बाजार में कोरोना वायरस संक्रमण की दवा उपलब्ध हो गई है। ग्लेनमार्क फार्मास्युटिकल्स (Glenmark Pharmaceuticals) ने ये कारनामा किया है। हालाँकि, ये दवा उन्हीं लोगों पर काम करेगी, जो इस संक्रमण से मामूली रूप से पीड़ित हैं या फिर जो कोरोना वायरस संक्रमण के शुरुआती स्टेज में हैं। इस एंटीवायरल दवा का नाम फेविपिराविर है, जिसे फैबिफ्लू नामक ब्रांड नेम से बाजार में उतारा गया है।
मुंबई की कम्पनी ने शनिवार (जून 20, 2020) को इस बारे में जानकारी देते हुए बताया कि भारतीय औषधि महानियंत्रक (DCGI) द्वारा इस दवा के उत्पादन और मार्केटिंग के लिए पहले ही अनुमति दी जा चुकी है। फैबिफ्लू को कोविड-19 के संक्रमण के इलाज के लिए फेविपिराविर नामक ड्रग या दवा बताया गया है, जिसका उत्पादन कम्पनी कर रही है। ग्लेमार्क फार्मास्युटिकल्स के सीएमडी (CMD) ग्लेन सल्दान्हा ने इसकी पुष्टि की है।
सल्दान्हा ने ध्यान दिलाया कि ये मंजूरी ऐसे समय में मिली है जब भारत में कोरोना वायरस के संक्रमितों की संख्या पहले के मुकाबले काफ़ी ज्यादा तेज़ी से बढ़ रही है। अब तक के आँकड़ों के अनुसार, भारत में कोरोना संक्रमितों की संख्या 3,96,874 हो गई है, जिनमें से 1,69,253 सक्रिय मामले हैं और 2,14,599 संक्रमित ठीक हो चुके हैं। हालाँकि, 12,972 लोगों की मौत चिंता का विषय है, जिसे लेकर केंद्र सरकार लगातार राज्यों से चर्चा कर रही है। सल्दान्हा ने कहा:
“कोरोना वायरस के लगातार बढ़ते मामलों के कारण हमारी हेल्थ सर्विस सिस्टम काफी दबाव में है। मैं आशा करता हूँ कि फैबिफ्लू जैसे प्रभावी इलाज की उपलब्धता से इस दबाव को बहुत हद तक कम करने में मदद मिलेगी। क्लिनिकल परीक्षणों में फैबिफ्लू द्वारा कोरोना वायरस के हल्के संक्रमण से पीड़ित मरीजों के इलाज के बाद काफी अच्छे परिणाम मिले हैं। यह इंजेक्शन नहीं बल्कि खाई जाने वाली दवा है जो इलाज का एक सुविधाजनक रास्ता है।”
Glenmark Pharmaceuticals on Saturday said it has launched antiviral drug Favipiravir, under the brand name FabiFlu, for the treatment of patients with mild to moderate COVID-19. pic.twitter.com/mQkazeGimj
उन्होंने भरोसा दिलाया कि उनकी कंपनी सरकार और चिकित्सा समुदाय के साथ मिलकर काम करेगी ताकि देशभर में मरीजों को यह दवा आसानी से उपलब्ध कराई जा सके। हालाँकि, बिना डॉक्टर की सलाह के इस दवा को नहीं ख़रीदा जा सकेगा। इसकी क़ीमत 103 रुपए प्रति टेबलेट रखी गई है। पहले दिन इसकी 1800 मिलीग्राम की दो खुराक लेनी होगी। उसके बाद अगले 14 दिनों तक 800 मिलीग्राम की दो खुराक लेनी पड़ेगी।
कम्पनी ने बताया है कि कोरोना वायरस के मामूली संक्रमण से पीड़ित ऐसे मरीज जो डाइबिटिज या दिल की बीमारी से पीड़ित हैं, वो भी इस दवा को ले सकते हैं। अकेले शनिवार को देश में कोरोना वायरस के एक दिन में रिकॉर्ड 14,516 मामले सामने आए हैं। ऐसे में उम्मीद की जा रही है कि इस दवा के बाजार में सक्रिय रूप से उपलब्ध कराए जाने के बाद से रिकवरी रेट में वृद्धि होगी, जिससे राहत मिलेगी।
इससे पहले पतंजलि आयुर्वेद के प्रबंध निदेशक आचार्य बालकृष्ण ने बताया था कि उनके द्वारा बनाई गई कोरोना की विशेष दवा का प्रयोग हर आयु वर्ग के और हर एक स्टेज के मरीजों पर किया जा चुका है, जिनमें से लगभग सभी रोगियों में 7-8 दिन में कोरोना नेगेटिव पाया गया और कुछ ही रोगियों को ठीक होने में 12-14 दिन लगे। बता दें कि वर्ष 2017 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हरिद्वार में ‘पतंजलि अनुसंधान संस्थान’ का उद्घाटन किया था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत-चीन सीमा विवाद पर सर्वदलीय बैठक बुला कर सभी पार्टियों की बातें सुनी और उसके बाद देश को आश्वस्त किया कि भारत की एक इंच ज़मीन पर भी चीन ने घुसपैठ नहीं किया है। इसके बाद से ही कॉन्ग्रेस सहित कई दलों के नेताओं और लिबरल गिरोह के पत्रकारों ने आरोप लगाया था कि पीएम मोदी अपनी ही सरकार के स्टैंड को काट रहे हैं और सेना व सरकार में सामंजस्य नहीं है।
अब प्रधानमंत्री कार्यालय ने इन चर्चाओं पर विराम लगाते हुए स्पष्टीकरण जारी किया है और दुष्प्रचार फैलाने वालों को मुँहतोड़ जवाब दिया है। स्पष्टीकरण के अनुसार, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ़ कर दिया है कि ‘लाइन ऑफ एक्चुअल कण्ट्रोल (LAC)’ के साथ छेड़छाड़ करने की किसी भी प्रकार की कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। बकौल पीएम मोदी, पहले इस तरह की छेड़छाड़ पर सरकारें इसे नज़रअंदाज़ कर देती थीं लेकिन अब सेना के जवाब ऐसा करने वालों को रोकते-टोकते हैं।
सभी पार्टियों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरफ से सूचित किया गया कि इस बार चीन ने सीमा पर एक बड़े सैन्य बल के साथ अपने इरादों को अंजाम देने आए थे लेकिन भारतीय सेना ने उसके अनुरूप ही उचित जवाब दिया। जहाँ तक 15 जून को गलवान में हुई हिंसा की बात है, वो चीनियों द्वारा LAC के पास कंस्ट्रक्शन करने से पैदा हुआ। रोकने के बावजूद वो अपने मंसूबों को आगे बढ़ाते रहे, जिसके बाद संघर्ष हुआ। पीएमओ के अनुसार:
“प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सर्वदलीय बैठक को सम्बोधित करते हुए जो बातें कही गईं, वो गलवान में 15 जून को हुई हिंसा के सम्बन्ध में थीं। प्रधानमंत्री ने वीरगति को प्राप्त उन 20 भारतीय सेना के जवानों को श्रद्धांजलि देते हुए उनकी वीरता और बलिदान को प्रणाम किया, जिन्होंने चीनियों के मंसूबों को कामयाब नहीं होने दिया। 16 बिहार रेजिमेंट ने न सिर्फ़ चीनियों द्वारा सीमा पर कंस्ट्रक्शन करने के इरादे को नाकाम कर दिया बल्कि घुसपैठ की कोशिशों को भी विफल किया।”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यालय की तरफ से जारी किया गया स्पष्टीकरण
पीएम मोदी ने कहा था कि जिन्होंने भारतीय सरजमीं में घुसने की कोशिश की, उन्हें भारत माता के वीर सपूतों ने करारा जवाब दिया। साथ ही उन्होंने आश्वस्त किया कि हमारे जवान हमारी सीमाओं की रक्षा में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। पीएमओ ने कहा है कि भारतीय क्षेत्र की क्या परिभाषा है, ये आधिकारिक नक़्शे से तय होता है। पिछले 60 साल में किस तरह से देश की 43,000 वर्ग किलोमीटर जमीन चीन के कब्जे में चली गई, इस बारे में भी सभी दलों को बताया गया।
पीएमओ ने कहा कि ऐसे समय में जब हमारे जवान सीमा पर हमारी सुरक्षा करते हुए खड़े हैं, पीएम मोदी के बयान को लेकर इस तरह का दुष्प्रचार फैलाया जाना उनके आत्मविश्वास को डिगाने वाली दुर्भाग्यपूर्ण हरकत है। हालाँकि, कहा गया है कि सर्वदलीय बैठक में सरकार और सेना को सभी दलों का समर्थन मिला। सरकार LAC की स्थिति में किसी प्रकार का अपरिवर्तन नहीं होने देगी, इस सम्बन्ध में आश्वस्त किया गया।
फिल्म डायरेक्टर अभिनव कश्यप ने सलमान खान की चैरिटी करने करने वाली संस्था ‘बीइंग ह्यूमन’ (Being Human) को लेकर बड़े आरोप लगाए हैं। अभिनव ने दावा किया है कि सलमान का बीइंग ह्यूमन फाउंडेशन एक ‘मनी-लॉन्ड्रिंग‘ हब है। इसे सलमान खान की इमेज सुधारने के लिए बनाया गया था।
सलमान खान की फिल्म दबंग का अभिनव निर्देशन कर चुके हैं। पिछले दिनों सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद भी उन्होंने सलमान खान और उनके परिवार पर गंभीर आरोप लगाए थे।
अभिनव कश्यप ने शुक्रवार (जून 19, 2020) को सलमान खान के ‘बींइग ह्यूमन’ फाउंडेशन को लेकर फेसबुक पोस्ट में लिखा, “जनाब सलीम खान का सबसे बड़ा आइडिया है बींइग ह्यूमन। बींइग ह्यूमन की चैरिटी महज एक दिखावा है। दबंग की शूटिंग के दौरान मेरी आँखों के सामने पाँच साइकिल बँटती थी, अगले दिन अखबारों में छपता था कि दानवीर सलमान खान ने 500 साइकिलें गरीबों में बाँटीं।”
वे आगे लिखते हैं, “सारी कोशिश सलमान खान की गुंडे, मवाली वाली छवि सुधारने की थी ताकि इनके तमाम क्रिमिनल कोर्ट केस में मीडिया और जज इन पर थोड़ी रियायत बरतें। Being human आज 500 रुपए की जीन्स 5000 में बेचता है और पता नहीं किन-किन तरीकों से चैरिटी के नाम पर मनी लॉन्ड्रिंग चल रही है। सीधी-सादी जनता की आँखों में धूल झोंककर उनसे नोट बटोर रहे हैं ये धूर्त लोग। इनकी मंशा किसी को कुछ देने की नहीं, सिर्फ लेने की है। सरकार को चाहिए कि Being human की भी गहरी जाँच हो। मैं सरकार का पूरा सहयोग करूँगा।”
एक अन्य पोस्ट में अभिनव कश्यप लिखते हैं, “अजीब खानदान है। बाप से सवाल पूछो, तो औलादें तिलमिला जाती हैं और औलादों से पूछो तो बाप उनका बचाव करने लगते हैं। ये तो muslim brotherhood से भी आगे निकल गए, फिर अपने आप को secular बताते हैं। जिससे पूछा जाए वो जवाब क्यों नहीं देता? छिप कर क्यों बैठे हैं सलमान खान? ‘प्यार करो ना’ जैसे बेसुरे, बेहूदा गाने बना सकते हैं। मेरे सीधे सवालों का जवाब नहीं दे सकते। भला होता कि ये खानदान भी कह देता… BoycottSalimKhan#BoycottSalmanKhan बाकी अरबाज़ और सोहेल खान को तो उनकी औलाद भी नहीं पूछती।”
आगे उन्होंने एक और पोस्ट में लिखा, “मैने सलीम खान का नाम क्या ले लिया पूरा परिवार दर्द से कराहने लगा। अपने चमचों की फौज छोड़ दी है मुझे गाली देने के लिए। इनके फेसबुक लड़ाकों की भाषा से ही आपको ज्ञात हो जाएगा कि ये किन इस्लामी मुल्कों और किस समुदाय के लोग हैं… क्यों भाई? सलीम खान कोई बहुत बड़े रसूल, पैगम्बर या पीर हैं क्या? उनके काले कारनामे भी किसी से छिपे नहीं हैं। पूरा खानदान ही जिहादी मानसिकता से लैस है। क्या उन्होंने श्रीमती सुशीला चरक का धर्म परिवर्तन कर उन्हें सलमा खान नहीं बना दिया…? मैं मानता हूँ ये लव जिहाद है और हर मंच से बोलूँगा। आगे और भी बहुत लिखता रहूँगा… मेरा मुँह बंद करके दिखाए सलमान खान।”
गौरतलब है कि सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद अभिनव कश्यप ने यशराज फिल्म्स और सलमान खान के परिवार पर कई गंभीर आरोप लगाए थे। उन्होंने अपने पोस्ट में यह दावा किया कि सलमान खान और उनके परिवार ने अभिनव के फिल्मी करियर को बर्बाद करने की काफी कोशिश की।
उन्होंने सरकार से सुशांत सिंह की आत्महत्या मामले में विस्तृत जाँच की माँग की थी। उन्होंने ‘यशराज फिलम्स’ पर आरोप लगाते हुए कहा था कि उसकी टैलेंट मैनेजमेंट एजेंसी ने सुशांत को आत्महत्या करने के लिए मजबूर किया होगा, ये जाँच का विषय है। उन्होंने कहा कि ये लोग करियर बनाते नहीं हैं बल्कि करियर और ज़िंदगी, दोनों ही बिगाड़ते हैं। उल्लेखनीय है कि एक्ट्रेस जिया खान की माँ राबिया अमीन ने भी सलमान खान के खिलाफ आरोप लगाते हुए कहा था कि वो पुलिस को फोन कर पैसे की बात कर प्रेशर बनाते थे।
चीन के साथ हालिया तनाव के बीच देश में चीनी उत्पादों के बहिष्कार की मॉंग जोर पकड़ती जा रही है। लेकिन, पूर्व केंद्रीय वित्त मंत्री और वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता पी चिदंबरम ने इसका विरोध किया है। उनका कहना है चीन के सामान का बहिष्कार करने से चीन की अर्थव्यवस्था को नुकसान नहीं होगा।
So boycotting Chinese goods will not hurt the China’s economy. We should not bring issues like boycott when we are discussing very grave matters like the defence of India: Congress leader P Chidambaram (2/2) https://t.co/S1kVyP269J
शनिवार (20 जून, 2020) को चिदंबरम ने कहा कि हमें जितना संभव हो सके उतना आत्मनिर्भर बनना चाहिए, लेकिन हम बाकी दुनिया से अलग नहीं हो सकते। भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला जारी रखनी चाहिए और चीनी वस्तुओं का बहिष्कार नहीं करना चाहिए।
चिदंबरम ने कहा कि चीनी सामानों का बहिष्कार करने से चीन की अर्थव्यवस्था को नुकसान नहीं होगा। जब हम भारत की रक्षा जैसे बहुत गंभीर मामलों पर चर्चा कर रहे हैं, तो हमें बहिष्कार जैसे मुद्दों को बीच में नहीं लाना चाहिए।
उल्लेखनीय है कि नोएडा में करीब 20 हजार MSME ने निर्माण प्रक्रिया में चीनी उत्पादों और उपकरणों का बहिष्कार करने का निर्णय लिया है। इसी तरह कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (सीएआईटी) ने भी चीनी उत्पादों के बहिष्कार की अपील की है।
गौरतलब है कि पिछले दिनों गलवान में चीनी सैनिकों के धोखे से किए गए हमले में 20 सैनिक बलिदान हो गए थे। हालॉंकि भारतीय सैनिकों ने इसका मुॅंहतोड़ जवाब दिया था और चीन के 43 सैनिकों के मरने की खबर भी है। इस घटना को लेकर भी कई कॉन्ग्रेस नेता अनर्गल प्रलाप अलाप चुके हैं।
कारगिल से कॉन्ग्रेस पार्षद जाकिर हुसैन ने तो इस घटना का हवाला देकर सेना और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। इसका ऑडियो वायरल होने के बाद उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था।
उससे पहले कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद रह चुके हुसैन दलवई ने कहा था कि इस घटना में चीन की तरफ से कोई सैनिक नहीं मरा है। भारतीय सेना को अपमानित करते हुए उन्होंने कहा था कि उन्हें वहाँ लाठी लेकर क्यों भेजा गया, क्या वहाँ आरएसएस की कोई शाखा थी? महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस के नेता दलवई ने कहा कि भारत-चीन के बीच हुई झड़प में चीन की तरफ से कोई सैनिक नहीं मरा, सिर्फ हमारे जवान मारे गए हैं।
उन्होंने कहा, “हमने जवानों को लाठियाँ देकर क्यों बॉर्डर पर भेजा, क्या वहाँ RSS की शाखा थी? ऐसा है तो सैनिकों को क्यों आरएसएस के लोगों को ही बॉर्डर पर भेजो। वे सीमा पर पहरा देंगे।”
इतना ही नहीं राजनीतिक पार्टी डीएमके (DMK) के आधिकारिक ‘कलैगनार टीवी’ (Kalaignar TV) पर प्रसारित एक शो का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इसमें वरवणई सेंथिल (Varavanai Senthil) नाम के होस्ट को वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) के पर गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों पर हुए चीनी आक्रामण का बचाव करते देखा जा सकता है।
वीडियो में टीवी एंकर सेंथिल को चीन का समर्थन करते हुए करते हुए सुना जा सकता है कि भारतीयों के खिलाफ पीएलए सैनिकों द्वारा किया गया हमला मोदी सरकार की कुछ नीतियों की प्रतिक्रिया थी, विशेष रूप से जम्मू और कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त करना।
तिब्बत की निर्वासित सरकार के पीएम लोबसंग सांगेय ने कहा कि गलवान वैली पर चीन का अधिकार नहीं है। अगर चीनी सरकार ऐसा दावा कर रही है तो ये गलत है, क्योंकि गलवान नाम ही लद्दाख का दिया हुआ है, फिर ऐसे दावों का कोई मतलब नहीं रह जाता है।
पीएम लोबसंग सांगेय ने कहा कि अहिंसा भारत की परंपरा है और यहाँ इसका पालन होता है। वहीं, चीन अहिंसा की बातें तो करता है, लेकिन पालन नहीं करता। वो हिंसा का पालन करता है। इसका सबूत तिब्बत है। चीन ने हिंसा के दम पर ही तिब्बत पर कब्जा किया है।
इस विवाद से निपटने को लेकर सांगेय ने कहा कि तिब्बत को जोन ऑफ पीस बनाना होगा। दोनों सीमाएँ आर्मी फ्री होनी चाहिए, तभी शांति होगी। भारत और चीन के बीच तिब्बत है और जब तक तिब्बत का मुद्दा हल नहीं होता, तब तक तनाव की स्थिति बनी रहेगी।
उन्होंने कहा कि चीन एशिया में नंबर-1 बनना चाहता है। एशिया में उसका मुकाबला भारत, इंडोनेशिया और जापान से है, इसलिए वो लद्दाख, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, नेपाल और भूटान पर कब्जा करना चाहता है। पहले उसने डोकलाम में नापाक हरकत की, अब लद्दाख में अपनी गतिविधियाँ बढ़ा दी हैं। उधर, नेपाल से भी भारत के रिश्ते थोड़े बिगड़ गए हैं।
पीएम सांगेय ने कहा कि आर्थिक मोर्चो पर चीन को सबक सिखाया जा सकता है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक रुचि में से आपको चुनना है। राष्ट्रीय सुरक्षा सबसे ऊपर है। पीएम मोदी ने कुछ करार रद्द करके चीन को संदेश दे दिया है। सांगेय ने कहा कि भारत-चीन के बीच जो व्यापार चल रहा है, उससे चीन को डबल, ट्रिपल फायदा हो रहा है। ऐसे में व्यापार पर नियंत्रण से असर होना स्वाभाविक है।
गौरतलब है कि भारत और चीन की सेनाओं के बीच लद्दाख बॉर्डर पर गलवान घाटी के पास हिंसक झड़प में चीन के 43 सैनिकों के हताहत होने की बात मीडिया में सामने आई है। वहीं, भारतीय सेना ने स्पष्ट किया है कि इस झड़प में 20 भारतीय सैनिकों को वीरगति प्राप्त हुई।
चीन के साथ हालिया तनाव के मद्देनजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (जून 19, 2020) को सर्वदलीय बैठक की। इस दौरान उन्होंने सबको आश्वस्त किया कि हमारी एक इंच जमीन भी कोई नहीं ले सकता। हमारे किसी पोस्ट पर दूसरे देश का कब्जा नहीं है।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “चीन ने ना तो हमारी सीमा में घुसपैठ की है, ना ही किसी पोस्ट को कब्जे में लिया है। हमारे 20 जवान वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन जिन्होंने भारत माता को आँख दिखाई उन्हें सबक सिखा दिया।”
झारखंड के लोहरदगा से एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार राजद जिलाध्यक्ष शकील अख्तर के खिलाफ एक नाबालिग लड़की को अगवा करने का मामला दर्ज किया गया है। उस पर पीड़ित परिवार को धमकाने का भी आरोप है।
शकील को इसी साल जनवरी में लोहरदगा जिले की कमान मिली थी। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पीड़िता की माँ की शिकायत पर शकील पर भादवि धारा 366ए, 363 के तहत मामला दर्ज किया गया है।
घटना सेन्हा थाना क्षेत्र के झखरा गाँव की है। शकील अख्तर 16 जून को गाँव की एक नाबालिग को अगवा कर फरार हो गया। साथ ही उसने पीड़िता की के माँ- बाप को फ़ोन कर धमकी भी दी।
नाबालिग की मॉं के अनुसार 16 जून की सुबह वह और उनकी बेटी सोकर उठी। वह रसोई में काम करने लगी। कुछ देर बाद बेटी नहीं मिली। घर और आसपास खोजबीन करने पर भी उसका पता नहीं चला। उसी दिन शाम के करीब 5:30 बजे शकील अख्तर ने उनके मोबाइल पर फोन कर कहा कि ज्यादा चिंता एवं खोजबीन करने की जरूरत नहीं है। तुम्हारी बेटी मेरे पास है। ज्यादा हाथ-पॉंव मत मारो नहीं तो तुम्हारी बेटी और तुम लोगों को जान से मार देंगे।
इसके बाद उसने पुलिस को सूचना दी और अपहरण का मामला दर्ज कराया। उन्होंने शकील अख्तर पर गलत नीयत से अपनी बेटी के अपहरण का आरोप लगाया है। साथ ही उसके साथ अनहोनी की आशंका जताई है।
इस संबंध में राजद के प्रदेश अध्यक्ष अभय कुमार सिंह ने प्रतिक्रिया देने से इनकार किया है। उनका कहना है कि उन्हें मामले की जानकारी नहीं है। एफआईआर की कॉपी देखने के बाद ही वे कुछ कह पाएँगे।
गौरतलब है कि हाल ही में झारखंड के लातेहार से गैंगरेप का मामला सामने आया था। तीन युवतियों को रास्ते से अगवा करने उनके साथ दुष्कर्म किया गया था। पिछले महीने राज्य के साहिबगंज जिले में बगीचे में गई एक नाबालिग के साथ इदगार शेख, शाहनवाज शेख और एकरामुल शेख ने रेप किया था। मामला दो समुदाय से जुड़ा होने के कारण इलाके में तनाव पैदा हो गया था।
सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद तरह-तरह की कई ख़बरें आ रही हैं, जिससे इसके पीछे का सस्पेंस गहराता जा रहा है और उनके फैंस सच जानने के लिए बेचैन हो उठे हैं। मुंबई पुलिस उनसे जुड़े लोगों से पूछताछ कर रही है, जिससे कई राज़ निकल कर सामने आ रहे हैं। उनकी मनोचिकित्सक केसरी चावड़ा ने पुलिस को बताया कि वो ‘पवित्र रिश्ता’ सीरियल में उनकी अभिनेत्री रहीं अंकिता लोखंडे से ब्रेक-अप के बाद से ही बेचैन रहने लगे थे। वो रेहा से भी नाराज़ थे।
इसके बाद एक-एक कर सुशांत के कई रिश्ते नहीं चल पाए, जिससे उन्हें इस बात का एहसास होता रहा कि उन्हें किसी भी लड़की ने उस तरह से प्यार नहीं किया, जैसे अंकिता किया करती थी। वो रातों को सो नहीं पाते थे और अवसाद से ग्रस्त रहा करते थे। उनकी मनोचिकित्सक ने बताया कि वो रात भर अपनी दिमागी हालत के बारे में सोचा करते थे और अजीब-अजीब से ख्याल उनके दिमाग में आते थे।
सुशांत सिंह राजपूत के बारे में ये भी पता चला है कि वो ‘राब्ता’ में सह-अभिनेत्री रहीं कृति सेनन के साथ रिलेशनशिप में थे और एक फिल्म निर्देशक की बेटी के साथ भी उनका रिश्ता भी कुछ खास नहीं चला और अंत में उन्हें निराशा ही हाथ लगी। मनोचिकित्सक के बयान से तो इतना तक पता चला है कि वो अपनी वर्तमान गर्लफ्रेंड रेहा चक्रवर्ती के व्यवहार से भी ख़ुश नहीं थे। बता दें कि 2016 में अंकिता से ब्रेकअप से पहले सुशांत 6 साल तक साथ थे।
दोनों के बीच ब्रेअकप के बाद चर्चाओं पर विराम लगाते हुए सुशांत ने सार्वजनिक रूप से स्पष्टीकरण दिया था कि न तो अंकिता शराबी थी और न ही वो लड़कीबाज थे। उन्होंने कहा था कि लोग अलग होते हैं और इसी तरह वो लोग भी अलग रास्तों पर निकले। इधर उनके फैंस महेश भट्ट से जवाब माँग रहे हैं क्योंकि महेश भट्ट ने बयान दिया था कि उन्होंने ही सुशांत के व्यवहार को देखते हुए रेहा को सुशांत से अलग होने की सलाह दी थी।
महेश भट्ट और रेहा की कई तस्वीरें वायरल हुई हैं, जिनमें दोनों काफ़ी क़रीब दिख रहे हैं। इसके बाद से ही लोगों ने भट्ट से कई सवाल दागे हैं। कई लोगों द्वारा सोशल मीडिया पर दावा किया जा रहा है कि एक दिन पहले सुशांत सिंह राजपूत की इमारत के सारे सीसीटीवी कैमरे बंद हो गए थे। साथ ही रेहा पर आरोप लगे हैं कि उन्होंने सुशांत के साथ अपनी सारी फोटोज को इंस्टाग्राम से डिलीट कर लिया था।
हालाँकि, इस सम्बन्ध में अभी तक पुलिस की तरफ से कोई बयान नहीं आया है। लोग सोशल मीडिया पर ऐसी बातें कर रहे हैं। इधर सुशांत सिंह राजपूत के दोस्त और प्रोड्यूसर संदीप सिंह ने भी अंकिता लोखंडे को इंस्टाग्राम के माध्यम से सम्बोधित कर कहा है कि वो सुशांत से सच्चा प्यार करती थी, वो चाहती तो उन्हें रोक सकती थी। उन्होंने कहा कि हमलोग अगर प्रयास करते तो शायद उन्हें ऐसा करने से रोक सकते थे।
उन्होंने कहा कि अंकिता ने अलग होने के बाद भी सुशांत की ख़ुशी और सफलता की ही कामना की, उसका प्यार पवित्र था। उन्होंने खुलासा किया कि अंकिता ने अब तक अपने घर के नेमप्लेट से सुशांत का नाम नहीं हटाया है। उन्होंने अंकिता और सुशांत के साथ बिताए अपने समय को याद करते हुए कहा कि साथ खाना बनाने से लेकर गोवा होली खेलने तक, कई यादें आज उन्हें रुला रही हैं। उन्होंने कहा कि अंकिता और सुशांत को शादी करनी चाहिए थी।
From Gulshan Kumar to Sushant Singh Rajput, why do all the controversial Bollywood deaths end up having a Mahesh Bhatt angle? Why doesn’t he act when he always knows it all?
Days after 26/11, Mahesh peddled “RSS ki saazish” theory, later his son turned out to be Headley’s pal. pic.twitter.com/RzrF9jqnGq
संदीप ने लिखा कि अंकिता तुम सुशांत की गर्लफ्रेंड, पत्नी, दोस्त और माँ- सभी कुछ थी। उन्होंने कहा कि वो अंकिता की तरह शायद ही ऐसे किसी दोस्त को खो पाएँ क्योंकि उनसे ये नहीं हो पाएगा। संदीप ने लिखा कि सुशांत और अंकिता एक-दूसरे के लिए ही बने हुए थे। उन्होंने कहा कि वो पुराने दिन वापस चाहते थे। सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या के बाद कई सेलेब्रिटीज ने बॉलीवुड में नेपोटिज्म के खिलाफ आवाज उठाई है।
अभिनेत्री कंगना रनौत ने भी वीडियो के माध्यम से कई खुलासे किए थे। उन्होंने बताया था कि किस तरह सुशांत को प्रताड़ित किया गया था। निर्देशक अभिनव सिंह कश्यप ने बताया था कि कई मजबूर कलाकारों को एस्कॉर्ट सर्विस या फिर वेश्यावृत्ति के धंधों की ओर रुख करना पड़ता है। बकौल अभिनव सिंह कश्यप, बॉलीवुड में कई पुरुष एस्कॉर्ट्स भी हैं, जिनका इस्तेमाल अमीर और प्रभावशाली हस्तियों के अभिमान और यौन भूख मिटाने के लिए किया जाता है।
उत्तर-पूर्वी दिल्ली में इस साल फरवरी में हुए दंगों के सिलसिले में पुलिस पिछले कुछ दिनों से चार्जशीट दाखिल कर रही है। अलग-अलग मामलों में जब से चार्जशीट दाखिल करने का सिलसिला शुरू हुआ है, तभी से पुलिस और प्रशासन को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। एक विशेष वर्ग द्वारा आरोपितों को छात्र बताकर, प्रेगनेंसी का हवाला देकर एक अलग नैरेटिव गढ़ी जा रही है कि ‘मासूमों’ को फँसाया जा रहा है, क्योंकि वो ख़ास मजहब से हैं। जबकि सच्चाई इससे कोसों दूर है।
इस मुद्दे पर पूरी सच्चाई सामने लाने के लिए हमने ग्रुप ऑफ इंटेलेक्चुअल एंड एकेडेमिक्स (GIA) की कन्वीनर और सुप्रीम कोर्ट की वकील मोनिका अरोड़ा के साथ बातचीत की।
हमने उनसे दंगों को लेकर किस तरह की प्लानिंग की गई थी और किस तरह से इसे एक पायलट प्रोजेक्ट के रूप में पेश किया गया, इस पर विस्तार से प्रकाश डालने के लिए कहा। मोनिका अरोड़ा ने बताया कि दंगे तो 24 और 25 फरवरी को हुए थे, लेकिन इसकी योजना दिसंबर से ही बननी शुरू हो गई थी। ये एक सोची-समझी साजिश थी। उन्होंने बताया कि दिसंबर 2019 में जब CAA आया और कहा गया कि पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांगलादेश से प्रताड़ित होकर भारत आए हिंदुओं को नागरिकता दी जाएगी, तभी से साजिशें शुरू हो गई थी।
उन्होंने कहा कि इस एक्ट में समुदाय विशेष के खिलाफ कुछ भी नहीं कहा गया था, मगर फिर भी फर्जी जानकारी फैलाई गई और इसके तहत हेट स्पीच दिए जाने लगे। कॉन्ग्रेस ने दिल्ली की रैली में लोगों को सड़कों पर उतरने के लिए उकसाया। सोनिया गाँधी ने कहा, “ये आर-पार की लड़ाई है। सड़क पर आ जाओ, जेलें भर दो, ये आखिरी मौका है।” राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी ने भी यही बातें कहीं।
इसके बाद उमर खालिद ने लोगों से कहा कि अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आने पर वे सड़कों पर आएँ और इंटनेशनल मीडिया को दिखा दें कि वो भारत में प्रताड़ित हैं, सुरक्षित नहीं हैं।
फिर जामिया मिलिया इस्लामिया में AAP नेता अमानतुल्लाह खान की हेट स्पीच सामने आई। उन्होंने कहा, “ट्रिपल तलाक तो मोदी ने समाप्त कर दिए, दाढ़ी, टोपी और अजान भी समाप्त कर देंगे। सड़कों पर आ जाओ।” उसके बाद शरजील इमाम का देश को परमानेंटली काटने का बयान आता है और कॉन्ग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर तो पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को कातिल ही बोल देते हैं।
मोनिका अरोड़ा ने बताया कि बड़े-बड़े नेताओं द्वारा दिसंबर से फरवरी तक परोसे गए नफरत का परिणाम ये दंगा था। साथ ही उन्होंने शाहीनबाग और छोटे छोटे बच्चों द्वारा भड़काऊ नारेबाजी करने की तरफ भी इशारा किया।
ऑपइंडिया संपादक अजीत भारती के साथ मोनिका अरोड़ा की विस्तृत बातचीत
जब हमने मोनिका अरोड़ा से उनकी रिपोर्ट ‘धरने से दंगे तक का मॉडल’ के बारे में जानने की कोशिश की तो उन्होंने बताया कि ये मॉडल चार स्टेज में हुए। उन्होंने पहले स्टेज के बारे में बताया कि 11 दिसंबर को CAA पारित होने के बाद हर जगह हेट स्पीच दिए जाने लगे। यूनिवर्सिटी के बच्चे-शिक्षक बाहरी लोगों के साथ मिलकर पेट्रोल बम फेंकने लगे, आगजनी करने लगे। पुलिस के साथ मारपीट करने लगे और फिर सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट में जाकर कहते हैं कि हमें पुलिस मार रही है, बचा लो। तो सुप्रीम कोर्ट कहता है कि पहले हिंसा रोको, फिर कार्रवाई करेंगे।
फिर उन्होंने सेकेंड स्टेज के बारे में बताते हुए कहा कि इनका मॉडल था कि किसी मुख्य सड़क के एरिया को घेर लो। वह जगह ऐसी होनी चाहिए, जहाँ पर दोनों मजहब वाले बराबर संख्या में हों। वहाँ पर टेंट लगा दो। स्टेज पर माइक लगा दो। पीछे एक संविधान रख दो और साथ में एक तिरंगा। लेकिन इनका हाथ में तिरंगा और दिल में दंगा सबके सामने आ गया। उन्होंने बताया कि किस तरह से वहाँ पर मोदी विरोधी, शाह विरोधी, भारत विरोधी, हिंदू विरोधी भाषण दिए गए। माँ काली को बुर्का पहनाया गया, स्वास्तिक को झाड़ू से तोड़ते हुए दिखाया गया। इससे उनका जिहादी विचारधारा साफ दिख रहा था।
उन्होंने कहा कि शाहीनबाग में PFI का पैसा आया। सुबह से शाम तक बिरयानी बाँटा गया। वो कहती हैं, “मेरे एक Law Intern ने मुझे बताया कि वो 8 घंटे तक वहाँ रहा, बिरयानी खाया और 500 रुपए मिले, वो लेकर चला आया।” प्रदर्शनकारियों ने ऐसा माहौल बनाया कि पुलिस उन पर लाठीचार्ज करे, ताकि नेशनल न्यूज बने, मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। पुलिस ने संयम बरता।
फिर इनका तीसरा स्टेज शुरू होता है। इन लोगों ने मार्केट में, एरिया में जुलूस में आना शुरू किया। हजारों की संख्या में महिलाएँ बुर्के में शिव मंदिर के सामने ‘आजादी’ के नारे लगाए। पुलिस भी जख्मी हुए। मगर महिला होने की वजह से पुलिस इनका कुछ कर भी नहीं सकते। महिलाओं और बच्चों को आगे करके पुरुष अपनी साजिश को अंजाम दे रहे थे।
उन्होंने बताया कि चौथे चरण के तहत 22 फरवरी 2020 को सफूरा रात के 1:30 बजे समुदाय विशेष की महिलाओं को लेकर आई और जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के गेट नंबर 4 को ब्लॉक कर दिया। इसके बाद सुबह 6 बजे जाफराबाद सड़क को जाम कर दिया। इनकी दूसरी टीम ने चाँदबाग में सड़क को जाम किया। सफूरा, नताशा, देवांगना आदि ने महिलाओं को फ्रंटलाइन में ढाल की तरह इस्तेमाल किया। ताकि पुलिस महिलाओं पर हमला नहीं करेगी और पीछे वे अपने मंसूबों को अंजाम देने में कामयाब हो जाएँगे।
24 फरवरी को यही महिलाएँ मौजपुर चौक पर हजारों की संख्या में बैठी हुई थी। तभी महिलाओं ने डीसीपी अमित शर्मा को बुलाया कि आइए बात करते हैं। उन्होंने सोचा कि महिलाएँ हैं और बातचीत से मसला हल हो जाएगा। मगर जैसे ही वो वहाँ पर पहुँचे महिलाओं ने बुर्के में से चाकू, छूरी, रॉड, डंडों आदि से उन पर हमला कर दिया। एक ने उनका हेलमेट निकाल दिया। बाकी ने उनके सिर पर मारा। जिहादी भीड़ उन पर टूट पड़ी। जब अन्य पुलिस वालों ने किसी तरह से उन्हें छुड़ाकर पास वाले नर्सिंग होम में एडमिट करवाया तो जिहादी भीड़ ने उस हॉस्पिटल को ही जला दिया। इसके बाद उन्हें वहाँ से निकाल कर किसी दूसरे हॉस्पिटल के ICU में भर्ती कराया गया।
मोनिका अरोड़ा ने बताया कि AAP के निलंबित पार्षद ताहिर हुसैन ने किस तरह से प्लानिंग की थी और दंगे के एक दिन पहले खजूरी खास थाने से अपना पिस्टल रिलीज करवाया था। घर के सीसीटीवी कैमरा को बंद कर दिया था। इसके बाद उन्होंने शिव विहार में फैयाज के राजधानी स्कूल से हिंदू के स्कूल को निशाना बनाया गया। स्कूलों को लूटा गया, फिर उसे जला दिया गया। आईबी के अंकित शर्मा की नृशंस हत्या की गई, दिलबर नेगी को काटकर जला दिया गया। विवेक के सिर में ड्रिल कर दिया गया।
उन्होंने हिंसा की क्रोनोलॉजी समझाते हुए कहा कि 19 दिसंबर को सीलमपुर के 7 मेट्रो स्टेशन को बंद कर दिया जाता है। 40,000 जिहादियों की भीड़ इकट्ठा होती है। 13 जनवरी को 4000 की संख्या में जुलूस मालवीय नगर की तरफ आजादी के नारे लगाती निकलती है। 15 जनवरी को हर जगह धरने शुरू हो जाते हैं। 22 फरवरी को महिलाओं को बुलाकर जाम कर दिया जाता है। फिर 23 फरवरी को 3:30 बजे स्थानीय लोग इकट्ठा होते हैं और प्रदर्शनकारियों के हटने के लिए कहते हैं। बीजेपी नेता कपिल मिश्रा ने भी पुलिस से कहा तो उन्होंने कहा कि अभी ट्रंप हैं, दो दिन में हटा देंगे। जिसके बाद उन्होंने कहा कि हाँ, उसके बाद तो हम आपकी भी नहीं सुनेंगे।
इसके बाद इस बात को हवा दी जाने लगी कि कपिल मिश्रा ने दंगा भड़काया, मगर इससे पहले ही जगह-जगह पर भीड़ इकट्ठी हुई। दिसंबर में NIA को ISIS मॉड्यूल मिले। 23 फरवरी की शाम से ही पत्थरबाजी शुरू हो जाती है। 24 फरवरी की सुबह दुकानें जला दी जाती है। डीसीपी अमित शर्मा को अधमरा कर दिया जाता है। हेड कॉन्स्टेबल रतनलाल की हत्या कर दी जाती है।
मोनिका अरोड़ा ने सफूरा के प्रेगनेंट और माँ बनने की बात कहने वालों पर निशाना साधते हुए प्रीति गर्ग की याद दिलाई, जिन्होंने अपने 9 साल और 11 साल के बच्चों को बचाने के लिए छत के ऊपर से नीचे फेंक दिया था। पड़ोसी ने उसे पकड़ लिया, बच्चा बच गया। वो कहती हैं कि क्या वो माँ नहीं है, क्या वो बच्चे नहीं हैं?
इसके बाद उन्होंने व्हाट्सएप मैसेज की भी बात की, जिससे दंगे की साजिश रची गई थी और बताया गया था कि इस दौरान उन्हें क्या करना चाहिए। उन्होंने जय भीम-जय मीम का नारा लगाया। स्क्रिप्ट पहले से ही तैयार थी कि किसका कौन सा रोल होगा। इसके साथ ही उन्होंने दिल्ली पुलिस द्वारा दाखिल किए गए चार्जशीट पर भी बात की।
अंत में मोनिका अरोड़ा कहती हैं, “मुझे आशा नहीं विश्वास है धरने से दंगे तक का ये मॉडल आखिरी एक्सपेरिमेंट होगा। ऐसा कोई भी शाहीनबाग 2, कोई भी खिलाफत 2, कोई भी जिन्ना वाली आज़ादी के नारे नहीं लगा पाएगा और कोई भी यहाँ ऐसी साजिशें नहीं कर पाएगा। फिर किसी प्रीति गर्ग को पहली मंजिल से अपने बच्चों को नहीं फेंकना पड़ेगा। फिर किसी विनोद कश्यप को सिर पर पत्थर मार-मारकर खत्म नहीं किया जाएगा। हम कोशिश करेंगे कि ऐसा हिंदुस्तान हमारे सामने आए। ये हमारी भी कोशिश है और आपकी भी। कम से कम हम सच्चाई को सामने तो रखें। सच्चाई तो 100 पर्दे फाड़कर सामने आ जाती है।”
लद्दाख के गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प के बाद भारत अब स्थिति की गंभीरता को देखते हुए क्षेत्र में अपनी उपस्थिति को बढ़ा रहा है। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की एक ख़बर के अनुसार, भारत ने अपने फॉरवर्ड बेसेज पर फाइटर जेट्स और हैलीकॉप्टर्स को आगे बढ़ाया है, तैनाती में तेज़ी लाई है। ‘लाइन ऑफ एक्चुअल कण्ट्रोल’ की सीमा 3488 किलोमीटर लम्बी है, जहाँ विभिन्न बिंदुओं पर भारत ने सेना और अस्त्रों की तैनाती की है।
साथ ही बंगाल की खाड़ी वाले इलाक़े में भी नौसेना के वॉरशिप्स की तैनाती की गई है। फॉरवर्ड बेसेज पर चिनूक हैवी-लिफ्ट हैलीकॉप्टर्स और अपाची हैलीकॉप्टर्स की तैनाती की गई है। आगे होने वाले किसी भी हमले और हिंसा की स्थिति को रोकने के लिए जिन हैलिकॉप्टरों को तैनात किया गया है, उसके साथ सेना के कई जवान भी गए हैं। ऊँचे इलाक़ों में होवित्जर को तैनात किया गया है। वायुसेना पूरी तरह तैयार है।
बता दें कि अपाची हैलीकॉप्टर्स एयर टू ग्राउंड वार कर के टैंकों को तबाह करने की क्षमता रखते हैं। वो मिसाइल्स का प्रयोग करके ऐसा करने में सक्षम हैं। सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि भारत ने सीमा पर हर वो व्यवस्था की है, जिससे किसी भी प्रकार के छोटे-बड़े हमलों और तनाव भड़काने की साजिशों को नाकाम किया जा सके। चीन के साथ लगने वाली उत्तरी सीमा पर सुखोई-30MKI, मिग-29 और जगुआर फाइटर्स को एयरबेसेज पर तैनात किया गया है।
लेह, श्रीनगर, अवन्तिपुर, बरेली, चबुआ, हासीमारा और तेजपुर के एयरबेसेज को एक्टिवेट किया गया है। सीमा पर ताज़ा परिस्थिति को देखते हुए पेट्रोलिंग भी तेज़ कर दी गई है। लद्दाख और चंडीगढ़ के बीच एक एयर ब्रिज भी बनाया गया है। इसके लिए C-17 ग्लोबमास्टर III और AN-32 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट्स की मदद ली गई। C-130J की मदद से भी सैनिकों और अस्त्र-शस्त्रों को फॉरवर्ड बेसेज तक पहुँचाया गया। हालाँकि, अपनी तरफ चीन ने भी तैनाती में कोई कमी नहीं की है और पैंगोंग झील से लेकर तिब्बत के अन्य सीमावर्ती इलाक़ों तक हथियारों की तैनाती की है।
भारत और चीन के बीच ताज़ा विवाद पैंगोंग झील में भारतीय सीमा के अंदर घुसपैठ के बाद शुरू हुआ था। भारत ने LAC के पास चीन द्वारा भारी हथियारों की तैनाती और सेना की सक्रियता पर आपत्ति जताई थी। बाद में चीनी सैनिकों ने लाठी-डंडे, लोहे के रॉड्स और कीलों द्वारा धोखे से हमला कर के एक कर्नल सहित 20 भारतीय सैनिकों को मार डाला। चीन के भी 43 जवानों के मारे जाने की सूचना है, जिससे उसने सार्वजनिक नहीं किया है।
हाल ही सर्वदलीय बैठक के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सबको आश्वस्त किया कि हमारी एक इंच जमीन भी कोई नहीं ले सकता। हमारे किसी पोस्ट पर दूसरे देश का कब्जा नहीं है। उन्होंने कहा, “चीन ने ना तो हमारी सीमा में घुसपैठ की है, ना ही किसी पोस्ट को कब्जे में लिया है। हमारे 20 जवान वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन जिन्होंने भारत माता को आँख दिखाई उन्हें सबक सिखा दिया।”
जब-जब चीन के साथ लद्दाख सीमा क्षेत्र में सीमा विवाद का मुद्दा गरमाएगा, तब-तब इस क्षेत्र को ‘बंजर’ बताकर अपनी वैश्विक छवि के लिए चीन की नीतियों को हल्के में लेने की महान भूल करने के लिए जिम्मेदार भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का ‘योगदान’ भी याद किया जाता रहेगा।
चीन के साथ लद्दाख क्षेत्र में लम्बे समय से चल रहे सीमा विवाद के बाद भारतीय नेतृत्व और चीन के प्रति इसके नजरिए को लेकर कई प्रकार की बातें सामने आई हैं। लेकिन कश्मीर के साथ ही अक्साई चीन क्षेत्र को हमेशा के लिए विवादित विषय बना देने वाले जवाहरलाल नेहरू के नजरिए और उनकी नीतियों के बारे में भारतीय सेना और भारतीय वायुसेना के वो अधिकारी, जो इस युद्ध का हिस्सा थे, अक्सर नेहरू की कमजोरियों को उजागर करते आए हैं।
वर्ष 2012 में चीन के साथ युद्ध के पचास साल पूरे हो चुके थे। इस अवसर पूर्व वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एवाई टिपणीस ने चीन के हाथों पराजय के लिए जवाहरलाल नेहरू को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा था कि नेहरू ने अंतरराष्ट्रीय नेता बनने की अपनी महात्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए राष्ट्र के सुरक्षा हितों को त्याग दिया। टिपणीस 1960 में बतौर फाइटर पायलट नियुक्त हुए थे और वर्ष 1998 में वह वायुसेना प्रमुख बने।
इसके कुछ समय पहले ही भारतीय वायुसेना प्रमुख एनएके ब्राउन ने भी कहा था कि चीन के साथ उस समय युद्ध में वायुसेना की आक्रामक भूमिका होती तो शायद नतीजा ही कुछ और होता।
‘भारत और चीन: 1962 के युद्ध के पाँच दशक बाद’ सेमिनार में बोलते हुए पूर्व वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल टिपणिस ने कहा था कि उस युद्ध में भारत की अपमानजनक पराजय के लिए जवाहरलाल नेहरू की ग्लोबल लीडर बनने की महत्वाकांक्षा जिम्मेदार थी।
इस सम्मेलन में टिपणिस ने कहा था कि युद्ध के दौरान उनके समय में सेना प्रमुखों को नेहरू स्कूल के बच्चों की तरह बुरी तरह डाँट देते थे। उन्होंने खुलासा किया कि चीन के साथ लड़ाई में वायुसेना की भूमिका सिर्फ सेना की ट्रांसपोर्ट हेल्प तक सीमित थी। उसकी कोई आक्रामक भूमिका नहीं थी।
चीन को लेकर नेहरू का अंधसमर्पण
चीन को लेकर जवाहरलाल नेहरू के भीतर विचारधारा के स्तर पर अंधसमर्पण की स्थिति थी। नेहरू को तो वास्तव में अक्साई चीन में कभी दिलचस्पी भी नहीं थी। उन्होंने भरी संसद में इस क्षेत्र का वर्णन कुछ इस तरह किया था – “एक बंजर निर्जन क्षेत्र, जो 17,000 फ़ीट की ऊँचाई पर है और जहाँ घास का नामो-निशाँ तक नहीं है, ऐसा क्षेत्र जहाँ एक तिनका भी नहीं उगता..।”
यही नहीं, जवाहरलाल नेहरू ने यहाँ तक कह दिया था कि हमें तो यह भी पता नहीं कि इस क्षेत्र का कौनसा हिस्सा हमारा है और कौन सा उनका। जवाहरलाल नेहरू के इस कायराना बयानों की छाप संयुक्त राष्ट्र तक भी नजर आई। इसी बीच तिब्बत में चीन की सेना के प्रवेश को लेकर भी नेहरू के विचार उस सैनिक की तरह थे, जो बिना लड़ाई के ही कई युद्ध हार चुका। और उनके इसी कायराना रवैए की झलक चीन के साथ लड़े गए युद्ध में भी थी।
स्वतंत्र भारत की दूसरी लोकसभा में भारतीय जन संघ के सिर्फ़ चार सांसद थे, अटल बिहारी वाजपेयी उन चार सांसदों में से एक थे।
नेहरू का तिब्बत के पक्ष पर मौन और तिब्बत में चीनी आक्रमणकारियों की सेना के प्रवेश को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन के समर्थन की नीति का विरोध तब युवा सांसद अटल बिहारी वाजपेयी ने किया था। वाजपेयी ने अगस्त, 1959 में भारतीय संसद में तिब्बत की मदद के बजाए आक्रमणकारियों के साथ खड़े होने वाली तत्कालीन नेहरू सरकार को कोसते हुए कहा था कि संयुक्त राष्ट्र संघ में तिब्बतियों को उनके ही देश में अल्पसंख्यक बना देने वाले चीन को मान्यता दिलाने के लिए भारत एक हद से आगे जाकर उनके साथ खड़ा है।
कोको द्वीप – नेहरू की भूल का एक और नतीजा
जवाहरलाल नेहरू की रणनीतिक समझ की कमी और अंग्रेजों के साथ सख्ती से पेश आने की असमर्थता के कारण भारत ने अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के बाद दक्षिण एशिया के सबसे प्रमुख रणनीतिक द्वीपों में से एक – कोको द्वीप समूह को खो दिया।
कोको द्वीप समूह, जो कोलकाता के 1255 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में स्थित है, दक्षिण एशिया के सबसे महत्वपूर्ण द्वीपों में से एक है। कोको द्वीप, जो भूगर्भीय रूप से अराकान पर्वत या राखीन पर्वत का एक विस्तारित विभाजन है, बंगाल की खाड़ी में द्वीपों की एक श्रृंखला के रूप में लंबे भूभाग तक फैला हुआ है।
ये रणनीतिक द्वीप, अंडमान द्वीप के उत्तर में स्थित हैं। हालाँकि, कोको द्वीप अब म्यांमार का हिस्सा हैं, और इसका कारण इन द्वीपों के दावे को लेकर भारतीय नेतृत्व की असमर्थता और उदासीनता है।
1950 में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भारत का यह कोको द्वीप समूह बर्मा (म्यांमार) को गिफ्ट दे दिया। सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण यह द्वीप बाद में बर्मा द्वारा चीन को दे दिया गया, जहाँ से आज चीन भारत पर नजर रखता है।
काबू वैली
नेहरू की दूरदर्शिता का एक और उदाहरण काबू वैली भी है। मणिपुर में स्थित काबूवैली कभी भारत का हुआ करता था। 1954 में नेहरु ने इसे भी ‘मित्रता के तौर पर’ म्यांमार को दे दिया। काबूवैली के बारे में कहा जाता है कि अगर दुनिया में कश्मीर के बाद कोई जगह इतनी खूबसूरत है तो वह काबूवैली है। म्यांमार ने आज काबूवैली का कुछ हिस्सा चीन को दे रखा है जिसे कि चीन अपने सामरिक हितों के लिए इस्तेमाल कर रहा है।
संप्रभुता एकता और अखंडता : नेहरू बनाम 56 इंच
आज के समय में देश का वामपंथी मीडिया और सत्ता-विरोधी वर्ग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर 56 इंच जैसे तंज कसने का असफल प्रयास करता है। जबकि स्वतंत्र भारत के इतिहास में कई ऐसे अपमानजनक पन्ने मौजूद हैं जो नेहरू की हिमालयी भूलों से भरे पड़े हैं फिर भी मीडिया ने उन्हें कभी भी महामानव से कम साबित करने का प्रयास नहीं किया। जिन गोदी इतिहासकारों ने लौह महिला का अर्थ ‘इंदिरा’ बता दिया था, उनकी कलम ‘हिमालयी भूल’ का अर्थ ‘जवाहरलाल नेहरू’ लिखते वक्त लड़खड़ा गई थी।
भारत के जनमानस के मन में हिमालय को लेकर भावनात्मक लगाव का सम्मान रख पाने में तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने असमर्थता व्यक्त की थी, ना ही अपनी व्यक्तिगत छवि के सामने कभी उन्होंने इन विषयों को जरुरी माना। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत को शान्ति का उपासक तो बताया ही, साथ ही यह स्पष्ट संदेश भी दिया है कि भारत अपनी संप्रभुत्ता के साथ किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप होने पर मुँहतोड़ जवाब दे पाने में सक्षम है। यही नहीं, भारत ने अब अपने सामरिक समाधान के विकल्प बाहरी देशों में तलाशने की नीतियाँ भी त्याग दी हैं।
निःसंदेह चीन के साथ यह सीमा विवाद अभी भी अंतहीन है, लेकिन भारत के पास कम से कम एक ऐसा नेतृत्व तो मौजूद है, जो अपनी भौगोलिक सीमाओं को बंजर नहीं कहता, जो विचारधारा के प्रभुत्व के लिए आक्रमणकारी और वर्चस्ववादियों के सामने घुटने टेक दे और महज विचारधारा के लिए तिब्बत के बजाए चीन के साथ खड़ा हो जाए।
नेहरू ने तो मानो अपने आदर्श पश्चिमी देशों से भी कुछ नहीं सीखा। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जब सोवियत संघ मित्र राष्ट्रों के साथ खड़ा हुआ, तब उसने विचारधारा की परवाह नहीं की थी और वह पूँजीवादियों के साथ नजर आया। बदले में पूँजीवादियों ने भी नरसंहारक कम्युनिस्ट स्टालिन से निःसंकोच मित्रता कर ली थी।
लेकिन नेहरू की मित्रता शायद ही अपनी निजी छवि और गौरव के अलावा किसी अन्य चीज से रह सकी हो। यदि ऐसा न होता तो भारत आज भी अपने पहले प्रधानमंत्री की भूलों के लिए अपने सैनिकों का बलिदान नहीं दे रहा होता और कॉन्ग्रेस इन सैनिकों के बलिदान में अपने सत्ता में लौटने का मार्ग नहीं तलाश रही होती।