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‘पिंजरा तोड़’: वामपंथनों का गिरोह जिसकी भूमिका दिल्ली दंगों में है; ऐसे बर्बाद किया DU कैम्पस, जानिए सब कुछ

‘पिंजरा तोड़’ मुहिम वामपंथी नौटंकी का वही फर्जीवाड़ा थी (और है) जो कोई भी वामपंथी मुहिम होती है। कुछ लोग, जिनके पेट भरे हुए हैं, जिन्हें सामाजिक समसामयिकता और भेदभाव झेलना नहीं पड़ता, वो एक बेकार-सी बात को एवरेस्ट की दुर्गम चढ़ाई की तरह बता कर, अंग्रेजी के तमाम विशेषणों का प्रयोग कर के (जो उनकी जानकारी में है, और जो वामपंथियों की पॉकेटबुक में वर्णित हों) जनसामान्य के लिए ऐसे रखते हैं, जैसे यह न हुआ तो सृष्टि का अंत तय है।

हॉस्टल की लड़कियों द्वारा इसकी शुरुआत हुई दिल्ली विश्वविद्यालय के कैम्पस में, जहाँ आम तौर पर जेएनयू ब्रीड की सड़ी हुई ‘सर्वहारा को चूसने’ वाली पॉलिटिक्स काम नहीं करती। जी, जेएनयू में सर्वहारा का अलग तरह से शोषण होता है। यह शोषण वैचारिक है, जिससे वहाँ के वामपंथियों को एक सर्वकालिक विषय मिला रहता है, जिसकी मदद से वो सर्वहारा/गरीब/वंचित/शोषित (सारे पर्यावाची शब्द) को कोई न्याय नहीं दिलाते।

न्याय दिलाना लक्ष्य भी नहीं होता। लक्ष्य होता है इनकी बातें कर के मीडिया में थोड़ी-सी कवरेज पा लेना। उसी तर्ज पर, दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में एक चौथाई से ले कर आधी सीट तक के लिए तरसता वामपंथ, एक परजीवी की तरह नकली मुद्दे उठाते हुए चर्चा का हिस्सा बनना चाह रहा था। इसी तर्ज पर आपको रामजस में टुकड़े-टुकड़े गैंग के ‘राष्ट्रद्रोही’ उमर खालिद के भाषण वाली बात याद होगी, जब नॉर्थ कैम्पस में वामपंथियों ने रॉड, डंडे और पत्थर से हमला करते हुए दंगा किया था।

साथ ही, आपको यह बात भी याद होगी कि उसी आयोजन में ‘केरल माँगे आजादी’, ‘पंजाब माँगे आजादी’ के भी नारे लगे थे। वो एक तरह से टेस्टिंग चल रही थी कि यहाँ का पानी कैसा है। डीयू में वामपंथियों को कोई चारा नहीं देता, गाली सुनते हैं और सीट को उँगलियों पर गिनते हैं। जेएनयू का कचरा वामपंथ डीयू में, जो कि वाकई देश की एक प्रतिनिधि जनसंख्या है, अपने पर पसारना चाह रहा था लेकिन वो राजनैतिक तौर पर संभव नहीं था।

यहाँ के वामपंथी शिक्षक भी, मेरे निजी अनुभव से, ऐसे-ऐसे दोगली वैचारिक प्रवृत्ति के हैं कि हँसी आती है। इन्हें आप कैम्पस में बीड़ी और लाल चाय पीते पाएँगे, लेकिन पार्टी में मार्लबोरो और कॉफी। ये दोनों ही चीजें, हमारे समय में (2004-07) हर स्टाफ रूम में उपलब्ध होती थीं, लेकिन दोगला वामपंथ सार्वजनिक तौर पर सर्वहारा की बात करने वाले इन नौटंकीबाज शिक्षकों को सिगरेट पीने की इजाज़त नहीं देता।

ख़ैर, मोदी के पहले और दूसरे कार्यकाल से ही डीयू कैम्पस में अलग वैचारिक ‘क्रांति’ की शुरुआत हो चुकी थी और स्कूल मॉनिटरों के चुनाव में वामपंथियों के भतीजों की जीत को ‘देश के युवाओं की आवाज’ बता कर नाचने वाले लम्पटों को एक नया उद्योग मिल गया। अब शैक्षणिक संस्थानों में मोदी सरकार ने शिक्षकों की आवाजाही, उपस्थिति रजिस्टर आदि का भी काम गम्भीरता से करना शुरु कर दिया तो निकम्मे वामपंथी मास्टरों को यह बात पची नहीं।

फिर खुल कर विरोध का दौर आ गया और व्हाट्सएप के ग्रुपों में शिक्षक इन बच्चों को विष की दो-दो बूँदे हर रोज पिलाने लगे। आप देखिएगा कि डीयू के शिक्षकों ने फेसबुक पर लेखन कब से शुरु किया है। 2017-18 के बाद से कैम्पस पॉलिटिक्स के लिए ही कैम्पस चर्चा में रहा क्योंकि जेएनयू और जामिया के बच्चे अब ‘सेमिनार’ के बहाने भीड़ की शक्ल में आर्ट्स फैकल्टी से ले कर नॉर्थ कैम्पस के तमाम जगहों पर आने-जाने लगे।

अब यह बाइनरी स्थापित हो चुकी थी और वैसे विद्यार्थियों को निशाना बनाया जाने लगा जो गैर-वामपंथी थे। उनका उपहास करना, उन्हें जबरन यूनिवर्सिटी या कॉलेज की समितियों से इस्तीफा दिलवाना, मानसिक प्रताड़ना देना आदि आम हो चुका था। हाल ही में हिन्दू कॉलेज की दीपिका शर्मा चर्चा में आई थीं जब उन्होंने कश्मीरी हिन्दुओं के नरसंहार की बरसी पर एक पत्र पढ़ना चाहा और उन्हें कैम्पस के गुंडों ने शोर मचा कर शांत करना चाहा।

आप इनके पोस्टों को, पोस्टरों को देखेंगे तो पाएँगे कि इनके पास वही चार घिसे-पिटे नारे हैं जिसमें ‘आजादी’, ‘तेरे अरमानों को’, ‘बोल कि लब आजाद हैं तेरे’, ‘सब बुत उठवाए जाएँगे’ आदि होते हैं। इनमें इस साल का नयापन यह रहा कि इन्होंने ‘*** के ख़िलाफ़, औरतों का इंक़लाब’ खूब चलाया। ये सब भी बताता है कि वामपंथियों ने इन लड़कियों को अपना मोहरा बनाया ताकि वो हर कैम्पस में अपनी एक भीड़ तैयार रखें जो एक व्हाट्सएप मैसेज पा कर झोला उठा कर सड़क पर आ जाए।

‘पिंजरा तोड़’ की नौटंकी है क्या?

इसी सब की तर्ज पर कुछ लड़कियों ने ‘पिंजरा तोड़‘ की स्थापना की। उद्देश्य था ‘अंग्रेजी के भारी भरकम शब्दों के प्रयोग से क्रांति कर देना’। जी, उद्देश्य बिलकुल यही प्रतीत होता है क्योंकि जिन बातों को इन लड़कियों ने सबसे बड़े मुद्दे बना कर सोशल मीडिया पर, जॉन एलिया के गर्दन झटकने की गति से सत्रह गुणा तीव्रता से बालों को आवेशित रूप में लहराया है, वो सारे काम आज तक की वीरांगनाओं ने एक आवेदन लिख कर पा लिया था।

मुद्दों पर गौर कीजिए: कन्या छात्रावासों में आने-जाने की समय सीमा बदलवाने की बात, वाई-फाई लगवाने की बात, नल ठीक करने की बात, मेस के भोजन की बात… मतलब आम समस्याएँ जो एक छात्रा अपने हॉस्टल में, और एक छात्र अपने हॉस्टल में, झेलता है: समय की पाबंदी वाली बात के अलावा।

प्रश्न यह है कि हॉस्टल के गेट क्यों बंद कर लिए जाते हैं? ‘पिंजरा तोड़’ छात्राओं का कहना है कि उन्हें ‘पितृसत्ता, फासीवादी ताकतों, जहरीली मर्दानगी के जोश, हिन्दू राष्ट्र’ से आजादी चाहिए। यहाँ भी समस्या नहीं है। समस्या इस बात में है कि यही ‘पिंजरा तोड़’ कन्या समूह अपने कई फेसबुक पोस्टों में यह स्वीकारता है कि दिल्ली की सड़कें लड़कियों के लिए सुरक्षित नहीं हैं।

हॉस्टल के गेट किसी की आजादी को खत्म करने के लिए बंद नहीं किए जाते, बल्कि समाज की घटिया स्थिति को देखते हुए, जहाँ मर्दों का एक गिरोह हर लड़की को घूरने, छूने, मोलेस्ट करने, और बलात्कार करने की फिराक में रहता है, उनकी सुरक्षा हेतु बचाव में उठाया गया एक कदम है। लड़कियाँ हॉस्टल क्यों चुनती हैं? क्योंकि उन्हें लगता है कि बाहर किसी रेंट वाले मकान में रहने से बेहतर कैम्पस के सुरक्षित माहौल में रहना है।

अधिकतर लड़कियों के माता-पिता भी इसी कारण उन्हें हॉस्टलों में रखना चाहते हैं। आजादी की बात करना सही है, मिलनी भी चाहिए, लेकिन क्या हम अपने ही बेहूदे समाज की स्थिति को नकार दें, जहाँ घर से कॉलेज/कार्यालय पहुँचती युवती को पचास बार उसकी कमर और छाती पर किसी हरामखोर लड़के या अधेड़ का अनचाहा स्पर्श मिलता है?

आठ बजे तक हॉस्टल की गेट पर ताला लगना सुरक्षा है, स्वतंत्रता का हनन नहीं। आपको स्वतंत्रता चाहिए तो आप अपने माता-पिता से इजाजत लीजिए और हॉस्टल के बाहर रहिए। आप अपनी जिद के कारण बाकी हर उस लड़की को खतरे में नहीं डाल सकती जो यहाँ पढ़ने आई हैं न कि वामपंथ की कुत्सित राजनीति का हिस्सा बनने। सुरक्षा के विषय पर आगे और भी चर्चा होगी।

कुल मिला कर यह मुहिम सोशल मीडिया पर बेकार के मुद्दों को राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बना कर, सीधे ‘क्लास स्ट्रगल’ और ‘पेट्रियार्की’ से जोड़ दिया गया। इनकी नेत्रियों को देखेंगे तो आप पाएँगे कि कैसे ‘पिंजरा तोड़’ एक बाह्यावरण है, जबकि भीतर में इनकी योजना दंगे भड़काने और सड़कों पर अराजकता फैलाने को ले कर है। आगे, इनकी पूरी यात्रा पर विस्तृत चर्चा होगी कि कैसे इन्होंने कैम्पस में पढ़ाई छोड़ कर सारी बातें की हैं।

‘पिंजरा तोड़’ में पिंजरा है ही नहीं। ये वामपंथियों की एक साजिश है कि वो किसी तरह विद्यार्जन की जगहों को जेएनयू, जाधवपुर, अलीगढ़ और जामिया जैसे वैसे संस्थान बना दें जो अपनी शिक्षा के कारण नहीं, वामपंथियों की हिंसा, सेक्स, जिहाद, आतंकवाद,नक्सलवाद समेत हर वैसे मुद्दे पर चर्चा में आए जिसका छात्र जीवन से कोई वास्ता नहीं। ये हमारे हर कैम्पस को बर्बाद करना चाहते हैं, उसकी लाइब्रेरी में पत्थरबाजी, आगजनी करने वाले दंगाइयों को बिठाना चाहते हैं… युवाशक्ति को तबाह करना इनके वृहद अजेंडे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है

‘पिंजरा तोड़’: क्या था और क्या बन गया

इसी संदर्भ में एक और ध्यातव्य बात यह है कि अगर ‘पिंजरा तोड़’, जिसे बच्चियों की एक ईमानदार मुहिम ही मान लें, अपने शुरुआती बातों पर टिका रहता कि उन्हें आज़ादी चाहिए हॉस्टल से रात-बेरात निकलने या वापस आने की, तो भी हम मानते कि 18-22 साल की नवयुवतियाँ हैं, स्कूलों के यूनिफॉर्म वाले दौर से बाहर आई हैं, इन्हें अपने पंखों को विस्तार देने की, स्वयं को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता की मुहिम बनाने में सहयोग की आवश्यकता है।

लेकिन नहीं, हमारी छोटी बहनों, दोस्तों या छोटे-छोटे शहरों से आई बच्चियों को पठन-पाठन से भटका कर उन्हें वामपंथी प्रोपेगेंडा का हिस्सा बना दिया गया। यहाँ हमें ‘स्वच्छन्दता’ की आवश्यकता को भी संदर्भ में ला कर देखने की जरूरत है।

इसमें कोई दोमत नहीं कि हमारी बहनों पर अभी भी हमारा समाज भाइयों से कम ध्यान देता है। चाहे उसका भोजन हो, पढ़ाई हो, कपड़े हों या फिर सामान्य स्वतंत्रता की बातें हो, हमारी बहनें हमारे ही घरों में नकारी जाती रही हैं। कुछ जगहों पर सुधार आया है लेकिन कई समुदायों में अभी भी उनकी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। इसी कारण, जब वो एक स्कूल के तंत्र से, समाज के दबाव से बाहर आ कर दिल्ली जैसी जगह में स्वतंत्रता को अलग तरीके से महसूस करती हैं, और उन्हें कोई घाघ वामपंथन भटकाने के लिए तैयार खड़ी हो, तो संभव है कि वो ऐसे चंगुल में फँस सकती हैं।

ये वामपंथन नेत्रियाँ वो हैं जिनका पेट भरा हुआ है, जो एक अभिजात्य परिवार से ताल्लुक रखती हैं, जिनके पिता उन्हें महँगी गाड़ियों से कॉलेज भेजते हैं, जिन पर समाज का वैसा दबाव नहीं है जो प्रथम वर्ष की किसी 17 साल की उस लड़की पर होता है तो बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश, उड़ीसा जैसी जगहों से आती हैं। उन्हें लगता है कि ‘दीदी सही कहती हैं कि लड़के जब बारह बजे तक घूमते हैं, तो हमारे हॉस्टल पर ताला क्यों’।

जबकि, उन्हें पता ही नहीं कि उनकी इस दीदी ने किस-किस तरह के कांड कर रखे हैं। जेएनयू में वामपंथनों को उनके तथाकथित दोस्त कई बार विरोधी छात्र नेताओं को चुनाव से पहले छवि खराब करने के लिए मोहरे के तौर पर इस्तेमाल करते हैं और वो उनके कहने पर ABVP के नेताओं पर ‘सेक्सुअल मोलेस्टेशन’ का आरोप लगा देती हैं। इन्हीं वामपंथनों को उनके वामपंथी नेताओं की असलियत तब पता चलती है जब वो सर्वहारा की लड़ाई लड़ने जंगलों में पहुँचती हैं, और वहाँ वो एक सेक्स स्लेव से ज्यादा कुछ नहीं बन पातीं। ‘क्रांति में तुम्हारा यही सहयोग है’, ‘तुम्हारी देह कम्यून की प्रॉपर्टी है’ कह कर उन्हें बरगलाया जाता है।

इन दीदियों ने ‘पिंजरा तोड़’ शुरु किया था हॉस्टल की समस्याओं को ले कर और अब यह पूरी तरह से डीयू में वामपंथी प्रोपेगेंडा का महिला ब्रिगेड बन कर खड़ा हो चुका है जो हर उस विषय पर भीड़ की शक्ल ले कर पहुँच जाता है, जो वामपंथियों के वृहद अजेंडे का हिस्सा है। आप इनके फेसबुक पोस्ट्स को खँगालेंगे तो ‘पिंजरा तोड़’ की नेत्रियाँ दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों की पूरी आधारशिला रखती प्रतीत होती हैं।

मजदूर दिवस पर इन धूर्त युवतियों के पेज पर पुलिसकर्मियों से ले कर बैंक कर्मचारियों, कम्पनियों के सीईओ, ब्यूरोक्रेट्स आदि को समाज में योगदान न देने वाला बताया गया है। इनकी मूर्खता ऐसे ही समयों पर उजागर होती है जब उनके लिए एक श्रमिक पूज्य है, लेकिन वैसे एक लाख श्रमिकों के घरों को तलाने वाला पूँजीपति दुत्कार योग्य हो जाता है। इन मूढ़ाँगनाओं को कोई यह भी पूछे कि कितने समाज ऐसे हैं जो वामपंथियों के शासन में फले-फूले हैं!

इनके हर पोस्ट से आपको या तो हिन्दू-घृणा नजर आएगी या फिर ये समाज को ‘ब्राह्मण बनाम अन्य’ की तर्ज पर तोड़ने की बातें करती दिखेंगी। इनका एजेंडा साफ है कि हॉस्टल के ताले तो बस एक छलावा हैं, इनकी श्यामल आत्मा उसी रक्तपिपासु वामपंथी एजेंडे पर चल रही है जो देश के हर राज्य को अलग करने का सपना देखता है। इसलिए, ‘पिंजरा तोड़’ नक्सलियों की सम्मोहित राष्ट्रदोही सेना से ज्यादा कुछ भी नहीं है।

इस उपशीर्षक के अंत में एक त्वरित दृष्टि इनके पिछले पाँच महीनों के पोस्ट पर आप दौड़ाएँगे तो आप पाएँगे कि पूरे दिसम्बर, 2019 और जनवरी, 2020 इन्होंने सीलमपुर-जाफराबाद में लोगों को भड़काया है, लोगों को बसों में ढो कर शाहीन बाग लाना, उनके इलाकों में सड़कों को ब्लॉक करने के लिए उकसाना, इनके मुहल्लों में वामपंथी शैली में पैम्फलेटबाजी करना और नारे लगाने पर केन्द्रित रहा है।

इनका मार्च इस बचाव में निकला कि इनका दिल्ली के हिन्दू-विरोधी दंगों में कोई हाथ नहीं है। फिर इन्होंने होली को ‘बहुजन लड़की’ को ‘ब्राह्मण देवता’ द्वारा जलाने की बात कह कर, इसे मोलेस्टेशन का त्यौहार बता कर हिन्दुओं के प्रति घृणा बाँटी। अप्रैल काफी चहल-पहल वाला महीना रहा इनके लिए क्योंकि इनके एजेंडे में छात्रों को हॉस्टलों से कोविड के दौर में घर भेजने की बातें थीं, दूसरे मजहब की गर्भवती महिला के बच्चे के मरने वाला फेक न्यूज था, प्रवासी मजदूरों को ले कर विचित्र सुझाव और घड़ियाली आँसू थे (ये लम्बा चला रहा है इनके पेज पर)।

इन्होंने फेक न्यूज फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जब 20 अप्रैल को इन्होंने यह लिख दिया कि लगभग 200 लोग भूख के कारण लॉकडाउन में मर गए। ऐसा कहीं, कुछ भी नहीं हुआ है। दीदियों का विशुद्ध झूठ है ये। रेंट खत्म करने की बातें, ब्राह्मणवादि पितृसत्ता, ABVP द्वारा स्त्रियों के योगदान को प्रतारित करने की मुहिम को टोकनिज्म कह कर नकारने की बातें आदि में इनका अप्रैल निकाला।

मई में इनका मुख्य फोकस दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा ली जा रही ‘ऑनलाइन परीक्षाओं’ को नकारने का रहा है जो कि अभी भी चल रहा है। हालाँकि ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि इनकी पूरी नौटंकी में आपको बंगाल, पालघर, महाराष्ट्र, दिल्ली आदि नहीं दिखेगा जो कि प्रवासी मजदूरों की समस्या के केन्द्रबिन्दु रहे हैं। यहाँ पर कन्याएँ गेम कर जाती हैं।

नारीवाद है क्या?

‘पिंजरा तोड़’ की मूल अवधारणा कहीं न कहीं नारीवाद से जुड़ी हुई है क्योंकि बार-बार इनके पोस्ट और कुकर्मों के आयोजनों में ‘हर पुरुष कुत्ता है’ या ‘पुरुषों का जहरीला पौरूष’ जैसे वाक्यांश प्रयुक्त होते रहे हैं। नारीवाद बहुत ही सामान्य सा विचार है, जहाँ हम अपने समाज में अपनी बच्चियों, नवयुवतियों, स्त्रियों आदि को वैसे ही अवसर देने की बातें करते हैं जैसे लड़कों, नवयुवकों और पुरुषों को उपलब्ध हैं।

लेकिन इन ढीठ और प्रपंची वामपंथनों का नारीवाद लड़कों को कोसने, घटिया शब्दों से गरियाने या फिर ‘हम भी खड़े हो कर लघुशंका निपटाएँगे’ जैसी हास्यास्पद बातों पर सिमटा हुआ है। इनकी पूरी मुहिम लड़की को लड़का, या स्त्री के पुरुष बना देने पर केन्द्रित है। ‘वो ये कर सकते हैं, तो हम क्यों न करें’ की जिद इन्हें सामाजिक वास्तविकताओं से दूर ले जाती हैं, और अटपटे काम करवाती हैं।

नारीवाद मेरे लिए लड़कियों को समान शिक्षा, भोजन आदि से बढ़ाते हुए उन्हें आर्थिक रूप से स्वतंत्र करना है। नारीवाद मेरे लिए ‘लड़की द्वारा हर उस काम को करना जो लड़के करते हैं’, नहीं है। क्योंकि दोनों दो तरह के होते हैं, दोनों के अपनी उपयोगिताएँ हैं। लेकिन इसका मतलब यह बिलकुल नहीं है कि उपयोगिता के नाम पर हम उन्हें चूल्हे में झोंक दें कि तुम इसी के लिए बनी हो।

नहीं, यह सामाजिक भेदभाव और पितृसत्ता का कुत्सित रूप है। अगर वो घर का काम करना चाहती है तो उसे उसकी भी आजादी मिलनी चाहिए, और अगर वो अपने लिए कोई नौकरी ढूँढती है तो उसकी भी। अलग-अलग उपयोगिता से मेरा तात्पर्य शारीरिक संदर्भ में है कि एक स्त्री ही बच्चे को जन्म दे सकती है, उसे दूध पिलाना भी उसी के द्वारा संभव है, अतः नारीवाद के नाम पर यह हल्ला करना कि वो बच्चे पैदा नहीं करेगी, बेकार की बात है।

जिसे नहीं करना, न करे। लेकिन आपने विवाह किया है, और उसमें दूसरे व्यक्ति की भी उम्मीदें आपके साथ हैं, फिर अचानक एक दिन आप यह कह दें कि आप बच्चे जनने की मशीन नहीं है। आप तलाक लीजिए और उस व्यक्ति को मुक्त कीजिए कि वो अपनी संतान की इच्छा कहीं और से पूरी करे। संतानोत्पत्ति एक प्राकृतिक कार्य है, हर जीव करता है। आप यह चुनाव वैयक्तिक स्तर पर कर सकती हैं लेकिन ‘हम बच्चे पैदा नहीं करेंगे’ की सामूहिक माँग मूर्खता है।

संक्षेप में, कहने का तात्पर्य यह है कि आर्थिक रूप से स्वतंत्र स्त्री न सिर्फ स्वयं को एक खराब माहौल से निकाल सकती है। बल्कि अपने बच्चों का भी जीवन सँवार सकती है। इसलिए, नारीवाद का उद्देश्य लड़कियों के समान अवसर दिलाने से ले कर उन्हें स्वाबलम्बी बनाने पर होना चाहिए, न कि राह भटक कर हिन्दूघृणा और पुरुषों को कुत्ता बताने में। कुत्ता ही बताना है तो बेशक अपने परिवार से शुरु कीजिए, दूसरों के परिवार में मत झाँकिए।

वामपंथियों की पुरानी तकनीक: अंग्रेजी के बड़े शब्दों की अतिवृष्टि

Disenfranchisement of muslims, repressive state machinery, criminalisation of students, marginalised community, Hindutva state, capitalisation, human cost, rhetorical eulogising of women, patriarchal gender roles, devalue women’s labour, communal bigotry, unleash repression, most vulnerable, times of crisis, holi is marked with violence and abuse, bahujan woman, brahmin god, pop culture, celebration of sexual harassment, divisive, anti-people, human chain, revolution, social justice, protest gathering, aggressively performing puja, toxic show of masculinity, nights of struggle, educate-agitate-organise, historically denied, brute show of military power, demonstration of international consolidation of fascist forces, historically marginalised, notions of emancipation, hegemonic nationalism, status quo, infested with patriarchy, fascism, dehumanising, proletariat, historically oppressed…

ये सारे शब्द या वाक्यांश वो हैं जो आपको हर वामपंथी फेफड़े में लिए घूमता मिल जाएगा। वो खाँसेगा तो एंटी-पीपुल निकलेगा, थूक दिया तो ‘ब्रूट शो ऑफ मिलिट्री पावर एंड डिमोन्सट्रेशन ऑफ इंटरनेशनल कन्सॉलिडेशन ऑफ फासिस्ट फोर्सेस’ की फुहाड़ें जमीन पर होंगी। ये तरीका पुराना तो है लेकिन कारगर है।

स्कूल से निकले बच्चों पर जब आप ऐसे भारी शब्द फेंकेंगे तो औपनिवेशिक मानसिकता से सराबोर नववामपंथी या वोक-युवा ‘यो-यो, योर राइट’ कहते हुए गर्दन हिलाएगा कि ऐसी अंग्रेजी बोल रहा है तो सही ही होगा। जबकि ऐसी सारी बातें उस फूड ब्लॉगर की बकैती से ज्यादा कुछ नहीं जो ‘ओपन फ्लेम रोस्टेड एगप्लांट फॉर स्मोकी फ्लेवर, इन एन असॉर्टेड मिक्स ऑफ़ फाइनली चॉप्ड अनियन, गार्लिक, ग्रीन चिली विद अ टच ऑफ एक्स्ट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल’ लिख कर बैंगन के भर्ते की फोटो लगा देता है।

वामपंथी अपने विशुद्ध बकैती को एलिजाबेथन अंग्रेजी में ऐसे लिखते हैं कि भाई, हॉस्टल का गेट नहीं खुला न तो माया सभ्यता वाला प्रलय अभी ही आ जाना है, पूरी सृष्टि की सर्वनाश तय है। मूर्ख लोग डिक्शनरी में भी नहीं देखते कि ‘असॉर्टेड मिक्स’ के नाम पर वो बैंगन की बीजों वाला चोखा दे कर जा चुका है।

पिंजरा तोड़ की एजेंडाबाज नेत्रियाँ

19 फरवरी की एक वीडियो में नताशा नाम की एक लड़की, जो कि दिल्ली के हिन्दू विरोधी दंगों को भड़काने के आरोप में दिल्ली पुलिस की सेवा में है, मूलतः मजहबी महिलाओं की एक भीड़ को यह बताती नजर आती है कि सरकार गाँवों के छोटे अस्पतालों को बेच देगी, फिर जितनी भी सरकारी कम्पनियाँ हैं उसको बेच देगी, बीमा कम्पनियों को बेच देगी, सरकारी संपत्ति को बेच जा रही है, रेलवे को बेचने की बात है, बैंक में जो पूँजी है उसको स्टॉक मार्केट में लगा देगी, पेंशन के पैसे को सट्टे पर लगाने वाली है यह सरकार…

इतनी बकैती के बाद उस वीडियो को आगे सुनने की इच्छा नहीं हुई क्योंकि मैं अपनी यूनिवर्सिटी की पढ़ी-लिखी लड़कियों से थोड़ी और उम्मीद रखता था। उन महिलाओं की भीड़ को नताशा यह बता रही है कि असल में जो भी गरीब लोग हैं, वो यहाँ के नागरिक नहीं हैं। आप सोचिए कि एक भीड़ जिसकी शिक्षा का स्तर कम हो, जिसे उनके घरों के पुरुषों ने ढाल बना कर ‘विरोध’ के नाम पर शिफ्टों में बिठा रखा हो, जिसमें से वही चार औरतें हर मीडिया वाले को पहले से पढ़ाया जवाब देती हैं, उन्हें आप ये बता रही हो कि गरीब लोगों के पास नागरिकता नहीं और सरकार सारी सरकारी चीजें बेच रही हैं!

ये तो बस एक उदाहरण है इनकी करतूतों का। फेसबुक के जरिए इन्होंने बार-बार फेक न्यूज फैलाया है जिससे यह साबित किया जा सके कि यहाँ तो डॉक्टर भी संवेदनहीन हैं और उन्होंने गर्भवती महिला को उसके मजहब के कारण लौटा दिया जिससे बच्चा मर गया। जबकि बात यह थी कि वह महिला एनीमिया (रक्ताल्पता) की शिकार थी और सातवीं बार गर्भवती थी, जिससे उसे बेहतर अस्पताल की जरूरत थी।

वैसे ही 200 लोगों के भूखे मरने की बातें इन्होंने लिखी और यह बताना चाहा कि सरकार मे मजदूरों को उनके हाल पर छोड़ दिया है। बजट के विश्लेषण में इन्होंने पहले ही भविष्य में झाँक लिया और उसे बेकार कह दिया। हालाँकि, हर बार इन्हें एक ही पार्टी की सरकार से समस्या होती है। इन्हें गैर-भाजपा सरकारों में आज तक कोई समस्या नहीं दिखी।

इन सारी बातों को देखने का बाद आपको लग जाएगा कि ‘पिंजरा तोड़’ का या उसके समर्थकों का मुख्य उद्देश्य एक ऐसी भीड़ इकट्ठा करना है जो कैम्पस को बर्बाद करने में योगदान देती रहे। इनके प्रमुख उपलब्धियों में बच्चों को क्लास न जाने के लिए प्रेरित करने से ले कर हर उस मुद्दे पर कहीं इकट्ठा होने की बातें हैं जो जेएनयू में चल रहा हो, जामिया में चल रहा हो, AMU में चल रहा हो।

देवांगना और नताशा को बार-बार जामिया कॉर्डिनेशन कमिटी की मीटिंग में पाया गया है। इस पर विस्तृत चर्चा तो आगे होगी, लेकिन यहाँ यह बात देखने योग्य है कि आखिर दिल्ली विश्वविद्यालय की लड़कियाँ जामिया की मुहिम का हिस्सा क्यों बन रही हैं? फिर याद आता है कि व्हाट्सएप आदि के जरिए अब भीड़ इकट्ठा करने में आसानी होती है, लेकिन उसी में से कोई प्लान लीक भी कर सकता है, तो कुछ लोगों को भीतरी कोठरी का हिस्सा बनाया जाता है।

लदीदा और आयशा जैसी जिहादनें हीरोइन बना कर दिखाई जाती हैं। कैमरा तैयार रहता है कि फुल एचडी फोटो ले ली जाए और तुरंत एक गिरोह हरकत में आ जाता है। ऐसे लोग, ऐसे ही फर्जी विरोधों का हिस्सा बन कर यूएन तक हो आते हैं। तो जाहिर है कि ‘पिंजरा तोड़’ की नेत्रियाँ भी तो अपनी जगह ढूँढेंगी, उन्हें भी तो हिस्सा बनना है इस ‘बनते हुए इतिहास’ का!

यही कारण है कि ऐसे छोटे-छोटे समूहों को बड़े-बड़े नाम दे कर लेजिटिमेसी प्रदान की गई जैसे नाटो की प्रासंगिकता खत्म होने के बाद अब जामिया कॉर्डिनेशन कमिटी और जाफराबाद एक्शन ग्रुप टाइप के व्हाट्सएप ग्रुप ही सुडानी क्रांति का निपटारा कर पाएँगे।

बाहरहाल, ऐसी नेत्रियाँ शरजील इमाम जैसे धूर्त कट्टरपंथी के हाथों की कठपुतलियाँ बनीं भीड़ों को इकट्ठा करने वाली वोलेंटियर से ज्यादा कुछ न बन पाईं। इनका काम जगह-जगह की महिलाओं को बरगलाना और उकसाना भर रह गया। इनके पूरे फेसबुक पेज पर आपको इनके वीडियो आदि से दिख जाएगा कि नेतागीरी के नाम पर ये लोग वाकई हिन्दू-विरोधी दंगों की पृष्ठभूमि में कैसे फिट बैठती हैं।

दिल्ली के हिन्दू-विरोधी दंगों में ‘पिंजरा तोड़’ का योगदान

हाल ही में दिल्ली पुलिस ने इन दोनों लड़कियों, देवांगना और नताशा, को जाफराबाद मेट्रो स्टेशन पर भीड़ के साथ होने तथा उन्हें उकसाने के लिए गिरफ्तार किया है। खास कर 22 फरवरी की रात को, पुलिस के अनुसार, पिंजरा तोड़ के सदस्यों ने भीड़ जुटाई थी और कहा था कि वो जाफराबाद मेट्रो स्टेशन पर धरना दें।

हालाँकि ये सारा काम इन्होंने वहाँ की महिलाओं को समर्थन देने के नाम पर किया था लेकिन पुलिस का मानना है कि इनका हाथ और भी गहरे जाता है। उन्होंने कहा है कि ‘पिंजरा तोड़’ समूह एक बाहरी कारण हो सकता है जिसने दिल्ली के हिन्दू-विरोधी दंगों को भड़काने में एक भूमिका निभाई हो।

अगर हम सिर्फ फेसबुक पोस्टों की बात करें, जो ‘पिंजरा तोड़’ के पेज पर अभी भी उपलब्ध है, तो पता चलता है कि 26 जनवरी को सीलमपुर-जाफराबाद इलाके में इन्होंने संविधान की प्रस्तावना का पाठ किया है (जो कि कोई अपराध नहीं है, यह बस उनके वहाँ होने की बात बताने के लिए है)। साथ ही, उसी दिन उन्होंने भारतीय गणतंत्र दिवस पर हर साल की तरह प्रदर्शित होने वाली झाँकी को नकारात्मक तरीके से देखते हुए लिखा कि ये तो सैन्य क्षमताओं का क्रूर प्रदर्शन है और फासीवादी ताकतों का अंतरराष्ट्रीय गठजोड़।

उसी तरह 1, 6, 16, 22, 23, और 24 फरवरी को इनके वहाँ होने के सोशल मीडिया पोस्ट्स हैं जिसमें वो उसी इलाके में हैं जहाँ अंततः दंगे भड़के। साथ ही यह भी कहना आवश्यक है कि जिस तरह से दंगे हुए और जिस तरह से उस इलाके के हर 10-15 घरों की छत पर से पेट्रोल बम, एसिड की बोतलें, गुलेल, पत्थरों और ईंटों के टुकड़ों के ढेर आदि मिले, और जानकारों के हिसाब से इसकी तैयारी में एक महीने से ज्यादा की बातें कही जा रही हैं, उसे भी इस पूरे संदर्भ में रख कर देखना चाहिए।

चाहे जाफराबाद-सीलमपुर में ही घरना पर बैठना हो, या फिर उन्हें बसों में भर कर शाहीन बाग ले जाना हो, पिंजरा तोड़ ने स्वयं ही अपने पेज के माध्यम से ये जानकारियाँ साझा की हैं।

22 और 23 फरवरी का दिन इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है जब ट्रम्प के दिल्ली आने की तैयारी चल रही थी, उसी वक्त फारूक फैजल के राजधानी स्कूल की छत, ताहिर हुसैन का घर और नॉर्थ ईस्ट दिल्ली में कई घरों की छतों पर एक अलग तैयारी चल रही थी। शाहीन बाग में एक सड़क को घेर कर आवाजाही बॉद कर दी गई थी, लेकिन जाफराबाद में वैसा कुछ नहीं हुआ था।

ओवैस सुल्तान खान (Owais Sultan Khan) की एक पोस्ट के मुताबिक, पिंजरा तोड़ की लड़कियों ने वहाँ का महिलाओं को भड़काया कि वो सड़क जाम कर दें। खान ने यह भी लिखा कि वो इसके पक्ष में नहीं हैं क्योंकि इन लड़कियों ने पहले भी दरियागंज में महिलाओं को विरोध में आगे कर दिया, पुलिस से लड़ गईं और फरार हो गईं, जिस कारण वहाँ की महिलाओं को पुलिस उठा कर ले गई।

इन लड़कियों के समूह को अभिजात्य वर्ग का बताते हुए ओवैस खान ने स्पष्ट शब्दों में लिखा कि इनकी फंतासियों के चक्कर में सीलमपुर और ट्रांस-यमुना का इलाका काफी तनावपूर्ण स्थिति में है। ध्यान रहे कि दंगों की पूरी तैयारी इस समय हो चुकी थी और इन इलाकों में अगले दिन व्यवस्थित तरीके से आगजनी, हत्या और रक्तपात होना तय था।

22 फरवरी को भीम आर्मी ने भारत बंद बुलाया था और ‘पिंजरा तोड़’ ने भारत बंद का मतलब जाफराबाद बंद निकाला और दिल्ली के और हिस्सों को जोड़ने वाली एक मुख्य सड़क को शाहीन बाग की शैली में बंद करवा दिया। इसी समय, CAA समर्थकों ने चेतावनी दी थी कि अगर कोई शाहीन बाग की तरह उनके चलने-फिरने के अधिकारों पर हमला किया, तो वो उसका विरोध करेंगे।

आखिर विधायक अब्दुल रहमान की वीडियो अपील के बाद भी कि लोग सड़क जाम न करें, ‘पिंजरा तोड़’ ने लोगों को सड़क को क्यों ब्लॉक किया? आखिर उनका कौन सा हित सध रहा था रोड को ब्लॉक करने में? वहीं के एक लड़के इमरान का भी एक वीडियो है जो बार-बार कह रहा है फेसबुक लाइव में कि यहाँ के लड़के जज्बाती हो रहे हैं, अगर सड़क पर कुछ हो गया तो बहुत बड़ा रूप ले सकता है। क्या ये सारी बातें ‘पिंजरा तोड़’ वालों को नहीं दिख रही थीं या फिर वो मन बना कर आए थे कि शरजील इमाम के अरमानों को मंज़िल तक पहुँचाना है?

अब आप शरजील इमाम और जामिया कॉर्डिनेशन कमिटी की योजना को पुनरावलोकन कीजिए। शरजील ने यही तो कहा था कि भारत के 500 शहरों को मजहब के लोग बंद नहीं कर सकते क्या? एक शाहीन बाग ने दिखा दिया कि ‘हाँ, बंद कर सकते हैं और पुलिस कुछ नहीं कर सकती’। दूसरी बात यह थी कि ट्रम्प के आने का समय था तो शाहीन बाग की बासी खबर से किसी को कुछ खास मजा आता नहीं।

फिर तय तरीके से जाफराबाद बंद किया गया और चौकस तैयारी के साथ लोग बैठ गए। यहाँ, ये लोग बार-बार कपिल मिश्रा पर आरोप लगाते रहे कि उसने धमकी दी है, जबकि मिश्रा ने सिर्फ यह कहा कि अगर सड़क खाली नहीं हुई तो वो भी सड़क पर उतरेंगे। इसमें धमकी कहाँ है, वो किसी को समझ में नहीं आया। 23 फरवरी को ‘सेलिब्रेटिंग इन्क्लाब, की नौंटकी हुई और सड़क पर भीड़ जमा होने लगी।

पृष्ठभूमि तैयार थी, ट्रम्प के दिल्ली पहुँचने का इंतजार था। पुलिस अपनी तैयारी में थी क्योंकि अमेरिकी राष्ट्रपति के आने पर पूरा शहर एक बखतरबंद किले में तब्दील हो जाता है। दंगाइयों को इसी मौके का इंतजार था। ‘पिजंरा तोड़’ ने 24 फरवरी को पोस्ट किया कि RSS और भाजपा के गुंडे, लाठी, सरिया और पत्थर ले कर ‘भड़काऊ’ नारेबाजी कर रहे हैं।

जबकि, जाफराबाद मेट्रो स्टेशन के निकटवर्ती इलाकों में छतों पर पत्थर, एसिड की बोतलें, पेट्रोल बम और हथियार इकट्ठा हो रहे थे। समय बीता और पत्थरबाजी शुरु हुई। पुलिस ट्रम्प की सुरक्षा में बँटी हुई थी, पूरा केन्द्रीय नेतृत्व ट्रम्प की आवभगत में लगा हुआ था और सीलमपुर, मौजपुर, जाफराबाद आदि इलाके में किसी हिन्दू को उसकी बाइक पर ‘जय श्री राम’ के स्टिकर के कारण भीड़ ने लिंच कर दिया।

कहीं आइबी के अंकित शर्मा को ताहिर हुसैन की घर में खींच लिया गया और उसे चाकुओं से दो घंटे तक गोदा! 400 से ज्यादा घायल, 50 से ज्यादा मौतें, करोड़ों की सम्पत्ति का नुकसान। फिर दंगों के बाद जो हिन्दुओं की कहानियाँ सामने आईं कि उनके मंदिर पर हमला हुआ, उनकी बच्चियों के कपड़े उतार लेते थे मजहबी लड़के, समुदाय विशेष के स्कूल पर दिखावे के दो-चार खरोंच, बगल के हिन्दू के स्कूल को पूरी तरह से राख में बदल दिया… पेट्रोल पम्प पर हमला हुआ, हिन्दू की बच्ची की शादी में सिलिंडर वाले इलाके में आग लगाई गई… अनेक कहानियाँ…

ये एक प्रोजेक्ट था जो शरजील इमाम, जामिया कॉर्डिनेशन कमिटी और कई लोगों की मिलीभगत थी। इसमें जामिया के दंगे, फिर जेएनयू में वामपंथियों द्वारा की गई हिंसा जिसमें ABVP के बच्चों को बुरी तरह पीटा गया और मरणासन्न होने तक मारा गया, सब एक शृंखला की कड़ियाँ हैं। कदाचित् ऐसा हो कि कालांतर में आपको इन सारी भीड़ों में कुछ लोग हर जगह मिल जाएँ। वैसी ही एक भीड़ का संचालन ‘पिंजरा तोड़’ की नायिकाएँ भी कर रही थीं।

अब आप सोचिए कि हॉस्टल के ताले खुलवाने की बात को ले कर हुआ विरोध पचास हत्याओं के आरोप में कैसे संलिप्त पाया जाता है! क्या आपको इसमें वामपंथी हरामखोरी की बदबू नहीं आती? क्या आपको यह नहीं लगता कि राष्ट्रीय राजधानी में अलग-अलग कैम्पसों में आगजनी, हिंसा, मारपीट हो, और नॉर्थ कैम्पस में आने वाले बच्चे जिन इलाकों से आते हों, वहाँ दंगों का हो जाना सामान्य घटना तो नहीं है?

चर्चा में बने रहने की मजबूरी

दंगे भी हो गए, शाहीन बाग भी हट गया और कोरोना आ गया, लेकिन ‘पिंजरा तोड़’ को अपनी प्रासंगिकता बनाए रखनी थी। इसलिए, अपनी संलिप्तता के बावजूद लकड़बग्घों के इस गिरोह ने दाँत निपोड़ कर झूठ बोलने से कभी संकोच नहीं किया। इन्होंने शांति की बातें भी कीं। इन्होंने ‘सामुदायिक सद्भाव के लिए शांतिसभा’ जैसी नौटंकियाँ भी बुलाईं।

ऐसी बेहूदगी तो वामपंथियों का मुख्य शृंगार है। ये तो वामपंथी विचारधारा के चेहरे पर लगे उस बड़े नथ के समान है कि आदमी चेहरा देखना छोड़ कर नथ के मोती ही गिनता रह जाता है। इन्होंने अपना कलुषित चेहरा छुपाने के लिए खूब शांतिप्रिय पोस्ट किए लेकिन अब आम आदमी जानता है कि ‘शांतिप्रिय’ और ‘शांतिदूत’ जैसे शब्दों का प्रयोग किनके लिए और किन संदर्भों में होता है।

कोरोना के समय में अपने आप को चर्चा में बनाए रखना इनके लिए आवश्यक था क्योंकि सोशल मीडिया पर ताबड़तोड़ गर्दन झुलाकर जो भुतबाइह इन्होंने किया था, उसके बाद तो कानून के हाथ तो इनके बाल सँवारने आते ही। इसी कारण इन्होंने लगातार दंगा साहित्य रचना जारी रखी और सबसे पहले मजदूरों के सबसे बड़े हिमायती बनते दिखे। गरीबों की बातें कीं, रेंट फ्री करने की बातें हुईं, हॉस्टलों में जो छात्र-छात्राएँ रह रहे थे उनके स्वास्थ्य और सुरक्षा की बातें हुईं…

सारा दृश्य बड़ा मनोरम दिख रहा था। ऐसे में पहले जामिया की तथाकथित छात्रा सफूरा जरगर पकड़ी गई, फिर मीरान हैदर गए भीतर, शरजील को तो पता नहीं कितने राज्यों की पुलिस खोज रही है… और उसके बाद ‘पिंजरा तोड़’ की भी बारी आई और पुलिस इन्हें भी ले गई ताकि पता चले कि ट्रम्प के आने पर, इस वृहद तैयारी के साथ ऐसे दंगे कैसे हो गए और उसी इलाके में जहाँ ‘पिंजरा तोड़’ काफी समय से मौजूद था।

‘शांति’ शब्द और उसके रूपों का दुरुपयोग

‘पिंजरा तोड़’ लकड़बग्घा गिरोह भी वामपंथियों, जिहादियों और तमाम राष्ट्रद्रोहियों की तरह ही ‘शांति’ शब्द के शीलहरण का बराबर का भागीदार रहा है। इनके सारे ‘विरोध प्रदर्शन’ ‘शांतिपूर्ण’ होते हैं। इनके नारे ‘शांतिप्रिय’ तरीके से लगाए जाते हैं और ये हमेशा समर्थकों को ‘शांतिपूर्वक’ कार्य करने की सलाह देते हैं।

इन्होंने इस शब्द का वो हाल कर दिया है कि लोग अब आतंकवादियों के लिए ‘शांतिदूत’ का प्रयोग करते हैं। कोई जिहादी कहीं मारा जाता है तो कहा जाता है कि एक ‘शांतिप्रिय’ आदमी को सेना ने मार गिराया। जैसे पूर्व भारतीय कप्तान अनिल कुंबले जी ने अपने नाम के आगे तो स्पिनर लिखवा रखा था, लेकिन सीधी गेंदे फेंक कर इतने एलबीडब्ल्यू करवाए, कुछ वैसे ही, लेकिन नकारात्मक संदर्भ में, इन वामपंथियों ने ‘शांति’ शब्द को बाकी जनता को बेवकूफ बनाने के लिए इस्तेमाल किया है।

‘पिंजरा तोड़’ ने अपने फेसबुक पर 30 जनवरी को नाबालिग लड़के द्वारा गोली चलाने की घटना पर तो पूरा साहित्य रच दिया है और बताया कि कैसे भाजपा नेता के उकसाने पर उसने गोली चलाई, लेकिन शाहरूख का नाम, ताहिस हुसैन की करतूत, फैसल फारूख की छत आदि उनकी पूरी चर्चा से गायब रही। एक भी बार इन्होंने दंगाई समुदाय से, जिन्होंने अलग-अलग जगहों पर विरोध के नाम पर तीस जानें ले लीं, उसे शांति का संदेश नहीं दिया।

इससे यही झलकता है कि ‘शांति’ शब्द इनके लिए एक माध्यम है ताकि ये अपने गिरोह की शह पर कुछ न कुछ उल्टा करते रहें लेकिन मीडिया लिट्रेचर और कार्यक्रमों में यही लिखा जाए कि ‘पिंजरा तोड़’ द्वारा किए जा रहे शांतिपूर्ण विरोध में’। इसमें आप देखेंगे तो पाएँगे कि इस नौटंकी समूह को मीडिया के किस हिस्से ने ऐसे दिखाया है जैसे वो वेस्टर्न मीडिया की मलाला या ग्रेटा थनबर्ग हो।

रवीश कुमार, ‘द वायर’, ‘स्क्रॉल’, ‘क्विंट’, NDTV आदि ने इन्हें दलाई लामा की तरह दिखाया कि यही लोग हैं तो भारत में साम्प्रदायिक सौहार्द बचा हुआ है वरना… इनकी कवरेज आप देखिए इन जगहों पर चाहे वो इनके जामिया के समय के कथित विरोधों का दौर हो या फिर चार गिन पहले पुलिस के नोटिस के बाद, इन सारे वामपंथी, जिहादियों के हिमायती दंगाइयों को किसी नायक की तरह दिखाया जा रहा है और इनके नाम के आगे ‘स्टूडेंट एक्टिविस्ट’ लिखा जा रहा है!

काहे के स्टूडेंट एक्टिविस्ट? पुलिस पर पत्थर फेंकना, बसों में आग लगाना, भोली-भाली महिलाओं को अपने अजेंडे के लिए सड़क पर बिठा कर दंगों की पृष्ठभूमि तैयार करना… यही तो किया है इन लोगों ने। ‘शांति’ शब्द की ही तरह अर्बन नक्सलियों और जिहादियों को मीडिया ‘एक्टिविस्ट’ के रंग-बिरंगे जरीदार घाघरे में छुपाने की पुरजोर कोशिश करती है, लेकिन हो नहीं पाता।

ऐसे कैसे चलेगा बहन?

इनके वामपंथी एजेंडे का सच सामने आ चुका है। नॉर्थ कैम्पस में इनके लोगों ने ठीक-ठाक सफलता पाई है क्योंकि विद्यार्थी ही नहीं, शिक्षक भी इनके विषैले स्पर्शकों (टेन्टेकल्स) के दायरे में आ गए हैं। अब शिक्षक भी कैम्पस के विरोधों का हिस्सा बन रहे हैं। छात्र-छात्राओं पर सरकार विरोधी प्रदर्शनों में इकट्ठा होने का दवाब लगातार बनाया जा रहा है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के कई छात्र-छात्राओं में मुझसे बात करते हुए बताया कि कैसे वामपंथियों के साथ न होना या न्यूट्रल होना, विद्यार्थियों के पास के विकल्प में है ही नहीं। ऐसे लोगों को नीची नजरों से देखा जाता है, उन्हें उपहास का पात्र बनाया जाता है जैसे कि गैरवामपंथी होना कोई पाप हो।

‘पिंजरा तोड़’ का भांडा फूट गया है। इनके एक पोस्ट पर स्त्री-सुरक्षा की बात दिखी जहाँ पर इन्होंने इस खतरे को स्वीकारा है लेकिन कहा है कि बलात्कारियों को कड़ी सजा देना समाधान नहीं है क्योंकि सजा पाने वालों में इतने लोग इस जाति के हैं, इतने लोग ओबीसी हैं, इतने मायनोरिटी हैं, तो न्याय मिलने की और सुधार की संभावना कम हो जाती है।

अब आप तय कीजिए कि ये लड़कियाँ चाहती क्या हैं? ये जानती हैं कि दिल्ली लड़कियों के लिए असुरक्षित जगह है। ये जानती हैं कि बलात्कार और यौन हिंसा आम बातें हैं, और रात्रि में ये अपराध ज्यादा होते हैं। ये यह भी जानती हैं कि सरकार और प्रशासन को स्त्रियों की सुरक्षा के लिए कदम उठाना चाहिए।

लेकिन, इनको हॉस्टल के ताले खुले चाहिए। साथ ही, अगर तर्क के लिए ही सही, इनके साथ एक गार्ड को भेजा जाए कि अगर ये देर रात में आए, तो यही वो पहली लड़कियाँ होंगी जो चिल्लाएँगी कि उनकी निजता का हनन हो रहा है, ये कैसी सुरक्षा है कि वो जो करना चाह रही हैं वह कार्य किसी गार्ड की उपस्थिति में हो!

मतलब, स्वतंत्रता भी चाहिए, सुरक्षा भी चाहिए, ये भी पता है कि समाज में अपराध हो रहे हैं, सजा की बात हो तो जाति और अल्पसंख्यकों की गणना करने लगती हो… तुम्हें नहीं लगता कि तुम कन्फ्यूज्ड वामपंथन हो? मतलब, वामपंथन हो… कन्फ्यूज्ड तो वो बाय डेफिनिशन होते ही हैं! हें हें हें!

शामली: गोकश अफजल को पकड़ने गई पुलिस पर सैकड़ों ग्रामीणों का हमला

उत्तर प्रदेश के शामली जिले के झिंझाना थाना क्षेत्र में गोकश अफजल को पकड़ने गई पुलिस टीम पर सैकड़ों की संख्या में ग्रामीणों ने हमला कर दिया। एक सब इंस्पेक्टर समेत 3 पुलिसकर्मी घायल हो गए। आक्रामक भीड़ ने पुलिस की दो गाड़ियों को तोड़ डाला।

घटना मंगलवार (मई 26, 2020) देर रात की है। पुलिस अधीक्षक विनीत जायसवाल ने बताया कि आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत 100 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज करते हुए गोकश अफजल समेत 30 लोगों को अब तक गिरफ्तार किया जा चुका है।

दरअसल, झिंझाना थाना क्षेत्र के टपराना गाँव में पुलिस की टीम गोकश अफजल को पकड़ने गई थी। पुलिस ने यहाँ दबिश देकर अफजल को हिरासत में ले लिया। जिसे छुड़ाने के लिए आरोपी पक्ष के लोगों और सैकड़ों ग्रामीणों ने पुलिस पर हमला बोल दिया और गोकश को छुड़ाने में कामयाब रहे।

सूचना पाकर तुरंत आलाधिकारी कई थानों की फोर्स लेकर मौके पर पहुँचे और गोकश अफजल समेत 30 लोगों को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस अधीक्षक विनीत जायसवाल ने कहा कि जल्द ही अन्य अभियुक्तों की गिरफ्तारी भी कर ली जाएगी। एसपी ने बताया कि घायल पुलिसकर्मियों का मेडिकल करवाया गया है। सभी खतरे से बाहर हैं। गाँव में बड़ी संख्या में फोर्स को तैनात किया गया है। आरोपितों की गिरफ्तारी के लिए दबिश दी जा रही है।

जानकारी के मुताबिक जमीअत उलेमा-ए हिन्द के सदर मौलाना साजिद कासमी ने जिलाधिकारी जसजीत कौर को प्रार्थना-पत्र देकर आरोप लगाया कि जिले में पुलिस द्वारा एक खास समुदाय को पूरी तरह से टारगेट करते हुए परेशान किया जा रहा है। उन्होंने पुलिस द्वारा ग्रामीणों के साथ की गई मारपीट की घटना की मजिस्ट्रेट जाँच कराए जाने की माँग की है।

इससे पहले सोमवार (मई 25, 2020) को मुखबिरों से सूचना के आधार पर टपराना पहुँची पुलिस ने गोवंश कटान की तैयारी कर रहे युवक शाहनवाज को धर दबोचा था। उसके दो भाई इकराम व इमरान फरार हो गए। पुलिस ने मौके से चोरी किया गया एक बछड़ा व काटने के उपकरण बरामद किए। बताया जा रहा है कि पकड़ा गया युवक शाहनवाज इससे पूर्व भी गोवंशों काटने के आरोप मे जेल जा चुका है। वहीं परिवार के अन्य लोगो पर भी गोवंश तस्करी के आरोप हैं।

अलीगढ़: बसपा नेता मोहम्मद जाहिद के बेटे के निकाह में नाचीं बार बालाएँ, हॉटस्पॉट में सोशल डिस्टेंसिंग की उड़ी धज्जियॉं

उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में बसपा नेता व हिस्ट्रीशीटर मोहम्मद जाहिद के बेटे के निकाह में सोशल डिस्टेंसिग और लॉकडाउन का जमकर मखौल उड़ाया। निकाह में बार बालाओं को डांस हुआ। घटना मंगलवार (मई 26, 2020) की है।

कार्यक्रम का वीडियो वायरल होने पर पुलिस ने जाहिद व अन्य के खिलाफ FIR दर्ज कर लिया है। अलीगढ़ के एसएसपी मुनिराज ने इस बाबत जानकारी देते हुए बताया कि कार्यक्रम का आयोजन करने वाले के खिलाफ सोशल डिस्टेंसिंग के उल्लंघन का मामला दर्ज किया है। आरोपित के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

जानकारी के मुताबिक घटना सासनी गेट के सराय सुल्तानी मोहल्ले की है, जहाँ पर अधिकतम कोरोना संक्रमितों के मिलने की वजह से 100% लॉकडाउन है। इसके बावजूद बसपा नेता ने ये कार्यक्रम आयोजित किया। इस दौरान न तो किसी ने मास्क पहना था और न ही सोशल डिस्टेंसिंग का पालन किया गया।

वायरल हुए वीडियो में देखा जा सकता है कि कार्यक्रम में सैकड़ों की संख्या में लोगों की भीड़ इकट्ठी है और सोशल डिस्टेंसिंग की जमकर धज्जियाँ उड़ाई जा रही है। लोग स्टेज के पास आकर बार बालाओं के ऊपर पैसे भी लुटा रहे हैं। लोगों ने इसका वीडियो बनाकर विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर शेयर कर दिया। इसके बाद पुलिस ने संज्ञान लेते हुए मामला दर्ज कर लिया। बता दें कि अलीगढ़ के तीन थाना क्षेत्र- सदर कोतवाली, सासनी गेट और देहली गेट थाना क्षेत्र में 100 फीसदी लॉकडाउन किया गया है। 

गौरतलब है कि कोरोना संक्रमण अपने चरम पर है, मगर लोग हरकतों से बाज नहीं आ रहे। पिछले दिनों भी सासनी गेट में ऐसा ही एक मामला सामने आया था। जहाँ एक व्यापारी ने अपनी शादी की 25वीं सालगिरह धूमधाम से मनाई और गाना-बजाना तक हुआ। बीच सड़क पर भीड़ जमाकर हुए इस जश्र का जब वीडियो वायरल हुआ तो पुलिस ने व्यापारी व उनके अज्ञात परिजनों पर मुकदमा दर्ज कर लिया है।

‘उत्तराखंड जल रहा है… जंगलों में फैल गई है आग’ – वायरल तस्वीरों की सच्चाई का Fact Check

उत्तराखंड के जंगलों में लगने वाली आग मुख्यधारा की मीडिया का हॉट टॉपिक बना हुआ है। लेकिन क्या उत्तराखंड के जंगल इस साल की गर्मियों में वास्तव में आग में झुलस रहे हैं? जवाब है- नहीं।

सोशल मीडिया पर आजकल कुछ तस्वीरों को बड़ी मात्रा में शेयर किया जा रहा है। ‘टूरिज्म-एडवेंचर’ के फेसबुक ग्रुप्स से शुरू हुई ये तस्वीरें आखिरकार इन्हीं इन्टरनेट ग्रुप्स पर आधारित ‘वोक-युवा फ्रेंडली’ वेबसाइट्स स्कूपव्हूप, द लॉजिकल इन्डियन आदि के पास पहुँची और उन्होंने भ्रामक, ‘क्लिकबेट’ हेडलाइन और फर्जी तस्वीरों के जरिए सनसनी को आग देने का काम किया।

द लॉजिकल इन्डियन ने एक कदम आगे जाते हुए अपने ही द्वारा 2016 में प्रकाशित की गई खबर में इस्तेमाल भ्रामक बातों को 2020 में एक बार फिर भुनाने की कोशिश की है। ऐसे कर उसने साबित किया है कि केवल वेबसाइट के नाम में लॉजिक है, खबरों से उसका कोई लेना-देना नहीं है।

नतीजा यह हुआ कि सोशल मीडिया पर सिर्फ और सिर्फ उत्तराखंड के जंगलों की आग चर्चा का विषय बन गई।

हालाँकि, ऐसा नहीं है कि उत्तराखंड के जंगलों में इस वर्ष आग ही ना लगी हो। लेकिन जितनी हेक्टेयर वन भूमि पर आग की ख़बरों को बिना किसी पुष्टि के पुरानी तस्वीरों के साथ फैलाया जा रहा है, वह बेबुनियाद तथ्य है।

पिछले साल, इसी समय उत्तराखंड ने लगभग 1600 हेक्टेयर जंगलों के नुकसान की सूचना दी थी। इस साल अब तक प्राप्त आँकड़ों के अनुसार उत्तराखंड के 71 हेक्टेयर वन भूमि को नुकसान हुआ है। निसंदेह जंगलों की आग एक बड़ी विभीषिका है, लेकिन इस तरह की घटनाओं के बारे में भ्रामक जानकारियाँ और फर्जी खबरें व्यवस्थाओं और संस्थाओं का काम बढ़ाने का ही कार्य करते हैं।

जंगलों में आग का एक प्रमुख कारण यहाँ पर पाए जाने वाले चीड़  के पेड़ होते हैं, जिनमें ज्वलनशील लीसा पाया जाता है। साथ ही चीड़ की पत्ती में मौजूद राल इसे सड़ने-गलने भी नहीं देती है। ये राल भी बेहद ज्वलनशील होती है। इससे जंगल में आग लगने का खतरा बना रहता है। कई बार देखा गया है कि जंगलों से गुजरने वाले लोग अक्सर अधजली बीड़ी-सिगरेट फेंक देते हैं, जिसके कारण आग लग जाती है। आकाशीय बिजली के कारण भी जंगल दहक उठते हैं।

उत्तराखंड में पश्चिमी सर्कल के वनों के मुख्य संरक्षक (CCF) पराग मधुकर धकाते ने बताया कि सोशल मीडिया पर बहुत सी गलत सूचनाएँ, पुरानी तस्वीरें और फर्जी खबरें प्रसारित हो रही हैं। उन्होंने कहा कि गत वर्षों की तुलना में इस वर्ष जंगलों में लगने वाली आग में कमी आई है। साथ ही कुछ दिनों में बारिश हो रही है, इसलिए नमी बरकारार है और जंगल की आग की कम घटनाएँ सामने आ रही हैं।

सोशल मीडिया पर जंगलों की आग की जो तस्वीरें ‘द लॉजिकल इंडियन’ से लेकर ‘स्कूपव्हूप’ आदि ‘वोक-युवा फ्रेंडली’ वेबसाइट्स पर शेयर की जा रही हैं, वह वर्ष 2016 की हैं, ना कि 2020 की। PIB उत्तराखंड ने भी इन ख़बरों को भ्रामक और फर्जी बताया है।

आईएफएस एसोसिएशन उत्तराखंड के ट्विटर अकाउंट ने उत्तराखंड में वर्ष 2020 में जंगलों में लगने वाली आग के वास्तविक तथ्यों की तुलना ग्राफ के माध्यम से सामने रखी है। इसमें 2019 और 2020 में लगने वाली जंगलों की आग की तुलना से स्पष्ट होता है कि 2020 की आग पिछले वर्ष की तुलना में बहुत ही कम है।

मीडिया गिरोह का है कारनामा

वास्तव में विपक्ष और प्रोपेगेंडा मीडिया निरंतर ही केंद्र सरकार से लेकर भाजपा-शासित राज्यों को निशाना बनाने का प्रयास कर रहा है। प्रोपेगेंडा मीडिया द्वारा चलाई जा रही कोरोना वायरस की महामारी के समय में जब टेस्टिंग किट, वेंटिलेटर, पीपीई किट, 26 करोड़ संक्रमण आदि की नौटंकी फ्लॉप हो गई तो, यह मीडिया गिरोह उत्तराखंड के जंगलों की आग को ऐसे दिखा रहा है जैसे इससे भयावह आग कभी लगी ही न हो।

जंगलों की आग भयावह होती है, लेकिन 2020 के आँकड़े पिछले सालों की तुलना में कहीं भी नहीं ठहरते। इसी कारण, जब पूरा गिरोह एक साथ हल्ला मचा रहा है तो इनका प्रयोजन उत्तराखंड के जंगल या जानवरों से प्रेम दिखाना नहीं, बल्कि पैनिक बाँटना है।

इन ख़बरों को ‘भावुक किन्तु फर्जी’ तस्वीरों के जरिए ‘पशु प्रेमियों’ और ‘प्रगतिशीलों’ के फेसबुक ग्रुप्स में शेयर किया जा रहा है, ताकि सरकार के खिलाफ एक प्रकार का दबाव बनाया जाए कि यदि यह कोरोना से निपटने में सक्षम है तो वह जंगलों की आग की ओर ध्यान नहीं दे रही।

ईद का जश्न मनाने के लिए दी विशेष छूट: उद्धव के तुष्टिकरण की शिवसेना के मुखपत्र सामना ने ही खोली पोल

जब से उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने हैं, शिवसेना पर तुष्टिकरण की राजनीति को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं। अब उसके मुखपत्र सामना में प्रकाशित एक लेख से चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। इस लेख के मुताबिक महाराष्ट्र के मुंब्रा में समुदाय विशेष के लोगों को लॉ़कडाउन के बावजूद ईद मनाने के लिए विशेष रियायत दी गई।

लेख में कहा गया कि ईद-उल-फितर के मद्देनजर अल्पसंख्यक समुदाय को छूट दी गई थी। लेकिन अब ईद का जश्न खत्म हो चुका है, इसलिए सरकार दोबारा से लॉकडाउन के नियमों में सख्ती कर रही है। अब चिकन-मटन की दुकानें बंद रहेंगी और केवल मेडिकल स्टोर और दूध की दुकानों को खोलने की अनुमति होगी।

लेख में लिखा गया कि रमजान के मद्देनजर किसी भी प्रकार के तनाव को रोकने के लिए मुंब्रा निवासियों की अपील पर दी गई रियायत अब ईद के बाद जल्द खत्म होने वाली है। ठाणे नगर निगम ने कड़े लॉकडाउन का ऐलान कर दिया है। ये सख्ती 27 मई से लागू होगी।।इस दौरान दूध की दुकानें और दवाई की दुकानें को छोड़कर सभी दुकानें जैसे मछली, चिकन, और मीट की दुकानें पूरी तरह बंद होंगी।

इस समय देश में कोरोना के एक तिहाई मामले महाराष्ट्र में ही सक्रिय हैं। ऐसे में शिवसेना के मुखपत्र सामना का समुदाय विशेष के लोगों पर अलग से इनायत बख्शने और कोरोना का खतरा होने के बावजूद उन्हें छूट देने की बात मानना, बड़ा कबूलनामा है।

ठाणे नगर निगम द्वारा जारी सर्कुलर में कोरोना मामलों में वृद्धि की चेतावनी देते हुए लिखा गया कि सख्त लॉकडाउन घोषणा के बाद, इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोगों ने दुकानों और सब्जी मंडियों में भीड़ देखी है। इसलिए अब यहाँ मेडिकल और दूध की दुकानों को छोड़कर किसी भी दुकानों को खुले रहने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

बता दें, पिछले दिनों मुंब्रा में कोरोना संक्रमितों की संख्या में अचानक इजाफा देखा गया था। अब तक देश की आर्थिक राजधानी से कोरोना के 298 केस सामने आ चुके हैं। स्वयं नेशनलिस्ट कॉन्ग्रेस पार्टी के नेता जितेंद्र आव्हाड भी पिछले महीने कोरोना संक्रमित पाए गए थे।

पूरे महाराष्ट्र में अब तक कोरोना के 54हजार मामले दर्ज हो चुके हैं। इनमें से 60 प्रतिशत मामले केवल मुंबई से हैं। यहाँ पर मृत्यु का आँकड़ा भी 1000 के पार पहुँच गया है। उल्लेखनीय है कि राज्य में भले ही पिछले दो दिन में ये कोरोना केसों में गिरावट देखने को मिली है। लेकिन पिछले लगातार दो हफ्तों में यह आँकड़ा 1000 से भी अधिक रहा है।

वियतनाम: ASI को खुदाई में मिला 1100 साल पुराना शिवलिंग, बलुआ पत्थर से है निर्मित

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को एक संरक्षण परियोजना की खुदाई के दौरान 9वीं शताब्दी का शिवलिंग मिला है। इस शिवलिंग के मिलने की जानकारी भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर तस्वीरों के साथ दी है।

खुदाई में प्राप्त बलुआ पत्थर से निर्मित यह शिवलिंग पूरी तरह से सुरक्षित है। इसे किसी तरह की हानि नहीं पहुँची है। यह शिवलिंग ASI को वियतनाम के माई-सन (मी-सान) मंदिर परिसर की खुदाई के दौरान मिला है।

इस ऐतिहासिक शिवलिंग के मिलने पर ASI की प्रशंसा करते हुए विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपने आधिकारिक ट्विटर एकाउंट से लिखा, “9वीं शताब्दी का अखंड बलुआ पत्थर शिवलिंग वियतनाम के ‘माई सन’ मंदिर परिसर में जारी संरक्षण परियोजना की नवीनतम खोज है। एएसआई की टीम को बधाई।”

इसके साथ ही विदेश मंत्री ने खुदाई में प्राप्त शिवलिंग की तस्वीरें ट्वीट कर 2011 में इस अभयारण्य की अपनी यात्रा का भी जिक्र किया है। एक अन्य ट्वीट में उन्होंने इस खोज को भारत की विकास साझेदारी का एक महान सांस्कृतिक उदाहरण भी बताया है।

पूरी तरह से सुरक्षित यह शिवलिंग हिंदू मंदिरों के एक परिसर का हिस्सा है। इसका निर्माण शक्तिशाली चंपा साम्राज्य द्वारा 4 शताब्दी ईस्वी सन् और 13 वीं शताब्दी ईस्वी के बीच माई सन में किया गया था।

उल्लेखनीय है कि ‘माई सन’ एक यूनेस्को (UNESCO) विश्व धरोहर केंद्र है, जो 10 शताब्दियों में निर्मित विभिन्न हिंदू मंदिरों का घर है। यह चाम लोगों के उन्नत तकनीकी सभ्यता का एक अद्भुत उदाहरण है।

‘रिपब्लिक टीवी को रिपोर्टिंग करने से रोकना चाहते हैं महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख’

रिपब्लिक मीडिया के संस्थापक अर्नब गोस्वामी को लेकर महाराष्ट्र सरकार का रुख धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगा है। ताजा मामला राज्य में कोरोना के हालातों से जुड़ी सीरीज करने को लेकर है। 25 मई को टेलीकास्ट की गई इस सीरीज के बाद राज्य के गृहमंत्री अनिल देशमुख बौखलाए हुए हैं और अर्नब से संबंधित पुराने मामलों को खुलवाने के लिए आदेश दे चुके हैं।

गृहमंत्री के इसी फैसले के मद्देनजर रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क ने अपनी ओर से बयान जारी किया है। इस बयान में उन्होंने महाराष्ट्र सरकार के घटिया तरीकों और लोगों को डराने वाले बर्ताव को देखकर हैरानी जताई है।

बयान में उन्होंने बताया है कि 25 मई को उन्होंने एक सीरीज की। इस सीरीज में उन्होंने कोरोना के समय में महाराष्ट्र के हालात को दर्शाया। साथ ही महाराष्ट्र सरकार द्वारा ट्रेनों की अनुपलब्धता के ऊपर दिए झूठे बयानों पर तथ्यों के साथ बात रखी। मगर, इस शो के 24 घंटे बाद ही महाराष्ट्र के गृहमंत्री ने हर प्रोटोकॉल तोड़ते हुए अपने ट्विटर हैंडल से अर्नब गोस्वामी को और रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क को ये कहकर धमकाना शुरू कर दिया कि वो कोर्ट द्वारा बंद किए गए एक साल पुराने केस को दोबारा से खोलेंगे।

बयान में आगे लिखा गया कि राज्य के गृहमंत्री को पता होना चाहिए कि कोर्ट का कानून ही केस को दोबारा से खोल सकता है। लेकिन, अगर फिर भी होम मिनिस्टर ऐसा कुछ करते हैं तो वो कानून का उल्लंघन होगा। बाकी जनता को डराने के लिए उनके इस तरह निर्णय केवल उनकी मंशा और उनके प्रतिशोध को दर्शाता है।

रिपब्लिक मीडिया के बयान में पालघर और यस बैंक-डीएचएफएल फ्रॉड केस जैसी घटनाओं में देशमुख की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा गया कि ये स्पष्ट है कि अनिल देशमुख अपनी मंत्री पद की शक्तियों का बेजा इस्तेमाल कर रिपब्लिक मीडिया को रिपोर्टिंग करने से रोकना चाहते हैं, क्यूँकि मीडिया संस्थान का मुख्यालय मुंबई में ही है।

मीडिया संस्थान के बयान अनुसार, जिन केसों को गृहमंत्री प्रतिशोध भावना से खोलने का विचार कर रहे हैं, उनमें से कइयों को कोर्ट के कानून और आदेश द्वारा खारिज कर दिया गया था, वो भी इसलिए क्योंकि उन्होंने उन आरोपों पर पहले ही तथ्य पेश कर दिए थे।

उल्लेखनीय है कि इस बयान के साथ रिपब्लिक मीडिया ने उन तथ्यों को भी जोड़ा है, जिसके कारण अर्नब के ख़िलाफ़ चल रहे केसों को कोर्ट में बंद करना पड़ा। इसमें अन्वय नाइक की पत्नी अक्षता नाइक द्वारा कोर्ट में कोई सबूत न पेश कर पाने की बात का उल्लेख किया गया है। ARG आउटलायर मीडिया प्राइवेट लिमिटेड द्वारा 90% अमाउंट की पेमेंट की बात है और उन ईमेल-पत्रों, व्हॉट्सअप संदेशों आदि का जिक्र है, जिनमें सीडीपीएल को पूरा बैलेंस चुकाने और फाइनल सेटेलमेंट के लिए कॉन्टेक्ट किया गया।

अर्नब के ख़िलाफ़ अनिल देशमुख करवा रहे सीबीआई जाँच

मंगलवार को साल 2018 के एक मामले में महाराष्ट्र के गृहमंत्री अनिल देशमुख ने रिपब्लिक टीवी के संपादक अर्नब गोस्वामी और दो अन्य के ख़िलाफ़ दोबारा जाँच शुरू करने के आदेश दिए। इस केस को पिछले साल रायगढ़ पुलिस ने बंद कर दिया था। लेकिन, दोबारा केस को खोलने के पीछे अनिल देशमुख ने मृतक की बेटी अदन्या नाइक को वजह बताया।

उन्होंने मंगलवार को ट्वीट करके हुए लिखा, “अदन्या नाइक ने मुझसे शिकायत की थी कि अलीबाग पुलिस ने अर्नब गोस्वामी के रिपब्लिक टीवी से बकाया राशि का भुगतान नहीं करने की जाँच नहीं की थी, जिसके कारण मई 2018 में उसके उद्यमी पिता और दादी ने आत्महत्या कर ली थी। मैंने मामले की सीआईडी जाँच का आदेश दिया है।”

इसके अलावा, बता दें महाराष्ट्र सरकार ने अर्नब गोस्वामी और उनके संस्थान रिपब्लिक टीवी के ख़िलाफ़ एक और आपराधिक केस में नई जाँच शुरू की है। ये जाँच मीडिया संस्थान पर कोरोना संकट के बीच महाविकास अघाड़ी सरकार के ख़िलाफ़ आलोनात्मक रिपोर्टिंग करने के कारण शुरू हुई है।

इससे जुड़े पेपर भी रिपब्लिक मीडिया को भेजे जा चुके हैं। इन पेपर्स के मुताबिक, ये जाँच बांद्रा में प्रवासी मजदूरों की भीड़ इकट्ठा होने के बाद संस्थान द्वारा इस मुद्दे पर की गई रिपोर्टिंग पर आधारित है।

गौरतलब है कि पालघर मामले में सोनिया गाँधी पर टिप्पणी करने के बाद अर्नब गोस्वामी पर कॉन्ग्रेस लगातार हमलावर है। इसी क्रम में कुछ हफ्तों पहले उनपर अलग-अलग राज्यों में एफआईआर हुई। उनपर हमला हुआ। उनसे 12 घंटे तक पूछताछ हुई और बाद में प्रतिशोध के लिए उस मामले को उजागर किया गया, जिसे कोर्ट सबूतों के अभाव में पहले ही बंद कर चुका था।

‘मोदी मंदिर’ बनाने की खबर फर्जी: MLA गणेश जोशी ने कॉन्ग्रेस को बताया ‘मोदीफोबिया’ से ग्रसित

उत्तराखंड मसूरी विधानसभा क्षेत्र के विधायक और भाजपा नेता गणेश जोशी द्वारा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मंदिर बनाने और मोदी स्तुति की खबर को ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ से लेकर अन्य प्रमुख मुख्यधारा की मीडिया ने मनगढ़ंत रूप से प्रकाशित किया है। इसके विपरीत भाजपा नेता गणेश जोशी का कहना है कि उनसे बयान लेकर मीडिया ने अपनी मर्जी से काल्पनिक बातों को प्रकाशित किया।

ऑपइंडिया से बातचीत में मसूरी विधायक गणेश जोशी ने बताया कि ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ की पत्रकार ने जब उनसे ‘मोदी आरती’ के बारे में पूछा तो इस पर उन्होंने यही कहा था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लोकप्रिय नेता हैं और कई लोग उनका सम्मान करते हैं, लेकिन इस बयान की जगह TOI ने फर्जी खबर को प्रकाशित किया है।

‘कभी नहीं कहा कि PM मोदी का मंदिर बना रहा हूँ’

दरअसल, भाजपा नेता गणेश जोशी ने कहा था कि पीएम मोदी की छवि के कारण लोग उन्हें श्रद्धेय मानते हैं, उनकी पूजा भी करते हैं और लोगों ने इसी कारण उनके मंदिर भी बनाए हैं। लेकिन ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ की रिपोर्टर ने उनके बयान को एक किनारे रखकर यह खबर प्रकशित करना ज्यादा बेहतर समझा कि भाजपा के विधायक गणेश जोशी ने कहा है कि वो पीएम नरेन्द्र मोदी का मंदिर बनाने जा रहे हैं।

गणेश जोशी ने यह भी कहा कि बहुत से लोगों ने कॉन्ग्रेस पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी और रजनीकांत के लिए भी मंदिर बनाया है क्योंकि वे लोग उनसे प्यार करते हैं और उनका सम्मान करते हैं।

‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ की रिपोर्टर द्वारा प्रकाशित इस खबर को फर्जी बताते हुए ऑपइंडिया से बातचीत में विधायक गणेश जोशी ने कहा कि इस झूठी रिपोर्ट को अन्य मीडिया संस्थानों ने भी बिना उनका बयान पूछे ही प्रकाशित कर उनकी छवि खराब करने का काम किया है।

‘मोदी-आरती’ की वास्तविकता

गौरतलब है कि हाल ही में उत्तराखंड में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समर्थक डॉ. रेनू पंत ने कोरोना वायरस संकट के दौरान प्रधानमंत्री मोदी के कुशल नेतृत्व और COVID-19 वायरस के कारण जारी लॉकडाउन को लेकर लिए गए जरूरी फैसलों से प्रभावित होकर उनके सम्मान में ‘मोदी-स्तुति’ लिखी थी।

इसी मोदी-आरती को लेकर विपक्ष और मीडिया भाजपा नेताओं को इससे जोड़ने का प्रयास कर रहा है। जबकि डॉ. रेनू पंत का भाजपा से कोई लेना-देना नहीं है और वो सिर्फ पीएम मोदी की समर्थक हैं।

विधायक गणेश जोशी ने ऑपइंडिया से स्पष्ट करते हुए कहा- “वास्तव में, जिस तरह से बीजेपी कोरोना वायरस के खिलाफ लड़ रही है और जरूरतमंद लोगों को राहत प्रदान कर रही है, उसे लेकर विपक्ष चिंतित है।

भाजपा नेता गणेश जोशी ने कहा-

“अकेले मेरे निर्वाचन क्षेत्र में हमने अब तक तकरीबन 3 लाख भोजन पैकेट्स वितरित किए हैं और 17 हजार से अधिक लोगों को राशन सामग्री प्रदान की है। लेकिन कॉन्ग्रेस कोरोना वायरस की महामारी के समय धरातल से एकदम गायब है। और अब मात्र एफआईआर की राजनीति के सहारे ही खड़ी है। हमने देखा है कि किस तरह से कॉन्ग्रेस द्वारा मीडिया के खिलाफ एफआईआर की राजनीति की जा रही है, और अब वो इसका इस्तेमाल निर्वाचित प्रतिनिधियों के खिलाफ भी कर रहे हैं, यह निंदनीय और शर्मनाक है।”

कॉन्ग्रेस पर द्वैषपूर्ण राजनीति करने की बात रखते हुए भाजपा नेता गणेश जोशी ने कहा – “वे मीडिया में इस तरह की फर्जी खबरें जारी कर हमारे प्रयासों को पटरी से उतारने की कोशिश कर रहे हैं। मैंने अपने मंदिर में फोटो रखने के बारे में कभी कुछ नहीं कहा। हर दूसरे कार्यकर्ता की तरह ही मेरे कार्यालय में भी पीएम मोदी की एक तस्वीर है और उनके प्रति मेरे मन में सम्मान और श्रद्धा है। लेकिन मीडिया और विपक्ष फेक न्यूज़ के जरिए यह साबित करने का प्रयास कर रहा है कि मैं पीएम मोदी का मंदिर बनाने की योजना बना रहा हूँ। यह बिल्कुल निराधार और बेबुनियाद खबरें हैं।”

‘मोदीफ़ोबिया से ग्रसित है कॉन्ग्रेस’

विपक्ष और मीडिया को ‘मोदीफ़ोबिया’ से ग्रसित बताते हुए गणेश जोशी ने कहा कि डॉ. रेणु पंत एक स्कॉलर हैं, जिनकी रचना का धन सिंह रावत और उन्होंने अनावरण किया था। उन्होंने कहा कि डॉ. रेणु पंत एक आम नागरिक हैं, जिन्हें पीएम मोदी का प्रशंसक होने के कारण निशाना बनाया जा रहा है, वास्तव में यह सिर्फ और सिर्फ मोदीफोबिया है।

दरअसल, डॉ. रेणु पंत द्वारा ‘मोदी आरती’ उस समय पढ़ी गई, जब देहरादून के डोभालवाला स्थित राजकीय इण्टर कॉलेज में मसूरी विधायक गणेश जोशी एवं प्रदेश के राज्यमंत्री धन सिंह रावत ने लॉकडाउन के दौरान जरुरतमंद प्रवासियों एवं स्थानीय लोगों को भोजन, राशन, मास्क, सैनिटाइजर प्रदान करने वाले भाजपा कार्यकर्ताओं को सम्मानित करने के लिए उपस्थित थे।

गणेश जोशी ने कहा कि प्रशसकों द्वारा यदि प्रधानमंत्री मोदी के सम्मान में कुछ लिखा जाता है, तो उन्हें रोका भी नहीं जा सकता। साथ ही उन्होंने कॉन्ग्रेस को अपनी नकारात्मक सोच को छोड़ने की भी सलाह दी।

‘मोदी किचन’ के जरिए कोरोना वायरस से प्रभावितों की मदद कर रहे हैं गणेश जोशी

विधायक गणेश जोशी ने कोरोना वायरस की महामारी के दौरान ‘मोदी किचन’ के जरिए लॉकडाउन के कारण प्रभावितों को खाना खिलाने से लेकर उनकी अन्य जरूरतों में मदद करने का काम व्यापक स्तर पर किया है। कई प्रमुख समाचार पत्रों ने भी उनके इस कार्य की सराहना की है।

‘मोदी किचन’ में खाना बनाते हुए मसूरी विधायक गणेश जोशी

भूखे, असहाय और जरुरतमंदों के लिए ‘मोदी किचन’ खोलना गणेश जोशी का ही विचार था। शुरू में ऐसी 6 रसोइयाँ – डोभालवाला, जाखन, गढ़ी कैंट, मसूरी, राजपुर में तैयार की गईं। इसी की तर्ज पर भाजपा ने पूरे उत्तराखंड में ऐसे ही 200 ‘मोदी किचन’ खोलकर इस मॉडल को अपनाया और लोगों तक मदद पहुँचाई जा रही।

जरूरतमंदों के लिए राहत सामग्री वितरण करते हुए

इसके साथ ही गणेश जोशी द्वारा बाहरी राज्यों से घर लौट रहे प्रवासियों को फ़ूड पैकेट्स भी उपलब्ध करवाए जा रहे हैं।

1 वर्ष का वेतन, निर्वाचन क्षेत्र भत्ते एवं सचिवीय भत्ते से कटौती पर भी गणेश जोशी की सहमति

राहत सामग्री के साथ ही विधायक गणेश जोशी ने कोरोना महामारी से निपटने में अपना सहयोग करते हुए अपने 1 वर्ष का वेतन, निर्वाचन क्षेत्र भत्ते एवं सचिवीय भत्ते, यानी कुल आय का 30% कटौती पर सहमति भी दी है।

यह उत्तराखंड ही नहीं बल्कि पूरे देशभर में ही देखा जा रहा है कि कॉन्ग्रेस और मीडिया ने भाजपा सरकार को लेकर कोरोना वायरस के दौरान जारी लॉकडाउन के दौरान भ्रामक और फेक न्यूज़ के जरिए भाजपा सरकार और उनके समर्थकों के खिलाफ दुष्प्रचार करने का काम किया है, जबकि प्राथमिकता इस समय सिर्फ और सिर्फ लोगों को राहत पहुँचाने और व्यवस्थाओं का सहयोग करने पर ही होना चाहिए।

प्रजासुखे सुखं राज्ञः… तबलीगी और मजदूरों की समस्या के बीच आपदा में राजा का धर्म क्या

किसी आपदा के वक़्त राजा का धर्म क्या है? जब किसी देश पर कोई विपत्ति आती है तो राजा का और आज के संदर्भ में सत्तासीन नेताओं का जनता के प्रति क्या कर्तव्य है? इस राजधर्म की बड़ी सुंदर व्याख्या भारतीय वांग्मय में की गई है। कोरोना आपदा के बीच राजा का प्रजा के प्रति धर्म को समझना आवश्यक है।

रामचरितमानस में तुलसीदास जी लिखते हैं :
“जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी, सो नृप अवसि नरक अधिकारी।” – अर्थात जिस राजा के राज्य में प्रजा दुखी होती है, उसे नरक मिलता है।

इसी बात को एक और तरह से उन्होंने लिखा है।
“सोचिअ नृपति जो नीति न जाना, जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना। – यानी जो शासक अपनी जनता को अपने प्राण के समान प्यारा नहीं मानता वह सोच करने के लायक है।

राजा के धर्म का निरूपण कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में भी किया है। वे लिखते हैं :
प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्।
नात्मप्रियं प्रियं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं प्रियम्॥ (अर्थशास्त्र 1/19)
– अर्थात्, प्रजा के सुख में राजा का सुख है, प्रजा के हित में उसका हित है। राजा का अपना प्रिय कुछ नहीं है, प्रजा का प्रिय ही उसका प्रिय है।

एक अन्य ग्रन्थ में प्रजा को संतान के बराबर बताया गया है।
“पुत्र इव पितृगृहे विषये यस्य मानवाः। निर्भया विचरिष्यन्ति स राजा राजसत्तम॥”

इन सभी ग्रंथों की उक्तियों का एक ही निचोड़ है कि राजा को जनता का उसी तरह ध्यान रखना चाहिए, जिस तरह एक पिता अपने पुत्र की देखभाल करता है। आज के लोकतान्त्रिक सन्दर्भ में इस बात का सीधा अर्थ है- जो शीर्ष पर बैठा हुआ नेता अपनी संतान की तरह लोगों के प्राण, उनकी आजीविका तथा सम्मान की रक्षा नहीं कर सकता, वह राज करने लायक नहीं है।

इसी सिद्धांत को कोरोना संकट और उससे उत्पन्न स्थितियों पर भी लागू किया जाना चाहिए। यहाँ यह कहना ज़रूरी है कि कोरोना एक ऐसी बीमारी है, जिसका पूर्वानुमान लगाना किसी के लिए संभव नहीं था। जिसकी तैयारी कर पाना किसी के वश में नहीं था। इस छूत की बीमारी से बचने के कोई स्थापित मानक नहीं थे। लेकिन इस विपत्ति के समय एक ही अपेक्षा थी कि सत्तासीन नेता इस पर राजनीति न करें और लोगों को बीमारी से बचाने के लिए और उनकी तकलीफें दूर करने के लिए जो भी मुनासिब हो, वो करें।

कोरोना के साथ भारत के अब तक के अपेक्षाकृत सफल युद्ध में दो बड़ी दुर्घटनाएँ हुईं हैं। इन घटनाओं ने इस बीमारी के फैलाव और उससे पैदा हुई तकलीफों को और बढ़ा दिया। पहली गंभीर घटना थी, तबलीगी जमात के कारण कोरोना के संक्रमण का जबरदस्त फैलाव। पहले तो ऐसा लगा कि यह इतना बड़ा झटका है जिससे उबर पाना मुश्किल होगा।

पर देश ने बड़े धैर्य, संयम, जहाँ आवश्यक हुआ वहाँ ज़रूरी सख्ती के साथ इसका सामना किया। मोटे तौर पर तब्लीगी जमात की पोंगापंथी, मूर्खता, जाहिली और दकियानूसी सोच से उत्पन्न इस संकट को ठीक तरीके से हल किया गया।

यह संकट अभी ख़त्म नहीं हुआ था कि दूसरी बड़ी विपदा देश के सामने आ गई। वह थी देशभर से मजदूरों के पलायन की समस्या। इस संकट का सामना मेरे विचार से उतनी अच्छी तरह नहीं हुआ, जिस तरीके से किया जा सकता था। मजदूरों की एक विकट समस्या सबसे ज्यादा विकराल हुई देश की वित्तीय राजधानी मुंबई तथा देश की राजनीतिक राजधानी दिल्ली में। देश में ज्यादातर मजदूर दो राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार से आते हैं।

आज देश में कोरोना संक्रमण के जितने मामले हैं, उनमें से आधे से अधिक इन चार राज्यों- महाराष्ट्र (52667), दिल्ली (14053), उत्तर प्रदेश (6268) और बिहार (2686) में ही हैं। कुछ हद तक यह समस्या गुजरात में भी देखी गई।

सबसे पहले इस समस्या के संकेत दिखाई दिए दिल्ली में। देश में लॉकडाउन 25 मार्च को शुरू हुआ था। उसके तीन दिन बाद 28 मार्च को राजधानी दिल्ली में अचानक मजदूरों को संदेश मिला कि उनके जाने के लिए दिल्ली के आनंद विहार बस अड्डे पर व्यवस्था की गई है। ये बस अड्डा दिल्ली-उत्तर प्रदेश सीमा पर है। कई मोहल्लों में व्हाट्सएप के जरिए व अन्य संचार माध्यमों के जरिए मजदूरों तक यह अफवाह पहुँचाई गई।

यह गंभीर जाँच का विषय है कि किसने राजनीतिक स्वार्थों के कारण यह अफवाह फैलाई। मीडिया में छपी खबरों के अनुसार, दिल्ली में सत्ताधारी आम आदमी पार्टी के कुछ स्थानीय नेताओं का इसमें हाथ था। पार्टी के विधायक राघव चड्ढा की एक विवादित ट्ववीट भी इस दौरान आई जिसमें कहा गया था कि उतर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मज़दूरों को पिटवा रहें हैं। जबकि यह बात झूठी निकली।

लाखों मजदूर जब आनंद विहार बस अड्डे पर पहुँचे तो अफरा-तफरी तो मचनी ही थी। इस घटना के चित्र, खबरें और वीडियो मीडिया में छाए रहे। दुनिया में ये संदेश गया कि मजदूर बेहद परेशान हैं। अब यह जिम्मेदारी हर उस राज्य की थी, जहाँ भी यह प्रवासी मजदूर रह रहे हैं।

इन राज्यों को सुनिश्चित करना था कि श्रमिकों की ठीक से व्यवस्था हो। उन में आई हुई स्वाभाविक अनिश्चितता और बेचैनी कम हो। उनके खाने-पीने का सही इंतजाम हो। साथ ही उन से रहने की जगहों का किराया ना माँगा जाए। इस सबका उद्देश्य कोरोना के फैलाव को आगे बढ़ने से रोकना था। लेकिन ऐसा लगता है कि इसमें कई जगह कोताही हुई।

उधर 15 अप्रैल को मुंबई में बांद्रा के पास एकाएक कई हजार मजदूर जमा हो गए। उन्हें भी यह बताया गया था कि उनके लिए जाने की व्यवस्था की जा रही है। विनय दुबे नाम के एक कथित सामाजिक कार्यकर्ता ने सोशल मीडिया पर बाकायदा लॉकडाउन के खिलाफ राजनीतिक अभियान चलाया, जिसे मुंबई की पुलिस और प्रशासन ने अनदेखा किया। जबकि दिल्ली की घटना के बाद मुंबई को मुस्तैद होना चाहिए था।

असल में इस व्यक्ति के साथ नरमी बरती गई क्योंकि इसके सत्ताधारी नेताओं के साथ नज़दीकी रिश्ते थे। उधर कुछ मीडिया खबरों के मुताबिक महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने तो यहाँ तक कहा कि मजदूरों को अपने राज्यों में चले जाना चाहिए।

इस सारे घटनाक्रम से प्रवासी मजदूरों में खासी बेचैनी फैली। फिर तो हर जगह ऐसी घटनाओं का सिलसिला आरंभ हुआ। गुजरात में भी कई जगह ऐसा हुआ। राज्यों ने मज़दूरों की मनःस्थिति समझने में संवेदनहीनता का परिचय दिया। मजदूर गहरे संकट में थे। अधिकतर मजदूर एक साथ छोटे-छोटे कमरों, झोपड़ियों या अस्थायी निर्माणों में रहते है। वे घर से दूर थे। कामकाज बंद हो चुके थे। बेकार श्रमिक बदहाल थे।

छोटे-छोटे दड़बों में रहने वाले मजदूरों की मानसिक अवस्था क्या होगी, इसे समझा जा सकता है। उन्हें चिंता रही होगी- अपने घरबार की; उन्हें चिंता हो रही चिंता होगी अपने काम की; चिंता रही होगी अपनी जान की; उन्हें दूर बसे अपने परिवार की चिंता रही होगी।

यों भी जब पूरी दुनिया में कोरोना के संक्रमण और मौत का मंजर फैला हो तो व्यक्ति अपनों के साथ रहना चाहता है। इसलिए मजदूरों की दिक्कत समझी जा सकती है। उसके साथ सहानुभूति होनी चाहिए थी। जैसा कि हमने ऊपर कहा कि राजा का धर्म होता है अपनी प्रजा की चिंता संतान की तरह करें। पर महाराष्ट्र, दिल्ली और गुजरात में शुरू के दिनों में स्थानीय नेतृत्व ने ऐसा नहीं किया। 

ऐसा लगा कि महाराष्ट्र और दिल्ली में वहाँ का स्थानीय नेतृत्व चाहता था कि जितना जल्दी से जल्दी हो ये मजदूर अपने घरों को लौटे। यह एक गैर ज़िम्मेदार सोच थी, जो प्रवासी मज़दूरों को अपना नहीं बल्कि दूसरा समझती थी। इसमें अपनत्व नहीं बल्कि फौरी राजनीतिक स्वार्थ का भाव था। दिल्ली और मुंबई की अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने में इन प्रवासी लोगों का महत्वपूर्ण योगदान है।

प्रवासी श्रमिक भारत के नागरिक हैं। वे किसी भी राज्य के हों तथा आजीविका के लिए कहीं भी रहते हों, देश के संसाधनों पर उनका उतना ही अधिकार है, जितना किसी और नागरिक का। इन्हें वह सब मिलने का हक था, जो कि किसी अन्य नागरिक को मिलता है। पर ऐसा नहीं हुआ, इसके कारण मजदूरों में दूसरेपन का संदेश गया। इसके कारण पहले से ही एकाकी, क्षुब्ध, परेशान और काम न होने के कारण चिंतित मजदूरों में संदेश गया कि उन्हें घर लौटना चाहिए।

इससे  देश में अफरातफरी का माहौल पैदा हो गया। देश में प्रवासी मज़दूरों की संख्या करोड़ों मे हैं। इन सब की व्यवस्था करना इतना सरल भी नहीं था। पर न तो इन तक सही संदेश पहुँचाने की व्यवस्था की गई और ना ही समाज के इस अहम हिस्से से संवेदशील तरीके से संवाद किया गया।

इसके बाद भागमभाग का जो मंजर फैला उसे हमने देखा, उससे एक अंतरराष्ट्रीय नेरेटिव बना कि सरकारे तकलीफ में पड़े हुए अपने मजदूरों के प्रति संवेदनशील नहीं है। दुनिया भर के मीडिया में असंख्य सही और गलत स्टोरी इस पर चली है। हर स्तर पर अपने देश की व्यवस्था इसके लिए जिम्मेदार है। अभी भी इस पर राजनीतिक बयानबाजी हो रही है, जो अत्यंत अफसोसजनक है। इससे नेताओं को बचने की आवश्यकता है। 

इनमें से ज्यादातर प्रवासी मजदूर दो राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार के हैं। जहाँ उत्तर प्रदेश ने एक बड़ी हद तक संवेदनशीलता दिखाई, वहीं बिहार के नेताओं का आचरण उचित नहीं था। शुरू में बिहार के मुख्यमंत्री ने कहा कि इतनी बड़ी संख्या में जब बिहार के लोग लौटेंगे तो उसके लिए राज्य तैयार नहीं है। संकट के समय ऐसा बयान उचित नहीं था। देश के हर नागरिक को अपने घर जाने का अधिकार है। बिहार की सरकार को इस तरह का संवेदनहीन बयान नहीं देना चाहिए था।

उधर महाराष्ट्र सरकार का पूरा रिस्पॉन्स भ्रम से भरा हुआ था। ऐसा लगा कि उन्हें पता ही नहीं था कि क्या करना है। पहले तो लॉकडाउन को बड़े लचर तरीके से लागू किया गया। मुंबई देश की वित्तीय धड़कन है। वहाँ कोरोना रोकने के लिए जो प्रशासनिक मुस्तैदी चाहिए थी, वह नदारद थी। इस प्रशासनिक लचरपन को राजनीतिक बयानबाजी की आड़ में छिपाया नहीं जा सकता। 

शायद राज्य सरकार चाहती थी कि प्रवासी जल्द से जल्द दूर चले जाएँ और राज्य की समस्या कम हो जाए। पर हुआ उसका उल्टा ही। शुरू के दिनों में महाराष्ट्र में लॉकडाउन को लेकर जो अनिश्चितता बनी, उसके कारण वहाँ परिस्थिति विषम से विषमतर होती गई l आज स्थिति है कि महाराष्ट्र में 52,000 से ज्यादा कोरोना पीड़ित हैं।

महाराष्ट्र और खासकर मुंबई में इसकी तैयारी नहीं है। राजनीतिक रस्साकशी और नेतृत्व की अनुभवहीनता के कारण महाराष्ट्र जैसी सक्षम प्रशासनिक व्यवस्था ऐसे लगता है कि लाचार हो गई है। इससे उलट उत्तर प्रदेश का उदाहरण देखें तो मुख्यमंत्री योगी ने शुरू के दिनों में लॉकडाउन में बेहद सख्ती दिखाई और बाद में मजदूरों के प्रति संवेदनशील व्यवहार रखा।

इसी के कारण शायद वे अपने यहाँ कोरोना के संक्रमण को काफी सीमित रख पाए है। उधर गुजरात और तमिलनाडु में भी शुरू में इस समस्या की अनदेखी की गई। वहाँ भी मजदूरों के संकट को कम करके आँका गया। दिल्ली का हाल भी बुरा है। तीनों राज्यों में कोरोना संक्रमण की स्थिति नाज़ुक है।

कहा जा सकता है कि इस विपदा की घड़ी में कुछ राज्यों का नेतृत्व कसौटी पर सही नहीं उतरा। उसने मजदूरों को तकलीफ में फँसे अपने देशवासियों के रूप में न देखकर एक समस्या के रूप में देखा। उस समस्या को अपने से दूर रखने की कोशिश की। नेतृत्व में ज़रूरी संवेदनशीलता के अभाव से ये समस्या और भी गंभीर हो गयी। नहीं तो हमें देश में ऐसे दृश्य नहीं देखने को मिलते जो आज मीडिया में दिखाई दे रहे हैं।

फिर भी यह कहना पड़ेगा कि भारतीय समाज ने हर स्थान पर प्रवासी परिवारों से अपनत्व का व्यवहार किया। हर स्थान पर जिससे जितना संभव हुआ, लोगों ने इनके दिक्कते दूर करने के लिए प्रयास किए।

सामाजिक-धार्मिक संस्थानों जैसे गुरुद्वारों, मंदिरों, स्थानीय संस्थाओं, सेवा भारती, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा सैकड़ों अन्य छोटे बड़े संगठनों और व्यक्तिगत तरीके से लोगों ने जितना भी बन पड़ा, अपने इन प्रवासी मजदूर भाइयों के लिए किया। खाना, पानी, वाहन, राशन, चिकित्सा  आदि की व्यवस्था की। अगर यह सामाजिक शक्ति भारत में नहीं होती तो यह संकट कितना बड़ा हो सकता था, इसकी कल्पना करना भी तकलीफदेह है।

1992 अजमेर रेपकांड और ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के अपमान का आरोप: ‘सत्य सनातन’ के अंकुर आर्य पर FIR की कहानी

देश में एक सिलसिला सा चल पड़ा है। इसके तहत विपक्ष द्वारा शासित राज्यों में उन लोगों पर FIR कर दी जा रही है, जिनके विचार से वहाँ की सरकार या सरकार में प्रभाव रखने वाले लोग असहमत हों। ऐसी ही एक FIR ‘सत्य सनातन’ नामक यूट्यूब चलाने वाले आचार्य अंकुर आर्य के खिलाफ राजस्थान के अजमेर में हुई है। राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की सरकार चल रही है।

ऑपइंडिया ने इस सम्बन्ध में अंकुर आर्य से बातचीत की। उन्होंने इस FIR को लेकर अपनी बात रखी। दरअसल, अजमेर स्थित ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती दरगाह के अफसान चिश्ती ने एक ट्वीट किया था, जिसमें उन्होंने अंकुर पर कई आरोप लगाए थे। वहाँ उन्हें कुछ लोगों ने सलाह दी कि वो इस मामले में अंकुर पर FIR कर सकते हैं। बस फिर क्या? कॉन्ग्रेसी सरकार की मशीनरी में उन्होंने तुरंत ही ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के अपमान का मामला दर्ज करा दिया।

अब यहाँ राजनीति समझें। पहले अफसान ने राजस्थान के मुख्यमंत्री कार्यालय से दरख्वास्त की थी कि अंकुर के खिलाफ मामला दर्ज किया जाए। उन्होंने अपनी शिकायत में कहा था कि अजमेर दरगाह को बदनाम करने और ख्वाजा मोईनुद्दीन का अपमान करने के लिए अंकुर ने एक वीडियो शूट किया है, इसलिए उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए। शिकायत में वो एक यूट्यूब वीडियो की बात कर रहे थे, जो अंकुर के चैनल पर था। इसके बाद दिल्ली के पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा सहित देश भर से अंकुर के समर्थन में लोगों ने ट्रेंड चलाया।

सोशल मीडिया में काफी देर तक ‘वी सपोर्ट अंकुर आर्य’ नंबर एक पर ट्रेंड होता रहा। अब बात करते हैं, उस वीडियो की, जिसे लेकर बवाल मचा हुआ है। इस वीडियो में यति नरसिंहानन्द सरस्वती भी थे। इसलिए उनके खिलाफ भी FIR दर्ज करवा दी गई है। उन पर भी ख्वाजा और अजमेर दरगाह के अपमान का आरोप लगा है। साथ ही अंकुर के अप्रैल 2019 के एक वीडियो के आधार पर दावा किया गया कि उन्होंने ख्वाजा का अपमान किया है।

शिकायत में यति नरसिंहानंद सरस्वती पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती को किन्नर बताया है। बता दें कि अजमेरशरीफ का दरगाह उनके नाम पर ही है, जहाँ हिन्दू भी चादर चढ़ाने जाते रहे हैं। अक्सर बॉलीवुड सेलेब्स को वहाँ देखा जाता है। जब हमने अंकुर से पूछा कि क्या ये सच है तो उन्होंने बताया कि वीडियो को गलत सन्दर्भ में पेश किया गया है। उनकी नज़र में वीडियो को एडिट कर के उससे छेड़छाड़ की गई है।

ये सब तब से शुरू हुआ, जब अंकुर ने देवी चित्रलेखा नामक कथावाचक द्वारा व्यास पीठ से नमाज का गुणगान करने का विरोध किया था। इसी तरह उन्होंने उन तमाम कथावाचकों के खिलाफ विरोध दर्ज कराया था, जिन्होंने कथा के नाम पर इस्लाम का गुणगान किया था। इस सम्बन्ध में उन्होंने यति सरस्वती के साथ एक वीडियो बनाया था, जिसमें सरस्वती ने भी अपनी राय रखी थी। देवी चित्रलेखा ने एक वीडियो शूट कर के इन आरोपों का जवाब दिया था और बदले में कई अन्य आरोप लगाए थे।

अंकुर स्वामी रामेदव के गुरुकुल से पढ़े हुए हैं। उन्होंने बताया कि अपने ही धर्म के कथावाचकों के ‘शुद्धिकरण’ के लिए उनके खिलाफ बोलना शुरू किया लेकिन व्यास पीठ से ‘अली मौला’ गाने वाले मोरारी बापू के वयोवृद्ध होने के कारण उन्होंने उन पर टिप्पणी नहीं की और यति नरसिंहानन्द सरस्वती से इस सम्बन्ध में राय ली और उनका वीडियो बनाया। इस वीडियो में यति सरस्वती ने बताया कि हमारा इतिहास ही भूलों से भरा पड़ा है।

उन्होंने ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती को दिल्ली में पहली बार इस्लामिक शासन के लिए जिम्मेदार ठहराया। बकौल यति नरसिंहानंद सरस्वती, वो ख्वाजा ही थे, जिन्होंने मोहम्मद गौरी को दिल्ली पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किया था। बता दें कि शिकंजे में आने के बावजूद पृथ्वीराज चौहान ने गौरी को कई बार छोड़ दिया था लेकिन अंत में एक बार मोहम्मद गौरी विजयी रहा और उसने दिल्ली में इस्लामिक राज की स्थापना कर दी थी।

इसी का जिक्र करते हुए यति सरस्वती ने ‘ख्वाजा’ शब्द को लेकर टिप्पणी की। उन्होंने बताया कि फारसी में ख्वाजा शब्द का मतलब किन्नर होता है। साथ ही उन्होंने उन सब लोगों को अपना दुश्मन बताया, जो कथा के नाम पर इस्लामिक चीजों का महिमामंडन करते हैं।

अंकुर कहते हैं कि इन दोनों हिस्सों को अलग-अलग कर के प्रपंच फैलाया गया। यति सरस्वती ने अपने ही बिरादरी के कथावाचकों को अपना दुश्मन बताया था, लेकिन बकौल अंकुर, इसे ऐसे दिखाया गया- ‘ख्वाजा किन्नर है और यहाँ ये सभी मेरे दुश्मन हैं।’ ‘मरुधरा’ ने अपने वीडियो के जरिए ये प्रपंच फैलाया।

अंकुर का कहना है कि जो बात स्वामी यति ने कथावाचकों के लिए कहा था, उसे ऐसे दिखाया गया जैसे उन्होंने इसे समुदाय विशेष और ख्वाजा के लोगों के बारे में कहा था। यति सरस्वती खुद एक कथावाचक हैं और वो भागवत में दक्ष हैं। वो अक्सर भागवत कथा कहते हैं।

हमने अंकुर की बातों की तह तक जाने के लिए और सच्चाई जानने के लिए उस वीडियो को खोज निकाला, जिसमें उन्होंने और यति नरसिंहानंद सरस्वती ने इस सम्बन्ध में बातचीत की थी। हम वो वीडियो नीचे एम्बेड कर रहे हैं, जिसमें आप 13वें मिनट से लेकर 15वें मिनट तक वाला हिस्सा देख सकते हैं। कथावाचकों द्वारा अल्लाह का गुणगान और व्यास पीठ की मर्यादा पर बोलते हुए यति सरस्वती इसमें कहते हैं:

“व्यासपीठ पर अलग अल्लाह का ही नाम लेना है तो फिर राम की पूजा क्यों करें? अल्लाह की ही क्यों न करें सीधा? ये कथाएँ अल्लाह को सर्वोपरि बनाने के लिए हो रही है। मेरा सोचना है कि अल्लाह के नाम पर ही मेरे करोड़ों भाइयों-बहनों का खून बहाया गया। मैं उन सभी को अपना व्यक्तिगत दुश्मन मानता हूँ, जो उस अल्लाह को मानते हैं- चाहे वो मोरारी बापू हों या फिर कोई अन्य कथावाचक जो ऐसा करते हैं।”

अंकुर आर्य और स्वामी यति नरसिंहानंद सरस्वती की बातचीत

इस वीडियो को देखने से स्पष्ट पता चलता है कि यति नरसिंहानंद सरस्वती कथावाचकों से क्षुब्ध होकर उनके लिए बोल रहे थे, मजहब या दरगाह के लिए नहीं। हालाँकि, उन्होंने कई अन्य मुद्दों पर भी बात की थी लेकिन अगर ये वाला हिस्सा एडिट कर के बाहर निकाला जाए तो ऐसा ही लगेगा कि जैसे वो हर उस व्यक्ति के बारे में कह रहे हों, जो अल्लाह को मानता हो। जब सन्दर्भ देखें तो लगता है कि वो मोरारी बापू व अन्य कथावाचकों के लिए ऐसा बोल रहे थे।

अब आते हैं अंकुर के उस पुराने वीडियो पर, जिसे लेकर विवाद हुआ। ये मुद्दा अजमेर में हुए देश के सबसे जघन्य रेपकांड को लेकर था, जिसे चिश्ती के अपमान के रूप में दिखाया गया।

दरअसल, अजमेर में हुए रेपकांड का पूरा खेल वहाँ के कुछ कॉन्ग्रेस नेताओं और ख़ुद को चिश्ती का वंशज बताने वालों ने रचा था। स्थिति ये हो गई थी कि अजमेर की लड़की से शादी करने में लोग हिचकने लगे थे। 200 से भी ज्यादा लड़कियों को ब्लैकमेल कर के उनका बलात्कार किया गया। दोषियों को अब तक सजा नहीं मिल पाई है। कई बच गए। यहाँ तक कि पत्रकारों, फोटो स्टूडियो वालों और पुलिसकर्मियों तक ने ब्लैकमेल कर के लड़कियों का बलात्कार किया था, जिनमें अधिकतर स्कूल-कॉलेज जाने वाली छात्राएँ थीं।

कहते हैं, ये रेप स्कैंडल किसी बड़े परिवार के एक लड़के और 9वीं कक्षा की एक लड़की के बीच प्रेम संबंध से शुरू हुआ था। लड़के के दोस्तों ने उन दोनों की अश्लील तस्वीरें निकाल ली थीं और लड़की को अपने दोस्तों से जान-पहचान कराने को कहा था। फिर तो इसका सिलसिला ही चल पड़ा। बाद में तो पुलिस ने भी माना कि उन्होंने जानबूझ कर खादिमों के विरुद्ध लीगल एक्शन नहीं लिया। पुलिस को डर था कि इससे साम्प्रदायिक तनाव फैलेगा।

इसी मुद्दे को अंकुर ने अपने वीडियो के जरिए उठाया था। इसको लेकर अजमेर के चिश्तियों को बुरा लग गया और उन्हें प्रताड़ित करने के लिए उनके खिलाफ FIR दर्ज करा दी गई। अंकुर बताते हैं कि अजमेरशरीफ दरगाह पर आज भी ट्रांसजेंडरों का एक ‘उर्स’ लगता है, जो खुद को ख्वाजा से जोड़ कर देखते हैं। वो बताते हैं कि इस्लाम में LGBTQ समुदाय के लिए कोई जगह ही नहीं है, इस्लामिक पुस्तकों में उनका क़त्ल वाजिब माना गया है।

साथ ही अंकुर ये भी कहते हैं कि जिन मुल्कों से इस्लाम का प्रादुर्भाव हुआ, वहाँ तो मजार वगैरह का कोई कॉन्सेप्ट था ही नहीं, फिर ये यहाँ क्यों? राम मंदिर और मथुरा के साथ इन मजारों को जोड़ते हुए अंकुर का कहना है कि इन मजारों में से अधिकतर तो हिन्दू मंदिरों को ध्वस्त कर के बनाया गया है। उन्होंने दावा किया कि कई मजारों की आड़ में वेश्यावृत्ति से लेकर ड्रग्स तक के धंधे चल रहे हैं, क्योंकि उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करता। उन्होंने कहा:

“इस्लामिक मुल्कों में कब्रों को भी सामान्य माना जाता है। कब्रों को हटा भी दिया जाता है। पहली बात, मेरी वीडियो के साथ छेड़छाड़ कर के उसे पेश किया गया है। दूसरी बात, मैंने अजमेर में 1992 में हुए रेपकांड की बात की, जिसे ख्वाजा का अपमान बता दिया गया। तीसरा, ख्वाजा का अनुवाद किन्नर होता है। ऐसा हमने तो नहीं कहा? पारसी में ऐसा होता है। ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती के दरगाह ने उस सलीम चिश्ती की दुआ कबूल की है, जिसने 200 से भी ज्यादा लड़कियों का बलात्कार किया।”

ऑपइंडिया से बात करते हुए अंकुर आर्य ने पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी से पूछा कि अपनी सुविधा की हिसाब से वो किसी एक रेप का विरोध करते हैं लेकिन अपनी ही पार्टी के नेताओं और चिश्तियों द्वारा सीरीज में किए गए बलात्कार के खिलाफ क्या उन्होंने कभी कोई कैंडल मार्च निकाला या फिर क्या इसके खिलाफ कभी आवाज उठाई? उन्होंने कॉन्ग्रेस पर भी सवाल दागा कि अजमेर में हुए उस घिनौने अपराध के बारे में पार्टी क्यों कुछ नहीं बोलती?

अंकुर ने बताया कि ऐसे ही एक मजार की खुदाई की गई थी तो उसके नीचे से शिवलिंग निकला था। उन्होंने इसका वीडियो भी ट्वीट किया है। उन्होंने कहा कि वो हिन्दुओं से हमेशा अपील करते हैं कि जब भी वो किसी मजार के पास खड़े होते हैं तो ये ज़रूर सोचें कि वो किसी पवित्र हिन्दू प्रतीक चिह्नों पर पैर रख कर खड़े हैं। उन्होंने कहा कि ये उन्हीं लोगों के मजार होते हैं, जिन्होंने हिन्दुओं का क़त्ल किया है, हिन्दू महापुरुषों को मारा है।

उन्होंने एक मौलवी का भी वीडियो शेयर किया, जिसमें वो दावा कर रहा है कि ख्वाजा का मतलब किन्नर होता है और वहाँ ‘हिजड़ों’ का मेला भी लगता है। उस वीडियो में वो मौलवी अल्लाह की कसम खाते हुए कहता है कि सारे ‘हिजड़े’ ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती को अपना मानते हैं। ‘सत्य सनातन’ यूट्यूब चैनल के संस्थापक अंकुर आर्य ने ऑपइंडिया को बताया कि उन्होंने वही बात कही थी, जो कई मौलवी भी कहते रहे हैं, फिर इस पर हंगामा क्यों?

राजस्थान में कॉन्ग्रेस की सरकार है, ऐसे में इस FIR का क्या मतलब हो सकता है? इस सवाल पर अंकुर आर्य जवाब देते हैं कि ये सब डराने के लिए किया जा रहा है ताकि आगे चल कर कोई हिन्दू हितों के लिए आवाज़ ही न उठाए। उन्होंने कहा कि पुलिस ने अब तक उनसे संपर्क नहीं किया है, कानूनी प्रक्रिया के तहत वो अपना पक्ष रखेंगे। उन्होंने कहा कि वो अपने बयान पर अभी भी कायम हैं क्योंकि उनकी बातों को गलत सन्दर्भ में पेश किया गया है।