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‘जिसने भी मेरे पापा के साथ ऐसा किया, उसकी गर्दन हाथ में पकड़ कर ऐसे तोड़ूँगी कि…’ – अजय भारती की बेटी

जम्मू कश्मीर के अनंतनाग जिले में आतंकियों ने सोमवार (जून 8, 2020) को कॉन्ग्रेस के हिंदू सरपंच अजय पंडित (अजय भारती) की गोली मारकर हत्या कर दी। बता दें कि अजय पंडित वहाँ एकमात्र हिंदू सरपंच थे। उनकी हत्या कर आतंकवादियों ने ये संदेश दिया कि एक भी हिंदू, जो ऊपर उठने की कोशिश करेगा, उसका यही हश्र होगा, जड़ से ही मिटा दिया जाएगा।

अजय पंडिता के परिवार में उनके माता-पिता के अलावा पत्नी और दो बेटियाँ हैं। बुधवार (जून 10, 2020) को उनकी बेटी ने हत्यारों के प्रति आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा कि जिसने भी उनके पिता के साथ ऐसा किया है, उसको वो जिंदा नहीं छोड़ेंगी। एक गोली तो मारेंगी ही।

वो हत्यारे को चेतावनी देते हुए कहती हैं, “तुझे क्या लगता है, तूने अजय भारती को मारा है। उनका शेर अभी जिंदा है। जिंदा नहीं छोड़ूँगी तुम्हें। एक गोली तो मारुँगी मैं उसे, सिर्फ एक गोली जाएगी मेरी तरफ से उसे। मेरे पापा मुझे शेरा बुलाते थे और मैं हूँ वो। मैं किसी से नहीं डरती। सामने बोल रही हूँ कि जिसने भी मेरे पापा के साथ ऐसा किया है, उसकी गर्दन हाथ में पकड़कर ऐसे तोड़ूँगी न कि उसकी रुह तक काँपनी चाहिए।”

अजय भारती की बेटी बताती हैं कि जब वो पापा से कहती थी कि मुस्लिम बुरे हैं, सिख बुरे हैं, तो वो हमेशा कहते थे कि हम किसी भी धर्म के बारे में नहीं बोल सकते हैं कि कौन सा बुरा है और कौन सा अच्छा है। हाँ, इंसानों की गारंटी नहीं है, वो बुरे हो सकते हैं। उनके लिए धर्म का एक ही मतलब होता था और वो था- इंसानियत का धर्म।

वो बताती हैं कि अजय भारती दिल के इतने साफ थे कि वो न केवल इंसानों के लिए बल्कि जानवरों के प्रति भी काफी संवेदनशील थे। वो जब भी रोड पर किसी जानवर को घायल देख लेते थे तो तुरंत उसका उपचार करवाते थे।

वो आगे कहती हैं, “मैं अजय भारती की बेटी हूँ और मैं डरती किसी के बाप से नहीं हूँ। सामने आ जाए, जिसने भी ये किया है। इधर ही बोल रही हूँ। बोटी-बोटी काट दूँगी मैं उसकी। जिंदा नहीं बचेगा तू। मेरे पापा हमेशा कहते थे कि चाहे, बीजेपी में रहो, कॉन्ग्रेस में रहो, AAP में रहो या फिर किसी भी पार्टी में रहो, मगर कभी गलत मत करना। उन्होंने कभी भी किसी के साथ गलत नहीं किया। उन्होंने तो कभी किसी के लिए बुरा सोचा तक नहीं होगा। आज एक-एक जुबान पर अजय भारती का नाम है। मुझे काफी खुशी हो रही है इस बात की, उन्होंने देश के लिए अपनी जान दी। वो इस इज्जत के हकदार हैं। उन्होंने देश के लिए जान दी तो अब देश के लोगों का फर्ज बनता है उनके बलिदान का मान रखें।”

इसके साथ ही उन्होंने अजय भारती को श्रद्धांजलि देने वालों का शुक्रिया अदा किया और कहा, “मैं अपने पापा के हर सपने को पूरा करुँगी। मैं अपने पापा से भी ऊँचा जाऊँगी, ताकि जिस तरह से आज मैं अपने पापा पर गर्व कर रही हूँ, कल मेरी फैमिली भी मुझ पर गर्व करे और मेरे पापा ऊपर स्वर्ग से ही कहें कि ये है मेरा शेरा। मेरी आर्मी ऑफिसर्स से अपील है कि मेरे पापा के हत्यारे को ढूँढे और अगर वह मिल जाए तो प्लीज मुझे जरूर बताएँ। एक गोली तो मारुँगी मैं उसको।”

ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक मुन्नालाल गोयल पर पत्थरों से हमला, लगाया कॉन्ग्रेस पर मारने की साजिश का आरोप

भाजपा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक व पूर्व विधायक मुन्नालाल गोयल पर हमले की खबर है। घटना ग्वालियर जिले के सिरौल थाना कैंपस की है। यहाँ भीड़ ने मंगलवार (जून 9, 2020) को उनपर पथराव किया। इस घटना में उनका सिर फूट गया और गाड़ी क्षतिग्रस्त हो गई। उनके सिर में चार टाँके भी आए।

मुन्नालाल गोयल ने अपने ऊपर हुए इस हमले के लिए कॉन्ग्रेस को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कॉन्ग्रेस पर उनकी हत्या की साजिश रचने का आरोप लगाया। उन्होंने बताया कि यह हमला उनपर उस समय हुआ जब वह एक बीए के छात्र की हत्या की खबर सुनकर सिरौल गाँव गए थे और फिर वहाँ से थाने पहुँचे थे।

उन्होंने बताया कि मंगलवार सुबह सिरौल थाना क्षेत्र में दलित युवक की हत्या होने की उन्हें सूचना मिली। जिसके बाद वह पीड़ित परिवार के प्रति सांत्वना व्यक्त करने उनके घर पहुँचे। परिवार से मिलने के बाद जैसे ही वे थाने पहुँचे उनकी कार पर पथराव शुरू हो गया।

उनके मुताबिक, पत्थरबाजी देखकर इससे पहले उन्हें कुछ समझ आता, एक पूरी भीड़ ने उनकी कार को घेर लिया। इसके बाद उन्हें पीछे से किसी ने सिर में कुछ मारा। वे कहते हैं कि अगर ड्राइवर तुरंत गाड़ी रिवर्स नहीं करता तो बड़ा हादसा हो सकता था।

मुन्नालाल गोयल ने कॉन्ग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस की ये सब साजिश है। उन्हें उनके मतदाताओं से मिलने से रोका जा रहा है। लेकिन वे इस तरह की घटनाओं से डरने वाले नहीं हैं और अपने समर्थकों से मिलने जाते रहेंगे। उन्होंने कहा कि भगवान हमलावरों को सदबुद्धि दे कि भविष्य में इस तरह का कृत्य नहीं करें।

गौरतलब है कि सिंधिया के समर्थक मुन्नालाल गोयल बीते दिनों सिंधिया के कॉन्ग्रेस छोड़ते ही भाजपा में शामिल हो गए थे। उनके इस्तीफे के बाद ग्वालियर पूर्व की सीट भी खाली हो गई थी। अब आने वाले समय में यहाँ पर भी उपचुनाव होने वाले हैं। जिनमें गोयल टिकट के सबसे मजबूत दावेदार हैं, इसलिए उन्होंने अपने विधानसभा में इसकी तैयारी भी शुरू कर दी है।

यहाँ बता दें, मंगलवार को हुई इस घटना के मद्देनजर मुन्नालाल गोयल ने फैसला लिया है कि वह इस मामले में एफआईआर दर्ज नहीं करवाएँगे। उन्होंने कहा है कि इस मामले में वह सारा फैसला जनता पर छोड़ते हैं। वहीं, गोयल के आरोप पर ग्वालियर शहर जिला कॉन्ग्रेस अध्यक्ष डॉ. देवेंद्र शर्मा ने पलटवार करते हुए कहा कि जनाधार खिसकता देखकर सहानुभूति बटोरने के लिए पूर्व विधायक ने हमले की साजिश रची है। उनका पूछना है कि आखिर वह आज अपने सुरक्षागार्ड को साथ लेकर क्यों नहीं गए। जबकि लॉकडाउन में 24 घंटे उनका सुरक्षा गार्ड उनके साथ था।

‘1962-2012 तक के चीनी कब्जे पर कॉन्ग्रेस क्यों रही मौन’: लद्दाख सांसद जामयांग ने पूरी लिस्ट देकर राहुल गाँधी को घेरा

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35 ए के प्रावधानों को रद्द किए जाने के बाद अपने भाषण से चर्चा में आए लद्दाख से भारतीय जनता पार्टी के सांसद जमयांग सेरिंग नामग्याल ने कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी द्वारा लद्दाख में चीन की घुसपैठ पर किए गए सवाल का जवाब दिया।

बता दें कि राहुल गाँधी ने मंगलवार (जून 9, 2020) को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के ट्वीट पर तंज के लहजे में प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने ट्वीट किया, “अगर रक्षा मंत्री का हाथ के निशान पर टिप्पणी करने का काम पूरा हो गया हो तो वह इसका जवाब दें कि क्या चीन के सैनिकों ने लद्दाख में भारतीय क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है?”

इसके जवाब में नामग्याल ने ट्वीट की प्रतिक्रिया में कॉन्ग्रेस नेता को फटकार लगाते हुए लिखा, “मुझे उम्मीद है कि राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस तथ्यों के आधार पर मेरे जवाब से सहमत होंगे और आशा है कि वो फिर से गुमराह करने की कोशिश नहीं करेंगे” क्या लद्दाख में चीन ने भारतीय क्षेत्र पर कब्जा कर लिया है? राहुल के इस सवाल के जवाब में नामग्याल ने लिखा, “हाँ, चीन ने भारतीय क्षेत्र पर इस तरह कब्जा कर लिया।”

इसके बाद बीजेपी सांसद ने राहुल गाँधी को उन जगहों की भी लिस्ट दी है जो भारत ने साल 1962 से 2012 के दौरान कॉन्ग्रेस या यूपीए शासनकाल में गँवा दी थी। इसमें अक्‍साई चीन से लेकर पैंगनक और चबजी घाटी, दूम चेले जैसे इलाकों का जिक्र किया गया है।

नामग्‍याल ने अपने ट्वीट में दो तस्‍वीरें पोस्‍ट कीं। एक में उनका जवाब था और दूसरे में डेमचोक घाटी की एक तस्‍वीर। उनका दावा है कि इन इलाकों पर कॉन्ग्रेस के वक्‍त में चीन ने कब्‍जा कर लिया।

  • 1962 में कॉन्ग्रेस राज के दौरान अक्‍साई चिन (37,244 किलोमीटर)।
  • यूपीए राज में 2008 तक चुमूर इलाके के तिया पैंगनक और चाबजी घाटी (250 मीटर लंबाई)
  • यूपीए काल में 2008 में चीनी सीना ने डेमजोक में जोरावर किले को ध्‍वस्‍त किया और 2012 में PLA ने ऑब्‍जर्विंग पॉइंट बना लिया। 13 सीमेंटेड घरों के साथ चीनी/न्‍यू देमजोक/कॉलोनी बसी।
  • यूपीए राज में भारत ने डुंगती और डेमचोक के बीच डूम चेले (एंशियंट ट्रेड पॉइंट) को गँवाया।

गौरतलब है कि इससे पहले भी नामग्याल ने कहा था कि कॉन्ग्रेस सरकार की ग़लत नीतियों की वजह से ही चीन ने डेमचोक सेक्टर तक के इलाक़े पर कब्ज़ा कर लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि कॉन्ग्रेस ने तनावपूर्ण स्थितियों में भी तुष्टिकरण को अपनी प्राथमिकता बनाए रखा और न सिर्फ़ कश्मीर को बर्बाद किया बल्कि लद्दाख को भी काफी क्षति पहुँचाई। 

उन्होंने कहा था, “पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने ‘फॉरवर्ड पॉलिसी’ अपनाई जिसमें कहा गया कि हमें एक-एक इंच चीन की ओर बढ़ना चाहिए। इसके कार्यान्वयन के दौरान यह ‘बैकवर्ड पॉलिसी’ बन गई। चीनी सेना लगातार हमारे क्षेत्र में घुसपैठ करती चली गई और हम लगातार पीछे हटते चले गए। यही वजह है कि अक्साई चीन पूरी तरह से चीन के नियंत्रण में है। पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के जवान डेमचोक ‘नाला’ तक पहुँच गए क्योंकि लद्दाख को कॉन्ग्रेस के 55 वर्षों के शासन में रक्षा नीतियों में उचित तवज्जो नहीं मिली।”

उन्होंने लोकसभा में भाषण देने के दौरान PDP-NC पर तंज सकते हुए कहा था कि ये दोनों परिवार कश्मीर को अपने बाप की जागीर समझ बैठे थे। इस पर सभी भाजपा सदस्यों की मेजों के थपथपाने से सदन गूँज उठा। इतना ही नहीं, जब विपक्ष ने उनके भाषण में टोका-टोकी शुरू की तो उन्होंने कह दिया, “सुनने की क्षमता रखिए।” बता दें कि नामग्याल का भाषण इतना प्रभावशाली था कि प्रधानमंत्री मोदी ने अलग से उसे ट्वीट कर उनकी तारीफ़ की थी

गोहत्या पर 10 वर्ष का कारावास, ₹5 लाख का जुर्माना: गोवंश संरक्षण के लिए सख्त हुई UP की योगी सरकार

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने गोहत्या पर पूर्ण लगाम लगाने के लिए ‘Cow-Slaughter Prevention (Amendment) Ordinance, 2020’ को पास कर दिया है। मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में ‘उत्तर प्रदेश गो वध निवारण (संशोधन) अध्यादेश, 2020’ को मंजूरी दे दी गई। दरअसल, योगी सरकार ने 1956 में लागू हुए गोवध निवारण अधिनियम में बदलाव किया है। इसमें संशोधन कर के इसे और सख्त बनाया गया है।

इससे पहले गोहत्या के आरोपित 7 साल के कारावास की सज़ा के प्रावधान के कारण जमानत पाने में सफल हो जाते थे। इसे ध्यान में रखते हुए सज़ा को अधिकतम 10 साल कर दिया गया है। साथ ही गोहत्या पर लगने वाले जुर्माने को भी 3 लाख रुपए से बढ़ा कर 5 लाख रुपए कर दिया गया है। उत्तर प्रदेश में अब जो भी गोहत्या या जो-तस्करी में संलिप्त होगा, उसके फोटो भी सार्वजनिक रूप से चस्पाए जाएँगे। मंगलवार (जून 9, 2020) को यूपी कैबिनेट ने ये फ़ैसला लिया।

इसके अलावा अवैध परिवहन से गो-तस्करी में लिप्त लोगों को पकड़े जाने के बाद वाहन चालक और तस्करी में शामिल लोग, बल्कि वाहन के मालिक के खिलाफ भी मुकदमा चलाया जाएगा। उत्तर प्रदेश सरकार ने कहा है कि गोकशी की घटनाओं को पूर्णतः रोकना उसका लक्ष्य है और गोवंशीय जानवरों के संरक्षण के लिए ये फ़ैसला लिया गया है। इससे पहले इस अधिनियम की नियमावली में 1964 और 1979 में संशोधन किया जा चुका है।

एक और ख़ास प्रावधान ये है कि अगर कोई आरोपित इन अपराधों में दोबारा लिप्त पाया जाता है तो सज़ा भी दोगुनी मिलेगी। अर्थात, 20 वर्ष की क़ैद भुगतनी पड़ेगी और 10 लाख बतौर जुर्माना वसूला जाएगा। इस अधिनियम में 1958, 61, 79 और 2002 में इससे पहले संशोधन किया जा चुका है। इन सबके बावजूद प्रदेश के विभिन्न हिस्सों से गोवंशीय पशुओं की तस्करी और हत्या की वारदातें सामने आती रहती थीं। इसीलिए इसे सख्त बनाया गया।

सबसे बड़ी बात ये है कि इस अधिनियम में भी योगी सरकार ने आरोपितों से ख़र्चा वसूलने वाली सोच पर अमल किया है। गो-तस्करी में लिप्त पाए गए आरोपितों से उन गायों के एक वर्ष के भरण-पोषण का ख़र्च भी वसूला जाएगा। सरकार ने लगातार इन अपराधों के सम्बन्ध में मिल रही शिकायतों के कारण ये क़दम उठाया है। अगर कोई व्यक्ति गोवंश को नुकसान पहुँचाने के इरादे से उसे भोजन-पानी नहीं देता है तो वो भी 1 वर्ष के लिए जेल जाएगा।

अभी तक गोवंश के परिवहन के दौरान किसी भी प्रकार की सज़ा का प्रावधान नहीं था। ताज़ा प्रावधान के बाद गोवंशीय पशुओं के अनियमित परिवहन पर रोक लगेगी, ऐसी उम्मीद जताई गई है। गोवंश से संबंधित अपराधों के आरोपितों के मोहल्ले में ही इनके नाम के साथ फोटो चस्पाई जाएगी। इससे पहले सरकार बनने के तुरंत बाद योगी सरकार ने गोहत्या को पूर्ण रूप से प्रतिबंधित कर दिया था। योगी सरकार के ताज़ा फ़ैसले का हिंदूवादी संगठनों ने स्वागत किया है।

PM मोदी को फासिस्ट कहने और ताहिर हुसैन का बचाव करने का इनाम: जावेद अख्तर के ‘रिचर्ड हॉकिंस अवार्ड’ का सच

भारतीय गीतकार जावेद अख्तर को सोशल मीडिया के माध्यम से बधाइयाँ मिल रही हैं। रविवार (जून 7, 2020) को ख़बर आई कि उन्होंने ‘रिचर्ड डॉकिन्स पुरस्कार’ जीता है। साथ ही इस तरह से पेश किया गया कि वो ऐसा कारनामा करने वाले पहले भारतीय हैं। रिचर्ड डॉकिन्स ब्रिटिश जीवविज्ञानी और लेखक हैं। ये अवॉर्ड 2003 से ही विज्ञान, रिसर्च, शिक्षा और मनोरंजन के क्षेत्र में प्रबुद्ध लोगों को दिया जाता रहा है।

लेकिन, सिर्फ यही एक क्राइटेरिया नहीं है इस अवॉर्ड को पाने का। यानी किसी ने अपने क्षेत्र में कितनी ही मेहनत क्यों न की हो, अवॉर्ड तभी मिलेगा जब आपने ‘लॉजिकल होकर धर्मनिरपेक्षता की रक्षा’ के लिए प्रयास किया हो। अब यहाँ धर्मनिरपेक्षता या सेक्युलरिज़्म के नाम पर क्या-क्या खेल चलता है, ये किसी से छिपा नहीं है। जब किसी अवॉर्ड में सेक्युलरिज़्म का जिक्र आए और वो विदेशी भी हो, तो भारत के लिए ये कान खड़े होने वाली बात है।

इसकी पड़ताल की शुरुआत जावेद अख्तर की दूसरी बीवी और फरहान अख्तर की सौतेली अम्मी शबाना आजमी के बयान से करते हैं। अपने शौहर को अवॉर्ड मिलने की ख़ुशी जाहिर करते हुए शबाना ने लिखा कि आज सभी धर्मों के कट्टरपंथी सेक्युलरिज़्म पर हमला कर रहे हैं, इसके मूल्यों की रक्षा के लिए जावेद अख्तर ने प्रयास किया और उन्हें ये अवॉर्ड मिला। साथ ही शबाना ने ये भी बताया कि जावेद अख्तर रिचर्ड डॉकिन्स से प्रेरणा लेते रहे हैं, उन्हें नायक मानते हैं।

वामपंथी गैंग में ख़ुशी की लहर दौड़ी और फर्जी इतिहासकारों से लेकर बॉलीवुड के लोगों तक, सबने बधाइयों का ताँता लगा दिया। अगर 79 वर्षीय रिचर्ड डॉकिन्स के ट्विटर प्रोफाइल को खँगालें तो पता चलता है कि फ़िलहाल वो अमेरिका में चल रहे ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ विरोध प्रदर्शन के समर्थन में लगे हुए हैं। हालाँकि, अब ये प्रदर्शन दंगों में तब्दील हो चुका है। अमेरिका में इसकी आड़ में आगजनी और लूटमार चल रही है।

रिचर्ड डॉकिन्स की वेबसाइट खँगालने पर पता चलता है कि भारत और यहाँ होने वाली घटनाओं के सम्बन्ध में वो और उनकी टीम उसी पूर्वग्रह से ग्रसित हैं, जिसके मद में सदानंद धुमे, बरखा दत्त और राणा अयूब जैसे लोग विदेशी पोर्टलों में लेख लिख कर अपने ही देश को बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं। फ़रवरी 2016 में उनकी वेबसाइट पर ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ की पत्रकार अपूर्वा मंडावली का एक लेख छपा था, जिसमें मोदी सरकार को विज्ञान-विरोधी बताया गया था।

नरेंद्र मोदी की सरकार को रूढ़िवादी और दक्षिणपंथी बताते हुए इस लेख में लिखा गया था कि शैक्षिक मसलों में सरकार का दखल और धार्मिक असहिष्णुता के बढ़ते माहौल के कारण देश भर के प्रबुद्ध लोग इसके ख़िलाफ़ आवाज़ उठा रहे हैं। उस समय भारत में असहिष्णुता का राग चरम पर था और अवॉर्ड वापसी का नाटक भी चल रहा था। इस लेख में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को एक दक्षिणपंथी कट्टरवादी संगठन करार दिया गया था।

वही आरएसएस, जो कोरोना आपदा के वक़्त 3.17 करोड़ से भी अधिक लोगों तक भोजन पहुँचा चुका है और जिसके 3.42 लाख स्वयंसेवक ग्राउंड पर डटे हुए हैं, जनसेवा कर रहे हैं। वही संघ, जो देश भर में 67,336 स्थानों पर एक साथ राहत-कार्य चला रहा है। और ये पहली बार नहीं है। दशकों से हर आपदा में संघ ने ऐसे ही कार्य किया है। लेकिन, इस लेख में संघ और भाजपा के जुड़ाव को ‘अपवित्र गठबंधन’ बताते हुए इसे एक हिंसक पैरामिलिट्री समूह करार दिया गया था। भारत में संघ के आलोचक भी जानते हैं कि ये सच नहीं है।

अगर विज्ञान की ही बात करनी हो तो इसरो के लिए केंद्र सरकार के बजट को देख कर ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इस मामले में कौन संवेदनशील है और कौन नहीं। 2013 में यूपीए के अंतिम पूर्ण बजट में भारतीय स्पेस एजेंसी इसरो के लिए 6792 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया था जबकि 2020 में यही आँकड़ा लगभग दोगुना, अर्थात 13,479 करोड़ रुपया हो जाता है। लेकिन, माहौल बनाने के लिए आँकड़ों को छिपाना होता है।

अक्टूबर 2015 में रिचर्ड डॉकिन्स की वेबसाइट पर एक और लेख आया था, जिसमें यूपी के दादरी में अखलाक की मॉब लिंचिंग को एक कहानी की तरह पेश किया गया। इसमें पूछा गया कि अखलाक का अपराध क्या था और साथ ही जवाब दिया गया कि बीफ खाना ही उसका एकमात्र ‘अपराध’ था। इसमें भी मोदी सरकार को कंजर्वेटिव बताते हुए लिखा गया कि उसके सत्ता में आने के बाद ऐसी घटनाएँ बढ़ गई हैं। यही नैरेटिव जो वामपंथी मीडिया चलाता है।

यहाँ इस बात की चर्चा करनी ज़रूरी है कि अखलाक की हत्या के मामले में एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया था कि इसका कारण बीफ न होकर आपसी रंजिश हो सकती है। साथ ही उसने ये भी दावा किया था कि ये एक मॉब लिंचिंग नहीं थी क्योंकि इस हत्याकांड में भीड़ नहीं बल्कि कुछ ही लोग शामिल थे। हालाँकि, रिचर्ड डॉकिन्स जैसे लोगों की नज़र में इन सबका कोई महत्व नहीं। अखलाक की हत्या के बाद कई महीनों तक ‘डर का माहौल’ वाला नैरेटिव चला था।

उस पर भी जावेद अख्तर जैसे व्यक्ति को ये अवॉर्ड मिलना ठीक वैसा ही है, जैसे रवीश कुमार जैसों को मैग्सेसे मिलना। जावेद अख्तर अब एक ट्विटर ट्रोल बन चुके हैं, जो आए दिन ऑनलाइन लड़ाई-झगड़ों में व्यस्त रहते हैं। दिल्ली दंगों के समय उन्होंने ताहिर हुसैन का बचाव करते हुए यहाँ तक पूछा था कि दिल्ली पुलिस एक ही व्यक्ति के पीछे क्यों पड़ी है? अब वही पूरे दंगों और कई हत्याओं का मास्टरमाइंड निकला। जावेद अख्तर को बख्तियार और अलाउद्दीन खिलजी के बीच का अंतर तक नहीं पता।

ये वही जावेद अख्तर हैं, जिन्होंने फ़रवरी 2020 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को फासिस्ट कहा था। रिचर्ड डॉकिन्स की वेबसाइट पर सीएए को लेकर भी दिसंबर 2019 में एक लेख आया, जिसमें लिखा गया था कि नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद से ही देश के 20 करोड़ लोगों की स्थिति बिगड़ने लगी है। लिखा गया कि भारतीय संसद ने नया क़ानून बना कर उन पर ‘वज्रपात’ किया है। बताया गया कि समुदाय विशेष को सीएए की सूची से बाहर रखना कोई संयोग नहीं हो सकता।

रिचर्ड डॉकिन्स अपनी पुस्तक ‘गॉड इज नॉट ग्रेट’ में हिन्दू और बौद्ध धर्म पर हमला भी कर चुके हैं। उन्होंने इन दोनों धर्मों के ‘अन्धविश्वास’ को मुद्दा बनाया था और साथ ही सती प्रथा के लिए हिन्दू धर्म की आलोचना की थी। ये भी अंग्रेजों का बना-बनाया नैरेटिव है। ख़ुद को नास्तिक बताने वाला रिचर्ड हॉकिंस ईश्वर के अस्तित्व को नकारते रहे हैं। जावेद अख्तर को अवॉर्ड देना भारत में अपने विचार फैलाने का एक जरिया हो सकता है, जिसके लिए उन्हें एक ‘योग्य’ व्यक्ति मिला है

उत्तराखंड में पौराणिक शिवमंदिर के सामने नजर आ रहे ‘चर्चनुमा संदिग्ध’ निर्माण से ग्रामीण हैरान

उत्तराखंड राज्य में धर्म स्वतंत्रता कानून होने के बावजूद कितने शातिराना तरीके से इस काम को अंजाम दिया जा रहा है, यह ग्रामीण अंचलों में रहने वाले लोग अच्छी तरह से जानते हैं। कोरोना वायरस की महामारी के दौरान ईसाई मिशनरियों द्वारा अनुसूचित जाति और जनजाति के धर्मांतरण की बात उठाने के बाद ग्रामीण लोगों ने इसी क्षेत्र के आसपास के और गाँवों के बारे में भी अवगत कराया, जहाँ पर ईसाइयों द्वारा बड़े पैमाने पर गरीब, एससी-एसटी जाति के लोगों को लालच देकर सिर्फ उन्हें ईसाई ही नहीं बनाया जा रहा बल्कि घर बनाने के बहाने वहाँ चर्च निर्माण का भी कार्य प्रगति पर चल रहा है।

हाल ही में ऑपइंडिया पर एक रिपोर्ट में हमने बताया था कि किस प्रकार से मसूरी से करीब चालीस किलोमीटर दूर स्थित घने देवदार के वन के बीच बसे देवलसारी महादेव मंदिर के आसपास की आबादी में एससी-एसटी जाति को ईसाई बनाने का कार्य कई वर्षों से चलाया जा रहा है।

ईसाई मिशनरियों ने कोरोना वायरस के दौरान जारी लॉकडाउन का फायदा उठाते हुए एकबार फिर आर्थिक रूप से पिछड़े इन परिवारों को निशाना बनाते हुए इन्हें राशन से लेकर मांस, जिसमें बकरी, मुर्गा आदि शामिल हैं, उपलब्ध करवा रहे हैं और इन सबकी आड़ में इन परिवारों का ईसाईकरण करना है।

इस घटना के प्रकाश में आने के बाद स्थानीय लोगों ने बताया कि ऐसा सिर्फ एक ही गाँव में नहीं बल्कि कुछ ही दूरी पर बसे एक और गाँव में, जहाँ भगवान शिव का ऐतिहासिक और पौराणिक मंदिर भी स्थित है, में भी इस कार्य को दूसरे स्तर पर पहुँचा दिया गया है।

घने देवदारों के बीच बसा पौराणिक कोणेश्वर महादेव मंदिर

हालाँकि, लोग स्पष्ट रूप से इस बारे में ना कहते हुए बताते हैं कि यहाँ पर चल रहे ये घर जैसे निर्माण कार्य संदिग्ध हैं, जो कि कुछ ‘बाहरी लोगों’ के इशारे पर किया जा रहा है। जिन जगहों पर यह भवन निर्माण हो रहे हैं, वह जमीन भी अनुसूचित जाति के ही लोगों की ही है, जिस पर वो कभी खेती किया करते थे।

नाम गोपनीय रखने की शर्त पर एक ग्रामीण युवक ने कहा कि वो कई समय से इन लोगों को धर्मांतरण के खिलाफ जागरूक करने का प्रयास कर रहा है लेकिन वो असफल रहा है। युवक ने बताया कि इन्हें इतनी बड़ी मात्रा में बाहरी लोग धन और संसाधन उपलब्ध करवा रहे हैं कि ये सरकारी योजनाओं जैसे- मनरेगा आदि में भी काम करने को अब तैयार नहीं होते।

यह भी उल्लेखनीय है कि ये अनुसूचित जाति के लोग ग्रामीण परिवेश का हिस्सा होने के कारण किसी ना किसी पारंपरिक व आर्थिक गतिविधियों का हिस्सा हुआ करते थे, जिससे कि सभी जाति और परिवारों के आर्थिक और सामाजिक हित जुड़े होते थे। लेकिन अब ये लोग अपने पारम्परिक कार्य को भी अपनी आगे की पीढ़ी को नहीं सिखा रहे हैं, ना ही उन्हें गाँव की परिपाटी का हिस्सा बने रहने में अब दिलचस्पी है।

यह भी गौर करने की बात है कि यह ‘चर्चनुमा भवन’ ठीक पौराणिक कोणेश्वर महादेव मंदिर के सामने बन रहा है। स्थानीय लोगों ने बताया कि किस प्रकार से अनुसूचित जाति की असहाय महिलाओं को मसूरी में रहने वाले ‘डेविड’ द्वारा मदद भेजी जाती है, जो कुछ दिन उनके बीच ही ठहरते हैं, उनकी पूरी जानकारी हासिल कर उनकी ‘मदद’ का आश्वासन देते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि ‘अंग्रेज’ अब स्थानीय बोली के साथ अच्छी हिंदी में भी बात करने लगे हैं और उन्हें इन परिवारों से जुड़ने में ख़ास समस्या नहीं होती।

हिंदुत्व के साथ-साथ स्थानीय संस्कृति से भी विमुख करता ईसाईकरण

वास्तव में यह धर्मान्तरण उत्तराखंड की पारम्परिक छवि को ही सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचा रहा है। शायद ही कोई ऐसा जिला हो, जहाँ पर ईसाई मिशनरियों ने अपने ‘एजेंट’ ना स्थापित कर रखे हों। ये टूरिस्ट से किस प्रकार अनुसूचित जाति के रखवाले बन जाते हैं, इस बारे में हम पहले भी बता ही चुके हैं।

लेकिन यह देखना आश्चर्यजनक है कि गुपचुप धर्मांतरण के बाद अब चर्च निर्माण के लिए भी ईसाई मिशनरी साहस जुटाने लगे हैं। हमें इस बारे में जानकारी देने वाले स्थानीय युवक ने बताया कि यह ईसाई धर्मांतरण इस कारण भी खतरनाक है क्योंकि यह लोग उन्हें हिन्दुओं के खिलाफ भी भड़काते हैं और उन्हें ऐसे धर्म से परहेज करने की सलाह भी देते हैं जो उन्हें रूढ़िवादी बनाता है। यही नहीं, ‘टारगेट’ को अपनी स्थानीय परम्परा के लोकगीत, संस्कृति से भी परहेज करने की सलाह इन ‘बाहरी लोगों’ के द्वारा दी जाती है।

हालाँकि, इसी क्षेत्र का हिस्सा होने के बाद भी मैं स्वयं भी आज तक वह अंतराल देख पाने में असमर्थ हूँ, जो ईसाइयों ने इन गरीब और असहाय हिन्दुओं के धर्मांतरण के बाद इनके जीवनस्तर में लाया हो। इसके विपरीत वह लोग अब कृषि से विमुख हो गए हैं, शिक्षा से दूर होते जा रहे हैं, मुख्यधारा में जुड़ने से बचने लगे हैं और तो और अपने साथ के ग्रामीणों से भी दूरी बनाकर चलते नजर आने लगे हैं।

क्या मजार और चर्च में डूब जाएगी देवभूमि कहा जाने वाला उत्तराखंड?

उत्तराखंड में एक और प्रचलन भी देखने को मिला है कि सड़क किनारे या किसी आम रास्ते के पास कुछ दिन पहले एक हरी चादर रखी जाती है और कुछ ही समय में वो ऐसा आकार लेने लगता है, जिसे लोग मजार कहते हैं। ऐसे में यदि इस्लामिक और ईसाईयत का निशाना देवभूमि कहे जाने वाले उत्तराखंड जैसे राज्य, जो कि जनजातीय समाज से मिलकर बना है, जिसकी संस्कृति ही उसकी पहली पहचान है, बनते हैं तो फिर इस उत्तराखंड राज्य को गोआ बनते समय ही कितना लगेगा, वो भी तब जब लोगों को यह यकीन है कि वो दक्षिणपंथी नेतृत्व के तले सुरक्षित हैं?

स्कूल निर्माण

यहाँ पर ‘अंग्रेजी शिक्षा’ के नाम पर ईसाइयों द्वारा आठवीं कक्षा तक के स्कूल भी खोले जा रहे हैं, जिनमें पढ़ाने वालों की योग्यता और मानक भी विचारणीय है। लेकिन ग्रामीण लोगों के लिए ये स्कूल सहूलियत बनकर उभरे हैं क्योंकि ये ऐसी जगहों पर तैयार किए गए हैं, जो सिर्फ गाँव से कुछ ही कदम की दूरी पर बने हैं।

करीब आठ-दस किलोमीटर दूर मुख्य बाजार में अपने बच्चों को जो ग्रामीण पढ़ाने नहीं भेज सकते, उस बड़ी आबादी को मुख्य बाजार के उस सरकारी स्कूल और सुविधाओं से कहीं बेहतर यही मिशनरी स्कूल नजर आते हैं। उन्हें यह सुकून रहता है कि जो स्कूल उनके बच्चे जाते हैं, वह कम से कम कोई अंग्रेजी नाम वाली एकेडमी तो है! ऊपर से बरसात, पानी, गर्मी के मौसम में लम्बी दूरी पैदल जाने से भी बच्चे बच जाते हैं।

मुझे भी अच्छे से अपने बचपन का समय याद है, जब बरसात के दिनों हमें घर से पाँच-सात किलोमीटर दूर स्कूल भेजते समय घर के लोग पहाड़ से सटकर चलने की राय देते थे, ताकि ऊपर की पहाड़ी से अगर पत्थर गिरें भी, तो वो हमें ना लगे।

ईसाइयों द्वारा गुपचुप तरीके से किए जा रहे इन धर्मांतरणों पर स्थानीय नेताओं और हिंदूवादी संगठनों की भी विशेष दिलचस्पी नहीं है। जो कुछ गिने-चुने लोग इन घटनाओं से निराश हैं, वह भी लाचार हैं और उनका कहना है कि विदेशी मुद्रा से लड़ पाने में वो सक्षम नहीं हैं और उनकी अपनी सीमाएँ हैं। भले ही, लोग अवश्य चाहते हैं कि ईसाइयों की गिद्धदृष्टि से समाज को किसी तरह से बचाया जा सके।

कागज दिखाने के बावजूद पाकिस्तान में 70 हिन्दुओं के घरों को ध्वस्त किया, बेघर हुए गरीब महिलाएँ-बच्चें: भारत ने जताया विरोध

पाकिस्तान में हिन्दू लड़कियों के अपहरण, जबरन निकाह और इस्लामी धर्मान्तरण की ख़बरें तो सुर्ख़ियों में बनी ही हुई थीं, अब सिसिलेवार तरीके से साजिश रच कर उनके घर ढहाए जाने की बात सामने आ रही है। भारत ने मंगलवार (जून 9, 2020) को पाकिस्तान के समक्ष इस सम्बन्ध में कड़ा विरोध दर्ज कराया। पाकिस्तान स्थित पंजाब प्रान्त में हिन्दुओं को निशाना बना कर उनके घरों को योजनाबद्ध तरीके से ध्वस्त कर दिया जा रहा है।

भारत ने पाकिस्तान उच्चायोग के समक्ष इन शिकायतों को रखा है और पूरी मजबूती के साथ अपना विरोध दर्ज कराया है। बहावलपुर जिले के चाक 52/DB में हिन्दुओं के घरों को ध्वस्त कर दिया गया था, जिसके बारे में नई दिल्ली स्थित पाकिस्तानी उच्चायोग के सामने भारतीय अधिकारियों ने अपनी बातें रखीं। उन्हें बताया कि भारतीय सिविल सोसाइटी के लोग इस घटना पर गहरी चिंता जाहिर कर रहे हैं और अल्पसंख्यकों का इस तरह दमन किए जाने से वो पीड़ित हैं।

जिन हिन्दुओं के घरों को ध्वस्त किया गया है, उनके पास उचित और वैध दस्तावेज थे, जिससे न सिर्फ़ उनके मालिकाना हक़ के बारे में पता चलता था बल्कि उनके घरों को ढहाए जाने के सम्बन्ध में उन्हें राहत प्रदान किए जाने की भी बात लिखित थी। बावजूद इसके उनके घरों को ध्वस्त कर दिया गया। ये सब सामान्य नागरिकों द्वारा नहीं बल्कि वहाँ के प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा किया जा रहा है। भारत ने पाक को ‘अर्जेन्ट रेमेडियल एक्शन’, अर्थात पीड़ितों को तुरंत मदद पहुँचाने को कहा है।

भारत ने पाकिस्तान से कहा है कि वो अल्पसंख्यकों के फ्री स्पीच और जीवन जीने के अधिकारों की सुरक्षा के लिए क़दम उठाए। भारत ने पाकिस्तान से जिम्मेदारी पूर्वक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा करने को कहा है। ‘ह्यूमन राइट्स कमीशन ऑफ पाकिस्तान’ ने हाल ही में एक फैक्ट-चेकिंग मिशन के बाद पाया था कि बहावलपुर में हिन्दुओं के घर को प्रशासन ने ध्वस्त कर दिया है। हिन्दुओं ने इस सम्बन्ध में पहले ही सिविल जज के समक्ष याचिका दायर कर दी थी।

संगठन ने बताया है कि हिन्दुओं ने सिविल जज से गुहार लगाई थी कि उनके साथ इस तरह का व्यवहार होने से रोका जाए और सारे दस्तावेज पेश किए थे। उन्हें पहले से ही इस बात का अंदेशा था कि पाकिस्तानी सरकार ऐसा कुछ करने वाली है। एक बार नहीं बल्कि कई बार याचिका डाली गई थी। मार्च 20, 2020 को आदेश भी आया कि हिन्दुओं के घरों को न तोड़ा जाए। इस आदेश के बावजूद अधिकारियों ने ये कृत्य किया।

अकेले 20 मई को कुल 30 हिन्दुओं के घरों को ढाह दिया गया है। इनमें से 20 के घर तो पूरी तरह ध्वस्त कर दिए गए जबकि बाकी 10 को नुकसान पहुँचाया गया है। उन घरों की महिलाओं और बच्चों तक के सिर के ऊपर से छत उजड़ गया है। संगठन का कहना है कि एक तो ये ग़रीब हिन्दू पहले से ही तमाम तरीकों से प्रताड़ित किए जा रहे हैं, ऊपर से उनके घरों को ढाह देने के बाद उनके पास कुछ बचा ही नहीं है।

इस्लामाबाद में स्थित बीबीसी की संवाददाता शुमाइला जाफरी की रिपोर्ट के अनुसार, शहर के असिस्टेंट कमिश्नर का कहना है कि निर्माण अवैध तरीक़े से किया गया था। इस रिपोर्ट में पाकिस्तान मानवाधिकार संगठन के हवाले से बताया गया है कि जिन हिन्दू कॉलोनी को ध्वस्त किया गया, उसमें 70 हिन्दुओं के घर थे। ये सभी निर्माण एक दशक से भी पुराने थे। यहाँ के हिन्दू अशिक्षित और ग़रीब हैं, जो दिहाड़ी मजदूरी कर के अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं।

हिन्दुओं ने आरोप लगाया है कि स्थानीय मुस्लिम समुदाय का नेता मोहम्मद बूटा हिन्दुओं की जमीनों का हिस्सा हड़पना चाहता था। इसके बाद उसने कमिश्नर के पास जाकर शिकायत कर दी कि हिन्दू मंशा राम अपने समुदाय के लोगों को जमीनें बेच-बेच कर पैसे कमा रहे हैं। इसके बाद ट्रैक्टर और बुलडोजर लिए पहुँचे अधिकारियों ने घरों को ढाहना शुरू किया। वहीं बूटा ने बीबीसी से बात करते हुए आरोपों को निराधार बताते हुए हिन्दुओं को ही कटघरे में खड़ा किया।

उसका कहना था कि स्थानीय हिन्दू कब्रिस्तान का अपमान करते हैं, जिससे उसे दुःख पहुँचता था। उसने आरोप लगाया कि हिन्दू शराब पीते हैं और बोतलें कब्रिस्तान में ही छोड़ जाते हैं। जबकि आयोग का कहना है कि मोहम्मद बूटा का राजनीतिक सम्बन्ध मजबूत है, जिसका वह गलत फायदा उठा रहा है। जबकि प्रशासन कह रहा है कि उसने भू-माफिया के ख़िलाफ़ कार्रवाई करते हुए ऐसा किया। अब देखना ये है कि पीड़ितों को मुआवजा कब मिलता है।

कट्टरपंथियों के विरोध के आगे झुका PUBG, ‘मूर्तिपूजा’ वाले मोड को गेम से निकाल बाहर किया: बताया गया था इस्लाम के खिलाफ

ऑनलाइन गेमिंग एप्लीकेशन PUBG ने अपने गेम से ‘मूर्तिपूजा’ वाले भाग को हटा दिया है। ‘प्लेयर्स अननोन बैटलग्राउंड (PUBG)’ के पिछले अपडेट में ‘मूर्तिपूजा’ दिखाने और इसे बढ़ावा देने के आरोप लगे थे। इसके बाद कुवैत और सऊदी अरब जैसे मुल्कों में इसके खिलाफ विरोध शुरू हो गया था।

PUBG गेम के इस अपडेट पर कुवैत के मौलवियों ने हंगामा मचाया था और आरोप लगाया था कि ये मूर्तिपूजा है, इस्लाम के खिलाफ है। विरोध के बाद PUBG ने 2 एमबी का एक ताज़ा अपडेट लॉन्च किया है। ऐसे अपडेट्स तभी जारी किए जाते हैं जब किसी फीचर को हटाया या जोड़ा जाता है और प्लेयर्स किसी दिक्कत की रिपोर्टिंग करते हैं।

इस अपडेट में ‘जंगल एडवेंचर मोड’ को पूरी तरह से हटा दिया गया है। PUBG ने इसे लेकर बयान भी जारी किया है। उसका कहना था कि इस मोड से कई खिलाड़ियों को दिक्कत थी।

इसके विरोधियों का कहना था कि बच्चों और युवाओं को मूर्तिपूजा जैसी चीजों से दूर रखना चाहिए, लेकिन PUBG के एक भाग में खिलाड़ियों द्वारा मूर्तिपूजा किया जाना इस्लाम के विरुद्ध है और बर्दाश्त से बाहर है। उन्होंने प्रशासन से माँग की थी कि बच्चों और युवाओं को इन चीजों से दूर रखने के लिए PUBG के ख़िलाफ़ कार्रवाई की जाए और मूर्तिपूजा वाले भाग को हटाया जाए। बता दें कि PUBG को दक्षिण कोरियन कम्पनी ब्लूहोल इंक ने तैयार किया है।

ये एक सर्वाइवल पर आधारित युद्ध गेम है, जहाँ दर्जनों खिलाड़ियों को ऑनलाइन एक द्वीप पर छोड़ दिया जाता है और वो वहाँ एक-दूसरे के साथ लड़ते हैं। हाल ही में इसमें एक ‘मिस्टीरियस जंगल’, अर्थात रहस्यमयी जंगल वाला अपडेट लाया गया था। गेम के इसी मोड को लेकर सारा विवाद खड़ा हुआ है। कुवैत के एक प्रोफेसर ने कहा था कि किसी को प्रणाम करने या मूर्ति के सामने सिर झुकाने को लेकर इस्लाम में एक नियम है, जिसका PUBG ने उल्लंघन किया है।

प्रोफेसर बस्सम अल शट्टी ने ये भी कहा था कि इस्लाम में सबसे बड़ा पाप है कि अल्लाह के अलावा किसी और के सामने सिर झुकाया जाए। उन्होंने कहा था कि अल्लाह के सामने किसी और के सामने ये सब करना पाप है। प्रोफेसर रशीद अल एलिमनी ने कहा था कि ये गेम समुदाय विशेष के लिए काफ़ी खतरनाक है, क्योंकि इससे नई जनरेशन ब्रह्माण्ड की रचना करने वाले अल्लाह और इस्लाम के नियमों और तोहिंद से विमुख हो जाएगी।’

अब PUBG ने कहा है कि वो अपने खिलाड़ियों की संस्कृति, परंपरा और रीति-रिवाजों की महत्ता को समझते हुए उनका सम्मान करता है। उसने सुरक्षित और बेहतर खेल वातावरण देने की बात करते हुए इस मोड को हटाने की घोषणा की है। इस मोड के बारे में बता दें कि इसमें तीन ‘पावर स्टेचू’ होते थे, जिनके नजदीक जाने से खिलाड़ियों को नए किस्म के हथियार मिलते थे। कई मुस्लिम खिलाड़ियों ने ऐसा करने से इनकार कर दिया था।

कोरोना ने जन्मदिन पर ली DMK विधायक की जान, BMC के डिप्टी कमिश्नर की भी मौत

कोरोना वायरस ने आज (जून 10, 2020) तमिलनाडु में 62 वर्षीय डीएमके विधायक जे अनबझगन की जान ले ली। उन्हें साँस की परेशानी होने पर 2 जून को अस्पताल में भर्ती कराया गया था। आज सुबह तबीयत बिगड़ने के बाद उन्होंने आखिरी साँस ली। संयोगवश आज उनका जन्मदिन भी था

अस्पताल ने बताया कि शुरुआत में, उनका फेस मास्क के माध्यम से ऑक्सीजन थेरेपी के जरिए इलाज किया गया, लेकिन बाद में हालत बिगड़ने पर उन्हें वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया। दिल की परेशानी और किडनी की बीमारी की वजह से उनकी हालत बेहद गंभीर थी।

निजी अस्पताल ‘डॉ. रेला इंस्टीट्यूट एंड मेडिकल सेंटर’ ने एक बयान में कहा, “कोविड-19 के कारण उन्हें निमोनिया हो गया था, उनकी स्थिति गंभीर थी और उनकी तबियत आज तड़के तेजी से बिगड़ गई।” उसने बताया कि वेंटिलेटर पर रखे जाने सहित हर प्रकार की चिकित्सकीय सहायता के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका।

बता दें, जे अनबझगन सबसे पहले नगर निर्वाचन क्षेत्र से 2001 में विधानसभा के लिए चुने गए थे। इसके बाद वह 2011 और 2016 में चेपक-तिरुवल्लिकेनी सीट से चुने गए। अनबझगन की मौत ने विधानसभा में डीएमके की सदस्यों की संख्या घटाकर 97 कर दी है। उनसे पूर्व इस साल फरवरी में भी 2 डीएमके विधायक केपीपी सैमी (तिरुवोटियूर निर्वाचन क्षेत्र) और एस कथवनारायण (गुडियथम निर्वाचन क्षेत्र) का भी निधन हो चुका है।

उधर, महाराष्ट्र में भी बृहन्मुंबई महानगरपालिका के डिप्टी कमिश्नर शिरीष दीक्षित ने कोरोना के कारण मंगलवार को दम तोड़ दिया। शिरीष कोरोना महामारी में बतौर कोरोना वॉरियर कई दिनों से मैदान में थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 2 से 3 दिन पहले उनका कोरोना का टेस्ट हुआ था। हालाँकि, उनमें कोरोना के लक्षण नहीं थे। लेकिन, मंगलवार सुबह उनकी तबीयत खराब हो गई। घर पर जब तक डॉक्टरों की टीम पहुँची तब तक उनकी मौत हो गई थी। उनके परिवार के 3 सदस्यों को क्वारंटाइन कर दिया गया है।

कथित तौर पर महाराष्ट्र में अब तक कोरोना के कारण 55 बीएमसी कर्मचारियों की मौत हुई है। वर्तमान में केवल मुंबई में ही कोरोना वायरस के 51,000 सक्रिय केस है। वहीं मौत का आँकड़ा वहाँ 1760 पहुँच गया है। इसी प्रकार यदि पूरे महाराष्ट्र की बात करें तो कोरोना का आँकड़ा 90,000 पार कर गया है। पूरे राज्य में मरने वालों की गिनती 3, 289 हो गई है।

प्रिय वामपंथियो! अपनी खून की प्यास को सही ठहराने के लिए माँ के गर्भ का ‘इस्तेमाल’ बंद करो

दिल्ली में दंगे होते हैं। करोड़ों की संपत्ति तहस-नहस हो जाती है। किसी से उसका रोजगार छिनता है। कोई अपने परिजनों को हमेशा के लिए खो देता है। कुछ के घर के चिराग बुझ जाते हैं और कहीं-कहीं तो लोगों के हाथ में सिर्फ़ अपनों के टुकड़े आते हैं।

मगर, बावजूद इन सबके वामपंथी गिरोह के लोग प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कहते हैं कि नागरिकता संशोधन कानून के ख़िलाफ़ शुरू हुआ प्रदर्शन बिलकुल शांतिपूर्ण था और इसे आयोजित करने वाले लोगों की मंशा बिलकुल साफ थी।

अब इसी कथन को खींचते-खींचते ऐसे लोग उन सभी आरोपितों की रिहाई की माँग भी कर लेते हैं, जिन पर पुलिस अपनी जाँच के दौरान ताबड़तोड़ एक्शन ले रही है।

सफूरा जरगर, इन्हीं लोगों में से एक है। बस फर्क़ ये है कि सफूरा वर्तमान में गर्भवती है। वरना उस पर लगे आरोप भी उतने ही संगीन और गंभीर हैं, जितने पिंजड़ा तोड़ की सदस्य देवांगना और नताशा पर।

पुलिस ने सफूरा जरगर को पर्याप्त सबूतों के आधार पर गिरफ्तार किया। इसके बाद उसे पुलिस ने तिहाड़ में रखा। बाद में, कई बार गिरोह के लोगों ने सफूरा के गर्भवती होने का हवाला देकर उसके लिए रिहाई की माँग की। मगर, गंभीर आरोपों के तहत हुई गिरफ्तारी के कारण कोर्ट ने भी उसे बेल नहीं दिया।

ऐसे में मीडिया गिरोह ने सफूरा के लिए नया रास्ता खोजा। उन्होंने सफूरा पर मार्मिक लेख लिखने शुरू किए। द वायर, इस क्रम में सबसे तेज निकला। इस मीडिया संस्थान ने अपनी रिपोर्टिंग से सफूरा जरगर के आरोपों के मद्देनजर प्रशासन को अत्याचारी दिखाने का हर संभव प्रयास किया।

हालात ये हो गई कि जब किसी एंगल से काम नहीं चला तो अपने हालिया लेख में द वायर ने भारत में मातृत्व प्रेम को अलग-अलग बताकर उस पर सवाल उठा दिए। इस लेख में, जिसमें भारत में मातृत्व की परिभाषा को सफूरा जरगर के हालातों से तोल दिया गया । उसमें उस हथिनी की भी बात हुई, जिसे अभी हाल में विस्फोटक खिलाकर बेसहारा मरने के लिए छोड़ दिया गया।

अब क्या सोचकर ये तुलना हुई है? ये लेख को लिखने वाली लेखिका ही जाने। मगर, जब ऐसे उदाहरणों का प्रयोग सफूरा के अपराध को ढँकने के लिहाज से केवल इसलिए कर दिया गया हो, कि हथिनी भी गर्भवती थी और सफूरा भी है। फिर भी लोग हथिनी के प्रति संवेदना जाहिर कर रहे हैं, मगर सफूरा को बेल तक नहीं मिल रही।

ऐसे में यह ध्यान में रखने की आवश्यकता है कि जिस समय हथिनी गर्भवती थी और उसके साथ इस अमानवीय कृत्य को अंजाम दिया गया, उस वक्त अगर वह चाहती तो पूरे इलाके में बदहवास होकर काफी तबाही मचा सकती थी। किंतु उसने ऐसा कुछ भी नुकसान करने की बजाय, चुपचाप पानी में जाकर खड़ा होना मुनासिब समझा। 

हथिनी के उलट सफूरा जरगर, जो कि अकादमिक क्वालिफिकेशन के आधार पर पढ़ी-लिखी इंसान मानी जाएगी, उसने सीएए-विरोधी प्रदर्शन को हिंसक बनाने के लिए उसको और विस्तार दिया और बाद में उत्तर पूर्वी दिल्ली में कई हत्याएँ, आगजनी की घटनाएँ हुईं।

वामपंथी आज भले ही इस पूरी हिंसा के लिए छाती पीट-पीट कर कपिल मिश्रा को दोषी ठहराएँ। पर ये बात सब जानते हैं कि आखिर किस निराधार मुद्दे पर शुरू हुआ विरोध देखते-देखते दंगों में तब्दील हुआ। 

द वायर की लेखिका बिलकुल बोल सकती हैं कि मातृत्व की परिभाषा अलग होती है। लेकिन ये कहना कि भारत में मातृत्व का सम्मान नहीं है। बिलकुल बर्दाश्त योग्य नहीं है।

मातृत्व की परिभाषा सबकी दृष्टि में अलग होती है। पर इसको आधार बनाकर सफूरा जरगर के आरोपों के ऊपर मातृत्व का हवाला देना और भारत पर ऊँगली उठाना, केवल जरगर के अपराधों को छिपाने का एक छद्म प्रयास है।

जिस देश में सफूरा के कारण पूरे भारत की मंशा पर सवाल उठ गए। उसी देश के इतिहास में रानी लक्ष्मीबाई जैसी महिलाएँ भी हैं। जिन्होंने पीठ पर संतान को लेकर दुश्मनों को छठी का दूध याद दिलाया था और उसी देश में CRPF कमांडो सुनैना पटेल जैसी जिंदा उदाहरण भी हैं जिन्होंने, गर्भावस्था में भी नक्सलियों के खिलाफ मोर्चा सँभाला।

अब बताइए, संदर्भों को देखते हुए क्यों न रहे मातृत्व की परिभाषा अलग-अलग? सुनैना पटेल जैसी एक वो महिला, जिसने दो महीने का गर्भ धारण किए अपनी ड्यूटी ज्वाइन की और अंत तक अपना फर्ज निभाते-निभाते बच्चे को जन्म दिया। और दूसरी और वो महिला, जिसने गर्भावस्था के पहले माह में लोगों को भड़काने की साजिश रची और बात जब कुकर्मों के अंजाम की आई, तो उसी गर्भ को आड़ बनाकर अपने लिए दया माँगने लगी।

आज, लोकतंत्र की बातें करने वाले ही ये बताएँ कि किस किताब में लिखा है कि गर्भवती होने के बाद लोगों को भड़काओ और जब पकड़े जाओ तो विक्टिम कार्ड खेल लो? आज सोशल मीडिया पर गिरोह का दोहरापन देखकर ऐसे तमाम सवाल तैर रहे हैं। 

जो कुछ भी उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुआ, उसे भुला पाना असंभव है। दिलबर नेगी के साथ हुई क्रूरता, अंकित शर्मा के साथ हुई बर्बरता, इस्लामिक नारों के साथ गली में फेंकी गई विनोद कुमार की लाश… सबकी सिर्फ़ एक ही माँग है कि जो फरवरी माह में हुआ, उसे भड़काने वाला हर अपराधी सलाखों के पीछे हो या अपने जुर्म मुताबिक उपयुक्त सजा पाए।

सफूरा जरगर के लिए रिपोर्ट में मानवीय दृष्टिकोण रखने से पहले समझ लीजिए कि प्रेगनेंट होना किसी भी महिला को उसके अपराधों से मुक्ति नहीं दिलाता है। हाँ, स्वास्थ्य सुविधाएँ उस महिला को उपलब्ध करवाई जाती है, जो सफूरा को वर्तमान में करवाई जा रही है। मगर, बावजूद इसके गिरोह के ये प्रयास बताते हैं कि आज वामपंथी और कट्टरपंथी अपनी खून की प्यास को सही ठहराने के लिए माँ के गर्भ का इस्तेमाल करने लगने हैं।

जहाँ उन्हें ये याद नहीं रह गया कि जिस मामले में सफूरा गिरफ्तार हुई है, उसी के कारण 50 से ज्यादा निर्दोष लोगों की लाशें गिरी थीं और राष्ट्रीय राजधानी ने 1984 में सिखों नरसंहार के बाद मुख्य रूप से हिंदुओं को निशाना बनते देखा था। 

उस समय अनिल स्वीट हाउस में काम करने वाले दिलबर सिंह नेगी के हाथ-पाँव को दंगाइयों की भीड़ ने तलवार से काटा था और बाद में बचे शव या कहा ये भी जाता है कि ज़िंदा ही उनको आग में जलने के लिए फेंक दिया था।

उन्हीं जैसे लोगों के भड़काने की वजह से इस्लामिक भीड़ खुलेआम सड़कों पर आ गई थी और मौका पाते ही उन्होंने अंकित शर्मा को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया। सबसे पहले इस उन्मादी भीड़ पर अंकित को ताहिर हुसैन की बिल्डिंग में खींचकर ले जाने और धार-दार हथियार से ताबड़तोड़ वार कर मौत के घाट उतार देने का आरोप है। बाद में अंकित का शव चाँद बाग नाले से बरामद हुआ।

उन्हीं जैसे तथाकथित क्रांतिकारियों ने नॉर्थ ईस्ट दिल्ली के कट्टरपंथियों को इतनी हिम्मत दी कि ‘अल्लाह हू अकबर’ के नारे के बीच में उन्होंने विनोद को मार डाला और सभी हिंदुओं को धमकी दी कि वह पूरी रात उन्हें ऐसी लाशें भेजेंगे।

इसके बाद 19 साल के विवेक के सिर में ड्रिल मशीन से हमला किया गया और घर से बच्चे के लिए दूध लेने निकले दलित दिनेश को भी गोली मारकर खत्म कर दिया गया। दिलीप कुमार की दुकान जली, अनूप कुमार के गर्दन में गोली लगी।

इन सब घटनाओं का जवाब कौन देगा? क्यों न किया जाए सफूरा से सवाल? दिल्ली दंगे क्या कोई फिल्म का सीन था, जिन्हें स्मृतियों से डिलीट कर दें? या कोई काल्पनिक घटना थी, जिसे हिंदुओं ने अपने मनमुताबिक गढ़ लिया? सब रची-रचाई साजिश थी। जिसे सुनियोजित ढंग से अंजाम दिया गया।

अब सफूरा का पूरे दंगों में क्या रोल था? ये सब सिद्ध करना दिल्ली पुलिस का काम है। किंतु बेवजह एक आरोपित के लिए इतनी संवेदनाएँ उड़ेलना, इस बात को प्रदर्शित करता है कि सफूरा की आड़ में आज भी भारत की छवि को बिगाड़ने का प्रयास वामपंथियों द्वारा जारी है। फर्क शायद सिर्फ़ ये है कि पहले हिन्दूफोबिया के बैनर तले लेख लिखे जा रहे थे, अब मातृत्व भावना को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। पहले आतंकियों का प्रोफेशन खोजा जा रहा था, अब सफूरा के लिए लेखों में स्कॉलर जैसे शब्द का इस्तेमाल हो रहा है।

अगर, आज भारत की न्यायपालिका सफूरा के गर्भवती होने के बावजूद उसके लिए ऐसे कड़े निर्णय ले रही है, तो इस बात को समझिए। सफूरा पर तय आरोप छोटे-मोटे नहीं है और यदि वामपंथी उन आरोपों को झुठला नहीं सकते हैं, तो उनका कोई अधिकार नहीं है कि वो पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठाए या दिल्ली हिंसा के किसी आरोपित को माफ करने की बात कहें।

आज से पहले भी कई गर्भवती महिलाओं ने जेल में अपनी सजा काटी है। संभवत: उनमें से अधिकांश हिंदू भी हों। मगर, कभी इस गिरोह ने उनके लिए अपनी आवाज बुलंद नहीं की। लेकिन जैसे ही सफूरा जरगर गिरफ्त में आई, उसकी पढ़ाई-लिखाई से लेकर उसकी बौद्धिकता तक को आधार बनाकर दिल्ली पुलिस को गलत साबित करने का प्रयास हुआ। शायद इसीलिए, ये बात सच है कि सबका मातृत्व एक जैसा नहीं होता। वामपंथियों से ऐसा प्रेम चाहने के लिए आरोपितों को समुदाय विशेष से होना पड़ता है और दूसरा अपराध करने के दौरान उसे प्रेगनेंट होना पड़ता है।