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रवीश कुमार की प्रिय ‘कारवाँ’ के लेखक ने फैलाई रेल में 10 यात्रियों की भूख से मरने की फर्जी खबर

वामपंथी प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘कारवाँ’ के एक पत्रकार ने ट्विटर पर भारतीय रेलवे के कारण हुई मौत को लेकर फर्जी सूचना जारी की है। कारवाँ के लेखक ने ट्विटर पर दावा किया है कि ट्रेन में 10 यात्रियों की भूख से मौत हो गई। यह भी ध्यान देने की बात है कि यह वही ‘कारवाँ’ है, जिसका प्रोमोशन रवीश कुमार अक्सर NDTV पर अपने प्रेम टाइम से लेकर अपने फेसबुक पोस्ट में करते नजर आते हैं।

‘कारवाँ’ के लेखक @VidyaKrishnan ने एक ट्वीट में लिखा है – “क्या कोई मुझे ऐसा लेख दिखा सकता है, जिसमें 40 रेलों के भटक जाने के बारे में लिखा गया हो और जो रेल यात्रियों को खाना खिलाना भी भूल गई हो, जिस कारण दस यात्रियों की मौत हो गई?

PIB ने इस ट्वीट को फर्जी बताते हुए इसका फैक्ट चेक किया है, जिसमें PIB ने स्पष्ट किया है कि यह दावा एकदम फेक है और भूख के कारण ऐसी कोई मौतें नहीं हुई हैं। PIB ने ट्वीट में लिखा है कि मौत का कारण उचित कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से ऑटोप्सी के बिना निर्धारित नहीं किया जा सकता है। कृपया असत्यापित खबरें फैलाने से बचें।

रेल में होने वाली मौत को लेकर झूठ फैला रहा है मीडिया

गौरतलब है कि श्रमिक ट्रेनों को लेकर रेल मंत्रालय को घेरने के लिए मीडिया फेक न्यूज चला रहा है, जिसमें अब NDTV के प्रोपेगेंडा पत्रकार रवीश कुमार भी शामिल हो चुके हैं। इस तरह से रवीश कुमार लगातार 3 फर्जी खबर फैलाते हुए पाए गए हैं। रवीश ने ‘दैनिक भास्कर’ की वो रिपोर्ट शेयर की, जिसे भारतीय रेलवे पहले ही फेक साबित कर चुका है।

रवीश कुमार ने अपने फेसबुक पेज पर ‘दैनिक भास्कर’ अखबार की एक ऐसी ही भावुक किन्तु फर्जी तस्वीर शेयर की है जिसे कि भारतीय रेलवे एकदम बेबुनियाद बताते हुए पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि ये पूरी की पूरी रिपोर्ट अर्धसत्य और गलत सूचनाओं से भरी हुई है।

दरअसल अब, ‘दैनिक भास्कर’ ने ऐसी ही एक ‘फेक’ इमोशनल स्टोरी प्रकाशित करके दावा किया कि मजदूर पहले ट्रैक पर मर रहे थे, अब वो ट्रेनों में मर रहे हैं। अपनी इमोशनल स्टोरी में भास्कर ने दावा किया कि ईद के दिन इरशाद नामक बच्चे की ट्रेन में ही मौत हो गई। हालाँकि, रेलवे ने बाद में जब सच्चाई बयान की तो भास्कर के इस ख़बर की पोल खुल गई।

इरशाद के पिता मोहम्मद पिंटू के हवाले से ‘दैनिक भास्कर’ ने दावा किया कि गर्मी की उमस और भूख के कारण उनके बेटे की मौत हुई है। इस ख़बर में ये भी दावा किया गया कि सूरत से सीवान पहुँचने में ट्रेनों को पूरे 9 दिन लग गए।

रेलवे ने इस ख़बर को नकारते हुए कहा है कि ये पूरी की पूरी रिपोर्ट अर्धसत्य और गलत सूचनाओं से भरी हुई है। भारतीय रेलवे के प्रवक्ता ने ट्विटर के माध्यम से बताया कि 25 मई को सूरत से दो ट्रेनें 2 दिन मे पहुँच गई थी, इसीलिए 9 दिन वाली बात झूठी है।

रेलवे ने बताया कि वो बच्चा पहले से ही बीमार था और इलाज के बाद उसके परिजन उसे लेकर लौट रहे थे। अभी तक पोस्टमॉर्टम भी नहीं की गई है, ऐसे में उसकी मौत के कारण के बारे में कुछ पता ही नहीं है।

रेल मंत्रालय के सूत्रों ने ऑपइंडिया को कन्फर्म किया कि 099339 नंबर की ट्रेन सूरत से 23 मई को सुबह साढ़े 5 बजे चली थी और 25 मई को 2:20 बजे सीवान पहुँच चुकी थी। वहीं 09439 नंबर की दूसरी ट्रेन सूरत से 23 मई को 11 बजे चली और 25 मई को शाम 4:55 में सीवान पहुँच गई।

ऐसे में 9 दिन वाली बात कहाँ से या गई, ये ‘दैनिक भास्कर’ ने बिना समय का जिक्र किए ही दावा कर दिया है। इसी तरह गया के एक मजदूर के बारे में ख़बर में दावा किया गया कि उसकी भी मौत ट्रेन में ही हो गई।

उसकी पहचान 44 वर्षीय नसीर खान के रूप मे बताई गई है। जबकि रेलवे ने बताया कि नसीर को लेकर जब ट्रेन दानापुर पहुँची, तब वह बेहोशी की हालत में था। वहीं महाराष्ट्र से भी एक श्रमिक की मौत की बात कही गई, जिसके लिए रेलवे को जिम्मेदार ठहराया गया।

रेलवे से बात करने पर इस घटना की सच्चाई पता चली। दरअसल, उक्त व्यक्ति अपने भतीजे अरमान खान के साथ सफर कर रहा था। वो ट्रेन संख्या 09447 से सफर कर रहा था। वहाँ पर उसकी तबीयत खराब होने की सूचना मिलते ही रेलवे की मेडिकल टीम डॉक्टर नीलेश के नेतृत्व में पहुँची।

वहाँ जाँच-पड़ताल के बाद उक्त व्यक्ति को मृत घोषित किया गया। इसके बाद आगे की प्रक्रिया के तहत जाँच की जा रही है, जिसके बाद और भी डिटेल्स सामने आएँगे। बावजूद इसके इस मौत के लिए रेलवे को जिम्मेदार ठहरा दिया गया।

लगातार 3 फेक न्यूज शेयर कर रवीश कुमार ने लगाई हैट्रिक: रेलवे पहले ही बता चुका है फर्जी

श्रमिक ट्रेनों को लेकर रेल मंत्रालय को घेरने के लिए मीडिया फेक न्यूज चला रहा है, जिसमें अब NDTV के प्रोपेगेंडा पत्रकार रवीश कुमार भी शामिल हो चुके हैं। इस तरह से रवीश कुमार लगातार 3 फर्जी खबर फैलाते हुए पाए गए हैं।

रवीश कुमार ने अपने फेसबुक पेज पर ‘दैनिक भास्कर’ अखबार की एक ऐसी ही भावुक किन्तु फर्जी तस्वीर शेयर की है जिसे कि भारतीय रेलवे एकदम बेबुनियाद बताते हुए पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि ये पूरी की पूरी रिपोर्ट अर्धसत्य और गलत सूचनाओं से भरी हुई है।

भारतीय रेलवे के प्रवक्ता ने ट्विटर के माध्यम से बताया कि 25 मई को सूरत से दो ट्रेनें 2 दिन मे पहुँच गई थी, इसीलिए 9 दिन वाली बात झूठी है।

रवीश कुमार और NDTV हमेशा की ही तरह आजकल भी लगातार झूठी और फर्जी कहानियों को शेयर करते हुए पकड़े गए हैं। इससे कुछ दिन पहले ही रवीश कुमार टाइम्स मैगजीन की एक फर्जी तस्वीर शेयर करते हुए पकड़े गए थे। उन्होंने टाइम मैगजीन के कवर की तस्वीर शेयर की, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की तस्वीर दिख रही है और साथ ही लिखा है- ‘Time To Go’, अर्थात जाने का समय आ गया है। रवीश ने इसे शेयर करते हुए तंज कसा और पूछा कि किसके बारे में लिखा हुआ है? हालाँकि, फेसबुक ने उनका फैक्ट-चेक कर दिया, जिसमें ये तस्वीर फर्जी निकली। 

इससे पहले रवीश कुमार ने मोदी सरकार पर निशाना साधने के लिए ‘द हिन्दू’ की एक खबर शेयर करते हुए चारा घोटाले में सजायाफ्ता लालू यादव का गुणगान किया था, जो फ़िलहाल राँची जेल में बंद है। उसमें कहा गया था कि सरकार की पहल के बाद भारतीय रेलवे ने मजदूरों को उनके गृह राज्य भेजने का निर्णय लिया है, जिसके लिए उन्हें कोई शुल्क नहीं देना होगा। रवीश ने झूठा दावा किया था कि मजदूरों से किराया लिया जा रहा है जबकि कोसी बाढ़ के समय लालू ने मुफ्त में ट्रेनें चलवाई थी।



दरअसल अब, ‘दैनिक भास्कर’ ने ऐसी ही एक ‘फेक’ इमोशनल स्टोरी प्रकाशित करके दावा किया कि मजदूर पहले ट्रैक पर मर रहे थे, अब वो ट्रेनों में मर रहे हैं। अपनी इमोशनल स्टोरी में भास्कर ने दावा किया कि ईद के दिन इरशाद नामक बच्चे की ट्रेन में ही मौत हो गई। हालाँकि, रेलवे ने बाद में जब सच्चाई बयान की तो भास्कर के इस ख़बर की पोल खुल गई।

इरशाद के पिता मोहम्मद पिंटू के हवाले से ‘दैनिक भास्कर’ ने दावा किया कि गर्मी की उमस और भूख के कारण उनके बेटे की मौत हुई है। इस ख़बर में ये भी दावा किया गया कि सूरत से सीवान पहुँचने में ट्रेनों को पूरे 9 दिन लग गए।

रेलवे ने इस ख़बर को नकारते हुए कहा है कि ये पूरी की पूरी रिपोर्ट अर्धसत्य और गलत सूचनाओं से भरी हुई है। भारतीय रेलवे के प्रवक्ता ने ट्विटर के माध्यम से बताया कि 25 मई को सूरत से दो ट्रेनें 2 दिन मे पहुँच गई थी, इसीलिए 9 दिन वाली बात झूठी है।

रेलवे ने बताया कि वो बच्चा पहले से ही बीमार था और इलाज के बाद उसके परिजन उसे लेकर लौट रहे थे। अभी तक पोस्टमॉर्टम भी नहीं की गई है, ऐसे में उसकी मौत के कारण के बारे में कुछ पता ही नहीं है।

रेल मंत्रालय के सूत्रों ने ऑपइंडिया को कन्फर्म किया कि 099339 नंबर की ट्रेन सूरत से 23 मई को सुबह साढ़े 5 बजे चली थी और 25 मई को 2:20 बजे सीवान पहुँच चुकी थी। वहीं 09439 नंबर की दूसरी ट्रेन सूरत से 23 मई को 11 बजे चली और 25 मई को शाम 4:55 में सीवान पहुँच गई।

ऐसे में 9 दिन वाली बात कहाँ से या गई, ये ‘दैनिक भास्कर’ ने बिना समय का जिक्र किए ही दावा कर दिया है। इसी तरह गया के एक मजदूर के बारे में ख़बर में दावा किया गया कि उसकी भी मौत ट्रेन में ही हो गई।

उसकी पहचान 44 वर्षीय नसीर खान के रूप मे बताई गई है। जबकि रेलवे ने बताया कि नसीर को लेकर जब ट्रेन दानापुर पहुँची, तब वह बेहोशी की हालत में था। वहीं महाराष्ट्र से भी एक श्रमिक की मौत की बात कही गई, जिसके लिए रेलवे को जिम्मेदार ठहराया गया।

रेलवे से बात करने पर इस घटना की सच्चाई पता चली। दरअसल, उक्त व्यक्ति अपने भतीजे अरमान खान के साथ सफर कर रहा था। वो ट्रेन संख्या 09447 से सफर कर रहा था। वहाँ पर उसकी तबीयत खराब होने की सूचना मिलते ही रेलवे की मेडिकल टीम डॉक्टर नीलेश के नेतृत्व में पहुँची।

वहाँ जाँच-पड़ताल के बाद उक्त व्यक्ति को मृत घोषित किया गया। इसके बाद आगे की प्रक्रिया के तहत जाँच की जा रही है, जिसके बाद और भी डिटेल्स सामने आएँगे। बावजूद इसके इस मौत के लिए रेलवे को जिम्मेदार ठहरा दिया गया।

राहुल गाँधी झोला उठाने को तैयार: Zoom प्रेस कॉन्फ्रेंस में कही ‘दिल की बात’, महाराष्ट्र पर दिखाई लाचारी

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी ने लॉकडाउन की स्थिति और कोरोना वायरस को लेकर आज प्रेस वार्ता में कई ऐसी बातें कहीं, जिनसे उनके बेबसी और निर्णय ना ले पाने की असमर्थता का पता चलता है।

राहुल गाँधी ने ना सिर्फ महाराष्ट्र में कॉन्ग्रेस को शिवसेना से अलग बताया बल्कि यह भी कहा कि उन्हें इजाजत नहीं मिलती वरना वो प्रवासियों के बैग अपने कंधों पर लेकर निकल रहे होते। साथ ही राहुल गाँधी ने चीन से चल रहे विवाद पर केंद्र सरकार को स्पष्ट बातचीत करने का आग्रह भी किया।

प्रेस वार्ता में कॉन्ग्रेस पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी के बेटे राहुल गाँधी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि वो कोरोना से 21 दिनों की जंग लड़ने जा रहे हैं जबकि आज 60 दिन हो गए हैं।

राहुल गाँधी ने कहा कि भारत ऐसा देश है, जहाँ वायरस तेजी से बढ़ रहा है। कोरोना के मामले बढ़ते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि लॉकडाउन फेल हुआ है और जो लक्ष्य पीएम नरेंद्र मोदी का था, वह पूरा नहीं है।

प्रेस वार्ता में राहुल गाँधी ने महाराष्ट्र राज्य में कोरोना वायरस के प्रकोप के लिए कॉन्ग्रेस को उत्तरदायी बताने से पीछे हटते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस महाराष्ट्र में निर्णय लेने की भूमिका में नहीं है।

राहुल गाँधी ने कहा कि सरकार चलाने और राज्य में सरकार का समर्थन करने के बीच अंतर है। उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस को पंजाब और राजस्थान जैसे राज्यों में निर्णय लेने वाली भूमिका में माना जा सकता है, लेकिन महाराष्ट्र में नहीं।

राहुल गाँधी ने यह बयान प्रवासी श्रमिकों से लेकर कोरोना वायरस तक के मामले में महाराष्ट्र सरकार की विफलता वाले प्रश्न पर दिया। यही नहीं, शिवसेना के बचाव में उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार को कोरोना वायरस महामारी से लड़ने में महाराष्ट्र राज्य की हर संभव मदद करनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि महाराष्ट्र इस समय एक कठिन लड़ाई लड़ रहा है।

लॉकडाउन के बीच अपनी भूमिका के बारे में राहुल गाँधी ने कहा- “हमारा काम बस अपोजिशन का है। हमारा काम सरकार पर प्रेशर डालने का है। अगर सरकार कुछ नहीं देख रही या इग्नोर कर रही है तो उसको हाईलाइट करना हमारा काम है। मैंने जो फरवरी में किया था, वही मैं आज भी कर रहा हूँ… मैंने अपनी पोजिशन नहीं बदली है।”

वहीं ट्रांसपोर्टेशन के सवाल पर राहुल गाँधी ने कहा कि मैं एक्सपर्ट नहीं हूँ। हाल ही में केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के एक बयान पर पत्रकारों के सवाल पर राहुल गाँधी ने कहा – “अगर वह मुझे परमिशन दें तो मैं एक का नहीं 10-15 लोगों का बैग उठाकर ले जाऊं, लेकिन मेरा लक्ष्य है कि जो उन मजदूरों के दिल में है वह बात हिन्दुस्तान के दिल में पहुँचे।”

उन्होंने कहा- “मैंने डॉक्यूमेंट्री इसलिए बनाई ताकि हिन्दुस्तान इनका दुख समझे, इसका बड़ा प्रभाव पड़ता है। अगर वित्त मंत्री को लगता है कि मैं ड्रामा कर रहा हूँ तो ठीक है, मुझे परमिशन दें और मैं उत्तर प्रदेश जाउँगा। जितने लोगों की मदद कर पाउँगा करूँगा।

विवादित Zoom ऐप से एक और प्रेस कॉन्फ्रेंस

राहुल गाँधी लॉकडाउन के दौरान प्रेस वार्ता के लिए ज़ूम ऐप का इस्तेमाल कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि राहुल गाँधी और उनके समर्थक इन्टरनेट पर लगातार आरोग्य सेतु ऐप की गोपनीयता नीतियों को लेकर भ्रामक दावे कर लोगों को गुमराह करते देखे गए हैं, जबकि Zoom ऐप की प्राइवेसी लगातार चर्चा और विवाद का विषय रही है।

अमेरिकी वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग ऐप ‘जूम’ को भारत में प्रतिबंधित करने की माँग की एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया करते हुए केंद्र से चार हफ्ते के भीतर मामले पर जवाब माँगा था और साथ ही, जूम को भी सुप्रीम कोर्ट ने नोटिस भेजा था।

इस याचिका में कहा गया था कि ज़ूम ऐप के इस्तेमाल से राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा हो सकता है। इसके अलावा इस अमेरिकी ऐप के जरिए अलग-अलग तरह के साइबर अपराधों को भी बढ़ावा मिल सकता है।

Zoom ऐप की विश्वसनीयता पर संदेह के कारण ही गृह मंत्रालय ने भी निर्देश जारी करते हुए कहा था कि वीडियो मीटिंग के लिए या सरकार के अधिकारियों और कार्यालयों द्वारा किसी भी उद्देश्य के लिए जूम प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

वहीं, राहुल गाँधी कई बार जूम ऐप की मदद से वीडियो कांफ्रेंसिंग करते हुए देखा गया है, जो कि बेहद संवेदनशील विषय हो सकता है।

‘राजीव गाँधी हत्यारा था’: तजिंदर बग्गा के ट्वीट पर अब पंजाब यूथ कॉन्ग्रेस ने दी FIR और हमले की धमकी

बीजेपी प्रवक्ता तजिंदर पाल सिंह बग्गा द्वारा 1984 के सिख दंगों के लिए पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी को जिम्मेदार ठहराने के बाद मंगलवार (मई 26, 2020) को पंजाब यूथ कॉन्ग्रेस ने उन्हें ट्विटर पर धमकी दिया।

पंजाब यूथ कॉन्ग्रेस ने धमकी देते हुए ट्वीट किया, “पंजाब आओ। हम पंजाब सीमा से पुलिस चौकी तक आपका स्वागत करेंगे क्योंकि आप जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं उसे कुछ शिष्टाचार सिखाने की जरूरत है।”

राजीव गाँधी पर सवाल उठाने की हिम्मत करने के लिए भाजपा प्रवक्ता को ’मानवता पर धब्बा’ करार देते हुए, यूथ कॉन्ग्रेस ने कहा कि राजीव गाँधी के खिलाफ ट्वीट करने से रोकने के लिए एक ‘सॉलिड पंजाबी स्टाइल रिस्पॉन्स’ की आवश्यकता थी।

दरअसल, मंगलवार सुबह तजिंदर पाल सिंह बग्गा ने एक ट्वीट करते हुए राजीव गाँधी को हत्यारा बताया। उनका यह ट्वीट 1984 में हुए सिखों के नरसंहार के संदर्भ में था, जब इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद दिल्ली में हजारों सिखों का नरसंहार किया गया था। पंजाब यूथ कॉन्ग्रेस ने इसी ट्वीट पर टिप्पणी करते हुए धमकी दी।

बीजेपी प्रवक्ता ने इस धमकी भरे ट्वीट का अपने अनोखे अंदाज में जवाब दिया। उन्होंने पंजाब यूथ कॉन्ग्रेस द्वारा दी गई धमकी को स्वीकार करते हुए कहा कि वह लॉकडाउन के बाद उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलेंगे।

बग्गा ने आगे उनसे मीटिंग की तारीख और जगह तय करने के लिए कहा। उन्होंने लिखा, “देखे आ एक सिख में ज्यादा दम है या राजीव गाँधी के चमचे में।”

गौरतलब है कि इससे पहले छत्तीसगढ़ कॉन्ग्रेस ने तजिंदर पाल सिंह बग्गा के खिलाफ FIR दर्ज कराई थी। कॉन्ग्रेस ने आरोप लगाया कि बग्गा ने राजीव गाँधी पर अपमानजनक टिप्पणी की है और साथ ही सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने का प्रयास किया है। काँकेर यूथ कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पंकज वाधवानी ने तजिंदर बग्गा के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कराया। इसकी सूचना ‘यूथ कॉन्ग्रेस’ ने सोशल मीडिया के माध्यम से दी। कॉन्ग्रेस ने साथ ही उन्हें ‘नफरत का वायरस’ करार दिया और कहा कि ऐसे किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा।

उन्होंने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा था, “कॉन्ग्रेस देश को ये संदेश देना चाहती है कि जो कोई भी गाँधी परिवार के खिलाफ बोलने कि हिमाकत करेगा, उसे चुप करा दिया जाएगा। ये सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से किया जा रहा है। अर्नब गोस्वामी, सुधीर चौधरी और सम्बित पात्रा के बाद अब मेरे पर एफआईआर दर्ज किया गया है। एक महीने के भीतर 4 लोगों पर इस तरह से एफआईआर हुए, वो भी कॉन्ग्रेस शासित राज्यों में, या फिर कॉन्ग्रेस के साथी दलों द्वारा शासित राज्यों में। जैसे, महाराष्ट्र में। पार्टी का सीधा संदेश है कि अगर एक परिवार के विरुद्ध मुँह खोलोगे तो तुम्हें प्रताड़ित किया जाएगा, तुम्हारे खिलाफ केस दायर किया जाएगा। “

‘राम मंदिर की जगह बौद्ध विहार, सुप्रीम कोर्ट ने माना’ – शुभ कार्य में विघ्न डालने को वामपंथन ने शेयर की पुरानी खबर

कम्युनिस्ट पार्टी के नेता अब सठियाने लगे हैं। दरअसल, जब किसी की मति भ्रष्ट होने लगती है तो उसे बिहार में ‘सठिया जाना’ कहते हैं। सीपीआई की पोलित ब्यूरो की सदस्य सुभाषिनी अली ने एक पुराना लेख शेयर कर के अयोध्या राम मंदिर विवाद में ‘ट्विस्ट’ की बात की। उन्होंने दावा किया कि अयोध्या राम मंदिर की जगह बौद्ध विहार था। हिन्दुओं और बौद्धों को लड़ाने के लिए ये प्रपंच रचा गया, ये बात किसी से छिपी नहीं है।

72 वर्षीय सुभाषिनी अली ने भी यही किया। अयोध्या राम मंदिर मामले का निपटारा हो चुका है। सुप्रीम कोर्ट में 5 जजों की पीठ ने राम मंदिर के पक्ष में फ़ैसला सुनाया था। बाबरी मस्जिद को वहाँ राम मंदिर को ध्वस्त कर के बनाया गया था, जिसके लिए हिन्दू 400 सालों से न्याय की माँग कर रहे थे। दूसरे पक्ष को 5 एकड़ ज़मीन कहीं और देने के लिए कहा गया। अब राम मंदिर निर्माण का कार्य भी शुरू हो चुका है, इसीलिए प्रोपगंडा भी चालू है।

आगे बढ़ने से पहले नास्तिक वामपंथन सुभाषिनी अली के बारे में जान लेते हैं। उनके माता-पिता प्रेम सहगल और लक्ष्मी सहगल सुभाष चन्द्र बोस की ‘इंडियन नेशनल आर्मी’ में कार्यरत थे। उनके तलाकशुदा पति मुजफ्फर अली जाने-माने फिल्मकार हैं, जिन्होंने ‘उमराव जान’ नामक चर्चित फिल्म का निर्देशन किया था। दोनों में तलाक हो चुका है और वो अलग रहते हैं। सुभाषिनी, बृंदा करात के अलावा पोलित ब्यूरो में अकेली महिला हैं।

अब बात करते हैं अयोध्या राम मंदिर में बौद्ध विहार होने वाले विवाद की। दरअसल, हाल ही में जब मंदिर के निर्माण के लिए खुदाई चालू की गई, तब वहाँ पुरातात्विक अवशेष मिले, जो वहाँ हिन्दू मंदिर होने के दावों की पुष्टि करते हैं। खंडित मूर्तियों के अवशेष के साथ-साथ वहाँ शिवलिंग भी मिले। राम मंदिर मामले में दूसरे पक्ष के वकील रहे जफरयाब जिलाने ने इसे प्रोपेगेंडा बता दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनावी फायदे के लिए ऐसा किया जा रहा है।

फिर दलितों को भटका कर उनका फायदा उठाने वाले भीमवादी सक्रिय हुए। दिल्ली के पूर्व सांसद उदित राज और कॉलेजों में सवर्णों का शोषण करने वाले दिलीप मंडल ने वहाँ बौद्ध मठ होने की बात कही। दोनों ने अपने गिरोह के साथ मिल कर प्रपंच फैलाया कि जिसे शिवलिंग कहा जा रहा है, वो एक बौद्ध स्तम्भ है। जबकि वहाँ जो चक्र मिला है, वो धम्म चक्र है। जो लोग पहले वहाँ मस्जिद होने की बातें कर रहे थे, अब वही बौद्ध विहार के लिए माहौल बनाने में जुट गए।

बौद्धों को याद दिलाया गया कि कैसे अशोक के पुत्र बृहद्रथ का उनके सेनापति पुष्यमित्र सुंग ने धोखे से वध कर दिया था। वामपंथी इतिहासकार कहते हैं कि इसके बाद बड़े स्तर पर बौद्ध विहारों और स्तूपों को ध्वस्त कर दिया गया था। कई तो इसे ब्राह्मणवादी अत्याचार तक कह कर दुष्प्रचारित करते हैं। इसीलिए, उन अवशेषों के अशोक काल के होने की बात कही गई। दलितों और बौद्धों को हिन्दू धर्म से अलग दिखाने के लिए ऐसा किया गया।

ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल के महासचिव खालिक अहमद खान ने कहा है कि यह अवशेष बौद्ध धर्म से जुड़े हैं। वामपंथी भी यही राग अलाप रहे हैं। कल को अगर वहाँ से कोई दिगंबर प्रतिमा मिलती है तो वो ये भी कहने लगेंगे कि वहाँ मंदिर नहीं था बल्कि जैन विहार था। एक तरह से देखा जाए तो उन्हें सिर्फ़ ये कहना है कि वहाँ मंदिर नहीं था। वो ख़ुद निश्चित नहीं हैं कि अगर मंदिर नहीं था तो था क्या? जब जैसा कुचक्र चले, किसी संप्रदाय को भड़काने के लिए कुछ भी बोल दो, यही उनका लक्ष्य है।

ऐसा नहीं है कि सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई नहीं हुई थी। सुभाषिनी अली ने जो ख़बर शेयर की है, वो 2018 की है, जब अयोध्या के ही विनीत कुमार मौर्य ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर वहाँ बौद्ध स्थल होने की बात कही थी। जिस तरह सुनवाई के बाद वहाँ मस्जिद वाला मामला रिजेक्ट हो गया, ठीक उसी तरह ये याचिका भी नकार दी गई।

इतिहास में बौद्ध काल के राज्यों द्वारा मंदिरों को ध्वस्त करने का विवरण नहीं मिलता। खुद सम्राट अशोक ने कई मंदिरों का जीर्णोद्धार कराया था। भगवान बुद्ध ने जिस ‘अहिंसा परमो धर्मः’ का उपदेश दिया, वो श्री कृष्ण द्वारा ही कहा गया था। इस हिसाब से हिन्दू धर्म और बौद्ध, ये दोनों ही प्राचीन सनातन संस्कृति के छत्र तले आगे बढ़े हैं। ऐसे में दोनों को लड़ाने वाली साजिश अंग्रेजों की चाल का अनुसरण है, और कुछ नहीं।

किसे नहीं ज्ञात है कि अंग्रेजों ने भारतवर्ष में अपना राज कायम करने के लिए लालची राजाओं का सहारा लिया था। एक-दूसरे से सभी राज्यों को लड़ाया था। साथ ही लोगों को भड़का कर सांप्रदायिक विभेद पैदा किया, ताकि उनके ‘फूट डालो और राज करो’ की व्यवस्था में कोई कमी न रह जाए। आज के नव भीमवादियों और इस्लामी कट्टरपंथी बुद्धिजीवियों की चाल को देखें तो वो अंग्रेजों से ही प्रेरित लग रहे हैं, और कुछ नहीं।

सुभाषिनी अली तो ख़ुद को नास्तिक बताती हैं और कहती हैं कि किसी भी धर्म में उनका कोई इंटरेस्ट नहीं है क्योंकि उन्हें लगता है कि कुछ धर्मों में काफी कड़े नियम बना दिए गए हैं। अगर उनकी किसी भी धर्म में रूचि नहीं है तो फिर अचानक से बौद्ध धर्म से उनका प्रेम कैसे सामने आ गया? असल में यहाँ जितने भी नास्तिक वामपंथी हैं, ऐसा नहीं है कि वो सभी धर्मों में विश्वास नहीं रखते, बल्कि वो हिंदुत्व से घृणा करते हैं और इसे नीचा दिखाना चाहते हैं।

जिस चीज का फैसला सुप्रीम कोर्ट में हो चुका है, जहाँ कार्य शांतिपूर्वक चल रहा है- वहाँ खलल डालने के लिए अभी और भी प्रपंच रचे जाएँगे। कल को ये लोग ये भी बोल सकते हैं कि जीसस का जन्म वहीं पर हुआ था। सुभाषिनी अली जैसे नेताओं का आजकल कोई काम-धाम बचा नहीं है, क्योंकि वामपंथियों का जेएनयू और केरल छोड़ कर बाकी पूरे देश से सफाया हो चुका है, तो उन्हें टाइमपास के लिए कुछ तो भ्रम और फेक न्यूज़ फैलाना होगा।

अयोध्या में दर्शन के लिए तो गुरु नानक भी गए थे, ऐसा सुप्रीम कोर्ट ने भी माना था। दस्तावेजों के अनुसार ऐसा साबित हुआ था। कल को हो सकता है कि जिस गुरु नानक का वहाँ दर्शन करने जाना राम मंदिर की मौजूदगी का सबूत बना, उन्हीं के अनुयायियों, सिखों को भड़काने के लिए यहाँ गुरुद्वारा होने की बात कह दी जाए। ऐसे ही कॉन्ग्रेस ने कर्नाटक में लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा देकर हिन्दू धर्म को तोड़ने की कोशिश की थी।

सनातन डेका हत्याकांड: ‘ये सिर्फ आर्थिक मदद नहीं, हमारी एकता का परिचायक है’, लोगों ने शुरु की मुहिम

असम में सब्जी विक्रेता सनातन डेका की हत्या के बाद अब उनकी पत्नी दीपाली डेका बिलकुल अकेली हैं। 5 आरोपितों में से पुलिस ने भले ही कल 2 मुख्य आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। लेकिन ये कहना मुश्किल है कि इससे दीपाली डेका को इंसाफ मिलेगा।

दीपाली के पास न तो अब पति है और न ही उनकी कोई औलाद है। लेकिन, विवशता देखिए, जीने के लिए अब भी उनके सामने पूरा जीवन बाकी हैं।

ऐसी घड़ी में जब पुलिस भी हत्यारों के साथ मामूली आरोपितों जैसा बर्ताव करती दिख रही है। उस समय दीपाली की मदद हेतु सोशल मीडिया पर श्री श्री शंकर देव समिति ने एक अभियान शुरू किया है। इस अभियान के तहत सनातन डेका के परिजनों के लिए आर्थिक मदद जुटाई जा रही है।

इस अभियान का लक्ष्य वैसे तो 30 लाख रुपए तक का है। मगर, समिति की संस्थापक गायत्री बॉरपात्र गोहाँई बताती हैं कि इस कैंपेन के जरिए उनके संगठन को 15 दिन के भीतर लोग जितनी भी मदद करेंगे। वो सब वह सनातन के परिजनों को सुपुर्द कर देंगे।

गायत्री बताती हैं कि सनातन डेका की पत्नी पूर्ण रूप से निरक्षर हैं और अपने हस्ताक्षर भी मुश्किल से कर पाती हैं। ऐसे में उनकी समिति के लोगों ने खुद गाँव के प्रधान से बात की है। जिसके बाद वह जल्द से उनका बैंक अकॉउंट खुलवाने की कोशिश कर रहे हैं और पैन कार्ड भी बनवाने का प्रयास जारी है।

गायत्री बॉरपात्र गोहाँई ऑपइंडिया से बातचीत में कहती हैं कि इस आर्थिक मदद के बाद उनकी समिति दीपाली की इच्छानुसार उनके पुनर्वास में भी उनकी मदद करेगी। दीपाली जी के पुनर्वास में उनकी शिक्षण, कौशल्य पर भी शंकरदेव समिति ध्यान देगी ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें। मगर, अभी फिलहाल उनकी पहली प्राथमिकता सनातन के परिजनों को आर्थिक रूप से सहायता प्रदान करवाना है। इसलिए, उन्होंने crowdkash प्लैटफॉर्म पर इस मुहीम (Support Family Of Assam Lynching Victim Sanatan Deka) की शुरूआत की है।

https://www.crowdkash.com/campaign/366/supportsanatandeka

यहाँ बता दें, कि इस मुहीम के अंतर्गत दी जाने वाली मदद शंकर देव समिति तक पहुँचेगी। इसके बाद ये लोग उस मदद को सनातन के परिजनों को पहुँचाएँगे। मुमकिन है उस समय तक दीपाली का अकॉउंट भी खुल जाए, तो बाकी की मदद सीधा उनके अकॉउंट में भिजवाई जाए। लेकिन, वर्तमान में विश्वसनीयता कायम रखने के लिए ये समिति जल्द ही दीपाली डेका से बातचीत कर उनकी वीडियो डालेगी, ताकि दानदाताओं के पास प्रमाण रहे कि उनका दान सही जगह पहुँचा है।

किंतु, जब तक सनातन डेका की पत्नी का बैंक खाता खुलने में देरी है, तब तक हर वो व्यक्ति, जिसे ऐसा लगता है कि सनातन की हत्या मानवीय क्रूरता की हर पराकाष्ठा को पार करती है, गरीबों के ऊपर हावी अमीरों के अत्याचार को इंगित करती हैं या इस्लामिक कट्टरपंथियों का असली चेहरा बयान करती है, जो रमजान के समय में भी ऐसे अपराधों को अंजाम देना अपनी शान समझते हैं। तो आप इस प्लैटफॉर्म के जरिए सनातन के परिवार को अपने सामर्थ्य व इच्छानुसार मदद कर सकते हैं।

आज शंकर देव समिति द्वारा शुरू किया गया ये अभियान केवल आर्थिक मदद नहीं है। ये हमारी एकता का परिचायक है। कुछ समय पहले ऑपइंडिया ने भी नीरज प्रजापति के लिए ऐसा ही अभियान चलाया था। आप सबके सहयोग से उस समय 32 लाख रुपए तक की मदद नीरज के परिवार को पहुँची थी।

आज शंकर देव समिति की ओर से शुरू किया गया अभियान का भी लगभग वही उद्देश्य है कि वे एक ऐसे व्यक्ति के परिवार को एक नया जीवन प्रदान कर सकें, जो न केवल गरीब था, बल्कि मेहनतकश भी था और लॉकडाउन के समय में केवल परिवार के लालन पालन के लिए घर में सब्जियाँ उगाकर उन्हें घर-घर बेचने निकला था। लेकिन, दुर्भाग्यवश, सब्जियों को बेचकर लौटते हुए उसकी साइकिल मुस्लिम बहुल इलाके में दो मुस्लिम युवकों की स्कूटी से टकराई और उन दोनों ने अपने साथियों के साथ इतना मारा कि उसने वहीं, दम तोड़ दिया।

हालाँकि, मामले के संबंध में अभी पोस्टमार्टम रिपोर्ट नहीं आई है। मगर शंकर देव समिति की गायत्री कहती हैं कि पुलिस इस मामले को एक एक्सीडेंट बताने की कोशिशों में जुटी है। वहीं, भास्कर ज्योति दास, जिनसे हमने इस संबंध में पहले संपर्क किया, उन्होंने भी इस बारे में यही बताया था कि पुलिस शुरू में इसे आम झड़प का मामला बताकर पेश कर रही थी, पर उनके आंदोलन के बाद सारा राज खुला।

इसके अलावा, बता दें एक वीडियो भी सामने आई है, जिसमें पुलिस आरोपितों को बड़े सहज भाव से थाने में ले जाती दिख रही हैं और आरोपित अपने दोनों हाथों को हिलाकर अपनी बेशर्मी का प्रमाण दे रहा है।

इसलिए, इन्हीं सब चीजों को देखते हुए, ऐसे समय में जरूरी है कि सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर शुरू किए अभियान को उसके लक्ष्य तक पहुँचाया जाए, जिससे कि सनातन के परिवार को ऐसे दृश्यों की पीड़ा इतनी न कचोटे और वो आगे अपना जीवन अंधकार में न देंखें।

उल्लेखनीय है कि सोशल मीडिया पर इस अभियान को बढ़-चढ़कर सपोर्ट किया जा रहा है। श्री श्री शंकर देव सेवा समिति ने इस अभियान के साथ लिखे पोस्ट में स्पष्ट लिखा है कि ये केवल आर्थिक मदद नहीं, बल्कि हमारे लोगों के साथ हमारी एकता का परिचायक है। हम ऐसे उपद्रवियों को अपना जीवन की अर्थव्यस्था नियंत्रण करने की अनुमति नहीं दे सकते।

श्री श्री शंकर देव सेवा समिति

श्री श्री शंकर देव सेवा समिति एक भारतीय पंजीकृत गैर-लाभकारी संगठन है जो समाज के सर्वांगीण विकास और कल्याण के लिए समर्पित है। इसकी शुरुआत साल 2012-13 के बीच हुई थी।

आज ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ मंत्र के तहत गठित यह संघठन विश्व भर में अपना विस्तार कर रहा है और कोविड-19 जैसी महामारी के समय में ही नहीं बल्कि इससे पहले भी बाढ़ जैसे कई आपदाओं के समय में इस संगठन ने बढ़ चढ़कर लोगों की मदद करने में अपनी बड़ी भूमिका अदा की है।

शुरुआत में इस संगठन से कुछ एक लोग ही जुड़े थे, मगर धीरे-धीरे संगठन काम करता रहा, और इनकी प्रतिबद्धता को देखते हुए कई लोग इनसे जुड़े। आज देश के कोने-कोने में इस समिति के कार्यकर्ता हैं, जो मानव कल्याण और दीपाली जैसे लोगों के पुनर्वास के लिए कार्य कर रहे हैं।

देशद्रोह में गिरफ्तार शरजील इमाम की याचिका पर SC में सुनवाई, कोर्ट ने दिल्ली, यूपी समेत 3 अन्य राज्यों से माँगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (मई 26, 2020) को देशद्रोह के मामले में पकड़े गए शरजील इमाम की याचिका पर सुनवाई की। मामले पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अशोक भूषण, संजय किशन कौल और एमआर शाह की बेंच ने असम, यूपी, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश को नोटिस जारी किया, जहाँ पर शरजील इमाम के खिलाफ FIR दर्ज है।

बता दें कि पिछले दिनों शरजील इमाम ने याचिका दायर करते हुए खुद पर दर्ज सभी FIR पर एकसाथ एक ही एजेंसी से जाँच की माँग उठाई थी। शरजील इमाम ने कहा था कि उसके खिलाफ एक ही बयान के लिए अलग-अलग राज्यों में दर्ज FIR को क्लब किया जाए और निर्देश दिया जाए कि एक ही जाँच एजेंसी मामले की जाँच करे। 

सुप्रीम कोर्ट ने इस पर विस्तृत रिपोर्ट पेश करने के लिए दिल्ली पुलिस को एक सप्ताह का समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई एक हफ्ते बाद होगी। हालाँकि, अदालत ने कोई तारीख तय नहीं की है।

सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने यह कहते हुए जवाब दाखिल करने के लिए और अधिक समय माँगा था कि आरोपित शरजील इमाम कई राज्यों में आरोपों का सामना कर रहा है। उन्होंने कहा कि वह कल इस मामले पर जवाब दाखिल करेंगे। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट को सभी पार्टियों को नोटिस जारी करना चाहिए, केवल दिल्ली के एनसीटी को नोटिस देना पर्याप्त नहीं है।

याचिकाकर्ता शरजील के वकील सिद्धार्थ दवे ने रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्नब गोस्वामी और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के केस का हवाला दिया, जिसमें उनके खिलाफ अलग-अलग राज्यों में दर्ज केस को एक साथ क्लब करने के लिए अर्जी दाखिल करने की इजाजत मिली थी। हालाँकि, सॉलीसीटर तुषार मेहता ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा कि दोनों केस में बहुत अंतर है।

गौरतलब है कि शरजील पर पिछले साल दिसंबर में दिल्ली के जामिया में दंगा भड़काने और देश-विरोधी भाषण देने का आरोप है। उसके एक ही बयान के लिए पाँच राज्यों में पाँच अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गई है। अभी शरजील गुवाहाटी जेल में बंद है।

दिल्ली पुलिस ने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के छात्र शरजील इमाम पर गैर-कानूनी गतविधियाँ रोकथाम कानून (UAPA) के तहत भी मुकदमा दर्ज कर लिया है। शरजील को पिछले साल दिसंबर महीने में देशविरोधी भाषण देने और जामिया में दंगा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ भड़काऊ नारेबाजी और हिंसक विरोध प्रदर्शनों के बीच शरजील इमाम का एक बेहद आपत्तिजनक वीडियो सामने आया था। इस विडियो में पूर्वोत्तर और असम को भारत के नक्शे से मिटाने का घृणित मंसूबा बेनकाब हुआ था।

वीडियो में शरजील इमाम ने कहा था, “हमारे पास संगठित लोग हों तो हम असम से हिंदुस्तान को हमेशा के लिए अलग कर सकते हैं। परमानेंटली नहीं तो एक-दो महीने के लिए असम को हिंदुस्तान से कट कर ही सकते हैं। रेलवे ट्रैक पर इतना मलबा डालो कि उनको एक महीना हटाने में लगेगा…जाना हो तो जाएँ एयरफोर्स से। असम को काटना हमारी जिम्मेदारी है।”

‘भास्कर’ ने रेलवे को निशाना साध कर छापी ‘भावुक’ खबर: रेलवे ने बताया फेक न्यूज, कई जानकारियाँ गलत

श्रमिक ट्रेनों को लेकर रेल मंत्रालय को घेरने के लिए मीडिया का फेक न्यूज़ चला रहा है। ‘दैनिक भास्कर’ ने ऐसी ही एक इमोशनल स्टोरी प्रकाशित कर के दावा किया कि मजदूर पहले ट्रैक पर मर रहे थे, अब वो ट्रेनों में मर रहे हैं। अपनी इमोशनल स्टोरी में भास्कर ने दावा किया कि ईद के दिन इरशाद नामक बच्चे की ट्रेन में ही मौत हो गई। हालाँकि, रेलवे ने बाद में जब सच्चाई बयान की तो भास्कर के इस ख़बर की पोल खुल गई।

इरशाद के पिता मोहम्मद पिंटू के हवाले से ‘दैनिक भास्कर’ ने दावा किया कि गर्मी की उमस और भूख के कारण उनके बेटे की मौत हुई है। इस ख़बर में ये भी दावा किया गया कि सूरत से सीवान पहुँचने में ट्रेनों को पूरे 9 दिन लग गए। रेलवे ने इस ख़बर को नकारते हुए कहा है कि ये पूरी की पूरी रिपोर्ट अर्धसत्य और गलत सूचनाओं से भरी हुई है। भारतीय रेलवे के प्रवक्ता ने ट्विटर के माध्यम से बताया कि 25 मई को सूरत से दो ट्रेनें 2 दिन मे पहुँच गई थी, इसीलिए 9 दिन वाली बात झूठी है।

रेलवे ने बताया कि वो बच्चा पहले से ही बीमार था और इलाज के बाद उसके परिजन उसे लेकर लौट रहे थे। अभी तक पोस्टमॉर्टम भी नहीं कि गई है, ऐसे में उसकी मौत के कारण के बारे में कुछ पता ही नहीं है। रेल मंत्रालय के सूत्रों ने ऑपइंडिया को कन्फर्म किया कि 099339 नंबर की ट्रेन सूरत से 23 मई को सुबह साढ़े 5 बजे चली थी और 25 मई को 2:20 बजे सीवान पहुँच चुकी थी। वहीं 09439 नंबर की दूसरी ट्रेन सूरत से 23 मई को 11 बजे चली और 25 मई को शाम 4:55 में सीवान पहुँच गई।

ऐसे में 9 दिन वाली बात कहाँ से या गई, ये ‘दैनिक भास्कर’ ने बिना समय का जिक्र किए ही दावा कर दिया है। इसी तरह गया के एक मजदूर के बारे में ख़बर में दावा किया गया कि उसकी भी मौत ट्रेन में ही हो गई। उसकी पहचान 44 वर्षीय नसीर खान के रूप मे बताई गई है। जबकि रेलवे ने बताया कि नसीर को लेकर जब ट्रेन दानापुर पहुँची, तब वह बेहोशी की हालत में था। वहीं महाराष्ट्र से भी एक श्रमिक की मौत की बात कही गई, जिसके लिए रेलवे को जिम्मेदार ठहराया गया।

रेलवे से बात करने पर इस घटना की सच्चाई पता चली। दरअसल, उक्त व्यक्ति अपने भतीजे अरमान खान के साथ सफर कर रहा था। वो ट्रेन संख्या 09447 से सफर कर रहा था। वहाँ पर उसकी तबीयत खराब होने की सूचना मिलते ही रेलवे की मेडिकल टीम डॉक्टर नीलेश के नेतृत्व में पहुँची। वहाँ जाँच-पड़ताल के बाद उक्त व्यक्ति को मृत घोषित किया गया। इसके बाद आगे की प्रक्रिया की जा रही है, जिसके बाद और भी डिटेल्स सामने आएँगे। बावजूद इसके इस मौत के लिए रेलवे को जिम्मेदार ठहरा दिया गया।

इसी तरह कटिहार के 55 वर्षीय मोहम्मद अनवर की ख़बर प्रकाशित की गई। वो मुंबई के बांद्रा टर्मिनल से चढ़ा था। ‘दैनिक भास्कर’ ने उसके बारे में बताया कि वो 4 दिन से भूखा था और उसे खाने को नहीं दिया गया, इसीलिए वो मर गया। अनवर के बारे मे बताया गया कि उसने बरौनी में बस 10 रुपए का सत्तू खरीद कर खाया था। ‘दैनिक भास्कर’ का वर्जन कहता है कि वो पानी लेने उतरा और उसकी मौत हो गई।

इस मामले में भी रेलवे ने सच्चाई सामने रखी है।। रेलवे ने बताया कि अनवर पानी की पाइपलाइन के पास ही गिर गया था और बेहोशी की अवस्था में था। इसके बाद तुरंत स्टेट मेडिकल स्क्रीनिंग टीम के डॉक्टर मौके पर पहुँचे, जहाँ उसे मृत घोषित किया गया। बाद में पता चला कि वो अपने 3 परिचितों के साथ मुंबई से मधुबनी वाली ट्रेन में बैठा था। इसके बाद वो बेगूसराय में ट्रेन का इंतजार कर रहा था। मृत शरीर को बेगूसराय अस्पताल में भेजा गया। इस मामले में भी जाँच के बाद और जानकारी सामने आएगी।

अगर रेलवे द्वारा घटनाओं के संबंध में दी गई जानकारी को देखें तो पता चलता है कि ‘दैनिक भास्कर’ ने आधे-अधूरे तथ्यों के साथ किसी भी प्रकार की मौत के लिए रेलवे को ही जिम्मेदार ठहराने के लिए ऐसी कहानियाँ ढूँढी हैं। जबकि हर मामले में जैसे ही रेलवे को सूचना मिली, डॉक्टरों की टीम भागी हुई आई। इसमें से पहले से ही बीमार और इलाजरत लोगों की मौत के लिए भी रेलवे के मत्थे ही दोष मढ़ दिया गया।

‘दैनिक भास्कर’ ने दावा कर दिया कि रेलवे के कारण एक दिन में कुल 7 मौतें हुई हैं। एक कटिहार जा रही महिला की मौत की बात कही गई। साथ ही एक महिला की अपने पति की गोद में दम तोड़ने की ‘भावुक’ स्टोरी पब्लिश की गई। ये सारी मौतें बिहार में ही हुईं। किसी भी घटना में रेलवे का पक्ष नहीं लिखा गया और डॉक्टरों के मौके पर पहुँचने की बात भी छिपा ली गई। जब ट्रेन की टाइम ही गलत बताई गई तो आप सोच सकते हैं बाकी ख़बरों में कितनी हेरफेर की गई होगी।

कभी PPE किट की कमी तो कभी वेंटिलेटर्स में खोट: जानिए कैसे मीडिया गिरोह ने चीन के लिए की खुलेआम बैटिंग

भारत में मीडिया के एक खास वर्ग का चलन है कि वो पहले किसी चीज में कमी निकालता है और बाद में पता चलता है कि उस कमी को (अगर है तो) दूर कर लिया गया है तो वो कहने लगता है कि ये ऐसे नहीं बल्कि वैसे होना चाहिए था। भारत में कोरोना वायरस से निपटने के उपायों पर चर्चा करें तो रवीश कुमार सरीखे पत्रकारों ने यही काम किया है। हर चीज में कमी निकालना, सरकार को बदनाम करना और असली दोषी चीन का बचाव करना।

जब कोरोना वायरस का संक्रमण शुरू हुआ था, तब मीडिया के एक ख़ास जमात ने टेस्टिंग किट की कमी का हल्ला मचाना शुरू कर दिया था। बताया गया कि 25 करोड़ लोग बीमार होने वाले हैं। ये सब इसीलिए, ताकि सरकार पर दबाव बने और वो विदेश से टेस्टिंग किट ख़रीदे। टेस्टिंग किट बस एक ही देश बेच रहा था और वो था चीन। रैपिड टेस्टिंग किट का थोड़ा बहुत इंपोर्ट चीन से हुआ, उसमें भी ज़्यादातर ख़राब निकले।

अभी रोज़ क़रीब 1 लाख टेस्ट हो रहे हैं और ज़्यादातर टेस्टिंग किट भारतीय कंपनियाँ बना रही हैं। चीन का माल नहीं बिक पाया। मीडिया गिरोह का दुष्प्रचार फेल हो गया। फिर वेंटिलेटर का शोर मचाया गया। ऐसा लगा मानो इसके बिना आफ़त आ जाएगी। बताया गया कि देश में सिर्फ़ 45 हज़ार वेंटिलेटर है और मई तक 10 लाख चाहिए। इतने वेंटिलेटर सिर्फ़ चीन ने पहले से बनाकर रखे हैं। वो भी डबल रेट यानी भारतीय रुपये के हिसाब से एक क़रीब 10 लाख का।

जो देसी कंपनियाँ कल तक मशीनरी टूल्स बनाती थीं, उन्होंने वेंटिलेटर बनाना शुरू कर दिया। राजकोट की कंपनी ने 1 लाख रुपए का बेसिक वेंटिलेटर बनाकर लॉन्च भी कर दिया। पहले 100 सरकार को फ़्री में दिए। कहा कि कुछ पार्ट्स जापान से आने हैं, उसके बाद इसे उन्हें अपग्रेड कर दिया जाएगा। मारुति, ह्यूंडई और महिंद्रा जैसी कार कंपनियाँ भी वेंटिलेटर बनाने लगीं। अब ‘अहमदाबाद मिरर’ में छपवाया गया कि राजकोट की कंपनी का वेंटिलेटर नक़ली है।

इसी बहाने ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की खिल्ली उड़ाई गई। जबकि वो फ़ौरन ज़रूरत के लिए बेसिक मॉडल था, जिसे कंपनी अपग्रेड कर रही है। भारतीय मीडिया जिस वेंटिलेटर को नक़ली बता रही है, उसे स्पेन और कुछ यूरोपीय देशों से ऑर्डर मिलने शुरू हो चुके हैं। वैसे इन चीजों का मजाक बनाया जाना कोई नई बात नहीं है। राहुल गाँधी सरीखे नेता पहले भी ‘मेक इन इंडिया’ का मजाक बनाते रहे हैं।

अभी की ज़रूरत के हिसाब से वेंटिलेटर की थोड़ी कमी पैदा हुई तो अमेरिका ने 200 मुफ़्त में दे दिए। अब भारतीय मीडिया में चीन के सेल्समैनों ने शोर मचाया कि अमेरिका फ़्री में नहीं दे रहा बल्कि 20 करोड़ रुपए ले रहा है। मात्र दो महीने में भारत पीपीई किट का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक बन गया। तो अब पीपीई किट की क्वालिटी को लेकर बाजा बजने लगा कि वो चावल की बोरी जैसे हैं। जबकि ये वो किट हैं, जो शुरू में बने थे।

बता दें कि अपनी आदत के मुताबिक़ हमेशा नकारात्मक और विपरीत दिशा में बात करने वाले रवीश कुमार ने प्राइम टाइम में बैठ कर अपने कार्यक्रम में चीन का स्तुति गान किया। जिस वायरस की बात पर आज सारा विश्व चीन पर उँगली उठा रहा है, उस वायरस पर रवीश जी चीन को क्लीन चिट भी दे रहे हैं और कुछ विजुअल्स भी दिखा रहे की देखिए सब कुछ सामान्य है यहाँ। उन्होंने चीन को ‘निर्दोष और बेचारा’ साबित करने के लिए पूरा जोर लगा दिया।

रवीश ने 2 बार प्राइम टाइम कर के चीन का बचाव किया। एक बार 20 अप्रैल को और एक बार 24 अप्रैल को, जिसकी चर्चा हमने ऊपर की है। उन्होंने चीनी राजदूत के ट्वीट की व्याख्या करते हुए उसे ‘महान’ साबित करने का प्रयास किया। उन्होंने दावा किया कि मीडिया के पास ख़बरों का अकाल है और उन्हें कोई दुश्मन चाहिए, इसीलिए चीन को चुन लिया गया। इस बेहूदे लॉजिक के साथ रवीश ने चीन का बचाव किया था।

हाल ही में एक खबर आई थी कि चीन अब हर देश में अपने मेकओवर पर जुट गया है। इसके तहत ऐसे मीडिया संस्थानों को चिह्नित किया जा रहा है, जो उसके खिलाफ लिखते हैं। उन्हें किसी तरह हैंडल किया जा रहा है। साथ ही हर देश में चीन ने कुछ पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को सिर्फ इसीलिए हायर किया है, ताकि वो उसके बारे में सकारात्मक बातें लिख-लिख कर उसका महिमामंडन कर सकें। रवीश ऐसा क्यों कर रहे हैं, ये अंदाज़ा आप खुद लगाइए।

भारत में अब पीपीई किट उसी स्टैंडर्ड से बन रहे हैं, जिससे दुनिया के दूसरे देशों में बनते हैं। इस मामले में भी चीन को बहुत नुक़सान हुआ है। ये तीनों मामले बताते हैं कि भारतीय मीडिया में चीन के सेल्समैन कोशिश तो बहुत कर रहे हैं लेकिन कुछ ख़ास कर नहीं पा रहे। आखिर जिस देश से सीमा पर भी हमारे रिश्ते तनावपूर्ण ही रहे हैं, उसका गुणगान करने के लिए हमारा मीडिया बेचैन क्यों है? इसमें कहीं उनका कुछ व्यक्तिगत फायदा तो नहीं?

बकौल रवीश कुमार, जिन्होंने पूरा 2020 पहले ‘टेस्टिंग नहीं हो रहे’, फिर ‘वेंटिलेटर नहीं है’, ‘पीपीई किट नहीं मिल रहे’ का शोर करने में एक तिहाई से ज़्यादा साल तो निकाल ही दिया, लेकिन उनका एक प्रोपेगेंडा नहीं चल पाया। न तो भारत में ऐसे ‘शर्तिया इलाज’ बेचने वाले पत्रकारों को अब कोई सुनता है, न ही इनके बिकाऊ अजेंडे में कोई तथ्य दिखता है। जिस हिसाब के आँकड़े ये दे रहे थे कि भारत अब तबाह हो जाएगा, वैसा कुछ नहीं हुआ और लाख जतन करने के बाद भी चीन की थू-थू जारी है।

साथ ही, चीन का गुणगान करने वालों को अब ज्ञात होना चाहिए कि वहाँ 12 करोड़ को दोबारा लॉकडाउन में डाल दिया गया है। 20 अप्रैल को रवीश प्राइम टाइम में पूरी तरह से चीन की बैटिंग करते नजर आए कि दुनिया ‘चायना बैशिंग थ्योरी’ पर चल रही है जबकि चीन ने तो ये कर दिया, वो कर दिया। रवीश ने यहाँ तक कहा कि खबरों के अकाल के कारण चीन पर निशाने साधे जा रहे हैं और ऐसे समय में सरकार अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए चीन के नाम का दुश्मन जनता को देना चाहती है।

चीन को बचाने के लिए रवीश की ‘बकैती’

रवीश ने अपने प्राइम टाइम में चीन को न सिर्फ मासूम और दयनीय हालत को झेलने वाला बताया बल्कि उसे सबसे सक्षम महामानव भी कहा। रवीश के गैंग में से एक कथित वैश्विक एक्स्पर्ट न केवल वुहान से वायरस फैलने को सम्भावना कह रहे हैं बल्कि वुहान से 1100 किलोमीटर उत्तर में बसे बीजिंग की क्लिप दिखाकर वो स्थिति को सामान्य बता रहे। इसी तरह उन्होंने चीन को क्लीन-चिट देने के लिए एड़ी-चोटी एक की।

सवाल यह है कि भारत को कब ऐसी जरूरत पड़ गई? अगर भारत की हालत खराब होनी होती तो चार महीने की ‘बेकार व्यवस्था’ एक लम्बा समय है। आखिर, भारत बर्बाद क्यों नहीं हो गया? वो इसलिए कि भारत का प्रारब्ध रवीश कुमार की फेसबुक के हिसाब से नहीं चलता। भारत ने फरवरी के पहले सप्ताह से तमाम बचाव के प्रयास किए, घेराबंदी शुरू की, लॉकडाउन लगाया और काफी हद तक बीमारी के तीसरे चरण ‘कम्यूनिटी फैलाव’ को नियंत्रित रखने में सफलता पाई।

ये मीडिया का वही वर्ग है, जो चाहता था कि यहाँ ज्यादा से ज्यादा लाशें गिरे, ताकि उसे सरकार को कोसने का एक बढ़िया मौक़ा मिले। लेकिन, ऐसा नहीं हुआ। कोरोना के मृत्यु दर का मामला हो या फिर इससे निपटने के लिए हुई तैयारियों का, मीडिया द्वारा बदनाम किए जाने की लाख कोशिशों के बावजूद भारत सरकार ने अपनी ओर से पूरा प्रयास किया। आर्थिक पैकेज को लेकर भी हंगामा मचाया गया, बाद में यही लोग पूछने लगे कि पैसा कहाँ से आएगा?

(ये पोस्ट चन्द्र प्रकाश के फेसबुक पोस्ट से प्रेरित है)

मुंबई के KEM अस्पताल में कोरोना ड्यूटी पर तैनात स्वास्थ्यकर्मी की मौत, स्ट्राइक पर बाकी स्टाफ, लगाए कई आरोप

मुंबई के केईएम अस्पताल (KEM HOSPITAL) में कोरोना वायरस वार्ड में तैनात स्वास्थ्यकर्मी की रविवार को मौत के बाद अस्पताल का कॉन्ट्रैक्चुअल स्टाफ स्ट्राइक पर चला गया।

टाइम्स नॉऊ की खबर के अनुसार, 32 वर्षीय स्वास्थ्य कर्मचारी जिसकी मौत हुई, वह भी अस्पताल में कॉन्ट्रैक्ट पर था और पिछले कुछ समय से उसकी बहुत तबीयत खराब थी। मगर, स्वास्थ्य संबंधी परेशानी होने के कारण भी अस्पताल ने उसे छुट्टी नहीं दी और रविवार को उसकी मौत हो गई।

हालाँकि, कर्मचारी कोरोना संक्रमित था या नहीं इसके बारे में अभी जानकारी नहीं मिल पाई है। लेकिन, उसकी जाँच के लिए सैंपल भेज दिया गया है। प्रदर्शन पर बैठे कर्मचारियों की नाराजगी ये है कि प्रशासन ने न तो उनके साथी को उपयुक्त सुविधा प्रदान की और न ही किन्हीं मायनों में उनकी मदद करनी चाही।

इसके अलावा इस स्ट्राइक का एक दूसरा कारण ये भी बताया जा रहा है कि प्रदर्शन कर रहे कर्मियों की शिकायत है कि उनका सुपरवाइजर उनके लिए काफी अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करता है। खासकर तब जब वह वरिष्ठ अधिकारियों के मनमुताबिक काम नहीं करते।

प्रदर्शन पर बैठे लोगों का कहना है कि इन्हें प्रशासन की ओर से पर्याप्त सुरक्षा उपकरण भी नहीं दिए गए हैं। फिर भी ये अपनी जान की बाजी लगाकर वहाँ काम करते हैं और उसके बदले उन्हें ये सब झेलना पड़ता है। इसलिए, यही कारण है कि उनके अंदर अब गुस्सा भर चुका है और उन्होंने ये स्ट्राइक करके काम को रोक दिया है।

अब, भले ही मुंबई के अस्पताल में हुई इस स्ट्राइक में डॉक्टर्स शामिल नहीं है। लेकिन, इन स्वास्थ्य कर्मचारियों के काम रोकने से जाहिर है अस्पताल के काम-काज में बहुत फर्क आएगा। क्यूँकि इनमें से अधिकांश वे लोग है, जो परिसर की साफ-सफाई करते हैं या फिर मरीजों को एक जगह से दूसरी जगह शिफ्ट करने में मदद करते हैं। इसके अलावा इस स्ट्राइक में कुछ नर्सें भी शामिल हैं। जो डॉक्टर्स के बाद मरीजों का ख्याल रखती हैं।

यहाँ बता दें कि कोरोना संकट के बीच में महाराष्ट्र के हालात दिन पर दिन बिगड़ते जा रहे हैं। कल तक मुंबई में मौतों का आँकड़ा 1000 की संख्या पार कर गया। इस संबंध में नीतीश राणे ने एक ट्वीट भी किया है।

इन ट्विट्स में उन्होंने KEM अस्पताल के भीतर की फोटो शेयर की है और एक डॉक्टर की वीडियो को साझा करते हुए दुख जताया है कि इस संकट की घड़ी में जब वो हमारे लिए सबसे आगे हैं, उस समय उन्हें बहुत कम सैलरी दी जा रही है।