अनुरोध कर रहे हों कि; तुम्हीं कोई इलाज बताओ।
    
भारत में यह मर्ज पिछले चार दशकों में जिस तेज़ी से फैला है, वैसा उदाहरण बहुत कम देशों में दिखाई देता है। पहले, जब राजनीतिक आचरण और प्रतिक्रियाएँ केवल परंपरागत मीडिया पर दिखाई देते थे, तब किसी भी टिप्पणी में शब्दों का चयन तक बहुत योजनाबद्ध तरीके से किया जाता था। हाल यह था कि दल या नेता बोलने से पहले शब्दों पर मात्र इसलिए ध्यान रखते थे कि कहीं कोई नाराज न हो जाए। अब इसलिए ध्यान रखते हैं कि कहीं कोई हिंसा पर उतारू न हो जाए। 

शरुआती दिनों में राजनीतिक दलों के नेता अपने वक्तव्यों में इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों को लेकर सावधानी बरतने लगे। आगे चलकर यह सावधानी ऐसी फली-फूली कि रमजान के दौरान ‘सेक्युलर’ नेता इफ्तार पार्टियों में शामिल होने के लिए अरबों की तरह पोशाक पहन कर आने लगे।

एक समय ऐसा भी आया जब यह बात केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रही और संवैधानिक पदों पर बैठा लगभग हर व्यक्ति रमजान के दिनों में इफ्तार का आयोजन करने लगा। इसका असर यह हुआ कि ‘सेक्युलर’ नेता इन दिनों में मुस्लिम समाज के लोगों से भी अधिक मुस्लिम दिखाई देने लगे। मीडिया इफ्तार की कवरेज के लिए पूरी टीम खड़ी करने लगा। बीबीसी कश्मीरी आतंकवादियों के लिए गनमेन जैसे शब्दों का प्रयोग करने लगा।

मीडिया ने मुस्लिम समाज के लिए समुदाय विशेष जैसे शब्दों का प्रयोग शुरू किया। पोलिटिकल करेक्टनेस की महिमा थी कि प्रशासन ने भी इस समाज को छूट देनी शुरू की। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय की ओर से मुस्लिम देशों से सम्बंधित किसी मुद्दे पर दिए जाने वाले वक्तव्यों और प्रेस नोट में इस्तेमाल किए जाने वाले शब्दों ने पोलिटिकल करेक्टनेस को उसकी पराकाष्ठा तक पहुँचा दिया।

राजनीतिक दल पाकिस्तान या फिलिस्तीन के खिलाफ कुछ भी बोलने से कतराने लगे क्योंकि उन्हें लगता था कि भारतवर्ष का मुसलमान नाराज़ हो जाएगा। इसी पोलिटिकल करेक्टनेस का तकाजा था जो मणिशंकर ऐय्यर ने एक पाकिस्तानी न्यूज़ चैनल पर मोदी सरकार के बारे में कहा कि; उन्हें हटाइए, हमें ले आइए और राजनीति के इसी पहलू ने पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह से कहलवाया कि; देश के संशाधनों पर पहला अधिकार मुसलामानों का है। 

कालांतर में शब्दों और प्रतिक्रियाओं को लेकर सतर्क लोगों ने अपने पोलिटिकल करेक्टनेस को नया आयाम दिया और इस समाज से जुड़े अधिकतर विषयों और घटनाओं पर प्रतिक्रिया देनी ही बंद कर दी। राजनीतिक प्रॉफिट-लॉस से उत्पन्न होने वाली पुरानी आदतों का असर यह हुआ कि जहाँ भी संदेह होता कि कोई बात समाज को नाराज़ कर सकती है, वह बात कही ही नहीं गई। सतर्कता के साथ दी जाने वाली प्रतिक्रिया की नीति को प्रतिक्रिया न देने वाली नीति ने रिप्लेस कर दिया।   

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के आने के बाद और अधिकतर लोगों की उस पर उपस्थिति के कारण किसी भी घटना पर तुरंत प्रतिक्रिया देना एक स्वाभाविक बात हो गई। सोशल मीडिया का चरित्र ही ऐसा है कि लगातार बदलती हेडलाइन के बीच त्वरित प्रतिक्रिया आवश्यक हो जाती है। ऐसे में सोची-समझी और सावधान प्रतिक्रिया के लिए स्पेस कम बचा है। यही कारण है कि सोशल मीडिया पोस्ट पर अब मुस्लिम समाज सबसे अधिक और सबसे पहले नाराज होता है। एक फेसबुक पोस्ट के कारण बंगलुरू में हुए दंगे इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। उसके पहले पश्चिम बंगाल में भी फेसबुक पोस्ट पर दंगे हुए थे। छोटी-छोटी बातों पर इस समाज को नाराज़ होते देर नहीं लगती। 

बंगलुरू में हुए दंगे तो एक आम भारतीय के फेसबुक पोस्ट पर हुए थे और ऐसी घटनाओं का एक पूरा इतिहास रहा है। पर यह घटनाएँ अब आम भारतीयों के सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित नहीं रहीं और अब नेताओं और मंत्रियों के सोशल मीडिया पोस्ट पर भी होने लगी हैं।

केरल में जो हुआ, इसका सबसे बड़ा उदहारण है। एक खबर के अनुसार मुख्यमंत्री विजयन और पूर्व मुख्यमंत्री ओमेन चंडी को अपने-अपने फेसबुक पोस्ट में इसलिए बदलाव करना पड़ा क्योंकि हाल ही में इजराइल में हमास द्वारा किए हमले में मारी गईं केरल की सौम्या संतोष की मृत्यु पर दुःख प्रकट करते हुए मुख्यमंत्री विजयन ने लिखा था कि; सौम्या की मृत्यु उग्रवादियों द्वारा फायर किए गए रॉकेट की वजह से हुई।  

भाजपा नेता शोभा सुरेंद्रन की मानें तो मुस्लिम समाज की ओर से इतना बड़ा बवाल हुआ कि मुख्यमंत्री विजयन और पूर्व मुख्यमंत्री चंडी को अपने फेसबुक पोस्ट को एडिट करके उग्रवादी शब्द हटाना पड़ा। केरल की हालत को लेकर आए दिन बहस छिड़ी रहती है कि कैसे राज्य में छोटी-छोटी बात पर मुस्लिम समाज के लोग न केवल नाराज हो जाते हैं बल्कि अपनी ताकत दिखाने का कोई मौका जाने नहीं देते।

अब हालात ऐसे हैं कि बवाल करके मुख्यमंत्री तक के फेसबुक एडिट करवाए जा रहे हैं। किसी और देश में रॉकेट हमला करने वालों को यदि भारत के एक राज्य के मुख्यमंत्री और पूर्व मुख्यमंत्री उग्रवादी नहीं कह सकते तो फिर क्या होना है, उसका अनुमान लगाना कोई मुश्किल काम नहीं है। 

यह पोलिटिकल करेक्टनेस का ही असर है कि कान्ग्रेस के नेता ओमेन चंडी को फिलिस्तीन के समर्थकों ने याद दिलाया कि इंदिरा गाँधी और यासेर अराफात के सम्बन्ध कितने प्रगाढ़ थे। सीपीआई (एम) ने तो केंद्र सरकार को सुझाव दिए कि किन शब्दों में इजराइल की आलोचना करनी है और फिलिस्तीन का समर्थन करना है। सोशल मीडिया के जमाने में पोलिटिकल करेक्टनेस जहाँ एक तरफ कम हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ दबाव में बढ़ भी रहा है। आने वाले समय में यह किस ओर जाएगा, यह देखना दिलचस्प होगा।

जिनके पिता का नाम मोहम्मद, उस सुपरमॉडल ने कहा- इजरायल कोई देश नहीं, पीड़ित है फलस्तीन

अमेरिकी सुपरमॉडल बेला हदीद ने फलस्तीन का समर्थन का समर्थन करते हुए इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट डाल विवाद खड़ा कर दिया है। इसमें कहा गया है कि ‘इजरायल देश नहीं’ है। इंस्टाग्राम पर 4.2 करोड़ फॉलोअर्स वाली बेला ने बुधवार (12 मई 2021) को कॉर्टूनों की एक सीरीज शेयर की, जिसमें इजरायल को ‘कब्जा करने वाला’ और फलस्तीन को ‘पीड़ित’ बताया गया है।

ऐतिहासिक अशुद्धियों से भरी और यहूदी विरोधी इस पोस्ट को बेला की बड़ी बहन गिगी ने भी लाइक किया, जिनके इंस्टाग्राम पर 6.6 करोड़ फॉलोअर्स हैं। 24 वर्षीय बेला और 26 वर्षीय गिगी फलस्तीन के प्रति समर्थन को लेकर काफी मुखर रही हैं। इसके लिए कई मार्च और विरोध-प्रदर्शनों में भी हिस्सा ले चुकी हैं।

बेला हदीद की ये पोस्ट ऐसे में सामने आई है जब गुरुवार (13 मई) को इजरायल ने गाजा पट्टी में कड़ी सैन्य कार्रवाई करते हुए हमास के 11 शीर्ष आतंकियों को ढेर कर दिया। बेला और गिगी के 72 वर्षीय पिता मोहम्मद हदीद एक फलस्तीनी हैं। उनका जन्म नवंबर 1948 में नाजारेथ में हुआ था। उनके जन्म के चार महीने पहले ही नाजारेथ पर इजरायली सेना ने अधिकार जमा लिया था। मोहम्मद का परिवार इसके बाद सीरिया भाग गया था और अंत में अमेरिका में बस गया। उनके पास जॉर्डन और अमेरिकी नागरिकता है।

गलत जानकारियों से भरे कॉर्टून

बेला हदीद ने इंस्टाग्राम पर कॉर्टून के जरिए इजरायलफलस्तीन के इतिहास पर जानकारी देने की कोशिश की है। लेकिन इन कॉर्टूनों में भयंकर ऐतिहासिक गलतियाँ हैं। उदाहरण के तौर पर बेला द्वारा शेयर एक कॉर्टून में इजरायल को एक उपनिवेश के रूप में वर्णित किया गया है जो कि गलत है, क्योंकि यहूदी लोग सदियों से इस क्षेत्र में थे।

इजरायल पर ‘जातीय सफाया’ और ‘सैन्य कब्जे’ करने का भी उनका आरोप गलत है, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में यहाँ सीमाओं का पुनर्विकास किया गया था। साथ ही वह इस क्षेत्र में संघर्ष की वजह धार्मिक बताने को लेकर भी गलत हैं, क्योंकि इजरायल और फलस्तीन अपने-अपने नेताओं को चुनने और अपने नियमों के तहत जीने के लिए स्वतंत्र हैं।

झूठ फैला सोशल मीडिया में घिरीं

इजरायल के खिलाफ अपनी इस पोस्ट को लेकर बेला हदीद सोशल मीडिया में आलोचकों के निशाने पर आ गईं। एक महिला ने लिखा, “आप ऐसे बोलती हैं जैसे आप जानती हैं कि आप किस बारे में बात कर रही हैं। पहले अपनी जानकारी बढ़ाइए।” एक ने लिखा, “बहुत सारी तथ्यात्मक गलत बातें।” एक अन्य ने बेला से कहा, “जाइए किताब पढ़िए।” एक अन्य ने कहा, “झूठ”।

एक यूजर ने कहा, “यह पूरी तरह पक्षपातपूर्ण है।” एक अन्य ने कहा, “अपने भाइयों और बहनों के लिए कोई वास्तविक परिवर्तन करने के बजाय यह यहूदियों को शर्मिंदा करने के एक तरीके की तरह लगता है।”

ऑडिट का आदेश होते ही दिल्ली में ऑक्सीजन की डिमांड गिरी: सरप्लस थ्योरी से बचेगी केजरीवाल सरकार की गर्दन?

दिल्ली में मेडिकल ऑक्सीजन की कमी पर आम आदमी पार्टी (AAP) की क्षुद्र राजनीति आपने देखी होगी। अब अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आप सरकार ने सरप्लस ऑक्सीजन होने की बात कही है। गुरुवार (13 मई 2021) को उसने सरप्लस (अतिरिक्त) ऑक्सीजन का ऐलान करते हुए कहा कि जरूरतमंद राज्यों को यह दिया जा सकता है।

दिलचस्प बात यह है कि यह घोषणा सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रीय राजधानी में ऑक्सीजन की आपूर्ति, वितरण और उपयोग का ऑडिट करने के लिए एक पैनल की स्थापना के बाद की गई है।

दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा कि COVID-19 स्थिति के आकलन के बाद फिलहाल दिल्ली की ऑक्सीजन की जरूरत 582 मीट्रिक टन प्रतिदिन है। एक जिम्मेदार सरकार के रूप में हम अपनी सरप्लस ऑक्सीजन उन राज्यों को देने को तैयार हैं, जिन्हें इसकी आवश्यकता है।

सिसोदिया ने कहा कि दिल्ली में कोरोना के मामलों में आ रही कमी बहुत ही राहत की बात है। अस्पतालों में मरीजों की मौजूदा संख्या को देखते हुए ऑक्सीजन की जरूरत भी कम हुई है। इसे देखते हुए दिल्ली सरकार ने केन्द्र को चिट्ठी लिखकर कहा है कि ऑक्सीजन की माँग में अब कमी आई है, इसलिए दिल्ली को अब 700 की जगह 582 मीट्रिक टन की आवश्यकता है। हमने केंद्र सरकार से बाकी ऑक्सीजन जरूरतमंद राज्य को देने के लिए अनुरोध किया है।

बता दें कि 18 अप्रैल 2021 को केजरीवाल सरकार ने 700 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की माँग की थी।

उस दिन, दिल्ली में 74,941 सक्रिय कोरोना वायरस के मामले थे। गुरुवार (मई 13, 2021) को जब केजरीवाल सरकार ने कहा है कि ऑक्सीजन की आवश्यकता घट कर 582 मीट्रिक टन हो गई है, दिल्ली में सक्रिय मामले 82,725 हैं।

दिल्ली में ऑक्सीजन की आवश्यकता पर बदलती माँग

दिलचस्प बात यह है कि AAP सरकार राष्ट्रीय राजधानी में ऑक्सीजन की आवश्यकता पर अपने ही रुख का विरोध कर रही है। अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली AAP सरकार ने कहा था कि राष्ट्रीय राजधानी में संकट से बाहर निकलने के लिए दिल्ली को कम से कम 976 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की दैनिक आपूर्ति की आवश्यकता है। आवश्यक 976 मीट्रिक टन ऑक्सीजन प्रदान नहीं करने के लिए केंद्र सरकार पर दोषारोपण कर रही थी। लेकिन कोर्ट के आदेशों के बाद 730 एमटी ऑक्सीजन की आपूर्ति होने के बाद सीएम ने कहना शुरू कर दिया कि उनके पास हजारों नए ऑक्सीजन बेड शुरू करने के लिए पर्याप्त ऑक्सीजन है।

और अब जब शीर्ष अदालत ने AAP सरकार की कड़ी आपत्ति के बावजूद, दिल्ली में ऑक्सीजन ऑडिट करने के लिए एक पैनल नियुक्त किया है, केजरीवाल सरकार ने प्रति दिन 582 मीट्रिक टन ऑक्सीजन के लिए सीधे समझौता किया है।

यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि केंद्र का प्रतिनिधित्व करने वाले सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शीर्ष अदालत में जोर देकर कहा था कि दिल्ली की 700 मीट्रिक टन मेडिकल ऑक्सीजन (LMO) की माँग आवश्यकता से परे थी। उन्होंने कहा कि 500-600 में भी काम हो सकता था। उन्होंने अदालत में जोर देकर कहा था कि दिल्ली में ऑक्सीजन के वितरण में किसी भी तरह के गड़बड़ी की जाँच करने के लिए एक ऑडिट होना चाहिए।

केजरीवाल सरकार द्वारा इसका कड़ा विरोध किया गया था, जिसमें कहा गया था कि दिल्ली को ऑक्सीजन के आवंटन में ग्राउंड की वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित नहीं किया गया था और यह केवल कागजी कार्रवाई थी, और यदि ऑडिट की आवश्यकता है, तो यह केंद्र सरकार के मनमाने आवंटन पर होना चाहिए।

केंद्र द्वारा ऑडिट कराने के प्रस्ताव के तुरंत बाद, दिल्ली की ऑक्सीजन की माँग जादुई रूप से 976 मीट्रिक टन से घटकर 730 मीट्रिक टन ऑक्सीजन पर आ गई थी, जो अब सुप्रीम कोर्ट के ऑडिट के निर्देश देने के बाद 582 मीट्रिक टन प्रति दिन हो गई है।

मेडिकल ऑक्सीजन के इस शोरगुल के बीच, राष्ट्रीय राजधानी में एक बड़े घोटाले का खुलासा हुआ, जिसमें AAP के कई मंत्री और सहयोगी मेडिकल ऑक्सीजन और आवश्यक चिकित्सा आपूर्ति के ब्लैक मार्केटिंग में शामिल पाए गए