मुंबई नहीं आने की धमकियों के बीच कंगना रनौत ने ट्वीट कर ऐलान किया है कि वे मुंबई आ रही हैं और किसी के बाप को रोकना हो तो रोक ले। कंगना आजकल ट्विटर पर लगभग हर प्रोपेगेंडाबाज और वामपंथियों के निशाने पर हैं। इस लिस्ट में 2 नए नाम जुड़े हैं। पहली है प्रोपेगेंडा वेबसाइट ‘दी वायर’ की रिपोर्टर रोहिणी सिंह और दूसरी है राहुल गाँधी की कट्टर भक्त और कुख्यात कॉन्ग्रेस ट्रोल संजुक्ता बसु।
दरअसल, कंगना रनौत ने हाल ही में कहा था कि उन्हें मुंबई पुलिस की सुरक्षा नहीं चाहिए। इस पर शिवसेना नेता संजय राउत ने उन्हें धमकी दी थी कि कंगना रनौत को मुंबई वापस नहीं आना चाहिए। जवाब में कंगना ने कहा था कि आजकल मुंबई पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर जैसी क्यों लग रही है।
कंगना ने अपने ट्वीट में मुंबई की तुलना पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर से करते हुए ट्वीट किया, “संजय राउत ने मुझे खुले में धमकी दी है और मुंबई नहीं आने को कहा है। मुंबई की गलियों में आज़ादी-ग्रैफिटी और अब खुली धमकी। मुंबई पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर जैसी फ़ीलिंग क्यों दे रही है?”
इसी विवाद पर वामपंथी प्रोपेगेंडा और कुख्यात फेक न्यूज़ वेबसाइट ‘दी वायर’ की रिपोर्टर रोहिणी सिंह ने कंगना रनौत को घेरने की कोशिश करते हुए कहा कि कल्पना करिए कि भाजपा नेता फडणवीस की सरकार के दौरान बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान और उनकी पत्नी किरण राव ने मुंबई की तुलना पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से की होती तो उनका कितना विरोध होता।
इस पर कंगना रनौत ने रोहिणी सिंह को जवाब में लिखा, “रोहिणी कृपया मुझे बताएँ कि फिल्म इंडस्ट्री में कब आमिर/किरण जी ने असहिष्णुता के बारे में बात की थी। क्या उन्होंने किसी ड्रग/ माफिया रैकेट का खुलासा किया? क्या भाजपा के किसी नेता ने उन्हें उस समय भारत छोड़ने के लिए कहा था? यह अतार्किक तुलना क्या है?”
कुख्यात कॉन्ग्रेस ट्रोल को कंगना ने किया ट्रोल
शुक्रवार (सितम्बर 04, 2020) को एक प्रसिद्ध कॉन्ग्रेस ट्रोल, संजुक्ता बसु ने शिवसेना नेता संजय राउत के बचाव में अभिनेत्री कंगना रनौत को ‘भाजपा का मोहरा’ बताया।
संजुक्ता बसु ने ट्वीट किया, “लोग पूछ रहे हैं कि कंगना रनौत द्वारा मुंबई की तुलना PoK से करने पर दक्षिणपंथी नाराज क्यों नहीं हैं? लेकिन उनमें आमिर खान के खिलाफ नाराजगी है। क्या यह आसान नहीं है? आमिर की टिप्पणी अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिन्दुओं की हिंसा की आलोचना थी। कंगना महाराष्ट्र सरकार पर हमला करने वाले भाजपा के चेहरे की भूमिका निभा रही हैं।”
इस अपमानजनक टिप्पणी पर कॉन्ग्रेस ट्रोल को कंगना रनौत ने बताया कि उन्होंने दो बार भाजपा से चुनाव टिकट को ठुकरा दिया था। अभिनेत्री कंगना रनौत ने लिखा, “बीजेपी का मोहरा..हाहा। मैंने दो बार बीजेपी के टिकट से इनकार किया है, मैं कंगना रनौत हूँ… मेरी लोकप्रियता और वार्षिक आय कई सफल मंत्रियों और राजनेताओं से कहीं अधिक है … कभी-कभी अपनी बुद्धि का इस्तेमाल क्यों नहीं करते?”
BJP stooge ha ha , I have denied BJP ticket twice, I am Kangana Ranaut my popularity and yearly income is far more than many successful Ministers and politicians, why not sometimes use your intellect Madam intellectual ?…
मुंबई पुलिस पर अभिनेत्री कंगना रनौत के ट्वीट और शहर की तुलना पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से करने पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना, अमेय खोपकर ने शुक्रवार (सितंबर 04, 2020) को ट्विटर पर बिना किसी का नाम लिए मुंबई पुलिस के खिलाफ बोलने वालों को धमकी दी कि एक सच्चा मुंबईवासी मुंबई पुलिस की निंदा बर्दाश्त नहीं करेगा।
‘9 तारीख को आ रही हूँ मुंबई, किसी के बाप में हिम्मत है तो रोक ले’
इस तमाम विवाद के बीच बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत ने एक ट्वीट किया है। इसमें कंगना ने लिखा है, “मैं देख रही हूँ कि बहुत से लोग मुझे धमकी दे रहे हैं कि मैं मुंबई वापस नहीं आऊँ। इसलिए मैंने ये फैसला किया है मैं अब 9 सितंबर मुंबई वापस जाऊँगी। मैं वो समय भी शेयर करूँगी, जब मैं मुंबई हवाई अड्डे पर उतरूँगी। किसी के बाप में हिम्मत है तो रोक ले।” इस ट्वीट के साथ ही कंगना ने एक स्माइली भी शेयर की है।
I see many people are threatening me to not come back to Mumbai so I have now decided to travel to Mumbai this coming week on 9th September, I will post the time when I land at the Mumbai airport, kisi ke baap mein himmat hai toh rok le ? https://t.co/9706wS2qEd
ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कंपनी (बीबीसी) के नए डायरेक्टर जनरल टिम डैवी मशहूर वामपंथी नेटवर्क की ज़िम्मेदारी सँभालने के लिए तैयार हैं। इसके अलावा उन्होंने अपने विचारधारा प्रेरित कर्मचारियों से भी साफ़ कह दिया है कि या तो वह अपना नज़रिया बदल लें या नौकरी से इस्तीफ़ा दे सकते हैं। ख़बरों के मुताबिक़ बीबीसी के नए मुखिया टिम ने वादा किया है कि बीबीसी में बड़े पैमाने पर बदलाव होंगे।
साथ ही कर्मचारियों से कहा कि जितने भी लोग किसी भी तरह की विचारधारा से प्रेरित हैं वह अपना नज़रिया बदल लें या वह नौकरी छोड़ सकते हैं। कार्डिफ के बीबीसी दफ्तर में बोलते हुए टिम ने कहा, “अगर कोई कर्मचारी किसी विचारधारा प्रेरित स्तंभकार बनना चाहता है या सोशल मीडिया पर किसी विचारधारा के लिए कैम्पेनर की तरह काम करना चाहता है, तो यह उनकी निजी पसंद हो सकती है लेकिन ऐसे लोग अब बीबीसी में काम नहीं कर सकते हैं।”
टिम डैवी ने अपने उन कर्मचारियों पर कार्रवाई का ऐलान किया है जो सोशल मीडिया पर राजनीतिक टिप्पणी करेंगे। ऐसा बताया जा रहा है कि यह बदलाव इसलिए किए जा रहे हैं जिससे बीबीसी की निष्पक्ष छवि बने। टिम ने यह भी कहा कि सोशल मीडिया के संबंध में बीबीसी के कर्मचारियों के लिए दिशा निर्देश जारी किया गया है। सभी कर्मचारियों को इसका पालन करना होगा।
इसके बाद टिम ने कहा अब बीबीसी के लिए निष्पक्ष बने रहना सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी। साथ ही बीबीसी पर तमाम विचारधाराओं के नेता आरोप लगाते हैं कि उसका रवैया पक्षपाती और भेद करने वाला है। टिम के मुताबिक़, “बीसीसी सिर्फ विचारधारा से प्रेरित रहने वाले पत्रकारों और स्तंभकारों का संस्थान नहीं है। संस्थान के भीतर लोकतांत्रिक मूल्यों की अनदेखी नहीं की जा सकती है खासकर निष्पक्ष चर्चाएँ और नस्लभेद जैसे मुद्दों का विरोध। हमारा उद्देश्य राजनीतिक झुकाव से हट कर आगे बढ़ना होगा। हम किसी के एजेंडा का प्रचार नहीं कर सकते सिर्फ सच सामने लाना होगा।”
उन्होंने कहा, “फेक न्यूज़, सोशल मीडिया कैम्पेन, विचारों का शोर और मीडिया संस्थानों के झुकाव जैसे वक्त में हमें अपना काम सही से करना होगा। हमें पूरे देश के लिए ख़बरें तैयार करनी हैं न कि एक ख़ास वर्ग या समूह के लिए। बीबीसी पर हमेशा से आरोप लगते रहे हैं कि वह वामपंथ से प्रेरित है या वामपंथ का पक्ष लेता है। इस तरह के आरोप सिर्फ इंग्लैंड में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में लगाए जाते हैं।” इन बातों को मद्देनज़र रखते हुए टिम ने यह आदेश जारी किया।
बीबीसी पर यह आरोप लगाए जाते हैं कि वह सिर्फ लंदन के संभ्रांत वर्ग के लिए ख़बरें तैयार करता है। इस पर टिम ने कहा, “मैं इस तरह के आरोप आने वाले समय में नहीं सुनना चाहता कि बीबीसी सिर्फ एक विशेष वर्ग के लिए खबरें प्रकाशित करता है।”
इसके बाद टिम ने इस बात का भी दवा किया कि बीबीसी निष्पक्षता के लिए समर्पित रहेगा। इस पर टिम ने अपनी बात ख़त्म करते हुए कहा, “मैं हमारे रवैये में बड़े पैमाने पर बदलाव चाहता हूँ वह चाहे आंतरिक हो या बाहरी। लोगों के बीच यह संदेश जाना चाहिए कि हम उनके लिए काम कर रहे हैं न कि किसी विचारधारा के लिए।”
ताइवान ने चीन का एक फाइटर जेट मार गिराया है। टीवी रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि चीनी सुखोई विमान-35 ताइवान के एयरस्पेस में घुस आया था। ताइवान ने अमेरिकी पैट्रियॉट मिसाइल डिफेंस सिस्टम का इस्तेमाल कर उसे मार गिराया। बाद में ताइवान ने आधिकारिक तौर पर इस दावे को गलत करार दिया।
इससे पहले खबरों में कहा गया था कि पहले ताइवान ने चीन को चेतावनी दी। मगर, चीनी विमान फिर भी उसके एयरस्पेस में घूमता रहा। इसके बाद उन्होंने विमान को मार गिराया। सुखोई विमान को उड़ाने वाला पायलट भी इस घटना में घायल हो गया। इस घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।
कहा जा रहा है कि चीन पिछले कई दिनों से ताइवान के एयरस्पेस में अपने लड़ाकू विमान भेज रहा है। इसलिए ताइवान ने चीन के किसी भी नापाक हरकत का मुँहतोड़ जवाब देने की तैयारी शुरू कर दी है।
चीन का सामना करने के लिए ताइवान की सेना और नेवी दोनों अलर्ट हैं। वहाँ के राष्ट्रपति त्साई इंग-वेन ने सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए कई घोषणाएँ भी की हैं। इसके तहत रिजर्व फोर्स को ताइवानी सेना के लिए मजबूत बैकअप के रूप में विकसित किया जाएगा। यह सशस्त्र बलों की तरह ही ताकतवर होगी। इनको भी वैसे ही हथियार व सैन्य उपकरण दिए जाएँगे जिनका प्रयोग ताइवानी सेना करती है।
Exclusive #ViralVideo of #Su35 pilot after being shot down over #Taiwan Strait. #Chinese jets undertake aggressive intrude on into #Taiwanese workspace on several occasion. But looks like #US#Taiwan had enough.
बता दें, ताइवानी राष्ट्रपति की यह घोषणा बेहद महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि चीन ने हाल ही में हॉन्गकॉन्ग में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून को पारित किया है। साथ ही ताइवान को भी एक देश दो तंत्र के तहत मिलाने की धमकी दी है।
हालाँकि, यह पहली बार नहीं है कि उसने सैन्य ताकत के जरिए ताइवान को अपने में मिलाने की धमकी दी हो। लेकिन, बीते कुछ समय से जो चीन अपने एयरक्राफ्ट भेज कर ताइवानी एयरस्पेस का उल्लंघन कर रहा है, वह निस्संदेह ही चिंता की बात है।
दूसरी ओर चीन को यह भी दिक्कत है कि अमेरिका ताइवान के साथ खड़ा नजर आ रहा है। हाल में ताइवान को अमेरिका ने पैट्रियॉट एडवांस कैपिबिलिटी-3 मिसाइलों की बिक्री की। इसे देख चीन बौखला गया और इसके कारण उसके सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स ने सीधे तौर पर ताइवान और यूएस को आग से न खेलने की चेतावनी दे डाली।
In response to rumors online that claim a Chinese Su-35 fighter jet had been shot down by Taiwan air defense systems, #ROCAirForce would like to categorically state this is fake news. We urge netizens to not spread it and strongly condemn this malicious act.
— 國防部 Ministry of National Defense, R.O.C. (@MoNDefense) September 4, 2020
हालॉंकि ताइवान के रक्षा मंत्रालय ने इस दावे को खारिज किया है। ताइवान के एयर फोर्स कमांड ने वायरल वीडियो को लेकर कहा है कि यह गलत जानकारी है। ऐसा कुछ नहीं हुआ है। कमांड ने इसकी निंदा करते हुए कहा है कि इंटरनेट पर झूठ फैलाकर लोगों को गुमराह करने की कोशिश की जा रही है।
बुधवार (2 सितंबर 2020) को कॉन्ग्रेस संसद शशि थरूर की अध्यक्षता में सूचना प्रौद्योगिकी के लिए स्थायी समिति ने फेसबुक द्वारा प्रदर्शित किए गए राजनीतिक पूर्वाग्रहों पर चर्चा की। इस समिति की बैठक से कुछ घंटे पहले, केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग को पत्र लिखा था और फेसबुक द्वारा भारत में सत्ता पक्ष के खिलाफ राजनीतिक पूर्वाग्रहों के बारे में गंभीर चिंता व्यक्त की थी।
केंद्रीय मंत्री ने इस पत्र में जिन चिंताओं पर प्रकाश डाला था उनमें से सबसे प्रमुख फेसबुक द्वारा फेक न्यूज़ रोकने के लिए रखे गए पूर्ण रूप से राजनीतिक पूर्वग्रह से युक्त थर्ड पार्टी फैक्ट चेकर्स का विषय था।
अपने पत्र में उन्होंने लिखा, “फेसबुक के साथ एक प्रमुख मुद्दा थर्ड-पार्टी फैक्ट-चेकर्स के लिए फैक्ट-चेकिंग की आउटसोर्सिंग है। फेसबुक यूजर्स को गलत सूचना से बचाने के लिए फ़ेसबुक अपनी ज़िम्मेदारी से बचने के साथ ही बाहरी फैक्ट चेकर्स पर निर्भर रहता है, जो कि पहले से ही राजनीतिक पूर्वग्रहों से ग्रसित हैं। रोजाना ही इन फैक्ट चेकर्स के फैक्ट चेक्स को लोगों द्वारा स्वयं ही फैक्ट चेक कर दिया जाता है।”
सीएनएन-न्यूज 18 की रिपोर्ट के अनुसार, समिति की सुनवाई में, “भाजपा सांसदों ने फेसबुक द्वारा अंतर्राष्ट्रीय फैक्ट-चेकिंग नेटवर्क समिति और नियुक्तियों के बारे में बात की। इसकी मुखिया कंचन कौर ने पीएम नरेंद्र मोदी के साथ-साथ ही सत्तारूढ़ दल के खिलाफ अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया है।”
IFCN (इंटरनेशनल फैक्ट-चेकिंग नेटवर्क) के कार्यकर्ताओं में से एक कंचन कौर भी हैं, जो यह तय करती है कि भारत में किस वेबसाइट को IFCN सर्टिफिकेशन मिलता है और किस पोर्टल को नहीं! IFCN वेबसाइट पर कंचन कौर की प्रोफाइल बताती है कि उनमें ‘हितों का टकराव’ नहीं है।
IFCN पर कंचन कौर का प्रोफाइल विवरण
कंचन कौर ने IFCN सर्टिफिकेशन के अभ्यर्थी जिन कुछ पोर्टल्स का आकलन कर उन्हें सर्टिफिकेट दिया, वे बूमलाइव (BoomLive), दी क्विंट (TheQuint), ऑल्टन्यूज़ (AltNews ) आदि हैं। यह उनके IFCN प्रोफाइल पर भी दिखाई देता है। उसने Factchecker.in का भी आकलन किया और उसे भी सर्टिफिकेट जारी किया।
यहाँ पर ध्यान रखा जाना चाहिए कि न केवल ऑल्टन्यूज़, दी क्विंट जैसों को कई बार फर्जी खबरें फैलाने के लिए पकड़ा गया है, बल्कि उन्हें अत्यंत स्पष्ट राजनीतिक और वैचारिक पूर्वग्रह के लिए भी कुख्यात हैं। Factchecker.in भी अब इनके भयावह एजेंडा में शामिल हो गया है।
कंचन कौर इन पोर्टल्स के लिए IFCN सर्टिफिकेट का आकलन और निगरानी करती आई हैं, जो न केवल राजनीतिक दुर्भावना से भरे हैं, बल्कि स्पष्ट रूप से भाजपा के खिलाफ हैं। यही नहीं, ये वो पोर्टल्स हैं, जो बड़े पैमाने पर हिंदुओं के खिलाफ होने के साथ ही संप्रदाय विशेष के समर्थकों के साथ जुड़े हैं।
ऑपइंडिया ने खुद कंचन कौर की विचारधारा पर गौर करने की कोशिश की जिसमें एक ऐसा पेपर मिला जिसे उन्होंने नवंबर, 2019 में लिखा था। यानी, पीएम मोदी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने के कुछ ही महीने बाद।
कंचन कौर के लेख का हिस्सा
कंचन कौर ने जो पेपर लिखा, वह ‘भारत में फेक न्यूज़ इकोसिस्टम की समीक्षा और न्यूज़ साक्षरता प्रोजेक्ट की आवश्यकता’ था। दिलचस्प बात यह है कि जब वह खुद को फर्जी ख़बरों को रोकने के लिए जिम्मेदार संस्था मानती हैं और तय करती हैं कि कौन सा पोर्टल ‘तटस्थ’ ‘विश्वसनीय’ माना जाना चाहिए, किसे ‘फैक्ट-चेकर’ माना जाना चाहिए, कंचन कौर का अपना ही यह दस्तावेज फर्जी तथ्यों और वैचारिक पूर्वाग्रहों से भरा हुआ था।
जैसे, इस पन्ने के पहले ही पैराग्राफ में कंचन कौर बताती हैं कि सोशल मीडिया, खासकर व्हाट्सएप के माध्यम से फैली अपहरण की अफवाह के कारण 30 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। हालाँकि, जानकारी का यह हिस्सा अपने आप में असत्य नहीं है। बच्चों के अपहरण की अफवाहें वास्तव में हुई हैं और कई लोगों को न्याय पाने के लिए अपनी जान भी गँवानी पड़ी है। लेकिन, पहले वाक्य के बाद ही असली एजेंडा अपनी जगह बनता है।
वह आगे बढ़ती हैं और लिखती हैं कि टेलीकॉम कम्पनी जियो भारत में किस तरह से पेअर जमाती हैं, इससे इंटरनेट का उपयोग कैसे बढ़ा और फिर, इसे बीजेपी से जोड़ते हुए दावा करती है कि उसके व्हाट्सएप समूहों में 3 मिलियन से अधिक लोग हैं। इसके अलावा, वह यह दावा करने के लिए बीबीसी के एक अध्ययन का हवाला देती है कि दक्षिणपंथी ही ‘अधिकांश गलत सूचना’ फैलाते हैं।
इस पहले पैराग्राफ में ही कई चीजें गलत हैं। सबसे पहले, वह किसी भी तरह से यह आरोप लगाने के लिए बच्चों के अपहरण की अफवाहों के कारण होने वाली मौतों को लेकर प्रयास करती है कि भाजपा या दक्षिणपंथी इस तरह की अफवाहें फैलाने में शामिल हैं। जबकि, यह साबित करने के लिए कोई सबूत नहीं है क्योंकि ये लिंचिंग देश के अलग-अलग हिस्सों में हुई है, अलग-अलग राजनीतिक दलों के तहत और पुरुष और महिलाएँ, जो हिंदू और संप्रदाय विशेष के लोग थे, इसके शिकार हुए हैं। चूँकि इस दावे को साबित करने के लिए सीधे-सीधे फेक न्यूज़ का सहारा लेना होता है, इसलिए कंचन कौर चालाकी से गुमराह करने वाली जानकारी को इसमें जोड़ती हैं।
फिर वह बीबीसी की रिपोर्ट का हवाला देती है जिसमें कथित तौर पर दावा किया गया था कि भारत में दक्षिणपंथी ने सबसे ज्यादा फर्जी खबरें फैलाईं। चूँकि कंचन कौर, जो ‘फर्जी समाचार’ और ‘फैक्ट-चेकर्स’ की ‘ऑथरिटी’ होने का दावा करती हैं, इसलिए बीबीसी के इस शोध के बारे में बात करना ज़रूरी हो जाता है कि आखिर कैसे बीबीसी ने इस झूठ के बारे में जोर दिया कि फर्जी खबरों के पीछे का कारण राष्ट्रवाद है?
बीबीसी ने इसमें कहा था कि राष्ट्रवादी ही फेक न्यूज़ चलाते हैं। उस रिपोर्ट के खिलाफ बड़े पैमाने पर हंगामा होने के बाद, बीबीसी ने ‘द बेटर इंडिया’ के ईमेल का जवाब दिया, जिसने उनके नाम का इस्तेमाल ‘बीजेपी समर्थक फेक न्यूज़’ की सूची में शामिल होने पर आपत्ति जताई थी। बीबीसी ने तब स्वीकार किया कि उन्होंने ‘द बेटर इंडिया’ का नाम गलती से शामिल कर दिया था। उन्होंने दावा किया था कि वेबसाइट का नाम इस ‘शोध’ से हटा दिया गया था और इसके लिए अपनी शोध प्रणाली की खामियों की जगह ‘मानवीय त्रुटि’ को जिम्मेदार ठहराया था।
बीबीसी ने अपनी संशोधित रिपोर्ट में स्वीकार किया था कि वे वास्तव में यह नहीं कह सकते हैं कि राष्ट्रवाद फ़ेक न्यूज़ के पीछे की ताकत है या नहीं? वे वास्तव में ऐसा कहते हैं और अभी तक इस संगठन ने अपने पिछले आरोपों के लिए कोई माफी जारी नहीं की है।
यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि यह संशोधन तब जोड़ा गया था जब 30 घंटे बाद अस्थायी रूप से इसे हटाने के बाद नई ‘शोध रिपोर्ट’ प्रकाशित की गई थी। यह पैराग्राफ उनके मूल ‘रिसर्च पेपर’ में नहीं था।
इस ‘रिसर्च पेपर’ में लिखा था कि ‘इस नतीजे पर नहीं पहुँचा जा सकता है कि वास्तव में फेक न्यूज़ फैलाने वाले समूह कौन होते हैं लेकिन फिर भी, यह कहा जा सकता है कि इनमें से कुछ कारक जरूर फेक न्यूज़ में भूमिका निभाते होंगे।’
बीबीसी के ‘शोधकर्ताओं’ ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे अपने द्वारा दी गए फेक न्यूज से जुड़े कारकों के प्रभाव की तुलना नहीं कर सकते हैं।
इस पूरे खुलासे के बाद और बीबीसी के अपने दावे से पीछे हटने के बाद, कंचन कौर, जिन्हें IFCN ने यह तय करने का जिम्मा सौंपा है कि कौन विश्वसनीय ‘फैक्ट-चेकर’ है और कौन नहीं, इस ‘शोध’ का इस्तेमाल करती है। इसलिए, पहले ही पैराग्राफ से ही, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि कंचन कौर, जिसे IFCN द्वारा जिम्मेदारी सौंपी गई है, निष्पक्ष नहीं है और जब तक कोई सत्तारूढ़ पक्ष के खिलाफ लिखता या काम करता है, उन्हें उससे कोई आपत्ति नहीं है।
कंचन कौर के इसी रिपोर्ट में दावा किया गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यकाल में सिर्फ चुनिंदा मीडिया घरानों के साथ ही बातचीत की, जबकि यह तथ्य भी एकदम झूठ है। 2 नवंबर तक, कंचन कौर के इस लेख के प्रकाशित होने से पहले ही, पीएम मोदी ने निम्नलिखित चैनलों और प्रकाशनों को साक्षात्कार दिया था:
बैंकॉक पोस्ट
इकोनॉमिक टाइम्स
इज़राइल ह्यूम
नेटवर्क 18
इंडियन एक्सप्रेस
अमर उजाला
इंडिया टीवी
टाइम्स नाउ
वॉल स्ट्रीट जर्नल
रूसी मीडिया – TASS
अफ्रीकी पत्रकार
हिंदुस्तान समाचार
खलीज टाइम्स
UNI
द ट्रिब्यून
एएनआई
PTI
दैनिक जागरण
समय पत्रिका
हिंदुस्तान टाइम्स
आज सेशेल्स अखबार में
सीएनएन फरीद जकारिया
सीएनएन
स्वराज्य पत्रिका
इंडिया टुडे (आजतक)
और यह केवल सितंबर 21, 2014 से लेकर नवंबर 02, 2019 के बीच का विवरण है। यह जरूर ध्यान दिया जाना चाहिए कि कंचन कौर की ‘मीडिया’ की परिभाषा में NDTV के अलावा और कितने मीडिया स्रोत आते हैं।
कंचन कौर ने अपनी इस रिपोर्ट में मान लिया है कि भारत में लोगों के सोचने की क्षमता 2014 के चुनावों के बाद कम हो गई और यह देश अब तार्किक होकर सोच पाने में सक्षम नहीं है। कंचन कौर को यह याद नहीं रहा होगा कि कैसे बीबीसी ने कश्मीर में हज़रतबल ऑपरेशन के दौरान चेचन्या का फुटेज दिखाया था ताकि यह साबित किया जा सके कि भारतीय सेना मंदिर में गोलीबारी कर रही थी। कश्मीर में बीबीसी के कारनामे हाल ही में शुरू नहीं हुए थे, बल्कि 1990 के दशक में भारतीय मीडिया ने पूरे देश में चुप्पी बनाए रखी।
निरक्षरता और व्हाट्सएप
अपने लेख में कंचन कौर ने लिखा कि भारत डेटा खपत में कैसे सबसे ऊपर है, खासकर व्हाट्सएप और स्ट्रीमिंग ऐप पर। वह कहती हैं कि अशिक्षा और फर्जी खबरों के कारण इसका अधिक उपयोग किया जाता है, और आगे, वह उन सभी को भाजपा की चुनावी जीत से जोड़ती है।
लेकिन तथ्य यह हैं कि सबसे पहले, साक्षरता का एक बुनियादी स्तर भी फोन का उपयोग करने के लिए आवश्यक है। इसे इस्तेमाल करने के लिए उपयोगकर्ता को संख्या, अक्षर और निर्देशों की पहचानना जरूर होगी।
साथ ही, वर्तमान मोबाइल डेटा की खपत के साथ 2011 के साक्षरता डेटा का हवाला देकर इसे फेक न्यूज़ से जोड़ना इस फर्जी लेख को और भी हल्का साबित करता है। यही नहीं, 2011 के साक्षरता के आँकड़ों से व्हाट्सएप यूजर की तुलना कर कंचन कौर ने इसे 2019 के चुनावों के परिणाम से जोड़ने का भी खेल इस लेख में खेला है।
बीबीसी के ‘शोध’ का हवाला देते हुए, कंचन कौर का कहना है कि ज्यादातर फर्जी खबरें दक्षिणपंथ द्वारा फैलाई जाती हैं। जैसा कि इस लेख में पहले उल्लेख किया गया है, कि कंचन कौर को यह तक पता नहीं कि बीबीसी ने अपने इस घटिया शोध को अपडेट कर दिया था।
वह आगे कहती हैं कि मुख्यधारा की मीडिया वास्तव में फैक्ट चेक में शामिल नहीं है। कंचन कौर के बयान देखकर ही स्पष्ट होता है कि वह राजनीतिक पूर्वाग्रहों से भरी हुई हैं। वह केवल उन वेबसाइटों को प्रमाणित करती हैं, जिनकी राजनीतिक विचारधारा कॉन्ग्रेस और वामपंथियों के साथ है।
वह इसमें कह रही हैं कि जो वेबसाइट पीएम मोदी, भाजपा, दक्षिणपंथ या हिंदुओं को निशाना बनाने वाले लेख लिखते हैं, उन्हें इतने बड़े स्तर पर शेयर नहीं किया जाता है। शायद कंचन कौर का इशारा दी क्विंट, आउट ऑल्टन्यूज़ की ओर था।
जबकि प्रत्येक व्यक्ति अपने निजी राजनीतिक विचारों को रखने का हकदार है, यह भी एक वास्तविकता है कि एक विशिष्ट राजनीतिक विचारधारा वाले लोगों को IFCN द्वारा नजरअंदाज कर दिया जाता है।
मीडिया में कॉरपोरेट का स्वामित्व
निश्चित रूप से, कंचन कौर ने इस बात पर जोर दिया कि भाजपा के करीबी लोग और व्यक्ति मीडिया के मालिक हैं और इसलिए, वह सोचती हैं कि मीडिया प्रधानमंत्री से सवाल नहीं करता है। वह निश्चित रूप से, यह उल्लेख करना भूल जाती है कि NDTV के मुखिया कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य के रिश्तेदार कैसे हैं, या AAP के सदस्य न्यूज़लॉन्ड्री जैसे डिजिटल न्यूज़ पोर्टल के मालिक कैसे हैं। वह एनडीटीवी की सोनिया सिंह की तरह कई पत्रकारों के व्यक्तिगत राजनीतिक संबंधों को कॉन्ग्रेस पार्टी के साथ जोड़ना भी भूल जाती हैं। हालाँकि, वह यह आरोप सिर्फ इसलिए लगाती हैं कि मीडिया पीएम से सवाल नहीं करती है।
यहाँ तक कि राहुल गाँधी के सोनिया गाँधी और इंडिया टुडे के राजदीप सरदेसाई द्वारा आयोजित ‘सॉफ्ट-पेडलिंग इंटरव्यू’ को भी याद करते हैं। हालाँकि, ये तथ्य कंचन कौर के पेपर में शामिल नहीं हैं, जो कि फर्जी खबरों पर ‘रिसर्च’ को लेकर विवादित हैं।
कंचन कौर को देखकर लगता है कि वह फर्जी खबरों की बढ़ती संख्या से व्यथित हैं। जबकि खुद वह तमाम फेक न्यूज़ अपने इस पूरे पेपर में फैला रही हैं। उसके कागज के अंतिम हिस्से में ‘लम्बे समय तक चलने वाली जंग’ का जिक्र था।
वह लिखती हैं, “इसलिए, गलत सूचना के इस आंदोलन का विरोध करने की तत्काल आवश्यकता है। भारत में, कम से कम, हमारे पास एक पूरी पीढ़ी है जो संदिग्ध है, यहाँ तक कि इतिहास की पुस्तकों को बदल दिया गया है। वैश्विक मीडिया दिग्गजों – विशेष रूप से Google और फेसबुक द्वारा – फर्जी खबरों पर लोगों को शिक्षित करने और इसे कैसे ख़त्म करना है, इसके प्रयास किए गए हैं। Google ने देश में विभिन्न स्तरों पर कार्यशालाएँ आयोजित की और फर्जी समाचारों को प्रसारित करने में 8000 से अधिक पत्रकारों को प्रशिक्षित किया। फेसबुक ने भी अपने प्रयास किए हैं। फ़ेसबुक ने ‘फ़्लैग कंटेंट’ को इंटरनेशनल फैक्ट-चेकिंग नेटवर्क (IFCN) प्रमाणित फैक्ट चेकर्स की एक टीम भी नियुक्त की है।”
कंचन कौर ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है कि उसने इतिहास के पाठ्यक्रमों में बदलाव किया है। वास्तव में केंद्र सरकार ने इस बारे में अभी तक भी कोई रूचि नहीं दिखाई है। क्योंकि अगर ऐसा किया गया होता तो जिस झूठ को वामपंथी इतिहासकार अब तक लोगों को सच मानने के लिए मजबूर करते आए हैं, उस झूठे इतिहास से अब तक शिक्षा पद्धति मुक्त हो चुकी होती।
हालाँकि, यह एक स्थापित तथ्य है कि वामपंथियों ने भारत की शिक्षा को दूषित कर दिया है। इस स्थापित तथ्य को वामपंथी इतिहासकार विलियम डेलरिम्पल ने भी स्वीकार किया है। उन्होंने स्वीकार किया था कि वामपंथी और मार्क्सवादी इतिहासकारों ने इतिहास की किताबों को अपने कल्पना के रंग से रंगा है।
इस लेख में कंचन कौर IFCN को भाजपा द्वारा फैलाई जाने वाली फेक न्यूज़ को रोकने वाली संस्था के तौर पर जिक्र करती हैं। यहाँ पर यह देखना दिलचस्प है कि वह इस नतीजे पर पहुँची कि सभी फेक न्यूज़ के पीछे भाजपा का रोल रहा होगा। वह भी तब, जबकि IFCN निष्पक्ष और पूर्वाग्रह रहित होने का दावा करता है।
वह स्वीकार करती हैं कि फैक्ट चेकर्स पर पक्षपातपूर्ण होने का आरोप लगाया गया है। इस कथित रिपोर्ट में, अगर वह यह स्वीकार कर रही है कि ऑल्टन्यूज़, क्विंट और बूमलाइव जैसे फैक्ट चेकर्स पर पक्षपातपूर्ण होने का आरोप लगाया गया है, तो यह सवाल उठता है कि उसने पहली ही बार में उन्हें IFCN का सर्टिफिकेट क्यों दिया? अगर उसने ऐसा किया, तो उसने एक भी ऐसे प्लेटफॉर्म को सर्टिफिकेट क्यों नहीं दिया है, जो कि वामपंथी विचारधारा का विरोध करता है।
अनिवार्य रूप से, यह पेपर जो कंचन कौर ने लिखा है, में वह सिर्फ अपने राजनीतिक पूर्वाग्रह का ही खुलासा कर रही हैं। वह फैक्ट-चेकर्स, जो कंचन कौर के राजनीतिक पूर्वाग्रह के अनुरूप हैं, उसके द्वारा IFCN सर्टिफिकेट भी प्राप्त करते हैं। फिर उन फैक्ट-चेकर्स को फेसबुक द्वारा काम पर रखा जाता है और वो फिर दक्षिणपंथ की छवि ख़राब करने का काम करते है।
तथ्य सिर्फ यही है कि जिस तरह के फैक्ट चेकर्स को IFCN फैक्ट चेकर होने का सर्टिफिकेट देता है, ना ही वह फैक्ट चेकर हैं, ना ही IFCN की विश्वसनीयता है और ना ही फैक्ट चेकर्स का मूल्यांकन करने वाले इन कार्यकर्ताओं की!
नोट : यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में नूपुर शर्मा द्वारा लिखा गया है, जिसे आप इस लिंक पर पढ़ सकते हैं।
हाल ही में दिल्ली दंगों एक आरोपित आसिफ़ इक़बाल तन्हा ने दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के सामने स्वीकार किया था कि वह भारत को इस्लामिक मुल्क में तब्दील करना चाहता था। बुधवार 2 सितंबर 2020 को दिल्ली की एक अदालत ने आसिफ़ की जमानत खारिज कर दी थी। आसिफ़ जामिया मिल्लिया इस्लामिया विश्वविद्यालय का छात्र है और साल 2014 से स्टूडेंट इस्लामिक आर्गेनाईजेशन (SIO) का सदस्य भी है।
आसिफ़ पर फरवरी महीने में उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों की साज़िश रचने और उनमें शामिल होने का आरोप है। जिसके बाद उसे गैर क़ानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) संशोधन विधेयक (यूएपीए) के तहत गिरफ्तार किया गया था। इस मामले की सुनवाई करते हुए एडिशनल सेशन जज अमिताभ रावत ने कहा कि प्रत्यक्षदर्शियों के आधार पर इतना स्पष्ट है कि आसिफ़ षड्यंत्र रचने से लेकर चक्का जाम की गतिविधि में शामिल था। इन दो घटनाओं की वजह से उत्तर पूर्वी दिल्ली में दंगों की रफ़्तार अनियंत्रित हुई। इस मामले के एक अहम गवाह ने बयान दिया है कि आसिफ़ दंगों की साज़िश रचने वाले मुख्य लोगों में शामिल था।
घटना के संबंध में गवाहों के बयान विस्तृत न होने के चलते न्यायाधीश ने कहा, “वर्तमान हालातों में गवाहों की विश्वसनीयता को यूँ ही नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है। गवाहों ने अपने बयान में जिस तरह दिल्ली दंगों में आसिफ़ और अन्य की भूमिका का उल्लेख किया है। उसके आधार पर मुझे यह बात कहने में ज़रा भी संकोच नहीं है कि ऐसी तमाम वजहें हैं जिनके आधार पर लगाए गए आरोपों को प्राथमिक रूप से सत्य माना जाएगा।”
इस मामले में अमिताभ रावत ने कहा कि भारतीय संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है लेकिन उस स्वतंत्रता का भी एक दायरा है। अदालत ने अपने आदेश में कहा पूरे घटनाक्रम में उल्लेखनीय है कि जिस तरह असहमति जताई गई है। उससे इतना ज़रूर साफ़ होता है कि घटना के पीछे किसी न किसी तरह की साज़िश ज़रूर है। अदालत ने इन आरोपों का ज़िक्र करते हुए कहा ऐसी गतिविधि जिससे देश की एकता पर प्रभाव पड़े। किसी की जान को ख़तरा हो या कोई घायल हो, सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान हो या लोगों के मन में दहशत फैले। इस तरह की सभी गतिविधियाँ यूएपीए की धारा 15 और 18 के दायरे में आती हैं। इसलिए आरोपित पर यूएपीए के यह प्रावधान लगाए जा रहे हैं।
अदालत ने यह भी कहा, “क्योंकि मामला दंगों की साज़िश से जुड़ा हुआ है इसलिए बयान और सबूत पूरी तरह पढ़े और समझे जाएँगे। इस तरह दावे भी किए गए थे कि आरोपित किसी भी तरह की हिंसा में खुद शामिल नहीं हुआ था लेकिन ऐसे दावे के आधार पर इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है कि आसिफ़ समेत कई लोगों ने खुद पूरे दंगों का षड्यंत्र रचा।”
ख़बरों के अनुसार आसिफ़ ने यह बात मानी कि उसने पहले दंगों को बढ़ावा दिया। इसके बाद उसने जामिया मिलिया इस्लामिया के गेट नंबर 7 से निकली 2500-3000 लोगों की भीड़ को दिशा निर्देश दिए। दोनों घटनाएँ 12 दिसंबर की हैं। आसिफ़ ने यह बात भी मानी कि शर्जील इमाम ने 13 दिसंबर को भड़काऊ भाषण दिए। जिससे प्रदर्शन में शामिल हुए लोग चक्काजाम करें।
आसिफ़ ने 15 दिसंबर को गाँधी पीस मार्च का आयोजन कराने की बात भी स्वीकार की। यह मार्च जामिया मेट्रो स्टेशन से शुरू हुई फिर जाकिर नगर और बाटला हाउस होते हुए संसद तक चली। उसने इस मार्च का नाम महात्मा गाँधी इसलिए रखा जिससे मार्च में ज़्यादा भीड़ इकट्ठा हो। दिल्ली पुलिस ने सूर्या होटल के पास बैरीकेडिंग तक लगा दिए थे जिससे प्रदर्शनकारियों को वहीं पर रोका जा सके।
इसके बाद आसिफ़ ने माना कि उसने प्रदर्शनकारियों को बैरीकेडिंग तोड़ने के लिए भी भड़काया और कहा कि पुलिस के पास उन्हें रोकने की हिम्मत नहीं है। लेकिन वह अपने इरादों में कामयाब नहीं हो पाया क्योंकि पुलिस ने भीड़ को अलग करने के लिए लाठी चार्ज कर दिया। इसके बाद जामिया के छात्रों ने पत्थर चलाना शुरू कर दिया, बसों में आग लगाई और दिल्ली की सड़कों पर निर्दोष लोगों से हाथापाई की। जिसकी वजह से पुलिस वाले और प्रदर्शनकारी दोनों ही घायल हुए था।
अंत में आसिफ़ इक़बाल ने यह भी बताया कि उसने देश के कई शहरों में भड़काऊ भाषण दिए। जिसमें कोलकाता, लखनऊ, कोटा, इंदौर, कानपुर, उज्जैन, जयपुर, पटना, सब्ज़ीबाग़ अररिया, समस्तीपुर और अहमदाबाद जैसे शहर शामिल हैं। उसने संप्रदाय विशेष के लोगों से इस बात का निवेदन किया वह बड़े पैमाने पर विरोध करें और हिंसा की ज़रूरत पड़ने पर हिंसा भी करें। उसने कहा कि सड़क पर चक्का जाम करने की बात जेएनयू के एक्टिविस्ट उमर खालिद ने कही थी।
सारी योजनाएं ठीक उस दौरान तैयार की गई थीं जब डोनाल्ड ट्रंप भारत यात्रा पर थे। इस पूरी योजना को अंजाम देने वालों में मीरान हैदर और सफूरा ज़रगर अहम नाम थे जिसके वजह से बाद में हिंसात्मक दंगे हुए थे। आसिफ़ भारत को न सिर्फ इस्लामिक देश में बदलना चाहता था बल्कि उसका कहना था कि सीएए संप्रदाय विशेष के लोगों का विरोधी है। नतीजतन उसने जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ मिल कर साज़िश रची।
हाल ही में समाचार चैनल ‘इंडिया टुडे’ ने दावा किया था कि तीन सीबीआई अधिकारियों ने उन्हें कथित तौर पर सूचित किया है कि 34 वर्षीय अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत में किसी भी तरह का कोई ‘मर्डर एंगल’ यानी, हत्या का मामला नहीं है। लेकिन केंद्रीय जाँच एजेंसी (सीबीआई) ने ऐसे सभी दावों को खारिज कर दिया है।
मंगलवार (सितम्बर 02, 2020) को, इंडिया टुडे ने एक एक्सक्लूसिव समाचार रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसका शीर्षक था, “विशेष: सीबीआई अधिकारियों ने इंडिया टुडे को बताया – सुशांत सिंह राजपूत मामले में हत्या का कोई सबूत नहीं, जाँच अभी भी जारी।”
इंडिया टुडे ने तीन अनाम सीबीआई अधिकारियों का हवाला देते हुए इस रिपोर्ट में दावा किया कि जाँच एजेंसी को कोई भी ऐसा सबूत नहीं मिला है, जो अभिनेता की मौत में हत्या की संभावना को साबित कर सके।
इंडिया टुडे का दावा – सीबीआई अधिकारियों को नहीं मिला हत्या का कोई सबूत
इस रिपोर्ट में जोर देकर कहा गया है, “जाँच करने वाली टीम के अनुसार, कोई भी फॉरेंसिक रिपोर्ट, प्रमुख संदिग्धों के बयान या घटनास्थल के साक्ष्य इस बात को प्रमाणित नहीं करते हैं कि सुशांत सिंह की हत्या हुई थी।”
इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘जबकि सीबीआई ने आधिकारिक तौर पर ‘हत्या’ की जाँच को ‘बंद’ नहीं किया है, अधिकारियों ने ‘आत्महत्या के नजरिए’ की जाँच करने पर ध्यान केंद्रित किया है।
इंडिया टुडे के इस एक्सक्लूसिव लेख में दोहराया गया है, “सीबीआई अधिकारियों का कहना है कि वे आत्महत्या के कोण पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं और यह जाँच कर रहे हैं कि उन्हें आत्महत्या के लिए उकसाया गया या नहीं।”
इंडिया टुडे की विशेष रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट
CBI ने इंडिया टुडे के दावों को खारिज किया है
इंडिया टुडे द्वारा अपनी ’एक्सक्लूसिव’ रिपोर्ट प्रकाशित करने के दो दिन बाद, केंद्रीय जाँच ब्यूरो ने बृहस्पतिवार (सितम्बर 03, 2020) को एक बयान जारी कर इंडिया टुडे के दावों को खारिज कर दिया और कहा कि किसी भी प्रवक्ता या टीम के सदस्य द्वारा मीडिया द्वारा चलाए जा रहे ‘खोजी डिटेल्स’ को साझा नहीं किया गया है। उन्होंने दोहराया कि कोई भी डिटेल शेयर नहीं की गई हैं।
सीबीआई के बयान के अनुसार, “सीबीआई सुशांत सिंह राजपूत की मौत से संबंधित व्यवस्थित और पेशेवर तरीके से जाँच कर रही है। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स, जो सीबीआई के हवाले से बताई जा रही हैं, सिर्फ अटकलें हैं और तथ्यों पर आधारित नहीं हैं। यह दोहराया गया है कि हमारी पॉलिसी के अनुसार, सीबीआई जाँच का विवरण शेयर नहीं करती है। सीबीआई के प्रवक्ता या किसी भी टीम के सदस्य ने मीडिया के साथ जाँच का कोई विवरण शेयर नहीं किया है। सीबीआई के नाम से चलाई जा रही मीडिया रिपोर्ट्स विश्वसनीय नहीं हैं। मीडिया से अनुरोध है कि सीबीआई के हवाले से खबर चलाने से पहले सीबीआई प्रवक्ता से इसकी पुष्टि करें।”
इंडिया टुडे ने रिया के साथ एक्सक्लूसिव इंटरव्यू प्रसारित कर कहा था कि सुशांत मानसिक रूप से अस्वस्थ थे
इससे पहले, इंडिया टुडे ने सुशांत सिंह राजपूत की मौत में रिया चक्रवर्ती की कथित भूमिका को व्हाइट वॉश करने के लिए मुख्य आरोपित रिया चक्रवर्ती का इंटरव्यू चलाया। इस इंटरव्यू और इसके बाद के कई समाचारों के दौरान, यह चैनल इस बात पर जोर देता रहा है कि सुशांत सिंह मानसिक रूप से बीमार थे और इस कारण यह आत्महत्या का ही मामला है।
हाल ही में, इंडिया टुडे ने रिया चक्रवर्ती की पीआर टीम की तरह काम करते हुए एक लेख प्रकाशित किया था, जिसका शीर्षक था, “विशेष: आगरा से रिया चक्रवर्ती की स्कूल फोटो, शिक्षकों का कहना है कि वह एक प्रतिभाशाली छात्रा थी।”
हालाँकि, अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती के स्कूली जीवन का सुशांत के मामले से कोई लेना-देना नहीं था, फिर भी, इंडिया टुडे द्वारा आरोपित के बचाव में एक भावनात्मक अपील करने के लिए इस प्रकार की कहानी को प्रकाशित किया गया।
पश्चिम बंगाल के दिनाजपुर जिले स्थित रायगंज इलाके में भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता अनूप रॉय की मृत्यु हो गई। यह घटना गुरूवार 3 सितंबर 2020 की है। पार्टी के लोगों का आरोप है कि इस मौत के लिए पुलिस ज़िम्मेदार है। उनका कहना है कि पुलिस ने कार्यकर्ता की पिटाई की और उसके बाद गोली मार दी। इस मौत के विरोध में भाजपा कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान बंगाल भाजपा प्रमुख दिलीप घोष भी मौजूद थे।
West Bengal: Bharatiya Janata Party workers staged a protest in Raiganj of North Dinajpur district over the death of a party worker in police custody. (3.09.2020) pic.twitter.com/rABPImr4Fb
दिलीप घोष ने आरोप लगाया है कि अनूप रॉय को पहले पीटा गया। अंत में पुलिस ने उन्हें गोली मार दी जिससे उनकी मृत्यु हो गई। घोष का कहना है कि यह मृत्यु नहीं है बल्कि हत्या है। इस मामले की स्वतंत्र जाँच होनी चाहिए और आरोपितों को दंड मिलना चाहिए। वहीं पुलिस द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक़ अनूप रॉय के शरीर पर चोट के कोई निशान नहीं मौजूद हैं। घटना के विरोध में दिलीप घोष समेत भारतीय जनता पार्टी के कई कार्यकर्ता रायगंज में धरने पर भी बैठे। इस विरोध प्रदर्शन में कार्यकर्ताओं के अलावा अनूप रॉय के परिवार वाले भी मौजूद थे।
इसके अलावा भाजपा ने इस घटना पर कई तरह के सवाल भी खड़े किए हैं। उनका कहना है कि हत्या के महज़ 3 घंटे बाद ही क्यों पोस्टमार्टम कर दिया गया। इसके अलावा भाजपा का यह भी कहना था पुलिस ने अनूप को बुरी तरह प्रताड़ित भी किया था, उस पर ऐसा अत्याचार किया गया जिसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। पश्चिम बंगाल की न्याय और क़ानून व्यवस्था दिन प्रतिदिन बदतर होती जा रही है। इसके अलावा मृतक की माँ ने भी पुलिस को पत्र लिख कर कई अहम बातें कही हैं, उनके मुताबिक़ पोस्टमार्टम सही से नहीं किया गया है। वह इस गलत पोस्टमार्टम रिपोर्ट को स्वीकार नहीं करेंगी।
दरअसल, दिनाजपुर जिले के रायगंज क्षेत्र में डकैती की एक घटना हुई थी। इस घटना के संबंध में स्थानीय पुलिस ने 24 वर्षीय अनूप रॉय को पूछताछ के लिए बुलाया था। मामले पर एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का यह कहना है ‘डकैती की जानकारी मिलने पर हमने कुल 4 लोगों को गिरफ्तार किया था। उन लोगों ने अनूप रॉय का नाम लिया जिसके बाद हमने पूछताछ के लिए उसे भी तलब किया। वह थाने में पहुँचते ही बेहोश हो गया, उसकी यह हालत देखने के बाद हम उसे एक सरकारी अस्पताल लेकर गए। जहाँ उसे कुछ समय बाद मृत घोषित कर दिया गया। शरीर को पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया जहाँ इस बात का खुलासा हुआ कि अनूप की मृत्यु मस्तिष्क की नस फटने की वजह से हुई है।’
मृतक अनूप रॉय भारतीय जनता पार्टी की स्थानीय ईकाई का कार्यकर्ता था। भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं के अलावा अनूप के परिवार वालों ने भी मामले की स्वतंत्र जाँच की माँग उठाई है। वहीं तृणमूल कॉन्ग्रेस ने भी इस मुद्दे पर अपना पक्ष रखा है। पार्टी के स्थानीय कार्यकर्ता के अग्रवाल ने कहा कि इस घटना का राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए।
पश्चिम बंगाल में भाजपा कार्यकर्ताओं के साथ होने वाली हिंसा की यह पहली घटना नहीं है। इसके पहले भी ऐसी तमाम घटनाएँ सामने आ चुकी हैं। हाल ही में कथित तौर पर तिरंगा फहराने को लेकर हुए विवाद में बीजेपी के एक कार्यकर्ता की हत्या कर दी गई थी। घटना हुगली के आरामबाग स्थित खनकुल में हुई थी। सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के गुंडों पर हमला करने का आरोप था।
मृतक भाजपा कार्यकर्ता का नाम सुदर्शन प्रमाणिक था। उन पर झंडोत्तोलन के दौरान गुंडों ने धारदार हथियारों से हमला किया था। उन्हें स्थानीय हेल्थ सेंटर ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। इस हत्याकांड के बाद क्षेत्र में काफी तनाव के हालात भी बने थे। इसके बाद भाजपा कार्यकर्ताओं और नेताओं ने विरोध-प्रदर्शन भी किया था।
तृणमूल कॉन्ग्रेस पर भारत के राष्ट्रीय ध्वज का विरोध करने के आरोप लगाए गए थे। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार शनिवार (अगस्त 15, 2020) को दौलतचक में भाजपा और तृणमूल के कार्यकर्ता झण्डा फहरा रहे थे। अचानक सुबह 9 बजे दोनों के बीच संघर्ष शुरू हो गया। बाद में संघर्ष हिंसक हो गया। स्थानीय लोगों का तो यहाँ तक कहना है कि बमबारी भी शुरू हो गई थी। इसी दौरान सुदर्शन प्रमाणिक पर हमला किया गया और वे जमीन पर गिर पड़े।
गलवान घाटी में भारत-चीन सीमा पर चीनी सेना द्वारा दोबारा शुरू की गई खुराफात के बीच उत्तर प्रदेश सरकार ने फैसला लिया है कि अब चीन की कोई भी कंपनी उत्तर प्रदेश के किसी सरकारी प्रोजेक्ट में टेंडर नहीं डाल पाएँगी। योगी आदित्यनाथ सरकार ने सभी विभागों से इस पर प्रतिबंध लगाने को कहा है। कयास लगाए जा रहे हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार की नजर उन जापानी, अमेरिकी और यूरोपिय कंपनियों पर है, जो अब चीन से बाहर निकलने की सोच रही हैं।
इस आदेश के अंतर्गत, सरकारी खरीद में कुछ निश्चित देशों के बिडर्स या कंपनियों के शामिल होने पर रोक के संबंध में सभी विभागों से आवश्यक कार्यवाही करने को कहा गया है। इस मामले में योगी सरकार की ओर से प्रदेश के सभी विभागों को एक पत्र भेजा गया है।
इस आदेश में पीपीपी यानी, पब्लिक, प्राइवेट पार्टनरशिप वाली परियोजनाएँ, राज्य द्वारा संचालित परियोजनाएँ, सार्वजनिक उपक्रम और निगमों के साथ ही स्थानीय निकायों की परियोजनाएँ और सरकारी खरीद भी शामिल हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार, इस मामले से निपटने के लिए अब प्रदेश सरकार एक सक्षम प्राधिकरण तैयार करेगी। इस प्राधिकरण के तहत संबंधित देशों की कंपनियों को रजिस्ट्रेशन कराना होगा। पहले इन कंपनियों को रक्षा मंत्रालय और विदेश मंत्रालय से राजनीतिक सहमति के अलावा गृह मंत्रालय से सुरक्षा संबंधी अनुमति लेनी होगी। इसके बाद ही रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया शुरू होगी।
हर तीन माह के अंतराल पर राज्य की ओर से एक रिपोर्ट इस कंपनी को लेकर केंद्र को भेजी जाएगी। प्राधिकरण के पास इस बात का विवरण रहेगा कितनी कंपनियों के आवेदन आए, कितनों के निरस्त किए गए और कितने आवेदन मंजूर किए गए। केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय सुरक्षा व देश की रक्षा के लिए इस तरह के कदम उठाए गए हैं।
गौरतलब है कि गत मई माह से ही चीन द्वारा गलवान घाटी में की जा रही घुसपैठ के चलते केंद्र सरकार भी कई बड़े चीनी प्रोजेक्ट्स को रद्द कर चुकी है। इसके अलावा भारत सरकार ने सुरक्षा और गोपनीयता का हवाला देते हुए कुछ ही दिन पहले 118 मोबाइल ऐप पर प्रतिबंध लगाया है, जिसमें PUBG भी शामिल है। इसके पहले चरण में भारत सरकार ने 59 मोबाइल ऐप पर प्रतिबंध लगाया था।
सुशांत सिंह राजपूत मामले में नार्कोटिक्स ब्यूरो की तरफ से बड़ी कार्रवाई की गई। नार्कोटिक्स ब्यूरो इस मामले में ड्रग्स के पहलू पर जाँच कर रही है इसी कड़ी में आज रिया चक्रवर्ती के घर में छापेमारी की है। रिया के घर में लगभग 3 घंटे से पूछताछ जारी है और इसके अलावा सैमुएल मिरांडा के घर भी छापेमारी हुई। सैमुएल के घर कई घंटे चली छापेमारी के बाद नार्कोटिक्स ब्यूरो सैमुएल मिरांडा को हिरासत में ले लिया है। साथ ही रिया के भाई शौविक चक्रवर्ती को भी NCB ने समन भेजा है।
ख़बरों के मुताबिक़ नार्कोटिक्स ब्यूरो ने मामले के इस पहलू पर जाँच करते हुए रिया के घर से कई अहम सबूत भी इकट्ठा कर लिए हैं। नार्कोटिक्स ब्यूरो की एक और टीम ने सैमुएल मिरांडा के घर भी छापेमारी की। आज (4 सितंबर 2020) को सुबह के लगभग 6:30 बजे NCB की टीम छापा मारने के लिए रिया चक्रवर्ती के घर पहुँची। छापा मारने वाले नार्कोटिक्स ब्यूरो के इस समूह में कुल 8 सदस्य हैं और उनके साथ मुंबई पुलिस के लोग भी मौजूद हैं।
Maharashtra: Samuel Miranda being brought out of his residence in Mumbai, by Narcotics Control Bureau (NCB), in connection with #SushantSinghRajput death case.
वहीं रिया के घर जारी छापेमारी के समानांतर नार्कोटिक्स ब्यूरो की एक और टीम ने सैमुएल मिरांडा के घर छापा मारा है। कई घंटे चली छापेमारी के बाद एनसीबी सैमुएल मिरांडा को अपने साथ हिरासत में लेकर गई। फिलहाल रिया चक्रवर्ती के घर पर खोजबीन जारी है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, नार्कोटिक्स ब्यूरों के अधिकारियों द्वारा यह कार्रवाई ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंस एक्ट (NDPS) के तहत की जा रही है। नार्कोटिक्स ब्यूरो के डिप्टी डायरेक्टर केपीएस मल्होत्रा इस अभियान की अगुवाई कर रहे हैं।
Maharashtra: Officers of Narcotics Control Bureau (NCB) reach the residence of #RheaChakraborty in Mumbai. An officer (in pic 4) says, “It’s just a procedural matter. That is what we are following. It is being done at Rhea’s and Samuel Miranda’s house.” https://t.co/2qMW4jyDqKpic.twitter.com/307I6bqZCn
अभी तक सामने आई ख़बरों के मुताबिक़ इस अभियान के दौरान रिया चक्रवर्ती के पास मौजूद लैपटॉप और हार्ड डिस्क खँगालें जा रहे हैं। छापेमारी के बाद नार्कोटिक्स ब्यूरो NDPS अधिनियम की धारा 67 के तहत एक समन भी भेज सकता है। इसके अलावा नार्कोटिक्स ब्यूरो ने जिन तीन आरोपित ड्रग सप्लायर्स को गिरफ्तार किया है उनमें से दो अब्दुल बासित परिहार और जैद विलात्रा का शोविक से कनेक्शन सामने आया है। दोनों आरोपित शोविक और सैमुएल मिरांडा के साथ मिल कर काम करने की बात कह चुके हैं।
हाल ही में नार्कोटिक्स ब्यूरो ने जैद विलात्रा और बासित परिहार नाम के दो संदिग्ध ड्रग पेडलर गिरफ्तार किए थे। जिसमें जैद विलात्रा ने पूछताछ के दौरान कई बड़े नामों का ज़िक्र किया था। गुरूवार 3 सितंबर को जैद विलात्रा अदालत में भी पेश किया गया था इसके बाद नार्कोटिक्स ब्यूरो ने उसे 7 दिन की रिमांड पर लिया। जैद के पास से 9.55 लाख रूपए भी बरामद किए थे। उसने पूछताछ में यह भी बताया था कि मुंबई के जुहू, बांद्रा और लोखंडवाला समेत कई इलाकों में होने वाली पार्टी में ड्रग्स की सप्लाई होती थी।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में हिस्सा लेने के लिए बुधवार (सितम्बर 02, 2020) को रूस की राजधानी मॉस्को पहुँचे। जहाँ रूस में राजनाथ सिंह के समकक्ष ने भारत को यह आश्वासन दिया है कि वह भारत के अनुरोध का पालन करते हुए पाकिस्तान को हथियारों की आपूर्ति नहीं करेंगे।
रूस ने भारत को रक्षा मामलों में सहयोग का भी आश्वासन दिया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह रूस के तीन दिवसीय दौरे पर है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और उनके रूसी समकक्ष जनरल सर्गेई शोइगू के बीच मॉस्को में एक बैठक के दौरान उन्होंने कहा कि मॉस्को ताजा घटनाक्रम से परिचित है।
इसके साथ ही, भारत और रूस ने अमेठी में एक AK203 असॉल्ट राइफल कारखाने की स्थापना में तेजी लाने और अपने रक्षा उद्योगों की भागीदारी बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की है। रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि यह मेक-इन-इंडिया में रूसी रक्षा उद्योग को आगे बढ़ाने के लिए एक बहुत ही सकारात्मक आधार प्रदान करता है।
दोनों पक्षों ने ‘AK203 असॉल्ट राइफल’ के उत्पादन के लिए भारत-रूसी संयुक्त उद्यम की स्थापना के लिए चर्चा के अग्रिम चरण का स्वागत किया है। ‘AK203 असॉल्ट राइफल’ को पैदल सेना के लिए सबसे आधुनिक हथियारों में से एक माना जाता है। यह एके-47 राइफल का नवीनतम और सर्वाधिक उन्नत प्रारूप है। यह ‘इंडियन स्मॉल ऑर्म्स सिस्टम’ (इनसास) 5.56 गुना 45 मिमी राइफल की जगह लेगा।
अधिकारियों ने कहा कि राजनाथ सिंह रूसी पक्ष से भारत को एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणालियों की समय पर आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए भी अनुरोध करेंगे। भारत को एस-400 सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल प्रणाली की पहले खेप की आपूर्ति 2021 के अंत तक निर्धारित है। जून के बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की यह दूसरी मॉस्को यात्रा है।
वहीं, कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि भारत-चीन तनाव के बीच रूस की राजधानी मॉस्को में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक से अलग, चीन के रक्षा मंत्री जरनल वे फेंघे (Wei Fenghe) ने भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के साथ मुलाकात की इच्छा जाहिर की है। चीनी पक्ष ने भारतीय मिशन के समक्ष सीमा गतिरोध के सम्बन्ध में यह इच्छा व्यक्त की है।