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महाराष्ट्र: येलम्मा मंदिर से लगे 400 साल पुराने पेड़ को बचाने के लिए नितिन गडकरी ने बदला हाइवे का नक्शा

महाराष्ट्र के सांगली जिले के भोसे गाँव में 400 साल पुराने बरगद के पेड़ के पास से निर्माणाधीन रत्नागिरी-नागपुर हाइवे नंबर 166 गुजरने वाला था। जिसके लिए पेड़ को काटना पड़ता। लेकिन लोगों की माँग पर नितिन गडकरी ने इस पेड़ को बचाने के लिए हाइवे के नक्शे में बदलाव करके प्रोजेक्ट पूरा करने का आदेश दिया है।

महाराष्ट्र के सांगली जिले के भोसे गाँव का 400 साल पुराना बरगद का पेड़ आजकल सोशल मीडिया पर खूब चर्चा में है। दरअसल, एक निर्माणाधीन राष्ट्रीय राजमार्ग की सड़क इससे होकर गुजरने वाली थी। जिसके लिए इस पेड़ को काटकर एक सड़क बनाई जा रही थी।

रत्नागिरी-सोलापुर हाईवे पर यह पेड़ येलम्मा मंदिर के पास है, जो कि करीब 400 वर्गमीटर में फैला है। यह पेड़ स्थानीय लोगों की परंपरा से भी जुड़ा है। यही वजह है कि पर्यावरण कार्यकर्ताओं की माँग पर केन्द्रीय सड़क एवं परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने इस पेड़ को बचाने के लिए खुद इस हाइवे का नक्शा बदलकर इस प्रोजेक्ट को पूरा करने का आदेश दिया है।

इस 400 साल पुराने बरगद के पेड़ को लेकर महाराष्ट्र में पर्यावरण कार्यकर्ताओं के बढ़ते विरोध को देखते हुए, जब राज्य के पर्यावरण मंत्री आदित्य ठाकरे को पेड़ के बारे में अवगत कराया गया, तो उन्होंने तुरंत कार्रवाई की और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से बात की और पेड़ को बचाने की माँग की।

आदित्य ठाकरे ने नितिन गडकरी को पत्र लिखकर कहा कि यह बरगद का पेड़ 400 वर्ग मीटर में फैला हुआ। इसके पास एक येलम्मा देवी माँ का मंदिर है। ठाकरे ने लिखा, यह पेड़ न केवल ऐतिहासिक है, बल्कि चमगादड़ों और अन्य दुर्लभ पक्षियों के लिए एक प्राकृतिक आवास भी है। इसके अलावा यह वहाँ पर रह रहे बच्चों के खेलने की भी जगह है।

ठाकरे ने बुधवार को ही एक ट्वीट में कहा कि नितिन गडकरी ने उनके अनुरोध पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) ने रत्नागिरी-नागपुर राजमार्ग के निर्माण पर काम शुरू कर दिया है।

शुक्रवार (जुलाई 24, 2020) को, एनएचएआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि सर्विस रोड के रास्ते में आने वाले पेड़ के मुख्य तने को बरकरार रखा जाएगा, इसकी कुछ शाखाओं की छँटनी की जाएगी। अब यह हाईवे भोसे गाँव की जगह आरेखन गाँव से होकर गुजरेगा।

उन्होंने कहा- “पेड़ को बचाने के लिए एक योजना बनाई गई थी। पेड़ की कुछ शाखाओं को ट्रिम करने की आवश्यकता होगी, लेकिन पेड़ के ट्रंक को बरकरार रखने के लिए लगभग 20-25 मीटर के लिए इसे बंद करके सर्विस रोड में परिवर्तन किया जाएगा।”

उद्धव सरकार की प्रतीकात्मक कुर्बानी की अपील नहीं आई पार्टी के नेताओं को रास, कॉन्ग्रेस के आरिफ़ नसीम सहित कई नेताओं ने किया विरोध

कोरोना के बढ़ते संकट के बीच महाराष्ट्र सरकार ने बकरीद के मौके पर प्रतीकात्मक कुर्बानी का सुझाव दिया है। प्रतीकात्मक बकरी ईद मनाने के फ़रमान पर उन्हीं की पार्टी के नेता नाराज हो गए है। कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्य के पूर्व कैबिनेट मंत्री आरिफ़ नसीम खान ने सरकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई है।

बता दें, इस बार बकरीद 1 अगस्त को मनाया जाना है। महाराष्ट्र सरकार ने बकरीद लेकर पिछले शुक्रवार को दिशानिर्देश जारी किया था। नसीम खान ने सरकार को घेरते हुए मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर माँग की फैसला तुरंत बदला जाए और सभी मंत्रियों, वर्तमान और पूर्व विधायकों और अधिकारियों की एक तत्काल बैठक बुलाकर ईद को लेकर सही फ़ैसला किया जाए।

खान ने कहा, “हमारी मुख्य आपत्ति दो मुद्दों पर है। सबसे पहले, क़ुर्बानी प्रतीकात्मक रूप से नहीं की जा सकती है और अधिकांश लोगों को बकरियों को ऑनलाइन खरीदने के बारे में पता ही नहीं है। वहीं इस्लाम भी प्रतीकात्मक क़ुर्बानी देने की मंज़ूरी नहीं देता। फिर बकरा ख़रीदने से पहले उसकी सेहत, वजन सब कुछ देखना पड़ता है उसके बाद ही क़ुर्बानी दी जाती है। जो कि ऑनलाइन संभव नहीं है। सरकार को नए दिशानिर्देश जारी करने चाहिए क्योंकि वर्तमान दिशानिर्देश समुदाय के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप करते हैं।”

वहीं महाराष्ट्र में बकरीद को लेकर बनाए जा रहे दिशानिर्देश में वरिष्ठ अधिकारियों और मंत्रियों के साथ शामिल कॉन्ग्रेस के विधायक अमीन पटेल ने भी इस मामले का विरोध किया है। उन्होंने कहा, मैं सोशल डिस्टेंसिंग की निगरानी के लिए हूँ। न कि मैं इस बात को ख्याल रखने के लिए हूँ कि लोग महामारी के दौरान बकरीद के मौके पर घर में नमाज पढ़ रहे या नहीं, भीड़ जुटा रहे या नहीं। लेकिन समुदाय को प्रतीकात्मक रूप से कुर्बानी करने के लिए नहीं कहा जा सकता है।

जारी दिशानिर्देश को “अस्पष्ट और भ्रमित” बताते हुए कई नेताओं ने महाराष्ट्र सरकार पर निशाना साधा है। इसके साथ उन्होंने एनसीपी प्रमुख शरद पवार से भी मामले में हस्तक्षेप की माँग की है। प्रतीकात्मक कुर्बानी और ऑनलाइन बकरों की खरीदारी पर समाजवादी पार्टी के विधायक रईस शेख ने भी अपना विरोध दर्ज किया है। उन्होंने कहा कि वो इस मामले को लेकर शरद पवार से बात करेंगे। उन्होंने आगे कहा कि अगर गणपति पूजन प्रतीकात्मक नहीं हो सकता, तो खास मजहब को क्यों जानवरों की बलि प्रतीकात्मक करने के लिए कहा जाता है?

बात दें बकरीद पर जारी दिशानिर्देश को लेकर अब महाराष्ट्र में जमकर राजनीति हो रही है। वहीं इस मुद्दे को लेकर जमीयतुल उलेमा के नेता गुलज़ार आज़मी ने कहा कि सरकार द्वारा समुदाय विशेष को मवेशियों को बलिदान करने की अनुमति दी जानी चाहिए।

आज़मी ने कहा, “सात लोग एक मवेशी जैसे कि भैंस को आपस में बाँट सकते हैं, जबकि एक बकरी या भेड़ सिर्फ एक व्यक्ति के लिए होता है। कोई भी इस पहलू को नहीं देख रहा है जो सिविक अधिकारियों का बोझ कम करेगा। अगर सरकार मवेशियों की कुर्बानी की अनुमति देती है तो यह काफी संख्या में लोगों की क़ुर्बानी का दायित्व पूरा करेगा।”

गौरतलब है कि महाराष्ट्र सरकार ने बकरीद को लेकर दिशानिर्देश जारी किया था। जिसमें उन्होंने लोगों से नमाज मस्जिदों या फिर ईदगाह में नहीं बल्कि घरों में रहकर अदा करने की अपील की थी। इसके अलावा सरकार ने इस बार प्रतीकात्मक कुर्बानी देने के लिए कहा था। वहीं यह भी कहा था कि अगर नागरिक पशु खरीदना चाहते हैं तो वे ऑनलाइन खरीदारी करें।

केरल और कर्नाटक में सक्रिय हैं ISIS के 200 आतंकी, भारत में हमले की साजिश रच रहा अलकायदा: UN की रिपोर्ट में खुलासा

आतंकवाद पर आई संयुक्त राष्ट्र (UN) की एक रिपोर्ट में चेताया गया है कि भारतीय राज्य केरल और कर्नाटक में अच्छी-खासी संख्या में खूँखार वैश्विक आतंकी संगठन ISIS के आतंकवादी मौजूद हैं। साथ ही खुलासा किया गया है कि ISIL की भारतीय यूनिट ‘हिन्दू विलायाह’ के भी कम से कम 180 से लेकर 200 तक आतंकी सक्रिय हैं। बता दें कि इस आतंकी संगठन के गठन की घोषणा मई 2019 में हुई थी।

ISIS सहित अन्य आतंकी संगठनों पर नजर रखने के लिए गठित की गई यूएन की ‘Analytical Support and Sanctions Monitoring Team’ की 26वीं रिपोर्ट के अनुसार केरल और कर्नाटक में ISIS के कई आतंकी सक्रिय हैं। साथ ही इस रिपोर्ट में चेताया गया है कि अलकायदा की भारतीय उपमहाद्वीपीय यूनिट AQIS भी इस क्षेत्र में हमले की साजिश रच रहा है। ये संगठन तालिबान के बैनर तले सक्रिय है।

इसके सरगना निमरूज़, हेलमंद और कंधार प्रांतों से अपनी गतिविधियों को अंजाम देते हैं। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार में इस आतंकी संगठन के 150-200 आतंकी सक्रिय हैं। ये संगठन अपने पूर्व-सरगना की मौत का बदला लेना चाहता है। फिलहाल ओसामा महमूद AQIS का सबसे बड़ा सरगना है। इससे पहले असीम उमर था, जिसे मार गिराया गया था। उसकी ही मौत का बदला लेने को ये आतंकी संगठन बेचैन है।

पिछले साल 2019 में ISIS ने अपने ‘अमाक न्यूज एजेंसी’ के माध्यम से दावा किया था कि उसने भारत में एक नया प्रांत बनाया है, जिस पर उसका कब्जा है। उसने जम्मू-कश्मीर के भीतर के ही एक क्षेत्र को ‘वालियाह-ए-हिन्द’ या ‘हिन्द प्रांत’ नाम दिया था। जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के साथ मुठभेड़ के बाद ये दावा किया गया था। हालाँकि, ये अपने-आप में इस किस्म का पहला दावा था। सुरक्षा बलों ने इसे नकार दिया था।

इससे पहले जम्मू-कश्मीर में सक्रिय ISIS आतंकियों में से कइयों के नाम खोरासन प्रांत में सक्रिय आतंकी संगठन के ब्रांच से जुड़ा था। इसकी स्थापना 2015 में की गई थी, ताकि ‘अफगानिस्तान और पाकिस्तान के इलाकों को कवर किया जा सके।’ हालाँकि, भारत में भी केरल व कर्नाटक में सक्रिय ISIS आतंकियों के बारे में तब पता चला था, जब NIA ने स्पेशल सब-इन्स्पेक्टर विल्सन की हत्या मामले में फाइल की गई चार्जशीट में इसका खुलासा किया था।

इसमें बताया गया था कि केरल और कर्नाटक में न सिर्फ़ ISIS के आतंकी सक्रिय हैं, बल्कि उनकी संख्या लगातार बढ़ती ही जा रही है। तमिलनाडु पुलिस ने ISIS के आतंकियों मोहम्मद हनीफ़ खान, इमरान खान और मोहम्मद जैद को जनवरी 2020 में मार गिराया था। इसके जवाब में खुद को जिहादी कहने वाले आतंकियों ने विल्सन की हत्या कर दी थी। इस मामले में ISIS (इराक व सीरिया) के आतंकी खाजा मोहिदीन का नाम सामने आया था।

जाँच में पता चला था कि उसने ही मई 2019 में अब्दुल शमीम और मोहम्मद तौफीक को आतंक की ‘तालीम’ दी थी। उसने इन दोनों को हथियार मुहैया कराया था। साथ ही हमला करने के लिए प्रशिक्षित किया था।

अफगानिस्तान और इराक सहित अन्य देशों में ISIS ने केरल के आतंकियों को लगाया हुआ है। सबसे ज्यादा कन्नूर के युवक इस आतंकी संगठन में शामिल हुए हैं। पिछले सप्ताह के आँकड़ों के अनुसार, केरल के कुल 98 लोगों ने ISIS की सदस्यता ली थी। इनमें से 38 मारे जा चुके हैं जबकि 60 आतंकी अब भी सक्रिय हैं। जून 2019 तक कन्नूर की 8 महिलाओं के आतंकी संगठन में शामिल होने की ख़बर आई थी।

कन्नूर के अलावा कासरगोड, मल्लपुरम, कोझिकोड, एर्नाकुलम और थिसुर के कई लोगों ने भाग कर आतंकी संगठन ज्वाइन किया था। ये सभी मिडिल-ईस्ट में जाकर ‘जिहाद’ कर रहे हैं। इन सभी को वहाँ विभिन्न इलाक़ों में तैनात किया गया है। कहा गया है कि वैश्विक आतंकी संगठन वहाँ के मुस्लिम युवकों को निशाना बनाता है और उन्हें आतंक के लिए प्रशिक्षित करता है।

छत्तीसगढ़: पंचायत भवन में बंद कर रखे गए 40 गायों की दम घुटने से मौत, सरपंच पर FIR

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के एक गाँव में 50 से अधिक गायों को पंचायत भवन में बंद कर रखा गया था। इनमें से 40 की दम घुटने के कारण मौत हो गई। बिलासपुर के जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) डॉ. शरण मित्तर ने कहा है कि गाँव के सरपंच के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है।

स्थिति का आकलन करने के लिए वरिष्ठ अधिकारी भी मौके पर पहुँचे हैं। जिला अधिकारी ने बिलासपुर के तखतपुर के मेदापार गाँव में पंचायत भवन से 20 मवेशियों को बचाया है। हालाँकि, स्थानीय लोगों का कहना है कि 40 नहीं बल्कि 50 से भी अधिक गायों की दम घुटने के कारण मौत हुई है।

रिपोर्ट के अनुसार, इस मुद्दे पर डॉ मित्तर ने कहा, “प्रारंभिक जानकारी से पता चला है कि सरपंच द्वारा पिछले कुछ दिनों से गाँव में 60 मवेशियों को क्लस्ट्रोफोबिक पंचायत भवन में रखा गया था। हमने उनमें से 20 को बचा लिया है, जबकि 40 की मौत दम घुटने के कारण हुई है।”

इस घटना के बाद पशु चिकित्सकों की एक टीम गाँव में पहुँच गई है और पंचायत भवन से सुरक्षित निकाले गए मवेशियों की जाँच कर रही है। इसके अलावा पुलिस भी मौके पर पहुँचकर गायों के शवों को पंचायत भवन से बाहर निकाल रही है।

अधिकारियों ने कहा, “सरपंच ने मालिकों की अनुमति के बिना मवेशियों को पंचायत भवन के अंदर डाल दिया। सरपंच के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है और उनके मालिक पशुपालकों को पर्याप्त मुआवजा मिलेगा।”

पुलिस अधीक्षक (एसपी), बिलासपुर प्रशांत अग्रवाल ने कहा कि गायों की मौत पर डीएम के निर्देश के अनुसार सरपंच के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई है और जाँच शुरू हो गई है।

जून में छत्तीसगढ़ सरकार ने राज्य के सभी गाँवों में ‘रोका-छेका अभियान’ शुरू किया था, जो पारंपरिक खेती के तरीकों को पुनर्जीवित करने और आवारा पशुओं द्वारा खुले में चराई से खरीफ की फसलों को बचाने के सम्बन्ध में था।

छतीसगढ़ की राज्य सरकार इस बात से अवगत है कि राज्य के कई गाँवों में आज तक भी गौशाला नहीं है और पशुपालकों को खरीफ की फसलों को बचाने के लिए चराई पर प्रतिबंध के कारण बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

इस मामले पर सरकार पशुपालकों के बचाव में आ गई है और सूरा गाँव योजना के तहत राज्य भर में 5,000 गौशालाओं का निर्माण कर रही है। सरकार ने सभी सरपंचों से अपील की है कि वे खुले में चराई के प्रतिबंध के दौरान गौशालाओं में ही मवेशियों के रहने की व्यवस्था करें।

लेकिन आवारा पशुओं और गायों को लेकर यह प्रबंध इतने अव्यवस्थित हैं कि पहले भी कई बार इन्हीं कारणों से राज्य में गायों के मरने की खबरें आ चुकी हैं और अभी तक भी स्थिति बदतर ही नजर आ रही हैं।

NIA ने गौतम नवलखा से ISI एजेंट फई से लिंक को लेकर की पूछताछ: पत्रकार बावेजा सहित कई ‘बुद्धिजीवियों’ ने इवेंट में लिया था हिस्सा

राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने अर्बन नक्सली गौतम नवलखा से सईद गुलाम नबी फई से लिंक को लेकर पूछताछ की। फई कुख्यात अपराधी और संयुक्त राज्य अमेरिका में आईएसआई का एजेंट है। बता दें कि गुलाम नबी फई कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ावा देने और कश्मीर की आजादी के लिए प्रोपेगेंडा फैलाने में सबसे आगे रहा है।

भीमा-कोरेगाँव हिंसा का आरोपित अर्बन नक्सली गौतम नवलखा फिलहाल राष्ट्रीय जाँच एजेंसी की हिरासत में है। गौतम नवलखा ने कश्मीर ने आतंकी गतिविधि को बढ़ावा देने के साथ ही भारत विरोधी भावनाओं का भी प्रसार किया। जिसके बाद NIA ने उसके खिलाफ पाकिस्तान के साथ संबंध होने की बात कही थी।

हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक यूएस अटॉर्नी नील एच मैकब्राइड के 2011 के हलफनामे का हवाला देते हुए, एनआईए ने गौतम नवलखा से पाकिस्तान की जासूसी एजेंसी आईएसआई के उच्च-स्तरीय अधिकारियों के साथ उसकी मुलाकात के बारे में पूछताछ की, जिसे खुद गुलाम नबी फई पोषित करता है।

अमेरिकी अटॉर्नी नील मैकब्राइड के अनुसार, गुलाम नबी फई पाकिस्तानी खुफिया विभाग के लिए एक अग्रिम मोर्च के रूप में काम करता है और कश्मीर पर ISI के प्रोपेगेंडा को बढ़ावा देता है। इससे पहले फई ने स्वीकार किया था कि उसे पाकिस्तान की सरकार की तरफ से फंडिंग मिलती है।

इसके अलावा एनआईए गौतम नवलखा के लगातार संयुक्त राज्य अमेरिका की यात्राओं की भी जाँच कर रहा है, जहाँ वह गुलाम नबी फई की कश्मीरी अमेरिकन परिषद (KAC) द्वारा आयोजित कश्मीर पर भारत विरोधी सेमिनार में भाग लेने के लिए जाया करता था।

फई के संगठन- ‘कश्मीरी अमेरिकन काउंसिल (KAC)’ को भारत के खिलाफ कश्मीर के बारे में संयुक्त राज्य अमेरिका की नीति को गलत तरीके से प्रभावित करने के लिए पाकिस्तानी जासूसी एजेंसी, ISI द्वारा वित्त पोषित किया जाता है।

एनआईए अधिकारियों के अनुसार, एजेंसी को यह भी पता चला है कि नवलखा गुलाम नबी फई के समर्थन में खड़ा था और उसकी गिरफ्तारी के बाद उसके समर्थन में एफबीआई को भी खत लिखा था।

हरिंदर बावेजा, वेद भसीन, जस्टिस सच्चर ने भी इवेंट में लिया था हिस्सा

बता दें कि सिर्फ गौतम नवलखा ने ही नहीं, न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) राजिंदर सच्चर, हिंदुस्तान टाइम्स के ‘पत्रकार’ हरिंदर बावेजा और कश्मीर टाइम्स के एडिटर इन चीफ वेद भसीन ने भी 2010 में कश्मीरी अमेरिकन परिषद के सम्मेलन में भाग लिया था

गुलाम नबी फई द्वारा आयोजित सम्मेलनों में भारत विरोध बहुत स्पष्ट था और भारत के पत्रकारों, बुद्धिजीवियों ने अक्सर भारत को कश्मीर में एक दमनकारी शक्ति के रूप में चित्रित किया है।

2010 में आयोजित इसके एक सम्मेलन में अपनाए गए एक प्रस्ताव में कहा गया था कि प्रतिभागियों ने “सर्वसम्मति से” कश्मीर में बिगड़ते मानव अधिकारों की स्थिति पर चिंता व्यक्त की और भारत सरकार को नागरिक क्षेत्रों से सेना को वापस लेने के लिए बाध्य किया। इसने पारदर्शी तरीके से निष्पक्ष हत्याओं की जाँच करने की भी माँग की थी। इस सम्मेलन में गौतम नवलखा, हरिंदर बावेजा सहित अन्य भारतीय बुद्धिजीवियों ने हिस्सा लिया था।

कौन है गुलाम नबी फई?

गुलाम नबी फई अमेरिका में रहने वाला पाकिस्तान समर्थित कश्मीरी अलगाववादी है जिसे FBI ने 2011 में गिरफ्तार किया था और फिर दो साल की जेल काटनी पड़ी थी।

फई को पाकिस्तानी खुफिया नेटवर्क इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका में कश्मीरी स्वतंत्रता की पैरवी करने के लिए दोषी ठहराया गया था।

यूएस डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस और एफबीआई के दस्तावेजों के मुताबिक, 2011 में गिरफ्तार किए गए फई को आईएसआई और पाकिस्तान सरकार से 1990 से 35 लाख डॉलर (26 करोड़ रुपए) मिल चुके थे। 7 दिसंबर 2011 को एक शपथपत्र वर्जिनिया कोर्ट में दाखिल करके मैकब्राइड ने कहा, ”पिछले 20 सालों से मिस्टर फई ने पाकिस्तानी इंटलिजेंस से लाखों डॉलर लिए और अमेरिकी सरकार से झूठ बोला।”

इसमें आगे कहा गया है कि पेड ऑपरेटिव के तौर पर वह अमेरिका के निर्वाचित अधिकारियों से भी मिला, हाई-प्रोफाइल कॉन्फ्रेंस को फंड किया और वॉशिंटन में नीति निर्माताओं के सामने कश्मीरी मुद्दे को उछाला। सभी आरोपों में दोषी पाए जाने के बाद फई को 2012 में दो साल की सजा सुनाई गई और बाहर आने के बाद 3 साल तक निगरानी की गई। 

गुलाम नबी फई को संयुक्त राज्य अमेरिका में भारत विरोधी कश्मीरी लॉबी का सार्वजनिक चेहरा माना जाता है। उसने कश्मीर के मुद्दे पर भारत सरकार के खिलाफ लॉबिंग करने के लिए हाई-प्रोफाइल इवेंट आयोजित किए हैं। कथित तौर पर, फई की कई गतिविधियों का पैसा आईएसआई से आया था। पाकिस्तानी सरकार उसे प्रति वर्ष $ 500,000 से $ 700,000 का भुगतान कर रही थी।

हिन्दू देवी-देवताओं को गाली देने वाले नदीम और इरफ़ान को जमानत नहीं, 30-40 की भीड़ के साथ किया था हमला

राजस्थान के जोधपुर स्थित मदेरणा में कुछ मुस्लिम युवकों द्वारा हिन्दू-देवताओं को गाली दिए जाने वाले मामले में कोर्ट ने आरोपितों को जमानत देने से इनकार कर दिया है। बता दें कि ये घटना 13 जुलाई की है, जब महामंदिर थाने में 30-40 मुस्लिम युवकों की भीड़ के खिलाफ हिन्दू भावनाओं को आहत करने का मामला दर्ज कराया गया था। आरोपितों में कई नामजद और अज्ञात भी शामिल हैं। गिरफ्तार आरोपितों को जमानत नहीं दी गई है।

पुलिस ने इस मामले में दो आरोपित नदीम खान और इरफ़ान खान को गिरफ्तार किया था। दोनों आरोपितों ने कोर्ट में जमानत पत्र पेश करते हुए आग्रह किया था कि वो दोनों निर्दोष हैं और ये मामला मामूली झगड़े से जुड़ा हुआ है। जोधपुर एडीजे कोर्ट के पीठासीन अधिकारी मनोज जोशी ने उनका पक्ष सुनने के बाद उनकी जमानत याचिका ख़ारिज कर दी और उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया।

परिवादी मुकेश कुमार द्वारा दर्ज कराए गए मामले के अनुसार, जोधपुर स्थित मदेरणा कॉलोनी के श्रीराम चौक पर हाथ में लाठी-डंडा लिए 30-40 मुस्लिम युवक आ धमके और वहाँ के बोर्ड को फाड़ डाला। इसके बाद वहाँ उपस्थित लोगों के साथ भी उन्होंने मारपीट की। साथ ही हिन्दू देवी-देवताओं को जम कर गालियाँ बकी। ये घटना मदेरणा सरकारी स्कूल के पास हुई। इसके बाद इलाक़े में तनाव पसर गया था।

शुरू में खबर आई थी कि मदेरणा के कालका माता मंदिर रोड और सरकारी स्कूल के पास दो समूहों में जम कर मारपीट हुई है। मुस्लिम समुदाय के लोगों पर आरोप लगा था कि वो बाइक से जाते हुए स्थानीय लोगों के साथ गाली-गलौज और मारपीट कर रहे थे। इससे आहात होकर कुछ हिन्दू युवक अपने मोहल्ले में गए और उन्होंने अपने साथियों को बुला कर लाया था। इसके बाद दोनों पक्षों में मारपीट हुई थी।

इस घटना में पत्थरबाजी की भी खबर आई थी। कई घरों के बाहर लगे बिजली के मीटर के साथ-साथ गाड़ियों को भी क्षतिग्रस्त कर दिया गया था। पुलिस ने मौके पर पहुँच कर सीसीटीवी फुटेज की जाँच की थी और कइयों को हिरासत में लिया था। थानाधिकारी ने पुलिस बल के साथ मौके पर पहुँच कर स्थिति को सम्भाला था और लोगों को आश्वासन दिया था कि दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

राहुल गाँधी ने श्रमिक ट्रेन पर फैलाई फर्जी खबर: कहा- सरकार ने मुनाफा कमाया, जानिए क्या है सच

फर्जी खबरों और भ्रामक दावों के माध्यम से कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी अपनी राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं। इसी कड़ी में शनिवार (जुलाई 25, 2020) को उन्होंने स्पेशल श्रमिक ट्रेनों को लेकर मोदी सरकार पर हमला किया। आरोप लगाया कि प्रवासी मजदूरों को उनके गृह राज्यों में वापस भेजने के नाम पर ट्रेनों का परिचालन कर सरकार भारी मुनाफा कमा रही है।

ट्विटर पर राहुल गाँधी ने एक भ्रामक शीर्षक के साथ एक खबर शेयर की। इसमें लिखा था, “रेलवे ने श्रमिक ट्रेनों से भी की जमकर कमाई!” राहुल गाँधी का मकसद यह जताना था कि मोदी सरकार श्रमिक ट्रेनों के माध्यम से कोरोना वायरस के दौरान मुनाफ़ा कमा रही है।

राहुल गाँधी द्वारा साझा की गई रिपोर्ट में दावा किया गया था कि रेलवे ने कोरोना वायरस लॉकडाउन के दौरान फँसे प्रवासी कामगारों को घर पहुँचाने में 428 करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त किया था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारतीय रेलवे ने 1 मई से लगभग 63 लाख प्रवासी कामगारों को घर पहुँचाया था, जिससे 428 करोड़ रुपए का राजस्व प्राप्त हुआ।

राहुल गाँधी ने ट्वीट किया, “बीमारी के बादल छाए हैं, लोग मुसीबत में हैं, बेनिफिट ले सकते हैं। आपदा को मुनाफे में बदलकर गरीब विरोधी सरकार लाभ उठा रही है।”

राजस्व (रेवेन्यू) और लाभ (प्रॉफिट) के बीच अंतर कर पाने में असमर्थ राहुल गाँधी ने यह कहकर जनता को गुमराह करने का काम किया कि मोदी सरकार ने आपदा के दौरान श्रमिक ट्रेन सेवाओं से लाभ कमाया और सरकार की नकारात्मक छवि पेश करने का प्रयास किया।

क्या रेलवे ने श्रमिक ट्रेनें चलाने से लाभ कमाया?

राहुल गाँधी के इस दावे के विपरीत कि भारतीय रेलवे ने विशेष श्रमिक ट्रेनें चलाकर बहुत लाभ कमाया, रेलवे ने श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलाने पर 2,142 करोड़ रुपए खर्च किए हैं और बदले में सिर्फ 429 करोड़ रुपए का राजस्व अर्जित किया।

राहुल गाँधी ने अपने ट्वीट में यह दावा करते हुए फर्जी खबरें फैलाई कि भारतीय रेलवे ने 429 रुपए का ‘लाभ’ कमाया, जबकि वो यह विभेद नहीं कर पाए कि यह ‘अर्जित राजस्व’ था, ना कि कुल लाभ।

आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार, देश के विभिन्न हिस्सों से फँसे प्रवासी मजदूरों को वापस लाने के लिए श्रमिक ट्रेनों को चलाने के बाद रेलवे को लगभग 1,700 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। एक आरटीआई के माध्यम से प्राप्त जानकारी के अनुसार, रेलवे ने 29 जून तक केवल 428 करोड़ रुपए कमाए हैं और 4,615 श्रमिक ट्रेनें चलाई हैं।

रेलवे ने अपने खर्च के बारे में जानकारी साझा की, जिससे पता चलता है कि उसने श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में प्रति यात्री 3,400 रुपए खर्च किए, जो कुल 63 लाख प्रवासी श्रमिकों पर 2,142 करोड़ रुपए हैं। रेलवे ने राज्यों से इसकी लागत का केवल 15% वसूल किया और बाकी 85% उसने खुद वहन किया गया।

गुजरात सरकार ने अकेले कोरोना वायरस लॉकडाउन के दौरान 1,027 श्रमिक विशेष ट्रेनों में 15 लाख से अधिक फँसे हुए प्रवासी श्रमिकों को उनके घर तक पहुँचाने के लिए रेलवे को 102 करोड़ रुपए का भुगतान किया है।

गुजरात के बाद, महाराष्ट्र ने 844 ट्रेनों में 12 लाख श्रमिकों को परिवहन के लिए रेलवे को 85 करोड़ रुपए का भुगतान किया। देश के पश्चिमी राज्यों की ही तर्ज पर, तमिलनाडु ने 271 ट्रेनों में अपने गृह राज्यों में लगभग 4 लाख प्रवासी श्रमिकों को घर ले जाने के लिए 34 करोड़ रुपए का भुगतान किया।

हालाँकि, राहुल गाँधी मोदी सरकार पर निशाना साधने की जल्दी में, ‘राजस्व’ और ‘लाभ’ के बीच अंतर करने में विफल रहे हैं, और इस पर अपनी जानकारी दुरुस्त करने के बजाए उन्होंने श्रमिक ट्रेनों के बारे में जनता को गलत जानकारी देने की कोशिश की।

ऐसा असफल प्रयास कर राहुल गाँधी ने सेल्फ गोल करते हुए सिर्फ और सिर्फ अपने निजी और अपनी पार्टी की कुछ ‘उपलब्धियों’ में एक और कारनामा जोड़ने का काम किया है।

नेपाल ने सीमा पर फिर की फा​यरिंग, महिला और उसके बच्चे को बंधक बनाकर पीटा

बिहार में सीमा से सटे इलाके में नेपाल की ओर से फिर फायरिंग की घटना हुई है। पूर्वी चंपारण में घोड़ासहन थाना क्षेत्र के खरसलावा में एक महिला और उसके बच्चे को नेपाली पुलिस ने बंधक बनाकर मारपीट की। इस घटना पर विवाद होने के बाद फायरिंग भी की।

दैनिक जागरण में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार पीड़ित महिला अपने बच्चे के साथ सीमा नज़दीक घास काटने गई थी। नेपाल पुलिस ने उसे रोकने का प्रयास किया। महिला ने उनसे भारतीय सीमा में होने की बात कही। इसके बाद नेपाल पुलिस ने दोनों को बंधक बना लिया।

घटना की जानकारी मिलने के मौके पर ग्रामीण जुटने लगे। नेपाल पुलिस से उनका विवाद हो गया। इसके बाद नेपाली नागरिक भी मौके पर जमा हो गए। इसी बीच नेपाल की पुलिस ने हवाई फ़ायरिंग कर दी। 

घटना की सूचना मिलने पर पुलिस और सीमा सुरक्षा बल के कई अधिकारी मौके पर पहुँचे। फ़िलहाल अधिकारियों ने महिला को नेपाल पुलिस से मुक्त करा दिया है। लेकिन घटना के बाद दोनों देशों के सुरक्षाकर्मी सीमा पर चौकन्ने हो गए हैं। घटना पर पूर्वी चंपारण के पुलिस अधीक्षक नवीनचंद्र झा ने भी जानकारी दी है। उन्होंने बताया कि यह घटना शुक्रवार की है। 

फिलहाल माँ और उसके बच्चे को मुक्त कराया जा चुका है। इसके अलावा उन्होंने नेपाल पुलिस की तरफ से हुई फ़ायरिंग को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। तनाव बढ़ता देखने के बाद सिकरहना के डीएसपी शिवेंद्र कुमार को भी मौके पर भेज दिया गया है। अधिकारियों का कहना है घटना पर विस्तृत रिपोर्ट मिलने के बाद आगे की कार्रवाई होगी।       

नेपाल की तरफ सीमा पर इस तरह की घटना पहली बार नहीं हुई है। इसके पहले बिहार के किशनगंज में नेपाल पुलिस ने तीन भारतीय युवकों पर गोलीबारी की थी। 25 साल के जितेंद्र कुमार सिंह और उनके दो साथी अंकित कुमार सिंह और गुलशन कुमार सिंह शनिवार (जुलाई 18, 2020) की रात लगभग साढ़े सात बजे, अपने मवेशियों को ढूँढने के लिए भारत-नेपाल सीमा पर माफी टोला के पास गाँव के खेत में गए थे। सीमा पर तैनात नेपाल पुलिस ने इन युवकों पर अचानक फायरिंग की थी। इसमें एक युवक को कंधे में गोली लगी थी।  

इसके पहले सीतामढ़ी जिले से सटे नेपाल सीमा पर गोलीबारी में एक की मौत हुई थी और तीन अन्य जख्मी हुए थे। घटना शुक्रवार (12 जून 2020) की थी। इसमें नेपाली सुरक्षा बलों ने 15 राउंड फायरिंग की थी।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सोनबरसा थाना क्षेत्र के पिपरा परसाइन पंचायत अंतर्गत लालबदी स्थित जानकी नगर गाँव में कुछ मजदूर खेत में काम कर रहे थे कि अचानक नेपाली सुरक्षा बलों ने फायरिंग कर दी। इसमें नागेश्वर राय के 25 वर्षीय पुत्र डिकेश कुमार की मौत हो गई थी।

‘मजहब में मत घुसो… बेगैरत इन्सान’: बकरीद पर बकरा काटने से मना किया तो KRK पर भड़के इस्लामवादी

बकरीद पर बकरा काटने या ना काटने की बहस में अब एक और नाम जुड़ गया है। यह नाम है बॉलीवुड कलाकार और फिल्म समीक्षक कमाल राशिद खान उर्फ केआरके (KRK) का। KRK ने ट्वीट कर लोगों को बकरीद पर कुर्बानी न देने की सलाह दी है, जिसके कारण उन्हें ट्रोल किया जा रहा है।

KRK ने 24 जुलाई 2020 को अपने ट्वीट में लिखा, “मैं सभी लोगों से निवेदन करता हूँ कि इस ईद-अल-अधा पर बकरा खरीदकर उसे मारे नहीं, बकरा मारने की जगह हम दान भी कर सकते हैं।”

सोशल मीडिया पर खुलकर अपनी बात रखने के लिए जाने जाने वाले KRK का यह ट्वीट कुछ लोगों को पसंद आया है, तो कुछ इससे नाराज भी हैं।

एक मुस्लिम युवक ने KRK के ट्वीट पर आपत्ति जताते हुए लिखा है कि हम मुस्लिम इसे ‘मारना’ नहीं बल्कि ‘कुर्बानी’ कहते हैं, अगली बार लिखने से पहले सोचना।

वहीं, कुछ लोगों ने ईद पर मारे जाने वाले बकरे के बारे में कुरान का जिक्र करते हुए कहा है कि कुर्बान किए हुए बकरे को अपने साथियों और भूखे लोगों में बाँटने के निर्देश दिए रहते हैं, इसलिए यह बकरा मारा जाता है।

KRK के ट्वीट के जवाब में आक्रोशित उज्मा फरहीन ने लिखा है, “ज्यादा मजहब की चीजों में मत घुसा करो अंकल। खुद नहीं करना तो दूसरों को मत दिखाओ। जिस चीज का अल्लाह ने हुकुम दिया, नबी ने किया, उसको मना करने वाले आप होते कौन हैं बेगैरत इन्सान?”

गौरतलब है कि सोशल मीडिया पर जानवरों के अधिकारों की वकालत करने का भ्रामक दावा करने वाली संस्था PETA-इंडिया ने हाल ही में रक्षाबंधन पर लोगों से गाय के चमड़े की राखी इस्तेमाल ना करने की बात कही थी।

PETA-इंडिया का जब इस झूठे दावे को लेकर विरोध किया गया तो उन्होंने इसके लिए माफ़ी भी माँगी। यहीं से कुछ लोगों ने माँग की कि PETA को मुस्लिमों द्वारा ईद पर काटी जाने वाली बकरी पर भी अपने विचार रखने चाहिए और मुस्लिमों से अपील करनी चाहिए कि वो बकरा ना काटें। इसके बाद ही मशहूर फिल्म अभिनेता KRK ने यह ट्वीट किया है।

बॉलीवुड किसी की बपौती नहीं, कंगना रनौत की सफलता से जलते हैं सब: नेपोटिज्म पर जारी बहस के बीच शत्रुघ्न सिन्हा

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद बॉलीवुड में नेपोटिज्म पर जारी बहस के बीच शत्रुघ्न सिन्हा ने कंगना रनौत का समर्थन किया है। उन्होंने कहा है कि कंगना से बॉलीवुड में बहुत से लोग जलते हैं। उन्हें लगता है कि बिना किसी का एहसान लिए कंगना इतनी सफल कैसे हुई।

पूर्व सांसद व अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा ने कंगना को ‘महिलाओं का धर्मेन्द्र’ भी बताया है। उन्होंने कहा कि वे हमेशा कंगना का साथ देते रहे हैं और आने वाले समय में भी ऐसा ही करेंगे। उन्हें ऐसा महसूस होता है कि जितने भी लोग कंगना के खिलाफ़ बोलते हैं वह उससे इर्ष्या की भावना रखते हैं। 

उन्होंने कहा, “मैंने देखा है जितने भी लोग कंगना का विरोध करते हैं, कहीं न कहीं उन्हें इस बात से द्वेष है कि आखिर उनके एहसान और मर्ज़ी के बिना कंगना ने इतना कुछ हासिल कैसे किया है। बॉलीवुड के किसी भी गुट का हिस्सा न बनने के बावजूद कंगना ने इतना बड़ा पायदान कैसे हासिल किया। कुल मिला कंगना का विरोध करने वाले उसकी बहादुरी और सफलता से परेशान हो चुके हैं और जलते हैं।”

इसके अलावा शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा फ़िल्मी दुनिया में ऐसे तमाम कलाकार हैं जो छोटे शहरों से आते हैं। उनका सपना होता है कि मुंबई में अपना नाम बनाएँ, कुछ बड़ा हासिल करें। इस सूची में हर बड़ा नाम आता है, अमिताभ बच्चन और धर्मेन्द्र जैसे कलाकार भी छोटे शहरों से आते हैं। इनमें से कोई भी बहुत बड़े शहर से नहीं आया है। 

फिर कंगना का ज़िक्र करते हुए शत्रुघ्न सिन्हा ने कहा, वह खुद उत्तर भारत के एक सामान्य शहर से आती हैं। उनके मुताबिक़ कंगना ने अपने जीवन में बहुत परेशानियों का सामना किया है। इतना कुछ झेलने और देखने के बाद वह इस पायदान पर पहुँची हैं। फिलहाल वह जो कुछ भी कर रही हैं, बहुत अच्छा कर रही हों चाहे वह फ़िल्मी दुनिया हो या असल दुनिया। यही वजह है कि कंगना बॉलीवुड में ‘महिलाओं की धर्मेन्द्र’ हैं।  

शत्रुघ्न सिन्हा ने करण जौहर के शो कॉफी विद करण पर तंज कसते हुए कहा कि ऐसे शो विवाद का कारण बनते हैं। साथ ही कहा कि इंडस्ट्री किसी की बपौती नहीं है।

हाल ही में कंगना ने रिपब्लिक टीवी में साक्षात्कार के दौरान बॉलीवुड के हालात पर खुल कर बात की थी। उन्होंने जावेद अख्तर, महेश भट्ट, आदित्य चोपड़ा, करन जौहर समेत कई मशहूर बॉलीवुड हस्तियों पर गंभीर आरोप लगाए थे।

महेश भट्ट पर सवाल करते हुए कंगना ने कहा, “वह (महेश भट्ट) क्यों सुशांत की काउंसलिंग कर रहे थे? किसने उन्हें ऐसे बात करने का अधिकार दिया, तुम्हारा अंत नज़दीक है। अगर उन्हें पता था कि सुशांत सिंह अच्छा महसूस नहीं कर रहा है तो उन्होंने इस बारे में सुशांत के पिता को क्यों नहीं बताया? वह रिया और सुशांत के बीच क्या कर रहे थे? सभी जानना चाहते हैं। मुंबई पुलिस महेश भट्ट से सवाल क्यों नहीं कर रही है?”

कंगना ने बताया कि उन्हें सलमान खान की फिल्म ‘सुल्तान’ ठुकराने पर आदित्य चोपड़ा ने धमकी दी थी। कंगना ने कहा, “मैंने जैसे ही सलमान खान की सुल्तान के लिए ना कहा, आदित्य ने कहा इसके बाद वह कभी मेरे साथ काम नहीं करेंगे।”

इसके अलावा साक्षात्कार के दौरान कंगना ने एक और अहम बात कही थी। उन्होंने बताया था कि मुंबई पुलिस ने उन्हें समन भेजा। उन्होंने कहा, “मैंने उन्हें बताया कि मैं मनाली में हूँ। वह किसी को भेज कर मेरा बयान दर्ज करा सकते हैं लेकिन इसके बाद मुझसे किसी ने संपर्क नहीं किया। मैं खुद स्पष्ट करना चाहती हूँ अगर मैंने कुछ सार्वजनिक रूप से कहा है और मैं इसे साबित नहीं कर सकी तो अपना पद्मश्री लौटा दूँगी।”