Home Blog Page 4803

चुनाव से पहले फिर ‘विशेष राज्य’ के दर्जे का शिगूफा, आखिर इस राजनीतिक जुमले से कब बाहर निकलेगा बिहार

देश में लॉकडाउन की घोषणा हुए दो महीने होने को हैं। कोरोना के शुरुआती दौर में केंद्र के साथ-साथ राज्य सरकारों की प्राथमिकता थी कि संक्रमण की रफ्तार कैसी तोड़ी जाए।

भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के अनुसार बिना लॉकडाउन वाली स्थिति में 15 अप्रैल तक भारत में संक्रमितों की संख्या संभवतः 8.5 लाख के क़रीब होती। लॉकडाउन की नीति ने सरकारों की प्राथमिक आशय को पूरा किया है। यही कारण है कि विश्व की दूसरी बड़ी जनसंख्या होने के बावजूद भारत में संक्रमण की रफ़्तार विश्व के कई देशों से कम है।

लेकिन आर्थिक गतिविधियों के बंद होने की वजह से देश में अन्य कठिनाइयाँ उभर कर सामने आ गई हैं। इनमें गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, पलायन इत्यादि प्रमुख हैं।

भारत में कुल रोजगार में 93% भागीदारी असंगठित क्षेत्र की है, जो इस लॉकडाउन से सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। रिक्शा-ठेला चालक, सब्जी बेचने वाले, ड्राइवर-गार्ड, माली, दूध-अखबार पहुँचाने वाले, मंडी से लेकर कल-कारखानों में दिहाड़ी पर काम करने वाले, घरेलू कार्यों में सहयोग करने वाले और इसी तरह के अन्य कार्यों में लिप्त वर्ग के लोग जो गाँव की गरीबी और बेरोजगारी से भागकर शहरों में अपना भविष्य तलाशने आए थे, आज उनमें से अधिकांश मजदूर बेरोजगार होकर वापस गाँव जाने को प्रयत्नशील हैं।

सैकड़ों मील की दूरी पैदल तय करने की मजबूरी और उनसे होने वाली मौतों ने सोती हुई राज्य सरकारों को भी नींद से जगा दिया है। वर्तमान परिस्थिति में प्रवासी मजदूरों को उनके घर तक पहुँचाना, उनमें संक्रमण की जाँच करना, उनके इलाज का प्रबंध करना वगैरह सरकारों के लिए चुनौती बनी हुई है।

प्रवासी मजदूरों की इस दुर्दशा ने एक बार फिर देश में विभिन्न राज्यों के आर्थिक विकास की असमानता पर गंभीर बहस छेड़ दी है। एक तरफ विकास की सीढ़ी पर आगे खड़े गुजरात, महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा जैसे राज्य हैं। दूसरी ओर बिहार, झारखंड, उड़ीसा, बंगाल जैसे राज्य हैं, जहाँ से पलायित लोग अन्य राज्यों में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की संभावनाएँ तलाशते हैं।

अब कोरोना जनित आर्थिक मंदी से प्रभावित यह वर्ग घर वापसी कर रहा है। ऐसे में इनके गृह राज्य की सरकारें स्थानीय स्तर पर रोजगार पैदा करने के प्रयासों में जुट गई हैं। इस मंदी में सरकारों के राजस्व का भी नुकसान हुआ है। लिहाजा विभिन्न राज्य सरकारों ने केंद्र से अपने लिए आर्थिक सहायता की माँग की है।

प्रवासियों के वापस आने से अन्य राज्यों की तुलना में बिहार ज्यादा प्रभावित हो रहा है। बिहार मुख्यतः कृषि आधारित राज्य है। उत्तर बिहार में बाढ़ और दक्षिण बिहार में सुखाड़ से प्रभावित रहने की वजह से कृषि क्षेत्र वापस आए प्रवासियों को रोजगार देने में बहुत सक्षम नहीं है। ऐसे में बिहार सरकार के आर्थिक सलाहकारों ने बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की माँग एक बार पुनः छेड़ दी है।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अत्यंत करीबी माने जाने वाले एडीआरआई संस्थान के निदेशक ने हालिया प्रकाशित अखबारी लेखों के माध्यम से यह माँग बिहार की जनता तक पहुँचा दी है। हालाँकि इसकी शुरुआत तो स्वयं नीतीश कुमार ने 28 फरवरी 2020 को अमित शाह की अध्यक्षता वाली पूर्वी जोनल काउंसिल की बैठक में ही कर दी थी।

वस्तुतः यह माँग तो हर चुनाव के पहले बिहार की सभी राजनैतिक दलों का प्रमुख मुद्दा बन जाता है। लेकिन सभी पार्टियों के चुनावी मुद्दे में शामिल होने के वावजूद बिहार आज तक विशेष राज्य के वर्ग में शामिल होने में असफल रहा है। तो फिर से इसकी माँग उठाना क्या आगे आने वाले चुनावी समर का सूचक है? या वित्तीय संसाधन जुटाने का एक सार्थक प्रयास, जिससे बिहार आर्थिक मंदी के असर से निकलने और लोगों को रोजगार देने में सक्षम हो?

विशेष दर्जा देने का प्रावधान पाँचवें वित्त आयोग द्वारा सुझाई गई थी। इसके अनुसार राष्ट्रीय विकास परिषद निम्नलिखित 5 कारणों से किसी भी राज्य को विशेष राज्य का दर्जा प्रदान कर सकती थी;

  • पर्वतीय और दुष्कर बहुलता क्षेत्र वाले राज्य
  • अत्यधिक कम जनसंख्या घनत्व अथवा अनुसूचित जनजाति बहुलता वाले राज्य
  • सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण अंतराष्ट्रीय सीमा वाले राज्य
  • आर्थिक और अवसंरचना की दृष्टि से पिछड़े राज्य
  • वित्तीय संकट परिस्थिति

वर्तमान में 11 राज्यों को विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त है। ये राज्य हैं: असम, नागालैंड, जम्मू-कश्मीर, अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, सिक्किम, त्रिपुरा और उत्तराखंड। ये सारे राज्य या तो हिमालय की गोद में हैं या अनुसूचित जनजाति बहुल राज्य हैं।

विशेष राज्य का दर्जा होने के कारण इन्हें कुल केंद्रीय सहयोग राशि का 30% सीधा-सीधा मिल जाता है। विशेष दर्जे वाले राज्य को केंद्रीय सहयोग राशि का 90% भाग अनुदान और 10% भाग कर्ज के रूप में मिलता है। वहीं, अन्य राज्यों के लिए यह क्रमशः 70% और 30% होता है। केंद्रीय योजनाओं के कार्यान्वयन में भी विशेष दर्जे वाले राज्यों को बस 10% साझेदारी करनी होती है।

लेकिन, 14वें वित्त आयोग ने इस विशेष राज्य के दर्जे वाले वर्ग को ही रद्द करने की अनुशंसा की, जिसे सरकार ने मान लिया था। केंद्र सरकार ने वित्त आयोग की उस अनुशंसा को भी स्वीकार कर लिया था, जिसके तहत केंद्रीय राजस्व में राज्य सरकारों की हिस्सेदारी 32% से बढ़ा कर 42% करनी थी। इन अनुशंसाओं के पालन करने के बाद किसी भी राज्य को आर्थिक सहायता के लिए विशेष दर्जा देने का प्रावधान समाप्त हो चुका है।

ऐसे में राज्यों का ‘विशेष दर्जा’ देने की माँग राजनीति से प्रेरित दिखती है, वह भी तब जब केंद्रीय आर्थिक सहायता राशि बिना विशेष दर्जा प्रदान किए भी दी जा सकती है।

जब मध्य प्रदेश बिना विशेष राज्य के दर्जे के बावजूद स्वयं का संसाधन विकसित करते हुए विकास के मापदंडों पर आगे निकल सकता है। जब पंजाब जैसा छोटा और कृषि प्रधान राज्य भी बिना किसी विशेष सहायता के बिहार को हर क्षेत्र में पछाड़ सकता है। फिर प्रश्न उठता है कि बिहार ऐसा क्यूँ नहीं कर पाया? ऐसा न कर पाने की जिम्मेदारी किसकी है?

बिहार के मुख्यमंत्री का तीसरा कार्यकाल पूरा होने जा रहा है और बिहार विकास के अनेक मानकों पर नीचे खड़ा है। बिहार बँटवारे के बाद से अभी तक के समयकाल में तीन चौथाई समय नीतीश कुमार का शासन रहा है। ऐसे में विशेष राज्य के दर्जे की माँग के भरोसे 15 वर्ष के कार्यकाल तक बैठे रहना कहाँ तक उचित है? वह भी तब जब बिहार सरकार केंद्र द्वारा आवंटित विकास राशि का भी पूर्ण व्यय और सदुपयोग नहीं कर पाती।

इन परिस्थितियोंऐसे में विशेष दर्जा की माँग उठना न सिर्फ चुनावी जुमला दिखता है, बल्कि यह वर्तमान सरकार की राज्य के विकास के प्रति उदासीनता और अपनी अकर्मण्यता छिपाने की एक सोची-समझी रणनीति भी है।

राजनीतिक तौर पर भी इस मुद्दे को बिहार की जनता सिरे से खारिज कर चुकी है। 2014 के लोकसभा चुनाव में जब नीतीश कुमार भाजपा से अलग होकर चुनाव लड़े थे तो उन्होंने विशेष राज्य के दर्जे को एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया था। उस चुनाव के नतीजों से स्पष्ट है कि जनता इसे बिहार के विकास के लिए मुद्दा मानती ही नहीं है। ऐसे में पुनः इस माँग को उठना अपने नाकारेपन और नाकाबिलियत से ज्यादा कुछ नहीं हो सकता।

अब जब कोरोना संक्रमण के दौरान प्रदेश के लोगों को रोज़गार के अवसर देने होंगे और विदेशी औद्योगिक इकाइयाँ भी भारत में निवेश के नए अवसर ढूँढ रही है, ऐसे में राज्य सरकारों को अपनी उदासीनता और अकर्मण्यता त्याग कर इस चुनौती को अवसर में बदलना होगा। बिहारवासी इस चुनौती को अवसर के रूप में देख रहे हैं।

पटना स्थित सीएसआरए नामक शोध संस्थान के द्वारा चलाए जा रहे विशेषज्ञों के वक्तव्य ऋंखला में भी बिहार के विकास के लिए कृषि और उद्योग के क्षेत्र में कई अवसरों को चिह्नित किया गया है। सीएसआरए विशेषज्ञों के अनुसार बिहार में कम लागत वाली लघु-मध्यम उद्योग की असीम संभावनाएँ हैं। इनमें मखाना आधारित उद्योग, गन्ना मिल, दुग्ध आधारित उद्योग, आम, लीची, और केला संबंधित फूड प्रोसेसिंग उद्योग, जूट, सिल्क और कपास आधारित कुटीर उद्योग, कृषि आधारित उद्योग वगैरह शामिल हैं।

लेकिन बिहार सरकार और एएडीआरआई निदेशक जैसे आर्थिक सलाहकारों के रवैए से तो यही लगता है कि वे प्रदेश को अभी भी ‘जंगलराज’ बनाम ‘सुशासन’ की घुट्टी पिलाते हुए जनता को विशेष दर्जे की माँग से बरगलाना चाहते हैं।

बदकिस्मती यह है कि प्रमुख विपक्षी दल जैसे राजद और कॉन्ग्रेस भी इसी इसी माँग के सहारे अपनी राजनीति साधना चाहते हैं। ऐसे में यह प्रश्न तो स्वाभाविक ही है कि कब तक बिहार की बदहाली का हवाला देते हुए उसके नेता और राजनीतिक दल केंद्र से विशेष राज्य के दर्जे की भीख माँगते रहेंगे। वो भी तब जब उन्हें पता है कि यह भीख मिलने वाली नहीं है और बिना इस दर्जे के भी बिहार का विकास किया जा सकता है।

इस्लाम, ईसाई और पश्चिम की हीन भावना पर टिका है नेहरूवाद: जवाहर लाल नेहरू को सीता राम गोयल की ‘श्रद्धांजलि’

सीता राम गोयल ने अपनी आत्मकथा ‘How I became a Hindu’ में स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को एक अध्याय समर्पित किया है। ‘Nightmare of Nehruism’ नामक अध्याय में वह जवाहरलाल नेहरू के बारे में बात करते हैं। यह चैप्टर तीसरे पुनर्मुद्रण के दौरान जोड़ा गया था। चैप्टर संख्या 9 के पुनर्प्रकाशित अंश नीचे हैं;

यह सभी जानते हैं कि पंडित नेहरू किसी भी तरह से एक अद्वितीय चरित्र नहीं थे। न ही नेहरूवाद एक अनोखी घटना है। इस तरह के कमजोर दिमाग वाले व्यक्ति और इस तरह की विचारशील प्रक्रियाएँ उन सभी समाजों में देखा गया है, जो कुछ समय के लिए विदेशी शासन के अधीन होने का दुर्भाग्य झेल चुके हैं।

सभी समाजों में हमेशा ऐसे लोग होते हैं जो संस्कृति की श्रेष्ठता के साथ सशस्त्र की श्रेष्ठता को भ्रमित करते हैं। जो स्वयं को एक निम्न वंश का समझने लगते हैं और आत्मविश्वास हासिल करने के लिए विजेता के तरीकों को अपनाते हुए समाप्त हो जाते हैं। जो अपने पूर्वजों से विरासत में मिली चीजों से दोष ढूँढना शुरू करते हैं,और जो अंत में हर उस ताकत और फैक्टर के साथ हाथ मिलाते हैं, जो उनके पैतृक समाज को खत्म करने के लिए तत्पर होते हैं। इस परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो पंडित नेहरू एक स्वजातीय हिंदू से अधिक नहीं थे और नेहरूवाद, हिंदुत्व से पैदा नहीं हुआ है, बल्कि यह इस्लाम, ईसाई और आधुनिक पश्चिम में बैठी गहरीहीन भावना पर टिका हुआ है।

मध्ययुगीन भारत में मुस्लिम शासन ने ऐसे स्वजातीय हिंदुओं के एक पूरे वर्ग का निर्माण किया था। उन्होंने मुस्लिम बाहुल्य की श्रेष्ठता को मुस्लिम संस्कृति की श्रेष्ठता का प्रतीक बताया था। समय के साथ वे विजेता की तरह सोचने और व्यवहार करने लगे थे। वे उस समय बहुत खुश होते थे, जब उन्हें मुस्लिम संस्था में नौकरी मिलती थी, जिससे कि वो सत्ताधारी कुलीन वर्ग के सदस्यों के रूप में जाने जा सकें। उनके पक्ष में एक ही बात कही जा सकती थी कि कारण चाहे जो भी रहा हो, वो इस्लाम में परिवर्तित नहीं हुए और खुद को पूरी तरह से मुस्लिम समाज में मिला लिया। इसी कारण से वे इस्लामी साम्राज्यवाद के ‘ट्रोजन हॉर्सेस’ बन गए थे और अपने लोगों की सांस्कृतिक सुरक्षा को नीचे गिराने की दिशा में काम किया।

जब ब्रिटिश सेना विजयी हुए, तो उसी वर्ग ने ब्रिटिश की ओर अपना कदम बढ़ाया। उन्होंने उन अधिकांश हिंदू पूर्वाग्रहों को बरकरार रखा, जो उन्होंने अपने मुस्लिम आकाओं से उधार लिए थे। इसके अलावा ब्रिटिश प्रतिष्ठान और ईसाई मिशनों द्वारा योगदान की गई सभ्यताओं का भी उन्होंने विस्तार किया। इस तरह ब्रिटिश शासन उनके लिए एक दैवीय व्यवस्था बन गया। इस दोहरी प्रक्रिया का सबसे विशिष्ट परिणाम राजा राम मोहन रॉय थे।

सरदार पटेल की मृत्यु के बाद कुछ वर्षों के भीतर पंडित नेहरू ने जो शक्ति और प्रतिष्ठा हासिल की, उसका अपने गुणों से कोई लेना-देना नहीं था। न तो एक व्यक्ति या एक राजनीतिक नेता के रूप में और न ही एक विचारक के रूप में। वे एक लंबी ऐतिहासिक प्रक्रिया के परिणाम थे, जो एक अलग वर्ग के स्व-पृथक हिंदुओं की वजह से आए थे। यदि यह वर्ग न होता तो पंडित नेहरू कभी शीर्ष पर नहीं आते।

यह कोई अप्रत्याशित घटना या फिर इत्तफाक नहीं है कि नेहरूवादी शासन ने ज्यादातर मामलों में ब्रिटिश राज की तरह व्यवहार किया है। नेहरूवादियों ने भारत को एक हिंदू देश के रूप में नहीं बल्कि एक बहुनस्लीय, बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक कॉकपिट के रूप में देखा है। उन्होंने अंग्रेजों की तरह अल्पसंख्यकों की मदद से मुख्यधारा के समाज और संस्कृति को दबाने की अपनी पूरी कोशिश की। यही कारण है कि उपनिवेशवाद साम्राज्यवाद द्वारा क्रिस्टलीकृत है।

उन्होंने हिंदू समाज को खंडित करने का भी प्रयास किया। वास्तव में, यह हिंदू संस्कृति की हर अभिव्यक्ति को खत्म करने, हिंदू गौरव के हर प्रतीक को खत्म करने और अल्पसंख्यकों की रक्षा के नाम पर हर हिंदू संगठन को सताए जाने के लिए उनके पूरे समय का व्यवसाय है। हिंदुओं को उन राक्षसों के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिन्हें अगर सत्ता में आने की अनुमति दिया जाए, तो वो सांस्कृतिक नरसंहार करेंगे।

देश का विभाजन इस्लामी साम्राज्यवाद की वजह से हुआ था, मगर नेहरूवादियों ने इसे बड़े ही बेशर्मी से इसे हिंदू सांप्रदायिकता के रूप में कलंकित किया। सोवियत साम्राज्यवाद के हितों में कम्युनिस्टों द्वारा भारत के नवजात गणतंत्र पर युद्ध छेड़ा गया था। लेकिन नेहरूवादी इन गद्दारों के लिए माफी माँगने में व्यस्त थे और RSS के सामने हथौड़ा और चिमटा चला रहे थे।

मैं विवरण में नहीं जा रहा हूँ क्योंकि मुझे यकीन है कि जो कोई भी इस विषय पर गौर करेगा, समानताएँ उसके लिए खुद ब खुद स्पष्ट हो जाएँगी। नेहरूवादी फॉर्मूला यह है कि उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि असली अपराधी कौन है, हिंदुओं को हर हाल में अभियुक्त बनाया जाना चाहिए।

यह मेरा बहुत बड़ा सौभाग्य था कि पंडित नेहरू कभी मेरे हीरो नहीं बने। हीरो के पास एक कला होती है कि वो अपने चाहने वालों के विचार और मीमांसा का समाधान करता है, मगर मेरे विचार और मीमांसा को हर बार निस्तेजता का सामना करना पड़ा है। लेकिन बहुत लम्बे समय के लिए नहीं। पंडित नेहरू के सम्मोहन के तहत एक पल के लिए भी नहीं।

एकमात्र नेता, जिनके बारे में मुझे पता था, वे पंडित नेहरू थे। उनके बारे में काफी लोककथाएँ थीं। वह इलाहाबाद में एक महल में रहने वाले एक अमीर आदमी के इकलौते बेटे के रूप में प्रतिष्ठित थे। जो लंदन में अपने कपड़े सिलाता था और पेरिस में लॉन्ड्री कराता था। जब वायसराय उनसे मिलने आए थे, तो उन्होंने चाय बनाने के लिए ईंधन के रूप में उच्च मूल्यवर्ग के करेंसी नोटों का इस्तेमाल किया था।

जब उन्होंने पहली बार खादी के कपड़े पहने थे, तो उनकी कोमल त्वचा पर फफोले पड़ गए थे। बेटे को इंग्लैंड में उनकी स्कूल और कॉलेज की शिक्षा प्राप्त करने के लिए जाना जाता था, उन्होंने वेल्स के राजकुमार की दोस्ती को कलंकित किया, जो उनका सहपाठी था। उन्होंने अपने ही लोगों के खिलाफ विश्वासघात करके बेताज बादशाह होना चुना।

पंडित नेहरू के मंच पर आते ही तालियों की गड़गड़ाहट गूँज उठी। उन्होंने हाथ जोड़कर लोगों का अभिवादन किया। फिर औपचारिक रूप से एक स्थानीय कॉन्ग्रेस नेता द्वारा उनका परिचय दिया गया। लेकिन जो अगली चीजें मैंने देखी उसे देख अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ, मुझे अपनी आँखें मिंचनी पड़ी। महान व्यक्ति का चेहरा लाल हो गया था, वो बाईं ओर मुड़ गया और उसी नेता के चेहरे पर एक जोरदार थप्पड़ लगाया, जो माइक के पास ही खड़ा था। माइक ने काम करना बंद कर दिया था। पंडित नेहरू तेज आवाज में चिल्ला रहे थे जैसे कि कुछ भयानक हुआ हो।

इस बीच माइक ने फिर से काम करना शुरू कर दिया। इसके बाद उनकी आवाज सुनी जा सकती थी। वो कह रहे थे, “दिल्ली की कॉन्ग्रेस के नेता कमीने हैं, जाहिल हैं, नामाकूल हैं। मैंने कितनी बार इनसे कहा है कि इंतजाम नहीं कर सकते तो मुझे मत बुलाया करो, पर ये सुनते ही नहीं।” एक पल के लिए पिन ड्रॉप साइलेंस था और फिर अगले ही पल एक और तालियों की गड़गड़ाहट गूँजी। गाँधी ने मेरे बगल में बैठे आदमी से कहा, “पंडित जी अपने मिजाज (temper) के कारण प्रसिद्ध हैं और लोग उसे इसी तरह से पसंद करते हैं।”  मैं मंच की ओर बढ़ा। थप्पड़ खाने वाले कॉन्ग्रेसी नेता का चेहरा मुस्कुराहट में नहाया हुआ था, जैसे कि उन्होंने कोई प्रतिष्ठित पुरस्कार जीता हो।

इसके बाद जो भाषण हुआ वह और भी निराशाजनक था। मुझे विषय याद नहीं है। यह वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य के बारे में रहा होगा। अब मैं याद कर सकता हूँ कि पंडित नेहरू जिस भाषा में बात कर रहे थे। यह न तो हिंदी थी और न ही उर्दू।

उनके अधिकांश वाक्य व्याकरण या वाक्य-विन्यास के संदर्भ से कोसों दूर थे। कभी-कभी, वह बोलते हुए लड़खड़ा भी रहे थे। मुझे लगा कि वह बहुत खराब वक्ता थे। मैंने कई अन्य लोगों को सुना था, जो इतने प्रसिद्ध नहीं थे, फिर भी बेहतर और अधिक सुसंगत थे। मैंने उनकी भाषा पर गौर नहीं किया होता अगर मुझे नहीं पता होता कि वह एक ऐसे प्रांत से ताल्लुक रखते हैं जो हिंदी और उर्दू दोनों के लिए प्रसिद्ध था।

लेकिन जैसे-जैसे मैं स्टेज की तरफ बढ़ा, यह और भी ज्यादा अशोभनीय था। पंडित नेहरू कॉन्ग्रेस नेताओं की पकड़ से मुक्त होना चाहते थे। उन्हें नीचे कूदने से रोका जा रहा था। ऐसा लग रहा था कि वो इस बात से अंजान हैं कि सामने भीड़ बैठी हुई है। एक पल वह आगे बढ़ रहा था, और अगले ही पल उसे वापस खींचा जा रहा था। और हर समय, वह तेज आवाज में चिल्ला रहे थे।

तभी माइक पर उन्हें कहते हुए सुना गया, “देखना चाहता हूँ इन कमीनों को मैं। बता देना चाहता हूँ इनको कि मैं कौन हूँ। इनकी ये गंदी हरकतें मैं कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता।” हंगामा मच गया। कॉन्ग्रेस नेताओं ने उन्हें पकड़ा हुआ था। तभी उन्होंने अपना दाहिना हाथ ऊपर करके चिल्लाते हुए कहा, “मैं एक शानदार आदमी हूँ।” भीड़ बेतहाशा, लगातार तालियाँ बजा रही थी।

यह घटना 1947 के अंत में या फिर 1948 के शुरू में हुआ। मैं अमेरिका से आए मेरे पत्रकार मित्र से मिलने दिल्ली गया था। मैं कॉफी हाउस में उनके साथ बैठा था, तभी उन्होंने कहा, “सीता, ये आदमी अपने बारे में क्या समझता है कि ये कौन है? सर्वशक्तिमान ईश्वर?” हे ईश्वर?” मैंने उनसे पूछा, “कौन? क्या हुआ है?” उन्होंने मुझे कुछ साधुओं की कहानी सुनाई, जो नई दिल्ली में पंडित नेहरू के निवास के पास अनिश्चितकालीन उपवास पर बैठे थे, और उनसे आश्वासन माँग रहे थे कि गोहत्या बंद कर दी जाएगी।

मेरे दोस्त ने कहा, “मैं कुछ तस्वीरें लेने, और रिपोर्ट इकट्ठा करने के लिए वहाँ गया था। अमेरिकी पाठक भारत की ऐसी कहानियों को काफी पसंद करते हैं। लेकिन जो मैंने देखा वह मेरे लिए एक डरावनी घटना थी। मैं कुछ अंग्रेजी जानने वाले साधुओं में से एक से बात कर रहा था, यह आदमी अपनी बहन पंडित के साथ घर से निकला। ये दोनों हिंदी में कुछ चिल्ला रहे थे। बेचारे साधु अचरज में पड़ गए और खड़े हो गए। इस आदमी ने साधु को थप्पड़ मारा जो हाथ जोड़कर आगे बढ़ा था। उसकी बहन ने भी ऐसा ही किया। वे कुछ कह रहे थे जो बहुत कठोर लग रहा था। फिर वे दोनों वापस चले गए। जितनी तेजी से वे आए थे, उतनी ही तेजी से गायब भी हो गए। साधु ने विरोध में एक शब्द भी नहीं बोला, न ही उनके सामने और न ही उन दोनों के जाने के बाद। उन्होंने यह सब मान लिया था जैसे कि यह सामान्य बात थी।”

मैंने कहा, “लेकिन पंडित नेहरू के मामले में यह सामान्य बात है। वह सारी जिंदगी लोगों को थप्पड़ और लात मारते रहे हैं।” उन्होंने निष्कर्ष निकाला, “मुझे आपके देश के कायदे-कानून की जानकारी नहीं है। लेकिन मेरे देश में, यदि राष्ट्रपति किसी नागरिक पर इतना चिल्लाता है, तो उसे भी पद से जाना होगा। हम इस बदतमीजी को किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं कर सकते, चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो।” मैं खामोश रहा।

***

पंडित नेहरू को हर वक्त इस्तीफा देने की धमकी देने की आदत थी। यह उनका पेटेंट तरीका था कि लोग इसका विरोध करें, कि वह देश के लिए अतिआवश्यक हैं, उनके बिना देश बर्बाद हो जाएगा। वह हर बार अपने पक्ष में एक तूफान उठाने में सफल रहे और जिसने भी उन्हें बाहर निकालने की कोशिश की, उसे उन्होंने बदनाम कर दिया। इस तरह वो घोंघा की तरह सिंहासन से चिपके रहे। ब्रिगेडियर दलवी के शब्दों में, इस्तीफा देने की मंशा से गुजरने के लिए भी उनके पास शालीनता नहीं थी।

‘पूरी डायन हो, तुझे आत्महत्या कर लेनी चाहिए’: रुबिका लियाकत की ईद वाली फोटो पर टूट पड़े इस्लामी कट्टरपंथी

एबीपी की एंकर रुबिका लियाकत अक्सर अपनी बेबाक राय के कारण इस्लामी कट्टरपंथियों के निशाने पर रहती हैं। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ है। रुबिका ने ईद के मौके पर अपनी एक फोटो शेयर की। इस फोटो में वह पीले परिधान में नजर आती हैं।

इस तस्वीर को शेयर करते हुए उन्होंने लिखा- ईद मुबारक और येलो ट्विटर भी। इसके बाद कई यूजर्स ने उन्हें ईद की मुबारकबाद दी। लेकन कट्टरपंथी इस तस्वीर को देखकर बिदक गए।

आलम नाम के यूजर ने रुबिका के इस पोस्ट पर लिखा, “तुझे तो जल्द से जल्द आत्महत्या कर लेनी चाहिए रुबिका। क्योंकि अभी मोदी जिंदा है, तेरी मूर्ति को नागपुर के मुख्यालय मे स्थापित करा देगा, बाद मे मुश्किल होगी।”

इसके बाद सोनू कुरैशी ने लिखा, “अल्लाह माफ करे शक्ल पर दलाली करने के आसार नजर आ रहे हैं, दलाली करना छोड़ दो वरना शीशा देखने में भी शर्म लगेगी।”

वहीं, डार वसीम रुबिका के लिए लिखता है, “भगवा झंडा आप पे अच्छा लगता है, इससे आपके आका खुश होंगे”

जाकिर खान लिखता है, “आप भी मनाती हो ईद? क्योंकि आपको तो खून देखके मजा आता है।”

इसी प्रकार औरंगजेब आलम रुबिका को पूरी डायन बताता है और अली सैम उन्हें दलाल एंकर बताकर कहता है कि रुबिका तुम्हारा कोई धर्म नहीं है। वहीं, कुछ कट्टरपंथी ऐसे भी कमेंट करते दिखते हैं कि रुबिका तुमने पीला रंग क्यों पहना है, तुम पर तो भगवा अच्छा लगता है।

यहाँ बता दें कि ये पहली बार नहीं है, जब रुबिका लियाकत को किसी विशेष अवसर पर मजहबी कट्टरपंथियों ने निशाना बनाया हो। इससे पहले उनके जन्मदिन पर भी कई ऐसे ट्वीट सामने आए थे, जिनमें कुछ ऐसे ही मजहबी ठेकेदारों ने रुबिका के चरित्र पर सवाल उठा दिया था और उनकी पत्रकारिता को एकतरफा बताया था।

साथ ही एक यूजर ने उनके आभार संदेश पर प्रतिक्रिया देते हुए उन्हें मुजरे वाली दलाल कहा था। आरफा नाम की यूजर ने लिखा था, “रुबिका लियाकत देश के लिए एक आतंकवादी से खतरनाक वायरस है। अगर देश में शांति चाहते हो तो ऐसे वायरसों के साथ मत दो इनका बायो काट करो। मुजरे वाली दलाल।”

श्रमिक ट्रेनों में मौत की खबरों पर मीडिया ने फिर से फैलाया भ्रम, रेलवे ने लापरवाही के दावों को नकारा

श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में मौत को लेकर मीडिया लगातार भ्रामक खबरें प्रकाशित कर रहा है। भारतीय रेलवे ने एक बार फिर इस संबंध में प्रकाशित खबरों का खंडन किया है।

बुधवार (मई 27, 2020) को दैनिक जागरण ने एक खबर प्रकाशित की। इसमें दावा किया गया कि लापरवाही की वजह से श्रमिक एक्सप्रेस में चार लोगों की मौत हो गई। रिपोर्ट में कहा गया है कि श्रमिक एक्सप्रेस पर सवार प्रवासी श्रमिकों को भोजन और पानी के लिए तरसना पड़ता है। श्रमिक ट्रेनों के हालात को बदतर बताते हुए कहा कि प्रवासियों की मौत भोजन व पानी नहीं मिलने के कारण हुई।

सोशल मीडिया पर कई लोगों ने, जिसमें पत्रकार भी शामिल थे, ने श्रमिक एक्सप्रेस में भोजन और पानी की कमी को मौत का जिम्मेदार ठहराया।

रिपोर्ट के अनुसार, आजमगढ़ निवासी 45 वर्षीय राम अवध चौहान महाराष्ट्र के कल्याण से एक बस में झाँसी पहुँचे। झाँसी स्टेशन पहुँचने से पहले ही उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। झाँसी स्टेशन पहुँचने पर रेलवे अस्पताल के डॉक्टरों ने उन्हें दवा दी। आराम मिलने पर वे श्रमिक स्पेशल ट्रेन में सवार हुए। कानपुर सेंट्रल स्टेशन पहुँचने से पहले भीमसेन स्टेशन पर अचानकर उनकी हालत बिगड़ी और मौत हो गई।

श्रमिक ट्रेन में हुई मौत को लेकर ऑपइंडिया ने रेल मंत्रालय से संपर्क किया और उनसे इस बारे में जानने की कोशिश की। रेलवे के सूत्रों ने इस बात की पुष्टि की है कि मृतक को ब्लड प्रेशर और ब्लड शूगर की शिकायत थी। डॉक्टरों ने भी उनका इलाज किया था और दवाई दी थी।

इसी तरह, जागरण ने सूरत से वैशाली जाने वाले एक अन्य प्रवासी सरोज का जिक्र किया है। इसमें बताया गया कि 26 मई 2020 को सासाराम से पटना जाने के दौरान ट्रेन में सरोज की मृत्यु हो गई। जागरण ने मृतक सरोज के भाई कृष्णा कुमार का हवाला देते हुए बताया कि दोनों ने सोमवार से ही कुछ नहीं खाया था। हालाँकि, रेलवे के सूत्रों का कहना है कि लापरवाही का आरोप निराधार है और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आने तक कुछ भी नहीं कहा जा सकता है।

जागरण की रिपोर्ट में एक अन्य प्रवासी 52 वर्षीय लालबाबू कामत का उल्लेख भी है। जागरण की रिपोर्ट में कहा गया है कि कामत को कुछ समय पहले लकवा हुआ था और जब रास्ते में उनकी तबीयत खराब हुई तो उन्हें दवाइयाँ भी दी गईं। रेलवे के सूत्रों ने भी पुष्टि की कि जब उनकी तबीयत खराब हुई तो उन्हें दवाइयाँ दी गईं।

इसके साथ ही ट्रेनों में मौत के संबंध में फैलाई जा रही गलत सूचना का खंडन करने के लिए भारतीय रेलवे ने ट्विटर का सहारा लिया। रेलवे ने दैनिक जागरण की रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट लगाते हुए ट्वीट किया, “यह खबर पूर्णत: भ्रामक एवं असत्य है। जिन 4 मौतों का उल्लेख किया गया है उसमें से 2 लोग पहले से ही गंभीर रोग से ग्रसित थे। बाकी 1 व्यक्ति की मौत का कारण पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आने के बाद ही सामने आएगा। चौथे व्यक्ति का कोई भी विवरण नहीं दिया गया है।”

रेलवे ने एक अन्य ट्वीट में लिखा, “भारतीय रेल द्वारा विभिन्न स्टेशनों पर आवश्यकता पड़ने पर यात्रियों को तुरंत चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जाती है। सभी श्रमिक स्पेशल ट्रेनों में अनिवार्य रूप से खाना और पानी सभी यात्रियों को उपलब्ध कराया जाता है। इस खबर में किसी भी रेल अधिकारी का कोई भी पक्ष नहीं लिया गया है।”

इससे पहले मंगलवार (मई 26, 2020) को दैनिक भास्कर ने अपनी इमोशनल स्टोरी में दावा किया था कि ईद के दिन इरशाद नामक बच्चे की ट्रेन में ही मौत हो गई। हालाँकि, रेलवे ने बाद में जब सच्चाई बयान की तो भास्कर के इस ख़बर की पोल खुल गई।

खबर में ये भी दावा किया गया था कि सूरत से सीवान पहुँचने में ट्रेनों को पूरे 9 दिन लग गए। रेलवे ने इस ख़बर को नकारते हुए कहा है कि ये पूरी की पूरी रिपोर्ट अर्धसत्य और गलत सूचनाओं से भरी हुई है। भारतीय रेलवे के प्रवक्ता ने ट्विटर के माध्यम से बताया कि 25 मई को सूरत से दो ट्रेनें 2 दिन मे पहुँच गई थी, इसीलिए 9 दिन वाली बात झूठी है।

रेलवे ने बताया कि वो बच्चा पहले से ही बीमार था और इलाज के बाद उसके परिजन उसे लेकर लौट रहे थे। इसी तरह वामपंथी प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘कारवाँ’ के पत्रकार विद्या कृष्णन ने ट्विटर पर मौत को लेकर फर्जी सूचना जारी की है। कारवाँ के लेखक ने ट्विटर पर दावा किया कि ट्रेन में 10 यात्रियों की भूख से मौत हो गई।

PIB ने इस ट्वीट को फर्जी बताते हुए इसका फैक्ट चेक किया। इसमें PIB ने स्पष्ट किया है कि यह दावा एकदम फेक है और भूख के कारण ऐसी कोई मौतें नहीं हुई है। PIB ने ट्वीट में लिखा कि मौत का कारण उचित कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से ऑटोप्सी के बिना निर्धारित नहीं किया जा सकता है। कृपया असत्यापित खबरें फैलाने से बचें।

राजस्थान: अपने ही आश्रम में पेड़ से लटक गए संत प्रेमदास, वीडियो संदेश में बताया- रेप का आरोप लगा माँग रहे ₹15 लाख

राजस्थान के राजसमंद के दिवेर थाना क्षेत्र के गुना गाँव में महादेव मंदिर के संत प्रेमदास ने रविवार (मई 24, 2020) रात अपने आश्रम में फंदे से लटककर आत्महत्या कर ली। खुदकुशी से पहले प्रशासन के नाम पर उन्होंने वीडियो संदेश रिकॉर्ड किया था।

इस वीडियो में उन्होंने अपने लिए न्याय की माँग की। उन्होंने बताया कि कुछ दिन पहले एक महिला ने उन पर दुष्कर्म का आरोप लगाया था। इसके बाद उस महिला के साथ उसके पति और महिला आयोग की सदस्या समेत 5 लोग उनसे 15 लाख रुपए माँगने लगे। ऐसे में खुद के आत्मसम्मान व संत सम्मान को बचाने के लिए उन्होंने आत्महत्या का कदम उठाया।

स्थानीय रिपोर्ट्स के मुताबिक, महादेव मंदिर के पुजारी प्रेमदास महाराज लगभग 12 वर्षों से मंदिर में पूजा कार्य कर जीवन-यापन करते थे। मगर, पिछले कुछ समय से लोग उनपर अनर्गल आरोप लगाने लगे। इससे वह काफी आहत हुए। मामला ज्यादा बढ़ने पर उन्होंने एक पेड़ से लटकर अपनी जान दे दी।

आत्महत्या से पहले उन्होंने जो वीडियो रिकॉर्ड की, उसमें उन्होंने अपने लिए न्याय की माँग की और बताया कि उनके खिलाफ़ पिछले दिनों जो भी माहौल तैयार हुआ, वो सब साजिश था। इसके पीछे एक गैंग हैं। उन्होंने कहा कि जाने के बाद भले ही वे न्याय देखने नहीं आएँगे, मगर उन्हें न्याय जरूर मिला चाहिए। जिससे अन्यायियों को एक सबक मिल सके।

दैनिक भास्कर की खबर के अनुसार, गुना निवासी एक दंपती कुछ वक्त पहले संत प्रेमदास के आश्रम पेट दर्द की समस्या लेकर पहुँचा। उसके कुछ दिन बाद फिर पति ने अपनी पत्नी को संत के पास जाने को कहा। महिला जब 20 मई को संत के पास से होकर लौटी तो उसने रेप का आरोप लगा दिया।

बाद में दोनों मिलकर दिवेर थाना क्षेत्र गए, यहाँ इनकी शिकायत के आधार पर संत पर केस दर्ज हुआ। जब पुलिस आश्रम गई तो वहाँ संत रामदास नहीं मिले। इसके कारण मंदिर में मौजूद छगनलाल सुथार को संत के आने की सूचना देने के लिए कहा गया।

जब सुबह छगनलाल आश्रम गया तो संत को पेड़ पर लटका पाकर ग्रामीणों को इसकी सूचना दी। इसके बाद उनके शव को देवगढ़ अस्पताल के मोर्चरी में रखवाया गया। मामले की सूचना संत प्रेमदास के परिजनों को भेजी गई और पुलिस ने वीडियो के आधार पर पूरे मामले की जाँच करने को कहा।

जानकारी के मुताबिक, इस घटना के बाद से साधु-संत समाज में काफी रोष है। सब लोग पुलिस से संत प्रेमदास के लिए इंसाफ की माँग कर रहे हैं। लोगों का कहना है कि झूठा आरोप लगाने वालों को फौरन मामले में आरोपित बनाया जाए और उनपर कार्रवाई हो।

यहाँ बता दें कि इस मामले के सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर संत प्रेमदास की वीडियो को शेयर किया जा रहा है और उनके लिए इंसाफ की माँग हो रही है। राजस्थान पुलिस से भी ये सवाल किया जा रहा है कि क्या वे संत प्रेमदास को इंसाफ दिलाएँगे? वहीं, कुछ लोग इस घटना से आहत होकर ये कह रहे हैं कि ये समय है कि पुरुष भी अपने हक में आवाज उठाएँ।

पाताल लोक से हटाई बीजेपी नेता की तस्वीर, MLA नंदकिशोर गुर्जर ने अनुष्का शर्मा पर रासुका लगाने की मॉंग की थी

वेब सीरीज पाताल लोक में अपनी तस्वीर का गलत इस्तेमाल देखकर बीते दिनों लोनी विधानसभा से बीजेपी के विधायक नंदकिशोर गुर्जर ने इसकी प्रोड्यूसर अभिनेत्री अनुष्का शर्मा के खिलाफ शिकायत की थी। शिकायत में उन्होंने विवादित सीरिज में अपनी तस्वीर बिना अनुमति इस्तेमाल करने का आरोप लगाया था। इस शिकायत के बाद निर्माता ने उनकी तस्वीर हटा दी है।

बदली गई तस्वीर

पहले जहाँ सीरीज के पहले एपिसोड में 33 मिनट 20 सेकेंड पर आने वाले एक सीन में हमें नंदकिशोर गुर्जर की तस्वीर देखने को मिल रही थी। वहीं, अब उस जगह कोई और है।

सीरीज में पहले इस्तेमाल की गई तस्वीर

हालाँकि, पहली वाली तस्वीर भी असल तस्वीर नहीं थी। उसे भी छेड़छाड़ कर सीरिज में इस्तेमाल किया गया था। वास्तविक तस्वीर उस समय की थी, जब योगी आदित्यनाथ एक हाइवे प्रोजेक्ट का अनावरण करने गए थे।

वास्तविक तस्वीर

मगर, अनुष्का शर्मा द्वारा प्रो़ड्यूस की गई सीरिज में इसका गलत इस्तेमाल हुआ। सीरीज में इस्तेमाल की गई तस्वीर से सीएम योगी की तस्वीर तो हटा दी गई, लेकिन नंदकिशोर समेत अन्य लोगों की तस्वीर को जस का तस रहने दिया गया।

मामला संज्ञान में आने के बाद नंदकिशोर ने इस मुद्दे को ट्विटर पर साझा किया और अनुष्का के ख़िलाफ़ रासुका के तहत कार्रवाई करने की माँग की थी। उन्होंने इस संबंध में सूचना एवं प्रसारण मंत्री को भी पत्र लिखा। साथ ही तय उद्देश्यों या हिडेन एंजेंडे के साथ आने वाली सीरिजों को सेंसर बोर्ड के दायरे में लाने का अनुरोध किया।

गौरतलब है कि पाताल लोक सीरीज के आने के बाद से अनुष्का शर्मा लगातार विवादों में बनी हुई हैं। अब भले ही उन्होंने भाजपा नेता की तस्वीर एपिसोड से हटवा दी है। मगर, ताजा जानकारी के अनुसार उनपर दिल्ली के मुखर्जी नगर थाने में एक और शिकायत दर्ज हो गई है।

इसकी पुष्टि डीसीपी विजयंता आर्या ने स्वयं की है। उन्होंने बताया कि इस शिकायत को सोमवार को थाने की पेटिका डाला गया था, जिसकी सूचना मंगलवार को उन्हें मिली। अब कानून के आधार पर आगे की कार्रवाई होगी।

इसके अलावा याद दिला दे कि पिछले दिनों लॉयर गिल्ड मेंबर वीरेन सिंह गुरुंग ने भी सीरीज के प्रोड्यूसर अनुष्का शर्मा को लीगल नोटिस भेजा था। वीरेन ने बताया था कि ‘पाताल लोक’ के दूसरे एपिसोड में एक सीन है, जिसमें पूछताछ के दौरान एक महिला पुलिस नेपाली किरदार पर जातिवादी शब्दों का इस्तेमाल करती है। अगर केवल नेपाली शब्द का इस्तेमाल किया गया होता तो कोई दिक्कत नहीं थी पर इसके बाद का जो शब्द है उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। अनुष्का शर्मा इस शो की निर्माताओं में से एक हैं, इसलिए हमने उन्हें नोटिस भेजा है।

इस मामले पर गोरखा एसोसिएशन का भी कहना था कि वेब सीरीज के दूसरे एपिसोड में महिला पात्र के खिलाफ उपयोग की गई लिंग भेदी टिप्पणी से नेपाली भाषी लोगों का अपमान होता है। या तो वेब सीरीज को दिखाना बंद कर देना चाहिए या “पाताल लोक” की टीम को गोरखा लोगों से माफी माँगना चाहिए।

चीनी कंपनियों का भारत में निवेश, भारतीय कंपनियों का पाकिस्तानी प्रोडक्ट लॉन्च: यूँ फँसता जा रहा मोबाइल यूजर

‘रहस्यमय’ कोरोना वायरस के चलते दुनिया भर में चीन विरोधी संवेदनाओं में ज़बरदस्त उबाल है और ‘ड्रैगन को बाहर करो’ का शोर हर कोने में बढ़ता ही जा रहा है। इस सब के बीच इस चतुर वामपंथी देश की भीमकाय टेक कंपनियों की महामारी जनित संकट के बावजूद भारत के फलते-फूलते ऑनलाइन गेमिंग उद्योग में कथित विस्तारवादी रणनीति जारी दिख रही है।

चीन की दो कंपनियों, अलीबाबा और टेन्सेंट, ने खासकर भारत में टेक्नोलॉजी स्टार्ट अप क्षेत्र में खासा निवेश किया है। दोनों ने पिछले तीन-चार साल में तेजी से विकसित हुए भारत के ऑनलाइन गेमिंग क्षेत्र में भी मजबूती से कदम जमाए हैं। ऑनलाइन गेमिंग भारत के उन गिने-चुने क्षेत्रों में से है, जो न केवल कोरोना संकट से अब तक बहुत हद तक अछूता है बल्कि इसके पहले की आर्थिक सुस्ती में भी तेजी से विकसित हो रहा था।

अलीबाबा ने जहाँ अग्रणी भारतीय मोबाइल वॉलेट कंपनी पेटीएम और इसके पेटीएम फर्स्ट नाम के गेमिंग प्लेटफॉर्म में निवेश किया था वहीं टेन्सेंट ने ऑनलाइन गेमिंग क्षेत्र के इकलौते भारतीय यूनिकाॅर्न यानी एक अरब डॉलर से अधिक मूल्यन वाली स्टार्ट अप कंपनी ड्रीम 11 में पैसा लगाया था।

कोरोना संकट के चलते पिछले माह भारत की ओर से चीनी निवेश पर कई प्रतिबंध लगाए गए थे। इसके बाद भी हाल में पेटीएम फर्स्ट गेम्स ने अलीबाबा के निवेश वाली पाकिस्तान स्थित ई कॉमर्स और लाॅजिस्टिक्स कंपनी दराज़ के साथ भी हाथ मिला लिया है। दोनों ने मिल कर दराज़ फर्स्ट नाम से एक गेमिंग प्लेटफॉर्म इस माह बांग्लादेश में लॉन्च किया है और कहा है कि इसे दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया के अन्य देशों में भी विस्तारित किया जाएगा।

दराज़ कंपनी की स्थापना कराची में 2012 में हुई थी और अलीबाबा ने 2018 में एक अघोषित रक़म के निवेश के साथ इसका अधिग्रहण कर लिया था। यह बांग्लादेश, म्यांमार, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका आदि देशों में कारोबार करता है। अलीबाबा पेटीएम का भी सबसे बड़ा अंशधारक है।

चीनी भीमकायों की चतुर रणनीति

हाल की कई रिपोर्टों की मानें तो चीनी कंपनियों की नजर भारत के फैलते मोबाइल आधारित वाणिज्य बाजार यानी मोबाइल काॅमर्स मार्केट और इससे जुड़े अन्य छुपे हुए फायदों पर है।

भारत में अलीबाबा और टेन्सेंट समेत चीनी टेक कंपनियों के निवेश में पिछले कुछ सालों में जबरदस्त उछाल आया है। यह 2013 में महज 21 करोड़ 40 लाख अमेरिकी डॉलर था पर पिछले साल दिसंबर तक लगभग 40 गुना उछाल के साथ आठ अरब डॉलर तक पहुँच गया था। इसमें इन दोनों कंपनियों का भी खासा निवेश बताया जाता है। अलीबाबा जहाँ पेटीएम जैसी कंपनियों में बड़े-बड़े निवेश कर मालिकाना हक हासिल करने की रणनीति पर काम करता दिख रहा है, वहीं टेन्सेंट की नीति कई कंपनियों में अपेक्षाकृत छोटे निवेश करने की लगती है।

क्वार्ट्ज इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, अलीबाबा ने पेटीएम, ज़ोमैटो, बिगबास्केट, स्नैपडील और एक्सप्रेसबीज़ में निवेश किया है। यह तो पेटीएम में अकेला सबसे बड़ा अंशधारक भी बन गया है। टेन्सेंट ने अधिकतर ऐसी कंपनियों में निवेश किया है, जिनकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी कंपनियों में अलीबाबा का निवेश है। इनमें स्विगी, फ्लिपकार्ट, हाइक, ओला, बाइजू तथा ड्रीम 11 आदि शामिल हैं। इन दोनों के अलावा स्मार्टफोन निर्माता चीनी कंपनी शाओमी, टिक-टॉक का स्वामित्व रखने वाली बाइटडांस तथा फाेसून आदि ने भी अलग अलग स्टार्टअप आदि में निवेश किया है। 

भारतीय ऑनलाइन गेमिंग क्षेत्र

ऑनलाइन गेमिंग उन गिने चुने व्यवसायिक क्षेत्रों में से है, जो न केवल कोरोना संकट के पूर्व की सामान्य आर्थिक सुस्ती में भी तेजी से बढ़ रहा था बल्कि इस महामारी और लॉकडाउन के दौर में भी उफान पर है। भारत में करीब दो दशक पुराना यह उद्योग, सस्ते डाटा और स्मार्टफोन की उपलब्धता के कारण पिछले चार-पाँच साल में बहुत तेजी से बढ़ा है। अब 90 प्रतिशत लोग ऑनलाइन गेमिंग मोबाइल फोन के जरिए करते हैं। भारत में इसका कुल सालाना कारोबार पिछले साल 40 फीसदी की वृद्धि के साथ 6500 करोड़ रुपए पर पहुँच गया।

औद्योगिक संस्था फिक्की और पेशेवर सेवा प्रदाता अर्नस्ट एंड यंग के एक अध्ययन के अनुसार, यह 2022 तक लगभग तीन गुना बढ़ कर 18700 करोड़ पर पहुँच जाएगा। एक अन्य रिपोर्ट में इसके 2024 तक 25000 करोड़ रुपए का आँकड़ा पार कर जाने का अनुमान है। पिछले साल के अंत तक देश में ऑनलाइन गेम खेलने वालों की संख्या लगभग 38 करोड़ थी।

मजेदार बात यह है कि लॉकडाउन के दौरान जब अधिकांश तरह के कारोबार ठप हैं या उनमें खासी गिरावट दर्ज की गई है, ऑनलाइन गेमिंग सेक्टर अब भी तेजी से बढ़ रहा है। इस क्षेत्र के जानकारों के अनुसार लॉकडाउन के दौरान ही ऑनलाइन गेम खेलने वालों की संख्या में दो गुने से अधिक का इजाफा हुआ है। ऐसा इसलिए है कि अब लोगों के पास खाली समय अधिक है और इनमें से कई कोरोना संकट से उपजी चिंताओं से ध्यान हटाने के लिए भी मोबाइल फोन पर गेम खेल रहे हैं।

यह क्षेत्र निवेशकों के लिए पंसदीदा माना जाता रहा है और इसमें भी चीनी कंपनियों का खासा दबदबा होता जा रहा है। टेन्सेंट ने देश में फैन्टेसी गेमिंग के सबसे बड़े प्लेटफॉर्म ड्रीम 11 में निवेश किया है, हालाँकि कोरोना संकट के चलते असली खेल नहीं होने से फैन्टेसी गेमिंग कंपनियाँ खस्ताहाल हैं। संभवत: इसीलिए अब अलीबाबा ने नई रणनीति के तहत ऑनलाइन गेमिंग में अपने पैर फैलाने के लिए दूसरे उपाय आजमाने शुरू किए हैं।

ड्रैगन की रूचि

एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार देश की 130 करोड़ से अधिक की आबादी में करीब एक तिहाई लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं और इनमें से अधिकतर सस्ते डाटायुक्त स्मार्टफोन धारक भी हैं। कोरोना संकट से पहले तक स्मार्टफोन का बाजार भी 10 प्रतिशत के सालाना दर से बढ़ रहा था।

केपीएमजी मुंबई के मीडिया और मनोरंजन विभाग के प्रमुख गिरिश मेनन के अनुसार भारतीय परिदृश्य अलीबाबा और टेन्सेंट के लिए बेहद लुभावना है क्योंकि उनका पूरा तानाबाना मोबाइल फोन आधारित पारिस्थितिकी तंत्र यानी इकोसिस्टम वाला ही है। और भारत में अन्य तरह के मनोरंजन की तुलना में फोन पर गेमिंग के लिए बिताया जाने वाला समय सबसे अधिक होता है।

दराज़ फर्स्ट गेम्स के हाल में लॉन्च की घोषणा करते हुए पेटीएम ने अपने बयान में कहा था कि कंपनी दक्षिण एशियाई बाजार में प्रवेश के लिए दराज़ के साथ गठजोड़ कर ‘रोमांचित’ महसूस कर रही है। इसे अभी बांग्लादेश में लॉन्च किया गया है और अंतरराष्ट्रीय विस्तार के भाग के तौर पर जल्द ही इसे नेपाल, श्रीलंका और म्यांमार में भी लाया जाएगा।

पाकिस्तान अथवा चीन के नाम की चर्चा किए बगैर बयान में कहा गया था कि दराज़ के 50 लाख उपभोक्ता हैं और उसके साथ भागीदारी से पेटीएम फर्स्ट गेम्स को गेमिंग के मामले में एशिया के सबसे तेजी से बढ़ रहे इलाकों में पैठ बनाने में मदद मिलेगी। पेटीएम फर्स्ट के मुख्य संचालन अधिकारी सुधांशु गुप्ता ने कहा कि दक्षिण एशियाई क्षेत्र में मोबाइल पर गेम खेलने का चलन यानी मोबाइल गेमिंग एक तरह से विस्फोटक ढंग से बढ़ रहा है और उनकी कंपनी का प्रयास एक समान ‘मिशन’ वाली कंपनियों से भागीदारी का है। दराज़ के चीफ ग्रोथ ऑफिसर एडोआर्ड घीब्रांट ने पेटीएम के साथ गठजोड़ से अपने कारोबारी विकास में और तेजी आने का विश्वास जताया।

डाटा सुरक्षा और अन्य खतरे

जानी-मानी विदेश नीति थिंक टैंक गेटवे हाउस: इंडियन काउंसिल ऑन ग्लोबल रिलेशन्स की एक रिपोर्ट के अनुसार चीनी कंपनियों की ओर से भारतीय टेक स्टार्ट अप में किया जा रहा निवेश अपने मूल्य की तुलना में कहीं बड़ा असर पैदा कर रहा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि टेक्नाेलॉजी की भारत के विभिन्न क्षेत्रों में गहरी पैठ होती जा रही है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि अलीबाबा, टेन्सेंट और बाइटडांस जैसी कंपनियों की अगुवाई में चीनी टेक कंपनियों ने 92 भारतीय स्टार्ट अप में पैसा लगाया है। इनमें पेटीएम, ऑनलाइन शिक्षण वाला बाइजू जैसे नाम शामिल हैं। एक अरब डॉलर से अधिक मूल्यन वाली 30 में से 18 यूनीकॉर्न स्टार्ट अप कंपनियों में चीनी निवेश है। इसका मतलब यह है कि चीन की भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था और इसे प्रभावित करने वाले तकनीकी इकोसिस्टम में पैठ हो गई है।

यह निवेश किसी बंदरगाह या रेलवे परियोजना की तरह आसानी से दिखता नहीं है। यह छोटे आकार वाले अदृश्य निवेश होते हैं, जो कभी कभार ही 10 करोड़ डॉलर से अधिक के होते हैं और ये निजी क्षेत्र द्वारा किए जाते हैं, इसलिए तुरंत इनसे होने वाले खतरे का आभास नहीं हो पाता।

इसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अलीबाबा, टेन्सेंट और अन्य चीनी टेक कम्पनियाँ अगर अपने इंटरनेट संबंधी इकोसिस्टम को भारत में भी दोहराएँ तो इससे सिस्टम संबंधी एक खतरा भी पैदा हो सकता है। ऐसा इकोसिस्टम अंतिम उपयोगकर्ता की पहुँच को नियंत्रित करता है, जिसका अर्थ यह हुआ कि इनसे जुड़े खुदरा कारोबारी, वित्तीय संस्थानों, अन्य कंपनियों और मीडिया आदि को इनके द्वारा तय तकनीकी प्रतिमानों का पालन करना होगा।

इस तरह अलीबाबा और टेन्सेंट, गूगल जैसी स्थिति में आ जाएँगे और वे उपयोगकर्ता की पहुँच को नियंत्रित कर यह तय कर सकेंगे कि कौन सा संगठन सफल या असफल होगा। कल्पना कीजिए कि अगर ऐसी चीनी तकनीक का इस्तेमाल भारतीय अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण एप्लीकेशन्स के लिए हो तो क्या हो।

रिपोर्ट के अनुसार, इन कंपनियों का अपना इकोसिस्टम है, जिसमें ऑलनाइन स्टोर, पेमेंट गेटवे, संदेश सेवाएँ आदि होती हैं। उनका एक निवेश किसी भारतीय कंपनी को इस इकोसिस्टम में खींच सकता है और इसका मतलब इनका अपने डाटा पर नियंत्रण समाप्त हो जाना भी हो सकता है। इसमें कहा गया है कि पेटीएम तथा फ्लिपकार्ट जैसी कंपनियों को तो चीनी कंपनियों ने पूरी तरह अधिग्रहित ही कर लिया है।

तीखी प्रतिक्रियाएँ

भारत में चीनी टेक कंपनियों के निवेश पर गेमिंग क्षेत्र के विशेषज्ञ और कोलकाता स्थित जानी-मानी ऑनलाइन गेम अनुसंधान और विकास कंपनी एबिलिटी गेम्स के संस्थापक और प्रबंध निदेशक सह मुख्य कार्यकारी अधिकारी सूरज चोखाणी ने कहा कि आधुनिक समय में जब पूरी दुनिया एक तरह से वैश्विक गाँव यानी ग्लोबल विलेज में तब्दील हो गई है, किसी भी कंपनी के विकास के लिए अन्य देशों की कंपनियों से तकनीकी गठजोड़ और निवेश अनिवार्य है।

पर जहाँ तक चीन का सवाल है, उसे केवल एकतरफा ढंग से निवेश नहीं करना चाहिए और अपने दरवाजे भी भारतीय कंपनियों के लिए खोलने चाहिए। इससे व्यापार संतुलन भी कायम रह सकेगा। निवेश एकतरफा नहीं होना चाहिए।

जाने माने राष्ट्रवादी कार्यकर्ता, लेखक और जन की बात के संस्थापक प्रदीप भंडारी ने कहा कि भारत को यह देखना चाहिए कि निवेश की आड़ में चीन आर्थिक साम्राज्यवाद फैलाने में सफल न हो जाए। उन्होंने कहा कि कोरोना संकट के बाद से चीन वैश्विक स्तर पर परेशानी में है। ऐसे में यह बेहद जरूरी है कि भारत चीन को किसी सच्चे दोस्त के तौर पर न देखे बल्कि इसे एक ऐसी प्रतिस्पर्धी ताकत के रूप में देखे, जो हमारे रणनीतिक हितों को बाधित कर सकता है।

ऐसे में भारत को चीन के लिए अपने दरवाजे पूरी तरह खुले रखने की नीति की जगह एक ऐसी रूकावट वाली और सावधानीपूर्ण नीति का पालन करना चाहिए जो चीनी निवेश की पड़ताल कर इसके जरिए आर्थिक साम्राज्यवाद के किसी भी प्रयास को रोक सके।

गुजरात के अहमदाबाद स्थित ऑनलाइन गेम खेलने वाले एक गेमर मनोज दवे (परिवर्तित नाम) ने कहा कि चीन और इसकी कंपनियों के तौर तरीकों से उन्हें बहुत खीझ हाेती है। उन्होंने कहा,

“ऐसे समय में जब सरकारी मंजूरी के बिना भारत में किसी तरह के चीनी निवेश पर पूरी रोक लगी हुई है और जब पाकिस्तान पर भी दुनिया भर से सामाजिक और आर्थिक प्रतिबंध लगाए जा रहे हैं, मेरे लिये यह स्तब्धकारी है कि पूर्व में मेक इन इंडिया और राष्ट्रवाद को लेकर लंबी चौड़ी बाते करने वाली पेटीएम जैसी कंपनी चीन समर्थित और पाकिस्तान स्थित कंपनी दराज़ से गठजोड़ कर रही है। मैं तो अब इसे कभी भी नहीं इस्तेमाल करूँगा और अपने मित्रों से भी इसका बहिष्कार करने का आग्रह करूँगा। चीनी पैसे से कारोबार करने वाली कंपनियों का भारत की जनता को निश्चित तौर पर बहिष्कार करना चाहिए।

इस्लाम और हिन्दुत्व को एक मानने की जिद मूर्खता: हिन्दू संतों को अली-मौला गाना बंद करना चाहिए

गत 100 सालों से शुरू हुई अनेक वैचारिक परंपराओं में सबसे बुरी है: सभी धर्मों को एक बताना। कुछ लोगों ने वैदिक ‘‘एकम् सद विप्र बहुधा वदन्ति’’ को सभी रिलीजनों पर लागू कर दिया। मानो सत्य और रिलीजन एक चीज हों। जबकि सत्य तो दूर, भारतीय धर्म भी रिलीजन नहीं है।

धर्म है: उचित आचरण। रिलीजन है: फेथ। यहूदी, क्रिश्चियन, मुहम्मदी, आदि इस फेथ श्रेणी में आते हैं। कोई ‘फेथ’ भयावह, वीभत्स, अत्याचारी भी हो सकता है, इसकी समझ महात्मा गाँधी को थी। भारत के गत हजार साल का इतिहास उन्होंने पढ़ा नहीं, तो सुना अवश्य था। परंतु उसी की लीपा-पोती करने के लिए गाँधीजी ने फेथ को धर्म जैसा बताने की जिद ठानी। उसके क्या-क्या दुष्परिणाम हुए, वह एक अलग विषय है।

वही बुरी आदत कुछ आधुनिक हिन्दू संतों ने अपना ली। गाँधीजी की ही तरह उन्होंने न प्रोफेट मुहम्मद की जीवनी पढ़ी, न उन के कथनों, आदेशों का संग्रह हदीस, न आद्योपान्त कुरान, न शरीयत। न इस्लाम का इतिहास। फिर भी वे इस्लाम पर भी प्रवचन देते हैं। यह जनता से विश्वासघात है, जो उन्हें ज्ञानी मानती है।

ऐसे संत यह मोटी बात नहीं जानते कि इस्लाम केवल 20% धर्म है, शेष 80% राजनीति। अल्लाह, जन्नत, जहन्नुम, हज, रोजा, जकात, आदि धर्म-संबंधी विचार, कार्य इस्लामी मतवाद का छोटा हिस्सा है। इस का बहुत बड़ा हिस्सा है: जिहाद, काफिर, जिम्मी, जजिया, तकिया, दारुल-हरब, शरीयत, हराम-हलाल, आदि। कुल मिलाकर मूल इस्लामी ग्रंथों का एक तिहाई केवल जिहाद पर केंद्रित है। कुरान की लगभग दो तिहाई सामग्री काफिरों से संबंधित है।

इस राजनीतिक सरंजाम का घोषित उद्देश्य है – काफिरों को छल-बल-धमकी-अपमान आदि किसी तरह से धर्मांतरण करना, या खत्म कर देना। यह कुरान, हदीस, सीरा को पढ़ कर सरलता से देख सकते हैं।

प्रोफेट मुहम्मद ने कहा था कि दूसरे प्रोफेटों की तुलना में उन्हें ‘5 विशेष अधिकार’ मिले हैं। इनमें 4 शुद्ध राजनीतिक हैं। पर ये अधिकार उन्हें अरबी लोगों ने नहीं दिए! मक्का के लोगों ने 13 वर्षों तक मुहम्मद के प्रोफेट होने का दावा लगातार खारिज किया। लेकिन जब मुहम्मद ने मदीना जाकर लड़ाई का दस्ता बनाया, आस-पास के कबीलों और व्यापारी कारवाँओं पर हमले किए, उन लूटों का माल अपने दस्ते में बाँटा, तब उन के अनुयायी बढ़े।

उस हथियारबंद दस्ते द्वारा मौत या जिल्लत के विकल्प के सामने हार कर अरबों ने मुहम्मद के सामने आत्मसमर्पण किया। यह सब मुहम्मद की प्रमाणिक जीवनी में, शुरू से ही स्पष्ट दर्ज है। इस प्रकार, मात्र राजनीतिक बल से इस्लाम बढ़ा। वही आज भी उस की ताकत है। क्या इसे धर्म कहना चाहिए?

अरब, मेसोपोटामिया, स्पेन, फारस, अफगानिस्तान से लेकर लेबनान तक इस्लाम ने जिस तरह कब्जा किया और काफिरों को मिटाया, वह तरीके तनिक भी नहीं बदले हैं। हाल में बना पाकिस्तान, बंगलादेश भी प्रमाण है। फिर यहीं, तबलीगी जमात या देवबंदियों के क्रिया-कलाप देख सकते हैं। अफगानिस्तान-पाकिस्तान के कुख्यात तालिबान देवबंदी मदरसों की पैदावार हैं।

क्या इन हिन्दू संतों ने सोचा है कि इन मदरसों के पाठ्य-क्रम, पाठ्य-सामग्री सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती? उन्हें छिपाने का कारण क्या है? ताकि हिन्दू लोग 20% धर्म के पर्दे के पीछे 80% घातक राजनीति को न देख पाएँ।

मुरारी बापू जैसे कथावाचक अली को कोई संत-महात्मा समझ कर उसके नाम पर झूमते हैं। जबकि अली एक खलीफा, यानी सैनिक-राजनीतिक कमांडर थे। अली ने ही कहा कि बकौल मुहम्मद, ‘‘जो इस्लाम छोड़े, उसे फौरन मार डालो।’’

अरबों ने डर से इस्लाम कबूल किया था, इस का सबूत यह भी है कि जैसे ही मुहम्मद की मृत्यु हुई, असंख्य लोगों ने इस्लाम छोड़ दिया! तब खलीफा अबू बकर को समुदाय के लोगों को इस्लाम में जबरन रखने के लिए अरब में एक साल तक युद्ध करना पड़ा। उसे ‘रिद्दा’-युद्ध कहा जाता है।

रिद्दा, यानी कदम पीछे हटाना, इस्लाम छोड़ना। सच यह है कि आज भी यदि तलवार का आतंक हटे तो असंख्य लोग इस्लाम छोड़ दें। अब तो भय के बावजूद मुलहिद (इस्लाम छोड़ने वाला) धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं।

ऐसे कैदखाने जैसे मतवाद को ‘शान्ति’ का धर्म बताने वाले संत घोर अज्ञानी हैं। उन्हें मजहब विशेष के लोगों से प्रेम जताने का तरीका स्वामी विवेकानन्द से लेकर पीछे गुरू नानक तक से सीखना चाहिए। न कि अधकचरे नेताओं से।

हमारे ज्ञानियों ने अल्लाह का सम्मान किया था। अल्लाह की धारणा अरब में मुहम्मद से पहले से है। अरब के कई देवी-देवताओं में अल्लाह भी एक थे। उसी रूप में हमारे ज्ञानियों ने सभी देवी-देवताओं को एक ही परमात्मा का संकेत कहा था। किन्तु उन्होंने मुहम्मदी राजनीति की अनुशंसा कभी नहीं की। जबकि वही इस्लाम की जान है।

फारसी में कहावत भी है, ‘बाखुदा दीवानावाश, बामुहम्मद होशियार!’ यानी खुदा के साथ तो थोड़ी चुहल कर लो, मगर मुहम्मद से सावधान रहो। इसलिए, इस्लामी सिद्धांत-व्यवहार-इतिहास से अनजान कथावचाकों द्वारा अपने प्रवचन में इस्लाम की छौंक लगाना अपने विनाश का रसायन तैयार करने जैसा है।

उन्हें खोजना चाहिए कि अभी 75 साल पहले तक लाहौर, मुलतान, ढाका में बड़े-बड़े हिन्दू संत, मठ और संस्थान होते थे। उनका क्या हुआ? आज पाकिस्तान में स्वामी रामतीर्थ के भक्त, और बंगलादेश में रामकृष्ण परमहंस के भक्त कहाँ हैं?

हमारे संत यदि वही हालत बचे-खुचे भारत की करना नहीं चाहते, तो उन्हें मूल इस्लामी वाङमय का अध्ययन करना, करवाना चाहिए। वे एक हाथ में आ जाने वाली मात्र तीन-चार पुस्तकें हैं। उस से इस्लाम का सत्य दिखेगा। बिना उसे जाने अपनी मनगढ़ंत से वे हिन्दुओं की भयंकर हानि कर रहे हैं। यह गाँधीजी वाले अहंकार का दुहराव है।

आज पूरी दुनिया में इस्लाम के धार्मिक अंश से राजनीतिक भाग को अलग करने, दूर हटाने की कोशिश की रही है। स्वयं सऊदी अरब राजनीतिक इस्लाम से पल्ला छुड़ाने का उपाय कर रहा है। तब उसे गड्ड-मड्ड कर झूठी-मीठी बातें बोलना अक्षम्य अपराध है।

हमें दूसरों के और अपने मत की सम्यक जानकारी रखनी चाहिए। ‘एकम् सत’ कहने और ‘अल्लाह के सिवा कोई गॉड नहीं’ के दावे में जमीन-आसमान का अंतर है। अधिकांश हिन्दुओं को एक ही सत्य वाली बात का संदर्भ मालूम नहीं है। इसी का दुरुपयोग कर सभी रिलीजनों को एक सा सत्य बताया जाता है। किन्तु इस से बड़ा असत्य दूसरा नहीं हो सकता!

कृपया ऋगवेद का वह पूरा मंत्र देखें: ‘‘इन्द्रम् मित्रम् वरुणम् अग्निम् आहुः / अथो दिव्यः सा सुपर्णो गरुत्मान्/ एकम् सद् विप्राः बहुधा वदन्ति / अग्निम् यमम् मातरिश्वन् आहुः।’’ अर्थात इन्द्र, सूर्य, वरुण, अग्नि के रूप में उन का ही आवाहन किया जाता है। उन्हीं को दिव्य गुणों वाले गरुड़ के रूप में आहुति दी जाती है। एक ही अस्तित्व है, जिसे विद्वान विभिन्न नामों से बुलाते हैं। चाहे वह आवाहन अग्नि, यम या वायु का किया जाता हो।

जरा सोचें, कि आज हम अपने महान् ग्रंथ के मंत्र का केवल एक चौथाई क्यों उद्धृत करते हैं? उस चौथाई के कुल पाँच शब्दों में भी मात्र ‘एकम्’ को ही महत्व क्यों देते हैं? वह भी मूल संदर्भ भुला कर।

हमें झूठी राजनीति एवं सच्चे धर्म के बीच अंतर करना सीखना चाहिए। वरना बचे-खुचे भारत को लाहौर वाली दुर्गति में डूबते देर नहीं लगेगी। यही राजनीतिक इस्लाम है। यह धर्म नहीं है। आत्म-मुग्ध हिन्दू संतों को समझना चाहिए कि सही इस्लाम की जानकारी तमाम ईमामों, उलेमा को है। मजहबी विश्व उसी से चलता है। इस समुदाय के भारतीय भी अपने मौलानाओं से ही पूछते हैं।

हिन्दू संत इस्लाम के बारे में स्वयं अंधेरे में रहकर हिन्दुओं को भ्रमित कर रहे हैं। मनगढ़ंत बातों से लोगों को भरमाना दोहरा पाप है। हमें दूसरों के और अपने मत की सम्यक जानकारी रखनी चाहिए। ‘एकम् सत’ कहने और ‘अल्लाह के सिवा कोई गॉड नहीं’ के दावे में जमीन-आसमान का अंतर है। अधिकांश हिन्दुओं को एक ही सत्य वाली बात का संदर्भ मालूम नहीं है। इसी का दुरुपयोग कर सभी रिलीजनों को एक सा सत्य बताया जाता है। किन्तु इस से बड़ा असत्य दूसरा नहीं हो सकता।

लेखक: शंकर शरण

रिकॉर्ड में हैं सिर्फ 2.5% ईसाई, हकीकत में तो 25% हैं: आँध्र प्रदेश में धर्मांतरण पर YSRCP नेता का खुलासा

आँध्र प्रदेश में धर्मांतरण को लेकर मिशनरीज की हकीकत का खुलासा करने वाले YSRCP नेता रघु रामकृष्णा राजू ने कल दोबारा एक नया खुलासा किया। उन्होंने प्रदेश की सच्चाई बताते हुए खुलेआम कहा कि सरकारी रिकॉर्ड में भले ही ईसाइयों की संख्या 2.5% है मगर, हकीकत में ये आँकड़ा 25% से कम नहीं है।

टाइम्स नाउ की डिबेट से शुरू हुए धर्मांतरण के मुद्दे पर एंकर पद्मजा जोशी ने कल फिर जगन मोहन रेड्डी की सरकार में मंत्री राजू से इस मुद्दे पर आगे की जानकारी माँगी। हालाँकि पहले तो वह अपने पुराने ढर्रे का राग लापते दिखे कि कन्वर्जन सिर्फ़ आँध्र प्रदेश में नहीं पूरे देश में हो रहा है।

किंतु, जैसे ही पद्मजा जोशी ने कहा कि क्या वो पूरे देश की उन जगहों के बारे में मुख्यत: बता सकते हैं, जहाँ-जहाँ ये प्रक्रिया चालू है। तो, रघु रामकृष्णा राजू ने एक नया चौंकाने वाला आँकड़ा पेश कर दिया।

उन्होंने कहा, “रिकॉर्ड के अनुसार हमारे राज्य में ईसाइयों का प्रतिशत 2.5% से कम है, लेकिन वास्तव में यह 25% से कम नहीं होगा।”

उन्होंने आगे इस बात को भी स्पष्ट किया कि उन्हें नहीं मालूम कि ये सब बाते अच्छी हैं या बुरी, लेकिन वो जो ये बातें कह रहें है, वो सिर्फ़ आँकड़े बयान करती है।

इस खुलासे को सुनकर पद्मजा ने उन्हें उनकी ईमानदारी के सराहा और आगे उनसे सवाल पूछा कि आखिर ये सब मुमकिन कैसे हुआ?

इस पर, YSRCP नेता ने बताया कि कुछ लोग ऐसे वर्ग से आते हैं, जिन्हें पहले से ही फायदा मिल रहा होता है। ऐसे में यदि वो ईसाई धर्म अपना लेते हैं, तो उन्हें वो फायदा मिलना बंद हो जाता है। यही कारण है कि लोग धर्मांतरण करते हैं, मगर उसका पंजीकरण नहीं करवाते।

आगे इस पूरी धर्मांतरण की प्रक्रिया को ऱघु रामकृष्णा मानव मनोविज्ञान का नतीजा बताते हैं और इस प्रक्रिया को न्यायोचित ठहराने के लिए वो आर्टिकल 25 (1) का भी हवाला देते हैं। साथ ही इस बात का स्पष्टीकरण भी देते हैं कि वो ईसाई धर्म के ख़िलाफ़ नहीं हैं। वो हर धर्म की इज्जत करते हैं।

पर, जब उनसे पूछा जाता है कि वो अपने राज्य में होते धर्मांतरण करवाने वालों को रोकते क्यों नहीं है? उनकी सरकार इन सबके लिए कुछ करती क्यों नहीं हैं, तो वो इस मुद्दे को डायवर्ट करके दूसरे राज्यों की बातों को शुरू कर देते हैं।

उल्लेखनीय है कि ये पूरा विवाद 25 मई को टाइम्स नाऊ की एक डिबेट से शुरू हुआ था। उस डिबेट में YSRCP के सांसद रघु कृष्णा राजू ने इस बात को ऑन एयर शो में माना था कि आँध्र प्रदेश में धर्मांतरण की प्रक्रिया बहुत तेजी से चालू है। उन्होंने इस डिबेट में यह भी बताया था कि ये सब मिशनरी के जरिए होता है, जो मनी पावर का इस्तेमाल करके इन कामों को अंजाम देते हैं।

हालाँकि, जब उनसे पूछा गया कि सब जानते-समझते हुए उनकी सरकार क्या कर रही है? तो वो इस बात को कहते नजर आए कि इसमें वो क्या कर सकते हैं? ये सब तो पूरे देश में हो रहा है।

एक बाजू गायब, सिर धड़ से अलग, बाल उखड़े हुए… कमरा खून से लथपथ: पंजाब में 80 वर्षीय संत की निर्मम हत्या

पंजाब में एक 80 वर्षीय संत की हत्या कर दी गई और अब तक इस मामले में कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। इस हत्याकांड के 10 दिन बीत चुके हैं। महाराष्ट्र के पालघर में दो साधुओं की भीड़ द्वारा निर्मम हत्या वाली वारदात अभी भी लोगों की जेहन में है। हालिया घटना रूपनगर की है, जहाँ उक्त संत की उनके आश्रम में ही हत्या कर दी गई थी।

महा योगेश्वर महात्मा ‘श्री मुनि देशम आश्रम’ में अकेले रहा करते थे। वो डेरा चलाते थे और उस क्षेत्र के लोगों में खासे लोकप्रिय थे। उनकी हत्या एकदम वीभत्स तरीके से की गई थी। उनका एक बाजू गायब था। और साथ ही सिर को धड़ से अलग कर दिया गया था। उनके सिर के बाल उखाड़ लिए गए थे। पूरा कमरा खून से लथपथ था।

महात्मा सतलज नदी के किनारे अपने आश्रम में पिछले 4 दशक से वास कर रहे थे और नदी के किनारे ही बैठ कर पूजा-पाठ किया करते थे। वो मूल रूप से हिमाचल प्रदेश के सरकाघाट के निवासी थे। उन्होंने मात्र 20 वर्ष की आयु में ही संन्यास ले लिया था।

डेरा प्रमुख महा योगेश्वर महात्मा की हत्या के बाद लोग पंजाब सरकार से सवाल पूछ रहे हैं। वहाँ कॉन्ग्रेस की सरकार है और क्षेत्र से भी पार्टी के बड़े नेता मनीष तिवारी सांसद हैं, ऐसे में कॉन्ग्रेस पर लोगों का गुस्सा स्वाभाविक है। पालघर मामले में अर्नब गोस्वामी ने जब सोनिया गाँधी से सवाल पूछा था तो उन्हें पुलिस-प्रशासन द्वारा प्रताड़ित करवाया गया।

मार्च में कोरोना वायरस का प्रकोप शुरू हुआ। उसके बाद सरकार ने लॉकडाउन लगाया। उसका सम्मान करते हुए महात्मा वहाँ अकेले रहते थे और किसी भी प्रकार के सार्वजनिक धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन नहीं करते थे। जब उनके अनुयायी आश्रम में उनके दर्शन के लिए गए तो उन्होंने पाया कि दरवाजा खुला हुआ था और उनके कमरे में ही उनकी हत्या कर दी गई थी। काठगढ़ पुलिस स्टेशन का कहना है कि उनका मृत शरीर डीकम्पोज हो चुका था

इसका अर्थ है कि एक सप्ताह से लेकर 10 दिन पहले तक उनकी हत्या कर दी गई थी, जिसके बाद उनकी लाश उसी कमरे में पड़ी रह गई थी। इस कृत्य के कारण स्थानीय लोगों में पुलिस के प्रति भी रोष व्याप्त है। पुलिस ने उस वक़्त कहा था कि इस मामले में रिपोर्ट दर्ज कर के इन्वेस्टीगेशन चालू कर दिया गया है।

पंजाब के स्थानीय शिवसेना नेताओं ने भी इस हत्या को लेकर कड़ा विरोध दर्ज कराया था। महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस शिवसेना के नेत्रृत्व वाली सरकार में शामिल है। महात्मा योगेश्वर की आत्मा की शांति के लिए लोगों ने एक श्रद्धांजलि प्रार्थना का भी आयोजन किया।

महात्मा योगेश्वर के बारे में कहा जाता है कि उनका जन्म सरकाघाट के एक बड़े व्यापारिक खानदान में लाला रामरखा लाल के यहाँ हुआ था लेकिन उन्होंने संन्यास लेकर धन-वैभव को पीछे छोड़ दिया था। लोगों का आरोप है कि मीडिया भी इस मुद्दे को नहीं उठा रहा है और इस कारण इस मामले में राज्य सरकार व पुलिस आसानी से बिना कुछ किए निकल गई है।

महात्मा की जिस कमरे में हत्या की गई, वहाँ से कई कई चीजें भी गायब थीं। उनके कमरे के बल्ब, इनवर्टर और बैट्रियाँ भी गायब थीं। उनकी लाश को कुत्तों द्वारा खाए जाने की बात भी कही जा रही है। उनका आश्रम नूरपुर बेदी मार्ग पर स्थित था। महा योगेश्वर की हत्या के बाद इलाके में तनाव पसर गया था और पुलिस को स्थिति संभालनी पड़ी थी। आश्रम का दरवाजा टूटा होने के कारण लोगों को शक हुआ, जिसके बाद वो अन्दर गए थे।

हमने अधिवक्ता अमन कुमार से इस सम्बन्ध में बात की, जो अक्सर बाबा योगेश्वर से मिलते-जुलते थे। उन्होंने बताया कि महात्मा जी राजनीतिक चर्चाओं से दूर रहते थे और उन्हें पब्लिसिटी पसंद नहीं थी। उनके कई शिष्य बड़े-बड़े नाम वाले भी हैं लेकिन उन्होंने कभी फोटो वगैरह क्लिक करवा कर अपनी पब्लिसिटी कराना पसंद नहीं किया। उन्होंने कई महीने तक बद्रीनाथ में प्रवास किया था, जहाँ ठण्ड के दिनों में मात्र 4 साधुओं को ही सरकार की अनुमति थी।

महात्मा, जिनकी हत्या हुई (कुर्सी पर)

अधिवक्ता अमन ने जानकारी दी कि बाबा 5 भाई और 2 बहन थे। उनके भाई सुभाष कौशल कॉन्ग्रेस के छात्र संगठन NSUI के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। उनके भाई को उनकी हत्या की जानकारी न देकर प्राकृतिक मृत्यु होने की बात कही गई है। उन्हें कहीं इसका सदमा न लगे, इसीलिए लोगों ने ऐसा किया। पुलिस का दावा है कि इस मामले में गिरफ़्तारी की गई है लेकिन लोगों का कहना है कि फोरेंसिक जाँच के बाद क्या आया, ये नहीं बताया गया है। अधिवक्ता अमन ने बताया:

“हिमाचल प्रदेश में उनका जन्म हुआ। पंजाब में रूपनगर में उन्हें आश्रम के लिए जमीन मिली थी और वो वहाँ रह रहे थे। उत्तराखंड में वो प्रवास किया करते थे, बद्रीनाथ में। वहाँ उन्होंने एक चट्टान को काट-काट कर गुफा बनाई थी। कुल मिला कर 5 राज्यों में उनके अनुयायी थे। उन्होंने और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गुरु ने साथ दीक्षा ली थी। इस हिसाब से पीएम मोदी के गुरु उनके गुरुभाई हुए। वो भिक्षा माँग कर अपना गुजर-बसर करते थे। वो अवधूत अखाड़ा में दीक्षित हुए थे। बिरला मंदिर में वो समय-समय पर रहा करते थे। उद्योगपति कपिल मोहन अपनी हर नइ गाड़ी इनके पास लेकर आते थे। महात्मा के शिष्यों का कहना है कि इंदिरा गाँधी के समय गोरक्षा के लिए साधुओं ने आंदोलन किया था तो उन्होंने उसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया था। इसके लिए वो जेल तक गए थे।”

लोग बताते हैं कि बाबा हमेशा हिंदुत्व के प्रचार-प्रसार के लिए चिंतित रहते थे। असल में उनके आश्रम में बिजली तक नहीं थी, उनके अनुयायियों ने ही सोलर सिस्टम की व्यवस्था की थी। लोग उनके आश्रम पर ही उन्हें भोजन पहुँचाया करते थे। भिक्षा माँग कर गुजर-बसर होता था, इसीलिए वो खाना नहीं बनाया करते थे। उनकी हत्या के बाद स्थानीय लोगों ने उनके रिश्तेदारों को फोन की लेकिन संपर्क नहीं हो पाया। बाद में उनकी बहन के घर कॉल किया गया, जहाँ से लोग आए।

बताया जा रहा है कि लाश का पोस्टमॉर्टम करने के समय डॉक्टरों ने ये कह दिया था कि डेड बॉडी का कुछ करने लायक बचा ही नहीं है, जिसके बाद उन्हें फोरेंसिक जाँच के लिए भेजा गया। उनके शिष्यों की माँग है कि मृत शरीर वापस किए जाने के बाद उनकी समाधि बनाई जाएगी, लेकिन अभी तक वैसा कुछ नहीं हो पाया है। लोगों ने उनकी हत्या के खिलाफ सामाजिक दूरी का पालन करते हुए विरोध प्रदर्शन किया और कैंडल लाइट मार्च निकाला।

वहाँ के लोग सांसद मनीष तिवारी से संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन वो उनका कॉल नहीं उठा रहे हैं। मनीष तिवारी के बारे में कहा जा रहा है कि वो अपने दिल्ली स्थित निवास पर हैं और क्षेत्र में मौजूद नहीं हैं। लोगों का कहना है कि पंजाब की सरकार इस मामले में खुल कर कार्रवाई नहीं कर रही। महात्मा के बारे में अधिवक्ता अमन ने बताया कि वो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कामकाज से प्रभावित थे और कहते थे कि वो अच्छा काम कर रहे हैं।

जहाँ तक पुलिस की बात है, उनका कहना है कि इस मामले में दो लोगों को गिरफ्तार करने के साथ ही लूट का सामान भी जब्त कर लिया गया है। दीपक और संजय नामक आरोपितों को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने बताया कि दिवंगत महात्मा के भाई के बयान के आधार पर रिपोर्ट दर्ज की गई है। पुलिस के अनुसार, आरोपितों ने लूट की वजह से महात्मा का क़त्ल किए जाने की बात कही है और बताया कि दो अन्य लोगों ने भी उनका साथ दिया था।

हालाँकि, ये तर्क लोगों के गले उतर नहीं रहा। पुलिस का वर्जन है कि आरोपितों ने अपना गुनाह कबूल करते हुए स्वीकार किया कि महात्मा के बारे में उन्हें सूचना मिली थी कि वो अकेले रहते हैं। पहले उन्होंने कुटिया की रेकी की, जिसके बाद लूट की योजना बनाई गई। पुलिस की मानें तो वो लोग 10 मई को 2 बाइकों से आश्रम पहुँचे थे। इसके बाद उन्होंने शराब के नशे में धारदार हथियार से महात्मा का क़त्ल कर दिया। साथ ही सोलर सिस्टम लूट कर ले गए।