लॉकडाउन में फॅंसे प्रवासी मजदूरों को उनके घर तक पहुॅंचाने के लिए रेलवे ने श्रमिक स्पेशल ट्रेनों की शुरुआत की। इस पर विपक्षी पार्टियॉं शुरुआत से राजनीति करने में जुटी हैं। इसी कड़ी में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे कोरोना एक्सप्रेस बता दिया है।
ममता बनर्जी ने कहा कि रेलवे हजारों प्रवासी श्रमिकों को एक ही ट्रेन में भेज रहा है, अधिक ट्रेनें क्यों नहीं दी जा रही हैं? उन्होंने पूछा कि क्या रेलवे श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के नाम पर कोरोना एक्सप्रेस चला रही है?
ममता बनर्जी ने दावा किया, ”यह सामाजिक मेलजोल से दूरी का पालन किए बगैर किया जा रहा है।” मुख्यमंत्री ने कहा, “क्या भारतीय रेल श्रमिक स्पेशल ट्रेनों के बजाय ‘कोरोना एक्सप्रेस’ ट्रेनें चला रही है?” उन्होंने यह भी पूछा कि अन्य राज्यों से लौट रहे प्रवासी श्रमिकों के लिए और अधिक ट्रेन क्यों नहीं चलाई जा रही है?
सीएम ममता ने इस दौरान श्रमिक ट्रेनों से लौट रहे प्रवासी मजदूरों पर सवाल उठाते हुए कहा कि पश्चिम बंगाल में पिछले दो महीने से कोरोना वायरस संक्रमण को नियंत्रित करने में सफलता मिली थी। लेकिन अब मामले बढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि बड़ी संख्या में लोग लौट रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि इस बयान के अलावा आज ममता बनर्जी ने राज्य में धार्मिक स्थलों को खोले जाने की अनुमति भी दे दी। बनर्जी ने कहा कि पश्चिम बंगाल में 1 जून से धार्मिक स्थलों को खोला जा सकता है, लेकिन किसी भी तरह के धार्मिक आयोजन की अनुमति नहीं होगी।
All places of worship, mandir, masjid, gurudwara…will open, but not more than 10 people will be allowed, no assembly at religious places. This will be implemented from 1st June: West Bengal CM Mamata Banerjee. #CoronavirusLockdownpic.twitter.com/kmXfsvxY7h
उन्होंने कहा, “हर धार्मिक स्थल मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा खुलेंगे। लेकिन 10 से ज्यादा लोगों को इकट्ठा होने की अनुमति नहीं होगी। न ही कोई धार्मिक आयोजन होगा। ये नियम 1 जून से लागू होगा।”
इसके अलावा राज्य के सभी चाय और जूट उद्योग भी एक जून से संचालित होने लगेंगे। वहीं, 8 जून से सभी कर्मचारियों के काम पर लौटने का भी ऐलान किया है। उन्होंने कहा कि 8 जून से 100 प्रतिशत क्षमता के साथ सभी सरकारी और निजी दफ्तर खुल जाएँगे। मगर, स्कूल जून में बंद रहेंगे।
कोरोना संकट के बीच उत्तरप्रदेश के मेरठ के एक मेडिकल कॉलेज में शुक्रवार (मई 29, 2020) को बंदरों के कारण हड़कंप मच गया। खबरों की मानें तो यहाँ एक बंदर, लैब तकनीशियन से कोरोना संदिग्ध का ब्लड सैंपल छीनकर भाग गया। जब अस्पताल स्टॉफ ने उसका पीछा किया तो वह पेड़ पर चढ़ गया। बाद में उसे किट चबाते देखा गया।
इस दौरान अस्पताल प्रशासन ने उसका वीडियो भी बनाया। जिलाधिकारी ने इस संबंध में कहा कि अभी उनके संज्ञान में ये मामला नहीं आया है। लेकिन वह इसकी जाँच जरूर करेंगे।
In a shocking incident, a monkey snatched blood samples of Covid-19 patients being taken to the LLRM lab. Inquiry set up & the lab technician has been asked to give written explanation about why did he continue to make a video instead of asking for help.#Meerut#Coronaviruspic.twitter.com/N2bCeO2QA2
इस घटना की वीडियो धड़ल्ले से सोशल मीडिया पर शेयर हो रहा है। मेडिकल कॉलेज के प्रमुख अधीक्षक डॉ. धीरज बालियान ने बताया कि तकनीशियन ने उनसे इस संबंध में शिकायत की है। उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य कर्मचारियों से बंदर सैंपल लेकर भागे। उन्होंने पेड़ पर बैठकर किट को फाड़ा और सैंपल को नष्ट कर दिया। बाद में संदिग्धों के सैंपल दोबारा लिए गए।
डॉ. बलियान ने यह भी बताया कि बंदर चूँकि सैंपल लेकर पेड़ पर चढ़ा, तो उसे तोड़ते टाइम उसकी बूँद जमीन पर जा गिरी। मगर, अभी तक उस जगह के संपर्क में कोई नहीं आया है।
#WATCH Meerut: A troop of monkeys took away blood samples of some patients collected for routine tests, from lab technicians at Meerut Medical College, today. SK Garg, Principal, Meerut Medical College says,”Samples taken away by monkeys do not include #COVID19 swab test samples” pic.twitter.com/GKM1J2sjIC
बता दें, इस मामले पर मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉक्टर एसके गर्ग ने बाद में सफाई देते हुए कहा कि जो सैंपल बंदर ले गए हैं, वो कोरोना के स्वैब टेस्ट के लिए सैंपल नहीं थे। बल्कि कोरोना के मरीजों के रूटीन चेकअप के लिए भेजे गए सैंपल थे। इसलिए कोरोना के जिन तीन मरीजों के सैंपल बंदरों ने छीने उन्हें बाद में फिर से ले लिया गया।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, बंदर के भागने के बाद इलाके में दहशत है। लोगों का कहना है कि कहीं सैंपल से बंदर संक्रमित न हो जाएँ। वन विभाग के लिए उस बंदर को चिह्नित करना मुश्किल है।
#WATCH Meerut: A troop of monkeys took away blood samples of some patients collected for routine tests, from lab technicians at Meerut Medical College, today. SK Garg, Principal, Meerut Medical College says,”Samples taken away by monkeys do not include #COVID19 swab test samples” pic.twitter.com/GKM1J2sjIC
दूसरी ओर टाइम्स की पत्रकार इशिता भाटिया ने सूचना दी है कि अस्पताल प्रशासन ने बंदर का वीडियो बनाने वाले स्वास्थ्यकर्मी को नोटिस दे दिया है। उससे इस बात का स्पष्टीकरण माँगा गया है कि आखिर उसन उस वक्त लोगों से मदद माँगने की बजाय वीडियो क्यों बनाई और बाद में उसे लीक क्यों किया?
उल्लेखनीय है कि इस मामले के सामने आने के बाद राजनीति भी शुरू हो गई है। यूपी कॉन्ग्रेस ने ट्वीट किया, “मेरठ मेडिकल कॉलेज में एक बंदर कोरोना मरीजों के सैम्पल्स लेकर भाग गया। मेरठ में कोरोना संक्रमण लगातार बढ़ा है और लापरवाही का आलम देखिए। खैर सरकार इस पर भी नया झूठ लेकर आएगी।”
गोवा भारत के सबसे छोटे राज्यों में से एक है। रमणीय समुद्र तट, नीले पानी, सुनहरी रेत और सैलानियों के आकर्षण का केंद्र भी। लेकिन इसके अतीत में भयवाह सच मौजूद हैं। यह हिन्दुओं का दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि इस छोटे से राज्य में आज बचे हुए हिन्दुओं को अपनी पहचान ऐसे स्मारकों में तलाशनी पड़ रही है, जिन्हें इसाई मिशनरियों ने उन्हीं के रक्त से कभी सींचा था।
भारत के पश्चिमी तट पर स्थित गोवा के वेल्हा (पुराने) में चर्च और आश्रम, पुर्तगाली शासन के दौर से ही मौजूद हैं। 16वीं और 17वीं शताब्दी के बीच पुराने गोवा में व्यापक स्तर पर चर्चों और गिरजाघरों का निर्माण किया गया था। इनमें शामिल हैं– बेसिलिका ऑफ बोम जीसस, सेंट कैथेड्रल, सेंट फ्रांसिस असीसी के चर्च और आश्रम, चर्च ऑफ लेडी ऑफ रोजरी, चर्च ऑफ सेंट ऑगस्टीन और सेंट कैथरीन चैपल! इन चर्चों और आश्रमों को 1986 में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया था।
इन गिरिजाघरों में रखे गए अधिकांश चित्र लकड़ी के बॉर्डर से घिरे हैं। ये इसाई मिशनरी ‘सेंट’ ज़ेवियर के मकबरे को सजाने के लिए इस्तेमाल किए गए फूलों के डिजाइन जैसे ही हैं। पत्थर और लकड़ी की मूर्तियाँ, उन पर हुई शानदार उत्कृष्ट नक्काशी देखकर लगता है, मानो गोवा हमेशा से ही इतना शांत और रमणीय था। लेकिन यीशु, मदर मैरी और साईसंतों की पेंटिंग्स के बीच और भी कई ऐसे साक्ष्य अंतिम साँसे ले रहे हैं, जिन पर हिन्दुओं को रौंदा गया, उन्हें यातनाएँ दी गईं। यह सब इसलिए किया गया क्योंकि उन्होंने धर्म परिवर्तन का विरोध किया था और वो ‘बिलिवर’ नहीं बने।
यूँ तो इतिहास में बहुत कुछ दफन है लेकिन एक ऐसा स्तम्भ, जिस पर कभी कहीं भी बात नहीं की जाती, वह है – हाथ काटरो खम्भ (Hath Katro Khambh) या जिसे ‘न्याय का स्तम्भ’ भी कहा जाता है।
‘Hath Katro Khambh’ or ‘Pillar of Inquisition’ – This is where St. Xavier’s missionaries used to chop off the hands of those refusing to convert to Christianity #GoaHistory These same barbarians dare teach us human rights now! pic.twitter.com/8SxJCRvAEr
— MadhuPurnima Kishwar (@madhukishwar) May 28, 2020
इस स्तम्भ के बारे में कभी बात नहीं की गई। हालाँकि, फ्रांसिस ज़ेवियर के नाम पर आज देशभर में कई स्कूल कॉलेज, संगठन और गिरजाघर मौजूद हैं। इसाई मिशनरी धर्म प्रचारक सेंट फ्रांसिस ज़ेवियर (Francis Xavier) पुर्तगाली काफिले के साथ भारत आया था। उसने भारत पहुँचकर ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार किया था। वह ‘सोसायटी ऑफ जीसस’ से जुड़ा था।
16वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, दक्षिण भारत से होने वाले मसालों के व्यापार ने भारतीय बंदरगाह को एक बहु-सांस्कृतिक शहर में बदल दिया। देखते ही देखते पुर्तगालियों ने खुद को यहाँ सत्ता में स्थापित कर लिया। पुर्तगालियों ने सुनिश्चित किया कि वहाँ के स्थानीय लोग भी अब उनके जैसी ही धार्मिक मान्यताओं का पालन करें। वर्ष 1541 में इसाई मिशनरियों द्वारा फरमान सुनाए गए कि सभी हिंदू मंदिरों को बंद कर दिया जाए। इसके बाद, 1559 तक आते-आते तकरीबन 350 से अधिक हिन्दू मंदिरों को नष्ट कर दिया गया था और मूर्ति पूजा पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
सेंट ज़ेवियर ने देखा कि उसके हिन्दुओं के बलात धर्म परिवर्तन के प्रयास पूरी तरह से कामयाब नहीं हो रहे थे। उसे समय रहते यकीन होता गया कि सनातन धर्म की आस्था अक्षुण्ण है। यदि वह मंदिरों को नष्ट करता है तो लोग घरों में ही मंदिर बना लेते हैं। उसने देखा कि लोगों को धारदार हथियारों से काटने, उनके हाथ और गर्दन रेतने और असीम यातनाको देने के बाद भी फेनी (सस्ती शराब) और सनातन धर्म में से लोग सनातन धर्म को ही चुनते और मौत को गले लगा लेते।
निराश होकर ज़ेवियर ने रोम के राजा को पत्र लिखा जिसमें उसने हिन्दुओं को एक अपवित्र जाति बताते हुए उन्हें झूठा और धोखेबाज लिखा उसने कहा कि उनकी मूर्तियाँ काली, बदसूरत और डरावनी होने के साथ ही तेल की गंध से सनी हुई होती हैं।
इसके बाद हिन्दुओं पर यातनाओं का सबसे बुरा दौर आया। फ्रांसिस ज़ेवियर ने गोवा का पूर्ण अधिग्रहण किया। हिन्दुओं के दमन के लिए एक धार्मिक नीतियाँ बनाई और यीशु की कथित सत्ता में यकीन ना करने वाले ‘नॉन-बिलीवर्स’ को दंडित किया जाने लगा।
अक्टूबर, 1560 तक आम जनता के जिन्दा रहने और उनके मरने से लेकर उनके भाग्य का फैसला ईसाई प्रीस्ट (पुजारियों) के हाथों में आ गई। यह सभ्यता की आड़ में आस्था का बेहद क्रूर और वीभत्स अधिग्रहण था। लोगों को ईसाई बनाने के लिए बर्बर हिन्दू-विरोधी कानून लाए गए।
धर्मांतरण के लिए लोगों को ‘विश्वास के कार्य’ (ऑटो-दा-फ़े) की प्रक्रिया से गुजरना होता था, जिसमें नृशंस यातनाएँ दी जाने लगीं। इसके लिए लोगों को रैक पर खींचकर या सूली पर जलाया जाता था। बच्चों को उनके माता-पिता के सामने अंग-भंग किया जाता और उनकी आँखें तब तक खुली रहती थीं, जब तक वे धर्मपरिवर्तन के लिए सहमत नहीं होते थे।
इस घटना के बारे में लिखने वाले इतिहासकारों को भी सख्त यातनाएँ दी गईं। उन्हें या तो गर्म तेल में डालकर जलाया जाता या फिर जेल भेज दिया जाता। ऐसे ही कुछ लेखकों में फिलिपो ससेस्ती, चार्ल्स देलोन, क्लाउडियस बुकानन आदि के नाम शामिल थे। इतिहास में पहली बार हिन्दू भागकर बड़े स्तर पर प्रवास करने को मजबूर हो गए।
शोक की कथा कहता ‘हाथ काटरो खम्भ’
ओल्ड गोवा के कई स्मारकों और संरचनाओं के बीच, पेलोरिन्हो नोवो (Pelourinho Novo/नया स्तंभ) नाम का एक काले बेसाल्ट स्तंभ इतिहास के काले अध्यायों का साक्षी है। गोवा के शोक की कहानी कहता यह स्तम्भ वर्तमान में राजमार्ग पर एक प्रमुख जंक्शन पर स्थित है।
स्थानीय भाषा में इस पेलोरिन्हो नोवो को ही ‘हाथ काटरो खम्भ’ (Hatkatro Khambo) कहा जाता है। इसका शाब्दिक अर्थ है – ऐसा स्तंभ जहाँ हाथों को काटा जाता था। दुर्भाग्य यह है कि समकालीन स्मारकों के विपरीत, यह स्तंभ आज तक भी एक संरक्षित स्मारक नहीं है। यानी यह न तो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) और न ही अभिलेखागार और पुरातत्व निदेशालय, सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है।
इस स्तंभ का एक बहुत ही विवादित इतिहास रहा है। यह हिंदुओं पर पुर्तगाली सनकी शासकों के बर्बरता का जीवंत साक्ष्य है। ईसाइयों द्वारा नॉन-बिलीवर्स (हिन्दू) को इससे बाँधकर उनके अंगों को तोड़ा जाता था। इसे सालों पहले गोवा के बाहरी इलाके में स्थानांतरित कर दिया गया था। अब यह स्तंभ सड़क के केंद्र में स्थित है। जिसे करीब दो बार किसी भारी वाहन ने टक्कर मारी है।
कहा जाता है कि यह स्तंभ एक प्राचीन मंदिर का एक अवशेष है और इसके कुछ हिस्सों से प्रतीत होता है कि यह कदंब राजवंश से सम्बंधित है और इसे पुर्तगालियों ने कई मंदिरों को तोड़कर अपने दरवाजे और खिड़की की सजावट में इस्तेमाल किया था।
इस पर मौजूद शिलालेख इस बात की भी पुष्टि करते हैं कि यह मूल रूप से किसी पुराने मंदिर का स्तंभ था, या संभवत यह प्रसिद्ध सप्तनाथ शिव मंदिर का हिस्सा था।
इस स्तम्भ को लेकर हिंदू समूहों ने पंजिम और ओल्ड गोवा में कई बार विरोध-प्रदर्शन कर इसे एक संरक्षित स्मारक घोषित करने की माँग की है। लेकिन आज तक भी यह उपेक्षा ही झेल रहा है। यह उन शेष विरासतों में से एक है जो 1812 में मिटा नहीं दिए गए।
कुछ समय पहले ही हिंदू जनजागृति समिति के जयेश थली ने कहा था कि स्तंभ श्री सप्तकोटेश्वर मंदिर का अवशेष है जो कदंब वंश के शासनकाल के दौरान अस्तित्व में था और बाद में इसे पुर्तगालियों ने ध्वस्त कर दिया था। इसका उपयोग हिंदुओं और अपराधियों को दंडित करने के लिए किया जाता था। शोधकर्ता और इतिहासकार प्रजल सखरांडे ने स्तंभ के ऐतिहासिक महत्व पर जोर देते हुए कहा कि यह कन्नड़ में एक शिलालेख है।
सभ्यता की आड़ और दिखावे में आज भी कई ऐसे सेंट जेवियर हमारे बीच मौजूद हैं जो इस देश की आस्था को खोखला करने का हरसम्भव प्रयास कर रहे हैं। जो बस इस इन्तजार में हैं कि कब हिन्दुओं के जनेऊ के खिलाफ पुर्तगालियों की तरह ही अध्यादेश जारी किए जाएँ। कब शास्त्रीय संगीत से लेकर भारतीय संस्कृति के विचार को ही ईसाई मिशनरियों के शासन की तरह प्रतिबंधित विषय बना दिया जाए।
उत्तर प्रदेश के कानपुर के कोरोना हॉटस्पॉट इलाके में सपा विधायक इरफान सोलंकी द्वारा सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियाँ उड़ाते हुए बैठक करने का मामला सामने आया है। बैठक का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।
वायरल वीडियो में आप देख सकते हैं कि सपा MLA इरफान सोलंकी रास्ते में बिछी कुर्सियों पर बैठे हुए दिखाई दे रहे हैं। विधायक के साथ कुछ पुलिस वाले भी दिखाई दे रहे हैं। वीडियो में आप देख सकते हैं कि विधायक के आस-पास सैकड़ों की संख्या में लोग सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियाँ उड़ाते हुए खड़े नजर आ रहे हैं।
यह बैठक कानपुर के चमनगंज एरिया में हुई। यह इलाका हॉटस्पॉट है। स्थानीय लोगों ने विधायक इरफान सोलंकी से शिकायत की थी कि पुलिस इस क्षेत्र में जबरन सख्ती कर रही है। लोगों की शिकायत पर विधायक स्थानीय लोगों से मिलने पहुँच गए। विधायक को देखकर बड़ी संख्या में उनके चारों तरफ लोगों की भीड़ जमा हो गई।
इसकी जानकारी जैसे ही चमनगंज पुलिस को हुई तो सीसामऊ सीओ त्रिपुरारी पांडेय पुलिस फोर्स के साथ मौके पर पहुँच गए। सीओ सीसामऊ त्रिपुरारी पांडेय ने बताया कि स्थानीय लोगों ने विधायक को गलत सूचना दी थी। उन्हें अवगत कराया गया कि 45 दिनों से क्षेत्र में हॉटस्पॉट लगा है। 19 मई को भी एक कोरोना का पेसेंट सामने आया था। इस स्थिति में हॉटस्पॉट नहीं हटाया जा सकता है। 21 दिनों बाद ही हॉटस्पॉट को ग्रीन जोन में बदला जा सकता है।
वहीं विधायक का कहना है कि स्थानीय लोगों ने बताया था कि 45 दिनों से हॉटस्पाट बना हुआ है। इस सूचना पर मैं वहाँ गया था। मैं हॉटस्पॉट के भीतर नहीं गया था बाहर से ही लोगों से बात की थी। पुलिस ने जब सही जानकारी दी तो मैं वहाँ से वापस लौट आया था।
इससे पहले उत्तर प्रदेश के जिला अलीगढ़ में बसपा नेता व हिस्ट्रीशीटर मोहम्मद जाहिद के बेटे के निकाह में सोशल डिस्टेंसिग और लॉकडाउन का जमकर मखौल उड़ाया गया था। निकाह में बार बालाओं का डांस हुआ। मामला 26 मई, 2020 का है। कार्यक्रम का वीडियो वायरल होने पर पुलिस ने जाहिद व अन्य के खिलाफ FIR दर्ज किया था।
कोलकाता में पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (STF) को एक बड़ी कामयाबी मिली है। खबर है कि पुलिस ने इस्लामिक आतंकी और जमात-उल-मुजाहिद्दीन बांग्लादेश के टॉप कमांडर अब्दुल करीम उर्फ बोरो अब्दुल करीम को गिरफ्तार कर लिया है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, बांग्लादेशी आतंकी अब्दुल करीम JMB के टॉप लीडर सलाउद्दीन सालेहेन का बेहद करीबी था। उसे बंगाल के मुर्शिदाबाद के सूती पुलिस थाने इलाके से गिरफ्तार किया गया था।
एसटीएफ टीम के सीनियर अधिकारी ने बताया, “अब्दुल करीम उर्फ बोरो करीम को STF ने स्थानीय पुलिस की सहायता से आज (29 मई) सुबह गिरफ्तार किया। उसे कोर्ट में पेश किया जाएगा।”
मीडिया रिपोर्टस के अनुसार, करीम बोधगया विस्फोट में शामिल धुलियन मॉड्यूल का मेन लीडर था और सलाउद्दीन जैसे शीर्ष नेताओं को सक्रिय रूप से ठिकाने खोजने में मदद करता था। इतना ही नहीं आतंकी संगठन जमात-उल-मुजाहिदीन (JMB) के लिए भर्ती अभियान का भी हिस्सा था।
बता दें, पिछले साल केंद्र सरकार ने जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश को प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया था। बांग्लादेश की राजधानी ढाका में साल 2006 में हुए आतंकी हमले का जिम्मेदार जमात-उल-मुजाहिदीन बांग्लादेश को ही माना जाता है। इसमें 17 विदेशी नागरिकों समेत 22 लोगों की मौत हुई थी।
अब्दुल करीम की तलाश कोलकाता पुलिस, NIA व ख़ुफ़िया विभाग को लंबे समय से थी। मगर, वह काफी समय से अपना हुलिया बदल-बदलकर देश के विभिन्न हिस्सों में छिपता फिर रहा था। उसका मुख्य काम युवाओं को भ्रमित करके संगठन से जोड़ना था।
प्रभात खबर की रिपोर्ट के अनुसार एसटीएफ के उपायुक्त आईपीएस अपराजिता रॉय ने बताया कि अब्दुल करीम जेएमबी का टॉप कमांडर रहा है। इसका नाम जेएमबी के तीन टॉप मोस्ट वांटेड आतंकियों की सूची में शामिल है। 2018 में मुर्शिदाबाद में उसके घर से भारी मात्रा में विस्फोटक जब्त किया गया था, लेकिन उस समय वह पुलिस से बचकर भागने में सफल हो गया था।
इसके बाद से वह लगातार अपना हुलिया बदलकर देश के विभिन्न राज्यों में छिपता फिर रहा था। मगर, तब भी इसका मुख्य काम संगठन को मजबूत बनाने का ही था। इसके लिए यह युवाओं को भ्रमित करता था। उन्हें भर्ती कर ट्रेनिंग देता था।
फिलहाल, बोधगया और बर्दवान ब्लास्ट मामले में गिरफ्तार मुख्य साजिशकर्ता कौसर के साथ उसके संबंधों की जाँच STF की टीम द्वारा की जा रही है। इसके अलावा ये भी पता लगाया जा रहा है कि बंगाल में उसने कहाँ-कहाँ अपने संगठन के लिए नए सदस्य जोड़े हैं एवं उसने क्या-क्या आतंकी साजिशें रची थीं।
यहाँ बता दें कि देश में हुए कई आतंकी हमलों में जेएमबी का नाम सामने आ चुका है। एनआईए ने इस संगठन के ख़िलाफ़ कई सबूत भी इकट्ठा कर रखे हैं। साल 2014 में बर्दवान में हुए बॉम्ब ब्लास्ट में जेएमबी के ही दो आतंकी मारे गए थे। सुरक्षा अधिकारियों का ये भी दावा है कि यही संगठन साल 2018 में गया में हुए बम ब्लास्ट के लिए जिम्मेदार था, जिसमें कई लोगों की मौत हुई थी।
तेलंगाना के रंगारेड्डी जिले में 55 वर्षीय मुस्लिम व्यक्ति की हार्ट अटैक से मौत हो गई। इसके बाद कथित तौर पर 6 कब्रिस्तानों ने उसके शव को दफनाने से इनकार कर दिया। दरअसल, दावा किया गया कि मृतक एक बाहरी व्यक्ति था और उसके कोरोनो वायरस मरीज होने की भी आशंका थी।
इसी बीच क्षेत्र के दो हिंदू संदीप और शेखर शोकाकुल परिवार की मदद के लिए आगे आए। उन्होंने श्मशान घाट में मृतक को दफनाने के लिए जगह उपलब्ध कराई।
मृतक मोहम्मद खाजा मियाँ (55) रंगारेड्डी जिले के गंडमगुडा इलाके में करीब दस साल पहले रहने के लिए आए थे। हार्ट अटैक से उनकी मौत हो गई। परिवारवालों ने बताया कि शव लेकर वे लोग नजदीकी कब्रिस्तान पहुँचे। लेकिन यहाँ से उन लोगों को यह कहकर भगा दिया गया कि इससे कोरोना वायरस फैल सकता है।
उसके बाद पीड़ित परिवार शव को लेकर एक के बाद दूसरे, तीसरे और इस तरह से अलग-अलग इलाकों के छह कब्रिस्तान में गए। लेकिन सभी जगह शव को दफनाने से इनकार कर दिया गया। आखिर में इलाके के दो युवक संदीप और शेखर मदद के लिए सामने आए और शव को दफनाने के लिए श्मशान घाट में जमीन उपलब्ध कराई।
परिवारवालों ने बताया कि वे लोग स्थाई तौर पर यहाँ के रहने वाले नहीं हैं, इसलिए उनके समर्थन में कोई नहीं आया। खाजा के बेटे बाशा ने कहा कि हम लोग परेशान हो गए। उम्मीद खो दी कि शायद अब अपने पिता कि लाश दफन नहीं कर पाएँगे, लेकिन उसी समय संदीप और शेखर नाम के दो हिंदुओं ने हमारी मदद की।
वहीं तारीक मुस्लिम शब्बन ने इस मामले को लेकर तेलंगाना स्टेट वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष मोहम्मद सलीम से जाकर मुलाकात की है। साथ ही एक ज्ञापन देकर उन मुतवल्लियों के खिलाफ कार्रवाई करने की माँग की है, जिन्होंने खाजा के शव को कब्रिस्तान में दफनाने से इनकार कर दिया था।
इस मामले को लेकर तेलंगाना राज्य वक्फ बोर्ड ने कब्रिस्तानों की प्रबंध समितियों और देखभाल करने वालों के खिलाफ गंभीर आपराधिक कार्रवाई की चेतावनी दी है। मामले पर तेलंगाना वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष मोहम्मद सलीम ने कहा कि उन्होंने उन कब्रिस्तानों में टीमें भेजी हैं, जिन्होंने मृतक को दफनाने से इनकार किया था। सलीम ने मुस्लिम मृतक को हिंदू श्मशान घाट में दफनाने पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि प्रबंध समितियाँ दफनाने से इनकार नहीं कर सकती हैं। भले ही वह कोई कोरोन वायरस से मृत व्यक्ति हो या फिर गैर स्थानीय या एक यात्री ही क्यों न हो। उन्होंने कहा कि कब्रिस्तान किसी कर्मचारी की व्यक्तिगत संपत्ति नहीं हैं और वे किसी भी मुस्लिम को दफनाने से इनकार नहीं कर सकते।
आपको बता दें कि इससे पहले एक ऐसा ही मामला मल्लापुर के एक कब्रिस्तान में सामने आया था, जहाँ पर कब्रिस्तान की देखभाल करने वाले कर्मचारी ने मृतक मुस्लिम व्यक्ति के बाहरी होने का दावा करते हुए दफनाने से इनकार कर दिया था। इसके बाद मृतक सलीमुद्दीन सिद्दीकी के परिजनों ने कॉन्ग्रेस पार्टी के स्थानीय मुस्लिम नेताओं से मुलाकात की थी, जिसके बाद दूसरे कब्रिस्तान में मुस्लिम व्यक्ति को दफनाने की व्यवस्था की गई थी।
कोरोना वायरस संक्रमण के कारण देश में हुए लम्बे लॉकडाउन से बड़े पैमानें पर प्रवासी मजदूरों और कामगारों की आबादी प्रभावित हुई है। मजदूरों के हालात को देखते हुए उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने शुक्रवार (29मई,2020) को बड़ा फैसला लिया है। उन्होंने कहा है कि पूरे देश से श्रमिकों के लिए निशुल्क ट्रेनों का संचालन आगे भी तब तक जारी रहेगा, जब तक वापस आने के इच्छुक कामगार प्रदेश नहीं लौट आते।
मुख्यमंत्री श्री @myogiadityanath जी ने कहा है कि उत्तर प्रदेश में कार्यरत विभिन्न राज्यों के कामगारों/श्रमिकों, जो वापस जाने के इच्छुक हों, की सकुशल वापसी के लिए इनकी सूची विभिन्न राज्य सरकारों को प्रेषित की जाए। इस संबंध में आवश्यक समन्वय बनाया जाए।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा है कि उत्तर प्रदेश सरकार विभिन्न राज्यों से कामगारों/श्रमिकों की सुरक्षित प्रदेश वापसी के लिए प्रतिबद्ध हैं। हमने इसके लिए केंद्र तथा राज्य सरकार की निशुल्क ट्रेन एवं बस व्यवस्था से अब तक 27 लाख से अधिक कामगार व श्रमिकों की सुरक्षित और सकुशल प्रदेश वापसी कराई है।
मुख्यमंत्री श्री @myogiadityanath जी ने कहा है कि @UPGovt सभी कामगारों/श्रमिकों की सुरक्षित प्रदेश वापसी के लिए कृतसंकल्पित है। अतः प्रदेश वापस आने के इच्छुक श्रमिकों की सूची संबंधित राज्य सरकारों से प्राप्त की जाए, ताकि इनके लिए निःशुल्क ट्रेनों की व्यवस्था कराई जा सके।
प्रदेश सरकार ने राज्य सरकारों से श्रमिकों/कामगारों की सूची उपलब्ध कराने का अनुरोध किया है, जिससे श्रमिकों/कामगारों की प्रदेश वापसी के लिए नि:शुल्क ट्रेनों की व्यवस्था कराई जा सके।
हर हाथ को मिले काम, योगी सरकार की नीति
वहीं योगी सरकार ने मजदूरों के हालात को सुधारने के लिए अलग-अलग योजनाओं की भी पहल कर रही हैं। ताकि गृहराज्य वापस लौटे श्रमिको को रोजगार के लिए वापस अन्य राज्यों में न जाना पड़े।
More than 27 lakh migrant labourers have returned to the state. They were provided train/bus services free of cost, and the state will continue the services till all migrants are brought to the state safely: UP Additional Chief Secretary (Home),Awanish Awasthi #COVID19https://t.co/ADbZhSceRPpic.twitter.com/6cuNOFaozM
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सरकारी आवास पर इंडियन इंडस्ट्री एसोसिएशन व अन्य औद्योगिक संस्थाओं के साथ 11 लाख 50 हजार लोगों को रोजगार के अवसर प्रदान करने के लिए चार एमओयू पर हस्ताक्षर किया।
प्रवासी कामगारों को प्रदेश में रोजगार दिए जाने के संबंध में एम.ओ.यू. पर हस्ताक्षर कार्यक्रम में प्रतिभाग करते मुख्यमंत्री श्री @myogiadityanath जी https://t.co/BdTXTWx732
बता दें, मजदूरों को रोज़गार देने और यूपी में विकास को बढ़ाने के लिए रियल एस्टेट में ढाई लाख, इंडस्ट्री एसोसिएशन में पाँच लाख, लघु उद्योग में दो लाख और सीआईआई में दो लाख लोगों को रोजगार देने पर एमओयू साइन किया गया है।
प्रवासी मजदूरों के लिए नई योजनाएँ
यह बात सभी जानते है कि उत्तर प्रदेश से लाखों की संख्या में लोग अन्य राज्यों में काम के सिलसिले में जाते हैं। लेकिन कितने लोग जाते है इसका अभी तक इसका कोई ब्यौरा सरकार के पास नहीं था। जिसके चलते महामारी के दौरान श्रमिकों को दूसरों राज्यों से लाना या उनका पता लगाना काफ़ी मुश्किल हो गया था।
इस मुश्किल हालत से सबक लेते हुए अब योगी सरकार प्रस्तावित श्रमिक कल्याण आयोग में ऐसा प्रावधान करने जा रही है, जिससे अन्य राज्यों में यूपी के कितने श्रमिक और कामगार है इसका पूरा ब्यौरा सरकार के पास रहेगा।
योगी सरकार घर लौट रहे प्रवासी कामगारों को स्किल डेवलपमेंट की ट्रेनिंग दे रही है, प्रवासियों के हुनर का लाभ लेकर यूपी के अर्थतंत्र को मजबूत करने की दिशा में काम शुरू कर दिया गया है। उनकी विशेषज्ञता के आधार पर उत्पादों और उत्पादन को बढ़ावा देने का भी काम किया जाएगा।
कोरोना संकट के बीच मोदी सरकार के ख़िलाफ़ बोलने के लिए मीडिया को कुछ नहीं मिल रहा तो उसका एक धड़ा श्रमिक ट्रेनों पर अपने झूठों, अटकलों और भ्रमित करने वाली रिपोर्टिंग से सवाल उठा रहा है।
28 मई को सुप्रीम कोर्ट में एक केस की सुनवाई हुई। केस मुख्यत: उन श्रमिकों से संबंधित था, जिन्हें लॉकडाउन के कारण काफी परेशानियों का सामना कर पड़ा रहा है। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट में हुई इस केस की सुनवाई पर जो रिपोर्टिंग हुई, उसने केवल इस बात का खुलासा किया कि आखिर द प्रिंट विपक्षी दलों को फेक न्यूज फैलाने की सलाह देने के बाद खुद भी इस हथकंडे को आजमा रहा है।
द प्रिंट के आर्टिकल की हेडलाइन
दरअसल, गुरुवार (28 मई 2020) की रात प्रिंट ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की। इस लेख में बताया गया कि मोदी सरकार ने आखिरकार इस बात को स्पष्ट कर दिया है कि वह श्रमिक ट्रेन का खर्चा नहीं उठा रही। इसका भुगतान राज्य कर रही है।
इस लेख से द प्रिंट की मंशा साफ थी। वह कहना चाहता है कि मोदी सरकार ने पहले लोगों को भ्रमित किया और अब सुप्रीम कोर्ट के सामने इस बात का स्पष्टीकरण दिया है कि वे श्रमिक एक्सप्रेस के किराए का भुगतान नहीं कर रहे, बल्कि पूरा बिल भरने का दारोमदार राज्य पर है। ध्यान रहे कि यहाँ पर ‘Entire (सम्पूर्ण)’ शब्द का प्रयोग किस तरह प्रवर्तनशील मूल्य (operative value) के लिए किया गया है। इस बात की चर्चा हम आगे लेख में करने वाले हैं।
द प्रिंट की रिपोर्ट का अंश
इस लेख के पहले पैराग्राफ से ही दिख गया कि द प्रिंट अपने पाठकों को ये बताना चाहता है कि मोदी सरकार ने पहले झूठ बोला था कि वह श्रमिक ट्रेनों का 85% प्रतिशत किराया चुकाएगी और राज्यों को 15% चुकाना होगा। अपने पहले पैराग्राफ में द प्रिंट ने केंद्र सरकार की ओर से दिए बयान को स्पष्टीकरण बताया और लिखा कि प्रवासी मजदूरों की टिकटों का भुगतान केंद्र सरकार नहीं कर रही, बल्कि इसका जिम्मा राज्य सरकारों पर है।
कुल मिलाकर किसी भी साधारण पाठक के लिए द प्रिंट ने अपने आर्टिकल में दो बातें मुख्यत: बताई है:
केंद्र सरकार ने झूठ बोला।
प्रवासी मजदूरों के लिए चलाई जा रही श्रमिक ट्रेनों के टिकट का ‘सम्पूर्ण’ खर्चा राज्य सरकार दे रही हैं।
द प्रिंट के आर्किटल का वो भाग, जहाँ उन्होंने रेलवे का बयान लिखा और विरोधियों के झूठ को भी जगह दी।
हालाँकि, बाद में द प्रिंट ने अपने आर्टिकल के आखिरी में रेलवे मंत्रालय के स्पष्टीकरण वाला हिस्सा भी जोड़ा। उन्होंने लिखा कि रेलवे ने द प्रिंट को बताया कि केंद्र सरकार सरकार ने हमेशा कहा कि वह प्रवासी मजदूरों को उनके गृह राज्य भिजवाने के लिए चलाई गई श्रमिक ट्रेनों के लिए रेलवे को 85% भुगतान करेगी और किराया संबंधी भुगतान राज्यों द्वारा किया जाएगा।
अब, इस व्याख्या के बाद भी, जिससे श्रमिक ट्रेनों के किराए पर कोई प्रश्न ही नहीं बचता, उसे लेख में द प्रिंट ने एकदम आखिर में लिखा और उसके बाद विपक्षियों के कुछ झूठे बयानों को एजेंडा चलाने के लिए रिपोर्ट में जोड़ दिया। जबकि लेख की शुरुआत में वह अपना झूठ बोलता रहा कि सरकार ने श्रमिक ट्रेनों पर अब स्पष्टीकरण दिया है।
द प्रिंट की तरह अन्य मीडिया संस्थानों ने भी फैलाया झूठ
द प्रिंट ने अपनी रिपोर्ट में बिजनेस स्टैंडर्ड का लिंक लगाया, जिसमें इसी खबर को ऐसे ही झूठ के साथ फैलाया जा रहा था, बस उसे पेश करने का तरीका अलग था। रिपोर्ट की हेडलाइन थी, “विवादों के बाद सरकार ने श्रमिकों के लिए ट्रेन का 85% किराया रेलवे को अदा किया।”
इसके बाद, लेख के दूसरे पैराग्राफ में उन्होंने भी द प्रिंट की तरह रेलवे प्रशासन के बयान को कोट किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि श्रमिक ट्रेनों की लागत का 85% केद्रीय सरकार द्वारा वहन किया जा रहा है।
मंत्रालय के प्रवक्ता को कोट करते हुए बिजनेस स्टैंडर्ड ने लिखा, “हमने राज्यों के अनुरोध पर विशेष ट्रेनें चलाने की अनुमति दी है। हम मानदंडों के अनुसार लागत को 85-15 प्रतिशत (रेलवे: राज्यों) में विभाजित कर रहे हैं। हमने राज्यों से कभी नहीं कहा कि वे फँसे हुए मजदूरों से पैसा वसूलें।”
अब ये भी साफ है कि बिजनेस स्टैंडर्स ने भी मामले में सारी जानकारी रखते हुए, लेख के भीतर सच्चाई को बताते हुए, हेडलाइन के जरिए पाठकों को भ्रमित करने का प्रयास किया।
केंद्र द्वारा श्रमिक ट्रेनों के लिए दिया जा रहा 85%?
अगर कोई व्यक्ति आम स्थिति में ट्रेनों की टिकटों को देखता है, तो उसे मालूम चलेगा कि उसमें ये साफ लिखा होता है कि उसे चार्ज की गई राशि यात्रा के लिए खर्च की गई लागत का केवल 57% है।
मगर, श्रमिक ट्रेनों के लिए, यात्रा के दौरान सामाजिक दूरी सुनिश्चित करने के लिए केवल 2/3rd सीटें भरी जाएँगी। यानी दाई और बाई ओर की सीटें भरी जाएँगी, लेकिन बीच की सीट खाली रहेगी। इसी प्रकार टॉप और बॉटम बर्थ भी यात्रियों को दिए जाएँगे। मगर मिडिल बर्थ खाली रखा जाएगा। इनके कारण इनका शुल्क घटकर 38% हो जाएगा।
अब चूँकि, श्रमिकों के लिए चलाई गई ये विशेष ट्रेनें हैं और पूरी तरह से खाली होकर वापस होंगी, इसलिए यात्री की लागत को आधे से विभाजित किया गया है, जो कि 19% होगी। मगर बावजूद इसके भोजन और स्वच्छता जैसी यात्री सेवाओं को ध्यान में रखते हुए, राज्य सरकारों को कुल लागत का 15% भुगतान करने के लिए कहा गया था, शेष 85% केंद्र सरकार द्वारा वहन किया गया था।
बता दें, 15% चार्ज जो राज्य सरकार पर लगाया गया है, उसका उद्देश्य ये सुनिश्चित करना है कि राज्य सरकार भी इस मामले पर गौर करें। अगर, यात्रा को रेलवे और केंद्र सरकार मुफ्त करवा देगी तो प्रवासी मजदूरों के अलावा कई ऐसे लोगों की भीड़ इकट्ठा हो जाएगी जो एक राज्य से दूसरे राज्य में सफर करना चाहते हैं। बीते दिनों हमने ऐसे नजारे महाराष्ट्र में बांद्रा के एक मस्जिद के पास और दिल्ली में आनंद विहार में देखे। अगर 15 प्रतिशत से राज्य सरकार की भागीदारी श्रमिकों को भेजने में रहती है, तो वे इसकी जिम्मेदारी लेंगे और प्रवासी मजदूरों की स्क्रीनिंग के बाद उनकी लिस्ट के साथ सामने आएँगे। ताकि उन्हें टिकट मिल सके।
सॉलिस्टर जनरल से आखिर क्या कहा था, जिनके बयान के आधार पर द प्रिंट ने झूठ बोला
उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट में केस की सुनवाई के दौरान सॉलिस्टर जनरल ने कुछ चुनिंदा सवालों के जवाब दिए।
Initially, lockdown was announced and movement was stopped to control the spread of the #COVID19 contagion from urban to rural areas. Now the situation has changed. 3700 special trains for transporting migrants have operated between May 1-27, says Solicitor General Tushar Mehta.
ये सवाल केवल किराए ये संबंधित थे। सॉलिस्टर जनरल ने कहा कि इनका भुगतान सरकार द्वारा किया जाएगा। अब ध्यान रहे कि राज्य सरकार द्वारा दिए जा रहे 15% खर्चे में ही ये किराए का खर्चा आता है। लेकिन, फिर भी द प्रिंट ने फर्जी नैरेटिव गढ़ने के लिए और अपना एजेंडा चलाने के लिए बयानों को तोडा-मरोड़ा और हमेशा की तरह झूठी खबरें फैलाने का काम किया।
द प्रिंट को अपनी रिपोर्टों को पढ़ना चाहिए और उन्हें समझना चाहिए
अब आइए द प्रिंट के शेखर गुप्ता और एटिडर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट के सामने उनकी ही वेबासइट से एक तर्क रखें- जिनका एक लंबा और कथित तौर पर सम्मानजनक कैरियर समाचार पत्रों के साथ रहा है।
एक बहुत पुराना अखबार, जैसे टाइम्स ऑफ इंडिया, जिसमें 48 पेज होते हैं और उसकी कीमत 5 रुपए होती है और इसमें भी 40% डिस्ट्रिब्यूटर्स द्वारा ले लिया जाता है। बाद में मीडिया संस्थान को केवल 2.40 रुपए मिलते हैं। अब पेज छपने की लागत 0.25 है और जब 48 पेज छपते हैं, तो कुल लागत 12 रुपए की आती है। ऐसे में कर्मचारियों और समाचार एजेंसियों का आदि भुगतान करने के लिए कुल लागत 3 रुपए है। सब मिलाकर एक अखबार 15 रुपए में तैयार होता है। तो क्या, उपभोक्ता से केवल 5 रुपए लेना, किसी भी रूप में तार्किक है क्या? जाहिर है नहीं।
बता दें, ये उक्त जानकारी द प्रिंट के ही एक हालिया आर्टिकल में पब्लिश हुई है। इसलिए ये बात साफ है कि शेखर गुप्ता इन बातों को अच्छे से जानते हैं कि अखबारों को विज्ञापनों के जरिए पैसा आता है और सरकार भी अप्रत्यक्ष रूप से न केवल उन्हें एड के लिए पैसे देती है, बल्कि सब्सिडी इत्यादि से अखबारों को आर्थिक मदद देती है। और, अगर अखबार खुले में बिकता है, तो उसके प्रमोटर उसके लिए उसे भुगतान करते हैं।
अब यही तर्क, जो अखबार के लिए आता है, वही ट्रेनों के मामले में भी लागू होता है। बावजूद इसके शेखर गुप्ता की वेबसाइट मानती है कि यात्रा का किराया ही ट्रेन का आखिरी किराया होता है। इसका इस्तेमाल ट्रेन संचालित करने के लिए किया जाता है और जो पार्टी उस किराए की भरपाई करती है, वही पार्टी या सरकार पूरी किराए का भुगतान करती है।
श्रमिक ट्रेनों के मामले में, टिकटों की अंतिम कीमत कुल परिचालन लागत का सिर्फ 15% है, जैसे अखबार की अंतिम कीमत कुल परिचालन लागत का सिर्फ 33% है। फिर भी, शेखर गुप्ता की वेबसाइट बेईमानी से बताती है जैसे कि अंतिम कीमत केवल एक चीज है जो मायने रखती है।
यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि कुछ दिनों पहले शेखर गुप्ता के द प्रिंट ने स्पष्ट रूप से सुझाव दिया था कि विपक्षी दल मोदी सरकार के बारे में फर्जी खबरें फैलाएँ ताकि वे नरेंद्र मोदी सरकार के ‘झूठों’ को काट सकें।
पर, अब द प्रिंट की हरकतों को देखकर ऐसा लगता है कि शेखर गुप्ता की अगुवाई में मीडिया संस्थान ने जो बिंदुवार तरीके विरोधियों को बताए थे, उन पर अब वह खुद अमल करने लगा है। ताकि न केवल मोदी सरकार को बदनाम किया जा सके, अपितु विरोधियों को इसका फायदा पहुँचाया जा सके।
उत्तर प्रदेश के संभल जिले के एक शिव मंदिर से पुजारी और उनके बेटे का शव बरामद किया गया है। पुलिस ने प्रथम दृष्टया इसे आत्महत्या का मामला बताया है। घटना नाखासा थाना क्षेत्र के रसूलपुर सराय गॉंव की है।
शव मिलने की जानकारी मिलते ही बड़ी संख्या में ग्रामीणों की भीड़ मौके पर एकत्र हो गई। पुलिस ने शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है।
Sambhal: Priest&his son found dead at a temple in a village under limits of Nakhasa police station. Yamuna Prasad,Sambhal SP says,”Prima facie it appears to be case of suicide.Bodies are being sent for post-mortem.We’re investigating the matter&further action will be taken”. pic.twitter.com/LCJptcAUfr
रसूलपुर सराय गाँव में स्थित शिव मंदिर पर रहने वाले 60 वर्षीय पुजारी अमर सिंह और उनके 21 वर्षीय बेटे जयवीर का शव शुक्रवार की सुबह संदिग्ध परिस्थितियों में देखा गया। यह खबर गाँव में आग की तरह फैल गई और कुछ ही देर में बड़ी संख्या में ग्रामीणों की भीड़ एकत्र हो गई। बताया जा रहा है कि हर रोज की तरह पिता-पुत्र मंदिर में सो रहे थे।
इसी बीच सूचना पर तत्काल नखासा थाना पुलिस मौके पर पहुँच गई। आसपास के लोगों से पूछताछ के बाद पुजारी पिता-पुत्र के शवों को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। दोनों के गले पर निशान होने की बात कही जा रही है।
मामले पर एसपी यमुना प्रसाद का कहना है कि दोनों ने आत्महत्या की है। उन्होंने बताया कि अमर सिंह काफी बीमार थे और उनका बेटा मानसिक रूप से विक्षिप्त था।
इससे पहले 27 अप्रैल की देर रात उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के अनूपशहर कोतवाली में दो साधुओं की हत्या कर दी गई थी। मंदिर परिसर में सो रहे दोनों साधुओं पर धारदार हथियार से वार कर घटना को अंजाम दिया गया था। घटना के बाद लोगों ने आरोपी को पकड़कर पुलिस को सौंप दिया था।
दोनों साधु शिव मंदिर की देखरेख और पुरोहित का काम करते थे। देर रात मंदिर परिसर में ही दोनों साधुओं की हत्या कर दी गई थी। मंदिर में साधुओं के खून से लथपथ शव पड़े मिले थे। पुलिस ने मामले में एक नशेड़ी को गिरफ्तार किया था।
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस घटना पर संज्ञान ले लिया है। उन्होंने जिलाधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारियों को तुरंत मौके पर पहुँच कर घटना के संबंध में विस्तृत रिपोर्ट देने और दोषियों के विरुद्ध सख्त से सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए थे।
ISKCON के खिलाफ़ कॉमेडी के नाम पर अपमानजनक टिप्पणी करने के मामले में शेमारू एंटरटेनमेंट लिमिटेड (Shemaroo) ने तथाकथित कॉमेडियन सुरलीन कौर (Surleen Kaur) और बलराज स्याल के साथ किसी भी तरह की भागीदारी से खुद को अलग करने की घोषणा करते हुए ISKCON से माफ़ी माँगी है, जिसे कि धार्मिक संस्था ने यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया है कि वो इस बार ऐसा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई कर उदाहरण पेश करेंगे वरना यह चलन बनता जा रहा है।
इस्कॉन के श्रद्धालुओं के खिलाफ विवादित वीडियो के सामने आने पर हुए विवाद के बाद एंटरटेनमेंट कंपनी शेमारू ने कई ट्वीट्स करते हुए इस्कॉन संस्था द्वारा किए जा रहे मानवीय कार्यों की सराहना करते हुए माफ़ी माँगी है।
शेमारू ने ट्वीट में लिखा – “हम सभी अच्छे कामों के लिए, विशेष रूप से आध्यात्मिक और सामाजिक सेवा के लिए बहुत सम्मान रखते हैं, जो कि इस्कॉन ने भारत और अन्य जगहों पर अनगिनत लोगों को लाभ पहुँचाने के लिए किया है। कोरोना वायरस के बीच जारी लॉकडाउन के दौरान इस्कॉन द्वारा 5 करोड़ लोगों को भोजन खिलाने का योगदान प्रशंसनीय है।”
हालाँकि, इस्कॉन के प्रवक्ता राधारमण दास ने शेमारू के इस माफ़ीनामे से संतुष्ट नहीं लगते और उन्होने घोषणा की कि वे बलराज स्याल और सुरलीन कौर के इस वीडियो को प्रसारित करने वाले शेमारू के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेंगे।
दास ने अपने ट्वीट में कहा, “हमें आपका माफ़ीनामा स्वीकार नहीं। यह सनातन धर्म को खत्म करने का एक चलन बन गया है। अब और नहीं। हम इस बकवास पर कार्रवाई से एक उदाहरण सेट करेंगे। अब बहुत हो गया है।”
We don’t accept your apology @ShemarooEnt . We will proceed legally against you, @BalrajSyal & Surleen Kaur. This has become a trend to demean Sanatan Dharma. No more.
दरअसल, धार्मिक संस्था ISKCON (इंटरनेशनल सोसायटी फ़ॉर कृष्णा कॉन्शसनेस) सुरलीन कौर ग्रोवर के एक विवादास्पद वीडियो को लेकर एंटरटेनमेंट कंपनी शेमारू के खिलाफ मुंबई में शिकायत दर्ज कराई गई है। आरोपित कॉमेडियन सिमरन कौर पर उस वीडियो में इस्कॉन, ऋषि-मुनियों और हिंदू धर्म के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियाँ करते हुए उनका मजाक उड़ाने का आरोप है।
इस्कॉन की ओर से जारी शिकायती पत्र में इस्कॉन प्रवक्ता राधारमन दास ने बताया कि सुरलीन कौर इस वीडियो में कह रही है – बेशक हम सब इस्कॉन वाले हैं, पर अंदर से सब ‘हरामी पोर्न वाले’ हैं। इसके अलावा सिमरन कौर ने आस्था को ठेस लगाते हुए यह भी कहा है कि धन्य है हमारे ऋषि-मुनि जिन्होंने थोड़ी सी संस्कृत के जरिए अपने बड़े-बड़े कांड छुपा लिए हैं। यही नहीं सिमरन कौर ने कामसूत्र और खुजराहो का भी उपहास उड़ाया है।
इस्कॉन ने अपनी शिकायत में कहा कि वीडियो में सिमरन कौर द्वारा इस्तेमाल की गई भाषा ना केवल बेहद आपत्तिजनक है, बल्कि अपमानजनक भी है और इससे सनातन धर्म के अनुयायियों, हिंदुओं और इस्कॉन से जुड़े दुनियाभर के लोगों को भी ठेस पहुँची है।
सुरलीन कौर के विवादित वीडियो से शुरू हुआ मामला
सुरलीन कौर का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद इस्कॉन ने शिकायत दर्ज करने का फैसला किया था। हालाँकि, यह वीडियो कुछ महीने पहले ही प्रकाशित किया गया था, लेकिन वीडियो को हाल ही में सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से शेयर किया गया, जिसके कारण यह हिंदू संगठन की नजरों में आया।
सुरलीन कौर ने इस वीडियो में यह भी कहा कि प्राचीन हिंदू संतों ने अपनी ख़ुफ़िया हरकतों को छिपाने के लिए संस्कृत के अपने छोटे से ज्ञान का उपयोग किया। कामसूत्र का उदाहरण देते हुए उसने कहा कि ऋषियों ने कामुक ग्रंथों को लिखने के लिए संस्कृत भाषा का उपयोग किया।
साथ ही कौर ने खजुराहो की मूर्तियों का मज़ाक बनाते हुए कहा कि हिंदू अश्लीलता (पोर्न) पसंद करते हैं। इस वीडियो में सुरलीन कहती हुई नजर आती है कि ‘बेशक हम सब इस्कॉन वाले हैं, पर अंदर से सब हरामी पोर्न वाले हैं।’
इस्कॉन के उपाध्यक्ष और प्रवक्ता राधारमण दास द्वारा जारी की गई शिकायत में उन्होंने कहा है कि कंपनी द्वारा अलग-अलग सोशल मीडिया साइट्स, यूट्यूब चैनल, वेबसाइट www.shemaroome.com आदि पर प्रकाशित वीडियो इस्कॉन समाज के साथ-साथ हिंदू धर्म के अनुयायियों को भी अपमानित करता है।
Dear Sir @CPMumbaiPolice Pls find our complaint agains Surleen Kaur & @ShemarooEnt for using inappropriate words for ISKCON, for our Rishis, Hindus.
This is very unfortunate that there has been narrative building against the followers of Sanatan Dharma on different platforms pic.twitter.com/ldEDY47REY
उन्होंने कहा कि कौर द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा बेहद आपत्तिजनक और अपमानजनक है, और इसने सनातन धर्म, हिंदुओं और इस्कॉन के अनुयायियों को दुनिया भर में बहुत कष्ट दिया है।
मनोरंजन के नाम पर हिंदू धर्म के अपमान की बढ़ती घटनाओं का उल्लेख करते हुए, शिकायत में कहा गया है –
भारत में यह प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है, जहाँ हिंदू धर्म/ सनातन धर्म और हमारे ऋषि-मुनियों, देवताओं आदि का लोगों द्वारा असभ्य भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है दुरुपयोग किया जा रहा है। लोग सनातन धर्म के अनुयायियों के सहिष्णु स्वभाव का दुरुपयोग कर रहे हैं और उनकी गालियाँ और अभद्र भाषा की मात्रा दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है।”
वीडियो के खिलाफ शिकायत में, इस्कॉन ने यह भी बताया है कि मानव चरित्र से समझौता करके सभ्यताओं को कैसे नष्ट किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि एक राष्ट्र की सभ्यता को नष्ट करने के लिए, उनके परिवार के ढाँचे को नष्ट करने, उनकी शिक्षा प्रणाली को नष्ट करने और उनके रोल मॉडल को लज्जित करने जैसे 3 प्रमुख तरीके होते हैं।