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फिर से लॉकडाउन लगाने की तैयारी में सीएम केजरीवाल: वहीं उनके मंत्री ने कल किया था तालाबंदी से इनकार

दिल्ली में कोरोना संक्रमण का कहर लगातार बढ़ रहा है। जिसको लेकर एक तरफ जहाँ केजरीवाल सरकार के स्वास्थ्य मंत्री दिल्ली में दोबारा से लॉकडाउन लगाने से इनकार कर रहे थे वहीं आम आदमी पार्टी प्रमुख और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल लॉकडाउन फिर से लगाने की तैयारी में लगे है। सीएम और स्वास्थ्य मंत्री के दोहरे बयान ने दिल्ली जनता को उलझा कर रख दिया है।

रिपोर्ट के अनुसार, सीएम ने तेजी से फैलते संक्रमण को देखते हुए मंगलवार (17 अक्टूबर, 2020) को कहा, अगर भीड़भाड़ कम नहीं हुई तो बाजार बंद करने की अनुमति के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा जाएगा। CM ने कहा कि दरअसल दिल्ली में मामले बढ़ रहे हैं ऐसे में हम केंद्र सरकार को एक सामान्य प्रस्ताव भेज रहे हैं कि यदि आवश्यक हो तो दिल्ली सरकार उन बाजारों को कुछ दिनों के लिए बंद कर सकती है, जहाँ कोविड प्रोटोकॉल्स का पालन नहीं किया जा रहा है और वे एक स्थानीय हॉटस्पॉट बन रहे हैं।

सीएम ने यह भी कहा, “जब कुछ सप्ताह पहले दिल्ली में कोरोना की स्थिति में सुधार हुआ, तो शादी में शामिल होने वाले लोगों की संख्या 200 कर दी गई। अब इसे वापस लिया जा रहा है और केवल 50 लोगों को अनुमति दी जाएगी। यह प्रस्ताव एलजी के पास भेजा गया है।”

गौरतलब है कि सीएम का यह बयान दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन द्वारा कल की गई टिप्पणी के बाद आया है, जिसने लोगों को काफी हैरान कर दिया। दरअसल, दिल्‍ली के स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री सत्‍येंद्र जैन ने सोमवार को कहा था कि राजधानी में कोविड की तीसरी लहर खत्‍म हो गई है। उन्‍होंने कहा था कि लॉकडाउन लगाने का कोई प्‍लान नहीं है।

पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि, “दिल्ली में फिर से लॉकडाउन नहीं लगाया जाएगा। मुझे नहीं लगता कि अब यह प्रभावी कदम होगा। सभी का मास्क पहनकर बाहर निकलना ही फायदेमंद होगा।”

गौरतलब है कि यह बयान ऐसे समय पर सामने आया जब दिल्ली में 28 अक्टूबर से कोरोना वायरस के मामलों में तेजी से बढ़ोतरी देखी गई है। वहीं कोरोना वायरस के एक दिन में पहली बार 5,000 से 8000 अधिक नए मामले सामने भी आए। हालाँकि, बीते 2 दिनों से मामलों में कमी भी देखी गई है, लेकिन इसके पीछे कम कोविड-19 टेस्ट को वजह बताया जा रहा है। बता दें भारत में दिल्ली एक मात्र ऐसा राज्य है जहाँ सबसे ज्यादा संक्रमण के मामले सामने आ रहे है।

उल्लेखनीय है कि अगस्त के महीने में कोरोनावायरस के बढ़ते प्रसार को लेकर दिल्ली सरकार ने ‘बाहरी’ लोगों को दोषी ठहरा रही थी। जिसके बाद दिल्ली के हालात को सुधारने के लिए गृह मंत्री अमित शाह को संक्रमण को रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाना पड़ा था। वहीं इस बार भी केंद्र सरकार ने दिल्ली में बेकाबू होते हालात को देखते हुए ठोस कदम उठाने का फैसला लिया है। शाह ने राष्ट्रीय राजधानी में बढ़ते मामलों की जाँच के लिए 300 अतिरिक्त आईसीयू बेड की व्यवस्था, आरटीपीआर परीक्षणों को दोगुना करने और घर-घर सर्वेक्षण सहित कई उपायों की घोषणा की है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि नगर निगमों में से कुछ अस्पतालों को कोविड अस्पतालों में परिवर्तित किया जाएगा। साथ ही मैनपावर बढ़ाने के लिए डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ को बुलाया गया है। एमएचए के अनुसार, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों से लगभग 75 अर्धसैनिक चिकित्सक और कुछ 250 पैरामेडिक्स पहले ही दिल्ली आ चुके हैं।

‘बिहार विधानसभा में आजादी के बाद पहली बार सत्ताधारी गठबंधन में एक भी मुस्लिम MLA नहीं’: जानें इस ‘वामपंथी प्रोपेगेंडा’ की वजह

बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए ने एक बार फिर से जबरदस्त जीत हासिल की तो वहीं महागठबंधन को करारी हार मिली। चुनाव नतीजों से असंतुष्ट प्रोपेगेंडाबाज फर्जी नैरेटिव से जदयू, बीजेपी और एनडीए में शामिल अन्य दलों द्वारा कड़ी मेहनत से हासिल की गई जीत को मटियामेट करने की कोशिश में जुटे हैं।

कॉन्ग्रेस, राजद और अन्य पार्टी के महागठबंधन के जीतने की कामना करने वाले तथाकथित बुद्धिजीवियों में से कई ऐसे बुद्धिजीवी हैं जिनके लिए इस जीत को पचा पाना काफी मुश्किल हो रहा है। बिहार चुनावों में जदयू और बीजेपी के खिलाफ ध्रुवीकरण अभियान चलाने के बाद अब ये लोग नया प्रोपेगेंडा लेकर आए हैं। इस बार उनका इरादा  पीएम मोदी, बीजेपी और जेडीयू को मुस्लिम विरोधी के रूप में दिखाने का है। उन्होंने कहा कि एनडीए से एक भी मुस्लिम विधायक नहीं बना।

वामपंथी ऑनलाइन वेबसाइट ‘द वायर’ की पत्रकार ने ‘द टेलीग्राफ’ की एक रिपोर्ट शेयर करते हुए बिहार विधानसभा में एक भी मुस्लिम विधायक नहीं बनने के लिए एनडीए गठबंधन को ‘मुस्लिम विरोधी’ बताने का प्रयास किया। आरफा ने ट्वीट किया, “आजादी के बाद बिहार में पहली बार ऐसा हुआ है जब अपने सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय के एक भी विधायक के बिना सत्ताधारी गठबंधन बना।”

कई अन्य वामपंथी ‘बुद्धिजीवी’ और मीडिया पोर्टलों ने भी बीजेपी और उसके सहयोगी दलों को मुस्लिम विरोधी साबित करने के लिए इसी लाइन को आगे बढ़ाया है। उनका यह प्रयास ये दिखाने के लिए था कि भाजपा देश के समुदाय विशेष को असंतुष्ट करने का काम कर रही है।

उनका यह प्रयास स्वाभाविक रूप से देश के समुदाय विशेष के बीच के फैले छद्म भय को ट्रिगर करने के लिए किया जाता है ताकि उन्हें भाजपा और उसके सहयोगियों के खिलाफ वोट करने के लिए जुटाया जा सके। इसी तरह का पैंतरा उस समय भी आजमाया गया था जब बीजेपी ने जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 को निरस्त कर दिया और नागरिकता संशोधन अधिनियम को पारित किया था। वामपंथियों द्वारा भाजपा को एक ऐसी पार्टी के रूप में चित्रित करने का प्रयास किया गया, जो मुस्लिमों की विरोधी है। ऐसा करके, वे अपने पसंदीदा दलों- कॉन्ग्रेस और अन्य वामपंथी दलों को उबारने की कोशिश कर रहे हैं, जो भारतीय राजनीतिक परिदृश्य के भितरघात के कारण पतन की ओर अग्रसर हैं।

हालाँकि, जब मीडिया संगठनों और वामपंथी विचारकों ने बिहार विधानसभा चुनावों में जदयू-भाजपा गठबंधन पर शून्य मुस्लिम प्रतिनिधित्व का दोष लगाया, तो यहाँ पर ध्यान देने वाली बात है कि उन्होंने जो दोष लगाया है, उसके पीछे कोई तर्क भी है या फिर वो सिर्फ सच्चाई को छुपाने के लिए ऐसा कर रहे हैं।

सच्चाई यह है कि एनडीए गठबंधन के सबसे बड़े गठबंधन सहयोगियों में से एक, जदयू ने हाल ही में संपन्न बिहार विधानसभा चुनावों के लिए 11 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था। हालाँकि, इनमें से एक भी मुस्लिम उम्मीदवारों को जीत हासिल नहीं हो सकी।

बिहार विधानसभा चुनाव में जदयू द्वारा मैदान में उतारे गए मुस्लिम उम्मीदवारों का प्रदर्शन

सबा जफर ने जदयू के लिए अमौर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और 22.72 प्रतिशत वोट हासिल किए। हालाँकि, वह एआईएमआईएम उम्मीदवार अख्तरुल ईमान से हार गईं, जिन्होंने 51 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया।

Source: Election Commission

अररिया में, कॉन्ग्रेस पार्टी के उम्मीदवार अबिदुर रहमान ने जेडीयू उम्मीदवार शगुफ्ता अजीम पर व्यापक जीत दर्ज की।

Source: Election Commission

ठाकुरगंज में जदयू के मोहम्मद नौशाद आलम ने 11.46 प्रतिशत वोट हासिल किए, जबकि राजद उम्मीदवार ने 41.48 प्रतिशत वोट हासिल कर विधानसभा चुनाव जीत लिया।

Source: Election Commission

जदयू द्वारा मुस्लिम उम्मीदवार के लिए कोचाधामन की कहानी भी निराशाजनक थी। जदयू के मुजाहिद आलम एआईएमआईएम उम्मीदवार मुहम्मद इज़हार असफी से हार गए, जिन्होंने लगभग 50 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किए।

Source: Election Commission

बिहार के कांति में राजद के उम्मीदवार मुहम्मद इजरायल मंसूरी ने जदयू के उम्मीदवार मोहम्मद जमाल को पटखनी दी।

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सिकटा विधान सभा क्षेत्र से जदयू के खुर्शीद फिरोज अहमद को सीपीआई (एमएलएल) के उम्मीदवार बीरेंद्र प्रसाद गुप्ता को लगभग 14,000 वोटों के अंतर से हराया।

Source: Election Commission

जदयू के एक और मुस्लिम उम्मीदवार मोहम्मद शरफुद्दीन राजद उम्मीदवार चेतन आनंद से शेहर निर्वाचन क्षेत्र में हार गए।

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दरभंगा ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र में राजद प्रत्याशी ललित कुमार यादव और जदयू के फारुकी फातमी के बीच घनिष्ठ चुनावी रस्साकशी देखने को मिली। हालाँकि, अंत में यादव विजयी होकर उभरे।

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मरौरा जिले में, राजद के जितेंद्र कुमार रे ने जदयू के अल्ताफ आलम को काफी अंतर से हराया।

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महुआ में चुनाव परिणाम मारहरा से अलग नहीं था। यहाँ भी मुकेश कुमार रौशन ने जदयू के मुस्लिम उम्मीदवार अश्मा परवीन को करारी हार दी।

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बिहार के डुमरांव में, सीपीआई (एमएलएल) के उम्मीदवार अजीत कुमार सिंह ने चुनाव जीता, जदयू की अंजुम आरा को बढ़िया अंतर से हराया।

Source: Election Commission

राजनीतिक दल उम्मीदवारों की जीत को प्राथमिकता देते हैं

इस तरह से उपरोक्त परिणामों से स्पष्ट है, एनडीए गठबंधन के सहयोगियों द्वारा मैदान में उतारे गए मुस्लिम उम्मीदवारों में से कोई भी विधानसभा चुनाव जीतने में कामयाब नहीं हुआ। जदयू ने 43 सदस्यों को विधानसभा भेजा। अगर जदयू के सभी 11 मुस्लिम उम्मीदवार चुनाव जीत जाते, तो उनके पास विधानसभा की 54 सीटें होतीं, और उनमें से 20 प्रतिशत मुस्लिम होते।

राजनीतिक दल उन उम्मीदवारों का चयन करते हैं जो चुनाव जीतने की सबसे अधिक संभावना रखते हैं। बड़ी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवारों का चयन करना, लेकिन उनमें से एक को भी विधानसभा में नहीं लाना कहीं से भी समझदारी की रणनीति नहीं है। इसलिए, बिहार विधानसभा में एनडीए में मुस्लिम विधायकों के न होने को लेकर गुमराह किया जा रहा है। क्योंकि ऐसा उम्मीदवारों की कमी की वजह से नहीं बल्कि उनके न जीतने की वजह से हैं।

स्वरा भास्कर का नया कारनामा, अब मजहबी भीड़ द्वारा अमर जवान ज्योति को रौंदने वाली तस्वीर को बताया फोटोशॉप

बॉलीवुड अभिनेत्री स्वरा भास्कर के लिए सच बोलना जितना मुश्किल है, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल है सच्चाई स्वीकारना। कट्टरपंथी भीड़ द्वारा की गई हिंसा और उनकी कट्टरता पर हमेशा से लीपापोती और पर्दा डालने वाली स्वरा ने एक बार फिर देशद्रोहियों के प्रति अपने मन में छिपे प्यार को उजागर किया है। स्वरा भास्कर ने मंगलवार को दावा किया कि मुंबई के आज़ाद मैदान दंगों के दौरान दंगाइयों द्वारा अमर जवान स्मारक पर हमला करने वाली तस्वीरें असली नहीं बल्कि ‘फोटोशॉप्ड’ हैं।

बता दें विवादों से घिरी रहने वाली स्वरा भास्कर ने ट्विटर पर एक यूजर द्वारा की गई टिप्पणी का जवाब देते हुए यह दावा किया। दरअसल, एक यूजर ने अमर जवान ज्योति को लात मारते और उसका अपमान करते हुए कुछ फ़ोटो पोस्ट करते हुए लिखा, “जिस दिन तुमने अमर जवान को अपने पैरों से मारा, तभी से मैं मुस्लिमों से नफरत करने लगा।” वहीं इस पोस्ट का जवाब देते हुए स्वरा ने सीधे शब्दों में लिखा,”घटिया फोटोशॉप” मतलब आधुनिक टेक्निक्स द्वारा बनाई गई फ़ोटो। जबकि यह तस्वीर फोटोशॉप नहीं थी।

बता दें इन मशहूर तस्वीरों को मिड-डे के फोटोग्राफर अतुल कांबले ने 11 अगस्त, 2012 को क्लिक किया था। म्यांमार में रखाइन दंगों के विरोध में इस्लामिक संगठन रज़ा अकादमी ने इसके खिलाफ अपने समुदाय के लोगों को बरगलाया जिसके बाद आजाद मैदान में दंगे भड़क उठे। माना जाता है कि रोहिंग्याओं को उक्त दंगों के दौरान बहुत नुकसान हुआ था।

फोटोग्राफर अतुल कांबले द्वारा क्लिक फ़ोटो.1

यहाँ यह बात ध्यान देने योग्य है कि इन तस्वीरों की प्रामाणिकता को लेकर बहस करने का कोई मतलब नहीं है। आज़ाद मैदान में हुए दंगे और उससे पहले हुई हिंसा के इतने वर्षों बाद भी मुंबई के इतिहास पर एक धब्बा बने हुए है।

रज़ा अकादमी द्वारा लोगों को भड़काने और बरगलाने की वजह से हुए इन आत्मघाती दंगों के कारण, लोगों का गुस्सा जमकर इस इस्लामिक संगठन पर फूटा था। हालाँकि, आज भी लिबरल गिरोह अपने पापों पर पर्दा डालने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है।

फोटोग्राफर अतुल कांबले द्वारा क्लिक फ़ोटो.2

उल्लेखनीय है कि उदारवादियों ने भी इतनी बेशर्मी से इन बातों से इंकार नहीं किया कि हिंसा हुई या यह आरोप लगाया गया कि ये तस्वीरें प्रामाणिक नहीं हैं। स्वरा भास्कर ने बिना किसी जानकारी या यूँ कहूँ तो इस्लामिक गतिविधियों पर पर्दा डालने के लिए इन तरह की हरकतें की है। असल में ऐसा भी हो सकता है कि 2012 में हुए दंगों को लेकर उनका ज्ञान कोसों दूर हो।

वहीं इस बीच कट्टरपंथियों के अपराधों पर पर्दा डालने और उनकी साइड लेने वाली स्वरा जैसे अन्य लोगों ने उनके ट्वीट को लाइक किया है। इन लोगों में द वायर के प्रोपेगेंडा पत्रकार आरफा खानम शेरवानी ने भी स्वरा के पोस्ट को लाइक किया है। जिसका स्क्रीनशॉट सामने आया है। हालाँकि, आरफा खानम द्वारा किए लाइक पर एक यूज़र ने उन्हें जमकर लताड़ा। आरफा पर तंज कसते हुए यूजर ने कहा कि मैडम हमें पता है कि आप तस्वीरों को फोटोशॉप करने में एक्सपर्ट है लेकिन यह तस्वीरें असली है। जहाँ आपके जिहादी दोस्तों ने मुंबई में अमर जवान ज्योति को ध्वस्त कर दिया था।

बहरहाल, यह सब प्रमाणित करता है कि हमारी तथाकथित पॉपुलर हस्तियाँ पूरी तरह से सार्वजनिक जीवन की वास्तविकताओं को लेकर अनाड़ी हैं। अगर कोई गंभीरता से दावा कर सकता है कि आज़ाद मैदान दंगे की तस्वीरें फर्जी है, तो इसके आगे क्या है? वह दिन दूर नहीं जब उनमें से कुछ यह दावा करेंगे कि नागरिकता संशोधन अधिनियम के पारित होने के बाद एक भी मजहबी भीड़ ने दंगा नहीं किया था। लेकिन अब तो हम यह भी नहीं कह सकते क्योंकि ये लोग पहले से ही इस बात को साबित करने में तुले हुए है।

गौरतलब है कि लिबरल्स ने हर बार मजहबी भीड़ द्वारा किए गए हिंसा या हिंदुओं के प्रति उनके नफरत को छुपाने, लीपापोती करने या पर्दा डालने का काम किया है। वहीं जब इनके करतूतों के सबूत पब्लिक में सामने आते है तो ये लिबरल्स मिल कर उसे फर्जी साबित करने में लग जाते है। जिनमें स्वरा भास्कर भी एक है। वहीं अगर इनका बस चलता तो इस्लामवादियों द्वारा एक शिक्षक के सर को धड़ से अलग करने वाली घटना को भी ये फर्जी साबित कर देते।

लेकिन हम पहले से ही जानते थे कि जिस तरह से लिबरल गिरोह तो इस बात से भी इनकार करते है कि कश्मीरी पंडितों ने नरसंहार और बर्बरता मुस्लिमों के अत्याचार की वजह से अतीत में झेला हैं। वहीं यही बेशर्मी अब स्वरा भास्कर ने यह इनकार करते हुए किया है कि अमर जवान स्मारक पर आजाद मैदान के दंगों के दौरान हमला किया गया था।

डियर रेख्ता, हम अगर किसी त्योहार को ‘खून की नदी बहाने का त्योहार’ लिख दें तो सुलग जाएगी

रेख्ता ने दीपावली के त्योहार पर भी अपने मजहबी मानसिक मवाद को साहित्य का रंग देने की कोशिश करते हुए इसे ईद बताया है। रेख्ता ने एक पोस्टर के जरिए दिवाली और इससे जुड़े कुछ प्रचलित शब्दों को उर्दू शब्दकोश देने की कोशिश की और इसी बहाने इसमें मजहबी अजेंडा को साध लिया।

रेख्ता ने इस पोस्टर में जो शब्द दिए वो दिवाली, उपहार, उत्सव, छुट्टियाँ…. तो थे ही, साथ ही इनमें सबसे आखिर में ‘वायु प्रदूषण’ भी था। बड़ी ही चालाकी से रेख्ता ने यह पोस्टर बाजार में उतारा और दिवाली को ईद बताने के साथ ही इससे जुड़े शब्द में ‘एयर पॉल्यूशन’ भी जोड़ा गया। लेकिन रेख्ता के इस पोस्टर में अभी एक अधूरापन है।

जो एक शब्द रेख्ता इस पोस्टर में जोड़ना भूल गया वह था- मजहबी अजेंडा! रेख्ता को अजेंडा शब्द को भी उर्दू शब्दकोश में जगह देनी चाहिए। इसके साथ ही, ऐसी कई शब्द और भी हैं, जिन्हें उर्दू शब्दकोश में जगह चाहिए मगर फतवे और कट्टरपंथियों के भय से शायद रेख्ता ऐसा करने से डरता है।

मजहबी चेतना के ध्वजवाहकों को इसमें कुछ कट्टर मजहबी टार और पशुओं के खून से सने हुए ‘आयोजनों’ को भी लोगों को समझाने योग्य बनाना चाहिए। कुछ ऐसे त्यौहार, जिनसे मिलता-जुलता शब्द ‘दरिया-ए-ख़ूँ’ हो सकता है। और यदि रेख्ता ऐसा नहीं कर सकता, तो इसे हिंदी में ‘खून की नदी बहाने का त्योहार’ बताया जाना चाहिए। लेकिन ऐसा करने से गंगा-जमुनी तहजीब को ठेस लगने का भी भय है। गंगा-जमुनी तहजीब की गली बेहद संकरी और इकतरफा ही रही है। दिवाली की अमावस को ईद बताना सेक्युलर और प्रोग्रेसिव है जबकि किसी एक मजहबी त्योहार की साहित्यिक व्याख्या इस देश के सेक्युलर फेब्रिक को तहस-नहस करने के लिए काफी है।

वास्तव में, रेख्ता का मकसद दीपावली की शुभकामना देने का कभी नहीं रहा। यह हर त्योहार के इस्लामीकरण की ही एक कड़ी है। यह उसी विचारधारा की विष्ठा है, जो इस बात पर जोर देने का प्रयास करती है कि अकबर के शासन में यहाँ दीपावली मनाई जाती थी। मगर इस बात पर जोर देना वह भूल जाते हैं कि दिवाली तो भारत में तब भी मनाई जाती थी जब अकबर भ्रूण की अवस्था में भी नहीं रहा होगा। दिवाली इस देश में अकबर से पहले भी थी और उसके बाद भी हमेशा मनाई जाती रहेगी। हिन्दुओं का यह पवित्र त्योहार रेख्ता की कलाबाजी से पहले भी मौजूद था, और रेख्ता के बाद भी रहेगा। इसके बीच मजहबी और वाम-उदारवादी प्रोपगेंडा के लिए कोई जगह नहीं रहती।

इसी तरह, हिंदी भी उर्दू के बिना कहीं श्रेष्ठ और सम्पन्न भाषा रही है और आगे भी रहेगी। भारत को उर्दू ने नहीं बल्कि उर्दू को भारत ने शरण दी है यह बात दिमाग से निकाली नहीं जानी चाहिए। ताजमहल का महिमामंडन, बिरयानी, रसगुल्ले से लेकर जलेबी तक का ‘मुगलीकरण’ कर सांस्कृतिक वर्चस्व की जंग को अब भाषा के वर्चस्व में बदलने का कारनामा लेफ्ट-लिबरल्स को भी खूब लुभाता है।

रेख़्ता का वह पोस्टर जिसमें दिवाली को ईद बताया गया है

उर्दू-हिंदी को मौसेरी बहनें बताने वालों के शब्दकोश में दीपावली के लिए भी एक शब्द नहीं है। जिस संस्कृति का झंडाबरदार बनने रेख्ता निकला है, वह ‘संस्कृति’ होली से लेकर दिवाली तक में अपनी मौजूदगी ठूँसकर किसी तरह प्रासंगिक बने रहना चाहती है।

अगर दीपावली ‘ईद-ए-चरागाँ’ है तो फिर रेख्ता इस बात का जवाब क्यों नहीं देता कि अमावस की रात कौन सा चाँद निकलता है जो दीपावली को ईद बता दिया गया? जिस उर्दू का शब्दकोश इकलौते त्योहार के ही इर्दगिर्द शुरू होने से पहले ही समाप्त हो जाता है, उसे किसी हिमालयी सभ्यता के कंधे से कंधा मिलाने की ठरक को शांत करने से पहले अपने खुद के विकास पर मेहनत करनी चाहिए।

इसके अलावा, दिवाली के मिलते-जुलते शब्दों में ‘एयर पॉल्यूशन’ को जगह देने से पहले ‘खून से सनी गलियों’ के लिए एक दूसरी आसमानी किताब तैयार की जानी चाहिए। वह ‘सभ्यता’ और संस्कृति के क्रूर उदाहरण मिलता-जुलता भी नहीं बल्कि उस आयोजन का ही परिचय भी है, रेख्ता को उस पर गर्व होना चाहिए क्योंकि आखिर वह उस संस्कृति का हिस्सा है। यह भी स्पष्ट किया जाना आवश्यक है कि दिवाली से अगर प्रदूषण होता है तो बकरियों को रेतने से कौन सी आकशगंगा की ओजोन परत आकर पृथ्वी के चारों और सुरक्षा कवच खड़े कर देते हैं?

दिवाली की बधाई के बहाने अपने मजहबी अजेंडा को परोसने पर रेख्ता की खूब फजीहत भी हुई। यही वजह है कि रेख्ता ने भरपूर गालियाँ खाने के बाद अपना ये पोस्टर भी हटा लिया। हालाँकि, उस पोस्टर में एक अधूरापन है। अभी कुछ मजहबी त्योहारों के नामकरण की कमी रेख्ता के शब्दकोश में बनी हुई है। अगले सीजन से पहले रेख्ता को उनके नामकरण पर मेहनत करनी चाहिए।

कॉन्ग्रेस पहले ही पतन के करीब है, अब J&K के अलगाववादी गठबंधन में शामिल होकर दिया अपने ही विनाश को न्योता

कहते हैं कि जब मति भ्रष्ट हो तो एक के बाद एक गलतियाँ करते हैं। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कॉन्ग्रेस की हालत भी कुछ ऐसी ही है। बिहार चुनाव में महागठबंधन की हार की अघोषित जिम्मेदार कॉन्ग्रेस अब जम्मू-कश्मीर की अलगाववादी पार्टियों के गुपकार समझौते में शामिल हो गई है।

इन अलगाववादी दलों के नेताओं का देश विरोधी एजेंडा किसी से छिपा नहीं है, कहना गलत नहीं होगा कि ऐसे में इनके साथ अलगाववाद की मुहिम में अप्रत्यक्ष रूप से शामिल होने का ये फैसला कॉन्ग्रेस के लिए उसकी ताबूत में अंतिम कील साबित होगी।

कॉन्ग्रेस का गुपकार प्रेम

जम्मू-कश्मीर में जिला विकास परिषद के चुनाव होने वाले हैं ऐसे में अनेकों ना-नुकर करने के बाद गुपकार गठबंधन की पार्टियों ने चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया है। सबसे आश्चर्यजनक बात ये है कि इन पार्टियों का कॉन्ग्रेस ने भी समर्थन किया है और अलगाववाद के इस गठबंधन में शामिल होकर ही वो भी चुनाव लड़ेगी।

एक राष्ट्रीय पार्टी का अलगाववादी नेताओं के साथ प्रेम, देश और जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक भविष्य के लिए एक चिंताजनक बात है और ये आगे चलकर साबित करेगा कि कॉन्ग्रेस दोमुँहेपन की पराकाष्ठा को पार कर चुकी है l

अलगाववादी है गुपकार गठबंधन

कॉन्ग्रेस ने जिस गुपकार गठबंधन में शामिल होने का फैसला किया है उसकी हकीकत किसी को भी हैरान कर सकती है कि देश की राष्ट्रीय पार्टी ऐसा कदम केवल सत्ता के लिए कैसे उठा सकती है। गुपकार का मुख्य एजेंडा जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 और 35-A बहाली है। ये लोग तब तक भारतीय झंडे को हाथ नहीं लगाने की बात करते हैं जब तक अनुच्छेद -370 बहाल नहीं हो जाता।

इस गठबंधन में जम्मू-कश्मीर की राजनीतिक पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस और पीडीपी समेत कई क्षेत्रीय अलगाववादी पार्टियाँ हैं, जिसमें उमर अब्दुल्ला, फारुक अब्दुल्ला,  महबूबा मुफ्ती, सज्जाद लोन आदि शामिल हैं। इन नेताओं का कहना है कि वो इस बहाली के लिए चीन से भी मदद लेने को खुशी-खुशी तैयार हैं। वहीं, ये लोग कश्मीरी युवकों को नौकरी के अभाव में आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए भड़काते हैं, जो कि इनके देश विरोधी एजेंडे को दर्शाता है।

कॉन्ग्रेस के लिए मुसीबत

जो नेता अपने देश के मुद्दों के लिए दुश्मन देशों से मदद माँगते हो वो देशद्रोही ही तो कहलाएँगे और इनके साथ कॉन्ग्रेस का गठबंधन उसकी प्रकृति को दर्शाता है कि असल में वो कितने निचले स्तर तक जा चुकी है। राजनीतिक जमीन के लिए देशद्रोही नेताओं के साथ जाकर उनकी पंक्ति में खड़ी हो गई है जिससे उस पर भी लोगों ने देशद्रोही होने का ठप्पा लगाना शुरू कर दिया है।

हाल हीं में कॉन्ग्रेस को बिहार चुनावों में हार का मुँह देखना पड़ा है। केवल हार ही नहीं… बिहार में कॉन्ग्रेस के कारण ही महागठबंधन के नेता तेजस्वी यादव के सीएम बनने की ‘संभावनाएँ’ खत्म हुई हैं जिसके चलते अब बाकी पार्टियाँ भी कॉन्ग्रेस से सतर्क हो गई हैं। चुनाव नतीजों को चार दिन नहीं हुए कि कॉन्ग्रेस को उसके ही गठबंधन के साथियों ने दबे मुँह लताड़ना भी शुरू कर दिया है। 

आरजेडी नेता शिवानंद तिवारी का बयान इसकी परिणति है जिन्होंने कहा कि जब बिहार में चुनाव अपने चरम पर था, तब राहुल गाँधी बहन प्रियंका गाँधी के साथ उनके शिमला वाले घर में पिकनिक मना रहे थे। क्या पार्टी ऐसे चलती है? ये बयान बताता है कि कॉन्ग्रेस से अब उसके सहयोगी भी पीछा छुड़ाएँगे।

यूपी के 2017 विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन कर सत्ता में वापसी करने के इरादे रखने वाले पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के अरमानों पर जब कॉन्ग्रेस की वजह से पानी फिरा तो उन्होंने भी साफ कर दिया है कि वो भविष्य में किसी भी चुनाव में देश की बड़ी राजनीतिक पार्टी के साथ गठबंधन करके चुनाव नहीं लड़ेंगे। उन्होंने कॉन्ग्रेस का नाम नहीं लिया लेकिन अखिलेश का इशारा उसी तरफ था।

यहीं नहीं कॉन्ग्रेस के अपने लोग भी अब ये कहने लगे हैं कि कॉन्ग्रेस की वर्किंग कमेटी को ठोस कदम उठाने होंगे। कई लोगों ने तो एक बार फिर कॉन्ग्रेस का अध्यक्ष बनने के लिए राहुल गाँधी को आगे किया है जबकि वरिष्ठ नेता और अधिवक्ता कपिल सिब्बल का कॉन्ग्रेस की कार्यप्रणाली से मोह भंग हो रहा है और वो जमकर पार्टी की आलोचना करने लगे हैं। 

सिब्बल ने एक अंग्रेजी अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा था कि ऐसा लगता है कि पार्टी नेतृत्व ने शायद हर चुनाव में पराजय को ही अपना नियति इमान लिया है। उन्होंने कहा था कि बिहार ही नहीं, उपचुनावों के नतीजों से भी ऐसा लग रहा है कि देश के लोग कॉन्ग्रेस पार्टी को प्रभावी विकल्प नहीं मान रहे हैं। इसके अलावा पार्टी के 23 वरिष्ठ नेताओं ने अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी को पत्र लिखा था। इस पत्र में भी राहुल और प्रियंका के शिमला में छुट्टी मनाने पर जोर दिया गया था।

जब राजनीतिक रूप से कॉन्ग्रेस को केवल असफलता ही मिल रही है और उसके साथी उसका हाथ झटक रहे हैं तो उसका जम्मू-कश्मीर की अलगाववादी पार्टियों के साथ गुपकार गठबंधन में शामिल होना एक आत्महत्या के बराबर ही है। इसमें कोई दो राय नहीं कि कॉन्ग्रेस का ये फैसला न केवल जम्मू-कश्मीर बल्कि पूरे देश में उस पर भारी पड़ेगा और संकट में पड़े कॉन्ग्रेस के राजनीतिक भविष्य के लिए ये ताबूत में आखिरी कील का काम करेगा।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी इस तरफ इशारा किया है। उन्होंने गुपकार गैंग और कॉन्ग्रेस पर हमला करते हुए कहा कि गुपकार गैंग कश्मीर को आतंक युग में ले जाना चाहता है। इतना ही नहीं अमित शाह ने ये भी कहा कि अगर गुपकार गैंग देश के मूड के साथ नहीं आता है, तो जनता उसे डुबो देगी। 

आतंकवाद दुनिया की सबसे बड़ी समस्या, मददगार देशों को ठहाराया जाए दोषी: BRICS सम्मेलन में PM मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार (नवंबर 17, 2020) को ब्रिक्स (BRICS) सम्मेलन को संबोधित किया। पीएम मोदी ने इस दौरान आतंकवाद को दुनिया की सबसे बड़ी समस्या बताते हुए नाम लिए बिना पाकिस्तान पर निशाना साधा। पीएम मोदी ने कहा, ”आतंकवाद आज विश्व के सामने सबसे बड़ी समस्या है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि आतंकवादियों को समर्थन और सहायता देने वाले देशों को भी दोषी ठहराया जाए, और इस समस्या का संगठित तरीके से मुकाबला किया जाए।”

पीएम मोदी ने संयुक्त राष्ट्र संघ, विश्व व्यापार संगठन और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार पर जोर देते हुए कहा है कि इन संस्थाओं की क्रेडिबिलिटी और विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। इसकी वजह है कि समय के साथ इनमें बदलाव नहीं आया। ये अभी भी 75 साल पुरानी सोच पर हैं। भारतीय सुरक्षा परिषद में सुधार की आवश्यकता है। इसमें हमें ब्रिक्स साथियों के सहयोग की जरूरत है।

पीएम मोदी ने कहा, ”हमने ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के तहत एक व्यापक सुधार प्रक्रिया को शुरू किया है। यह कैंपेन इस विश्वास पर आधारित है कि आत्मनिर्भर भारत कोविड-19 महामारी के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए फोर्स मल्टीपल्यार हो सकता है और ग्लोबल वैल्यू चेन्स में मजबूत योगदान दे सकता है। इसका उदहारण हमने COVID के दौरान भी देखा, जब भारतीय फार्मा उद्योग की क्षमता के कारण हम 150 से अधिक देशों को आवश्यक दवाइयाँ भेज पाए। हमारी वैक्सीन उत्पादन और डिलीवरी क्षमता भी इस तरह मानवता के हित में काम आएगी।”

12वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी ने एक तरफ जहाँ रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की जमकर तारीफ की तो दूसरी तरफ चीनी राष्ट्रपति का जिक्र भी नहीं किया। ब्रिक्स की भूमिका को अहम बताते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि ब्रिक्स संगठन में शामिल देश वैश्विक अर्थव्यवस्था के इंजन है।

प्रधानमंत्री ने कहा, “इस वर्ष दूसरे विश्व युद्ध की 75वीं वर्षगाँठ पर हम वीरगति पाए सैनिकों को श्रद्धांजलि देते हैं। भारत से भी 2.5 मिलियन से अधिक वीर इस युद्ध में यूरोप, अफ्रीका, और साउथ ईस्ट एशिया जैसे कई फ्रंट्स पर सक्रिय थे।” प्रधानमंत्री ने कहा, “2021 में  BRICS के 15 वर्ष पूरे हो जाएँगे। पिछले सालों में हमारे बीच लिए गए विभिन्न निर्णयों का मूल्यांकन करने के लिए एक रिपोर्ट बना सकते हैं। 2021 में अपनी अध्यक्षता के दौरान हम BRICS के तीनों स्तंभों में intra-BRICS सहयोग को मजबूत करने का प्रयत्न करेंगे।”

अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि विश्व एक संकट से गुजर रहा है। ब्रिक्स में सुधार की जरुरत है। IMF, WTO, WHO में भी सुधार की जरुरत है।

पीएम मोदी ने आगे कहा, “इस कठिन कार्यकाल में, रूस के नेतृत्व में, लोगों से लोगों के कनेक्शन को बेहतर बनाने के लिए कई पहल की गईं जैसे कि ब्रिक्स फिल्म समारोह, युवा वैज्ञानिकों की बैठकें आदि की गई। ब्रिक्स के अपने नेतृत्व के दौरान, भारत ब्रिक्स देशों के बीच डिजिटल स्वास्थ्य और पारंपरिक चिकित्सा को बढ़ावा देगा।”

मुंबई पुलिस ने अर्णब को अब भेजा कारण बताओ नोटिस: अच्छे बर्ताव के लिए भरवाना चाहते हैं 10 लाख का बॉन्ड

मुंबई पुलिस ने रिपब्लिक टीवी पर अपनी हालिया कार्रवाई में चैनल के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी को कारण बताओ नोटिस भेजा है। यह नोटिस पालघर लिंचिंग केस और बांद्रा में प्रवासियों की भीड़ इकट्ठा होने पर की गई ‘सांप्रदायिक टिप्पणियों’ को लेकर है।

इस बार उन्हें रविवार को शाम 4 बजे वर्ली के असिस्टेंट पुलिस कमिशनर और स्पेशल एग्जिक्यूटिव मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने को कहा गया है। इतना ही नहीं, इससे पहले रिपब्लिक टीवी के एडिटर अर्णब गोस्वामी से ‘अच्छे बर्ताव’ के लिए एक बॉन्ड साइन करने को भी कहा गया था।

सीआरपीसी की धारा 108 के तहत एसीपी (वर्ली) सुधीर जंबावड़ेकर ने डिमांड की थी कि अर्णब गोस्वामी अपने अच्छे बर्ताव को सुनिश्चित करने के लिए बॉन्ड साइन करें। असिस्टेंट कमिशनर ने एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट के रूप में अपनी शक्तियों का प्रयोग किया था जो उन्हें संवेदनशील सामग्री को प्रकाशित किए जाने के संदेह में किसी से अच्छे व्यवहार के लिए सुरक्षा की माँग करने का अधिकार प्रदान करता है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, अर्णब गोस्वामी को कारण बताओ नोटिस भेज कर पूछा गया है कि आखिर क्यों उनसे एक साल के समय के लिए 10 लाख का बॉन्ड राशि नहीं भरवाना चाहिए, वो भी एक गारंटर के साथ जिसकी समाज में एक अच्छी खासी पहचान हो और अर्णब का बर्ताव कंट्रोल करने में सक्षम हो।

SC ने दी थी अर्णब गोस्वामी को बेल

गौरतलब है कि अभी हाल ही में पिछले बुधवार (नवंबर 11) को सुप्रीम कोर्ट में अर्णब गोस्वामी की याचिका पर सुनवाई करते हुए न्यायाधीश चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले को गलत बताया था। इसके बाद अर्णब को रिहाई देने के लिए मुंबई पुलिस को निर्देशित किया गया था।

अर्णब गोस्वामी और दो अन्य आरोपितों को 50,000 रुपए के बांड पर अंतरिम जमानत पर रिहा किया गया था। कोर्ट ने पुलिस आयुक्त को यह सुनिश्चित करने के लिए निर्देशित किया था कि आदेश का तुरंत पालन किया जाए।

जमानत पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की थी। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि अगर हम आज इस मामले में हस्तक्षेप नहीं करते हैं तो बर्बादी की राह पर बढ़ जाएँगे। उन्होंने यह भी कहा था कहा कि किसी की विचारधारा अलग हो सकती है और वो चैनल नहीं देखे, लेकिन संवैधानिक अदालतें अगर ऐसी आज़ादी की सुरक्षा नहीं करती हैं तो वो बर्बादी की राह पर बढ़ रही है।

‘वोटर को लिबरल वैल्यू की कद्र नहीं, इसलिए…’ – कॉन्ग्रेसी सलमान खुर्शीद का बिहारियों पर निशाना, पहले कहा गया गरीब-लालची

कॉन्ग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने बिहार में हुई पार्टी की हार का ठीकरा मतदाताओं के सिर पर फोड़ा है। अपने फेसबुक पोस्ट में खुर्शीद ने कहा है कि अगर मतदाता उदारवादी मूल्यों के प्रतिरोधी हैं तो फिर उन्हें (कॉन्ग्रेस) सत्ता में लौटने के लिए लंबे संघर्षों के लिए तैयार रहना चाहिए।

3600 करोड़ रुपए के अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले में नाम सामने आने के बाद सलमान खुर्शीद ने बिहार की जनता पर आरोप लगाया है कि उन्हें उदारवादी मूल्यों की कदर नहीं है। उन्होंने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा, “अगर मतदाता का मूड उन लिबरल वैल्यू को स्वीकारने का नहीं है, जिनका हम समर्थन करते हैं या जिन्हें हम पोषित करते हैं तो हमें सत्ता में लौटने के लिए छोटे रास्तों पर फोकस करने की बजाए लंबा संघर्ष करना होगा।”

अपने पोस्ट में खुर्शीद ने आखिरी मुगल सम्राट की प्रशंसा की और साथ ही कपिल सिब्बल जैसे उन कॉन्ग्रेसी नेताओं पर भी अप्रत्यक्ष रूप से निशाना साधा, जो चुनाव के बाद से पार्टी नेतृत्व की आलोचना कर रहे हैं। उन्होंने अपने पोस्ट में कहा, 

 “जब हम अच्छा करते हैं तो निश्चित रूप से उसे बहुत हद तक बहुत आसान समझ लिया जाता है। मगर जब हम बुरा भी नहीं, बस थोड़ा कमजोर प्रदर्शन करते हैं, वह फौरन कमियाँ निकालने लगते हैं। ऐसा लगता है कि इससे भावी निराशाओं के लिए कम कमियाँ बचेंगी। क्या यह ऐसा मामला है, जहाँ एक खराब कर्मी अपना गुस्सा अपने उपकरणों पर निकाले?”

अपने पोस्ट में सलमान खुर्शीद ने पार्टी के साथियों को पार्टी की आलोचना करने से बचने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि ये बात और है कि उनकी (कॉन्ग्रेस) राजसी राजनीति के समेकन में किसी भी वजह की तरह, समय-समय पर पुन: मूल्यांकन और रणनीति व लॉजिस्टिक में पुन: लेखन की आवश्यकता है।

आत्मनिरीक्षण की जगह कॉन्ग्रेस लगा रही इल्जाम

उल्लेखनीय है कि कॉन्ग्रेस को जिस समय में चुनावों में अपनी हार को लेकर आत्मनिरीक्षण करना चाहिए, उस समय कॉन्ग्रेस अब भी बाहरी तत्वों को अपनी हार का कारण बता रही है। ऐसा लगता है जैसे विपक्षी पार्टियों के लिए यह एक नियम बन गया है कि वो चुनाव में हारने के बाद या तो ईवीएम को दोषी ठहराएँगे या फिर वोटर्स की समझ पर सवाल खड़े कर देंगे।

सब जानते हैं कि कॉन्ग्रेस ने सत्ता में लौटने के लिए महागठबंधन से हाथ मिलाया लेकिन तब भी यह युक्ति उन्हें जीत दिलाने में काम नहीं आई और उनके बेकार प्रदर्शन के कारण राजद सबसे ज्यादा सीटें लेने के बावजूद सत्ता से वंचित रही। इसी तरह गुजरात, मणिपुर, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के चुनाव में मिली हार में पार्टी के लिए चिंता का सबब थी। 

याद दिला दें कि कुछ समय पहले कॉन्ग्रेस के एक अन्य पदाधिकारी ने बिहारियों को गरीब और लालची करार दिया था क्योंकि उन्होंने पार्टी को वोट नहीं दिया था। वहीं कपिल सिब्बल ने यह स्वीकारा था कि अब लोग कॉन्ग्रेस को एक प्रभावशाली नेतृत्व के तौर पर नहीं देखते हैं।

एक इंटरव्यू में अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि बिहार चुनाव के अलावा कई उपचुनावों के नतीजों से यह स्फ्ष्ट है कि लोग कॉन्ग्रेस पार्टी को एक प्रभावी विकल्प नहीं मानते हैं। उन्होंने कहा कि यूपी के कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में कॉन्ग्रेस के उम्मीदवारों को 2% से भी कम वोट डले। गुजरात में तो कॉन्ग्रेस के तीन उम्मीदवारों ने जमानत जब्त करवा दी।

क्रिकेट खेलते हुए बहस के बाद बल्ले और स्टंप से जानलेवा हमला: मोहम्मद आदिल, जेनुलहक खान और इरफान गिरफ्तार

राजस्थान के सलूंबर में गवर्नमेंट हायर सेकेंडरी स्कूल में रविवार शाम काे क्रिकेट खेलते समय दो समुदायों के बीच आपसी हाथापाई हुई और फिर मामला सांप्रदायिक झड़प में बदल गया।

रिपोर्ट्स के अनुसार, विद्यालय प्रांगण में मौजूद खेल के मैदान पर कुछ लड़के अलग-अलग पिच पर क्रिकेट खेल रहे थे। जिस दौरान एक तरफ से दूसरी तरफ गेंद के चले जाने पर दोनों पक्षों में बहस शुरू हो गई। देखते ही देखते बहस करते हुए लोग आपस मे गाली-गलौज करने लगे। यही नहीं, यह विवाद ऐसा बढ़ा कि एक पक्ष ने दूसरे पक्ष पर बल्ले और स्टंप से जानलेवा हमला कर दिया।

इस मारपीट में सोहन, नीलेश भोई, गौतम, अशोक और मोइन खान सहित पाँच लोग घायल हो गए। वहीं घटना को शांत कराने और बीच-बचाव करने पहुँचे सोहनलाल भोई को भी हमलावरों ने नहीं बख्शा। आरोपितों ने उनके सिर पर वार किया, इससे वे गंभीर रूप से घायल हाे गए। इसके बाद उन्हें और अन्य दाे युवकाें काे प्राथमिक उपचार के बाद महाराणा भूपाल सरकारी अस्पताल में रेफर किया गया है।

घटना की जानकारी होते ही पुलिस महकमा एक्शन में आया। एएसपी मुकेश सांखला, डीएसपी रतन चावला, थाना प्रभारी हनवंत सिंह सोढ़ा, थाना प्रभारी (सारदा) अनिल बिश्नोई, थाना प्रभारी (सेमरी) कर्मवीर सिंह, थाना प्रभारी (लसाड़िया) सूरजमल, थाना प्रभारी (झल्लारा) भैयालाल, गींगला से थाना प्रभारी तेज करण सिंह सहित अन्य थानों से पुलिस बल को मौके पर तैनात किया गया है।

पुलिस ने घायल सलूंबर निवासी नीलेश पुत्र जगदीश भोई की शिकायत पर 19 नामजद और 50 अज्ञात आरोपितों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। घटना के एक दिन बाद, पुलिस ने मामले के सिलसिले में सोमवार को मोहम्मद आदिल, मोनू उर्फ जेनुलहक खान और मोहम्मद इरफान को गिरफ्तार किया है।

वहीं घटना से आक्रोशित एक समुदाय के लोगों ने चुंगी नाका की सड़कों पर जमकर हंगामा किया। भीड़ ने कोरोनो वायरस महामारी के मद्देनजर बनी अस्थायी चाैकी की कुर्सियाँ तोड़ दी और डिवाइडर को बीच रास्ते में लगाकर सड़क को ब्लॉक कर दिया।

इस बीच स्थित को काबू करने पहुँची पुलिस से भी भीड़ ने हाथापाई की। जिसके बाद इलाके में कानून व्यवस्था की स्थिति को बहाल करने के लिए पुलिस को सख्त कदम उठाने पड़े। यह बवाल यहीं नहीं रुका। सर्व समाज के सदस्यों ने सोमवार को भाेईवाड़ा चाैराहे से उप-मंडल कार्यालय तक मौन रैली निकाल कर विरोध प्रदर्शन किया और उचित कार्रवाई की माँग की।

‘जब भी आप किसी मिलिट्री डील में ‘दलाली’ के बारे में सुनें तो कॉन्ग्रेस के बारे में सोचें’: रविशंकर प्रसाद

अगस्ता वेस्टलैंड डील में मुख्य आरोपित राजीव सक्सेना के खुलासे के बाद बीजेपी ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पर सीधा हमला बोला है। केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहा कि यूपीए की विरासत खत्म होने का नाम नहीं ले रही है।

उन्होंने कहा, “हमें सत्ता में आए 6 साल हो चुके हैं लेकिन अब तक यूपीए के किए कारनामे बाहर आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि मामले के मुख्य आरोपित राजीव ने प्रवर्तन निदेशालय के सामने खुलासा किया है कि उसने ये पैसे नेताओं और टॉप अधिकारियों को दिए गए थे।”

अगस्ता वेस्टलैंड को लेकर केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कॉन्ग्रेस पर कई गंभीर आरोप लगाए। मंगलवार (नवंबर 17, 2020) को प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हुए रविशंकर प्रसाद ने कहा, “बहुत बड़ी पेंट कंपनी जेंसन निकॉल्सन का एक बैनर देशभर में लगा होता था- “जब भी रंगों को देखो तो हमारे बारे में सोचो।” इसको थोड़ा बदल दूँ तो- “जब भी आप किसी मिलिट्री डील में किक बैक के बारे में सुनें तो कॉन्ग्रेस नेताओं के बारे में सोचें।”

उन्होंने आगे कहा, “बिना लूट के कोई सुरक्षा की डील नहीं, बिना किक बैक के कोई सुरक्षा से संबंधित खरीदारी नहीं और इन सब में कहीं न कहीं कुछ कॉन्ग्रेस नेताओं के नाम आते हैं, उनके व उनके परिवार से जुड़े लोग आते हैं। कॉन्ग्रेस पार्टी को इसका जवाब देना पड़ेगा।”

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा, “राजीव सक्सेना ने ईडी को बताया कि पैसे नेताओं और टॉप अधिकारियों को दिए गए थे। टोटल कीकबैक 70 मिलियन यूरो था। अगर AP का मतलब अहमद पटेल तो FAM का मतलब भी सामने आना चाहिए। क्या FAM का मतलब फैमिली है और सब जानते हैं कि कॉन्ग्रेस पार्टी में परिवार किसका है।”

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा, “ये गंभीर आरोप कॉन्ग्रेस पार्टी के बड़े नेताओ पर लगे हैं। इस पर कॉन्ग्रेस पार्टी को क्या कहना है या चुप रहना है। डिफेंस डील में कॉन्ग्रेस पार्टी के नेताओ का नाम आना ही है, ऐसे में हमारे देश की सुरक्षा के साथ ऐसे ही ये लोग खिलवाड़ करते रहे। सोनिया जी, राहुल जी बताएँ कि इस पर क्या कहना है।”

केंद्रीय मंत्री ने कहा, “जाँच एजेंसी अपना काम कर रही है, उस मामले में हम दखल नहीं देते हैं।” गुपकार मसले पर रविशंकर प्रसाद ने कहा, “अमित शाह ने बहुत सही ट्वीट किया है, मुफ्ती जी कहती हैं कि जब तक कश्मीर का झंडा नहीं आएगा, हम तिरंगा नहीं लहराएँगे। हमारी सेना आतंक पर भारी पड़ी है, इसलिए ये लोग घबराए हुए हैं।”

उन्होंने कहा, “प्रधानमंत्री की अपील लोकल फ़ॉर वोकल का बहुत बड़ा असर हुआ है और इस त्यौहार के सीजन में चीन को बहुत बड़ा आर्थिक नुकसान हुआ है।” कपिल सिब्बल के बयान पर रविशंकर प्रसाद ने कहा, “कॉन्ग्रेस में नेता अब बोलने लगे है, लेकिन कॉन्ग्रेस में सुनने वाला कौन है।”

रविशंकर प्रसाद ने कहा कि डिफेंस डील में कॉन्ग्रेस पार्टी के नेताओं का नाम आना ही बताता है कि हमारे देश की सुरक्षा के साथ ऐसे ही ये लोग खिलवाड़ करते रहे हैं। सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी बताएँ कि इस पर क्या कहना है। उन्होंने कहा कि जाँच एजेंसी अपना काम कर रही हैं, उस मामले में हम दखल नहीं देते हैं।

उन्होंने कहा, “2010 में 3,600 करोड़ रुपए के अमाउंट से राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के लिए VVIP अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर खरीदने की बात हुई थी। दो साल बाद 2012 में मीडिया रिपोर्ट आ गई थी कि इसमें किक बैक हुआ है।”

गौरतलब है कि अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले (Agusta Westland Deal) के प्रमुख आरोपित और पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट राजीव सक्सेना ने पूछताछ कमलनाथ के भतीजे रतुल पुरी, बेटे बकुल नाथ, सलमान खुर्शीद और अहमद पटेल का नाम लिया है। जाँच एजेंसियाँ पूरे मामले की जाँच कर रही हैं। जल्द ही इन नेताओं पर शिकंजा कस सकता है। अगस्ता वेस्टलैंड VVIP चॉपर डील केस में तीन हफ्ते पहले ही सक्सेना को अंतरिम जमानत दी गई है।